कक्षा 12 इतिहास अध्याय 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I, विषय 1 “ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ” के अभ्यास के सभी बारह प्रश्न, ठीक उसी क्रम और उन्हीं शब्दों में जैसे हिंदी संस्करण में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा मॉडल उत्तर। पहले पाँच प्रश्न किताब के शीर्षक उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में) के नीचे आते हैं, अगले चार निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में) के नीचे, फिर एक मानचित्र-कार्य और दो परियोजना-कार्य (कोई एक)। इनके बाद अध्याय के भीतर चित्रों और स्रोतों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए सत्रह प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। पहले खुद उत्तर लिखिए, फिर इससे मिलाइए।

1 हड़प्पा सभ्यता के शहरों में उपलब्ध भोजन सामग्री

प्रश्न 1

प्र. हड़प्पा सभ्यता के शहरों में लोगों को उपलब्ध भोजन सामग्री की सूची बनाइए। इन वस्तुओं को उपलब्ध कराने वाले समूहों की पहचान कीजिए।

उत्तर: हड़प्पाई नगरों के निवासियों को अनाज, दालें, माँस, मछली और दूध जैसी कई प्रकार की भोजन सामग्री उपलब्ध थी। गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना और तिल मुख्य अनाज-दालें थीं; बाजरे के दाने गुजरात के स्थलों से मिले हैं और चावल के प्रमाण दुर्लभ हैं। गाय-बैल, भेड़, बकरी, भैंस और सूअर पालतू पशु थे, जिनका माँस और दूध प्रयोग होता होगा। इसके अतिरिक्त जंगली सूअर, हिरण, घड़ियाल, मछली और पक्षियों की अस्थियाँ भी मिली हैं, यानी शिकार किया गया माँस भी खाया जाता था।

ये वस्तुएँ मुख्यतः तीन समूहों से आती थीं। पहला, किसान, जो अनाज और दालें उगाते और पशुपालन करते थे, और नगरों को अधिशेष भेजते थे। दूसरा, पशुपालक, जो पशुओं को पालते थे और उनसे माँस-दूध प्राप्त करते थे। तीसरा, संभवतः शिकारी-संग्राहक समुदाय, जो जंगली पशु, मछली और पक्षी पकड़कर नगरों को आपूर्ति करते होंगे, यद्यपि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि हड़प्पावासी स्वयं शिकार करते थे या इन समुदायों से माँस प्राप्त करते थे।

2 सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं का पता लगाना

प्रश्न 2

प्र. पुरातत्वविद हड़प्पाई समाज में सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं का पता किस प्रकार लगाते हैं? वे कौन सी भिन्नताओं पर ध्यान देते हैं?

उत्तर: चूँकि हड़प्पाई लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी, इसलिए कोई लिखित अभिलेख अमीर-ग़रीब का भेद नहीं बताता। पुरातत्वविद इसके बजाय दो अप्रत्यक्ष तरीके अपनाते हैं। पहला, दफ़न प्रथाओं का अध्ययन: शव गड्ढों में रखे जाते थे, कभी ईंटों से जड़े हुए; कुछ क़ब्रों में मिट्टी के बर्तन और आभूषण मिलते हैं। आभूषण स्त्री और पुरुष दोनों के शवाधानों से मिले हैं, जैसे हड़प्पा के कब्रिस्तान में एक पुरुष कंकाल की खोपड़ी के पास शंख के तीन छल्ले, जैस्पर के मनके तथा सैकड़ों सूक्ष्म मनकों से बना एक आभूषण मिला था। पर कुल मिलाकर हड़प्पावासी शवों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ नहीं दफ़नाते थे, समकालीन मिस्र के विपरीत, जहाँ राजसी क़ब्रें धन-संपत्ति से भरी होती थीं।

दूसरा तरीका है वस्तुओं को उपयोगी (रोज़मर्रा प्रयोग, साधारण सामग्री से बनी, जैसे चक्की-पत्थर, बर्तन, सूइयाँ) और बहुमूल्य (दुर्लभ या महँगी सामग्री, या जटिल तकनीक से बनी, जैसे फ़यॉन्स के बर्तन और सोने के आभूषण) में बाँटना। यह विभाजन हमेशा स्पष्ट नहीं होता, पर वितरण का पैटर्न स्पष्ट है: बहुमूल्य वस्तुएँ बड़ी बस्तियों में केंद्रित मिलती हैं: फ़यॉन्स के लघु पात्र मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिलते हैं पर छोटे कालीबंगन में नहीं, और सोने का हर आभूषण किसी न किसी संचय से ही मिला है।

3 जल-निकास प्रणाली और नगर-योजना

प्रश्न 3

प्र. क्या आप इस तथ्य से सहमत हैं कि हड़प्पा सभ्यता के शहरों की जल निकास प्रणाली, नगर-योजना की ओर संकेत करती है? अपने उत्तर के कारण बताइए।

उत्तर: हाँ, यह पूरी तरह सहमति योग्य है। मोहनजोदड़ो में निर्माण का क्रम स्वयं इसका प्रमाण है: पहले चबूतरे बनाए गए, जिससे तय हुआ कि निर्माण कहाँ होगा; फिर नालियों सहित सड़कें ग्रिड में, समकोण पर एक-दूसरे को काटती हुई बिछाई गईं; और अंत में इन्हीं सड़कों के किनारे घर बनाए गए: हर घर की एक दीवार सड़क पर होना ज़रूरी था ताकि उसका गंदा पानी सड़क की नाली तक पहुँच सके। यह क्रम दिखाता है कि योजना निर्माण से पहले बनी थी, बाद में जोड़ी नहीं गई।

घर की नाली पहले हौदी (मलकुंड) में गिरती थी, ताकि ठोस मैल वहीं बैठ जाए और केवल गंदा पानी सड़क की नाली में जाए। मुख्य नाले गारे में जमाई गई ईंटों से बने थे और ऐसी ढीली ईंटों से ढके होते थे जिन्हें सफ़ाई के लिए हटाया जा सकता था; कहीं-कहीं ढकने के लिए चूना पत्थर की पट्टिका का प्रयोग होता था। यह सुविधा केवल बड़े नगरों तक सीमित नहीं थी: लोथल में घर कच्ची ईंट के थे, फिर भी नालियाँ पक्की ईंट की थीं, यानी यह किसी एक नगर की विशेष सुविधा नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में अपनाया गया मानक था। इतनी सुव्यवस्थित, केंद्रीय रूप से नियोजित जल-निकास व्यवस्था बिना पूर्व-नियोजन के संभव नहीं थी, इसलिए यह निश्चित रूप से नगर-योजना का प्रमाण है।

