कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 4 बनारस / दिशा (केदारनाथ सिंह) नोट्स

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • केदारनाथ सिंह का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख कृतियाँ बता पाएँगे
  • “बनारस” कविता में शहर के परस्पर विरोधी बिंबों, पूर्णता-रिक्तता, प्राचीनता-आधुनिकता को पहचान पाएँगे
  • “बनारस” के हर अंश का भावार्थ अपने शब्दों में लिख पाएँगे
  • “दिशा” कविता में बच्चे के यथार्थ और बड़ों के यथार्थ के अंतर को समझा पाएँगे
  • दोनों कविताओं के कठिन शब्दों के अर्थ बिना भूले लिख पाएँगे
  • बिंब-विधान, प्रतीक और विरोधाभास अलंकार जैसे पारिभाषिक शब्दों को पहचानकर भाव-सौंदर्य और शिल्प-सौंदर्य वाले प्रश्नों की तैयारी कर पाएँगे
केदारनाथ सिंहबिंब-विधानबनारस के बिंबविरोधाभासदशाश्वमेध घाटबाल-मनोविज्ञानअपना-अपना यथार्थमुक्त छंद

1 कवि-परिचय: केदारनाथ सिंह

बनारस शहर की गलियों को और एक बच्चे की मासूम सोच को, दोनों को बिंबों में बाँधने वाले कवि केदारनाथ सिंह का पहले जीवन-परिचय जान लेते हैं।

  • केदारनाथ सिंह का जीवनकाल सन् 1934 से 2018 तक रहा।
  • इनका जन्म बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ था।
  • इन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। इसी विश्वविद्यालय से इन्होंने ‘आधुनिक हिंदी कविता में बिंब-विधान‘ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त की।
  • पीएच.डी. के बाद ये कुछ समय गोरखपुर में हिंदी के प्राध्यापक रहे। इसके बाद ये जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफ़ेसर के पद से अवकाश-प्राप्त हुए।
  • केदारनाथ सिंह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं। इन्होंने अपनी कविताओं में बिंब-विधान पर अधिक बल दिया, और बिंब-विधान ही इनकी पीएच.डी. का विषय भी था।
  • इनकी कविताओं में शोर-शराबा नहीं है, बल्कि विद्रोह का शांत और संयत स्वर सशक्त रूप में उभरता है।
  • इनके संग्रह “ज़मीन पक रही है” में ज़मीन, रोटी, बैल जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों पर कविताएँ हैं। इनकी कविताओं में संवेदना (महसूस करने की क्षमता) और विचारबोध (सोचने-समझने की गहराई) साथ-साथ चलते हैं।
  • पाठ के अनुसार, “जीवन के बिना प्रकृति और वस्तुएँ कुछ भी नहीं हैं”, यह अहसास इन्हें अपनी कविताओं में आदमी के और समीप ले आया है।
  • इस प्रक्रिया में इनकी भाषा और भी नम्य (लचीली) और पारदर्शी हुई, और उसमें एक नयी ऋजुता (सीधापन) और बेलौसपन (बेझिझक खुलापन) आया। इनकी कविताओं में रोज़मर्रा के जीवन के अनुभव परिचित बिंबों में बदलते दिखाई देते हैं। इनके शिल्प में बातचीत जैसी सहजता और अपनापन अनायास ही झलकता है।
  • काव्य-संग्रह “अकाल में सारस” पर इन्हें 1989 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
  • 1994 में मध्य प्रदेश शासन द्वारा संचालित मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान मिला, इसके साथ कुमारन आशान सम्मान, व्यास सम्मान और दयावती मोदी पुरस्कार जैसे कई और सम्मान भी मिले।
केदारनाथ सिंह की कृतियाँ (विधा के अनुसार)
काव्य-संग्रहअभी, बिलकुल अभी · ज़मीन पक रही है · यहाँ से देखो · अकाल में सारस · उत्तर कबीर तथा अन्य कविताएँ · बाघ · टालस्टाय और साईकिल
आलोचनाकल्पना और छायावाद · आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान का विकास
निबंध-संग्रहमेरे समय के शब्द · कब्रिस्तान में पंचायत
चयन व संपादनप्रतिनिधि कविताएँ (चुनी हुई कविताओं का संग्रह) · ताना-बाना (विविध भारतीय भाषाओं की कविताओं का हिंदी अनुवाद, संपादित)

