कक्षा 12 इतिहास अध्याय 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. हड़प्पा सभ्यता को यह नाम क्यों दिया गया?

उत्तर: क्योंकि हड़प्पा वह स्थल था जहाँ इसे सबसे पहले पहचाना गया; यह किसी राजा के नाम पर नहीं, स्थल के नाम पर है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. हड़प्पाई ईंटों का अनुपात बताइए।

उत्तर: लंबाई : चौड़ाई : ऊँचाई का अनुपात 4 : 2 : 1 था, जम्मू से गुजरात तक समान।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. ‘संचय’ (hoard) की परिभाषा दीजिए।

उत्तर: वस्तुओं का एक समूह जिसे सावधानी से, अक्सर किसी बर्तन जैसे पात्र में रखा जाता है, पुनः उपयोग के लिए।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. पाँच प्रमुख हड़प्पाई नगरों के नाम लिखिए।

उत्तर: राखीगढ़ी, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा और गनवेरीवाला।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. फ़यॉन्स क्या है?

उत्तर: रेत या सिलिका के चूर्ण को रंग और गोंद के साथ मिलाकर, फिर पकाकर बनाई गई एक कृत्रिम सामग्री, जिसे बनाना कठिन था।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. मेसोपोटामियाई अभिलेखों में हड़प्पाई क्षेत्र को संभवतः किस नाम से जाना जाता था?

उत्तर: मेलुहा, जिसे नाविकों की भूमि कहा गया है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. 1924 में सिंधु घाटी सभ्यता की खोज की घोषणा किसने की?

उत्तर: जॉन मार्शल ने, जो भारत में पहले पेशेवर पुरातत्वविद थे।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. हड़प्पाई लिपि किस दिशा में लिखी जाती थी?

उत्तर: दाएँ से बाएँ।

प्रश्न 9 (1 अंक)

प्र. राखीगढ़ी कहाँ स्थित है और यह किसलिए महत्वपूर्ण है?

उत्तर: हरियाणा के हिसार ज़िले में; यह 550 हेक्टेयर में फैला सबसे बड़ा हड़प्पाई नगर है, जहाँ पुरातत्व-अनुवांशिक शोध भी हुआ।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. पुरा-वनस्पतिज्ञ और पुरा-प्राणिविज्ञानी क्या अध्ययन करते हैं?

उत्तर: पुरा-वनस्पतिज्ञ प्राचीन पौधों के अवशेष जैसे जले हुए अनाज व बीजों का अध्ययन करते हैं; पुरा-प्राणिविज्ञानी (जू-आर्कियोलॉजिस्ट) प्राचीन पशु-अस्थियों का अध्ययन करते हैं। दोनों मिलकर पुनर्निर्मित करते हैं कि लोग क्या खाते थे।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. कालीबंगन का जुता हुआ खेत हड़प्पाई कृषि के बारे में क्या बताता है?

उत्तर: यह एक आरंभिक हड़प्पाकालीन खेत है जिसमें समकोण पर दो दिशाओं में हल की रेखाएँ मिलती हैं, यानी एक साथ दो फ़सलें उगाई जाती थीं।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. मुहर और सीलबंदी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: मुहर वह वस्तु है जिसे गीली मिट्टी पर दबाया जाता था, जिस पर आमतौर पर लिपि की एक पंक्ति और एक पशु-आकृति होती थी। सीलबंदी वह छाप है जो मुहर दबाने से बनती थी, और यदि यह बिना टूटे पहुँचती थी तो यह प्रमाण था कि रस्सी से बँधी थैली के सामान से छेड़छाड़ नहीं हुई।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. बेकार सामग्री (waste) किसी शिल्प उत्पादन केंद्र का सबसे अच्छा संकेतक क्यों है?

उत्तर: कटे हुए शंख और पत्थर के टुकड़े वहीं छूट जाते हैं जहाँ काम हुआ था, और छोटे-छोटे टुकड़े तब भी बचे रहते हैं जब बड़े तैयार टुकड़ों का पुनः उपयोग या स्थानांतरण हो जाता है: इसलिए तैयार वस्तुओं की तुलना में बेकार सामग्री अधिक भरोसेमंद संकेतक है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. स्तरविन्यास क्या है, और मार्शल की विधि ने इससे मिलने वाली जानकारी को क्यों नष्ट किया?

