आख़िरी वक़्त की रिवीज़न के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, ज़रूरी तथ्य, तारीख़ें और तालिकाएँ। पूरी व्याख्या वाले विस्तृत नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 पूरा अध्याय एक फ़्रेम में
यात्रियों के नज़रिए (लगभग दसवीं-सत्रहवीं सदी)
अल-बिरूनीकिताब-उल-हिन्द (80 अध्याय), जाति-व्यवस्था की ब्राह्मणीय व्याख्या, अनुष्ठानिक अपवित्रता का अस्वीकरण
इब्न बतूतारिह्ला, दिल्ली का क़ाज़ी, नारियल-पान, दिल्ली की प्राचीर, डाक-व्यवस्था
बर्नियरद्वि-विपरीतता, “कोई निजी संपत्ति नहीं” दावा, प्राच्य निरंकुशवाद व एशियाई उत्पादन शैली पर प्रभाव
| यात्री |
मूल स्थान |
भारत में समय |
| अल-बिरूनी |
ख़्वारिज़्म (उज़्बेकिस्तान) |
ग्यारहवीं सदी, ग़ज़नवी दरबार से जुड़ाव |
| इब्न बतूता |
तैंजियर (मोरक्को) |
1332-33 से 1342 तक, दिल्ली का क़ाज़ी |
| फ्रांस्वा बर्नियर |
फ़्रांस |
1656-1668, बारह वर्ष, मुग़ल दरबार से जुड़ाव |
2 याद रखने लायक़ आँकड़े
80किताब-उल-हिन्द के अध्याय
12वर्ष बर्नियर भारत में रहे (1656-1668)
15%सत्रहवीं सदी में नगरों में रहने वाली जनसंख्या
| आँकड़ा |
किस बात का |
| 28 |
दिल्ली के द्वार, इब्न बतूता के अनुसार (बदायूँ दरवाज़ा सबसे बड़ा) |
| ग्यारह हाथ |
दिल्ली की प्राचीर की दीवार की चौड़ाई |
| 50 दिन बनाम 5 दिन |
सिंध-दिल्ली सामान्य यात्रा बनाम डाक-व्यवस्था से सूचना पहुँचने का समय |
| 8 बार / 3 बार |
बर्नियर का वृत्तांत फ़्रांसीसी में आठ बार (1670-1725) और अंग्रेज़ी में तीन बार (1684 तक) पुनर्मुद्रित |
| चार भाषाएँ |
बर्नियर का वृत्तांत (1670-71) पाँच वर्षों के भीतर अंग्रेज़ी, डच, जर्मन, इतालवी में अनूदित |
3 तारीख़ें एक नज़र में
| तारीख़ |
क्या हुआ |
| 973 |
अल-बिरूनी का जन्म, ख़्वारिज़्म में |
| 1017 |
सुल्तान महमूद का ख़्वारिज़्म पर आक्रमण, विद्वानों सहित अल-बिरूनी ग़ज़नी ले जाए गए |
| 1048 |
अल-बिरूनी की मृत्यु, ग़ज़नी में, 70 वर्ष की आयु में |
| 1304-77 |
इब्न बतूता का जीवनकाल |
| 1332-33 |
इब्न बतूता का भारत के लिए प्रस्थान |
| 1342 |
इब्न बतूता चीन के मंगोल शासक के पास दूत बनाकर भेजे गए |
| 1347 |
इब्न बतूता की घर वापसी की शुरुआत (चीन-यात्रा के बाद) |
| 1354 |
इब्न बतूता तैंजियर लौटे, प्रस्थान के लगभग तीस वर्ष बाद |
| 1413-82 |
अब्दुर रज़्ज़ाक़ समरक़ंदी का जीवनकाल (दक्षिण भारत यात्रा, 1440 के दशक) |
| 1620-88 |
फ्रांस्वा बर्नियर का जीवनकाल |
| 1656-1668 |
बर्नियर का भारत-प्रवास, बारह वर्ष |
| 1670-71 |
बर्नियर की रचनाएँ फ़्रांस में प्रकाशित |
| 1684 |
बर्नियर के वृत्तांत का अंग्रेज़ी में तीसरा पुनर्मुद्रण |
4 सभी परिभाषाएँ एक जगह
