इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. केदारनाथ सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: केदारनाथ सिंह का जन्म सन् 1934 में बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ।
प्र. केदारनाथ सिंह के पीएच.डी. शोध का विषय क्या था?
उत्तर: आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान।
प्र. ‘अकाल में सारस’ काव्य-संग्रह पर केदारनाथ सिंह को कौन-सा पुरस्कार मिला?
उत्तर: 1989 का साहित्य अकादमी पुरस्कार।
प्र. पाठ्यपुस्तक के कविता-परिचय के अनुसार बनारस किसकी नगरी है?
उत्तर: शिव की नगरी।
प्र. दशाश्वमेध किसका नाम है?
उत्तर: बनारस के एक घाट का नाम, जहाँ पूजा, स्नान आदि होता है।
प्र. ‘दिशा’ कविता किस विषय से संबंधित है?
उत्तर: बाल मनोविज्ञान से।
प्र. ‘दिशा’ कविता में बच्चा कवि के प्रश्न का क्या उत्तर देता है?
उत्तर: “उधर-उधर”, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी।
प्र. ‘पचखियाँ’ शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: अंकुरण।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. बनारस में वसंत के आने से शहर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: इस शहर में वसंत अचानक आता है और लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से धूल का बवंडर उठता है, जिससे शहर की जीभ किरकिराने लगती है। जो है वह सुगबुगाने लगता है और जो नहीं है वह अंकुरित होने लगता है, भिखारियों के खाली कटोरों में भी एक अजीब चमक भर उठती है।
प्र. ‘खाली कटोरों में वसंत का उतरना’ से क्या आशय है?
उत्तर: इसका आशय है कि वसंत का उल्लासमय प्रभाव भिखारियों के खाली कटोरों तक भी पहुँचता है। भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन भी एक अजीब सी चमक से भर उठता है।
प्र. केदारनाथ सिंह की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर: उनकी भाषा में एक नई ऋजुता और बेलौसपन है, वह नम्य और पारदर्शी है। रोज़मर्रा के जीवन के अनुभव उनकी कविताओं में परिचित बिंबों में बदल जाते हैं, और शिल्प में बातचीत जैसी सहजता और अपनापन है।
प्र. बनारस कविता की भाषा और शिल्प के बारे में क्या कहा गया है?
उत्तर: कविता भाषा-संरचना के स्तर पर सरल है, किंतु अर्थ के स्तर पर गहरी है। इसका शिल्प विवरणात्मक है, जो कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है।
प्र. ‘जो है वह खड़ा है बिना किसी स्तंभ के, जो नहीं है उसे थामे है राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ’: इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
उत्तर: इस पंक्ति में कवि विरोधाभास अलंकार से कहते हैं कि जो है, वह बिना किसी स्तंभ के खड़ा है, जबकि जो नहीं है उसे भी राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ, आग और पानी के स्तंभ, धुएँ और खुशबू के तथा आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ थामे रहते हैं। इससे आस्था का भाव ध्वनित होता है।
प्र. दिशा कविता का केंद्रीय संदेश क्या है?
उत्तर: कविता का संदेश है कि हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है, बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं। कवि को बच्चे का यह बाल-सुलभ संज्ञान मोह लेता है, और कविता यह कहती है कि हम बच्चों से कुछ-न-कुछ सीख सकते हैं।
प्र. केदारनाथ सिंह की कविताओं में ‘विद्रोह के शांत और संयत स्वर’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: उनकी कविताओं में शोर-शराबा या उग्र नारेबाज़ी नहीं होती, बल्कि असंतोष और प्रतिरोध का भाव शांत, संयमित और सूक्ष्म ढंग से व्यक्त होता है, जैसे ज़मीन, रोटी, बैल जैसी कविताओं में देखा जा सकता है।
प्र. बनारस की ‘रौ’ से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: बनारस का चरित्र यह है कि यहाँ हर कार्य अपनी ही गति और लय में, अपने ही ढंग से होता है, किसी बाहरी दबाव या जल्दबाज़ी में नहीं, यही इस शहर की ‘रौ’ है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. बनारस कविता में शहर की पूर्णता और रिक्तता (होने और न होने) को कवि ने किस प्रकार दिखाया है?
