NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 5 वसंत आया / तोड़ो के प्रश्न-अभ्यास (दोनों कविताओं के 11 प्रश्न) और योग्यता-विस्तार (3 प्रश्न) के सभी चौदह प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ्यपुस्तक के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 वसंत आया
प्र. वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?
उत्तर: कवि को वसंत आगमन की सूचना किसी घोषणा से नहीं, बल्कि राह चलते मिले कुछ बहुत छोटे और लगभग अनदेखे संकेतों से मिली। किसी बँगले के किसी तरु (शायद अशोक) पर कोई चिड़िया कुऊकी, चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर पाँवों तले सूखे, पीले पड़े (पियराए) पत्ते चरमराए, और सुबह छह बजे एक खिली हुई हवा फिरकी-सी आई और पल-भर में चली गई। इन्हीं छोटी-छोटी, बिखरी बातों से, फुटपाथ पर चलते-चलते, कवि को अचानक एहसास हुआ कि वसंत आ गया है। वैसे वसंत के आने की जानकारी उसे पहले से कैलेंडर से थी कि अमुक दिन मदनमहीने की पंचमी होगी, और दफ़्तर में छुट्टी थी, यही इसका “प्रमाण” था; ढाक के जंगल दहकने, आम में बौर आने की बात उसे कविताएँ पढ़ते रहने से पता थी।
प्र. ‘कोई छह बजे सुबह … फिरकी सी आई, चली गई’: पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति में कवि सुबह छह बजे बहने वाली एक खिली हुई हवा का वर्णन करता है, जो मानो अभी-अभी गरम पानी से नहाकर आई हो, यानी बहुत स्वच्छ और सुहानी लग रही थी। यह हवा फिरकी-सी (गोल-गोल घूमने वाले खिलौने की तरह) अचानक आई और उतनी ही जल्दी चली भी गई। इस पंक्ति में निहित भाव यह है कि वसंत के आगमन के प्राकृतिक संकेत आज भी उतने ही सुंदर और सजीव हैं जितने पहले थे, पर वे इतने क्षणिक और अनदेखे रह जाते हैं कि मनुष्य को उनका ठीक से एहसास ही नहीं होता। यह क्षणभंगुरता कवि की उस बड़ी चिंता की ओर संकेत करती है कि आज का मनुष्य प्रकृति के इन सूक्ष्म संकेतों को पहचानने की संवेदनशीलता खो चुका है।
प्र. अलंकार बताइए,
(क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते
(ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो
(ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई
(घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
उत्तर (क): इसमें पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है, “बड़े-बड़े” शब्द की आवृत्ति (दोहराव) से पत्तों की अधिकता और भारीपन का भाव उभरता है।
उत्तर (ख): इसमें उत्प्रेक्षा अलंकार है, सुबह छह बजे की खिली हुई हवा के बारे में “जैसे” शब्द के ज़रिए यह संभावना व्यक्त की गई है कि मानो वह गरम पानी से नहाकर आई हो।
उत्तर (ग): इसमें उपमा अलंकार है, हवा की तुलना फिरकी (गोल घूमने वाला खिलौना) से “सी” उपमा-वाचक शब्द के साथ की गई है।
उत्तर (घ): इसमें अनुप्रास अलंकार है (‘द’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति) और साथ ही “दहर-दहर” शब्द की आवृत्ति के कारण पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार भी है।
प्र. किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है?
उत्तर: यह भाव सबसे स्पष्ट रूप से कविता के इन अंशों से ज्ञात होता है, “और यह कैलेंडर से मालूम था अमुक दिन अमुक बार मदनमहीने की होवेगी पंचमी, दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण” तथा “और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल, आम बौर आवेंगे … वे नंदन-वन होवेंगे यशस्वी, मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व अभ्यास करके दिखावेंगे।” इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि कवि को वसंत के पारंपरिक, सुंदर दृश्य (ढाक का दहकना, आम में बौर आना, कोयल-भौंरों की मस्ती) अपनी आँखों से देखकर नहीं, बल्कि कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से मालूम हैं। यही आज के मनुष्य का प्रकृति के प्रत्यक्ष, नैसर्गिक सौंदर्य से वंचित रह जाना दिखाता है।
प्र. ‘प्रकृति मनुष्य की सहचरी है’ इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: प्रकृति को मनुष्य की सहचरी (साथ चलने वाली संगिनी) माना गया है, ऋतु-परिवर्तन, फूलों का खिलना, पक्षियों का बोलना, ये सब मनुष्य के जीवन से गहरे जुड़े रहे हैं। परंतु आज के संदर्भ में यह रिश्ता टूटता जा रहा है। “वसंत आया” कविता इसी वास्तविकता को उजागर करती है, आज का मनुष्य वसंत का आना प्रकृति में देखकर नहीं, बल्कि कैलेंडर और छुट्टी से जानता है। आधुनिक जीवन-शैली में मनुष्य के पास प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तनों को देखने-महसूस करने का समय और संवेदनशीलता ही नहीं बची। इस तरह आज “प्रकृति मनुष्य की सहचरी है” यह कथन आदर्श रूप में सत्य होते हुए भी, व्यवहार में मनुष्य ने स्वयं इस सहचर्य को तोड़ लिया है, यही कविता की गहरी चिंता है।
प्र. ‘वसंत आया’ कविता में कवि की चिंता क्या है?
