- रघुवीर सहाय का जीवन-परिचय और उनकी पत्रकार-दृष्टि वाली काव्य-शैली बता पाएँगे
- “वसंत आया” में छिपे व्यंग्य को पहचानकर बता पाएँगे कि आज मनुष्य प्रकृति से कैसे कटा हुआ है
- “तोड़ो” में बंजर भूमि और मानव-मन के दोहरे प्रतीक को समझकर स्पष्ट कर पाएँगे
- दोनों कविताओं की हर पंक्ति का भावार्थ अपने शब्दों में लिख पाएँगे
- दोनों कविताओं के अलंकार पहचानकर परीक्षा में सही नाम लिख पाएँगे
- दोनों कविताओं के कठिन/देशज शब्दों के अर्थ बिना भूले लिख पाएँगे
1 कवि-परिचय: रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय की ये दोनों कविताएँ देखने में बहुत छोटी और सीधी-सादी लगती हैं, लेकिन दोनों के भीतर गहरी बात छिपी है। इन्हें ठीक से समझने के लिए पहले कवि की पत्रकार-दृष्टि वाली काव्य-शैली को जान लेना ज़रूरी है।
- रघुवीर सहाय का जीवनकाल सन् 1929 से 1990 तक रहा। इनका जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और इनकी संपूर्ण शिक्षा भी लखनऊ में ही हुई।
- इन्होंने 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। ये पेशे से पत्रकार थे, कवि होने के साथ-साथ।
- करियर की शुरुआत इन्होंने “प्रतीक” पत्रिका में सहायक संपादक के रूप में की, फिर ये आकाशवाणी के समाचार विभाग में रहे।
- इसके बाद कुछ समय ये हैदराबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “कल्पना” के संपादन से जुड़े रहे, और कई वर्षों तक इन्होंने “दिनमान” का संपादन किया।
- रघुवीर सहाय नयी कविता के कवि माने जाते हैं। इनकी कुछ कविताएँ अज्ञेय द्वारा संपादित “दूसरा सप्तक” में संकलित हैं।
- कविता के अलावा इन्होंने रचनात्मक और विवेचनात्मक गद्य भी लिखा है। इनके काव्य-संसार में अपने निजी (आत्मपरक) अनुभवों की जगह जनजीवन के अनुभवों की रचनात्मक अभिव्यक्ति अधिक है, यानी ये व्यापक सामाजिक संदर्भों के निरीक्षण, अनुभव और बोध को कविता में व्यक्त करते हैं।
पत्रकार-दृष्टि का काव्य में सर्जनात्मक उपयोग: रघुवीर सहाय मानते हैं कि अख़बार की खबर के भीतर दबी और छिपी हुई ऐसी अनेक “खबरें” होती हैं, जिनमें मानवीय पीड़ा छिपी रह जाती है। उस छिपी हुई मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति करना कविता का दायित्व (ज़िम्मेदारी) है। इसी काव्य-दृष्टि के अनुरूप उन्होंने अपनी नयी काव्य-भाषा का विकास किया।
- इसी काव्य-दृष्टि के अनुरूप ही इन्होंने अपनी नयी काव्य-भाषा का विकास किया। ये अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से प्रयासपूर्वक बचते हैं।
- भयाक्रांत (भय से घिरे, डरे हुए) अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति (बिना उत्तेजना दिखाए कहना) इनकी कविता की प्रमुख विशेषता है।
- रघुवीर सहाय ने मुक्त छंद के साथ-साथ छंद में भी काव्य-रचना की है। जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति के लिए ये कविता की संरचना में कथा या वृत्तांत (कहानी जैसा ढाँचा) का उपयोग करते हैं।
सीढ़ियों पर धूप में
काव्य-कृति
आत्महत्या के विरुद्ध
काव्य-कृति
हँसो हँसो जल्दी हँसो
काव्य-कृति
लोग भूल गए हैं
काव्य-कृति; इसी पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला
इनकी लगभग सभी रचनाएँ “रघुवीर सहाय रचनावली” नाम से छह खंडों में संगृहीत होकर प्रकाशित हुई हैं।
कवि-परिचय के मुख्य तथ्य: जीवनकाल (1929-1990), जन्मस्थान (लखनऊ), पेशा (पत्रकार) और “दिनमान” का संपादन, ये चार बातें याद रखें।