4 मनके बनाने के लिए प्रयुक्त पदार्थ और प्रक्रिया

प्रश्न 4

प्र. हड़प्पा सभ्यता में मनके बनाने के लिए प्रयुक्त पदार्थों की सूची बनाइए। कोई भी एक प्रकार का मनका बनाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्तर: मनके कार्नीलियन (लाल), जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज़ और सेलखड़ी जैसे पत्थरों से; ताँबा, काँसा और सोना जैसी धातुओं से; तथा शंख, फ़यॉन्स और टेराकोटा से बनाए जाते थे। ये चक्रिका, बेलनाकार, गोल, पीपे के आकार और खंडित रूपों में मिलते हैं, कुछ में दो या अधिक पत्थर जोड़कर सीमेंट किए गए, कुछ पर सोने की टोपियाँ चढ़ी हैं, और इन्हें उकेरकर, रंगकर या नक़्क़ाशी करके सजाया जाता था।

कार्नीलियन का मनका बनाने की प्रक्रिया तीन चरणों में होती थी: पहला खंडन: पत्थर की गुठलियों को मोटा आकार देने के लिए तराशना; दूसरा परतकरण: महीन परतें उतारकर अंतिम आकार देना; और तीसरा अंतिम रूप देना: घिसाई, पालिश और छेद करना। कार्नीलियन के लिए किए गए प्रयोगों से पता चला कि पीलापन लिए हुए कच्चे माल को विभिन्न चरणों में तपाने (गरम करने) से इसका रंग लाल हो जाता था। छेद करने के विशेष उपकरण चन्हुदड़ो, लोथल और धौलावीरा से मिले हैं, और तैयार मनके इन छोटे शिल्प-केंद्रों से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े नगरों तक भेजे जाते थे।

5 एक हड़प्पाई शवाधान का वर्णन

प्रश्न 5

प्र. चित्र 1 को देखिए और उसका वर्णन कीजिए। शव किस प्रकार रखा गया है? उसके समीप कौन सी वस्तुएँ रखी गई हैं? क्या शरीर पर कोई पुरावस्तुएँ हैं? क्या इनसे कंकाल के लिंग का पता चलता है?

उत्तर: चित्र में एक हड़प्पाई शवाधान दिखाया गया है। कंकाल एक लंबे आयताकार गड्ढे में पीठ के बल, पूरी लंबाई में सीधा लिटाया गया है। पुस्तक के अनुसार हड़प्पा स्थलों पर मृतकों को सामान्यतः गर्तों में दफ़नाया जाता था; कभी-कभी शवाधान गर्त की बनावट में अंतर होता था, जैसे कुछ में खोदे गए स्थान को ईंटों से चिना गया था, पर यह निश्चित नहीं कि ये भिन्नताएँ सामाजिक भिन्नता का संकेत हैं।

सिर की ओर, गड्ढे के एक सिरे पर मिट्टी के बर्तनों का एक समूह रखा है: मर्तबान, कटोरे और स्टैंड वाली तश्तरियाँ। पुस्तक बताती है कि कुछ कब्रों में मृदभाण्ड और आभूषण मिले हैं, जो शायद इस मान्यता का संकेत हैं कि इनका प्रयोग मृत्योपरांत किया जा सकता था। चित्र में शरीर पर कोई आभूषण स्पष्ट दिखाई नहीं देता; अन्य शवाधानों में आभूषण (जैसे शंख की चूड़ियाँ, मनके) या ताँबे के दर्पण भी शव के साथ मिले हैं। इस तरह की पुरावस्तुओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति और उनकी प्रकृति (साधारण या बहुमूल्य) से पुरातत्वविद यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि शव किसी सामाजिक रूप से भिन्न व्यक्ति का था या नहीं, यद्यपि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

कंकाल के लिंग का पता मुख्यतः अस्थि-संरचना (कूल्हे की हड्डी की बनावट, खोपड़ी का आकार) के वैज्ञानिक विश्लेषण से चलता है, न कि साथ मिली वस्तुओं से: क्योंकि आभूषण जैसी वस्तुएँ स्त्री और पुरुष दोनों के शवाधानों में मिली हैं (जैसे हड़प्पा के कब्रिस्तान के एक पुरुष कंकाल के पास शंख के छल्ले और मनके मिले)। इसलिए साथ मिली वस्तुओं के आधार पर लिंग का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

6 मोहनजोदड़ो की विशिष्टताएँ

प्रश्न 6

प्र. मोहनजोदड़ो की कुछ विशिष्टताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर: मोहनजोदड़ो हड़प्पा से बेहतर सुरक्षित रहा, इसलिए यह अधिक जाना जाता है; हड़प्पा तो ईंट-चोरों द्वारा नष्ट कर दिया गया था: 1875 में कनिंघम ने लिखा कि इतनी ईंटें ले जाई गईं कि उनसे लाहौर-मुल्तान रेलवे लाइन का लगभग 100 मील भाग बिछाया जा सका। मोहनजोदड़ो दो भागों में बँटा था: पश्चिम में दुर्ग: छोटा, ऊँचा, कच्ची ईंट के चबूतरों पर बना और परकोटे से घिरा; और पूर्व में निचला नगर: बड़ा, नीचा, ग्रिड में बनी सड़कों वाला, स्वयं भी परकोटे से घिरा और आंशिक रूप से चबूतरों पर बना।

निर्माण-क्रम स्पष्ट योजना दिखाता है: पहले चबूतरे, फिर नालियों सहित ग्रिड सड़कें, फिर घर। ईंटें: धूप में सुखाई गई हों या पकाई गई: सभी जगह 4:2:1 के निश्चित अनुपात की थीं। अकेले नींव बनाने में लगभग चालीस लाख मानव-दिवस लगे होंगे। जल-निकास व्यवस्था में हर घर की नाली पहले हौदी में गिरती थी, फिर सड़क की नाली में। निचले नगर के घरों में केंद्रीय आँगन, बिना बाहरी खिड़की की दीवारें (निजता का संकेत), ईंट-फ़र्श स्नानघर और सीढ़ियाँ (छत या ऊपरी मंज़िल के लिए) होती थीं, और लगभग 700 कुएँ थे। दुर्ग पर एक मालगोदाम (जिसका निचला ईंट-भाग बचा है) और विशाल स्नानागार जैसी सार्वजनिक इमारतें थीं: विशाल स्नानागार में उत्तर-दक्षिण दोनों ओर सीढ़ियाँ, चारों ओर बरामदा, और जिप्सम गारे से जलरोधक बनाया गया कुंड था; निकट ही आठ स्नानघरों वाली एक विशेष इमारत भी मिली है, जिसे विद्वान किसी विशेष धार्मिक स्नान से जोड़ते हैं, यद्यपि यह निश्चित नहीं है। ध्यान रहे यह “दुर्ग-निचला नगर” ढाँचा हर हड़प्पाई नगर का नियम नहीं था: धौलावीरा और लोथल में यह अलग था।

7 शिल्प उत्पादन के लिए कच्चा माल

प्रश्न 7

प्र. हड़प्पा सभ्यता में शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की सूची बनाइए तथा चर्चा कीजिए कि ये किस प्रकार प्राप्त किए जाते होंगे।

