विजयनगर, “विजय का नगर”, एक नगर और एक साम्राज्य दोनों के लिए नाम, चौदहवीं सदी में स्थापित, अपने चरम पर कृष्णा नदी से प्रायद्वीप की नोक तक फैला हुआ। 1565 में लूटा गया और शीघ्र ही त्याग दिया गया, यह केवल स्थानीय स्मृति में हम्पी के नाम से बचा रहा, मातृ-देवी पम्पादेवी के नाम पर, जब तक मौखिक परंपरा, पुरातत्व, अभिलेख और अन्य अभिलेखों ने विद्वानों को साम्राज्य को फिर से जोड़ने में सक्षम नहीं बनाया।
1 हम्पी की खोज
इन खंडहरों को 1800 में कर्नल कॉलिन मैकेन्जी, एक ईस्ट इंडिया कंपनी इंजीनियर और पुरातत्व-प्रेमी, ने प्रकाश में लाया, जिन्होंने स्थल का पहला सर्वेक्षण मानचित्र तैयार किया, अपनी आरंभिक अधिकतर जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों से लेते हुए। 1856 से, फ़ोटोग्राफ़रों ने स्मारकों को दर्ज करना शुरू किया; 1836 से, पुरालेखविदों ने हम्पी के मंदिरों के अनेक अभिलेख एकत्र किए। इतिहासकारों ने फिर इन सबको विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और तेलुगु, कन्नड़, तमिल व संस्कृत साहित्य के साथ मिलाया।
1754 ई. में जन्मे कॉलिन मैकेन्जी ने एक अभियंता, सर्वेक्षक, तथा मानचित्रकार के रूप में प्रसिद्धि हासिल की। 1815 में उन्हें भारत का पहला सर्वेयर जनरल बनाया गया और 1821 में अपनी मृत्यु तक वे इस पद पर बने रहे। भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के लिए उन्होंने इतिहास से संबंधित स्थानीय परंपराओं का संकलन तथा ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण करना आरंभ किया। वे कहते हैं, ‘ब्रिटिश प्रशासन के सुप्रभाव में आने से पहले दक्षिण भारत खराब प्रबंधन की दुर्गति से लंबे समय तक जूझता रहा।’ विजयनगर के अध्ययन से मैकेन्जी को यह विश्वास हो गया कि कंपनी, ‘स्थानीय लोगों के अलग-अलग कबीलों, जो इस समय भी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा थे, को अब भी प्रभावित करने वाले इनमें से कई संस्थाओं, कानूनों तथा रीति-रिवाज़ों के विषय में बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ’ हासिल कर सकती थी।
2 राय, नायक और सुल्तान
परंपरा और अभिलेख दो भाइयों, हरिहर और बुक्का, को 1336 में साम्राज्य की स्थापना का श्रेय देते हैं, जिन्होंने अनेक भाषाओं और अनेक धर्मों के लोगों पर शासन किया। समकालीन लोग इसे “विजयनगर साम्राज्य” नहीं, बल्कि कर्नाटक साम्राज्यमु कहते थे, यह शब्द बाद में इतिहासकारों ने गढ़ा।
अपनी उत्तरी सीमा पर, विजयनगर उपजाऊ नदी घाटियों और समुद्री व्यापार के राजस्व के लिए दक्कन के सुल्तानों और उड़ीसा के गजपति (“हाथियों के स्वामी”) शासकों से प्रतिस्पर्धा करता था, फिर भी उनके बीच स्थापत्य विचार स्वतंत्र रूप से आते-जाते रहे।
विजयनगर की अपनी लोक-परंपरा अपने प्रतिद्वंद्वियों को इस आधार पर नामित करती थी कि उनके पास क्या था: दक्कन के सुल्तानों को अश्वपति (घोड़ों के स्वामी), और अपने ही राय को नरपति (मनुष्यों के स्वामी) कहा जाता था।
साम्राज्य ने पहले से मज़बूत मंदिर-परंपराओं वाले क्षेत्रों को समाहित किया, चोलों का तमिलनाडु और होयसालों का कर्नाटक, तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर और बेलूर के चन्नकेशव मंदिर का घर, और विजयनगर के अपने शासकों ने, जो स्वयं को राय कहते थे, इन परंपराओं पर निर्माण करते हुए इन्हें और विस्तार दिया।
2.1 राजा और व्यापारी
घुड़सवार युद्ध ने अरब और मध्य एशिया से आयातित घोड़ों को अनिवार्य बना दिया; अरब व्यापारी और स्थानीय कुदिरई चेट्टी (घोड़ा-व्यापारी) 1498 तक इस व्यापार को नियंत्रित करते रहे, जब पुर्तगाली पश्चिमी तट पर पहुँचे, उनकी बेहतर सामरिक तकनीक, विशेष रूप से बंदूकों के प्रयोग ने उन्हें इस काल की उलझी हुई राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बनकर उभरने में सहायता की। मसालों, वस्त्रों और बहुमूल्य पत्थरों में विजयनगर के अपने बाज़ार स्वयं नगर के दर्जे का संकेत थे, और वह व्यापार-राजस्व सीधे राज्य की समृद्धि को पोषित करता था।
