NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग II के अध्याय 5 ‘यात्रियों के नज़रिए’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्नों (100-150 शब्दों वाले पाँच प्रश्न, 250-300 शब्दों के चार लघु निबंध, मानचित्र कार्य और दोनों परियोजना कार्य) के पूरे आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न (चर्चा कीजिए और स्रोतों व चित्रों के साथ दिए प्रश्न)। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।
1 किताब-उल-हिन्द पर टिप्पणी
प्र. किताब-उल-हिन्द पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: अरबी में लिखी गई, सरल और स्पष्ट भाषा में, अल-बिरूनी की किताब-उल-हिन्द धर्म, दर्शन, त्योहार, खगोलशास्त्र, कीमियागिरी, शिष्टाचार, रीति-रिवाज़, सामाजिक जीवन, माप-तौल, मूर्ति-विज्ञान, विधि और मापतंत्र विज्ञान (मापन का विज्ञान) पर 80 अध्यायों तक फैली है। अधिकतर अध्याय लगभग एक ही ज्यामितीय ढाँचे का पालन करते हैं: पहले एक प्रश्न उठाया जाता है, फिर संस्कृत परंपरा से लिया गया विवरण दिया जाता है, और अंत में अन्य संस्कृतियों से तुलना की जाती है; कुछ विद्वान इस सटीक संरचना को अल-बिरूनी के गणितीय प्रशिक्षण से जोड़ते हैं।
अल-बिरूनी संस्कृत, पालि और प्राकृत ग्रंथों के मौजूदा अरबी अनुवादों को जानते थे, पर वे उनकी आलोचना करते थे और स्पष्ट रूप से उनमें सुधार लाना चाहते थे। अरबी में लिखते हुए, वे संभवतः अपनी रचना उपमहाद्वीप की सीमाओं के आसपास के, हिंदुओं से धार्मिक चर्चा करने और मेलजोल रखने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए लिख रहे थे, जैसा उन्होंने स्वयं कहा, यह उनकी सहायता के लिए और उनके लिए सूचनाओं के भंडार के रूप में रची गई रचना थी।
2 इब्न बतूता और बर्नियर के दृष्टिकोणों की तुलना
प्र. इब्न बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर बताइए।
उत्तर: इब्न बतूता और बर्नियर दोनों ने भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे, पर उनके दृष्टिकोण मौलिक रूप से भिन्न थे। इब्न बतूता ने अनजाने के प्रति अपने रोमांच को साझा करने के लिए लिखा: वे जो कुछ भी अपरिचित या रोचक पाते (नारियल के वृक्ष, पान खाने का तरीका, दिल्ली की विशाल प्राचीर, कुशल डाक-व्यवस्था), उसे उत्साह और जिज्ञासा के साथ दर्ज करते थे, प्रायः प्रशंसात्मक भाव से। उनका उद्देश्य, जैसा इब्न जुज़ाई ने बताया, पाठक के “मन को मनोरंजन और कानों-आँखों को आनंद” देना था, साथ ही शिक्षा भी।
बर्नियर ने इसके विपरीत तुलना करने के लिए लिखा, और लगभग हमेशा भारत को यूरोप से कमतर दिखाने के लिए। उनकी विधि द्वि-विपरीतता की थी: भारत को यूरोप के व्यवस्थित विपरीत के रूप में प्रस्तुत करना, भेदों को इस तरह क्रमबद्ध करना कि भारत हमेशा निम्न सिद्ध हो, चाहे भूमि-स्वामित्व की बात हो, नगरों की या सामाजिक ढाँचे की। संक्षेप में, इब्न बतूता का दृष्टिकोण खोजी-जिज्ञासु और प्रायः सहानुभूतिपूर्ण था, जबकि बर्नियर का आलोचनात्मक-तुलनात्मक और प्रायः पूर्वाग्रहग्रस्त।
3 बर्नियर के वृत्तांत से नगरीय केंद्रों का चित्र
प्र. बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केंद्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए।
उत्तर: बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाला नगरीय केंद्रों का चित्र नकारात्मक और अधूरा दोनों है। उन्होंने मुग़ल नगरों को “शिविर-नगर” कहा, यह दावा करते हुए कि वे केवल घूमते शाही दरबार की सेवा के लिए अस्तित्व में थे और दरबार के जाते ही ढह जाते थे, और इस प्रकार उन्होंने नगरों की स्वतंत्र आर्थिक जीवंतता से इनकार किया।
पर अध्याय दिखाता है कि यह चित्रण अधूरा था: वास्तव में नगर कई प्रकार के थे: निर्माण, व्यापार, बंदरगाह, धार्मिक और तीर्थयात्रा नगर, और प्रत्येक वास्तविक व्यापारिक व पेशेवर समृद्धि का संकेत देता था। व्यापारी नातेदार और जाति-आधारित निकायों (महाजन, सेठ, नगर सेठ) से संगठित होते थे, और वैद्य, शिक्षक, विधिवेत्ता, चित्रकार, संगीतकार जैसे नगरीय पेशेवर शाही व निजी दोनों तरह के आश्रय पर काम करते थे। बर्नियर स्वयं राजकीय कारखानों (कढ़ाई, सुनार, चित्रकार, बढ़ई आदि के लिए हॉल) का वर्णन करते हैं, जो संगठित शिल्प-उत्पादन का प्रमाण है। सत्रहवीं सदी में जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो उस समय पश्चिमी यूरोप के औसत से भी अधिक था, और यह आँकड़ा स्वयं बर्नियर के “शिविर-नगर” दावे का खंडन करता है।
4 इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के साक्ष्य
प्र. इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।
उत्तर: इब्न बतूता के वृत्तांत में दास प्रथा को खुले और स्वाभाविक रूप में स्वीकार्य सामाजिक व्यवस्था के रूप में दिखाया गया है। दास खुलेआम बेचे और उपहार के रूप में दिए जाते थे: उन्होंने स्वयं सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ के लिए उपहार के रूप में घोड़े, ऊँट और दास ख़रीदे, मुल्तान के गवर्नर को एक दास और घोड़ा किशमिश-बादाम के साथ भेंट किया, और बताते हैं कि सुल्तान ने एक बार एक उपदेशक को एक लाख टंके और दो सौ दास देकर पुरस्कृत किया।