उत्तर: स्तरविन्यास किसी स्थल की परतों का अध्ययन है, जहाँ सबसे निचली परतें सामान्यतः सबसे पुरानी होती हैं। मार्शल ने टीले में समान क्षैतिज इकाइयों में खुदाई की, परतों को नज़रअंदाज़ करते हुए, जिससे अलग-अलग सांस्कृतिक कालों की खोजें आपस में मिल गईं और उनका संदर्भ (context) हमेशा के लिए खो गया।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. ओमान के साथ हड़प्पाई व्यापार के दो प्रमाण दीजिए।

उत्तर: (1) ओमानी और हड़प्पाई दोनों ताँबों में निकल पाया जाता है। (2) मोटी काली मिट्टी की परत चढ़ा एक बड़ा हड़प्पाई मर्तबान, जो तरल को रिसने से रोकता था, ओमान के स्थलों पर मिलता है, शायद ताँबे के बदले दिया गया।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. दफ़न प्रथाओं में हड़प्पा और समकालीन मिस्र में क्या मुख्य अंतर था?

उत्तर: हड़प्पावासी कुल मिलाकर शवों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ नहीं दफ़नाते थे, जबकि समकालीन मिस्र में राजसी क़ब्रें भारी मात्रा में धन-संपत्ति से भरी होती थीं। हड़प्पा में कभी-कभार बर्तन, आभूषण या ताँबे के दर्पण ही मिलते हैं।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. हड़प्पाई बाट प्रणाली का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर: बाट सामान्यतः चर्ट पत्थर के, अधिकांशतः घनाकार और बिना निशान के होते थे। निचली इकाइयाँ द्विआधारी (1,2,4,8,16,32) थीं, संभवतः आभूषण-मनके तौलने के लिए, और ऊँची इकाइयाँ दशमलव प्रणाली (160,200,320,640) का पालन करती थीं। धातु के तराज़ू के पलड़े भी मिले हैं।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. हड़प्पाई लिपि के बारे में कोई दो तथ्य लिखिए जो बताते हैं कि यह वर्णमाला-आधारित नहीं है।

उत्तर: (1) इसमें 375 से 400 चिह्न हैं, जो एक ध्वनि के लिए एक चिह्न के हिसाब से बहुत अधिक है। (2) सबसे लंबे अभिलेख में भी केवल लगभग 26 चिह्न हैं, यानी अभिलेख बहुत छोटे हैं।

प्रश्न 10 (2 अंक)

प्र. ‘कनिंघम का भ्रम’ से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: कनिंघम की रुचि आरंभिक ऐतिहासिक काल (लगभग 600 ई.पू. से 400 ई.) में थी और वे मानते थे भारतीय इतिहास गंगा घाटी के नगरों से आरंभ होता है। इस कारण, हड़प्पाई मुहर दिए जाने पर भी वे उसे किसी काल या स्थान में ठीक से नहीं रख सके, क्योंकि हड़प्पा उनके ढाँचे में फ़िट ही नहीं बैठता था।

प्रश्न 11 (2 अंक)

प्र. राखीगढ़ी के पुरातत्व-अनुवांशिक शोध का एक निष्कर्ष लिखिए।

उत्तर: हड़प्पावासी स्थानीय (indigenous) थे, जिनकी अनुवांशिक जड़ें 10,000 ई.पू. तक जाती हैं, और अधिकांश दक्षिण एशियाई जनसंख्या इन्हीं से वंशागत प्रतीत होती है: यह तथाकथित आर्यों के बड़े पैमाने के आगमन के सिद्धांत को खारिज करता है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. मोहनजोदड़ो की जल-निकास व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

उत्तर: हर घर की एक दीवार सड़क पर होना ज़रूरी था ताकि उसका गंदा पानी सड़क की नाली तक पहुँच सके। घर की नाली पहले हौदी (मलकुंड) में गिरती थी, ताकि ठोस मैल वहीं बैठ जाए और केवल गंदा पानी आगे सड़क की नाली में जाए। मुख्य नाले गारे में जमाई गई ईंटों से बने थे और ऐसी ढीली ईंटों से ढके होते थे जिन्हें सफ़ाई के लिए हटाया जा सकता था; कहीं-कहीं ढकने के लिए चूना पत्थर की पट्टिका का प्रयोग होता था। यह सुविधा केवल बड़े नगरों तक सीमित नहीं थी: लोथल में घर कच्ची ईंट के थे, फिर भी नालियाँ पक्की ईंट की थीं। यह पूरी व्यवस्था दिखाती है कि स्वच्छता योजना का हिस्सा थी, बाद में नहीं जोड़ी गई।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. हड़प्पाई मनका-निर्माण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए (कार्नीलियन का उदाहरण लेकर)।