उत्तर: हड़प्पाई शिल्पकार मनका-निर्माण के लिए कार्नीलियन, जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज़ और सेलखड़ी जैसे पत्थर, ताँबा-काँसा-सोना जैसी धातुएँ, तथा शंख, फ़यॉन्स और टेराकोटा प्रयोग करते थे। शंख की चूड़ियों और जड़ाई के काम के लिए पूरे शंख चाहिए होते थे, मुहरों के लिए सेलखड़ी और बाटों के लिए चर्ट पत्थर। मिट्टी स्थानीय रूप से उपलब्ध थी, पर पत्थर, लकड़ी और धातु स्थानीय नहीं थे, क्योंकि हड़प्पावासी जलोढ़ मैदान में रहते थे।

यह सामग्री दो तरीकों से प्राप्त की जाती थी। पहला, सामग्री के स्रोत पर ही बस जाना, जैसे नागेश्वर और बालाकोट (शंख के लिए, दोनों तटीय स्थल), शोर्तुघई अफ़ग़ानिस्तान में (लाजवर्द मणि के सर्वोत्तम स्रोत के निकट), और लोथल (भड़ौच के कार्नीलियन, दक्षिण राजस्थान व उत्तर गुजरात की सेलखड़ी, और राजस्थान की धातु के निकट)। दूसरा, अभियान भेजना, जैसे राजस्थान के खेतड़ी में ताँबे के लिए और दक्षिण भारत में सोने के लिए; इनसे स्थानीय समुदायों से संपर्क बना, जैसे खेतड़ी की गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति, जिसके गैर-हड़प्पाई मिट्टी के बर्तन थे पर ताँबे की वस्तुओं की असाधारण प्रचुरता थी: यह हड़प्पावासियों को ताँबा आपूर्ति करती रही होगी। ताँबा शायद ओमान से भी आता था, क्योंकि ओमानी और हड़प्पाई दोनों ताँबों में निकल पाया जाता है। सामान बैलगाड़ी से, और नदी-समुद्री मार्गों से भी ढोया जाता था। शिल्प-केंद्रों की पहचान वहाँ मिली बेकार सामग्री (कटे शंख, पत्थर के टुकड़े) से होती है, जो तैयार वस्तुओं से भी अधिक भरोसेमंद संकेतक है।

8 पुरातत्वविद अतीत का पुनर्निर्माण कैसे करते हैं

प्रश्न 8

प्र. चर्चा कीजिए कि पुरातत्वविद किस प्रकार अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं।

उत्तर: पुरातत्वविद उत्खनन में मिली वस्तुओं, उनकी परतों (स्तरविन्यास) और संदर्भ के आधार पर अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं। सबसे पहले, वे टीले की परतों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करते हैं: सबसे निचली परतें सामान्यतः सबसे पुरानी होती हैं, इसलिए किसी परत में मिली वस्तुओं को किसी सांस्कृतिक काल से जोड़ा जा सकता है। आर.ई.एम. व्हीलर ने इस स्तरविन्यास पद्धति को मानक बनाया, इससे पहले जॉन मार्शल ने टीले में समान क्षैतिज इकाइयों में खुदाई कर परतों को नज़रअंदाज़ किया था, जिससे कई खोजों का संदर्भ हमेशा के लिए खो गया।

इस प्रक्रिया में तीन बड़ी समस्याएँ आती हैं। पहली, अधिकांश वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं: कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी और सरकंडे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सड़ जाते हैं, केवल पत्थर, जली मिट्टी और धातु बचते हैं, इसलिए हड़प्पाई जीवन की पूरी श्रेणियाँ अनुपस्थित रह जाती हैं। दूसरी, खोजें संयोगवश होती हैं: लोग टूटी वस्तुएँ फेंकते थे और बाक़ी का पुनः उपयोग करते थे, इसलिए कोई बहुमूल्य वस्तु अक्षुण्ण मिलने का अर्थ है कि वह खो गई या छिपाई गई थी, विशिष्ट नहीं। तीसरी, प्रयोजन एक अनुमान है: सामग्री के अनुसार वर्गीकरण आसान है, प्रयोजन के अनुसार नहीं; पुरातत्वविद वर्तमान की समान वस्तुओं से तुलना और संदर्भ के आधार पर अनुमान लगाते हैं (जैसे मैके ने मसाले कूटने वाली चक्कियों को आज के ‘सालन पत्थर’ से तुलना करके पहचाना), पर यह एक तुलना है, प्रमाण नहीं।

धर्म का पुनर्निर्माण सबसे कठिन है: आरंभिक पुरातत्वविदों ने मान लिया कि कोई भी असाधारण वस्तु धार्मिक होगी, जैसे टेराकोटा स्त्री-मूर्तियों को ‘मातृदेवी’ और एक पत्थर की मूर्ति को ‘पुरोहित-राजा’ मान लिया गया, मेसोपोटामिया की समानताओं के आधार पर। आद्य-शिव मुहर का उदाहरण दिखाता है कि यह विधि कहाँ टूट जाती है: ऋग्वेदिक रुद्र न तो पशुपति हैं न योगी, इसलिए मुहर पर बैठी आकृति को शिव मानना विवरण से मेल नहीं खाता: यह किसी शमन की भी हो सकती है। इस प्रकार पुरातत्वविद प्रमाणों की सावधानीपूर्वक व्याख्या करते हैं, पर कई प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं।

9 हड़प्पाई समाज में शासकों के संभावित कार्य

प्रश्न 9

प्र. हड़प्पाई समाज में शासकों द्वारा किए जाने वाले संभावित कार्यों की चर्चा कीजिए।

उत्तर: पुरातत्व किसी शासक का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं देता: मोहनजोदड़ो की एक बड़ी इमारत को ‘प्रासाद’ नाम दिया गया, पर उसमें कुछ भी असाधारण नहीं मिला, और एक पत्थर की मूर्ति को केवल ‘पुरोहित-राजा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि आरंभिक पुरातत्वविद मेसोपोटामिया के इतिहास से परिचित थे। फिर भी, जो कुछ आयोजन और निर्णय होते दिखते हैं, उनसे शासकों के संभावित कार्यों का अनुमान लगाया जा सकता है।

सबसे स्पष्ट कार्य नगर-नियोजन और निर्माण का आयोजन होगा: ईंटें बनाने और विशाल दीवारों, चबूतरों तथा नालियों के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर श्रम संगठित करना, जो बिना किसी केंद्रीय प्राधिकार के संभव नहीं था। दूसरा, मानकीकरण बनाए रखना: मिट्टी के बर्तनों, मुहरों, बाटों और ईंटों में जम्मू से गुजरात तक मिलने वाली असाधारण एकरूपता किसी नियंत्रण-तंत्र की ओर संकेत करती है, विशेषकर जब ईंटें एक ही केंद्र पर नहीं बनती थीं। तीसरा, व्यापार और कच्चे माल की आपूर्ति का प्रबंधन: दूर के स्रोतों तक अभियान भेजना (जैसे खेतड़ी में ताँबे के लिए) और मेसोपोटामिया, ओमान व बहरीन तक फैले व्यापार-संबंधों को बनाए रखना संगठन माँगता था। चौथा, संभवतः धार्मिक अनुष्ठानों का निष्पादन, यद्यपि यह ज्ञात नहीं कि यह राजनीतिक सत्ता से जुड़ा था या नहीं।