बहुत-से छात्र भ्रमित हो जाते हैं कि रघुवीर सहाय ही “दूसरा सप्तक” के संपादक हैं। ऐसा नहीं है: “दूसरा सप्तक” के संपादक अज्ञेय हैं, रघुवीर सहाय की केवल कुछ कविताएँ उसमें संकलित (शामिल) हैं। “संपादक” और “संकलित कवि” में यह भेद परीक्षा में स्पष्ट लिखें।
2 वसंत आया
2.1 प्रसंग और केंद्रीय भाव: यह वसंत का सीधा वर्णन नहीं, व्यंग्य है
व्यंग्य: जब कवि या लेखक किसी बात को सीधे न कहकर, उसका उलटा या हल्का-सा मज़ाक उड़ाते हुए कहता है, ताकि पढ़ने वाले को असली कमी या ग़लती ख़ुद समझ आ जाए, उसे व्यंग्य कहते हैं। “वसंत आया” में कवि सीधे वसंत का सुंदर वर्णन नहीं कर रहा, बल्कि इस बात पर व्यंग्य कर रहा है कि आज का मनुष्य वसंत को सीधे अनुभव करने की जगह कैलेंडर से जानता है।
- यह कविता कहती है कि आज मनुष्य का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है। वसंत ऋतु का आना अब सीधे अनुभव करने के बजाय कैलेंडर से जाना जाता है।
- ऋतुओं में परिवर्तन पहले की तरह ही स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं: पत्ते झड़ते हैं, कोंपलें (नयी कोमल पत्तियाँ) फूटती हैं, हवा बहती है, ढाक के जंगल दहकते (लाल फूलों से जल उठते) हैं, कोमल भ्रमर (भौंरे) अपनी मस्ती में झूमते हैं। लेकिन हमारी निगाह उनपर नहीं जाती, हम निरपेक्ष (उदासीन) बने रहते हैं।
- वास्तव में कवि ने आज के मनुष्य की आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य किया है।
- कविता की भाषा में जीवन की विडंबना (जो होना चाहिए और जो हो रहा है, उसके बीच का अंतर) छिपी हुई है।
- प्रकृति से अंतरंगता (आत्मीयता) व्यक्त करने के लिए कवि ने देशज (तद्भव) शब्दों और क्रियाओं का भरपूर प्रयोग किया है, जैसे “कुऊकना” और “चुरमुराए”। अशोक, मदनमहीना, पंचमी, नंदन-वन जैसे परंपरा में रचे-बसे जीवनानुभवों की भाषा ने इस कविता को आधुनिकता के सामने एक चुनौती की तरह खड़ा कर दिया है।
2.2 मूल काव्यांश: वसंत आया
ऐसे किसी बँगले के किसी तरु (अशोक?) पर कोई चिड़िया कुऊकी
चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराए पाँव तले
ऊँचे तरुवर से गिरे
बड़े-बड़े पियराए पत्ते
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो—
खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई।
ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते।
कल मैंने जाना कि वसंत आया।
भावार्थ: जैसे बहन बिना सोचे-समझे सहज ही “दा” कह देती है, उसी सहजता से कवि को वसंत का आभास मिलता है, कोई सीधा एलान नहीं। किसी बँगले के किसी पेड़ (शायद अशोक) पर कोई चिड़िया बोली, चलती सड़क किनारे पीले पड़े सूखे पत्ते पाँवों तले चरमराए, और सुबह छह बजे मानो गरम पानी से नहाकर आई खिली हुई हवा फिरकी-सी आई और पल-भर में चली गई। इन्हीं छोटी-छोटी, बिखरी हुई और लगभग अनदेखी बातों से, फुटपाथ पर चलते-चलते, कवि को अचानक एहसास हुआ कि वसंत आ गया है।
अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आवेंगे
रंग-रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नंदन-वन होवेंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व
अभ्यास करके दिखावेंगे
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा
जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।