स्त्री दासियों की भूमिकाएँ व्यापक रूप से भिन्न थीं: कुछ संगीत-नृत्य में निपुण होकर सुल्तान की बहन के विवाह में प्रस्तुति देतीं, अन्य अभिजात परिवारों के भीतर बादशाह के लिए जासूस के रूप में प्रयुक्त होतीं, और अधिकतर घरेलू श्रम करतीं, पालकी में लोगों को ढोने सहित। वे इतनी सस्ती थीं कि कई परिवार एक या दो रखते थे। इस प्रकार इब्न बतूता का वृत्तांत दिखाता है कि दासता उस समय के सामाजिक व आर्थिक ताने-बाने में गहराई से बुनी हुई थी, न कि कोई असाधारण घटना।
5 सती प्रथा के तत्व जिन्होंने बर्नियर का ध्यान खींचा
प्र. सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
उत्तर: बर्नियर का ध्यान सीधे सती प्रथा की ओर गया, जिसे यूरोपीय यात्री अक्सर स्त्रियों के प्रति व्यवहार को पूर्वी भेद के मुख्य संकेतक के रूप में प्रयोग करते हुए उठाते थे। जिन तत्वों ने उनका विशेष ध्यान खींचा वे थे: बलि होने वाली स्त्री की अत्यंत कम आयु (उन्होंने लाहौर में एक बारह वर्ष से अधिक की न लगने वाली विधवा को बलि होते देखा), इस प्रक्रिया में सहायकों (तीन-चार ब्राह्मण और एक बूढ़ी स्त्री) की भूमिका जिन्होंने अनिच्छुक शिकार को बलपूर्वक मृत्यु-स्थल तक धकेला और उसके हाथ-पैर बाँधे ताकि वह भाग न सके, और यह तथ्य कि कुछ स्त्रियाँ “प्रसन्नतापूर्वक” मृत्यु की ओर गईं जबकि अन्य को स्पष्ट रूप से बाध्य किया गया, यानी स्वेच्छा और बाध्यता के बीच का अंतर स्वयं उनके लिए उल्लेखनीय था।
6 निबंध · अल-बिरूनी की जाति-व्यवस्था की व्याख्या
प्र. जाति व्यवस्था के संबंध में अल-बिरूनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।
उत्तर: अल-बिरूनी की जाति-व्यवस्था की समझ जटिल और परस्पर-विरोधाभासी दोनों है। उन्होंने स्वयं समझ की तीन बड़ी बाधाएँ पहचानीं: भाषा (संस्कृत की जटिल संरचना ने अनुवाद कठिन बनाया), धार्मिक भेद, और स्थानीय जनसंख्या का अभिमान। इन बाधाओं को स्वीकार करने के बावजूद, वे जाति-व्यवस्था को समझने के लिए लगभग पूरी तरह ब्राह्मणीय संस्कृत ग्रंथों (वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि, मनुस्मृति) पर निर्भर रहे, प्रत्यक्ष सामाजिक अवलोकन के बजाय।
इन ग्रंथों के आधार पर, उन्होंने वर्ण-व्यवस्था का पारंपरिक ब्राह्मणीय विवरण दोहराया: ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से, क्षत्रिय कंधों-भुजाओं से, वैश्य जाँघ से, और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए, फिर भी उन्होंने नोट किया कि व्यवहार में ये समूह एक ही नगरों-गाँवों में साथ रहते थे। अल-बिरूनी ने इस सामाजिक विभाजन को भारत के लिए अद्वितीय नहीं माना: उन्होंने बताया कि प्राचीन फ़ारस में भी चार समान श्रेणियाँ थीं: घुड़सवार और शासक वर्ग; भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक; खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक; और कृषक तथा शिल्पकार, और यह भी नोट किया कि इस्लाम के भीतर सभी पुरुष समान माने जाते हैं, केवल धर्मपरायणता में भिन्न।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने वर्ण के ब्राह्मणीय विवरण को स्वीकार करते हुए भी अनुष्ठानिक अपवित्रता के विचार को सिरे से अस्वीकार कर दिया, प्रकृति से तर्क देते हुए: सूर्य वायु को शुद्ध करता है, नमक समुद्र को सड़ने से रोकता है, और जो कुछ भी अपवित्र होता है वह अंततः पुनः पवित्रता प्राप्त कर लेता है, इसलिए स्थायी अवस्था के रूप में अपवित्रता प्राकृतिक नियम के विरुद्ध थी। कुल मिलाकर, अल-बिरूनी की समझ ब्राह्मणीय, ग्रंथ-आधारित दृष्टि तक सीमित रही, रोज़मर्रा के वास्तविक व्यवहार तक नहीं; अंत्यज जैसे समूह सामाजिक रूप से उत्पीड़ित पर आर्थिक रूप से अपरिहार्य थे, जो उनके वर्णित मॉडल से कहीं अधिक जटिल वास्तविकता दिखाता है।
7 निबंध · इब्न बतूता के वृत्तांत की उपयोगिता
प्र. क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केंद्रों में जीवन-शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्न बतूता का वृत्तांत सहायक है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।
उत्तर: हाँ, इब्न बतूता का वृत्तांत समकालीन नगरीय केंद्रों में जीवन की समझ के लिए काफ़ी हद तक उपयोगी है, यद्यपि इसकी अपनी सीमाएँ भी हैं।