शासनकला पर अपनी तेलुगु कृति अमुक्तमल्यद में व्यापारियों के विषय में कृष्णदेव राय ने लिखा: ‘एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके… उसे प्रबंध करना चाहिए कि उन विदेशी नाविकों जिन्हें तूफानों, बीमारी या थकान के कारण उनके देश में उतरना पड़ता है, की भली-भाँति देखभाल की जा सके… सुदूर देशों के व्यापारियों, जो हाथियों और अच्छे घोड़ों का आयात करते हैं, को रोज बैठक में बुलाकर, तोहफ़े देकर तथा उचित मुनाफे की स्वीकृति देकर अपने साथ संबद्ध करना चाहिए। ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।’
2.2 साम्राज्य का चरम और पतन
यह मत लिखें कि विजयनगर और दक्कन की सल्तनतें निरंतर धार्मिक शत्रुता में बँधी थीं। कृष्णदेव राय ने सल्तनतों के भीतर प्रतिद्वंद्वी दावेदारों का समर्थन किया और “यवन राज्य का संस्थापक” (यवन = यूनानियों और अन्य उत्तर-पश्चिमी लोगों के लिए संस्कृत शब्द) की उपाधि ली; बीजापुर के सुल्तान ने एक बार विजयनगर के उत्तराधिकार-विवाद को सुलझाने में मदद भी की। तालीकोटा रामराय की अपनी नीति के कारण हुआ, जो एक सुल्तान को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करता रहा, अंततः उन्हें उसके विरुद्ध गठबंधन के लिए बाध्य कर दिया, न कि किसी स्थायी युद्ध-स्थिति के कारण।
मानचित्र 1 (पुस्तक, पृष्ठ 174) के प्रमुख स्थान, दक्षिण भारत, लगभग चौदहवीं-अठारहवीं शताब्दी:
| प्रकार | स्थान |
|---|---|
| साम्राज्य की राजधानी | विजयनगर (तुंगभद्रा नदी के तट पर) |
| दक्कन की सल्तनतों के केंद्र | बीजापुर, गोलकुंडा, गुलबर्गा, बीदर |
| नायक शक्ति के केंद्र | चंद्रगिरि, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर, मैसूर, जिंजी |
| तटीय नगर और बंदरगाह | पश्चिम में गोवा, भटकल, मंगलौर, कालीकट, कोचीन, क्विलोन; पूर्व में मसुलिपटनम, मैलापुर |
| मानचित्र पर अन्य नगर | कांचीपुरम, कोलार, तिरुनेलवेली (मानचित्र पर ‘तिरुवल्ली’ छपा है), चित्रदुर्ग, चिंदम्बरम, रामानाथपुरम, वारंगल, हैदराबाद, बसरूर (बारसिलोर), कन्ननोर |
| प्रमुख नदियाँ | कृष्णा, भीमा, तुंगभद्रा, पेन्नार, कावेरी, वैगई |
इस अध्याय की CBSE मानचित्र-सूची (2026-27): मानचित्र 1 के ये दस स्थान इस अध्याय का पाठ्यक्रम मानचित्र-कार्य हैं।
| स्थान | आज कहाँ है | मानचित्र पर क्यों |
|---|---|---|
| विजयनगर | हम्पी, कर्नाटक, तुंगभद्रा नदी के तट पर | साम्राज्य की राजधानी |
| बीदर | उत्तर-पूर्वी कर्नाटक | दक्कन की सल्तनतों का एक केंद्र |
| गोलकुंडा | हैदराबाद के पास, तेलंगाना | दक्कन सल्तनत; बीजापुर और अहमदनगर के साथ मिलकर 1565 में रामराय को हराया |
| बीजापुर | उत्तरी कर्नाटक | दक्कन सल्तनत; 1565 के गठबंधन में शामिल |
| चंद्रगिरि | तिरुपति के पास, आंध्र प्रदेश | नायक शक्ति का केंद्र; बाद में अराविदु शासकों का केंद्र |
| कांचीपुरम | उत्तरी तमिलनाडु, पूर्वी तट के पास | मानचित्र 1 पर अंकित नगर |
| मैसूर | दक्षिणी कर्नाटक | नायक शक्ति का केंद्र |
| तंजावुर | कावेरी डेल्टा, तमिलनाडु | नायक शक्ति का केंद्र |
| कोलार | दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक | मानचित्र 1 पर अंकित नगर |
| तिरुनेलवेली | तमिलनाडु का सुदूर दक्षिण | मानचित्र 1 पर अंकित नगर (वहाँ ‘तिरुवल्ली’ छपा है), दक्षिणी सिरे के पास |
पहले तुंगभद्रा के तट पर विजयनगर लगाइए। सल्तनतों के तीनों नगर इसके उत्तर में हैं: बीजापुर (उत्तर-पश्चिम), बीदर (उत्तर) और गोलकुंडा (उत्तर-पूर्व, हैदराबाद के पास)। चंद्रगिरि और कांचीपुरम पूर्वी तट की ओर हैं; मैसूर और कोलार दक्षिण के पठार पर; तंजावुर कावेरी डेल्टा में; और तिरुनेलवेली दक्षिणी सिरे के पास।