भावार्थ: कवि बताता है कि वसंत के आने की जानकारी तो उसे पहले से थी: कैलेंडर से मालूम था कि अमुक दिन मदनमहीने की पंचमी (वसंत पंचमी) पड़ेगी, और दफ़्तर में छुट्टी थी, यही इसका “प्रमाण” था। कविताएँ पढ़ते रहने से उसे यह भी पता था कि कहीं ढाक के जंगल दहकेंगे, आम में बौर आएँगे, दूर के नंदन-वन रंग-रस-गंध से लदकर यशस्वी होंगे और मधुमस्त कोयल-भौंरे अपना-अपना कृतित्व दिखाएँगे। यानी वसंत का उसका ज्ञान कैलेंडर, छुट्टी और किताबों से आया था, अपनी आँखों देखकर नहीं। पर यह वह नहीं जानता था कि आज के इस नगण्य (साधारण) दिन, फुटपाथ पर चलते-चलते, चिड़िया की कूक, पियराए पत्तों और खिली हुई हवा जैसे छोटे संकेतों से वह वसंत को इस तरह सहज अनुभव से जानेगा। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: आज के मनुष्य को ऋतु-परिवर्तन का पता कैलेंडर, छुट्टी और किताबों से है, और प्रकृति का सहज अनुभव भी अब बस राह चलते, किसी “नगण्य” दिन होता है। यही इस कविता की विडंबना और व्यंग्य है।
2.3 शब्दार्थ: वसंत आया
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कुऊकना | चिड़िया की स्वाभाविक आवाज़, “कुहुकना” का तद्भव (देशज) रूप |
| चुरमुराए | चरमराने की आवाज़ |
| तरुवर | छायादार वृक्ष |
| फिरकी | फिरहरी, लकड़ी का खिलौना जो ज़मीन पर गोल-गोल घूमता है |
| मदनमहीना | कामदेव का महीना (वसंत) |
| दहर-दहर | धधक-धधक कर |
| दहकना | लपट के साथ जलना |
| लदे-फँदे | बोझ से लदा हुआ, भरपूर मात्रा में सजा हुआ |
| ढाक | पलाश (एक वृक्ष, जिसमें लाल फूल खिलते हैं) |
| नंदन-वन | आनंददायी वन (इंद्र का उद्यान) |
| मधुमस्त | पुष्पों का रस पीकर मस्त |
| पिक | कोयल |
| नगण्य | जो गिनती योग्य न हो, तुच्छ |
व्यंग्य और विडंबना: पूरी कविता का मूल स्वर व्यंग्य है, आज का मनुष्य प्रकृति के प्रत्यक्ष अनुभव की जगह कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से ऋतु-परिवर्तन जानता है।
देशज/तद्भव शब्दावली: कुऊकना, चुरमुराए जैसे ग्रामीण, बोलचाल के शब्दों का प्रयोग कविता को यथार्थ के क़रीब लाता है।
बिंब और प्रतीक: “चुरमुराए पाँव तले” और “बड़े-बड़े पियराए पत्ते” जैसे दृश्य-बिंब तथा “खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई” जैसा स्पर्श-बिंब कविता को जीवंत बनाते हैं। पाठ्यपुस्तक के अनुसार कविता में बिंबों और प्रतीकों का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।
भाषा-शैली: खड़ी बोली, मुक्त छंद, बोलचाल जैसी सहज वाक्य-रचना (“जैसे बहन ‘दा’ कहती है”)।
(क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते: पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार (“बड़े-बड़े” शब्द की आवृत्ति)।
(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो: उत्प्रेक्षा अलंकार (सुबह छह बजे की खिली हुई हवा के बारे में संभावना जताई गई है कि मानो वह गरम पानी से नहाकर आई हो; “जैसे” शब्द यही संभावना बताता है)।
(ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई: उपमा अलंकार (हवा की तुलना फिरकी से, “सी” उपमा-वाचक शब्द के साथ)।
(घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल: अनुप्रास अलंकार (‘द’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति) और पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार (“दहर-दहर”)।
कवि “नंदन-वन” (रंग-रस-गंध से लदे-फँदे) को “दूर के विदेश के” कहता है, इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि यह दृश्य कवि के लिए इतना अपरिचित हो गया है मानो किसी दूसरे ही देश की बात हो।
3 तोड़ो
3.1 प्रसंग और केंद्रीय भाव: विध्वंस नहीं, सृजन का आह्वान
- “तोड़ो” एक उद्बोधनपरक (पुकारने/आह्वान करने वाली) कविता है। इसमें कवि सृजन (कुछ नया बनाने) के लिए भूमि को तैयार करने वास्ते चट्टानें, ऊसर और बंजर ज़मीन को तोड़ने का आह्वान करता है।