पर यह भी उतना ही संभावित है कि हड़प्पावासियों ने किसी प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई हो, क्योंकि पुस्तक के अनुसार कुछ संरचनाएँ अपनी विशेषताओं सहित स्पष्टतः उपयोगितावादी उद्देश्यों के लिए बनाई गई प्रतीत होती हैं। विद्वानों में तीन मत हैं: कुछ मानते हैं कोई शासक नहीं था और सब समान थे; कुछ मानते हैं हर नगर के अपने अलग शासक थे; और कुछ मानते हैं यह एक ही राज्य था, जैसा पुरावस्तुओं की समानता और नियोजित बस्तियों से संकेत मिलता है।

10 मानचित्र-कार्य

प्रश्न 10

प्र. मानचित्र 1 पर उन स्थलों पर पेंसिल से घेरा बनाइए जहाँ से कृषि के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। उन स्थलों के आगे क्रॉस का निशान बनाइए जहाँ शिल्प उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं। उन स्थलों पर ‘क’ लिखिए जहाँ कच्चा माल मिलता था।

उत्तर: चिह्नित किए जाने वाले स्थल नीचे दिए गए हैं (○ = कृषि के लिए घेरा, × = शिल्प उत्पादन, ‘क’ = कच्चा माल)। इन स्थलों का सही मानचित्र इस अध्याय के नोट्स में दिया गया है।

स्थल (मानचित्र 1) क्षेत्र निशान अध्याय में साक्ष्य
कालीबंगन राजस्थान ○ जुता हुआ खेत (आरंभिक हड़प्पा स्तर)
बनावली हरियाणा ○ हल का टेराकोटा प्रतिरूप
चन्हुदड़ो सिंध × मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर और बाट बनाना
धौलावीरा कच्छ, गुजरात × छेद करने के विशेष उपकरण
मोहनजोदड़ो, हड़प्पा सिंध; पंजाब × बचे हुए टुकड़े बताते हैं कि बड़े नगरों में भी शिल्प-उत्पादन होता था
लोथल गुजरात ×, क छेद करने के विशेष उपकरण; कार्नीलियन (भड़ौच), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान, उत्तरी गुजरात) और धातु (राजस्थान) के स्रोतों के निकट
नागेश्वर, बालाकोट गुजरात का तट; बलूचिस्तान का तट (सोनमियानी खाड़ी, पाकिस्तान) ×, क जहाँ शंख उपलब्ध था, वहीं शंख की वस्तुएँ बनाई जाती थीं

शोर्तुघई (लाजवर्द मणि) और खेतड़ी (ताँबा) भी अध्याय में कच्चे माल के क्षेत्र हैं, पर ये मानचित्र 1 पर नहीं दिखाए गए हैं। पाँच प्रमुख नगरों (राखीगढ़ी, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा, गनवेरीवाला) को मानचित्र पर पहचानना भी उपयोगी है।

11-12 परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11

प्र. पता कीजिए कि क्या आपके शहर में कोई संग्रहालय है। उनमें से एक को देखने जाइए, और किन्हीं दस वस्तुओं पर एक रिपोर्ट लिखिए जिसमें बताइए कि वे कितनी पुरानी हैं, वे कहाँ मिली थीं, और आपके अनुसार उन्हें क्यों प्रदर्शित किया गया है।

दृष्टिकोण: यह एक क्षेत्र-कार्य आधारित प्रश्न है, इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। रिपोर्ट में हर वस्तु के लिए तीन बातें अवश्य लिखें: (1) अनुमानित काल/तिथि, संग्रहालय की सूचना-पट्टिका से; (2) मूल स्थल: कहाँ खुदाई में मिली; (3) आपका अपना तर्क कि यह वस्तु क्यों महत्वपूर्ण मानी गई और प्रदर्शन के लिए चुनी गई (उदाहरण के लिए दुर्लभता, तकनीकी कुशलता, या ऐतिहासिक महत्व के आधार पर)। यदि हड़प्पाई पुरावस्तुएँ मिलें, तो इस अध्याय में सीखी शब्दावली (मुहर, बाट, फ़यॉन्स आदि) का प्रयोग करके उनका वर्णन कीजिए।

प्रश्न 12

प्र. वर्तमान समय में निर्मित तथा प्रयुक्त पत्थर, धातु तथा मिट्टी की दस वस्तुओं के रेखाचित्र एकत्रित कीजिए। इनकी तुलना इस अध्याय में दिए गए हड़प्पा सभ्यता के चित्रों से कीजिए, तथा आपके द्वारा उनमें पाई गई समानताओं तथा भिन्नताओं पर चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण: दस आधुनिक वस्तुएँ चुनिए (जैसे चक्की-पत्थर, मिट्टी के बर्तन, ताँबे का बर्तन, मनके का आभूषण) और प्रत्येक की तुलना अध्याय के किसी समान चित्र से कीजिए। समानता का उदाहरण: मैके ने मोहनजोदड़ो की चक्कियों की तुलना आज की चक्की और ‘सालन पत्थर’ से की थी: यही विधि आप स्वयं दोहरा सकते हैं। भिन्नता का उदाहरण: आधुनिक वस्तुएँ अक्सर मशीन-निर्मित और मानकीकृत होती हैं, जबकि हड़प्पाई वस्तुएँ हाथ से, चरणबद्ध प्रक्रिया (जैसे मनके के लिए खंडन-परतकरण-अंतिम रूप) से बनाई जाती थीं। यह भी ध्यान रखें कि वर्तमान से तुलना केवल एक सादृश्य है, निश्चित प्रमाण नहीं: अपनी रिपोर्ट में इस सीमा का उल्लेख अवश्य करें।

13 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न

अध्याय के भीतर चित्रों और स्रोतों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए प्रश्न, उसी क्रम में जिसमें पुस्तक उन्हें छापती है।

पाठगत प्रश्न 1 · पृष्ठ 3 · चर्चा कीजिए

प्र. मानचित्र 1 तथा 2 की आपस में तुलना कीजिए तथा इनमें बस्तियों के वितरण में समानताओं तथा असमानताओं की सूची बनाइए।