उपयोगी होने के कारण। पहला, वे प्रत्यक्षदर्शी थे और अपने अनुभवों को विस्तार से दर्ज करते थे: दिल्ली की प्राचीर की सटीक चौड़ाई (ग्यारह हाथ), द्वारों की संख्या (अट्ठाईस), निर्माण-सामग्री (निचला भाग पत्थर, ऊपरी भाग ईंटों का) जैसी बारीकियाँ किसी दूसरे स्रोत से मिलना कठिन है। दूसरा, वे बाज़ारों के सामाजिक जीवन का वर्णन करते हैं: मस्जिद व मंदिर का साथ होना, नर्तकों-संगीतकारों के लिए स्थान, दौलताबाद के ताराबबाद जैसे विशिष्ट संगीत-बाज़ार, जो नगरों की सांस्कृतिक जीवंतता को उजागर करता है। तीसरा, उनका डाक-व्यवस्था का वर्णन (उलुक, दावा, घंटियों वाली छड़ लेकर दौड़ते संदेशवाहक, पाँच दिन में सूचना पहुँचना) प्रशासनिक दक्षता का ठोस प्रमाण देता है, और उनके व्यापार-संबंधी अवलोकन (सूती वस्त्र, मलमल, रेशम का पश्चिम व दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यात) आर्थिक जीवन को समझने में सहायक हैं।
सीमाएँ। इब्न बतूता एक विशेषाधिकार-प्राप्त क़ाज़ी और दरबारी व्यक्ति के रूप में यात्रा करते थे, इसलिए उनका दृष्टिकोण सामान्य नगरवासी के अनुभव से भिन्न हो सकता है; वे प्रायः वही दर्ज करते हैं जो उन्हें विदेशी होने के कारण अपरिचित या रोचक लगा, न कि हर पहलू को व्यवस्थित रूप से। फिर भी, इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत का प्रयोग यह तर्क देने में किया है कि शहर अपनी संपत्ति का एक बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते थे। इसलिए, सावधानीपूर्वक और अन्य स्रोतों के साथ मिलाकर पढ़ने पर, इब्न बतूता का वृत्तांत समकालीन नगरीय जीवन को समझने का एक मूल्यवान, यद्यपि आंशिक, स्रोत है।
8 निबंध · बर्नियर के वृत्तांत की सीमा
प्र. चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित करने में सक्षम करता है?
उत्तर: बर्नियर का वृत्तांत इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज पुनर्निर्मित करने में केवल आंशिक रूप से सक्षम बनाता है, क्योंकि उनका विवरण तथ्य और पूर्वाग्रह का मिश्रण है।
उनका केंद्रीय दावा था कि मुग़ल भारत में भूमि पर कोई निजी संपत्ति नहीं थी: बादशाह सब कुछ का स्वामी था, इसलिए भूस्वामी अपनी संतानों को भूमि नहीं दे सकते थे, जिससे दीर्घकालिक निवेश की कोई प्रेरणा नहीं बचती थी, और परिणामस्वरूप कृषि-बर्बादी, किसान-उत्पीड़न व गिरता जीवन-स्तर पैदा हुआ। उन्होंने ग़रीब किसानों का मार्मिक वर्णन दिया (बंजर भूमि, अत्याचारी स्वामियों की माँगें, बच्चों का दास के रूप में ले जाया जाना), और डच यात्री पेलसर्ट ने भी स्वतंत्र रूप से इसी तरह की ग्रामीण ग़रीबी दर्ज की, जो दर्शाता है कि बर्नियर का यह अवलोकन उस काल के अन्य यूरोपीय यात्रियों द्वारा भी साझा किया गया था और शायद वास्तविक तकलीफ़ पर आधारित था।
फिर भी उनका मूल कारण-विश्लेषण संदिग्ध है: कोई मुग़ल आधिकारिक दस्तावेज़ यह नहीं कहता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था; अकबर के इतिहासकार अबुल फ़ज़ल भूमि-राजस्व को “राजत्व का पारिश्रमिक” के रूप में वर्णित करते हैं, शासक की सुरक्षा के बदले भुगतान, न कि भूमि पर किराया, अर्थात यह फ़सल पर कर था, भूमि के स्वामित्व का प्रमाण नहीं। इसके अलावा, बर्नियर का अपना प्रमाण उनके सिद्धांत को कमज़ोर करता है: उन्होंने स्वीकार किया कि सोना-चाँदी भारतीय निर्माताओं के बदले भारत में बहकर आता था और एक समृद्ध, दूर-व्यापार करने वाला व्यापारी वर्ग भी देखा।
अध्याय के अनुसार, वास्तविक ग्रामीण समाज बर्नियर की सपाट “सब कुछ राज्य का” तस्वीर से कहीं अधिक विभेदित था: बड़े ज़मींदारों से लेकर भूमिहीन मज़दूरों तक, बीच में बड़े वस्तु-उत्पादक किसान और छोटे निर्वाह किसान। इसलिए बर्नियर उपयोगी कच्चा प्रमाण देते हैं, पर उनके निष्कर्षों को अन्य स्रोतों (जैसे अबुल फ़ज़ल) से सत्यापित किए बिना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
9 उद्धरण-आधारित · बर्नियर और शिल्प-कार्य
प्र. यह बर्नियर से लिया गया एक उद्धरण हैः “ऐसे लोगों द्वारा तैयार सुंदर शिल्पकारीगरी के बहुत उदाहरण हैं, जिनके पास औज़ारों का अभाव है, और जिनके विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी निपुण कारीगर से कार्य सीखा है। कभी-कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतनी निपुणता से नकल करते हैं कि असली और नकली के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। अन्य वस्तुओं में, भारतीय लोग बेहतरीन बंदूकें, और ऐसे सुंदर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि संदेह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है। मैं अकसर इनके चित्रों की सुंदरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ हूँ।” उसके द्वारा उल्लिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।
उत्तर: इस उद्धरण में बर्नियर द्वारा उल्लिखित शिल्प हैं: बंदूकें (मस्केट) व शिकार की बंदूकें बनाना, सुंदर स्वर्णाभूषण बनाना, यूरोपीय वस्तुओं की सटीक नक़ल करना, और चित्रकारी (पेंटिंग)।
