इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: रेणु का जन्म औराही हिंगना गाँव, पूर्णिया ज़िला, बिहार में हुआ था।
प्र. रेणु ने 1942 में किस आंदोलन में भाग लिया था?
उत्तर: रेणु ने 1942 के ‘भारत छोड़ो’ स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया था।
प्र. हरगोबिन किस गाँव का संवदिया है?
उत्तर: हरगोबिन जलालगढ़ गाँव का संवदिया है।
प्र. ‘संवदिया’ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: ‘संवदिया’ का शाब्दिक अर्थ है संदेशवाहक, संदेश पहुँचाने वाला।
प्र. बड़ी बहुरिया किस साग को खाकर गुज़ारा करती थी?
उत्तर: बड़ी बहुरिया बथुआ-साग खाकर गुज़ारा करती थी।
प्र. बड़े भैया की मृत्यु कैसे हुई थी?
उत्तर: बड़े भैया की मृत्यु एक घंटे की बीमारी में हो गई थी।
प्र. काबुली व्यापारी का नाम क्या था?
उत्तर: काबुली व्यापारी का नाम गुल मुहम्मद आगा था।
प्र. हरगोबिन को कटिहार से जलालगढ़ तक कितनी दूरी पैदल तय करनी पड़ी?
उत्तर: हरगोबिन को कटिहार से जलालगढ़ तक बीस कोस की दूरी पैदल तय करनी पड़ी।
प्र. कहानी में सूरदास कौन है?
उत्तर: वापसी की गाड़ी में आने वाला “निरगुन गानेवाला सूरदास”, जिसके गीतों को सुनकर हरगोबिन का जी थोड़ा स्थिर हुआ।
प्र. बड़ी बहुरिया की माँ ने विदाई में हरगोबिन को क्या दिया?
उत्तर: बड़ी बहुरिया की माँ ने विदाई में हरगोबिन को बासमती चूड़े की एक पोटली दी।
प्र. ‘काबुली-कायदा’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘काबुली-कायदा’ का अर्थ है ज़ोर-ज़ुल्म से, कठोरता से उधार वसूलने का तरीक़ा।
प्र. रेणु की किस कहानी पर फ़िल्म बनी?
उत्तर: रेणु की ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम’ कहानी पर फ़िल्म बनी।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. गाँव के लोग संवदिया के बारे में क्या ग़लत धारणा रखते हैं?
उत्तर: पाठ के अनुसार गाँव के लोगों की गलत धारणा है कि निठल्ला, कामचोर और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है। बिना मज़दूरी लिए जो गाँव-गाँव संवाद पहुँचावे, उसे वे ‘औरतों का गुलाम’ कहते हैं। पर पाठ पूछता है कि गाँव में कौन ऐसा है, जिसके घर की माँ-बहू-बेटी का संवाद हरगोबिन ने नहीं पहुँचाया है।
प्र. बड़ी हवेली की स्थिति बिगड़ने का क्या कारण था?
उत्तर: बड़े भैया की मृत्यु के बाद तीनों भाइयों में आपस में लड़ाई-झगड़ा शुरू हुआ, रैयतों ने ज़मीन पर दखल कर लिया, और तीनों भाई गाँव छोड़कर शहर जा बसे, जिससे हवेली की शान घट गई और नौकर-चाकर का सहारा ख़त्म हो गया। बूढ़ी माता के अनुसार ज़मीन-जायदाद भी चली गई, जबकि हरगोबिन कहता है, ‘ज़मीन-जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं। जो है, वही बहुत है।’
प्र. मोदिआइन काबुली के नाम से क्यों चिढ़ती थी?
उत्तर: पाँच साल पहले काबुली (गुल मुहम्मद आगा) उधार कपड़ा देते समय मीठा बोलता और वसूली के समय ज़ोर-ज़ुल्म से एक का दो वसूलता था। एक बार कई उधार लेने वालों ने मिलकर उसकी ऐसी मरम्मत कर दी कि वह फिर लौटकर गाँव नहीं आया। इसके बाद ही दुखनी मोदिआइन ‘लाल मोदिआइन’ हो गई, यानी काबुली क्या, ‘काबुली बादाम’ के नाम से भी चिढ़ने लगी।
प्र. कटिहार जंक्शन में हरगोबिन को क्या बदलाव दिखाई दिया?