उत्तर: समानताएँ: (1) जैसा अध्याय स्वयं बताता है, विकसित हड़प्पा संस्कृति कुछ ऐसे स्थानों पर पनपी जहाँ पहले आरंभिक हड़प्पा संस्कृतियाँ अस्तित्व में थीं। (2) दोनों मानचित्रों में बस्तियाँ सिंधु घाटी और उसके आस-पास के क्षेत्रों में हैं। मानचित्र 2 पर सिंध के आमरी-नाल और कोटदीजी समूह उसी क्षेत्र में हैं जहाँ मानचित्र 1 पर आमरी, कोटदीजी, मोहनजोदड़ो और चन्हुदड़ो हैं। (3) पूर्व में मानचित्र 2 का सिसवल समूह उसी क्षेत्र में है जहाँ मानचित्र 1 पर बनावली, कालीबंगन, मिताथल और राखीगढ़ी हैं।
असमानताएँ: (1) मानचित्र 2 पर आरंभिक हड़प्पाई बस्तियाँ कुछ गिने-चुने समूहों में हैं: बलूचिस्तान की पहाड़ियों में दंबसादात, सिंध में आमरी-नाल और कोटदीजी, तथा पूर्व में सिसवल। अध्याय के अनुसार ये बस्तियाँ सामान्यतः छोटी थीं और इनमें बड़ी संरचनाएँ लगभग न के बराबर थीं। (2) मानचित्र 1 का फैलाव कहीं अधिक है: गुजरात के तट तक (धौलावीरा, लोथल, रंगपुर, नागेश्वर), मकरान तट तक (सुत्कागेंडोर, बालाकोट) और उत्तर में मांडा तक। इसमें मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, राखीगढ़ी, धौलावीरा और गनवेरीवाला जैसे बड़े शहर भी हैं। (3) मानचित्र 1 पर केवल कुछ महत्वपूर्ण स्थल दिखाए गए हैं, जबकि मानचित्र 2 पूरे बसाव-क्षेत्र को दिखाता है, इसलिए दोनों के बिंदुओं की गिनती की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

पाठगत प्रश्न 2 · पृष्ठ 4 · चित्र 1.4

प्र. क्या आपको लगता है कि इन औज़ारों का प्रयोग फसल कटाई के लिए किया जाता होगा?

उत्तर: चित्र 1.4 में धातु के दो चपटे, चौड़े फलक और तीन लंबी, पतली छड़ें दिखाई देती हैं। चपटे फलकों में धार है; इन्हें लकड़ी के हत्थे में बिठाकर फसल के डंठल काटे जा सकते थे, इसलिए इनसे कटाई संभव है। पतली छड़ें कटाई के औज़ार कम, और शिल्प-कार्य की छेनी या बरमे जैसी अधिक लगती हैं। फिर भी अध्याय स्वयं यह प्रश्न खुला छोड़ता है: पुरातत्वविद अभी यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि हड़प्पा सभ्यता के लोग कटाई के लिए लकड़ी के हत्थों में बिठाए गए पत्थर के फलकों का प्रयोग करते थे या धातु के औज़ारों का। ताँबा भी बाहर से (जैसे राजस्थान के खेतड़ी या ओमान से) मँगाना पड़ता था, इसलिए संभव है कि सस्ते पत्थर के फलक भी प्रयोग में आते रहे हों।

पाठगत प्रश्न 3 · पृष्ठ 4 · चर्चा कीजिए

प्र. आहार संबंधी आदतों को जानने के लिए पुरातत्वविद किन साक्ष्यों का इस्तेमाल करते हैं।

उत्तर: (1) जले अनाज के दाने तथा बीज, जिनका अध्ययन पुरा-वनस्पतिज्ञ करते हैं: गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना तथा तिल; गुजरात के स्थलों से बाजरे के दाने; चावल के दाने अपेक्षाकृत कम। (2) जानवरों की हड्डियाँ, जिनका अध्ययन पुरा-प्राणिविज्ञानी अथवा जीव-पुरातत्वविद करते हैं: मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस तथा सूअर, जो पालतू थे; जंगली प्रजातियाँ जैसे वराह, हिरण तथा घड़ियाल; और मछली तथा पक्षियों की हड्डियाँ। (3) भोजन तैयार करने के साधन: अनाज पीसने के लिए अवतल चक्कियाँ, तथा मिलाने, मिश्रण करने और पकाने के लिए पत्थर, धातु और मिट्टी के बरतन (स्रोत 1)। (4) खेती के साक्ष्य: चोलिस्तान और बनावली से मिट्टी के हल के प्रतिरूप तथा कालीबंगन का जुता हुआ खेत, जो बताते हैं कि भोजन कैसे उगाया जाता था।

पाठगत प्रश्न 4 · पृष्ठ 4 · स्रोत 1

प्र. पुरातत्वविद वर्तमान समय की तुलनाओं से यह समझने का प्रयास करते हैं कि प्राचीन पुरावस्तुएँ किस प्रयोग में लायी जाती थीं। मैके खोजी गई वस्तु की तुलना आजकल की चक्कियों से कर रहे थे? क्या यह एक उपयोगी नीति है?

उत्तर: हाँ, यह उपयोगी नीति है, पर इसकी सीमाएँ भी हैं। क्यों उपयोगी: रोज़मर्रा की कई वस्तुएँ हज़ारों वर्षों में बहुत कम बदली हैं, इसलिए आज की वस्तुओं से तुलना करके उनके प्रयोग का ठीक अनुमान लगाया जा सकता है। मैके ने दो प्रकार की अवतल चक्कियाँ पहचानीं: एक अनाज पीसने के लिए, और दूसरी जड़ी-बूटियों तथा मसालों को कूटने के लिए। उनके श्रमिकों ने दूसरे प्रकार को ‘सालन पत्थर’ कहा और उनके बावर्ची ने एक पत्थर रसोई में प्रयोग के लिए संग्रहालय से उधार माँगा, जिससे उनकी पहचान की पुष्टि होती है। अध्याय के अनुसार ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने की यह विधि पत्थर की चक्कियों और पात्रों के संदर्भ में तर्कसंगत है। सीमाएँ: (1) ‘धार्मिक’ प्रतीकों पर लागू करने पर यह अटकल बन जाती है, जैसे ‘आद्य शिव’ मुहर या वे छोटे शंकु जिन्हें लिंग भी माना गया है और पट्टों पर खेले जाने वाले खेलों की वस्तुएँ भी; (2) हज़ारों वर्षों में किसी वस्तु का प्रयोग बदल भी सकता है; (3) इसलिए तुलना को उस संदर्भ से भी जाँचना चाहिए जिसमें वस्तु मिली (घर, नाली, कब्र या भट्ठी) और अन्य साक्ष्यों से भी।

पाठगत प्रश्न 5 · पृष्ठ 5 · चित्र 1.7

प्र. निचला शहर दुर्ग से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: (1) आकार और ऊँचाई: दुर्ग छोटा लेकिन ऊँचाई पर बना है; निचला शहर कहीं अधिक बड़ा लेकिन नीचे बना है। (2) स्थिति: चित्र 1.7 में दुर्ग पश्चिम में और निचला शहर पूर्व में है। (3) दुर्ग की ऊँचाई का कारण: यहाँ की संरचनाएँ कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बनी थीं। (4) दीवारें: दुर्ग को दीवार से घेरा गया था जिससे वह निचले शहर से अलग हो गया; निचला शहर भी दीवार से घिरा था। (5) भवन: दुर्ग पर ऐसी संरचनाएँ हैं जिनका प्रयोग संभवतः विशिष्ट सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए होता था, जैसे मालगोदाम और विशाल स्नानागार; निचले शहर में आवासीय भवन हैं, जो लगभग ‘ग्रिड’ पद्धति में बनी गलियों के साथ बसे थे और जिनमें से कई एक आँगन पर केंद्रित थे। चित्र में निचला शहर गलियों से बँटे कई खोदे गए क्षेत्रों (एच आर, वी एस, डी के, मॉनियर क्षेत्र) में दिखता है।

पाठगत प्रश्न 6 · पृष्ठ 7 · चित्र 1.9

प्र. आँगन कहाँ है? दो सीढ़ियाँ कहाँ हैं? आवास का प्रवेशद्वार कैसा है?