इनकी तुलना अध्याय में वर्णित अन्य शिल्प-गतिविधियों से करने पर एक दिलचस्प पैटर्न उभरता है। अध्याय बर्नियर के ही एक अन्य विवरण में राजकीय कारखानों का वर्णन करता है: बड़े हॉल जिनमें कढ़ाई करने वाले, सुनार, चित्रकार, वार्निश करने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्ज़ी, मोची, और रेशम-ज़री-मलमल के निर्माता संगठित रूप से काम करते थे। इस उद्धरण में उल्लिखित स्वर्णाभूषण-निर्माण (सुनार) और चित्रकारी उन्हीं राजकीय कारखानों की सूची में मिलते हैं, पर बंदूक-निर्माण उस सूची (स्रोत 14) में नहीं है। दोनों विवरण मिलकर राजकीय कारखानों के भीतर और बाहर, दोनों जगह काम करने वाले कुशल और विविध शिल्पी वर्ग की तस्वीर देते हैं।
दिलचस्प विरोधाभास यह है कि इसी उद्धरण में बर्नियर स्वयं भारतीय शिल्पकारों की कुशलता की खुले दिल से प्रशंसा करते हैं, यह मानते हुए कि वे “औज़ारों के अभाव” और औपचारिक प्रशिक्षण के बिना भी यूरोपीय वस्तुओं की उत्कृष्ट नक़ल बना सकते थे, और उनके स्वर्णाभूषण किसी यूरोपीय स्वर्णकार से बेहतर हो सकते थे, जबकि अध्याय के अन्य भाग में वे यही तर्क देते हैं कि भारतीय शिल्पियों के पास सुधार की कोई प्रेरणा नहीं थी क्योंकि राज्य उनका लाभ ले लेता था। यह ठीक वही आत्म-विरोधाभास है जो अध्याय बर्नियर के प्रमाण में बार-बार दिखाता है: उनका अपना अवलोकन उनके व्यापक सिद्धांत (कि मुग़ल भारत में आर्थिक ठहराव था) को कमज़ोर करता है, क्योंकि कुशल, नवोन्मेषी शिल्प-कार्य की यह तस्वीर आर्थिक जड़ता की उनकी सामान्य तस्वीर से मेल नहीं खाती।
10 मानचित्र कार्य
प्र. विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित कीजिए जिनकी यात्रा इब्न बतूता ने की थी। कौन-कौन से समुद्रों को उसने पार किया होगा?
उत्तर: इन्हें अपने सीमारेखा विश्व मानचित्र पर उसकी यात्रा के क्रम में चिह्नित कीजिए।
| अध्याय के अनुसार देखे गए देश/क्षेत्र | रास्ते में संभवतः पार किया गया समुद्र |
|---|---|
| मोरक्को (जन्म स्थान तैंजियर) और उत्तरी अफ़्रीका (ट्यूनिस) | भूमध्य सागर के तट के साथ |
| मक्का (अरब), सीरिया, इराक, फ़ारस (ईरान) | लाल सागर (अरब पहुँचने के लिए) |
| यमन, ओमान और पूर्वी अफ़्रीका के तटीय व्यापारिक बंदरगाह | लाल सागर, अरब सागर और फ़ारस की खाड़ी |
| मध्य एशिया और अफ़गानिस्तान; संभवतः रूस भी | स्थल मार्ग |
| भारत (सिंध, मुल्तान, दिल्ली, मालाबार तट, बंगाल, असम) | अरब सागर (मालाबार तट के साथ) |
| मालद्वीप और श्रीलंका | हिंद महासागर |
| सुमात्रा और चीन (जायतुन यानी क्वानझू, बीजिंग) | बंगाल की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर |
चिह्नित कैसे करें: (1) तालिका के हर देश या क्षेत्र को छायांकित करके नाम लिखिए। (2) इन्हें इसी क्रम में एक रेखा से जोड़िए: स्थल पर ठोस रेखा, समुद्र पर टूटी रेखा। (3) टूटी रेखा के पास हर समुद्र का नाम लिखिए। (4) संकेत-सूची बनाइए और तैंजियर को यात्रा का आरंभ-बिंदु दिखाइए।
समुद्र जिन्हें उसने पार किया होगा: भूमध्य सागर, लाल सागर, फ़ारस की खाड़ी, अरब सागर, हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर।
11 परियोजना कार्य (कोई एक)
प्र. अपने किसी बड़े संबंधी (माता/पिता/दादा-दादी तथा नाना-नानी/चाचा/चाची) का साक्षात्कार कीजिए जिन्होंने आपके नगर अथवा गाँव के बाहर यात्राएँ की हों। पता कीजिए (क) वे कहाँ गए थे (ख) उन्होंने यात्रा कैसे की (ग) उन्हें कितना समय लगा (घ) उन्होंने यात्रा क्यों की (ङ) क्या उन्होंने किसी कठिनाई का सामना किया। ऐसी समानताओं और भिन्नताओं को सूचीबद्ध कीजिए जो उन्होंने अपने रहने के स्थान और यात्रा किए गए स्थानों के बीच देखीं, विशेष रूप से भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतों, सड़कों तथा पुरुषों और महिलाओं की जीवन-शैली के संदर्भ में। अपने द्वारा हासिल जानकारियों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर (परियोजना कैसे करें): प्रश्न के पाँचों बिंदुओं (क से ङ) पर प्रश्नावली बनाकर साक्षात्कार कीजिए और उत्तर उन्हीं के शब्दों में लिखिए। फिर एक तालिका बनाइए जिसमें भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतें, सड़कें और पुरुषों-महिलाओं की जीवन-शैली के आगे ‘अपने स्थान पर’ और ‘यात्रा किए गए स्थान पर’ लिखा जाए। रिपोर्ट के अंत में अध्याय से तुलना कीजिए: अध्याय के यात्रियों की तरह आपके संबंधी को भी कौन-सी बातें ‘अपरिचित’ लगीं, और क्या उन्होंने भी अपने स्थान से तुलना करके ही नए स्थान को समझा (जैसे बर्नियर ने यूरोप से तुलना की)।
प्र. इस अध्याय में उल्लिखित यात्रियों में से एक के जीवन तथा कृतियों के विषय में और अधिक जानकारी हासिल कीजिए। उनकी यात्राओं पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हुए कि उन्होंने समाज का कैसा विवरण किया है तथा इनकी तुलना अध्याय में दिए गए उद्धरणों से कीजिए।
उत्तर (परियोजना कैसे करें): अध्याय की काल-रेखा में से एक यात्री चुनिए (जैसे अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी, अफानासी निकितिन, दुआर्ते बरबोसा, पीटर मुंडी, ज्यौं-बैप्टिस्ट तैवर्नियर, या अल-बिरूनी, इब्न बतूता, बर्नियर में से कोई)। रिपोर्ट में (1) उसका जीवन-परिचय और यात्रा का मार्ग व समय, (2) उसने किसके लिए और क्यों लिखा, (3) उसने समाज के किन पहलुओं (नगर, गाँव, जाति, स्त्रियाँ, व्यापार, धर्म) का वर्णन किया, और (4) उसके विवरणों की तुलना अध्याय के उद्धरणों से कीजिए, यह दिखाते हुए कि उसका अपना पृष्ठभूमि-दृष्टिकोण उसके विवरण को कैसे प्रभावित करता है।