2.3 राय और नायक
नायक कहलाने वाले सैन्य मुखिया, सामान्यतः तेलुगु या कन्नड़ बोलने वाले, दुर्गों और सशस्त्र अनुयायियों को नियंत्रित करते थे और अक्सर बसने वाले किसानों को साथ लेकर चलते थे; कई विजयनगर के अधीन हो गए, पर विद्रोह आम था।
अमर-नायक प्रणाली, संभवतः दिल्ली सल्तनत की इक्ता व्यवस्था से व्युत्पन्न, अमर-नायकों को राय की ओर से शासन करने के लिए क्षेत्र देती थी। वे किसानों, शिल्पियों और व्यापारियों से कर वसूलते, राजस्व का एक भाग अपने लिए और घोड़ों व हाथियों की एक निश्चित टुकड़ी बनाए रखने के लिए रखते (जिससे राजाओं को एक प्रभावी संयुक्त सैन्य शक्ति मिलती), और कुछ राजस्व मंदिरों व सिंचाई पर ख़र्च करते थे। वे वार्षिक श्रद्धांजलि भेजते और उपहारों सहित स्वयं दरबार में उपस्थित होते थे; राजा कभी-कभी उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर उन पर अपना नियंत्रण दर्शाता था। अमर संभवतः संस्कृत समर (युद्ध) से व्युत्पन्न है, और फ़ारसी अमीर की गूँज है।
सत्रहवीं सदी के दौरान कई अमर-नायक स्वतंत्र राजाओं के रूप में अलग हो गए, जिससे केंद्रीय साम्राज्यिक संरचना का पतन तेज़ हुआ।
3 विजयनगर: राजधानी और उसके आसपास
स्रोतों में मंदिर-दान दर्ज करने वाले राजकीय और नायक अभिलेख, और यात्री-वृत्तांत शामिल हैं: निकोलो दे कॉन्ती (इटली), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारसी राजदूत), अफ़ानासी निकितिन (रूस), ये सभी पंद्रहवीं सदी के, और दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस व फर्नाओ नूनिज़ (पुर्तगाल), सोलहवीं सदी के।
डोमिंगो पेस: ‘इस शहर का परिमाप मैं यहाँ नहीं लिख रहा हूँ क्योंकि यह एक स्थान से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, पर मैं एक पहाड़ पर चढ़ा जहाँ से मैं इसका एक बड़ा भाग देख पाया। मैं इसे पूरी तरह से नहीं देख पाया क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर; इसमें पेड़ों के कई उपवन हैं, आवासों के बगीचों में, तथा पानी की कई नालियाँ जो इसमें आती हैं, तथा कई स्थानों पर झीलें हैं; तथा राजा के महल के समीप ही खजूर के पेड़ों का बगीचा तथा अन्य फल प्रदान करने वाले वृक्ष थे।’
3.1 जल-संसाधन
नगर तुंगभद्रा से बने एक प्राकृतिक बेसिन में स्थित है, ग्रेनाइट पहाड़ियों से घिरा, प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में, जिसने वर्षा-जल संग्रहण को अनिवार्य बना दिया। पहाड़ी झरनों के आर-पार बाँधों ने जलाशय बनाए; सबसे महत्वपूर्ण, पंद्रहवीं सदी के आरंभ का कमलपुरम् जलाशय, ने निकटवर्ती खेतों की सिंचाई की और नहर से “राजकीय केंद्र” तक पानी पहुँचाया। हिरिया नहर, तुंगभद्रा के एक बाँध से पानी लेते हुए और संभवतः संगम राजवंश के अधीन बनी, ने वह घाटी सींची जो “धार्मिक केंद्र” को “शहरी केंद्र” से अलग करती थी।
कृष्णदेव राय द्वारा बनवाए गए जलाशय के विषय में पेस लिखता है: ‘राजा ने एक जलाशय बनवाया… दो पहाड़ियों के मुख-विबर पर जिससे दोनों में से किसी पहाड़ी से आने वाला सारा जल वहाँ इकट्ठा हो, इसके अलावा जल 9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक की दूरी से पाइपों से आता है जो बाहरी शृंखला के निचले हिस्से के साथ-साथ बनाए गए थे। यह जल एक झील से लाया जाता है जो छलकाव से खुद एक छोटी नदी में मिलती है। जलाशय में तीन विशाल स्तंभ बने हैं जिन पर खूबसूरती से चित्र उकेरे गए हैं; ये ऊपरी भाग में कुछ पाइपों से जुड़े हुए हैं जिनसे ये अपने बगीचों तथा धान के खेतों की सिंचाई के पानी लाते हैं। इस जलाशय को बनाने के लिए इस राजा ने एक पूरी पहाड़ी को तुड़वा दिया… जलाशय में मैंने इतने लोगों को कार्य करते देखा कि वहाँ पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चीटियों की तरह…’
