कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 5 वसंत आया / तोड़ो महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय का जीवनकाल क्या है?

उत्तर: रघुवीर सहाय का जीवनकाल सन् 1929 से 1990 तक रहा।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय का जन्म कहाँ हुआ?

उत्तर: रघुवीर सहाय का जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय ने कई वर्षों तक किस पत्रिका का संपादन किया?

उत्तर: रघुवीर सहाय ने कई वर्षों तक “दिनमान” का संपादन किया।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय की किस काव्य-कृति पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला?

उत्तर: “लोग भूल गए हैं” काव्य-संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. “वसंत आया” कविता का केंद्रीय स्वर क्या है?

उत्तर: “वसंत आया” का केंद्रीय स्वर व्यंग्य और विडंबना है।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. “तोड़ो” में “गोड़ो” शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: गोड़ो का अर्थ है निराई-गुड़ाई करना, पौधे को उगाने के लिए मिट्टी को सहेजना।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. “तरुवर” शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: तरुवर का अर्थ है छायादार वृक्ष।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. “तोड़ो” कविता में पत्थर-चट्टानें किसका प्रतीक हैं?

उत्तर: पत्थर-चट्टानें झूठे बंधनों (रूढ़ियों) का प्रतीक हैं।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय की पत्रकारिता-यात्रा संक्षेप में बताइए।

उत्तर: रघुवीर सहाय ने करियर की शुरुआत “प्रतीक” पत्रिका में सहायक संपादक के रूप में की, फिर आकाशवाणी के समाचार विभाग में रहे, कुछ समय हैदराबाद से प्रकाशित पत्रिका “कल्पना” के संपादन से जुड़े रहे, और अंततः कई वर्षों तक “दिनमान” का संपादन किया।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय की पत्रकार-दृष्टि का उनकी कविता में क्या योगदान है?

उत्तर: रघुवीर सहाय मानते थे कि अखबार की खबर में दबी-छिपी मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति करना कविता का दायित्व है। पाठ्यपुस्तक के अनुसार इसी काव्य-दृष्टि के अनुरूप उन्होंने अपनी नयी काव्य-भाषा का विकास किया, जिसमें वे अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से प्रयासपूर्वक बचते हैं।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. “वसंत आया” में मनुष्य और प्रकृति के बीच के रिश्ते का क्या चित्रण है?

उत्तर: कविता कहती है कि आज मनुष्य का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है। ऋतुओं में परिवर्तन पहले की तरह ही स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं, पर हमारी निगाह उनपर नहीं जाती, हम निरपेक्ष (उदासीन) बने रहते हैं, वसंत का आना अब कैलेंडर से जाना जाता है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. “वसंत आया” में कवि ने वसंत के किन प्राकृतिक संकेतों का उल्लेख किया है?

उत्तर: कवि ने बताया है कि किसी बँगले के तरु पर चिड़िया कुऊकी, चलती सड़क किनारे पीले पत्ते पाँवों तले चरमराए, और सुबह छह बजे खिली हुई हवा फिरकी-सी आई और चली गई। ये छोटे-छोटे, अनदेखे संकेत ही उसे वसंत का आभास देते हैं।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. दफ़्तर की छुट्टी को कवि वसंत का “प्रमाण” क्यों मानता है?

उत्तर: कवि को कैलेंडर से पहले से मालूम था कि अमुक दिन मदनमहीने की पंचमी होगी। दफ़्तर में उस दिन छुट्टी मिलना ही इस बात का “प्रमाण” बन जाता है, यह दिखाता है कि ऋतु-परिवर्तन की पहचान अब कैलेंडर और छुट्टी से होती है, प्रकृति से नहीं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. “तोड़ो” कविता का केंद्रीय भाव क्या है?

उत्तर: “तोड़ो” एक उद्बोधनपरक कविता है, जिसमें कवि सृजन के लिए भूमि तैयार करने वास्ते चट्टानें, ऊसर और बंजर ज़मीन को तोड़ने का आह्वान करता है। यहाँ कवि विध्वंस के लिए नहीं उकसाता, बल्कि सृजन के लिए प्रेरित करता है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. “तोड़ो” में दोहरे प्रतीक को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: पाठ्यपुस्तक के अनुसार “यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है।” यानी बंजर ज़मीन केवल असली भूमि नहीं, मन में व्याप्त ऊब और खीज की ओर भी संकेत करती है। कवि मन में व्याप्त ऊब तथा खीज को भी तोड़ने, अर्थात उर्वर बनाने की बात करता है, क्योंकि मन के भीतर की ऊब सृजन में बाधक है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. “तोड़ो” तोड़ने से गोड़ने तक की यात्रा किस तरह पूरी होती है?