उत्तर: कटिहार जंक्शन में अब भोंपे से ही प्लेटफ़ार्म की घोषणा हो जाती थी, जिससे हरगोबिन को सुराज (स्वराज) का सच्चा एहसास हुआ, क्योंकि पहले प्लेटफ़ार्म पूछने में ही उसकी कई बार गाड़ी छूट चुकी थी।
प्र. हरगोबिन ने वापसी में चूड़े की पोटली से एक मुट्ठी भी क्यों नहीं खाया?
उत्तर: पाठ के शब्दों में वह चूड़ा “माँ की सौगात-बेटी के लिए” था, इसलिए हरगोबिन उसमें से एक मुट्ठी भी नहीं खा सकता था।
3 3 अंक के प्रश्न
प्र. बड़ी बहुरिया के देवर-देवरानियों के व्यवहार का वर्णन कीजिए।
उत्तर: हरगोबिन के अनुसार देवर-देवरानियाँ ठीक अगहनी धान के समय बाल-बच्चों को लेकर शहर से आते हैं, दस-पंद्रह दिनों में कर्ज़-उधार की ढेरी लगाकर, वापस जाते समय दो-दो मन के हिसाब से चावल-चूड़ा ले जाते हैं। फिर आम के मौसम में आकर कच्चा-पक्का आम तोड़कर बोरियों में बंद करके चले जाते हैं, और फिर उलटकर कभी नहीं देखते। इसीलिए हरगोबिन उन्हें बेदर्द कहता है, ‘राक्षस हैं सब!’
प्र. हरगोबिन ने बड़ी बहुरिया के भाई और बूढ़ी माता से पहले दो झूठ क्यों बोले?
उत्तर: थाना बिंहपुर पहुँचते ही हरगोबिन का मन कलपने लगा कि ‘गाँव की लक्ष्मी ही गाँव छोड़कर जावेगी!’ वह सोचता है, ‘किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा?’ और डरता है कि ‘सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे’। इसी डर और बड़ी बहुरिया के प्रति करुणा में उसने पहले बड़ी बहुरिया के भाई से ‘भगवान की दया से सब राजी-खुशी है’ कहा, और फिर बूढ़ी माता से ‘संवाद तो कोई नहीं’ कहा। पाठ इन झूठों का कारण सीधे नहीं लिखता; ये कारण प्रसंग से झलकते हैं।
प्र. ‘संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है’ पंक्ति का संदर्भ सहित अर्थ बताइए।
उत्तर: लेखक बताते हैं कि आम तौर पर संवदिया (जिसके घर संवाद लेकर जाता है, वहाँ) डटकर खाता है और अफरकर यानी पेट भरकर सोता है। पर हरगोबिन के साथ ऐसा नहीं होता, झूठ बोलने के अपराध-बोध में वह रात का भोजन नहीं कर पाता (‘हरगोबिन ने कुछ नहीं खाया। खाया नहीं गया।’) और रातभर सो नहीं पाता।
4 4 अंक के प्रश्न
प्र. ‘बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है’ कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: हवेली ‘टूट भी गई है’, और उसकी असली शान, यानी नौकर-चाकर और रौनक़, ख़त्म हो चुकी है; ज़मीन-जायदाद पर पाठ में दो मत हैं (बूढ़ी माता: ‘ज़मीन-जायदाद तो सब चली ही गई’; हरगोबिन: ‘ज़मीन-जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं। जो है, वही बहुत है’)। बड़ी बहुरिया ख़ुद अपने हाथ से अनाज फटकती है, जबकि पहले वहाँ दिनरात नौकर-नौकरानियों और जन-मज़दूरों की भीड़ लगी रहती थी। इसलिए अब वहाँ सिर्फ़ नाम की ‘बड़ी हवेली’ है, हक़ीक़त में वहाँ ग़रीबी और सूनापन है।