इनके अब तक सात काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, ऊपर तालिका में दिए सातों नाम याद रखने लायक़ हैं। इनकी आलोचनात्मक पुस्तकें “कल्पना और छायावाद” और “आधुनिक हिंदी कविता में बिंब विधान का विकास” हैं; इनमें दूसरी पुस्तक बिंब-विधान पर है।

परीक्षा संकेत

कवि-परिचय के मुख्य तथ्य: जीवनकाल (1934-2018), जन्मस्थान (बलिया ज़िले का चकिया गाँव), पीएच.डी. का विषय (बिंब-विधान) और निबंध-संग्रह का नाम (कब्रिस्तान में पंचायत)। पाठ के अनुसार केदारनाथ सिंह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं।

आम ग़लती

निबंध-संग्रह का नाम पाठ्यपुस्तक के अनुसार लिखें: “कब्रिस्तान में पंचायत” (न कि “पंचायत में कब्रिस्तान” या “कब्रिस्तान का पंचायत”)।

2 बनारस

2.1 प्रसंग: कविता की मूल भावना

बनारस कविता को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि कवि इस शहर को किस नज़र से देखते हैं। पाठ के प्रश्न-अभ्यास में भी ऐसे प्रश्न हैं, जैसे “बनारस की पूर्णता और रिक्तता को कवि ने किस प्रकार दिखाया है?”

  • यह कविता प्राचीनतम शहर बनारस के सांस्कृतिक वैभव के साथ-साथ उसके ठेठ बनारसीपन (बनारस के अपने अलग मिज़ाज) पर भी रोशनी डालती है।
  • बनारस शिव की नगरी है और गंगा के साथ इसका विशेष आस्था का रिश्ता है।
  • कविता में गंगा, गंगा के घाट, मंदिर, और मंदिरों-घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरे, जिनमें वसंत उतरता है, इन सबका सजीव चित्र खींचा गया है।
  • इस शहर से एक मिथकीय (पौराणिक) आस्था भी जुड़ी है, काशी और गंगा के सान्निध्य (निकटता) से मोक्ष की अवधारणा (मृत्यु के बाद मुक्ति की सोच) जुड़ी है।
  • यहाँ विरोधाभासी बिंब एक साथ जीते हैं, गंगा में एक तरफ़ नाव बंधी है, मंदिरों-घाटों पर दीप जलते हैं, तो दूसरी तरफ़ कभी न बुझने वाली चिताग्नि (शवदाह की आग) है, इन दोनों से और हवन से उठता धुआँ भी है।
  • बनारस का असली चरित्र यह है कि यहाँ हर कार्य अपनी ‘रौ’ में होता है, यानी अपनी धुन और प्रवाह में।
  • आस्था, श्रद्धा, विरक्ति (मोह-त्याग), विश्वास, आश्चर्य और भक्ति, इन सबका मिला-जुला रूप ही बनारस है।
  • काशी की अत्यंत प्राचीनता, आध्यात्मिकता और भव्यता के साथ-साथ आधुनिकता का समाहार (समावेश) भी इस कविता में दिखता है।
  • यह कविता एक पुरातन, मिथक बन चुके शहर के रहस्यों को खोलती है, और इस शहर की एक दार्शनिक व्याख्या करती है।
  • भाषा-संरचना के स्तर पर यह कविता सरल है, लेकिन अर्थ के स्तर पर बहुत गहरी। इसका शिल्प विवरणात्मक है, जो कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है।
कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

