NCERT की पाठ्यपुस्तक वितान भाग 2 के अध्याय 3 «अतीत में दबे पाँव» की प्रश्नावली के सभी आठ प्रश्नों के पूर्ण उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 साधन-संपन्नता बनाम भव्यता का आडंबर
प्र. सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था। कैसे?
उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता के पास साधनों की कोई कमी नहीं थी। उसने सुनियोजित नगर बनाए, महाकुंड जैसी उन्नत जल-व्यवस्था खड़ी की, विशाल कोठार बनाया (जिसमें कर के रूप में हासिल अनाज शायद जमा किया जाता था), सूत की कताई-बुनाई और रंगाई की, और इतिहासकारों के अनुसार कुएँ खोदकर भू-जल तक पहुँचने वाली संसार की पहली ज्ञात संस्कृति बनी। इसीलिए साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए मुअनजो-दड़ो को सबसे समृद्ध भी माना गया है। इसके बावजूद यहाँ न भव्य राजप्रसाद मिले, न मंदिर, न राजाओं-महंतों की समाधियाँ, और हथियार भी उस तरह कहीं नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। यहाँ के मूर्तिशिल्प भी आकार में छोटे हैं, नरेश का मुकुट तक इतना छोटा है कि उससे छोटे सिरपेंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती, और नावें मिस्र की नावों जैसी बनावट की होते हुए भी आकार में छोटी रहीं। लेखक के शब्दों में यह “लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति” थी; इसकी संपन्नता की बात कम हुई है तो शायद इसलिए कि उसमें भव्यता का आडंबर नहीं है।
2 समाज-पोषित सौंदर्य-बोध
प्र. “सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।” ऐसा क्यों कहा गया?
उत्तर: पाठ के अनुसार सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज़्यादा था। वास्तुकला और नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप इस सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज़्यादा कला-सिद्ध ज़ाहिर करते हैं। दूसरी ओर यहाँ राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत दिखाने वाले भव्य राजप्रसाद या मंदिर नहीं मिले, और मूर्तिशिल्प भी छोटे हैं। यानी यह सौंदर्य किसी राजा या धर्म-सत्ता की महिमा बढ़ाने के लिए नहीं, आम जीवन की चीज़ों में दिखता है। इसीलिए एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था; और शायद इसीलिए उसमें आकार की भव्यता की जगह कला की भव्यता दिखाई देती है।
3 ताकत से नहीं, समझ से अनुशासित
प्र. पुरातत्त्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि “सिंधु-सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।”
उत्तर: सबसे बड़ा चिह्न यह है कि मुअनजो-दड़ो क्या, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं; अजायबघर में औज़ार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं। इसी आधार पर विद्वान मानते हैं कि यहाँ कोई सैन्य सत्ता शायद न रही हो। फिर भी कोई अनुशासन ज़रूर था, जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ़-सफ़ाई जैसी व्यवस्थाओं में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था। इसके कुछ उदाहरण: सीधी-आड़ी सड़कों वाला नियोजन; मुअनजो-दड़ो के घरों की एक ही आकार की, 1:2:4 अनुपात की, भट्टी में पकी ईंटें; घरों की कमोबेश एक-सी वास्तु शैली (सामने की दीवार में केवल प्रवेश-द्वार, दरवाज़े अंदर गलियों में); हर घर में स्नानघर और ढकी नालियों का जाल। इन सबसे लगता है कि यहाँ अनुशासन ताकत के बल पर नहीं, समझ के बल पर था।
4 खंडहरों से इतिहास के पार झाँकना
प्र. “यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आप को कहीं नहीं ले जातीं। वे आकाश की तरफ़ अधूरी रह जाती हैं। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं उस के पार झाँक रहे हैं।” इस कथन के पीछे लेखक का क्या आशय है?
