NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति के अध्याय 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ की प्रश्नावली के सभी 10 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में अध्याय की ‘खुद करें-खुद समझें’ गतिविधि और पाठ के बीच पूछे गए प्रश्न (चित्र-परिचय, ‘सिने-संसार’, ‘खोज-बीन’, मानचित्र-प्रश्न और हाशिये की टिप्पणियाँ) भी हल किए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
इस अध्याय की प्रश्नावली हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में एक जैसी है: दोनों में दस प्रश्न हैं, उसी क्रम में, और प्रश्न 1 के चारों विकल्प भी दोनों में एक जैसे हैं। एक फ़र्क़ ज़रूर है जो उत्तर लिखते समय मायने रखता है: प्रश्न 2 की दूसरी सूची को हिंदी संस्करण 1, 2, 3, 4 से गिनता है, जबकि अंग्रेज़ी संस्करण i, ii, iii, iv से। इसलिए नीचे का उत्तर (क)-2, (ख)-1, (ग)-4, (घ)-3 के रूप में लिखा गया है, न कि a-ii, b-i वाले रूप में। इसी तरह प्रश्न 4 के दोनों नाम हिंदी संस्करण के अनुसार विस्मय और इंद्रप्रीत हैं।
1 बहुविकल्पीय प्रश्न
प्र. भारत-विभाजन के बारे में निम्नलिखित कौन-सा कथन ग़लत है?
(क) भारत-विभाजन ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ का परिणाम था।
(ख) “धर्म के आधार पर दो प्रांतों—पंजाब और बंगाल—का बँटवारा हुआ।”
(ग) पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में संगति नहीं थी।
(घ) विभाजन की योजना में यह बात भी शामिल थी कि दोनों देशों के बीच आबादी की अदला-बदली होगी।
उत्तर: (घ) विभाजन की योजना में यह बात भी शामिल थी कि दोनों देशों के बीच आबादी की अदला-बदली होगी।
क्यों: यही एक कथन है जो किताब से मेल नहीं खाता। अध्याय बताता है कि अल्पसंख्यकों की समस्या विभाजन की ‘सबसे अबूझ कठिनाई’ थी और इस कठिनाई से उबरने के लिए किसी के पास कोई योजना भी नहीं थी। शुरू में नेता यही मानकर चल रहे थे कि हिंसा की घटनाएँ अस्थाई हैं। आबादी की अदला-बदली कोई पहले से तय योजना नहीं थी, वह हिंसा के दबाव में हुई अफ़रा-तफ़री थी।
बाकी विकल्प क्यों सही हैं: (क) मुस्लिम लीग ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ की बात की थी और इसी आधार पर अलग देश की माँग मानी गई। (ख) मुस्लिम-बहुल प्रांत पंजाब और बंगाल में अनेक हिस्से गैर-मुस्लिम बहुसंख्या वाले थे, इसलिए इन दोनों प्रांतों का बँटवारा भी धार्मिक बहुसंख्या के आधार पर हुआ। (ग) पाकिस्तान में दो इलाके शामिल थे, पश्चिमी और पूर्वी, और इनके बीच भारतीय भू-भाग का एक बड़ा विस्तार था, यानी दोनों में संगति नहीं थी।
2 सुमेलन
प्र. निम्नलिखित सिद्धांतों के साथ उचित उदाहरणों का मेल करें ः
| सिद्धांत | उदाहरण |
|---|---|
| (क) धर्म के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण | 1. पाकिस्तान और बांग्लादेश |
| (ख) विभिन्न भाषाओं के आधार पर देश की सीमा का निर्धारण | 2. भारत और पाकिस्तान |
| (ग) भौगोलिक आधार पर किसी देश के क्षेत्रों का सीमांकन | 3. झारखंड और छत्तीसगढ़ |
| (घ) किसी देश के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक आधार पर क्षेत्रों का सीमांकन | 4. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड |
उत्तर: (क)-2, (ख)-1, (ग)-4, (घ)-3
क्यों:
(क)-2: भारत और पाकिस्तान की सीमा धर्म के आधार पर खींची गई। किताब कहती है कि तय किया गया कि धार्मिक बहुसंख्या को विभाजन का आधार बनाया जाएगा।
(ख)-1: पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा भाषा के सवाल से बनी। पूर्वी पाकिस्तान ही आज का बांग्लादेश है, और वह पाकिस्तान से अलग हुआ, यानी यहाँ धर्म ने नहीं, भाषा और अलग पहचान ने सीमा तय की।