12 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न
अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों व चित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।
प्र. अल-बिरूनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत 5) तथा चर्चा कीजिए कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है।
उत्तर: अल-बिरूनी ने अपने कार्य को उन लोगों के लिए सहायक बताया जो हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं, और उनके साथ संबद्ध होने वालों के लिए सूचना का संग्रह। स्रोत 5 में वह वर्ण व्यवस्था का स्पष्ट और क्रमबद्ध विवरण देता है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, उनकी उत्पत्ति की मान्यता और उनका दर्जा, और यह भी कि वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुल कर रहते हैं। ऐसी जानकारी किसी बाहरी पाठक को हिंदू समाज समझने और उससे संवाद करने में सहायक है, इसलिए यह कृति अपने उद्देश्य को काफ़ी हद तक पूरा करती है। फिर भी, यह विवरण संस्कृत ग्रंथों पर आधारित ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण है; वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी, इसलिए पाठक को समाज का पूरा चित्र नहीं मिलता।
प्र. यदि अल-बिरूनी इक्कीसवीं शताब्दी में रहता, तो वही भाषाएँ जानने पर भी उसे विश्व के किन क्षेत्रों में आसानी से समझा जा सकता था?
उत्तर: अल-बिरूनी अरबी, फ़ारसी, सीरियाई, हिब्रू और संस्कृत जानता था। आज अरबी के कारण उसे पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ़्रीका के अरब देशों (जैसे सऊदी अरब, इराक, सीरिया, मिस्र) में; फ़ारसी के कारण ईरान, अफ़गानिस्तान और ताजिकिस्तान में; हिब्रू के कारण इज़राइल में; और सीरियाई के कारण पश्चिम एशिया के कुछ ईसाई समुदायों में समझा जा सकता था। संस्कृत आज बोलचाल की भाषा नहीं है, पर भारत में विद्वान और पंडित उसे समझ लेते। हालाँकि भाषाओं के रूप सदियों में बदल गए हैं, इसलिए पूरी तरह आसानी से समझा जाना कठिन भी होता।
प्र. क्या ये कपड़े यूनानी हैं अथवा अरबी?
उत्तर: ये कपड़े अरबी हैं। सोलोन और उसके विद्यार्थी पगड़ियाँ और लंबे, ढीले चोगे पहने दिखाए गए हैं, जो अरबी पहनावे की विशेषता है। तेरहवीं शताब्दी की अरबी पांडुलिपि के चित्रकार ने छठी शताब्दी ई.पू. के एथेंस के यूनानी राजनेता को अपने ही समाज के पहनावे में चित्रित किया, यानी जो दृश्य वह जानता था उसी के अनुसार।
प्र. आप डाकुओं को यात्रियों से कैसे अलग करेंगे?
उत्तर: डाकू हथियार लिए हुए हमला करते दिखते हैं; वे आक्रामक मुद्रा में आगे बढ़ रहे हैं और लोगों को पकड़ या मार रहे हैं। यात्री निहत्थे या बचाव की मुद्रा में हैं, कुछ भाग रहे हैं या ज़मीन पर गिरे हुए हैं, और उनके पास गठरियाँ व सामान है। यानी हथियार और आक्रमण की मुद्रा से डाकू, और भागने-बचने की मुद्रा व सामान से यात्री पहचाने जाते हैं।
प्र. आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं?
उत्तर: उस समय यात्रा करना कठिन, जोखिम भरा और असुरक्षित था। नदी और समुद्री मार्गों पर भी लुटेरों और डाकुओं का खतरा रहता था; इब्न बतूता के कारवाँ पर भी मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में आक्रमण हुआ था। इसलिए यात्री अपनी, अपने साथियों और सामान की रक्षा के लिए हथियार लेकर चलते थे। हो सकता है कि कुछ हथियारबंद लोग नाव की रक्षा के लिए रखे गए रक्षक या सैनिक भी हों।
प्र. आपके विचार में अल-बिरूनी और इब्न बतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान/भिन्न थे?
उत्तर: समानता: दोनों ने उपमहाद्वीप के समाज और संस्कृति के बारे में उन पाठकों के लिए लिखा जो इससे अपरिचित थे, और दोनों ने अरबी में लिखा। भिन्नता: अल-बिरूनी का उद्देश्य विद्वत्तापूर्ण था: हिंदुओं से धार्मिक चर्चा करने और उनसे संबद्ध होने वालों के लिए सूचना का संग्रह तैयार करना; इसलिए उसने धर्म, दर्शन, खगोल-विज्ञान, मापतंत्र विज्ञान जैसे विषयों पर अस्सी अध्यायों का व्यवस्थित ग्रंथ लिखा, जो मुख्यतः संस्कृत ग्रंथों पर आधारित था। इब्न बतूता का उद्देश्य अपने प्रत्यक्ष अनुभवों को सुनाना था: शासक के निर्देश पर उसने देखे गए शहरों, रोचक घटनाओं, शासकों और संतों का वृत्तांत लिखवाया, जिससे ‘मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता’ मिले और लाभप्रद उपदेश भी। इसलिए वह जो कुछ अपरिचित और अनोखा लगा, उसे विशेष रूप से रेखांकित करता है।
प्र. बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौन सी वस्तुएँ हैं जो आज आप यात्रा में साथ ले जाएँगे?