उत्तर: मनका-निर्माण तीन चरणों में होता था: (1) खंडन: गुठलियों को मोटा आकार देने के लिए तराशना, (2) परतकरण: महीन परतें उतारकर अंतिम आकार देना, (3) अंतिम रूप: घिसाई, पालिश और छेद करना। कार्नीलियन के लिए, प्रयोगों से पता चला कि पीलापन लिए कच्चे माल को विभिन्न चरणों में तपाने से लाल रंग प्राप्त होता था। छेद करने के विशेष उपकरण चन्हुदड़ो, लोथल और धौलावीरा से मिले हैं, और तैयार मनके इन छोटे केंद्रों से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े नगरों तक भेजे जाते थे।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. हड़प्पाई समाज में शासकों को लेकर विद्वानों के तीन मत क्या हैं?

उत्तर: (1) कुछ पुरातत्वविद मानते हैं कि कोई शासक नहीं था और सभी की सामाजिक स्थिति समान थी। (2) कुछ अन्य मानते हैं कि एक नहीं बल्कि कई शासक थे: मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि के अपने-अपने राजा। (3) कुछ यह तर्क देते हैं कि यह एक ही राज्य था, जैसा कि पुरावस्तुओं में समानताओं, नियोजित बस्तियों के साक्ष्यों, ईंटों के आकार में निश्चित अनुपात, तथा बस्तियों के कच्चे-माल के स्रोतों के समीप बसाए जाने से स्पष्ट है। NCERT यह भी बताती है कि हड़प्पावासी शायद किसी प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करते थे।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. पुरातत्वविदों के सामने आने वाली तीन समस्याओं का वर्णन कीजिए जो अतीत के पुनर्निर्माण को कठिन बनाती हैं।

उत्तर: (1) अधिकांश वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं: कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी और सरकंडे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सड़ जाते हैं, केवल पत्थर, जली मिट्टी और धातु बचते हैं। (2) खोजें संयोगवश होती हैं: लोग टूटी वस्तुएँ फेंकते थे और बाक़ी का पुनः उपयोग करते थे, इसलिए अक्षुण्ण मिली बहुमूल्य वस्तु का अर्थ है कि वह खो गई या छिपाई गई थी, विशिष्ट नहीं। (3) प्रयोजन एक अनुमान मात्र है: सामग्री के अनुसार वर्गीकरण आसान है, प्रयोजन के अनुसार नहीं; पुरातत्वविद वर्तमान की समान वस्तुओं से तुलना और संदर्भ के आधार पर अनुमान लगाते हैं।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. मेसोपोटामिया के साथ हड़प्पाई व्यापार-संबंधों के प्रमाण दीजिए।

उत्तर: तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. के मेसोपोटामियाई अभिलेख तीन व्यापारिक साझेदारों का नाम लेते हैं: मगन (संभवतः ओमान, जहाँ से ताँबा आता था और निकल के अंश मेल खाते हैं), दिलमुन (संभवतः बहरीन, जहाँ गोल ‘फ़ारस की खाड़ी’ मुहरों पर हड़प्पाई आकृतियाँ मिलती हैं और बाट हड़प्पाई मानक का अनुसरण करते हैं), और मेलुहा (संभवतः हड़प्पाई क्षेत्र, जिसे नाविकों की भूमि कहा गया और जहाँ से कार्नीलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना व लकड़ी के उत्पाद आते थे)। इसके अलावा एक मेसोपोटामियाई बेलनाकार मुहर पर कूबड़ वाले बैल की आकृति सिंधु-क्षेत्र से प्रभावित लगती है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. आद्य-शिव मुहर के उदाहरण से बताइए कि हड़प्पाई धर्म का पुनर्निर्माण इतना कठिन क्यों है।

