कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 5 वसंत आया / तोड़ो शॉर्ट नोट्स

कक्षा 12 हिंदी, अंतरा भाग 2, अध्याय 5 का त्वरित पुनरीक्षण। हर परिभाषा, हर शब्दार्थ और हर नामित तथ्य एक ही जगह, बीच का कुछ नहीं। पहले पूरे नोट्स पढ़ें, यह परीक्षा की सुबह पढ़ें।

1 कवि-परिचय एक नज़र में

तथ्य विवरण
जीवनकाल सन् 1929-1990
जन्मस्थान लखनऊ (उत्तर प्रदेश); संपूर्ण शिक्षा भी लखनऊ में
शिक्षा 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.
पेशा पत्रकार
पत्रिकाएँ प्रतीक (सहायक संपादक) → आकाशवाणी (समाचार विभाग) → कल्पना (हैदराबाद) → दिनमान (कई वर्ष संपादन)
काव्यधारा नयी कविता के कवि
संबंध कुछ कविताएँ अज्ञेय संपादित “दूसरा सप्तक” में संकलित (स्वयं संपादक नहीं)
काव्य-कृतियाँ सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो, लोग भूल गए हैं
संकलन रघुवीर सहाय रचनावली (छह खंडों में)
पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार (“लोग भूल गए हैं” पर)

2 दोनों कविताओं की मूल जानकारी

वसंत आया तोड़ो
स्वर व्यंग्य और विडंबना आह्वान और उद्बोधन
केंद्रीय भाव मनुष्य का प्रकृति से टूटा रिश्ता, कैलेंडर से ऋतु जानना बंजर भूमि और मन दोनों को तोड़कर सृजन की ओर बढ़ना
भाषा देशज/तद्भव शब्दावली (कुऊकना, चुरमुराए) सरल, प्रत्यक्ष क्रिया-प्रधान भाषा (तोड़ो, गोड़ो)
शिल्प बिंब-प्रधान; चार पंक्तियों में अलंकार (प्रश्न-अभ्यास 3) दोहराव (तोड़ो तोड़ो तोड़ो / गोड़ो गोड़ो गोड़ो), दोहरा प्रतीक
अंत “यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा / जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।” “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” (मन की खीज वाला प्रश्न इससे ठीक पहले)
छंद मुक्त छंद तुकांत, लयबद्ध

3 वसंत आया: याद रखने योग्य बिंदु

प्रत्यक्ष संकेतचिड़िया का कुऊकना, पीले पत्तों का चुरमुराना, फिरकी-सी हवा: इन्हीं से फुटपाथ पर चलते-चलते कवि ने जाना कि वसंत आया
पहले से ज्ञानकैलेंडर से मालूम मदनमहीने की पंचमी; “दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण”
तीखा व्यंग्यढाक के जंगल दहकना, आम बौर आना, कोयल-भौंरों की मस्ती, यह सब कविताएँ पढ़कर मालूम, आँखों देखकर नहीं

4 तोड़ो: याद रखने योग्य बिंदु

तोड़ो तोड़ो तोड़ोपत्थर-चट्टानें = झूठे बंधन (इन्हें रूढ़ियों के रूप में पढ़ा जा सकता है); ऊसर-बंजर = अनुपजाऊ ज़मीन, जिसे तोड़कर खेत बनाना = सृजन
दोहरा प्रतीक“यह बंजर प्रकृति में है तो मानव-मन में भी है”; कवि मन की ऊब-खीज को भी उर्वर बनाने की बात करता है
गोड़ो गोड़ो गोड़ोनिराई-गुड़ाई = पोषण/सृजन; कविता को तोड़ने से गोड़ने तक की यात्रा के रूप में पढ़ा जा सकता है

5 वसंत आया के अलंकार (प्रश्न-अभ्यास 3)

पंक्ति अलंकार
बड़े-बड़े पियराए पत्ते पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो उत्प्रेक्षा अलंकार
खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई उपमा अलंकार
कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल अनुप्रास + पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार

6 सभी शब्दार्थ एक जगह

वसंत आया
कुऊकनाचिड़िया की स्वाभाविक आवाज़, कुहुकना का तद्भव रूप
चुरमुराएचरमराने की आवाज़
तरुवरछायादार वृक्ष
फिरकीफिरहरी, गोल घूमने वाला खिलौना
मदनमहीनाकामदेव का महीना (वसंत)
दहर-दहरधधक-धधक कर
दहकनालपट के साथ जलना
ढाकपलाश (लाल फूलों वाला वृक्ष)
नंदन-वनआनंददायी वन (इंद्र का उद्यान)
मधुमस्तपुष्पों का रस पीकर मस्त
पिककोयल
नगण्यजो गिनती योग्य न हो, तुच्छ
तोड़ो
व्यापीफैली हुई, व्याप्त
ऊसर-बंजरअनुपजाऊ ज़मीन
चरती-परतीपशुओं के लिए चारागाह हेतु छोड़ी गई ज़मीन
दूबएक प्रकार की कोमल घास
खीजझुँझलाहट, चिड़चिड़ापन
गोड़नानिराई-गुड़ाई करना, मिट्टी सहेजना
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • रघुवीर सहाय (1929-1990), जन्म लखनऊ में, पेशे से पत्रकार, “दिनमान” के संपादक
  • करियर-यात्रा: प्रतीक → आकाशवाणी → कल्पना (हैदराबाद) → दिनमान; दूसरा सप्तक के संपादक अज्ञेय हैं, रघुवीर सहाय की कविताएँ उसमें केवल संकलित
  • “वसंत आया”: व्यंग्य-प्रधान, आज का मनुष्य वसंत को कैलेंडर, छुट्टी और कविताओं से जानता है, प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं
  • “वसंत आया” के अलंकार: पुनरुक्तिप्रकाश (बड़े-बड़े), उत्प्रेक्षा (नहाई हो), उपमा (फिरकी-सी), अनुप्रास + पुनरुक्तिप्रकाश (दहर-दहर दहकेंगे)
  • “तोड़ो”: उद्बोधनपरक, चट्टान/बंजर तोड़कर सृजन का आह्वान, विध्वंस नहीं
  • “तोड़ो” का दोहरा प्रतीक: बंजर भूमि = बाहरी यथार्थ, बंजर मन (ऊब-खीज) = भीतरी यथार्थ
  • “तोड़ो” तोड़ो से गोड़ो तक की यात्रा: ध्वंस जैसा दिखने वाला काम असल में सृजन की तैयारी है; मन के बारे में प्रश्न उठाकर कवि आगे बढ़ जाता है (अर्थ-विस्तार), अंत “गोड़ो गोड़ो गोड़ो” पर
  • “वसंत आया” मुक्त छंद और व्यंग्यात्मक; “तोड़ो” तुकांत, लयबद्ध और आह्वानपरक