- परती को खेत में बदलना सृजन की आरंभिक परंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। यहाँ कवि विध्वंस (तोड़-फोड़, नष्ट करना) के लिए नहीं उकसाता, बल्कि सृजन के लिए प्रेरित करता है। यह भेद स्पष्ट रखें।
- कविता का ऊपरी ढाँचा सरल प्रतीत होता है, परंतु प्रकृति से मन की तुलना करते हुए कवि इसे नया आयाम दे देता है: यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है।
प्रकृति और मन का बंजर: “यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है।” कवि मन में व्याप्त ऊब तथा खीज (झुँझलाहट) को भी तोड़ने की बात करता है, अर्थात उसे भी उर्वर (उपजाऊ) बनाने की बात करता है, क्योंकि मन के भीतर की ऊब सृजन में बाधक (रुकावट डालने वाली) है।
- कवि सृजन का आकांक्षी (इच्छुक) है, इसलिए इस ऊब को भी दूर करने की बात करता है। कवि मन के बारे में प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाता है (“हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?”), इससे कविता का अर्थ-विस्तार होता है। यह प्रश्न अंतिम पंक्ति से ठीक पहले आता है; कविता का अंत “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर होता है।
3.2 मूल काव्यांश: तोड़ो
ये पत्थर ये चट्टानें
ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती को हम जानें
सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है
अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है
आधे आधे गाने
भावार्थ: कवि बार-बार पुकार लगाता है, इन पत्थरों और चट्टानों को तोड़ो; “ये पत्थर ये चट्टानें” के ठीक बाद कवि कहता है “ये झूठे बंधन टूटें / तो धरती को हम जानें”। इसलिए पत्थर-चट्टानों को झूठे बंधनों का प्रतीक माना जाता है (इन बंधनों को रूढ़ियों और ग़लत मान्यताओं के रूप में पढ़ा जा सकता है), जिनके टूटने पर ही धरती को जाना जा सकेगा। सुनने में आता है कि मिट्टी में जीवन-रस है, जिससे घास (दूब) उग आती है, लेकिन अपने ही मन के मैदान पर तो न जाने कैसी ऊब फैली हुई है, कि गीत भी अधूरे-अधूरे (“आधे आधे”) ही निकलते हैं, सृजन-शक्ति मानो कुंठित (रुकी हुई) हो गई है।
ये ऊसर बंजर तोड़ो
ये चरती परती तोड़ो
सब खेत बनाकर छोड़ो
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?
गोड़ो गोड़ो गोड़ो
भावार्थ: कवि फिर पुकारता है, अनुपजाऊ (ऊसर-बंजर) और चरागाह के लिए छोड़ी गई (परती) ज़मीन को तोड़ो, और सबको जोत-तोड़कर खेत बना दो, यह सृजन के लिए एक ठोस, व्यावहारिक कर्म है। मिट्टी में रस तो तभी होगा जब वह बीज को पोसेगी (पालेगी), लेकिन कवि सवाल उठाता है, अपने मन की इस खीज (झुँझलाहट) का हम क्या करें? कवि इस प्रश्न पर रुकता नहीं, आगे बढ़ जाता है, और कविता “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर समाप्त होती है। अंतिम पंक्ति “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” में गोड़ने का अर्थ है निराई-गुड़ाई करना, यानी पौधे को उगाने के लिए मिट्टी को सहेजना, पोषण देना। कविता को तोड़ने (ध्वंस जैसा दिखने वाला काम) से गोड़ने (पोषण और सृजन) तक की यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है।

3.3 शब्दार्थ: तोड़ो
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| व्यापी | फैली हुई, व्याप्त |
| ऊसर-बंजर | अनुपजाऊ ज़मीन |
| चरती-परती | पशुओं के लिए चारागाह आदि के लिए छोड़ी गई ज़मीन |
| दूब | एक प्रकार की कोमल घास |
| खीज | झुँझलाहट, चिड़चिड़ापन |
| गोड़ना | निराई-गुड़ाई करना, पौधे के आसपास की मिट्टी को सहेजना |