उत्तर: कवि पूरी कविता में विरोधाभास अलंकार का प्रयोग करते हैं, “जो है वह सुगबुगाता है, जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ।”
शहर आधा जल में, आधा मंत्र में; आधा फूल में, आधा शव में; आधा नींद में, आधा शंख में बताया गया है।
ध्यान से देखने पर कवि कहते हैं कि यह शहर आधा है और आधा नहीं है, इसे भौतिक और आध्यात्मिक दोनों वास्तविकताओं के एक साथ होने के रूप में पढ़ा जा सकता है।
अंत में कहा गया है, जो है वह बिना किसी स्तंभ के खड़ा है, जबकि जो नहीं है उसे राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ थामे हैं; इस तरह होना और न होना, दोनों साथ-साथ दिखाए गए हैं।
प्र. बनारस में ‘धीरे-धीरे’ क्या-क्या होता है? इस दोहराव से कवि इस शहर के बारे में क्या कहना चाहता है?
उत्तर: शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है, लोग धीरे-धीरे चलते हैं, घंटे धीरे-धीरे बजते हैं और शाम धीरे-धीरे होती है।
‘धीरे-धीरे’ शब्द की बार-बार आवृत्ति (पुनरुक्तिप्रकाश) शहर की मंथर, अटूट लय को महसूस कराती है।
यह धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय समूचे शहर को इतनी दृढ़ता से बाँधे रहती है कि यहाँ कुछ भी गिरता या हिलता नहीं है।
इस मंथर गति को बनारस की स्थिरता और प्राचीनता के रूप में पढ़ा जा सकता है; यहाँ हर चीज़ अपनी जगह पर वैसे ही टिकी रहती है जैसे सदियों पहले थी, जैसे तुलसीदास की खड़ाऊँ।
प्र. ‘सई-साँझ’ में घुसने पर बनारस की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है?
उत्तर: कवि कहते हैं कि कभी बिना किसी सूचना के शाम की शुरुआत (सई-साँझ) में इस शहर में घुस जाओ, या आरती के आलोक में इसे अचानक देखो।
ऐसा करने पर पता चलता है कि इसकी बनावट अद्भुत है।
यह शहर आधा जल में, आधा मंत्र में; आधा फूल में, आधा शव में; आधा नींद में, आधा शंख में है, इसे भौतिक और आध्यात्मिक जगत के साथ-साथ होने के रूप में पढ़ा जा सकता है।
ध्यान से देखने पर यह आधा है और आधा नहीं है, इस विरोधाभास से शहर की अद्भुत बनावट सामने आती है।
प्र. बनारस शहर के लिए जो मानवीय क्रियाएँ इस कविता में आई हैं, उनका व्यंजनार्थ (गूढ़ अर्थ) स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कवि बनारस को मनुष्य की तरह चित्रित करते हैं, शहर की ‘जीभ किरकिराने लगती है’, जैसे मनुष्य को धूल के कारण असहजता महसूस होती है।
‘जो है वह सुगबुगाता है’, मनुष्य के जागने जैसी क्रिया शहर पर आरोपित है।
शहर ‘अपनी एक टाँग पर खड़ा है’ और ‘अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर’ है, इस मानवीकरण को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि बनारस परंपरा और आधुनिकता दोनों में एक साथ रहता है, पर अपने एक हिस्से से बेख़बर है।
इन मानवीय क्रियाओं का व्यंजनार्थ यह है कि बनारस कोई निर्जीव शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत, साँस लेता हुआ चरित्र है, जिसकी अपनी चेतना और अपना स्वभाव है।
प्र. केदारनाथ सिंह के जीवन और साहित्यिक योगदान का परिचय दीजिए।
उत्तर: जन्म सन् 1934 में बलिया ज़िले के चकिया गाँव में; निधन 2018 में।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और ‘आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान’ विषय पर पीएच.डी.; गोरखपुर में प्राध्यापक रहे, बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में प्रोफ़ेसर पद से अवकाश प्राप्त किया।
मानवीय संवेदनाओं के कवि; कविताओं में विद्रोह का शांत-संयत स्वर और बिंब-विधान पर विशेष बल।
सात काव्य-संग्रह, दो आलोचनात्मक पुस्तकें, दो निबंध-संग्रह, एक चयन-संग्रह (प्रतिनिधि कविताएँ) और एक संपादित अनूदित संकलन (ताना-बाना) प्रकाशित।
1989 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1994 में मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान सहित कई सम्मान प्राप्त।