3.2 दुर्गीकरण और सड़कें
अब्दुर रज़्ज़ाक ने केवल नगर ही नहीं बल्कि इसकी कृषि-भूमि और वनों को भी घेरने वाली दुर्ग की सात पंक्तियों का वर्णन किया: सबसे बाहरी दीवार आसपास की पहाड़ियों को जोड़ती थी, बिना गारे के आवश्यकता वाले पच्चर-आकार के पत्थर-खंडों से बनी, भीतर मिट्टी और मलबे से भरी, और उभरे वर्गाकार या आयताकार गढ़ों सहित।
यह मत मानें कि दुर्गीकृत क्षेत्रों में केवल इमारतें थीं। अब्दुर रज़्ज़ाक लिखता है कि ‘पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं’, जिसकी पुष्टि पेस और आज के पुरातत्व दोनों करते हैं। खेती की भूमि को घेरना बड़े अन्न-भंडारों की सामान्य घेराबंदी-रक्षा का एक जान-बूझकर किया गया, महँगा विकल्प था: घिरा हुआ विजयनगर अपनी ही दीवारों के भीतर की भूमि से स्वयं को पोषित कर सकता था।
दूसरी दुर्ग-रेखा शहरी केंद्र को घेरती थी, तीसरी राजकीय केंद्र को, और वहाँ हर प्रमुख भवन-परिसर की अपनी ऊँची दीवार थी। प्रवेश-द्वारों में इंडो-इस्लामी स्थापत्य के मेहराब और गुंबद प्रयुक्त थे, जो तुर्की सुल्तानों द्वारा लाए गए और स्थानीय निर्माण-प्रथा के साथ परस्पर-क्रिया से अनुकूलित। सड़कें चट्टानी भूमि से बचते हुए घाटियों से होकर घुमावदार चलती थीं, और प्रमुख सड़कें बाज़ारों से घिरे मंदिर-द्वारों से निकलती थीं।
3.3 शहरी केंद्र
सामान्य आवास का लगभग कुछ भी नहीं बचा है। शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने में मिला उत्कृष्ट चीनी चीनी-मिट्टी, और स्थानीय मंडप-शैलियों की गूँज वाली क़ब्रों और मस्जिदों सहित एक मुस्लिम आवासीय मोहल्ला, संकेत देते हैं कि धनी व्यापारी वहाँ रहते थे। बरबोसा सामान्य लोगों के आवासों (जो अब अस्तित्व में नहीं हैं) का वर्णन करता है: ‘लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।’ केंद्र भर में बिखरे अनेक छोटे तीर्थ कई समानांतर पंथों की ओर इशारा करते हैं, जबकि कुएँ और मंदिर/वर्षा-जल तालाब सामान्य निवासियों की जल-आवश्यकताएँ पूरी करते थे।
4 राजकीय केंद्र
दक्षिण-पश्चिम में स्थित, राजकीय केंद्र में 60 से भी अधिक मन्दिर सम्मिलित थे, क्योंकि मंदिरों और पंथों का आश्रय राजाओं द्वारा अपनी सत्ता को वैध ठहराने के केंद्र में था। लगभग 30 परिसरों को राजमहल के रूप में पहचाना गया है, बड़े पर अनुष्ठानिक प्रयोजन वाले नहीं; मंदिरों के विपरीत, जो पूरी तरह चिनाई से बने थे, राजमहल की ऊपरी संरचनाओं में नाशवान सामग्री प्रयुक्त हुई, यही कारण है कि आज इनका इतना कम बचा है।
“राजा के महल” का घेरा, सबसे बड़ा, राजकीय निवास होने का कोई निश्चित प्रमाण नहीं रखता, पर इसमें दो सबसे उल्लेखनीय चबूतरे हैं: “सभा मंडप”, जिसमें पास-पास लकड़ी के खंभों के गड्ढे होने से खाली फ़र्श कम बचता है (इसलिए इसका सटीक प्रयोजन स्पष्ट नहीं है), और स्वयं महानवमी डिब्बा, 11,000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट ऊँचा उठता हुआ, जो कभी एक लकड़ी की संरचना को सहारा देता था, इसका आधार उभरे शिल्प-फलकों से उकेरा गया है।
“इन इमारतों में एक के ऊपर एक दो चबूतरे हैं, सुंदर रूप से तराशे गए… ऊपरी चबूतरे पर… इस विजय-भवन में राजा का एक कमरा है जो कपड़े से बना है… जहाँ मूर्ति का एक तीर्थ है… और दूसरे में, बीच में, एक मंच रखा है जिस पर राजसी सिंहासन खड़ा है, (मुकुट और राजसी पायल)…”