| शब्द |
अर्थ |
| मापतंत्र विज्ञान (metrology) |
मापन का विज्ञान |
| किताब-उल-हिन्द |
अल-बिरूनी की अरबी रचना, 80 अध्याय, धर्म-दर्शन-मापतंत्र विज्ञान आदि पर |
| रिह्ला |
इब्न बतूता के यात्रा-वृत्तांतों का संकलन, इब्न जुज़ाई द्वारा लिखित रूप में |
| वर्ण |
ब्राह्मणीय ग्रंथों में वर्णित चार सामाजिक श्रेणियाँ (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) |
| अंत्यज |
‘व्यवस्था के बाहर जन्मे’, सामाजिक रूप से उत्पीड़ित पर आर्थिक रूप से अपरिहार्य समूह |
| द्वि-विपरीतता |
बर्नियर की विधि, भारत को यूरोप के व्यवस्थित विपरीत के रूप में प्रस्तुत करना |
| प्राच्य निरंकुशवाद (oriental despotism) |
मॉन्टेस्क्यू का विचार कि एशियाई शासकों के पास बिना निजी संपत्ति के पूर्ण सत्ता थी |
| एशियाई उत्पादन शैली |
कार्ल मार्क्स की अवधारणा: राज्य द्वारा निचोड़ी जाने वाली आत्मनिर्भर ग्राम-व्यवस्था |
| उलुक / दावा |
घोड़े की डाक / पैदल डाक-व्यवस्था |
| संदेशवाहक (पैदल डाक) |
ताँबे की घंटियों वाली छड़ लेकर अगले अवस्थान तक दौड़ने वाला डाक-वाहक |
| कारख़ाना |
शिल्पियों के लिए शाही कार्यशाला |
| महाजन / सेठ / नगर सेठ |
सेठ के नेतृत्व वाला व्यापारी-निकाय / उसका मुखिया / अहमदाबाद के व्यापारी-निकाय का प्रमुख |
| क़ाज़ी |
न्यायाधीश; इब्न बतूता दिल्ली और मालदीव दोनों में इस पद पर रहे |
5 तीन यात्री एक नज़र में
| यात्री |
क्या याद रखें |
| अल-बिरूनी (973-1048) |
ख़्वारिज़्म में जन्म; 1017 में सुल्तान महमूद के आक्रमण के बाद ग़ज़नी लाया गया; अरबी में किताब-उल-हिन्द लिखी, जो लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथों पर आश्रित है; समझने में तीन बाधाएँ बताईं: भाषा, धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता, और अभिमान |
| इब्न बतूता (1304-77) |
तैंजियर (मोरक्को) में जन्म; पुस्तकों के बजाय यात्राओं से मिले अनुभव को महत्त्व दिया; 1333 में सिंध पहुँचा; मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने उसे दिल्ली का क़ाज़ी बनाया; बाद में सुल्तान का दूत बनाकर चीन भेजा गया; उसका रिह्ला अरबी में है |
| फ्रांस्वा बर्नियर (1620-88) |
फ़्रांस का चिकित्सक और दार्शनिक; 1656-68 तक बारह वर्ष भारत में; दारा शिकोह का चिकित्सक, बाद में दानिशमंद ख़ान के साथ बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में; भारत की तुलना यूरोप से करते हुए निजी भू-स्वामित्व के अभाव का तर्क दिया |
6 कौन क्या
| नाम |
किस बात के लिए याद रखें |
| सुल्तान महमूद |
ग़ज़नी का शासक; 1017 में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण किया और अल-बिरूनी को ग़ज़नी ले गया |