बिंब-विधान का अर्थ है, किसी भाव या विचार को सीधे बताने के बजाय, उसे एक ऐसी ठोस, आँखों के सामने साकार होने वाली तस्वीर (बिंब) में बदल देना, जिसे पढ़ते ही पाठक के मन में वह दृश्य जीवंत हो उठे। जैसे “उठता है धूल का एक बवंडर”, “घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है”, “सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी है”, ये सब बनारस के जीवंत बिंब हैं। पाठ के अनुसार केदारनाथ सिंह ने अपनी कविताओं में बिंब-विधान पर अधिक बल दिया है।

2.2 मूल काव्यांश: बनारस (अंश-दर-अंश भावार्थ)

मूल काव्यांश: अंश 1
इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

भावार्थ: इस शहर, बनारस में, वसंत ऋतु अचानक ही आ जाती है। कवि कहते हैं, मैंने देखा है कि जब वसंत आता है, तो लहरतारा या मडुवाडीह (बनारस के दो मोहल्लों) की तरफ़ से धूल का एक बवंडर (आँधी) उठता है, और इस महान, पुराने शहर की “जीभ” में किरकिराहट होने लगती है, यानी हवा में उड़ती धूल शहर के हर कोने में महसूस होने लगती है।

मूल काव्यांश: अंश 2
जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन

भावार्थ: जो कुछ ज़िंदा है, वह जाग उठता (सुगबुगाता) है, और जो अभी तक नहीं उगा, वह भी अंकुर (पचखियाँ) फेंकने लगता है, यानी वसंत में हर तरफ़ जीवन का संचार होने लगता है। आदमी दशाश्वमेध घाट पर जाता है और पाता है कि घाट का आख़िरी पत्थर भी कुछ और मुलायम हो गया है। सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में भी एक अजीब-सी नमी दिखती है, और भिखारियों के बिलकुल खाली कटोरों (निचाट खालीपन) में भी एक अजीब चमक भर उठती है।

मूल काव्यांश: अंश 3
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर

भावार्थ: कवि सीधे पाठक से पूछते हैं, क्या तुमने कभी खाली कटोरों में वसंत का उतरना देखा है? यह शहर, बनारस, बस इसी तरह खुलता है, इसी तरह भरता है और इसी तरह खाली भी होता है, यानी सबसे ग़रीब, सबसे ख़ाली दिखने वाली चीज़ में भी यहाँ जीवन और सुंदरता भर उठती है।

मूल काव्यांश: अंश 4
इसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है

भावार्थ: ठीक इसी तरह, हर रोज़, कंधे एक अनंत (न ख़त्म होने वाला, यानी रोज़ दोहराया जाने वाला) शव को अँधेरी गली से चमकती हुई गंगा की तरफ़ ले जाते हैं, अंतिम संस्कार के लिए। इस शहर में धूल भी धीरे-धीरे उड़ती है, लोग भी धीरे-धीरे चलते हैं, मंदिर के घंटे भी धीरे-धीरे बजते हैं, और शाम भी धीरे-धीरे ही होती है। जीवन और मृत्यु दोनों यहाँ एक जैसी धीमी, ठहरी हुई रफ़्तार से चलते हैं।

मूल काव्यांश: अंश 5
यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

भावार्थ: यह “धीरे-धीरे” होना, यह धीमी, साझा लय (सामूहिक लय) पूरे शहर को बहुत मज़बूती से बाँधे रखती है। इस तरह कि यहाँ कुछ भी गिरता नहीं, कुछ भी हिलता नहीं, जो चीज़ जहाँ थी, वह आज भी वहीं रखी है, गंगा आज भी वहीं बहती है, नाव आज भी वहीं बँधी है, और तुलसीदास की खड़ाऊँ (लकड़ी की चप्पल) भी सैकड़ों बरसों से वहीं रखी है। यहाँ समय मानो थमा-सा दिखता है।