यहाँ के अनुष्ठान संभवतः दस-दिवसीय शरद उत्सव के महानवमी (“महान नौवें दिन”) के साथ मेल खाते थे, जिसे अन्यत्र दशहरा, दुर्गा पूजा या नवरात्री कहा जाता है: मूर्ति और राजकीय घोड़े की पूजा, पशु-बलि, नृत्य, कुश्ती, सजे घोड़ों, हाथियों और रथों के जुलूस, और नायकों व अधीनस्थ राजाओं द्वारा अनुष्ठानिक प्रस्तुतियाँ, जो एक अंतिम सैन्य निरीक्षण में परिणत होतीं जहाँ नायक उपहार और श्रद्धांजलि देते। क्या बचा हुआ चबूतरा वास्तव में इन भीड़ों को समा सकता था, यह वास्तव में विवादित है; विद्वान नोट करते हैं कि आसपास की जगह वर्णित जुलूस के पैमाने के लिए बहुत छोटी लगती है, इसलिए यह संरचना, अध्याय के ही शब्दों में, एक पहेली बनी हुई है।
4.2 राजकीय केंद्र की अन्य इमारतें
कमल महल, जिसका नाम उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश यात्रियों ने रखा (एक नाम जिसके इसके वास्तविक प्रयोग से मेल खाने के बारे में इतिहासकार निश्चित नहीं हैं, संभवतः एक मैकेन्जी-युगीन मानचित्र के अनुसार एक परिषद-कक्ष), तथाकथित “हाथियों के अस्तबल” के निकट स्थित है, जिसका वास्तविक प्रयोजन भी विवादित है। हज़ार राम मंदिर, संभवतः राजा के परिवार के लिए आरक्षित, ने अपनी केंद्रीय मूर्तियाँ खो दी हैं पर रामायण के दृश्यों वाले उकेरे भित्ति-फलक बनाए रखे हैं। विजयनगर की लूट के बाद भी, क्षेत्र भर के नायक उन्हीं राजमहल-परंपराओं में निर्माण करते रहे, जिनमें से कई आज भी बची हैं।
5 धार्मिक केंद्र
5.1 राजधानी चुनना
नगर के चट्टानी उत्तरी छोर पर, स्थानीय परंपरा रामायण के वाली और सुग्रीव के वानर-राज्य को रखती है; एक अन्य परंपरा मानती है कि स्थानीय मातृ-देवी पम्पादेवी ने यहाँ राज्य के संरक्षक देवता और शिव के एक रूप विरुपाक्ष से विवाह के लिए तप किया, एक विवाह जो आज भी विरुपाक्ष मंदिर में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। विजयनगर-पूर्व जैन मंदिर भी इन पहाड़ियों के बीच खड़े हैं, अर्थात साम्राज्य के अस्तित्व में आने से पहले ही यहाँ कई पवित्र परंपराएँ मिल चुकी थीं।
क्षेत्र में मंदिर-निर्माण पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल तक जाता है: मंदिर शिक्षा-केंद्र और, भूमि-अनुदानों के माध्यम से, आर्थिक केंद्र दोनों का काम करते थे, जबकि शासक स्वयं को दैवी से जोड़ने के लिए मंदिर-आश्रय का प्रयोग करते थे। विजयनगर के राजाओं ने विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा किया, राजकीय आदेशों पर कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष” हस्ताक्षर करते हुए, और हिन्दू सूरतराणा, अरबी “सुल्तान” का एक संस्कृतकृत रूप जिसका शाब्दिक अर्थ है “हिंदू सुल्तान”, की उपाधि ली। उन्होंने नवाचार भी किया: राजकीय चित्र-मूर्तिकला अब मंदिरों के भीतर दिखाई देने लगी, और राजकीय मंदिर-यात्राएँ साम्राज्य के नायकों की उपस्थिति वाले प्रमुख राजकीय अवसर बन गईं।
5.2 गोपुरम और मंडप
इस काल में एक नया स्थापत्य पैमाना उभरा: राय गोपुरम (राजकीय प्रवेश-द्वार) अक्सर केंद्रीय तीर्थ के अपने ही शिखर को बौना बना देते थे, दूर से मंदिर की उपस्थिति की घोषणा करते हुए और शासक के संसाधनों, कौशल और तकनीक पर नियंत्रण प्रदर्शित करते हुए। मंदिरों में विस्तृत मंडप (मंडप-कक्ष) और लंबे स्तंभयुक्त गलियारे भी उभरे।
विरुपाक्ष मंदिर
- सबसे पुराना तीर्थ नौवीं-दसवीं सदी का है, साम्राज्य की स्थापना के बाद पर्याप्त रूप से विस्तृत किया गया
- कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण को चिह्नित करने के लिए मुख्य तीर्थ के सामने हॉल बनवाया, उकेरे स्तंभों से सजाया, और पूर्वी गोपुरम का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है
- इन जोड़ों ने मूल केंद्रीय तीर्थ को पूरे परिसर का केवल एक छोटा हिस्सा बना दिया
- हॉल कई कार्य करते थे: कुछ में मूर्तियाँ संगीत, नृत्य और नाटक देखतीं; कुछ दैवी विवाह आयोजित करते; कुछ में देवताओं के लिए झूले रखे जाते, जिनमें मुख्य तीर्थ से अलग विशेष मूर्तियाँ प्रयुक्त होतीं