| इब्न जुज़ाई |
मोरक्को के शासक के निर्देश पर इब्न बतूता की बताई यात्राओं को लिखा |
| मुहम्मद बिन तुग़लक़ |
दिल्ली का सुल्तान; इब्न बतूता को क़ाज़ी नियुक्त किया |
| अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी |
हेरात से आया राजनयिक; कालीकट को “विचित्र देश” बताया, पर मंगलौर के पास एक मंदिर की बहुत प्रशंसा की |
| दारा शिकोह |
शाहजहाँ का सबसे बड़ा बेटा; बर्नियर उसका चिकित्सक था |
| दानिशमंद ख़ान |
मुग़ल दरबार का एक आर्मीनियाई अमीर; बर्नियर बाद में उसके साथ बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में रहा |
| अबुल फ़ज़्ल |
अकबर का इतिहासकार; भू-राजस्व को “राजत्व का पारिश्रमिक” बताया, जो बर्नियर के दावे के विपरीत है |
| मॉन्टेस्क्यू |
बर्नियर के वृत्तांत के आधार पर प्राच्य निरंकुशवाद का विचार विकसित किया |
| कार्ल मार्क्स |
उन्नीसवीं शताब्दी में इसी विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया |
| पेलसर्ट |
डच यात्री, जिसका ग्रामीण ग़रीबी का वर्णन बर्नियर के वर्णन की पुष्टि करता है |
7 फटाफट पुनरावृत्ति · परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
तीन बिल्कुल भिन्न यात्री, तीन भिन्न नज़रिए: अल-बिरूनी (उज़्बेकिस्तान, ग्यारहवीं सदी) ने किताब-उल-हिन्द में धर्म-दर्शन पर ध्यान दिया, अपनी समझ की तीन बाधाएँ (भाषा, धार्मिक भेद, अभिमान) गिनाईं, फिर भी लगभग पूरी तरह ब्राह्मणीय ग्रंथों पर निर्भर रहे; उन्होंने वर्ण-व्यवस्था स्वीकार की पर अनुष्ठानिक अपवित्रता के विचार को प्रकृति से तर्क देकर अस्वीकार किया। इब्न बतूता (मोरक्को, चौदहवीं सदी) ने पुस्तकों से अधिक यात्रा-अनुभव को महत्व दिया, दिल्ली और मालदीव में क़ाज़ी रहे, और जो कुछ भी अपरिचित था उसे उजागर किया: नारियल, पान, दिल्ली की अट्ठाईस द्वार वाली प्राचीर, और उलुक-दावा डाक-व्यवस्था जिससे सिंध-दिल्ली की सूचना केवल पाँच दिन में पहुँचती थी। फ्रांस्वा बर्नियर (फ़्रांस, सत्रहवीं सदी) ने द्वि-विपरीतता की विधि अपनाई, भारत को यूरोप से हीन दिखाने के लिए, अपना पूरा तर्क “भूमि में कोई निजी संपत्ति नहीं” के झूठे दावे पर खड़ा किया, अबुल फ़ज़ल के अनुसार भूमि-राजस्व वास्तव में फ़सल पर कर था, स्वामित्व का प्रमाण नहीं। यह दावा सीधे मॉन्टेस्क्यू के प्राच्य निरंकुशवाद और मार्क्स की एशियाई उत्पादन शैली में गया, यद्यपि बर्नियर का अपना प्रमाण (सोने-चाँदी का प्रवाह, समृद्ध व्यापारी समुदाय) कभी-कभी उनके ही सिद्धांत को कमज़ोर करता है। तीनों वृत्तांतों में स्त्रियाँ मुख्यतः दासियों या सती-पीड़िताओं के रूप में दिखती हैं; उनका रोज़मर्रा आर्थिक जीवन लगभग पूरी तरह अनुपस्थित है।
इसी अध्याय की बाक़ी सामग्री