प्रतीक: पत्थर-चट्टानें झूठे बंधनों के प्रतीक हैं (इन्हें रूढ़ियों के रूप में पढ़ा जा सकता है); बंजर प्रकृति में भी है और मानव-मन में भी (मन की ऊब-खीज); खेत और बीज सृजन के प्रतीक हैं। यह एक विस्तृत रूपक अलंकार है, बंजर ज़मीन की तुलना सीधे मन से कर दी गई है।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार: “तोड़ो तोड़ो तोड़ो” और “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” में एक ही शब्द की तीन बार आवृत्ति, बल और लय दोनों के लिए।
प्रश्नालंकार/उद्बोधन: “हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?” जैसा प्रश्न उठाकर कवि आगे बढ़ जाता है, जिससे कविता का अर्थ-विस्तार होता है।
भाषा-शैली: खड़ी बोली, तुकांत और लयबद्ध रचना (चट्टानें-जानें, दूब है-ऊब है, तोड़ो-छोड़ो, बीज को-खीज को जैसी तुकें), सरल क्रिया-प्रधान शब्दावली, आह्वान जैसा तेज़ लहजा।
4 दोनों कविताओं की तुलना
दोनों कविताएँ एक ही कवि (रघुवीर सहाय) की लिखी हैं, फिर भी दोनों का छंद, स्वर और अंदाज़ बिलकुल अलग है। “वसंत आया” मुक्त छंद में है, जबकि “तोड़ो” तुकांत और लयबद्ध रचना है।
वसंत आया
- स्वर: व्यंग्य और विडंबना
- छंद: मुक्त छंद (नियमित तुक-योजना नहीं)
- विषय: मनुष्य का प्रकृति से टूटा रिश्ता, कैलेंडर से ऋतु जानना
- भाषा: देशज/तद्भव शब्दावली (कुऊकना, चुरमुराए)
- अंत: “यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा / जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।”
तोड़ो
- स्वर: आह्वान और उद्बोधन
- छंद: तुकांत और लयबद्ध (चट्टानें-जानें, तोड़ो-छोड़ो जैसी तुकें)
- विषय: बंजर भूमि और मन दोनों को तोड़कर सृजन की ओर बढ़ना
- भाषा: सरल, प्रत्यक्ष क्रिया-प्रधान शब्दावली (तोड़ो, गोड़ो)
- अंत: “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” (खीज वाला प्रश्न इससे ठीक पहले)
“वसंत आया” की व्याख्या करते समय इसे कभी भी एक सीधी, सुंदर प्रकृति-कविता की तरह मत लिखिए, इसका मूल स्वर व्यंग्य है। इसी तरह “तोड़ो” को कभी विध्वंस या तोड़-फोड़ की कविता मत लिखिए, यह सृजन (कुछ नया बनाने) की कविता है। यह भेद भाव-सौंदर्य के उत्तर में स्पष्ट लिखें।
- रघुवीर सहाय (1929-1990), जन्म लखनऊ में, पेशे से पत्रकार, “दिनमान” के संपादक
- करियर-यात्रा: प्रतीक → आकाशवाणी → कल्पना (हैदराबाद) → दिनमान; काव्य-कृतियाँ: सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं (साहित्य अकादमी पुरस्कार)
- दूसरा सप्तक के संपादक अज्ञेय हैं, रघुवीर सहाय की कविताएँ उसमें केवल संकलित हैं
- “वसंत आया”: व्यंग्य-प्रधान कविता, आज का मनुष्य वसंत को कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से जानता है, प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं
- “वसंत आया” के अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश (बड़े-बड़े), उत्प्रेक्षा (नहाई हो), उपमा (फिरकी-सी), अनुप्रास + पुनरुक्तिप्रकाश (दहर-दहर दहकेंगे)
- “तोड़ो”: उद्बोधनपरक कविता, चट्टान/बंजर तोड़कर सृजन का आह्वान, विध्वंस नहीं
- “तोड़ो” का दोहरा प्रतीक: बंजर भूमि = बाहरी यथार्थ, बंजर मन (ऊब-खीज) = भीतरी यथार्थ; दोनों को तोड़कर उर्वर बनाना है
- “तोड़ो” में कवि मन के बारे में प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाता है, इससे कविता का अर्थ-विस्तार होता है; कविता “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर समाप्त होती है
- “वसंत आया” मुक्त छंद और व्यंग्यात्मक; “तोड़ो” तुकांत, लयबद्ध और आह्वानपरक