उत्तर: कविता “तोड़ो तोड़ो तोड़ो” से शुरू होती है, जो पत्थर-चट्टान और बंजर भूमि को तोड़ने का आह्वान है। अंत “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर होता है, जिसका अर्थ है निराई-गुड़ाई करना, यानी पोषण देना। कविता को तोड़ने (ध्वंस जैसा दिखने वाला काम) से गोड़ने (पोषण/सृजन) तक की इसी यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. “वसंत आया” और “तोड़ो” की काव्य-भाषा में क्या अंतर है?

उत्तर: “वसंत आया” में देशज/तद्भव शब्दावली (कुऊकना, चुरमुराए) और परंपरागत शब्द (अशोक, मदनमहीना, नंदन-वन) का प्रयोग है। “तोड़ो” में सरल, प्रत्यक्ष क्रिया-प्रधान भाषा (तोड़ो, गोड़ो) है, और दोहराव के ज़रिए बल और लय पैदा की गई है।

प्रश्न 10 (2 अंक)

प्र. “वसंत आया” में कौन-सा अलंकार सबसे अधिक ध्यान खींचता है, और क्यों?

उत्तर: “कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो” में उत्प्रेक्षा अलंकार है, क्योंकि सुबह छह बजे की हवा के बारे में “जैसे” शब्द के ज़रिए संभावना व्यक्त की गई है कि मानो वह गरम पानी से नहाकर आई हो। यह हवा की ताज़गी को बहुत जीवंत ढंग से चित्रित करता है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय का जीवन-परिचय और काव्य-दृष्टि संक्षेप में लिखिए।

उत्तर: • जीवनकाल सन् 1929-1990, जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में, संपूर्ण शिक्षा भी लखनऊ में हुई।
• 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए., पेशे से पत्रकार थे।
• प्रतीक → आकाशवाणी → कल्पना (हैदराबाद) → दिनमान (कई वर्ष संपादन), यही उनकी पत्रकारिता-यात्रा है।
• नयी कविता के कवि माने जाते हैं, कुछ कविताएँ अज्ञेय संपादित “दूसरा सप्तक” में संकलित।
• पत्रकार-दृष्टि का सर्जनात्मक उपयोग, अनावश्यक शब्दों से बचना, आवेगरहित अभिव्यक्ति उनकी काव्य-दृष्टि की विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. “वसंत आया” कविता में छिपे व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: • कविता वसंत का सीधा, सुंदर वर्णन नहीं करती, बल्कि इस पर व्यंग्य करती है कि आज का मनुष्य प्रकृति से कट गया है।
• ऋतु-परिवर्तन के प्राकृतिक संकेत (पत्ते झड़ना, हवा बहना) होते रहते हैं, पर हमारी निगाह उनपर नहीं जाती।
• वसंत पंचमी का दिन कवि को कैलेंडर से मालूम था, दफ़्तर की छुट्टी “प्रमाण” बनती है; वसंत का सहज अनुभव उसे किसी “नगण्य” दिन, फुटपाथ पर चलते-चलते होता है।
• ढाक के जंगल दहकने, आम बौर आने जैसे पारंपरिक दृश्य कवि को कविताएँ पढ़कर मालूम हैं, अपनी आँखों देखकर नहीं।
• यही कविता के व्यंग्य का केंद्र है: पाठ्यपुस्तक के अनुसार कवि ने आज के मनुष्य की आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य किया है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. “तोड़ो” कविता के प्रतीकों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।

उत्तर: • पत्थर-चट्टानें = झूठे बंधन (इन्हें रूढ़ियों के रूप में पढ़ा जा सकता है): “ये झूठे बंधन टूटें / तो धरती को हम जानें”।
• ऊसर-बंजर = अनुपजाऊ ज़मीन, जिसे तोड़कर खेत बनाना है।
• परती ज़मीन को खेत में बदलना = सृजन की आरंभिक पर महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया।
• मन के मैदान पर छाई ऊब = आधे-आधे गाने, यानी कुंठित सृजन-शक्ति।
• यह बंजर प्रकृति में भी है और मानव-मन में भी, यही दोहरा प्रतीक है।
• गोड़ो गोड़ो गोड़ो = निराई-गुड़ाई, यानी पोषण/सृजन; कविता को तोड़ने से गोड़ने तक की यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. “वसंत आया” के अलंकारों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: • “बड़े-बड़े पियराए पत्ते”: पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार, “बड़े-बड़े” शब्द की आवृत्ति।
• “कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो”: उत्प्रेक्षा अलंकार, सुबह की हवा के गरम पानी से नहाकर आने की संभावना।
• “खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई”: उपमा अलंकार, हवा की तुलना फिरकी से “सी” शब्द के साथ।
• “कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल”: अनुप्रास अलंकार (‘द’ वर्ण की आवृत्ति) और पुनरुक्तिप्रकाश दोनों।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. “वसंत आया” और “तोड़ो” की तुलना कीजिए।