प्र. बनारस कविता की काव्य-सौंदर्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: बिंबधर्मी शैली, शहर के विरोधाभासों (पूर्ण/रिक्त, जल/मंत्र, फूल/शव) को छवियों में बाँधना, पाठ के अनुसार कवि ने बिंब-विधान पर अधिक बल दिया है।
विरोधाभास अलंकार बार-बार प्रयुक्त, “आधा…आधा नहीं”, “जो है…जो नहीं है”।
प्रतीकात्मकता, “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर” को बनारस के आधुनिकता और परंपरा में एक साथ जीने के प्रतीक के रूप में पढ़ा जा सकता है।
‘धीरे-धीरे’ शब्द की आवृत्ति शहर की मंथर, अटूट लय को महसूस कराती है।
मुक्त छंद और बोलचाल जैसी सहज भाषा में गहरे भाव पिरोए गए हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. ‘अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर’ पंक्ति की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
उत्तर: प्रसंग: यह पंक्ति केदारनाथ सिंह की कविता “बनारस” के अंतिम भाग से ली गई है, जहाँ कवि शहर की शताब्दियों पुरानी, अपरिवर्तित छवि को समेटते हैं।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि यह शहर किसी अलक्षित (अनदेखे) सूर्य को अर्घ्य देता हुआ, शताब्दियों से गंगा के जल में अपनी एक टाँग पर खड़ा है, लेकिन अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर है।
अर्थ-विस्तार: इस पंक्ति को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि ‘एक टाँग पर खड़ा होना’ बनारस की सदियों पुरानी परंपरा में दृढ़ता से टिके रहने का प्रतीक है, और ‘दूसरी टाँग से बेखबर होना’ यह दर्शाता है कि यह शहर आधुनिकता में भी साथ-साथ जीता है, लेकिन उसे स्वयं इस बात का पूरा एहसास नहीं कि उसका यह दूसरा हिस्सा किस हाल में है।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ मानवीकरण और प्रतीकात्मकता दोनों का सुंदर प्रयोग है, एक टाँग पर खड़े रहने की मुद्रा शहर की सदियों पुरानी, अटल परंपरा को दर्शाती है।
निष्कर्ष: इस पठन में यह पंक्ति बनारस के दोहरे चरित्र, परंपरा और आधुनिकता में एक साथ, बेपरवाह होकर जीने, को एक ही बिंब में समेट देती है, जो पूरी कविता के भाव को चरम पर ले जाती है।
प्र. बनारस कविता में गंगा और घाटों के माध्यम से शहर के सांस्कृतिक-आध्यात्मिक जीवन का चित्रण किस प्रकार हुआ है?
उत्तर: प्रसंग: बनारस कविता में गंगा और उसके घाट केवल भौगोलिक तत्व नहीं, बल्कि शहर की विशिष्ट आस्था के केंद्र हैं (पाठ: “बनारस शिव की नगरी और गंगा के साथ विशिष्ट आस्था का केंद्र है”)।
गंगा का महत्व: काशी और गंगा के सान्निध्य से मोक्ष की अवधारणा जुड़ी है; गंगा में बंधी नाव और चमकती गंगा की ओर ले जाई जाती अनंत शवयात्राएँ इसी आस्था को दर्शाती हैं।
घाटों का चित्रण: दशाश्वमेध घाट पर आदमी वसंत में जाता है और घाट का आखिरी पत्थर मुलायम हो गया महसूस करता है; घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरों में भी वसंत उतरता है।
विरोधाभासी बिंब: एक ओर मंदिरों-घाटों पर जलते दीप, दूसरी ओर कभी न बुझने वाली चिताग्नि और हवन का धुआँ, यह जीवन और मृत्यु का सह-अस्तित्व दिखाता है।
निष्कर्ष: इस प्रकार गंगा और घाट बनारस की आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति के मिले-जुले चरित्र को मूर्त रूप देते हैं, जो शहर को एक जीवंत सांस्कृतिक-आध्यात्मिक केंद्र बनाता है।
प्र. दिशा कविता के आधार पर बताइए कि बाल-सुलभ दृष्टिकोण बड़ों की सोच से किस प्रकार भिन्न और सार्थक होता है।
उत्तर: प्रसंग: ‘दिशा’ एक लघु आकार की कविता है जो बाल मनोविज्ञान से संबंधित है, जिसमें कवि स्कूल के बाहर पतंग उड़ाते एक बच्चे से पूछते हैं कि हिमालय किधर है।
कवि की स्थिति: कवि स्वयं स्वीकार करते हैं, “मैंने पहली बार जाना / हिमालय किधर है!”, यानी हिमालय की दिशा का ऐसा बोध उन्हें पहले नहीं था।