उत्तर: आँगन: आवास के बीच का बड़ा, फ़र्श वाला खुला स्थान, जिस पर 18 अंक लिखा है; इसके चारों ओर कमरे बने हैं। सीढ़ियाँ: दोनों आवास के पश्चिमी भाग में हैं, एक उत्तर-पश्चिम में कमरा 16 की दीवार के साथ ऊपर चढ़ती है और दूसरी कमरा 15 के पास, कमरा 17 के बगल में है। ये दूसरे तल या छत पर जाने के लिए थीं। प्रवेशद्वार: बाहरी दीवार में एक सँकरा द्वार (आरेखण में नीचे बाईं ओर), जिससे एक गलियारे से होकर अंदर जाया जाता है; इससे आंतरिक भाग या आँगन का सीधा अवलोकन नहीं होता। भूमि तल की दीवारों में खिड़कियाँ न होने के साथ यह लोगों द्वारा एकांतता को दिए जाने वाले महत्त्व को दर्शाता है।

पाठगत प्रश्न 7 · पृष्ठ 8 · चर्चा कीजिए

प्र. मोहनजोदड़ो के कौन से वास्तुकला संबंधी लक्षण नियोजन की ओर संकेत करते हैं?

उत्तर: (1) बस्ती दो भागों, दुर्ग और निचले शहर, में बँटी थी और दोनों दीवारों से घिरे थे। (2) भवन ऊँचे चबूतरों पर बने थे जो पहले बनाए गए; उसके बाद सारा भवन-निर्माण चबूतरों पर एक निश्चित क्षेत्र तक सीमित था, यानी पहले नियोजन हुआ और फिर उसके अनुसार निर्माण। केवल आधारों के लिए लगभग चालीस लाख श्रम-दिवस लगे होंगे। (3) धूप में सुखाई या पकाई गई ईंटें एक निश्चित अनुपात की थीं: लंबाई ऊँचाई की चार गुनी और चौड़ाई दोगुनी। (4) सड़कें और गलियाँ लगभग ‘ग्रिड’ पद्धति में बनी थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। (5) पहले नालियों के साथ गलियाँ बनाई गईं और फिर उनके अगल-बगल आवास, इसलिए हर घर की कम से कम एक दीवार गली से सटी थी। (6) हर घर में ईंटों के फ़र्श वाला स्नानघर था जिसकी नालियाँ दीवार के माध्यम से गली की नालियों से जुड़ी थीं; मुख्य नाले ऐसी ईंटों से ढँके थे जिन्हें सफ़ाई के लिए हटाया जा सके, और बीच-बीच में हौदियाँ थीं। (7) कई आवासों में कुएँ थे, कुल लगभग 700। (8) दुर्ग पर मालगोदाम और जलबद्ध विशाल स्नानागार जैसी सार्वजनिक संरचनाएँ सोच-समझकर बनाई गई थीं।

पाठगत प्रश्न 8 · पृष्ठ 8 · चित्र 1.10

प्र. क्या दुर्ग पर मालगोदाम तथा स्नानागार के अतिरिक्त अन्य संरचनाएँ भी हैं?

उत्तर: हाँ। दुर्ग के नक्शे (चित्र 1.10) में विशाल आँगन, महाविद्यालय, स्तूप क्षेत्र, स्तंभों वाला हॉल, दक्षिणी हिस्से और एल क्षेत्र के भवन, ए सी सी क्षेत्र, जैनसेन द्वारा खोदा गया कुआँ, सीढ़ियाँ, मुख्य सड़क और दैवीय मार्ग, तथा संरक्षित दीवारें (संरक्षित पूर्वी दीवार सहित) भी दिखाई गई हैं। पाठ यह भी बताता है कि विशाल स्नानागार के उत्तर में एक गली के दूसरी ओर एक अपेक्षाकृत छोटी संरचना थी जिसमें आठ स्नानघर थे, एक गलियारे के दोनों ओर चार-चार।

पाठगत प्रश्न 9 · पृष्ठ 10 · चर्चा कीजिए

प्र. आधुनिक समय में प्रचलित मृतकों के अंतिम संस्कार की विधियों पर चर्चा कीजिए। ये किस सीमा तक सामाजिक भिन्नताओं को परिलक्षित करती हैं?

उत्तर: आज की विधियाँ: दाह-संस्कार (अधिकांश हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध), जिसमें विद्युत शवदाह-गृह भी शामिल हैं; दफ़नाना (मुसलमान, ईसाई और कुछ हिंदू समुदाय, तथा प्रायः छोटे शिशु); कुछ स्थितियों में नदी में प्रवाहित करना; और पारसियों में ‘मौन मीनार’ पर शव रखना। सामाजिक भिन्नताएँ: विधि स्वयं अधिकतर धर्म और समुदाय को दर्शाती है, धन को नहीं। लेकिन हैसियत और धन की भिन्नता कई रूपों में दिखती है: साधारण कब्र से लेकर भव्य मकबरे तक कब्रों का आकार और सजावट; महँगे संस्कार और सामग्री; बड़े नेताओं की समाधियाँ और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार; और कुछ गाँवों में अलग-अलग जातियों या समुदायों के अलग श्मशान या कब्रिस्तान। हड़प्पाई शवाधानों के अध्ययन में भी पुरातत्वविद यही विधि अपनाते हैं: गर्त की बनावट (कुछ में ईंटों की चिनाई) और मृतक के साथ रखी वस्तुओं की तुलना। फिर भी अध्याय बताता है कि हड़प्पा के कब्रिस्तानों में बहुत कम सामाजिक भिन्नता दिखती है।

पाठगत प्रश्न 10 · पृष्ठ 11 · चर्चा कीजिए

प्र. इस अध्याय में दिखाई गई पत्थर की पुरावस्तुओं की एक सूची बनाइए। इनमें से प्रत्येक के संदर्भ में चर्चा कीजिए कि क्या इन्हें उपयोगी अथवा विलास की वस्तुएँ माना जाए। क्या इनमें ऐसी वस्तुएँ भी हैं जो दोनों वर्गों में रखी जा सकती हैं?