मूल काव्यांश: अंश 6
कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट

भावार्थ: कवि पाठक को न्योता देते हैं, कभी सई-साँझ (शाम की शुरुआत) में बिना कोई सूचना दिए, अचानक इस शहर में घुस जाओ, या कभी आरती की रोशनी (आलोक) में इसे अचानक देखो। इसकी बनावट सचमुच अद्भुत है, हर पल इसका एक नया रूप दिखता है।

मूल काव्यांश: अंश 7
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है

भावार्थ: यह शहर आधा गंगा के जल में है, तो आधा पूजा के मंत्रों में। आधा फूल जैसी ताज़गी में है, तो आधा शव जैसी गंभीरता में। आधा नींद में डूबा है, तो आधा शंख की आवाज़ में जागा हुआ है। कवि कहते हैं, अगर ध्यान से देखो, तो यह शहर आधा भी है और आधा नहीं भी है, यानी इसे किसी एक पूरी परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता; इसमें दो विरोधी स्थितियाँ एक साथ दिखती हैं।

मूल काव्यांश: अंश 8
जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्तंभ के
जो नहीं है उसे थामे है
राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ
आग के स्तंभ
और पानी के स्तंभ
धुएँ के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ

भावार्थ: जो कुछ ठोस और नज़र आने वाला है, वह बिना किसी खंभे (स्तंभ) के ही खड़ा है, यानी उसे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं। और जो नज़र नहीं आता, उसे राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ थामे हुए हैं, आग के स्तंभ, पानी के स्तंभ, धुएँ के स्तंभ, खुशबू के स्तंभ, और पूजा में उठे हुए आदमी के हाथों के स्तंभ। इन पंक्तियों में राख, रोशनी, आग, पानी, धुएँ, खुशबू और उठे हाथों को “स्तंभ” कहा गया है, जिससे आस्था का भाव ध्वनित होता है।

मूल काव्यांश: अंश 9 (समापन)
किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!

भावार्थ: किसी ऐसे सूर्य को, जो नज़र नहीं आता (अलक्षित), अर्घ्य (जल चढ़ाकर पूजा) देते हुए, यह शहर सैकड़ों सालों से इसी तरह गंगा के पानी में अपनी एक टाँग पर खड़ा है, और अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेख़बर है। इस पंक्ति को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि शहर परंपरा और आधुनिकता, दोनों में एक साथ रहता है, पर अपने दूसरे हिस्से (दूसरी टाँग) से बेख़बर है; पाठ्यपुस्तक की भूमिका में “आधुनिकता का समाहार” आता है।

2.3 शब्दार्थ: बनारस

शब्द अर्थ
लहरतारा / मडुवाडीह बनारस के मोहल्लों के नाम
बवंडर अंधड़, आँधी
सुगबुगाना जागरण, जागने की क्रिया
पचखियाँ अंकुरण (नए अंकुर का फूटना)
निचाट बिलकुल, एकदम
सई-साँझ शाम की शुरुआत
स्तंभ खंभा
अलक्षित अज्ञात, न देखा हुआ
अर्घ्य पूजा के 16 उपचारों में से एक, दूब-दूध-चावल आदि मिला हुआ जल जो देवता के सामने श्रद्धापूर्वक चढ़ाया जाता है
दशाश्वमेध बनारस के एक घाट का नाम, जहाँ पूजा, स्नान आदि होता है
काव्य-सौंदर्य: बनारस