उत्तर: (यह आपकी अपनी पसंद का प्रश्न है; एक संभावित उत्तर:) आज यात्रा में मैं बर्नियर की सूची में से तकिया, बिछौना/चादर, नैपकिन (अंगौछे), कुछ खाने का सामान (चावल, मीठी रोटी, नींबू, चीनी), पानी का पात्र (बोतल) और कपड़े ले जाऊँगा। घोड़े, ऊँट, साईस, खानसामा, तंबू, दरी और बेंत का बिस्तर आज की यात्रा में ज़रूरी नहीं, क्योंकि आज वाहन, होटल और ढाबे उपलब्ध हैं।
प्र. भारतीय भाषाओं में बहुत प्रचुर यात्रा वृत्तांत साहित्य उपलब्ध है। आप अपने घर में बोली जाने वाली भाषा के यात्री-लेखकों के विषय में पता कीजिए। किसी एक ऐसे वृत्तांत को पढ़िए और यात्री द्वारा देखे गए क्षेत्रों, उसने जो देखा और उसके द्वारा वृत्तांत लिखे जाने के कारणों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर (कैसे करें): यह स्वयं खोज करने का कार्य है। हिंदी में, उदाहरण के लिए, राहुल सांकृत्यायन का यात्रा-साहित्य प्रसिद्ध है; अपनी भाषा का कोई भी यात्रा-वृत्तांत चुन सकते हैं। टिप्पणी में तीन बातें लिखिए: (1) यात्री ने किन क्षेत्रों की यात्रा की; (2) उसने वहाँ क्या देखा, जैसे लोग, भाषा, रीति-रिवाज, भवन, प्राकृतिक दृश्य; (3) उसने वृत्तांत क्यों लिखा, जैसे जानकारी देने, मनोरंजन, या अपने पाठकों को किसी बात से प्रभावित करने के लिए। अंत में इसकी तुलना अध्याय के किसी एक यात्री से कीजिए।
प्र. अल-बिरूनी ने जो लिखा उसकी तुलना अध्याय 3 स्रोत 6 से कीजिए। क्या आप कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं? क्या आपको लगता है कि अल-बिरूनी भारतीय समाज के विषय में अपनी जानकारी और समझ के लिए केवल संस्कृत के ग्रंथों पर आश्रित रहा?
उत्तर: अध्याय 3 का स्रोत 6 (‘सामाजिक व्यवस्था में लचीलापन’) ऋग्वेद के एक सूक्त के आधार पर बताता है कि प्रारंभिक वैदिक समाज में व्यवसायों में लचीलापन था: वक्ता स्वयं कवि है, उसके पिता वैद्य हैं और माता अन्न पीसती हैं। समानता: दोनों विवरण संस्कृत ग्रंथ-परंपरा से लिए गए हैं और समाज में विभिन्न कार्यों/वर्गों की बात करते हैं; अल-बिरूनी भी कहता है कि वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुल कर रहते हैं। भिन्नता: अल-बिरूनी वर्णों को जन्म से निर्धारित, ब्रह्मन् के अंगों से उत्पन्न और ऊँच-नीच के क्रम में बँधा बताता है, जबकि स्रोत 6 एक ही परिवार में अलग-अलग व्यवसायों का लचीलापन दिखाता है। क्या वह केवल संस्कृत ग्रंथों पर आश्रित था? अध्याय के अनुसार वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों (वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियाँ, मनुस्मृति) पर आश्रित रहा; फिर भी उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और पंजाब व उत्तर भारत की यात्रा की, इसलिए उसकी जानकारी का कुछ भाग उनसे बातचीत और प्रत्यक्ष अनुभव से भी आया होगा।
प्र. एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान कितना आवश्यक है?
उत्तर: बहुत आवश्यक है। भाषा जाने बिना यात्री लोगों से सीधे बात नहीं कर सकता, उनकी प्रथाओं, विश्वासों और विचारों को ठीक से नहीं समझ सकता, और उसे दुभाषियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे ग़लतफ़हमियाँ हो सकती हैं। अल-बिरूनी ने स्वयं भाषा को समझ में पहला अवरोध माना, क्योंकि संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों का अनुवाद आसान नहीं था; इसीलिए उसने संस्कृत सीखी और ग्रंथों का अनुवाद कर सका। जो यात्री स्थानीय भाषा नहीं जानते थे, वे प्रायः अपनी ही पृष्ठभूमि से तुलना करके निष्कर्ष निकालते थे, जो हमेशा सटीक नहीं होते थे।
प्र. नारियल कैसे होते हैं, अपने पाठकों को यह समझाने के लिए इब्न बतूता किस तरह की तुलनाएँ प्रस्तुत करता है? क्या ये तुलनाएँ वाजिब हैं? वो किस तरह से ये दिखाता है कि नारियल असाधारण फल है? बतूता का वर्णन कितना सटीक है?
उत्तर: तुलनाएँ: वह नारियल के वृक्ष की तुलना खजूर के वृक्ष से करता है (हू-बहू खजूर जैसे, अंतर केवल फल में), और फल की तुलना मानव सिर से करता है: दो आँखें और एक मुख, हरा होने पर भीतरी भाग मस्तिष्क जैसा, और रेशा बालों जैसा। वाजिब: ये तुलनाएँ उसके पाठकों के लिए उपयुक्त थीं, क्योंकि उत्तर अफ़्रीका के लोग खजूर और मानव सिर से परिचित थे, इसलिए वे अनजाने फल की कल्पना कर सकते थे। असाधारण: वह इन्हें ‘स्वरूप से सबसे अनोखे तथा प्रकृति में सबसे विस्मयकारी’ वृक्ष कहता है और बताता है कि रेशे से रस्सी बनती है और लोहे की कीलों के बजाय जहाज़ सिले जाते हैं। सटीकता: वर्णन काफ़ी सटीक है (नारियल पर आँख जैसे तीन निशान, भीतर का गूदा, बाहर का रेशा, रस्सी और जहाज़ सिलने में रेशे का प्रयोग सही है), पर ‘मस्तिष्क’ और ‘बाल’ जैसी उपमाएँ शाब्दिक नहीं, केवल समझाने के लिए हैं।
प्र. आपके विचार में इसने इब्न बतूता का ध्यान क्यों खींचा? क्या आप इस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहेंगे?