बच्चे की सोच: बच्चा बाल-सुलभ ढंग से उत्तर देता है, ‘उधर-उधर’, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी। उसके लिए दिशा वही है जो उसके खेल और अनुभव से जुड़ी है।
कवि की प्रतिक्रिया: कवि इस सरल, निश्छल उत्तर से इतने प्रभावित होते हैं कि कहते हैं, ‘मैं स्वीकार करूँ, मैंने पहली बार जाना हिमालय किधर है!’ यानी वे अपनी बनी-बनाई भौगोलिक धारणा को त्यागकर बच्चे के अनुभव-जन्य सत्य को स्वीकार करते हैं।
सार्थकता: यह दिखाता है कि हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है, और पाठ के अनुसार “बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं”; उनका सहज, अनुभव-आधारित दृष्टिकोण बड़ों की सोच से अलग और जीवंत हो सकता है।
निष्कर्ष: कविता यह कहती है कि हम बच्चों से कुछ-न-कुछ सीख सकते हैं।
प्र. केदारनाथ सिंह के काव्य में मानवीय संवेदना और बिंब-विधान की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालिए (बनारस और दिशा दोनों के संदर्भ में)।
उत्तर: प्रसंग: केदारनाथ सिंह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं, जिनका पीएच.डी. शोध विषय भी ‘आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान’ था।
बिंब-विधान की भूमिका: बनारस कविता में शहर के हर पहलू को ठोस बिंबों में बाँधा गया है, किरकिराती जीभ, सुगबुगाता होना, कटोरों में उतरता वसंत, आधा जल में-आधा मंत्र में होना, एक टाँग पर खड़ा शहर। ये बिंब अमूर्त भावों को दृश्यात्मक और स्पर्शनीय बना देते हैं।
मानवीय संवेदना: दिशा कविता में एक साधारण बच्चे के उत्तर से कवि की संवेदना इतनी गहराई से जुड़ती है कि वे अपनी सोच बदलने को तैयार हो जाते हैं, यह दिखाता है कि कवि की संवेदनशीलता आम मनुष्य, यहाँ तक कि एक बच्चे के अनुभव तक को भी उतनी ही गंभीरता से लेती है।
भाषा और शिल्प: दोनों कविताओं में भाषा सरल, बोलचाल जैसी और मुक्त छंद में है, फिर भी अर्थ की गहराई बनी रहती है, यही केदारनाथ सिंह की भाषा की नई ऋजुता और बेलौसपन है।
निष्कर्ष: इस प्रकार केदारनाथ सिंह का काव्य बिंब-विधान की तकनीकी कुशलता और मानवीय संवेदना की गहराई का अद्भुत संगम है, जो साधारण दृश्यों और अनुभवों को असाधारण अर्थ प्रदान करता है।
5 केस स्टडी
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से
(क) 1 अंक यह पद्यांश किस कविता से लिया गया है?
उत्तर: बनारस कविता से।
(ख) 2 अंक ‘धीरे-धीरे’ शब्द की आवृत्ति का क्या काव्य-प्रभाव है?
उत्तर: यह आवृत्ति (पुनरुक्तिप्रकाश) शहर की मंथर, अटूट लय को महसूस कराती है और बनारस की स्थिरता को उभारती है।
(ग) 2 अंक इस ‘सामूहिक लय’ के कारण शहर में क्या नहीं होता?
उत्तर: इस लय के कारण शहर में कुछ भी गिरता नहीं है और कुछ भी हिलता नहीं है, हर चीज़ अपनी जगह पर वैसे ही टिकी रहती है।
(घ) 1 अंक तुलसीदास की खड़ाऊँ कितने समय से एक ही स्थान पर रखी हैं?
उत्तर: सैकड़ों बरस से।
मैंने उस बच्चे से पूछा जो स्कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था
उधर-उधर—उसने कहा
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी
मैं स्वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है!
(क) 1 अंक कवि ने बच्चे से क्या प्रश्न पूछा?
उत्तर: हिमालय किधर है?
(ख) 2 अंक बच्चे ने कवि के प्रश्न का उत्तर किस आधार पर दिया?
उत्तर: बच्चे ने अपने खेल के अनुभव के आधार पर उत्तर दिया, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी, उसी को उसने ‘उधर’ बताया।
(ग) 2 अंक ‘मैं स्वीकार करूँ’ कहकर कवि क्या व्यक्त करना चाहते हैं?
उत्तर: कवि यह स्वीकार करना चाहते हैं कि उन्होंने बच्चे के सहज उत्तर से हिमालय की दिशा को पहली बार वास्तव में जाना; वे अपनी पूर्व-धारणा को त्यागकर बच्चे के अनुभव-जन्य सत्य को अपनाते हैं।
(घ) 1 अंक यह कविता किस विषय से संबंधित है?
उत्तर: बाल मनोविज्ञान से।