बिंब-विधान: पूरी कविता केदारनाथ सिंह के बिंब-विधान का एक अच्छा उदाहरण है, “धूल का एक बवंडर”, “घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है”, “बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी” जैसे ठोस, दृश्य बिंब शहर को सीधे आँखों के सामने खड़ा कर देते हैं।
विरोधाभास अलंकार: पूरी कविता में विरोधाभास बार-बार आता है, आधा है/आधा नहीं है, पूर्णता/रिक्तता, जीवन (वसंत)/मृत्यु (शव), जो है/जो नहीं है। विरोधाभास इस कविता की एक प्रमुख तकनीक है।
प्रतीक: “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर” को एक प्रतीक के रूप में पढ़ा जा सकता है: बनारस का परंपरा और आधुनिकता में एक साथ, बेपरवाह होकर जीना।
पुनरावृत्ति: “धीरे-धीरे” शब्द की बार-बार वापसी शहर की मंथर, अटूट लय को पाठक को महसूस कराती है (पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार)।
भाषा-शैली: कविता मुक्त छंद में है, भाषा बोलचाल जैसी सहज है, लेकिन अर्थ की गहराई बहुत ज़्यादा है, यही “भाषा-संरचना में सरल, अर्थ में गहरी” वाली बात है।

चित्र 1: "अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर" का एक संभावित पठन: एक टाँग परंपरा (गंगा, अर्घ्य, मंत्र) में, दूसरी आधुनिकता में, जिससे शहर ख़ुद बेख़बर है। (यह एक प्रतीकात्मक रेखाचित्र है, भौगोलिक रूप से सटीक मानचित्र नहीं)
चित्र 1: “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर” का एक संभावित पठन: एक टाँग परंपरा (गंगा, अर्घ्य, मंत्र) में, दूसरी आधुनिकता में, जिससे शहर ख़ुद बेख़बर है। (यह एक प्रतीकात्मक रेखाचित्र है, भौगोलिक रूप से सटीक मानचित्र नहीं)

2.4 बनारस की विशेषताएँ: कविता में आए नाम

बनारस शहर को समझने के लिए उसका भूगोल याद रखना ज़रूरी नहीं, कविता में आए नामों और उनके महत्त्व को याद रखना ज़्यादा काम का है, नीचे तालिका में यही दिया गया है।

तत्व नाम / उल्लेख कविता में महत्त्व
नदी गंगा मोक्ष की अवधारणा से जुड़ी; शव इसी की तरफ़ ले जाए जाते हैं; नाव इसी में बँधी है
घाट दशाश्वमेध जहाँ आदमी वसंत में जाता है और घाट का पत्थर मुलायम पाता है
मोहल्ले लहरतारा, मडुवाडीह जहाँ से वसंत के आते ही धूल का बवंडर उठता है
आस्था-प्रतीक चिताग्नि, दीप, हवन का धुआँ जीवन और मृत्यु के विरोधाभास को एक साथ दिखाते हैं
ऐतिहासिक चिह्न तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरसों से एक ही जगह रखी होना, शहर के न बदलने का प्रतीक
चित्र 2: दशाश्वमेध घाट पर होने वाली संध्या गंगा आरती, कविता में वर्णित "मंदिरों-घाटों पर जलने वाले दीप" और आस्था के इसी दृश्य की एक झलक। (चित्र: AKS.9955 / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)
चित्र 2: दशाश्वमेध घाट पर होने वाली संध्या गंगा आरती, कविता में वर्णित “मंदिरों-घाटों पर जलने वाले दीप” और आस्था के इसी दृश्य की एक झलक। (चित्र: AKS.9955 / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)
क्या आप जानते हैं?

कविता के भीतर शहर का नाम एक बार भी नहीं आता: कवि हर जगह “इस शहर”, “यह शहर” या “इस महान पुराने शहर” कहते हैं; नाम “बनारस” केवल शीर्षक में है। पाठ्यपुस्तक की भूमिका में इसके लिए “बनारस” और “काशी” दोनों नाम आते हैं, उत्तर लिखते समय इन्हीं का प्रयोग करें।

3 दिशा

3.1 प्रसंग और मूल काव्यांश

दिशा कविता, बनारस के मुक़ाबले, आकार में बहुत छोटी है, लेकिन इसका भाव उतना ही गहरा है। यह कविता बाल-मनोविज्ञान (बच्चों की सोच को समझने वाला विषय) से जुड़ी है।

मूल काव्यांश: पूरी कविता
हिमालय किधर है?
मैंने उस बच्चे से पूछा जो स्कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था
उधर-उधर—उसने कहा
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी
मैं स्वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है!