उत्तर: कवि की मूल चिंता यह है कि आज का मनुष्य प्रकृति से भावनात्मक रूप से कट गया है। ऋतुओं में परिवर्तन पहले की तरह ही स्वाभाविक रूप से होते रहते हैं, पत्ते झड़ते हैं, कोंपलें फूटती हैं, हवा बहती है, पर मनुष्य की निगाह अब इन पर नहीं जाती, वह उदासीन (निरपेक्ष) बना रहता है। वसंत जैसी सुंदर ऋतु का आगमन भी अब कैलेंडर, दफ़्तर की छुट्टी और कविताओं से जाना जाता है, प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं। कवि इसी आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य करते हुए यह चिंता व्यक्त करता है कि प्रकृति से यह दूरी मनुष्य के जीवन को कितना संवेदनाहीन बना रही है।
2 तोड़ो
प्र. ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्द किसके प्रतीक हैं?
उत्तर: “पत्थर” और “चट्टान” शब्द झूठे बंधनों के प्रतीक हैं (इन बंधनों को रूढ़ियों और ग़लत मान्यताओं के रूप में पढ़ा जा सकता है)। कवि के अनुसार ये झूठे बंधन धरती (यथार्थ) को सही ढंग से जानने में बाधा हैं, इसीलिए वह बार-बार इन्हें तोड़ने का आह्वान करता है, “ये झूठे बंधन टूटें, तो धरती को हम जानें।” व्यापक अर्थ में ये पत्थर-चट्टानें उन पुरानी, जड़ हो चुकी मान्यताओं और रूढ़ियों का प्रतीक हैं, जो नए सृजन के रास्ते में रोड़ा बनी रहती हैं।
प्र. भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए, मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को / हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को? / गोड़ो गोड़ो गोड़ो
उत्तर: इन पंक्तियों में कवि कहता है कि मिट्टी में रस (जीवन-शक्ति) तभी सिद्ध होगा जब वह बीज को पोसेगी, यानी बीज को पालकर उसे अंकुरित करेगी। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कवि अपने मन की ओर मुड़ता है और सवाल उठाता है कि मन में व्याप्त खीज (झुँझलाहट) का क्या किया जाए। यह प्रश्न कविता को केवल भूमि की बात से आगे बढ़ाकर मनुष्य के भीतरी संसार तक ले जाता है, बंजर भूमि और बंजर मन के बीच एक गहरा सादृश्य (समानता) स्थापित करता है। प्रश्न उठाकर कवि आगे बढ़ जाता है और कविता “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर समाप्त होती है। इस आवृत्ति को प्रश्न के उत्तर के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है: जिस तरह मिट्टी को गोड़ने (निराई-गुड़ाई) से उपजाऊ बनाया जाता है, उसी तरह मन की खीज को भी सहेजकर, सँवारकर उपजाऊ (सृजनशील) बनाया जा सकता है। भाव-सौंदर्य इसी में है कि कविता एक साधारण कृषि-क्रिया को मनुष्य के आंतरिक जीवन के गहरे प्रश्न से जोड़ देती है, और मन के बारे में प्रश्न उठाकर उसका अर्थ-विस्तार करती है।
प्र. कविता का आरंभ ‘तोड़ो तोड़ो तोड़ो’ से हुआ है और अंत ‘गोड़ो गोड़ो गोड़ो’ से। विचार कीजिए कि कवि ने ऐसा क्यों किया?