उत्तर: आद्य-शिव मुहर पर पालथी मारकर ‘योगिक’ मुद्रा में बैठी एक आकृति है, कभी-कभी पशुओं से घिरी हुई, जिसे शिव के प्रारंभिक रूप के रूप में पढ़ा गया, क्योंकि परवर्ती परंपरा में रुद्र (ऋग्वैदिक देवता) को शिव का ही एक नाम माना जाता है। पर यह विधि (ज्ञात से अज्ञात, वर्तमान से पीछे की ओर) यहाँ टूट जाती है: ऋग्वेदिक रुद्र न तो पशुपति (पशुओं के स्वामी) हैं और न ही योगी, इसलिए मुहर का विवरण इस पहचान से मेल नहीं खाता। यह आकृति इसके बजाय कोई शमन हो सकती है। यह उदाहरण दिखाता है कि बिना लिपि पढ़े धार्मिक व्याख्याएँ अनुमान मात्र रहती हैं, और परवर्ती परंपराओं को बहुत पीछे तक खींचना ग़लत निष्कर्ष दे सकता है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. मोहनजोदड़ो को एक नियोजित नगरीय केंद्र के रूप में विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: मोहनजोदड़ो दो भागों में बँटा था: दुर्ग (पश्चिम, छोटा, ऊँचा, कच्ची ईंट के चबूतरों पर बना, परकोटे से घिरा) और निचला नगर (पूर्व, बड़ा, नीचा, ग्रिड में बना, स्वयं भी परकोटे से घिरा)। निर्माण-क्रम स्पष्ट था: पहले चबूतरे बनाए गए, जिससे निर्माण-स्थान तय हुआ; फिर नालियों सहित ग्रिड सड़कें समकोण पर बिछाई गईं; अंत में इन्हीं सड़कों के किनारे घर बनाए गए, हर घर की एक दीवार सड़क पर होना ज़रूरी था। ईंटें (धूप में सुखाई या पकाई गई) सभी जगह 4:2:1 के निश्चित अनुपात की थीं। दुर्ग पर मालगोदाम (निचला ईंट-भाग बचा) और विशाल स्नानागार (उत्तर-दक्षिण सीढ़ियाँ, बरामदा, जिप्सम गारे से जलरोधक, अलग से जल-निकास) जैसी सार्वजनिक इमारतें थीं, साथ ही आठ स्नानघरों वाली एक विशेष इमारत भी। निचले नगर के घरों में केंद्रीय आँगन, बिना बाहरी खिड़की की दीवारें (निजता), ईंट-फ़र्श स्नानघर और सीढ़ियाँ (छत/ऊपरी मंज़िल के लिए) होती थीं, और लगभग 700 कुएँ भी थे। जल-निकास व्यवस्था घर की नाली → हौदी → सड़क की नाली के क्रम में काम करती थी। ध्यान रहे यह ढाँचा नियम नहीं, सामान्य पैटर्न है: धौलावीरा और लोथल इससे भिन्न थे।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. हड़प्पा सभ्यता के अंत के कारणों और उसकी प्रक्रिया की समीक्षा कीजिए।

उत्तर: लगभग 1800 ई.पू. तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थल त्याग दिए गए, जबकि गुजरात, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नई बस्तियों में आबादी बढ़ी। जहाँ 1900 ई.पू. के बाद भी बस्ती बनी रही, वहाँ भौतिक संस्कृति पूरी तरह बदल गई: बाट, मुहरें, विशिष्ट मनके, लिपि, दूर का व्यापार, शिल्प-विशेषज्ञता और बड़ी सार्वजनिक संरचनाएँ सब लुप्त हो गईं, और उनकी जगह ग्रामीण जीवनशैली (‘उत्तर हड़प्पा’ या ‘अनुवर्ती संस्कृतियाँ’) ने ले ली। बताए गए कारणों में जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़, नदियों का सूखना या मार्ग बदलना, और भूमि का अत्यधिक उपयोग शामिल हैं: इनमें से कुछ कारण कुछ बस्तियों के लिए सही हो सकते हैं, पर कोई भी अकेला कारण पूरी सभ्यता के पतन की व्याख्या नहीं करता। प्रमाण इसके बजाय संकेत देते हैं कि एक सुदृढ़ एकीकरण तत्व, संभवतः हड़प्पाई राज्य, का अंत हो गया था: मुहरों, लिपि, विशिष्ट मनकों व मृदभाण्डों का एक साथ लोप, मानकीकृत बाट प्रणाली की जगह स्थानीय बाटों का प्रयोग, और शहरों का पतन व परित्याग: इन सभी परिवर्तनों से इस तर्क को बल मिलता है। उपमहाद्वीप को नए शहरों के विकास के लिए, एक पूरी तरह अलग क्षेत्र में, एक सहस्राब्दि से भी अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. कनिंघम से लेकर राखीगढ़ी के पुरातत्व-अनुवांशिक शोध तक हड़प्पा सभ्यता की खोज के क्रम का वर्णन कीजिए।