भावार्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति:

  • हिमालय किधर है? मैंने उस बच्चे से पूछा जो स्कूल के बाहर पतंग उड़ा रहा था: कवि स्कूल के बाहर पतंग उड़ा रहे एक बच्चे से पूछते हैं कि हिमालय किस दिशा में है।
  • उधर-उधर, उसने कहा, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी: बच्चा बड़ी सहजता से जवाब देता है, “उधर-उधर”, यानी जिस दिशा में उसकी पतंग उड़ती जा रही है, उसी दिशा में। बच्चे के लिए दिशा का मतलब है, जहाँ उसका खेल उसे ले जा रहा है।
  • मैं स्वीकार करूँ, मैंने पहली बार जाना, हिमालय किधर है!: कवि इस मासूम जवाब से इतने प्रभावित होते हैं कि वे मान लेते हैं, इस बच्चे के जवाब से ही उन्हें पहली बार सचमुच पता चला कि हिमालय किधर है।

3.2 दिशा का मूल भाव

  • हर व्यक्ति का अपना यथार्थ (सच्चाई) होता है। बड़ों के लिए हिमालय एक स्थिर भौगोलिक दिशा है।
  • बच्चे के लिए दिशा का मतलब बिलकुल अलग है, उसके लिए दिशा वही है, जिधर उसका खेल, उसकी पतंग, उसे ले जा रही है। पाठ के अनुसार, “बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं।”
  • कवि को यह बाल-सुलभ (बच्चों जैसी) सोच इतनी मोह लेती है कि वे अपनी बड़ी, तयशुदा समझ को भी बदलने के लिए तैयार हो जाते हैं, यही “मैं स्वीकार करूँ” कहने का मतलब है।
  • यह कविता लघु आकार की है, और पाठ के अनुसार यह कहती है कि “हम बच्चों से कुछ-न-कुछ सीख सकते हैं।”
  • कविता की भाषा बेहद सहज है, इसकी भाषा सीधी और बोलचाल जैसी है।
कंठस्थ करेंपरिभाषा 2

यथार्थ का अर्थ है वह सच्चाई जिस तरह हम उसे देखते और समझते हैं। “हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है” का मतलब है, एक ही चीज़ को अलग-अलग लोग अपने अनुभव और नज़रिए के हिसाब से अलग-अलग तरह से समझ सकते हैं, जैसे “दिशा” कविता में बड़ों और बच्चे के लिए हिमालय की दिशा का मतलब अलग-अलग है।

काव्य-सौंदर्य: दिशा

बिंब-विधान: स्कूल के बाहर पतंग उड़ाता बच्चा और उसका “उधर-उधर” कहना, यह पूरा दृश्य एक जीवंत बिंब बनाता है।
विषय: बाल-मनोविज्ञान, बच्चे यथार्थ को अपने ढंग से देखते हैं, जो बड़ों की सोच से अलग हो सकता है।
भाव: कविता में सहजता और आश्चर्य (बच्चे के जवाब पर कवि का चकित होना) का भाव प्रधान है।
भाषा-शैली: कविता बहुत छोटी है; पाठ के अनुसार “कविता की भाषा सहज है”, सीधी और बोलचाल जैसी। छंद यहाँ भी मुक्त छंद ही है।

4 बिंब-विधान: केदारनाथ सिंह की एक प्रमुख काव्य-विशेषता

बिंब-विधान इनकी पीएच.डी. का विषय था, और पाठ के अनुसार इन्होंने अपनी कविताओं में बिंब-विधान पर अधिक बल दिया है। यह समझना दोनों कविताओं के भाव-सौंदर्य वाले प्रश्नों के लिए ज़रूरी है।