उत्तर: कविता की संरचना “तोड़ो” से “गोड़ो” तक एक यात्रा का संकेत देती है। आरंभ में “तोड़ो तोड़ो तोड़ो” पत्थर-चट्टान, ऊसर-बंजर और परती भूमि, यानी बाधाओं और रूढ़ियों को तोड़ने का आह्वान करता है, यह विध्वंस जैसा प्रतीत होता है पर वास्तव में सृजन के लिए ज़मीन तैयार करने की प्रक्रिया है। अंत में “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” आता है, जिसका अर्थ है निराई-गुड़ाई करना, यानी उस तैयार भूमि को पोषण देना, उसे उपजाऊ बनाना। इस तरह कविता यह स्पष्ट संदेश देती है कि तोड़ना अपने-आप में लक्ष्य नहीं, बल्कि सृजन की पहली सीढ़ी है, असली उद्देश्य तो गोड़ना यानी पोषण और सृजन ही है। कविता को तोड़ो से गोड़ो तक की इसी यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है।
प्र. ये झूठे बंधन टूटें / तो धरती को हम जानें / यहाँ पर झूठे बंधनों और धरती को जानने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: “झूठे बंधन” से कवि का अभिप्राय उन रूढ़ियों, पुरानी जड़ मान्यताओं और ग़लत विश्वासों से है, जो मनुष्य को यथार्थ को सीधे देखने-समझने नहीं देते, ठीक वैसे ही जैसे पत्थर-चट्टानें धरती के असली स्वरूप को ढँक देती हैं। “धरती को जानना” से कवि का अभिप्राय है यथार्थ को उसके सच्चे, बिना किसी आवरण के रूप में पहचानना, जीवन और संसार को जैसा वह वास्तव में है वैसा ही देखना। कवि का मानना है कि जब तक ये झूठे बंधन टूटेंगे नहीं, तब तक धरती (यथार्थ) को सही ढंग से नहीं जाना जा सकता, इसीलिए वह बार-बार इन्हें तोड़ने का आह्वान करता है।
प्र. ‘आधे-आधे गाने’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर: “आधे-आधे गाने” के माध्यम से कवि यह बताना चाहता है कि मन के मैदान पर छाई ऊब (उदासी, नीरसता) के कारण सृजन-शक्ति भी अधूरी, कुंठित हो गई है। जिस तरह मिट्टी में रस होने पर दूब पूरी तरह उग आती है, उसी तरह मन में जब सृजन की पूरी ऊर्जा हो तो गीत भी पूरे निकलने चाहिए, पर मन पर व्याप्त ऊब के कारण गीत भी “आधे-आधे” ही निकल पाते हैं, यानी अधूरे, अपूर्ण। यह पंक्ति कविता के दोहरे प्रतीक को और गहरा करती है, जैसे बंजर भूमि पर पूरी फ़सल नहीं उग पाती, वैसे ही ऊब से भरे मन से पूर्ण, सम्पूर्ण सृजन नहीं हो पाता। कवि इसी अधूरेपन को दूर करने, मन को भी उर्वर बनाने की बात करता है।
3 योग्यता-विस्तार
प्र. वसंत ऋतु पर किन्हीं दो कवियों की कविताएँ खोजिए और इस कविता से उनका मिलान कीजिए?
उत्तर: (यह खोज और तुलना की गतिविधि है, विद्यार्थी पुस्तकालय या अध्यापक की सहायता से कविताएँ खोजें।) मिलान करते समय यह देखें कि पारंपरिक वसंत-कविताएँ प्रायः ढाक, आम के बौर, कोयल, भौंरे और फूलों का सीधा, उल्लासपूर्ण वर्णन करती हैं, जबकि ‘वसंत आया’ इन्हीं दृश्यों को ‘कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था’ कहकर व्यंग्य का विषय बनाती है। पाठ्यपुस्तक के अनुसार यह कविता बताती है कि आज मनुष्य का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है और वसंत का आना अब अनुभव करने के बजाय कैलेंडर से जाना जाता है। दोनों कविताओं के विषय, भाषा (तत्सम या देशज) और स्वर (उल्लास या व्यंग्य) की तुलना तालिका बनाकर लिखें।
प्र. भारत में ऋतुओं का चक्र बताइए और उनके लक्षण लिखिए।
उत्तर: (यह सामान्य-ज्ञान पर आधारित गतिविधि है।) भारत में परंपरागत रूप से छह ऋतुएँ मानी जाती हैं: वसंत (फूल खिलना, नई कोंपलें, कोयल की कूक, हल्की सुहानी हवा), ग्रीष्म (तेज़ गर्मी, लू), वर्षा (बादल, बरसात, हरियाली), शरद (साफ़ आसमान, हल्की ठंडक), हेमंत (ठंड बढ़ना) और शिशिर (कड़ाके की सर्दी, पतझड़ की शुरुआत)। ‘वसंत आया’ में वसंत के लक्षण के रूप में पियराए पत्तों का गिरना, चिड़िया का कुऊकना, खिली हुई हवा, ढाक के दहकते जंगल और आम के बौर का उल्लेख है।
प्र. मिट्टी और बीज से संबंधित और भी कविताएँ हैं, जैसे सुमित्रानंदन पंत की ‘बीज’। अन्य कवियों की ऐसी कविताओं का संकलन कीजिए और भित्ति पत्रिका में उनका उपयोग कीजिए।
उत्तर: (यह संकलन और प्रस्तुति की गतिविधि है।) विद्यार्थी पुस्तकालय से मिट्टी, बीज, खेत और किसान से जुड़ी कविताएँ खोजें, जैसे सुमित्रानंदन पंत की ‘बीज’। भित्ति पत्रिका में हर कविता के साथ कवि का नाम और दो पंक्तियों में उसका भाव लिखें, और ‘तोड़ो’ की पंक्ति ‘मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को’ से उसकी तुलना करें कि किस तरह मिट्टी और बीज सृजन के प्रतीक बनते हैं।