उत्तर: अध्याय की कसौटी: उपयोगी वस्तुएँ पत्थर या मिट्टी जैसे सामान्य पदार्थों से आसानी से बनती हैं और बस्तियों में सर्वत्र मिलती हैं; विलास की वस्तुएँ दुर्लभ होती हैं, या महँगे, स्थानीय स्तर पर अनुपलब्ध पदार्थों से, या जटिल तकनीकों से बनी होती हैं।
सूची और वर्गीकरण:
(1) अवतल चक्की (चित्र 1.6): सामान्य कठोर पत्थर, अत्यधिक प्रयोग के संकेत, इसलिए उपयोगी।
(2) पत्थर के फलक (चित्र 1.2): रोज़मर्रा के औज़ार, उपयोगी।
(3) कार्नीलियन, जैस्पर आदि के मनके (चित्र 1.2, 1.13): दूर से लाए पत्थर; आग में पकाने, तोड़ने, शल्क निकालने, घिसाई, पॉलिश और छेद करने की लंबी प्रक्रिया, इसलिए विलास की वस्तुएँ।
(4) ‘पुरोहित-राजा’ की पत्थर की मूर्ति (चित्र 1.23): दुर्लभ, इसलिए विलास की।
(5) लाजवर्द मणि, जैस्पर और चाल्सेडनी के छोटे शंकु (चित्र 1.28): बहुत सुंदर ढंग से काटे और तराशे गए, कीमती पत्थरों से बने।
(6) चर्ट के बाट (चित्र 1.2) और सेलखड़ी की मुहरें (चित्र 1.1)।
दोनों वर्गों में रखी जा सकने वाली वस्तुएँ: चर्ट के बाट रोज़ के विनिमय में प्रयुक्त होते थे, फिर भी एक परिशुद्ध मानक प्रणाली के अनुसार बनाए गए थे; सेलखड़ी की मुहरें व्यापार के काम की वस्तुएँ थीं पर बड़ी सावधानी से उकेरी गई थीं; और पत्थर के शंकु संभवतः पट्टों पर खेले जाने वाले खेलों (रोज़ के प्रयोग) में काम आते थे, पर कीमती पत्थरों से बने थे। अध्याय में फ़यॉन्स से बनी तकलियों के उदाहरण की तरह, ये वस्तुएँ दिखाती हैं कि दोनों वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल सकते हैं।

पाठगत प्रश्न 11 · पृष्ठ 14 · चर्चा कीजिए

प्र. हड़प्पाई क्षेत्र से ओमान, दिलमुन तथा मेसोपोटामिया तक कौन से मार्गों से जाया जा सकता था।

उत्तर: सामुद्रिक मार्ग (सबसे संभावित): गुजरात के लोथल, मकरान तट के सुत्कागेंडोर तथा बलूचिस्तान तट के बालाकोट जैसी तटीय बस्तियों से जहाज़ अरब सागर के तट के साथ-साथ पश्चिम में ओमान (मगान) तक, फिर फारस की खाड़ी में दिलमुन (संभवतः बहरीन) तक, और खाड़ी में आगे मेसोपोटामिया (उर) तक जा सकते थे। अध्याय इसके साक्ष्य देता है: मेसोपोटामिया के लेख मेलुहा को नाविकों का देश कहते हैं; मुहरों पर जहाज़ों और नावों के चित्र हैं (चित्र 1.20); ओमान में एक हड़प्पाई मर्तबान मिला है; बहरीन में मिली ‘फारस की खाड़ी’ प्रकार की मुहरों पर हड़प्पाई चित्र मिलते हैं; और दिलमुन के बाट हड़प्पाई मानक का अनुसरण करते थे। नदी-मार्ग: सिंधु और उसकी उपनदियों के सहारे माल तट तक पहुँचाया जाता होगा। स्थल मार्ग: बलूचिस्तान और ईरान के पठार से होकर पश्चिम की ओर, मानचित्र 3 पर दिखाए शहर-ए-सोख्ता और टेपे याहया जैसे स्थलों से होते हुए मेसोपोटामिया तक; परिवहन का एक साधन बैलगाड़ियाँ थीं।

पाठगत प्रश्न 12 · पृष्ठ 15 · चित्र 1.22

प्र. मिट्टी के इस टुकड़े पर कितनी मुहरों की छाप दिखती है?

उत्तर: रोपड़ से मिले इस मुद्रांकन पर दो मुहरों की छाप साफ़ दिखती है, अगल-बगल: बाईं ओर एक पंक्ति में लिपि के चिह्न, और दाईं ओर लिपि के नीचे एक जानवर का चित्र। निचले किनारे पर चिह्नों की एक पंक्ति किसी तीसरी, अधूरी बची छाप का भाग लगती है। इस प्रकार दो मुहरें स्पष्ट हैं और संभवतः एक तीसरी भी। यह अध्याय के उस वर्णन से मेल खाता है कि थैले की गाँठ पर जमाई गई गीली मिट्टी को ‘एक या अधिक मुहरों से दबाया गया’।

पाठगत प्रश्न 13 · पृष्ठ 15 · चर्चा कीजिए

प्र. वर्तमान समय में सामान के लंबी दूरी के विनिमय के लिए प्रयुक्त कुछ तरीकों पर चर्चा कीजिए। उनके क्या-क्या लाभ और समस्याएँ हैं?

उत्तर: तरीके: ट्रकों द्वारा सड़क परिवहन, रेल, सील बंद कंटेनर ले जाने वाले जहाज़, हवाई माल-परिवहन, तेल और गैस के लिए पाइपलाइन, डाक और कूरियर सेवाएँ, तथा डिजिटल भुगतान के साथ ऑनलाइन ख़रीद। लाभ: सामान तेज़ी से और बहुत बड़ी मात्रा में पहुँचता है; सील बंद, क्रमांकित कंटेनर और ट्रैकिंग संख्या बताते हैं कि पार्सल से छेड़-छाड़ नहीं हुई और भेजने वाला कौन है, ठीक वैसे ही जैसे हड़प्पाई मुद्रांकन करता था; मानक बाट, माप और कीमतें विनिमय को उचित बनाते हैं। समस्याएँ: ईंधन का ऊँचा ख़र्च और प्रदूषण; रास्ते में दुर्घटनाएँ और माल की टूट-फूट; सीमाओं पर देरी, सीमा-शुल्क और काग़ज़ी कार्रवाई; चोरी और ऑनलाइन धोखाधड़ी; तथा युद्ध, हड़ताल, प्राकृतिक आपदा या महामारी से रुकावट।

पाठगत प्रश्न 14 · पृष्ठ 16 · चर्चा कीजिए

प्र. क्या हड़प्पाई समाज में सभी लोग समान रहे होंगे?

उत्तर: संभवतः नहीं, यद्यपि साक्ष्य मिले-जुले हैं। भिन्नता के संकेत: (1) कुछ शवाधान गर्तों में ईंटों की चिनाई थी और कुछ कब्रों में आभूषण या ताँबे के दर्पण मिले; (2) महँगे पदार्थों से बनी दुर्लभ वस्तुएँ, जैसे फ़यॉन्स के लघुपात्र, मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में केंद्रित हैं, और सभी स्वर्णाभूषण संचयों से मिले; (3) ऊँचा, दीवार से घिरा दुर्ग, जिस पर विशिष्ट भवन थे, निचले शहर से अलग था; (4) ईंटों, मुहरों और बाटों की एकरूपता, बस्तियों का नियोजन और बहुत बड़े पैमाने पर संगठित श्रम (मोहनजोदड़ो में केवल आधारों के लिए लगभग चालीस लाख श्रम-दिवस) बताते हैं कि कोई जटिल फैसले लेता और लागू करवाता था; (5) लोग किसान, पशुपालक, शिल्पकार और व्यापारी जैसे अलग-अलग काम करते थे। समानता के संकेत: कुछ पुरातत्वविद मानते हैं कि हड़प्पाई समाज में शासक नहीं थे और सभी की सामाजिक स्थिति समान थी; ‘प्रासाद’ से कोई भव्य वस्तुएँ नहीं मिलीं; शवाधानों में बहुत कम भिन्नता दिखती है; और अध्याय के अनुसार हड़प्पावासियों ने एक प्रकार की लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई थी। अतः संभवतः कोई सर्वशक्तिमान राजा नहीं था, पर धन और काम की भिन्नताएँ अवश्य रही होंगी।