4.1 बिंब-विधान: दोनों कविताओं में उदाहरण

1

बनारस में बिंब-विधान

शहर के हर भाव को ठोस तस्वीर में बदला गया है, “धूल का एक बवंडर”, “घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है”, “बंदरों की आँखों में एक अजीब सी नमी”, “राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभ”, ये सब बिंब पाठक को सीधे बनारस की गलियों में खड़ा कर देते हैं।

2

दिशा में बिंब-विधान

स्कूल के बाहर पतंग उड़ाता बच्चा और उसका “उधर-उधर” कहना, जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी, यह एक छोटा-सा, सीधा-सा बिंब है, लेकिन इतना असरदार है कि पूरी कविता का भाव इसी एक दृश्य में समा जाता है।

3

बिंब-विधान क्यों ज़रूरी है

केदारनाथ सिंह भाव को सीधे बताने के बजाय, उसे एक दृश्य बना देते हैं, जिससे पाठक स्वयं उसे महसूस करता है। यही तरीक़ा इनकी कविताओं को शोर-शराबे से दूर, शांत और गहरा बनाता है।

5 दोनों कविताओं की तुलना

दोनों कविताएँ एक ही कवि, केदारनाथ सिंह की लिखी हैं, दोनों मुक्त छंद में हैं, फिर भी दोनों का विषय, आकार और अंदाज़ बिलकुल अलग है।

बनारस

  • विषय: एक पूरे शहर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान
  • आकार: लंबी कविता (यहाँ समझने के लिए 9 अंशों में बाँटी गई)
  • प्रमुख तकनीक: विरोधाभास अलंकार (आधा है/आधा नहीं है)
  • भाव: एक पुरातन, मिथक बन चुके शहर की दार्शनिक व्याख्या

दिशा

  • विषय: एक बच्चे और कवि के बीच का एक छोटा-सा संवाद
  • आकार: बहुत छोटी कविता, केवल 8 पंक्तियाँ, कोई अंश-विभाजन नहीं
  • प्रमुख तकनीक: सीधा, सरल संवाद-बिंब
  • भाव: बच्चों के अपने यथार्थ पर सहज आश्चर्य और सीख
परीक्षा संकेत

दोनों कविताओं में बिंब-विधान की शैली साझा है, चाहे वह बनारस के बड़े, विस्तृत बिंब हों या दिशा का एक छोटा-सा बिंब; और दोनों मुक्त छंद में हैं। (पाठ्यपुस्तक दोनों कविताओं की तुलना नहीं करती।)

त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • केदारनाथ सिंह (1934-2018), जन्म बलिया के चकिया गाँव में; काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बिंब-विधान विषय पर पीएच.डी.
  • निबंध-संग्रह “कब्रिस्तान में पंचायत”; काव्य-संग्रह “अकाल में सारस” पर 1989 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • “बनारस”: शहर के परस्पर विरोधी बिंब, आधा जल में/आधा मंत्र में, आधा फूल में/आधा शव में
  • अंतिम पंक्ति का प्रतीक: “अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर, अपनी दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर”; एक पठन: परंपरा और आधुनिकता में एक साथ, बेपरवाह जीना (भूमिका: “आधुनिकता का समाहार”)
  • “धीरे-धीरे” की पुनरावृत्ति शहर की मंथर, अटूट लय दिखाती है; तुलसीदास की खड़ाऊँ सैकड़ों बरस से एक ही जगह रखी है
  • “दिशा”: एक बच्चे से हिमालय की दिशा पूछने पर उत्तर मिलता है, “उधर-उधर”, यानी जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी
  • दिशा का केंद्रीय भाव: हर व्यक्ति का अपना यथार्थ होता है, हम बच्चों से कुछ-न-कुछ सीख सकते हैं
  • दोनों कविताएँ मुक्त छंद में; बिंब-विधान दोनों में साझा तकनीक, लेकिन बनारस लंबी और विस्तृत, दिशा बेहद छोटी और सीधी