प्र. हरगोबिन के मन में बड़ी बहुरिया का संवाद सुनाने को लेकर उठे द्वंद्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर: ट्रेन में बड़ी बहुरिया के संवाद का हर शब्द हरगोबिन के मन में काँटे-सा चुभता है, वह डरता है कि संवाद सुनाते समय वह अपने कलेजे को कैसे सँभालेगा। उसे यह डर भी है कि “सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे”, और गाँव की लक्ष्मी गाँव छोड़कर चली जाएगी। इसी द्वंद्व में वह बार-बार झूठ बोलता है, और फिर अपराध-बोध में रातभर सो नहीं पाता।
प्र. हरगोबिन द्वारा बोले गए झूठों का वर्णन करते हुए बताइए कि वह ये झूठ क्यों बोलता है।
उत्तर: बड़ी बहुरिया के भाई से वह कहता है, ‘भगवान की दया से सब राजी-खुशी है’। बूढ़ी माता से कहता है, ‘संवाद तो कोई नहीं’, वह कल सिरसिया गाँव आया था; और बड़ी बहुरिया के नाम से कहता है कि ‘यदि छुट्टी हुई तो’ दशहरा के समय गंगाजी के मेले में आकर माँ से भेंट कर जाएगी (पाठ यह नहीं बताता कि बड़ी बहुरिया ने सचमुच ऐसा कहा था या नहीं)। वह यह भी कहता है कि ‘सारी गृहस्थी बड़ी बहुरिया के ऊपर ही है’। भोजन न कर पाने पर कहता है कि पेटभर जलपान कर लिया है, और विदा होते समय भाई से कहता है, ‘आपकी दुआ से किसी बात की कमी नहीं’। पाठ इनका कारण सीधे नहीं लिखता, पर प्रसंग से कारण झलकते हैं: वह डरता है कि ‘सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे’, ‘गाँव की लक्ष्मी’ गाँव छोड़ देगी, और बूढ़ी माता को दुख होगा; अंतिम झूठ उसके आत्म-सम्मान से जुड़ा पढ़ा जा सकता है।
प्र. कहानी के अंत में हरगोबिन के मन में आए परिवर्तन का वर्णन कीजिए।
उत्तर: बेहोशी से जागने पर हरगोबिन बड़ी बहुरिया के पैर पकड़कर क्षमा माँगता है, ख़ुद को उसका बेटा और उसे सारे गाँव की माँ बताता है, और अब निठल्ला न रहकर उसका सारा काम करने का संकल्प लेता है। इसे उसके भीतर के उत्तरदायित्व-बोध और करुणा के चरम बिंदु के रूप में पढ़ा जा सकता है।
प्र. ‘द्रौपदी के चीर-हरण’ की उपमा का प्रयोग किस प्रसंग में और क्यों किया गया है?
उत्तर: बँटवारे के समय बड़ी बहुरिया के गहने ज़बरदस्ती छीन लिए गए और उसकी बनारसी साड़ी तक तीन टुकड़ों में बाँट दी गई। हरगोबिन इसे उतना ही क्रूर और अपमानजनक मानता है जितना महाभारत में द्रौपदी का चीर खींचना, इसीलिए वह इस उपमा का प्रयोग करता है।
5 6 अंक के प्रश्न
प्र. ‘संवदिया’ कहानी के आधार पर हरगोबिन के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: हरगोबिन जलालगढ़ गाँव का अनुभवी संवदिया है, जो अत्यंत संवेदनशील स्वभाव का है, वह बड़ी बहुरिया के दुख से इतना विचलित हो जाता है कि उसे अपना दुख मान लेता है। वह कर्तव्यनिष्ठ भी है, पर करुणा और कर्तव्य के बीच फँसकर कई बार झूठ बोल बैठता है। अंत में वह अपनी ग़लती खुलकर स्वीकार करता है और बड़ी बहुरिया की सेवा तथा पूरे गाँव के प्रति अपने उत्तरदायित्व का संकल्प लेता है। इस तरह वह गाँव के आत्मीय, मानवीय रिश्तों का प्रतिनिधि पात्र बन जाता है।
प्र. ‘संवदिया’ कहानी के माध्यम से लेखक ने ग्रामीण जीवन और मानवीय संवेदना का कैसा चित्र प्रस्तुत किया है?