विट्ठल मंदिर
- प्रमुख देवता विट्ठल, महाराष्ट्र में सामान्यतः पूजित विष्णु का एक रूप, यहाँ आयातित, यह दिखाते हुए कि विजयनगर के शासकों ने जान-बूझकर क्षेत्रीय परंपराओं को एक साम्राज्यिक संस्कृति में मिलाया
- एक अद्वितीय तीर्थ जो एक पत्थर के रथ के आकार में बना है
- गोपुरम से सीधी निकलती एक रथ-गली, पत्थर की पट्टिकाओं से पक्की और स्तंभयुक्त मंडपों से घिरी जहाँ व्यापारी लेन-देन करते थे
साम्राज्य के पतन के बाद नायकों ने दुर्गीकरण और मंदिर-निर्माण दोनों परंपराओं को जारी और विस्तृत रखा; युग के कुछ सबसे शानदार गोपुरम, जैसे मदुरई में, वास्तव में नायक-कार्य हैं, विजयनगर का अपना नहीं।
6 राजमहलों, मंदिरों और बाज़ारों का मानचित्रण
मैकेन्जी के आरंभिक सर्वेक्षणों के बाद, यात्री-वृत्तांतों और अभिलेखों से जानकारी एकत्रित होती गई; ASI और कर्नाटक पुरातत्व व संग्रहालय विभाग ने बीसवीं सदी भर स्थल को संरक्षित रखा, और 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्व का स्थल मान्यता दी गई। 1980 के दशक के आरंभ में एक गहन, दशकों तक चलने वाली दस्तावेज़ीकरण परियोजना शुरू हुई।
स्थल को 25 वर्गों में बाँटा गया, प्रत्येक को अक्षर दिया गया; हर वर्ग को छोटे वर्गों में, और उन्हें फिर और छोटी इकाइयों में उपविभाजित किया गया, श्रमसाध्य रूप से छोटे तीर्थों से लेकर विस्तृत मंदिरों तक, हज़ारों संरचनाओं के निशान, साथ ही सड़कें, रास्ते और बाज़ार, जिन्हें मुख्यतः बचे स्तंभ-आधारों और चबूतरों से पहचाना गया, पुनर्प्राप्त करते हुए।
विद्वान जॉन एम. फ़्रिट्ज़, जॉर्ज मिशेल और एम.एस. नागराज राव, जिन्होंने वर्षों इस स्थल पर काम किया, ने लिखा: “विजयनगर के इन स्मारकों के अध्ययन में हमें ग़ायब हो चुके लकड़ी के तत्वों की एक पूरी शृंखला (स्तंभ, ब्रेकेट, शहतीर, छतें, निकले हुए छज्जे, और मीनारें) की कल्पना करनी होती है, जो प्लास्टर से सजी और शायद चमकीली रंगी हुई थीं।” केवल पत्थर बचा है; यात्रियों के लिखित विवरण ही वे हैं जो इतिहासकारों को शेष का पुनर्निर्माण करने देते हैं।
पेस बाज़ार का एक सजीव विवरण देता है: ‘आगे जाने पर एक चौड़ी और सुंदर गली पाते हैं… इस गली में कई व्यापारी रहते हैं और वहाँ आप सभी प्रकार के माणिक्य, और हीरे, और पन्ने, और मोती, और छोटे मोती, और वस्त्र, और पृथ्वी पर होने वाली हर वस्तु जिसे आप खरीदना चाहेंगे, पाएँगे। फिर हर शाम को आप एक मेला देख सकते हैं जहाँ से कई सामान्य घोड़े तथा टट्टू और कई तुरंज और नींबू और संतरे और अंगूर और उद्यान में उगने वाली हर प्रकार की वस्तुएँ और लकड़ी मिलती है: इस गली में आप हर वस्तु पा सकते हैं।’ सामान्य रूप से वह शहर का वर्णन ‘विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर’ के रूप में करता है। फर्नाओ नूनिज़ के अनुसार विजयनगर के बाज़ार ‘प्रचुर मात्रा में फलों, अंगूरों और संतरों, नींबू, अनार, कटहल तथा आम से भरे रहते थे और सभी बहुत सस्ते।’ बाज़ारों में मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था, जैसे भेड़-बकरी का मांस, सूअर, मृगमांस, तीतर, खरगोश, कबूतर और बटेर।
7 उत्तर खोजते प्रश्न
बची इमारतें रक्षा-आवश्यकताओं, निर्माण-विधियों, सामग्रियों को प्रकट करती हैं, और स्थलों के बीच तुलना करने पर विचारों के प्रसार को भी, और ये प्रतीकात्मक अर्थ भी वहन करती हैं जो साहित्य, अभिलेखों और लोक-परंपरा के साथ ही समझ में आता है। वे जो नहीं बता सकतीं वह यह है कि सामान्य पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे, वह विशाल बहुसंख्या जो वास्तव में नगर के अंदर और आसपास रहती थी, इस सबके बारे में क्या सोचते थे: क्या उनकी राजकीय या धार्मिक केंद्रों तक कोई पहुँच थी भी? क्या मूर्तिकला का प्रतीकवाद किसी राहगीर के लिए कोई अर्थ रखता था? न ही अकेले इमारतें यह बता सकती हैं कि उन्हें वास्तव में किसने डिज़ाइन और निर्मित किया: कौन-से राजमिस्त्री, पत्थर काटने वाले और शिल्पी, क्या इनमें से कोई युद्ध-बंदी थे, वे कौन-सी मज़दूरी पाते थे, निर्माण की देखरेख कौन करता था, या सामग्री कहाँ से आती और कैसे ढोई जाती थी। ये आगे के शोध के लिए खुले प्रश्न बने रहते हैं, ऐसी बातें नहीं जिन्हें खड़े खंडहर स्वयं तय कर सकें।