उत्तर: अलेक्ज़ैंडर कनिंघम (भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर जनरल) की विधि पाठ-केंद्रित थी: चीनी बौद्ध यात्रियों के वृत्तांतों से बस्तियों का पता लगाना: और उनकी रुचि आरंभिक ऐतिहासिक काल (600 ई.पू.-400 ई.) में थी, इसलिए हड़प्पाई मुहर मिलने पर भी वे इसे किसी ढाँचे में फ़िट नहीं कर सके (‘कनिंघम का भ्रम’)। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में दया राम साहनी, फिर राखालदास बनर्जी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में वैसी ही मुहरें खोजीं, जिससे पता चला कि दोनों स्थल एक ही संस्कृति के थे। जॉन मार्शल ने 1924 में सभ्यता की खोज की घोषणा की: यूनान-क्रीट के अनुभव वाले पहले पेशेवर पुरातत्वविद, पर उनकी क्षैतिज-इकाई खुदाई ने परतों का संदर्भ नष्ट कर दिया। 1944 में डायरेक्टर जनरल बने आर.ई.एम. व्हीलर ने स्तरविन्यास को मानक बनाकर यह त्रुटि सुधारी। विभाजन के बाद, प्रमुख स्थल पाकिस्तान चले जाने से भारतीय पुरातत्वविदों ने कच्छ, पंजाब और हरियाणा का सर्वेक्षण किया, जिससे कालीबंगन, लोथल, राखीगढ़ी और धौलावीरा खोजे व खोदे गए। 1980 के दशक से अंतरराष्ट्रीय संयुक्त दलों ने आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया, और अंततः राखीगढ़ी में वसंत शिंदे के नेतृत्व में पुरातत्व-अनुवांशिक शोध (2013 से) आरंभ हुआ, जिसने हड़प्पावासियों की स्थानीय उत्पत्ति सिद्ध की।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. पुरातत्वविद हड़प्पाई समाज में सामाजिक-आर्थिक भेदों का पता कैसे लगाते हैं, और उन्हें कौन-से भेद मिलते हैं?

उत्तर: चूँकि लिपि अपठित है, लिखित अभिलेख नहीं मिलते, इसलिए पुरातत्वविद दो अप्रत्यक्ष तरीके अपनाते हैं। पहला, दफ़न प्रथाओं का अध्ययन: शव गड्ढों में रखे जाते थे, कभी ईंटों से जड़े हुए; कुछ क़ब्रों में मिट्टी के बर्तन व आभूषण मिलते हैं (परलोक में विश्वास का संकेत); आभूषण स्त्री-पुरुष दोनों के साथ मिलते हैं (जैसे हड़प्पा के कब्रिस्तान के पुरुष कंकाल के पास शंख के छल्ले व मनके); पर कुल मिलाकर हड़प्पावासी शवों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ नहीं दफ़नाते थे, समकालीन मिस्र के विपरीत। दूसरा, वस्तुओं को उपयोगी (रोज़मर्रा, साधारण सामग्री से बनी, सभी बस्तियों में फैली) और बहुमूल्य (दुर्लभ, महँगी या जटिल तकनीक से बनी, जैसे फ़यॉन्स के बर्तन व सोने के आभूषण) में बाँटना; यह विभाजन हमेशा स्पष्ट नहीं होता (जैसे कुछ फ़यॉन्स की तकली-चरखियाँ), पर वितरण का पैटर्न स्पष्ट है: बहुमूल्य वस्तुएँ बड़ी बस्तियों में केंद्रित हैं (फ़यॉन्स के लघु पात्र मोहनजोदड़ो-हड़प्पा में, कालीबंगन में नहीं) और सोना केवल संचयों से मिलता है। इस प्रकार सीमित पर वास्तविक सामाजिक भेद के प्रमाण मिलते हैं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
मोहनजोदड़ो में विशाल स्नानागार दुर्ग पर स्थित एक आयताकार कुंड है, जिसमें उत्तर और दक्षिण दोनों ओर से उतरने की सीढ़ियाँ हैं, चारों ओर एक बरामदा और तीन ओर कमरे बने हैं। कुंड को जलरोधक बनाने के लिए किनारे खड़ी ईंटें और जिप्सम गारा प्रयोग किया गया, और पानी एक बड़ी नाली से बाहर निकाला जाता था। उत्तर की ओर एक गली पार करते ही एक छोटी इमारत थी जिसमें आठ स्नानघर थे, एक गलियारे के दोनों ओर चार-चार। इस विशेष संरचना और इसकी असाधारण स्थिति (दुर्ग की अन्य विशिष्ट इमारतों के बीच) के आधार पर विद्वान मानते हैं कि इसका प्रयोग किसी विशेष धार्मिक स्नान के लिए होता था, परंतु इसका कोई निश्चित प्रमाण नहीं है।