उत्तर: कहानी एक ओर बड़ी हवेली के पतन, देवरों की बेरुख़ी और मोदिआइन-काबुली प्रसंग के माध्यम से ग्रामीण जीवन की कठोर आर्थिक सच्चाई दिखाती है। पाठ-परिचय के अनुसार इसमें “मानवीय संवेदना की गहन एवं विलक्षण पहचान” है और असहाय, सहनशील नारी मन के दुख, करुणा, पीड़ा और यातना की सूक्ष्म पकड़ है। दूसरी ओर हरगोबिन बड़ी बहुरिया के दुख में जो अपनापन दिखाता है, वह उसके देवरों की बेरुख़ी के सामने उभरता है; अंत में वह कहता है, ‘तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो!’ संवदिया की भूमिका के ज़रिए लेखक यह संकेत देता है कि डाकघर खुल जाने के बावजूद संवाद का सुर और भाव पहुँचाने वाले भरोसेमंद व्यक्ति की ज़रूरत बनी रहती है, क्योंकि संवाद ‘जिस सुर और स्वर में’ सुनाया गया हो, ‘ठीक उसी ढंग से’ पहुँचाना सहज काम नहीं।
प्र. बड़ी बहुरिया के चरित्र की विशेषताएँ बताते हुए स्पष्ट कीजिए कि कहानी का अंत उसके चरित्र को किस प्रकार उजागर करता है।
उत्तर: बड़ी बहुरिया बड़ी हवेली की पुत्रवधू है; हरगोबिन के शब्दों में ‘हमारे गाँव की लक्ष्मी है बड़ी बहुरिया’। पति की मृत्यु और देवरों की उपेक्षा के बाद वह अकेली और आर्थिक रूप से असहाय होकर बथुआ-साग खाकर गुज़ारा करने को मजबूर है, फिर भी लंबे समय तक सहती रहती है। गहरी निराशा में वह माँ को साफ़ संवाद भेजती है कि ‘अब नहीं रह सकूँगी’, और न ले जाने पर डूब मरने की बात कहती है। पर कहानी के अंत में पता चलता है कि ‘संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी’। इससे गाँव और अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति उसका लगाव झलकता है, यद्यपि उसका दुख सच्चा था।
6 केस स्टडी
(क) 1 अंक गद्यांश में बड़ी बहुरिया अपनी माँ से कहलवाती है कि वह अब यहाँ क्या नहीं कर सकेगी?
उत्तर: वह अब यहाँ (ससुराल में) नहीं रह सकेगी।
(ख) 1 अंक गद्यांश के अनुसार बड़ी बहुरिया भाई-भाभियों के यहाँ क्या करके पेट पालने को तैयार है?
उत्तर: वह भाई-भाभियों की नौकरी करके पेट पालने को तैयार है।
(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि बड़ी बहुरिया की आर्थिक स्थिति कैसी हो गई है।
उत्तर: गद्यांश के अनुसार वह बथुआ-साग खाकर जी रही है और भाई-भाभियों की नौकरी करके, बच्चों की जूठन खाकर भी पेट पालने को तैयार है। इससे पता चलता है कि उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है।
(घ) 2 अंक गद्यांश में व्यक्त बड़ी बहुरिया की मनोदशा को अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: गद्यांश में बड़ी बहुरिया की गहरी निराशा, हताशा और पीड़ा व्यक्त हुई है। वह इतनी टूट चुकी है कि आत्महत्या तक की बात कह देती है, और अंत में पूछती है कि बथुआ-साग खाकर वह कब तक जिए, “किसलिए… किसके लिए?”
(क) 1 अंक गद्यांश में ‘पहली साँझ में ही अमावस्या का अंधकार!’ से क्या संकेत मिलता है?
उत्तर: साँझ होते ही हरगोबिन को अमावस्या जैसा घना अँधेरा दिखने लगता है; यह बीस कोस चलकर थके, राह भूले हरगोबिन की भ्रमित मनःस्थिति की ओर संकेत है, जहाँ उसे यह भी पता नहीं चलता कि “वह रोशनी है या आँखें?”
(ख) 1 अंक गद्यांश में हरगोबिन को झोंपड़े किसके झुंड जैसे लगते हैं?
उत्तर: गद्यांश में हरगोबिन को झोंपड़े हाथियों के झुंड जैसे लगते हैं।
(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर हरगोबिन की मानसिक और शारीरिक दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: बीस कोस पैदल चलकर थका हरगोबिन (उसके पैर पहले ही लड़खड़ाने लगे थे) राह भूलकर पूरी तरह भ्रमित हो चुका है। उसे खेत नदी जैसे और झोंपड़े हाथियों के झुंड जैसे दिखाई देते हैं, और उसे यह भी समझ नहीं आता कि वह खड़ा है या चल रहा है, धरती पर है या गाड़ी में।
(घ) 2 अंक यह अवस्था कहानी में किस मोड़ पर आती है और इसके ठीक बाद क्या होता है?
उत्तर: यह अवस्था हरगोबिन के बीस कोस के पैदल सफ़र के अंत में, गाँव के निकट पहुँचने पर आती है। इसके ठीक बाद वह बेहोश हो जाता है, और बड़ी बहुरिया उसे दूध पिलाकर होश में लाती है।