उत्तर: पान उसके और उसके पाठकों के लिए पूरी तरह अपरिचित था: ऐसा पौधा जिसका कोई फल नहीं होता और जो केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है, और जिसे सुपारी के साथ चबाया जाता है। ऐसी अनोखी चीज़ें उसके श्रोताओं को प्रभावित करती थीं, इसलिए उसने इन्हें विशेष रूप से रेखांकित किया। इस विवरण में जोड़ा जा सकता है कि पान की पत्ती पर प्रायः चूना और कत्था लगाया जाता है, और भारत में पान अतिथि-सत्कार, उत्सवों और धार्मिक अवसरों पर भी दिया जाता है।
प्र. स्थापत्य के कौन से अभिलक्षणों पर इब्न बतूता ने ध्यान दिया? चित्र 5.8 तथा 5.9 से इस वर्णन की तुलना कीजिए।
उत्तर: इब्न बतूता ने ध्यान दिया: शहर के चारों ओर अतुलनीय प्राचीर, जिसकी दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी थी; प्राचीर के भीतर रात्रि के पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष तथा खाद्यसामग्री, हथियार, बारूद और घेरेबंदी की मशीनों के भंडारगृह; प्राचीर के भीतर घुड़सवारों और पैदल सैनिकों के आने-जाने का रास्ता; शहर की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ; निचला भाग पत्थर का और ऊपरी भाग ईंटों का; पास-पास बनी मीनारें; अट्ठाईस दरवाज़े; और क़ब्रगाह में गुंबद और मेहराब वाली क़ब्रें। तुलना: चित्र 5.9 में बस्ती की किलेबंदी की मोटी पत्थर की दीवार और उसकी गोल बुर्ज़नुमा संरचनाएँ उसके विशाल प्राचीर और मीनारों के वर्णन से मेल खाती हैं, और चित्र 5.8 का तुग़लक़ाबाद का मेहराब उसके द्वारा बताए गए मेहराबों और दरवाज़ों की झलक देता है।
प्र. अपने वर्णन में इब्न बतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?
उत्तर: गायकों का यह बाज़ार उसे अनोखा और रोचक लगा: झूलों पर बैठी सजी हुई गायिकाएँ, गुंबद में हर गुरुवार होने वाला गायन-नृत्य, और यह कि हिंदू और मुस्लिम दोनों शासक वहाँ आकर गान सुनते थे। वह जो कुछ अपरिचित और असाधारण था उसे विशेष रूप से रेखांकित करता था, ताकि श्रोता प्रभावित हों और उनका मनोरंजन हो। साथ ही इससे पता चलता है कि बाज़ार केवल आर्थिक विनिमय के स्थान नहीं थे, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र भी थे, जहाँ मस्जिदें भी थीं और प्रदर्शन के स्थान भी।
प्र. क्या आपको लगता है कि पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?
उत्तर: संभवतः नहीं। इस व्यवस्था के लिए हर तीन मील पर घनी आबादी वाले गाँव, हर मील पर तीन अवस्थान, और हर समय तैयार बैठे लोग चाहिए थे, जिन्हें राज्य को संगठित और भुगतान करना पड़ता। ऐसा मुख्य व्यापारिक मार्गों और सुल्तान के नियंत्रण वाले घने बसे क्षेत्रों, जैसे सिंध-मुल्तान-दिल्ली मार्ग, पर ही संभव था। पहाड़ी, जंगली या कम आबादी वाले इलाक़ों में, और जहाँ सुल्तान का नियंत्रण कमज़ोर था, यह व्यवस्था चलाना कठिन रहा होगा।
प्र. इब्न बतूता लोगों के लिए ऐसी वस्तुओं और स्थितियों के वर्णन की समस्या को कैसे हल करता था, जिनसे वे अनभिज्ञ थे और जिन्हें उन्होंने अनुभव नहीं किया था?
उत्तर: वह अनजानी चीज़ों की तुलना अपने पाठकों की परिचित चीज़ों से करता था: नारियल के वृक्ष की खजूर से और फल की मानव सिर से, पान की बेल की अंगूर-लता से, और सुपारी की जायफल से। वह सटीक माप और संख्याएँ भी देता था (दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी, एक हाथ लगभग 20 इंच; अट्ठाईस दरवाज़े; डाक में हर चार मील पर घोड़े), किसी चीज़ के उपयोग की विधि क्रम से बताता था (पान खाने का तरीका, डाक-व्यवस्था की प्रक्रिया), और जो कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित करता था ताकि श्रोता उसकी कल्पना कर सकें।
प्र. बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?