8 समयरेखा और पुनरावृत्ति
| समयरेखा 1 · प्रमुख राजनीतिक विकास (तिथियाँ अनुमानित; ? = अनिश्चित) | |
|---|---|
| लगभग 1200-1300 | दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206) |
| लगभग 1300-1400 | विजयनगर साम्राज्य की स्थापना (1336?); बहमनी राज्य (1347); जौनपुर, कश्मीर, मदुरई में सल्तनतें |
| लगभग 1400-1500 | उड़ीसा का गजपति राज्य (1435); गुजरात और मालवा की सल्तनतें; अहमदनगर, बीजापुर और बरार की सल्तनतें (1490) |
| लगभग 1500-1600 | गोवा पर पुर्तगाली विजय (1510); बहमनी राज्य का पतन और गोलकुंडा का उदय (1518); बाबर द्वारा मुग़ल साम्राज्य की स्थापना (1526) |
| समयरेखा 2 · विजयनगर की खोज और संरक्षण | |
|---|---|
| 1800 | कॉलिन मैकेन्जी विजयनगर की यात्रा करते हैं |
| 1856 | अलेक्ज़ेंडर ग्रीनलॉ हम्पी की पहली विस्तृत तस्वीरें लेते हैं |
| 1876 | जे.एफ़. फ़्लीट स्थल के मंदिर-दीवार अभिलेखों का दस्तावेज़ीकरण शुरू करते हैं |
| 1902 | जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण शुरू होता है |
| 1986 | हम्पी को यूनेस्को विश्व पुरातत्व स्थल घोषित किया जाता है |
- विजयनगर नगर और साम्राज्य दोनों के लिए नाम है, 1336 में स्थापित, 1565 में लूटा गया, मैकेन्जी के 1800 सर्वेक्षण तक स्थानीय रूप से हम्पी के नाम से स्मरण किया गया।
- चार राजवंशों ने बारी-बारी शासन किया: संगम, सुलुव, तुलुव (कृष्णदेव राय का चरम) और अराविदु (1542 से); तालीकोटा (1565) के बाद अराविदु ने पेनुकोण्डा और बाद में चंद्रगिरि से शासन किया।
- तालीकोटा/राक्षसी-तांगड़ी रामराय की अपनी बदलती गठबंधन-नीति से हुआ, न कि किसी स्थायी हिंदू-मुस्लिम संघर्ष से; सुलतानों और रायों के संबंध धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे।
- अमर-नायक प्रणाली (जिसके कई तत्त्व संभवतः दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे) ने सैन्य सेवा और राजस्व संग्रह को जोड़ा, और स्वतंत्र नायक-राज्यों में इसका टूटना साम्राज्य के केंद्र को कमज़ोर करता गया।
- नगर ने अपनी दीवारों के भीतर कृषि-भूमि को दुर्गीकृत किया, अन्न-भंडारों का एक महँगा विकल्प, लंबी घेराबंदी झेलने के लिए।
- तीन क्षेत्र: धार्मिक केंद्र (विरुपाक्ष, पम्पादेवी, पहले से मौजूद पवित्र पहाड़ियाँ), राजकीय केंद्र (60+ मंदिर, महानवमी डिब्बा, कमल महल), शहरी केंद्र (बाज़ार, सामान्य आवास, अधिकतर खोया हुआ)।
- राय के अधीन गोपुरम साम्राज्यिक पैमाने तक बढ़े; महानवमी डिब्बा का सटीक अनुष्ठानिक प्रयोग आज भी विद्वानों के बीच वास्तव में विवादित है।
- विजयनगर के पुनर्निर्माण में अभिलेख, यात्री-वृत्तांत (पेस, नूनिज़, अब्दुर रज़्ज़ाक, निकितिन) और, 1980 के दशक से, एक गहन ग्रिड-वर्ग मानचित्रण सर्वेक्षण प्रयुक्त हुए।
- इमारतें रक्षा, तकनीक और प्रतीकवाद के बारे में प्रश्नों का उत्तर देती हैं, पर सामान्य लोगों के जीवंत अनुभव या नगर बनाने वाले श्रमिकों के बारे में नहीं।
- 1 अंकविजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसने, और किस वर्ष की?
- 1 अंककर्नाटक साम्राज्यमु क्या था?
- 1 अंकअमर-नायक क्या है?
- 1 अंकविजयनगर के राजाओं ने कौन-सी उपाधि ली जो “सुल्तान” के अरबी शब्द को संस्कृतकृत करती थी?
- 1 अंककॉलिन मैकेन्जी कौन थे?