(क) 1 अंक विशाल स्नानागार में सीढ़ियाँ किन दो दिशाओं में बनी थीं?
उत्तर: उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में।

(ख) 2 अंक कुंड को जलरोधक कैसे बनाया गया था?
उत्तर: कुंड के किनारे खड़ी ईंटें लगाई गई थीं और जिप्सम के गारे का प्रयोग किया गया था, जिससे पानी रिसकर बर्बाद न हो और पानी एक बड़ी नाली से बाहर निकाला जा सके।

(ग) 3 अंक विद्वान विशाल स्नानागार को धार्मिक संरचना क्यों मानते हैं, और यह मत कितना निश्चित है?
उत्तर: यह संरचना अद्वितीय है और दुर्ग की अन्य असाधारण इमारतों के बीच स्थित है, तथा पास ही आठ स्नानघरों वाली एक विशेष इमारत भी है: इन्हीं आधारों पर विद्वान इसे किसी विशेष धार्मिक स्नान के लिए मानते हैं। परंतु यह केवल एक अनुमान है, कोई लिखित या निश्चित पुरातात्विक प्रमाण नहीं है कि इसका प्रयोग वास्तव में धार्मिक अनुष्ठान के लिए ही होता था: यह अध्याय के ‘अनुत्तरित प्रश्नों’ में से एक है।

केस स्टडी
हड़प्पा सभ्यता की मुहरें आमतौर पर सेलखड़ी से बनाई जाती थीं और उन पर लिपि की एक पंक्ति के साथ एक पशु की आकृति उत्कीर्ण होती थी। इन मुहरों को रस्सी से बँधी थैलियों की गाँठ पर लगी गीली मिट्टी पर दबाया जाता था; यदि सीलबंदी बिना टूटे गंतव्य तक पहुँचती, तो यह प्रमाण था कि सामान से छेड़छाड़ नहीं हुई। मुहरों पर मिलने वाली लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है: इसमें 375 से 400 चिह्न हैं, जो किसी वर्णमाला के लिए बहुत अधिक है, और यह दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। बहरीन (दिलमुन) में मिली गोल ‘फ़ारस की खाड़ी’ मुहरों पर कभी-कभी हड़प्पाई आकृतियाँ मिलती हैं, और वहाँ के स्थानीय बाट हड़प्पाई मानक का अनुसरण करते थे: ये दूर-दराज़ के संपर्क के प्रमाण हैं।

(क) 1 अंक हड़प्पाई मुहरें आमतौर पर किस पत्थर से बनाई जाती थीं?
उत्तर: सेलखड़ी से।

(ख) 2 अंक गीली मिट्टी पर मुहर दबाकर बनाई गई सीलबंदी का क्या उद्देश्य था?
उत्तर: यह प्रमाणित करने के लिए कि रस्सी से बँधी थैली के भीतर के सामान से रास्ते में कोई छेड़छाड़ नहीं हुई: यदि सीलबंदी बिना टूटे पहुँचती, तो सामान सुरक्षित माना जाता था।

(ग) 3 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि दिलमुन में मिली मुहरें हड़प्पा सभ्यता के बारे में क्या बताती हैं, और लिपि से जुड़ी दो सीमाएँ भी लिखिए।
उत्तर: दिलमुन (बहरीन) में मिली गोल ‘फ़ारस की खाड़ी’ मुहरों पर हड़प्पाई आकृतियाँ दिखाती हैं कि हड़प्पाई व्यापारिक संपर्क सुदूर फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र तक फैले थे। लिपि से जुड़ी दो सीमाएँ: (1) यह आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए मुहरों पर लिखे नाम/पदवी का अर्थ अनुमान मात्र है; (2) इसमें 375-400 चिह्न होने से यह वर्णमाला-आधारित नहीं लगती, जिससे इसकी संरचना समझना और कठिन हो जाता है।