उत्तर: समस्याएँ: कई क्षेत्र रेतीली भूमि या बंजर पर्वत थे; खेती अच्छी नहीं थी और आबादी कम थी; श्रमिकों के अभाव में कृषियोग्य भूमि भी बिना खेती के रह जाती थी; गवर्नरों के बुरे व्यवहार से कई श्रमिक मर जाते थे; लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न कर पाने पर किसानों को जीवन-निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता था और उनके बच्चों को दास बनाकर ले जाया जाता था; इस निरंकुशता से हताश होकर किसान गाँव छोड़ देते थे। पक्ष को सुदृढ़ करना: हाँ, यह विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने के लिए ही लिखा गया था। बर्नियर यूरोप में चल रही बहस में भाग ले रहा था और दिखाना चाहता था कि निजी भूस्वामित्व के अभाव और राजकीय भूस्वामित्व के कारण ऐसी दुर्दशा होती है; उसका विवरण यूरोप में उन लोगों के लिए चेतावनी था जो निजी स्वामित्व की अच्छाइयों को स्वीकार नहीं करते थे। पर इसी कारण उसका चित्रण एकतरफ़ा था, जैसा स्रोत 13 से स्पष्ट होता है।
प्र. बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है? (अध्याय 8 तथा 9 पढ़ने के बाद इस विवरण का फिर से आकलन कीजिए।)
उत्तर: बर्नियर चेतावनी देता है कि यदि यूरोपीय शासकों ने मुग़ल ढाँचे का अनुसरण किया तो उनके राज्य अच्छी तरह जुते, बसे, समृद्ध और फलते-फूलते नहीं रहेंगे; शासक ‘रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा’ बनकर रह जाएँगे; महान शहर और नगर ‘खराब हवा’ के कारण न रहने योग्य और विनाश की स्थिति में होंगे जिनके जीर्णोद्धार की किसी को चिंता नहीं; और खेत टीलों, झाड़ियों अथवा ‘घातक दलदल’ से भरे होंगे। वह इस सारी बर्बादी का एकमात्र कारण राजकीय भूस्वामित्व को बताता है। अध्याय 8 और 9 के बाद यह चित्रण अतिरंजित लगता है: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ राज्य को भूमि का एकमात्र स्वामी नहीं बताता, और ग्रामीण समाज में बड़े ज़मींदारों से लेकर भूमिहीन श्रमिकों तक बहुत विभेद और उत्पादक खेती थी।
प्र. इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?
उत्तर: स्रोत 11 में ग्रामीण अंचल रेतीली भूमि और बंजर पर्वत, खराब खेती, कम आबादी और त्रस्त, गाँव छोड़ते किसानों वाला दिखाया गया है। स्रोत 13 में इसके विपरीत देश का अधिकांश भाग अत्यधिक उपजाऊ बताया गया है: बंगाल चावल, मकई और रेशम, कपास, नील जैसी वाणिज्यिक वस्तुओं में मिस्र से भी आगे है; कई भागों में पर्याप्त जनसंख्या और अच्छी खेती है; शिल्पकार गलीचे, ज़री, कढ़ाई, सोने-चाँदी के वस्त्र और रेशमी-सूती वस्त्र बनाते हैं जो विदेश में निर्यात होते हैं; और विश्व भर का सोना-चाँदी भारत में आकर खो जाता है। यानी स्रोत 13 एक समृद्ध, उत्पादक और व्यापार में आगे देश का चित्र देता है, जो बर्नियर के अपने ही सिद्धांत से मेल नहीं खाता।
प्र. बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालाँकि हर तरफ़ बहुत सक्रियता है पर उन्नति बहुत कम?
उत्तर: वह एक ओर कारखानों के कई कक्षों में कसीदाकारों, सुनारों, चित्रकारों, रोगन लगाने वालों, बढ़ई, खरादी, दर्जी, जूते बनाने वालों और रेशम-ज़री-मलमल के कारीगरों की व्यस्तता का वर्णन करता है, जो पूरे दिन कार्यरत रहते हैं। दूसरी ओर वह कहता है कि वे हर रोज़ सुबह आते और शाम को घर लौट जाते हैं, ‘इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है’, और ‘कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ था’। इस प्रकार दैनिक गतिविधि की भरमार और जीवन में सुधार की इच्छा के अभाव को साथ रखकर वह सक्रियता के बावजूद उन्नति न होने का भाव प्रेषित करता है।
प्र. आपके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की?
उत्तर: बर्नियर अपनी ही पृष्ठभूमि, यानी यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस, के आधार पर भारत को समझ रहा था, इसलिए तुलना स्वाभाविक थी। पर उसका उद्देश्य इससे आगे था: वह नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना चाहता था ताकि वे वे निर्णय लें जिन्हें वह सही मानता था। भारत को यूरोप के विपरीत (द्वि-विपरीतता) और निम्न दिखाकर वह यूरोप की श्रेष्ठता और निजी स्वामित्व की अच्छाइयों को रेखांकित करता था, और यूरोपीय शासकों को चेतावनी देता था कि मुग़ल ढाँचा अपनाने से उनके राज्य भी बर्बाद हो जाएँगे। उसकी प्रमुख कृति फ्रांस के राजा लुई XIV को समर्पित थी और कई रचनाएँ प्रभावशाली अधिकारियों को पत्रों के रूप में लिखी गई थीं।
प्र. आपके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्न बतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा?
उत्तर: ये यात्री पुरुष थे और प्रायः दरबारों, शासकों, विद्वानों और नगरों के बीच रहते थे; सामान्य महिला श्रमिकों से उनका संपर्क कम था। वे वही दर्ज करते थे जो उन्हें असाधारण, अनोखा या अपने तर्क के लिए उपयोगी लगता था, जैसे दासियाँ और सती प्रथा; यूरोपीय यात्रियों के लिए महिलाओं से होने वाला बर्ताव पश्चिमी और पूर्वी समाजों में भिन्नता का संकेतक था। खेती और शिल्प-उत्पादन में महिलाओं का श्रम रोज़मर्रा की सामान्य बात थी, इसलिए उन्हें यह उल्लेखनीय नहीं लगा; कभी-कभी वे सामाजिक पक्षपात को ‘सामान्य’ परिस्थिति मान लेते थे। फिर भी अध्याय बताता है कि महिलाओं का श्रम कृषि और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था।
प्र. यहाँ यातायात के कौन-कौन से साधन अपनाए गए हैं?
उत्तर: मथुरा से मिली इस मूर्ति में यात्री घोड़ों पर सवार दिखाए गए हैं, एक ढकी हुई गाड़ी (पहियों वाला रथ जैसा वाहन) घोड़ों द्वारा खींची जा रही है, और कुछ लोग पैदल चल रहे हैं। यानी घुड़सवारी, पशुओं से खींची जाने वाली गाड़ी और पैदल यात्रा, तीनों साधन दिखाए गए हैं।