उत्तर: लेखक कहना चाहते हैं कि मुअनजो-दड़ो की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब किसी असली मंज़िल तक नहीं पहुँचतीं, वे बीच में ही अधूरी रह जाती हैं; यानी वे अपने मूल, व्यावहारिक उद्देश्य के हिसाब से बेकार हो चुकी हैं। पर उन्हीं अधूरे पायदानों पर खड़े होकर एक अलग ही अनुभव होता है: मानो आप दुनिया की छत पर खड़े हों, और वहाँ से इतिहास को सिर्फ़ पढ़ा नहीं जा रहा, बल्कि उसके पार झाँका जा रहा हो। यानी यह जगह अब चलने-फिरने के काम की नहीं, पर कल्पना और अनुभूति के स्तर पर बहुत गहरी और असीम हो गई है; खंडहर होकर भी यह इतिहास से परे कुछ महसूस कराती है।
5 खंडहर, अनछुए समयों का दस्तावेज़
प्र. टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती ज़िंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज़ होते हैं, इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: खंडहर केवल ईंट-पत्थर के ढेर नहीं होते, वे उस सभ्यता के तकनीकी और सामाजिक इतिहास को तो दिखाते ही हैं, साथ ही उन आम लोगों की रोज़मर्रा की, धड़कती हुई ज़िंदगी की झलक भी देते हैं जो किसी बड़ी घटना या तारीख़ में दर्ज नहीं होती। मुअनजो-दड़ो के घरों की दीवारें, आँगन, स्नानघर और गलियाँ बताती हैं कि यहाँ कभी असली लोग रहते और साधारण दिनचर्या जीते थे। पाठ के अनुसार आज भी किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं, या किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर बैलगाड़ी की रुनझुन सुन सकते हैं। ये “अनछुए समय” इतिहास की किताबों में सीधे दर्ज नहीं होते, पर खंडहरों की चुप्पी में सुरक्षित रह जाते हैं; यही भाव इस कथन में निहित है।
6 किसी नज़दीक से देखे ऐतिहासिक स्थल का वर्णन
प्र. इस पाठ में एक ऐसे स्थान का वर्णन है जिसे बहुत कम लोगों ने देखा होगा, परंतु इससे आपके मन में उस नगर की एक तसवीर बनती है। किसी ऐसे ऐतिहासिक स्थल, जिसको आपने नज़दीक से देखा हो, का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर (नमूना): मैंने दिल्ली का पुराना क़िला नज़दीक से देखा है। इसकी ऊँची, मोटी पत्थर की दीवारें, बड़ा फाटक और अंदर के खंडहर टूटी हुई इमारतों के दिखाई देते हैं, पर उनकी बनावट से अंदाज़ा होता है कि कभी यह क़िला कितना जीवंत और गतिशील रहा होगा। परकोटे पर चढ़कर देखने पर पूरे इलाक़े का नज़ारा दिखता है, और अंदर की मस्जिद व शेरमंडल जैसी इमारतें बताती हैं कि यहाँ प्रशासन, धर्म और रोज़मर्रा का जीवन साथ-साथ चलता था। मुअनजो-दड़ो की तरह ही, यहाँ की चुप ईंटें भी अपने ढंग से एक पूरे शहर की कहानी सुना देती हैं। (विद्यार्थी अपने देखे किसी और स्थल का वर्णन भी लिख सकते हैं।)
7 जल-संस्कृति का प्रश्न
प्र. नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखते हुए लेखक पाठकों से प्रश्न पूछता है कि क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं? आपका जवाब लेखक के पक्ष में है या विपक्ष में? तर्क दें।
उत्तर: मेरा जवाब लेखक के पक्ष में है। पाठ में दिए गए प्रमाण इस दावे का पूरा समर्थन करते हैं: महाकुंड जैसी जलरोधी, धार्मिक-अनुष्ठानिक स्नान-व्यवस्था; अकेले मुअनजो-दड़ो में करीब सात सौ कुएँ; इतिहासकारों के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता का संसार की पहली ज्ञात संस्कृति होना जो कुएँ खोदकर भू-जल तक पहुँची; हर घर में स्नानघर और मुख्य सड़कों के दोनों तरफ़ समांतर ढकी नालियों का सुव्यवस्थित जाल, जो पानी-निकासी की ऐसी व्यवस्था है जो इससे पहले के इतिहास में कहीं नहीं मिलती। पानी का इतना केंद्रीय, रोज़मर्रा और अनुष्ठानिक दोनों तरह का उपयोग यह साबित करता है कि जल इस सभ्यता की पहचान का एक अहम हिस्सा था, इसलिए इसे जल-संस्कृति कहना उचित है।
8 लिखित साक्ष्य के अभाव में बनी धारणा
प्र. सिंधु घाटी सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है। सिर्फ़ अवशेषों के आधार पर ही धारणा बनाई है। इस लेख में मुअनजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की गई है, क्या आपके मन में इससे कोई भिन्न धारणा या भाव भी पैदा होता है? इन संभावनाओं पर कक्षा में समूह-चर्चा करें।
उत्तर (नमूना): लेखक की धारणा, कि यह एक अनुशासित, समाज-पोषित सौंदर्य-बोध वाली और भव्यता के आडंबर से दूर सभ्यता थी, अवशेषों के आधार पर बहुत ठोस लगती है, और मैं इससे मूल रूप से सहमत हूँ। फिर भी मन में एक भिन्न संभावना भी उठती है: क्या हथियारों का न मिलना यह भी दिखा सकता है कि उस काल की युद्ध-तकनीक इतनी सरल रही हो कि उसके औज़ार आज तक न बचे हों, न कि यह कि युद्ध हुए ही नहीं? लिखित साक्ष्य के अभाव में हम केवल भौतिक अवशेषों से अनुमान लगा सकते हैं, इसलिए कोई भी धारणा अंतिम सत्य नहीं मानी जानी चाहिए; यही बात कक्षा में समूह-चर्चा के लिए भी सबसे उपयोगी बिंदु हो सकती है, जहाँ अलग-अलग विद्यार्थी अपने-अपने तर्क और संभावनाएँ रख सकते हैं।