पाठगत प्रश्न 15 · पृष्ठ 17 · चर्चा कीजिए

प्र. मानचित्र 1, 2 और 4 के बीच समानताओं और भिन्नताओं पर विचार कीजिए।

उत्तर: समानताएँ: तीनों मानचित्र उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग में सिंधु के आस-पास के क्षेत्र को दिखाते हैं; सिंध, पंजाब और पूर्व में हरियाणा का क्षेत्र तीनों पर है (जैसे मानचित्र 2 पर सिसवल और मानचित्र 4 पर उत्तरवर्ती सिसवल), और गुजरात मानचित्र 1 तथा 4 दोनों पर है (रंगपुर, और रंगपुर II बी सी)।
भिन्नताएँ: (1) मानचित्र 2 (आरंभिक हड़प्पा) पर छोटी बस्तियाँ कुछ समूहों में हैं, जिनमें से कई बलूचिस्तान और सिंध में हैं (दंबसादात, आमरी-नाल, कोटदीजी)। (2) मानचित्र 1 (विकसित हड़प्पा) पर सबसे अधिक फैलाव है, बड़े शहरों और मकरान तट से गुजरात तक की तटीय बस्तियों के साथ। (3) मानचित्र 4 (उत्तर हड़प्पा) एक बदलाव दिखाता है: लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थल त्याग दिए गए थे, जबकि गुजरात, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नयी बस्तियों में आबादी बढ़ने लगी थी; यह उत्तरवर्ती सिसवल और रंगपुर II बी सी के घने समूहों में दिखता है। स्वात, शवाधान एच और झूकर अन्य समूह हैं, और बलूचिस्तान लगभग खाली है। मानचित्र 4 पर कोई बड़ा शहर नहीं है, जो इन ‘अनुवर्ती संस्कृतियों’ की ग्रामीण जीवनशैली से मेल खाता है।

पाठगत प्रश्न 16 · पृष्ठ 21 · चर्चा कीजिए

प्र. इस अध्याय में दिए गए विषयों में से कौन से कनिंघम को रुचिकर लगते? 1947 के बाद से कौन-कौन से प्रश्न रोचक माने गए हैं?

उत्तर: कनिंघम: उनकी मुख्य रुचि आरंभिक ऐतिहासिक (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईसवी) तथा उसके बाद के कालों के पुरातत्व में थी; वे लिखित स्रोतों, अभिलेखों और चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों के वृतांतों का प्रयोग करते थे और ऐसी पुरावस्तुएँ खोजते थे जो उनके विचार में सांस्कृतिक महत्त्व की थीं। इसलिए उन्हें मुहरें (उन्होंने एक मुहर पर ध्यान दिया था, चित्र 1.24), ‘पुरोहित-राजा’ जैसी पत्थर की मूर्तियाँ, अभिलेख और लिपि, तथा दुर्ग पर स्तूप जैसे बौद्ध अवशेष जैसी आकर्षक खोजें रुचिकर लगतीं। दैनिक जीवन के विषय (भोजन, नालियाँ, आवास, शिल्प) उन्हें कम आकर्षित करते।
1947 के बाद: विभाजन के बाद प्रमुख ज्ञात पुरास्थल पाकिस्तान में चले गए, इसलिए भारतीय पुरातत्वविदों ने भारत में पुरास्थल खोजने का प्रयास किया: कच्छ, पंजाब और हरियाणा में सर्वेक्षण, तथा कालीबंगन, लोथल, राखीगढ़ी और धौलावीरा में उत्खनन। अन्य प्रश्न: सांस्कृतिक क्रम का पता लगाना; विशेष पुरास्थलों की भौगोलिक स्थिति के पीछे के कारण; पुरावस्तुओं की उपयोगिता; निर्वाह के तरीके, शिल्प-उत्पादन और कच्चा माल प्राप्त करने की नीतियाँ; सामाजिक भिन्नताएँ; 1980 के दशक से अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त कार्य और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकें; राखीगढ़ी में आर्कियोजेनेटिक्स (डीएनए) अनुसंधान; लैंगिक प्रश्न; और हड़प्पावासियों तथा वैदिक लोगों के संबंध।

पाठगत प्रश्न 17 · पृष्ठ 24 · चर्चा कीजिए

प्र. हड़प्पाई अर्थव्यवस्था के वे कौन-कौन से पहलू हैं जिनका पुनर्निर्माण पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर किया गया है?

उत्तर: (1) निर्वाह के तरीके: जले अनाज के दानों से फ़सलें (गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना, तिल, बाजरा, कुछ चावल) और हड्डियों से पालतू तथा जंगली जानवर, मछली और पक्षी। (2) कृषि प्रौद्योगिकी: खेत जोतने के लिए बैल (मुहरों और मृण्मूर्तियों पर वृषभ), चोलिस्तान और बनावली से मिट्टी के हल के प्रतिरूप, कालीबंगन का जुता हुआ खेत जहाँ दो फ़सलें एक साथ उगाई जाती थीं। (3) सिंचाई: शोर्तुघई में नहरें, कुएँ, और धौलावीरा के जलाशय। (4) भोजन तैयार करना: अवतल चक्कियाँ और बरतन। (5) शिल्प-उत्पादन: चन्हुदड़ो में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण तथा बाट बनाना; नागेश्वर और बालाकोट में शंख की वस्तुएँ; इन केंद्रों की पहचान कच्चे माल, औज़ारों, अपूर्ण वस्तुओं और कूड़े-करकट से। (6) कच्चा माल प्राप्त करना: स्रोतों के निकट बस्तियाँ (लाजवर्द मणि के लिए शोर्तुघई; कार्नीलियन, सेलखड़ी और धातु के लिए लोथल) तथा ताँबे के लिए खेतड़ी और सोने के लिए दक्षिण भारत में अभियान। (7) परिवहन: बैलगाड़ियाँ (मिट्टी के खिलौना-प्रतिरूप, चित्र 1.29), नदी-मार्ग और तटीय मार्ग। (8) सुदूर क्षेत्रों से संपर्क: ओमान से ताँबा, दिलमुन और मेसोपोटामिया से संपर्क (मेलुहा से कार्नीलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना और लकड़ियाँ)। (9) विनिमय का नियंत्रण: मुहरें और मुद्रांकन, तथा चर्ट के बाटों की परिशुद्ध प्रणाली, जिसके निचले मानदंड द्विआधारी और ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली के थे, साथ में धातु के तराजू के पलड़े।