उत्तर: • स्वर: “वसंत आया” में व्यंग्य और विडंबना; “तोड़ो” में आह्वान और उद्बोधन।
• विषय: पहली कविता मनुष्य के प्रकृति से टूटे रिश्ते की बात करती है; दूसरी सृजन के लिए बंजर भूमि और मन तोड़ने का आह्वान करती है।
• भाषा: “वसंत आया” देशज/तद्भव शब्दावली की; “तोड़ो” सरल, प्रत्यक्ष क्रिया-प्रधान भाषा की।
• अंत: पहली कविता “जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।” पर समाप्त होती है; दूसरी “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर (मन की खीज वाला प्रश्न इससे ठीक पहले आता है)।
• समानता: दोनों एक ही कवि (रघुवीर सहाय) की हैं और दोनों में प्रकृति के बिंबों से मनुष्य की स्थिति पर टिप्पणी है; अंतर यह कि “वसंत आया” मुक्त छंद में है, जबकि “तोड़ो” तुकांत और लयबद्ध है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. “तोड़ो” में मन की खीज वाला प्रश्न कहाँ आता है, और इसका क्या महत्त्व है?

उत्तर: • कविता की अंतिम पंक्ति से ठीक पहले कवि पूछता है, “हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?”
• कवि इस प्रश्न पर रुकता नहीं, प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाता है; कविता “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर समाप्त होती है।
• पाठ्यपुस्तक के अनुसार मन के बारे में प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाने से कविता का अर्थ-विस्तार होता है: बात केवल ज़मीन की नहीं रहती, मन तक पहुँचती है।
• “यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है”; अंतिम “गोड़ो” को इस संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है कि मन की खीज को भी गोड़कर, यानी सँवारकर, उर्वर बनाया जा सकता है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. “वसंत आया” कविता के आधार पर आज के मनुष्य और प्रकृति के बीच के रिश्ते पर विस्तार से प्रकाश डालिए।

उत्तर: • कविता कहती है कि आज मनुष्य का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है।
• ऋतुओं में परिवर्तन पहले की तरह ही स्वाभाविक रूप से होते हैं, पत्ते झड़ना, कोंपलें फूटना, हवा बहना, ढाक के जंगल दहकना, भ्रमरों का झूमना।
• पर हमारी निगाह उनपर नहीं जाती, हम निरपेक्ष (उदासीन) बने रहते हैं।
• वसंत पंचमी का दिन कवि को कैलेंडर से मालूम था, दफ़्तर की छुट्टी “प्रमाण” बन जाती है।
• ढाक-आम-कोयल जैसे पारंपरिक दृश्य कवि को कविताएँ पढ़कर मालूम हैं, अपनी आँखों देखकर नहीं।
• अंतिम पंक्तियों में कवि कहता है कि उसे यह नहीं पता था कि आज के नगण्य (साधारण) दिन, राह चलते, वह वसंत को इस तरह सहज रूप से जानेगा।
• पाठ्यपुस्तक के अनुसार कवि ने आज के मनुष्य की आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य किया है, जिसमें मनुष्य प्रकृति से दूर हो गया है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. “तोड़ो” कविता में सृजन और विध्वंस के भेद तथा दोहरे प्रतीक को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: • “तोड़ो” एक उद्बोधनपरक कविता है, कवि चट्टानें, ऊसर और बंजर तोड़ने का आह्वान करता है।
• यह विध्वंस के लिए नहीं, बल्कि सृजन के लिए आह्वान है, परती को खेत में बदलना सृजन की आरंभिक प्रक्रिया है।
• कविता का ऊपरी ढाँचा सरल लगता है, पर प्रकृति से मन की तुलना करके कवि इसे नया आयाम देता है।
• यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है, यही दोहरा प्रतीक है: बाहरी बंजर भूमि और भीतरी मन की ऊब।
• कवि मन में व्याप्त ऊब और खीज को भी तोड़ने, यानी उर्वर बनाने की बात करता है, क्योंकि यह सृजन में बाधक है।
• कवि मन के बारे में प्रश्न उठाकर आगे बढ़ जाता है (“हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?”), इससे कविता का अर्थ-विस्तार होता है; कविता “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर समाप्त होती है।
• कविता को तोड़ने (ध्वंस जैसा दिखने वाला काम) से गोड़ने (पोषण/सृजन) तक की यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. रघुवीर सहाय के जीवन-परिचय और उनकी काव्य-विशेषताओं का विस्तृत वर्णन कीजिए।