- 2 अंकविजयनगर के चार शासक राजवंशों के नाम क्रम में लिखिए।
- 2 अंकराय गोपुरम क्या है, और इसका आकार क्या संकेत देता था?
- 2 अंककमलपुरम् जलाशय और हिरिया नहर किसलिए प्रयुक्त थे?
- 2 अंकमहानवमी डिब्बा क्या है, और इसका सटीक प्रयोग अब भी विवादित क्यों है?
- 3 अंकपिछली दो सदियों में हम्पी के खंडहरों का अध्ययन करने के लिए किन विधियों का प्रयोग हुआ है?
- 3 अंकविजयनगर की जल-आवश्यकताएँ कैसे पूरी की गईं?
- 3 अंकनगर के दुर्गीकृत क्षेत्र के भीतर कृषि-भूमि को घेरने के क्या लाभ और हानियाँ थीं?
- 3 अंकअमर-नायक प्रणाली का वर्णन कीजिए और बताइए कि इसने अंततः साम्राज्य को कैसे कमज़ोर किया।
- 3 अंकधार्मिक भिन्नताओं के बावजूद विजयनगर और दक्कन की सल्तनतों के संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण क्यों नहीं रहे? उदाहरण दीजिए।
- 3 अंकविरुपाक्ष और विट्ठल मंदिर हमें विजयनगर के शासकों द्वारा धार्मिक आश्रय के प्रयोग के बारे में क्या बताते हैं?
- 3 अंकविजयनगर के बारे में बची इमारतें किन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकतीं?
- 5 अंकचर्चा कीजिए कि क्या “राजकीय केंद्र” शब्द विजयनगर के उस भाग के लिए उपयुक्त वर्णन है जिसे यह नामित करता है।
- 5 अंकविजयनगर के शासकों ने अनुष्ठानिक स्थापत्य की पहले की परंपराओं को किन तरीकों से अपनाया और अनुकूलित किया, इसकी चर्चा कीजिए।
- 5 अंकविजयनगर के दुर्गीकरण का वर्णन कीजिए और चर्चा कीजिए कि इसने वह विशेष रूप क्यों लिया।
- 5 अंकविजयनगर की अर्थव्यवस्था में शासक, व्यापारी और मंदिर किन तरीकों से जुड़े थे, इसकी चर्चा कीजिए।
- 5 अंकमैकेन्जी की 1800 की यात्रा से 1980 के दशक की मानचित्रण परियोजना तक विजयनगर की खोज और संरक्षण का पता लगाइए।
- 5 अंकमहानवमी डिब्बा से जुड़े अनुष्ठानों का क्या महत्व था, और इतिहासकारों को उनके पुनर्निर्माण में किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
- 5 अंकभारत के एक रेखा-मानचित्र पर विजयनगर, बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर और मदुरई अंकित कीजिए, और राक्षसी-तांगड़ी (तालीकोटा) के स्थान का वर्णन कीजिए।
- 1 अंकविजयनगर किस युद्ध में लूटा गया?
(क) पानीपत(ख) तालीकोटा(ग) प्लासी(घ) हल्दीघाटी - 1 अंककृष्णदेव राय की राजनीति पर रचना अमुक्तमल्यद किस भाषा में लिखी गई?
(क) संस्कृत(ख) कन्नड़(ग) तेलुगु(घ) तमिल - 1 अंकविजयनगर के संरक्षक देवता, जिनके नाम पर राजकीय आदेश हस्ताक्षरित होते थे, कौन थे?
(क) विट्ठल(ख) विरुपाक्ष(ग) जगन्नाथ(घ) विष्णु - 1 अंकअमर-नायक प्रणाली दिल्ली सल्तनत की किस व्यवस्था से व्युत्पन्न मानी जाती है?
(क) मनसबदारी व्यवस्था(ख) इक्ता व्यवस्था(ग) ज़मींदारी व्यवस्था(घ) जागीरदारी व्यवस्था - 1 अंकशहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने में मिली उत्कृष्ट चीनी चीनी-मिट्टी संकेत देती है कि यह क्षेत्र किसका घर था?
(क) मंदिर पुरोहित(ख) धनी व्यापारी(ग) राजकीय रक्षक(घ) कृषि मज़दूर - 1 अंकहम्पी को यूनेस्को विश्व पुरातत्व स्थल कब घोषित किया गया?
(क) 1902(ख) 1976(ग) 1986(घ) 1998
चुनिए: (क) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं तथा कारण, अभिकथन की सही व्याख्या करता है; (ख) दोनों सही हैं पर कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता; (ग) अभिकथन सही है, कारण ग़लत है; (घ) अभिकथन ग़लत है, कारण सही है।
कारण (R): इससे नगर लंबी घेराबंदी के दौरान केवल संचित अन्न-भंडारों पर निर्भर रहने के बजाय भोजन से स्वयं को बनाए रख सकता था।
कारण (R): कृष्णदेव राय ने सल्तनतों के भीतर सत्ता के दावेदारों का समर्थन किया, और बीजापुर के सुल्तान ने एक बार विजयनगर के उत्तराधिकार-विवाद को सुलझाने में हस्तक्षेप किया।