उत्तर: जीवन-परिचय:
• जीवनकाल सन् 1929-1990, जन्म और संपूर्ण शिक्षा लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में।
• 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए., पेशे से पत्रकार।
• करियर-यात्रा: प्रतीक (सहायक संपादक) → आकाशवाणी (समाचार विभाग) → कल्पना (हैदराबाद) → दिनमान (कई वर्ष संपादन)।
काव्य-विशेषताएँ:
• नयी कविता के कवि, कुछ कविताएँ अज्ञेय संपादित “दूसरा सप्तक” में संकलित।
• पत्रकार-दृष्टि का सर्जनात्मक उपयोग, अखबार की खबर में छिपी पीड़ा को कविता में व्यक्त करना कविता का दायित्व मानते थे।
• नयी काव्य-भाषा, अनावश्यक शब्दों से बचना, भयाक्रांत अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति।
• मुक्त छंद के साथ-साथ छंद में भी रचना, कथा/वृत्तांत का उपयोग।
• प्रमुख कृतियाँ: सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं (साहित्य अकादमी पुरस्कार); रचनावली छह खंडों में प्रकाशित।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आवेंगे
रंग-रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नंदन-वन होवेंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व
अभ्यास करके दिखावेंगे
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा
जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।

(क) 1 अंक मदनमहीने की पंचमी का दिन कवि को पहले से किससे मालूम था?
उत्तर: कैलेंडर से, कि अमुक दिन मदनमहीने की पंचमी होगी।

(ख) 1 अंक दफ़्तर की छुट्टी को कवि क्या मानता है?
उत्तर: दफ़्तर की छुट्टी को कवि वसंत आने का “प्रमाण” मानता है।

(ग) 2 अंक कवि को ढाक के जंगल दहकने और आम बौर आने की जानकारी कैसे मिली, और इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर: यह जानकारी कवि को कविताएँ पढ़ते रहने से मिली, प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं। यही कविता के व्यंग्य का केंद्र है; यह दिखाता है कि आधुनिक मनुष्य प्रकृति से कितना कट गया है।

(घ) 2 अंक इस काव्यांश के आधार पर बताइए कि “वसंत आया” किस पर व्यंग्य करती है?
उत्तर: यह कविता आज के मनुष्य की उस आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य करती है, जिसमें ऋतु-परिवर्तन को कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से जाना जाता है, प्रकृति के प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं।

केस स्टडी
तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये पत्थर ये चट्टानें
ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती को हम जानें
सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है
अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है
आधे आधे गाने

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये ऊसर बंजर तोड़ो
ये चरती परती तोड़ो
सब खेत बनाकर छोड़ो
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?
गोड़ो गोड़ो गोड़ो

(क) 1 अंक “तोड़ो” में पत्थर-चट्टानें किसका प्रतीक हैं?
उत्तर: पत्थर-चट्टानें झूठे बंधनों (रूढ़ियों) का प्रतीक हैं।

(ख) 1 अंक कविता का अंत किस शब्द की आवृत्ति से होता है?
उत्तर: कविता का अंत “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” की आवृत्ति से होता है।

(ग) 2 अंक इस काव्यांश के आधार पर बताइए कि कवि विध्वंस के लिए उकसाता है या सृजन के लिए।
उत्तर: कवि विध्वंस के लिए नहीं उकसाता, बल्कि सृजन के लिए प्रेरित करता है। “सब खेत बनाकर छोड़ो”: बंजर-परती भूमि तोड़कर खेत बनाना सृजन की आरंभिक प्रक्रिया है।

(घ) 2 अंक मन की ऊब-खीज का प्रश्न कविता में किस दोहरे प्रतीक को दर्शाता है?
उत्तर: पाठ्यपुस्तक के अनुसार “यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है।” इसलिए बंजर ज़मीन के साथ मन में व्याप्त ऊब-खीज की बात आती है; कवि मन की ऊब और खीज को भी तोड़ने, अर्थात उर्वर बनाने की बात करता है।