(ग)-4: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों पहाड़ी भौगोलिक पेटी के राज्य हैं; यह एक देश के भीतर भौगोलिक आधार पर किया गया सीमांकन है।
(घ)-3: झारखंड और छत्तीसगढ़ सन् 2000 में प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों से बने। किताब कहती है कि अनेक उप-क्षेत्रों ने अलग क्षेत्रीय संस्कृति या विकास के मामले में क्षेत्रीय असंतुलन का सवाल उठाकर अलग राज्य की माँग की, और ऐसे तीन राज्य छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड सन् 2000 में बने।
3 रियासतों की पहचान
प्र. “भारत का कोई समकालीन राजनीतिक नक्शा लीजिए (जिसमें राज्यों की सीमाएँ दिखाई गई हों) और नीचे लिखी रियासतों के स्थान चिह्नित कीजिए—”
(क) जूनागढ़ (ख) मणिपुर (ग) मैसूर (घ) ग्वालियर
उत्तर: यह अपनी अभ्यास-पुस्तिका के नक्शे पर करने वाला काम है। नीचे की तालिका बताती है कि हर रियासत आज किस राज्य में और उस राज्य के किस हिस्से में पड़ती है, इसलिए नक्शे पर निशान लगाना आसान हो जाएगा।
| रियासत | आज किस राज्य में | राज्य में कहाँ |
|---|---|---|
| जूनागढ़ | गुजरात | सौराष्ट्र प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में |
| मणिपुर | मणिपुर (स्वयं एक राज्य) | पूर्वोत्तर भारत, म्याँमार की सीमा से लगा हुआ |
| मैसूर | कर्नाटक | राज्य के दक्षिणी हिस्से में |
| ग्वालियर | मध्य प्रदेश | राज्य के उत्तरी हिस्से में |
इस अध्याय के लिहाज़ से याद रखने लायक बात यह है कि किताब जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर को वे चार रियासतें बताती है जिनका विलय बाकियों की तुलना में थोड़ा कठिन साबित हुआ। यानी इस सूची में से जूनागढ़ और मणिपुर उस ‘कठिन’ सूची के हैं, जबकि मैसूर और ग्वालियर उस सूची में नहीं हैं; किताब इन दोनों का नाम केवल इसी प्रश्न में लेती है।
- पहले आज के राज्य ढूँढिए: गुजरात (पश्चिमी तट), मणिपुर (पूर्वोत्तर, म्याँमार की सीमा पर), कर्नाटक (दक्षिण), मध्य प्रदेश (मध्य भारत)।
- उस राज्य के भीतर रियासत की जगह बिंदु लगाइए: जूनागढ़ सौराष्ट्र प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिम में; मणिपुर राज्य के बीच इंफाल के पास; मैसूर कर्नाटक के दक्षिण में; ग्वालियर मध्य प्रदेश के उत्तर में।
- हर बिंदु के पास (क), (ख), (ग), (घ) के साथ रियासत का नाम लिखिए और एक छोटी संकेत-सूची बनाइए।
4 रियासतों का विलय: विस्मय और इंद्रप्रीत की राय
प्र. नीचे दो तरह की राय लिखी गई है ः
विस्मय ः रियासतों को भारतीय संघ में मिलाने से इन रियासतों की प्रजा तक लोकतंत्र का विस्तार हुआ।
इंद्रप्रीत ः यह बात मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। इसमें बलप्रयोग भी हुआ था जबकि लोकतंत्र में आम सहमति से काम लिया जाता है।
देशी रियासतों के विलय और ऊपर के मशविरे के आलोक में इस घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है?
उत्तर: दोनों बातों में सच्चाई है, इसलिए सही राय दोनों को जोड़कर बनती है।
विस्मय का पक्ष किन तथ्यों पर टिका है:
अधिकतर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक रीति से चलाया जाता था और शासक अपनी प्रजा को लोकतांत्रिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे। विलय के बाद वही प्रजा भारत के संविधान के तहत मौलिक अधिकार और मतदान का अधिकार पा गई। किताब यह भी कहती है कि अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे, और मणिपुर में तो विलय से पहले ही सार्वभौम वयस्क मताधिकार से चुनाव हुए। हैदराबाद में निज़ाम के खिलाफ़ जनता का ही आंदोलन चल रहा था।
इंद्रप्रीत का पक्ष किन तथ्यों पर टिका है:
हैदराबाद में मामला बातचीत से नहीं सुलझा; 1948 के सितंबर में भारतीय सेना को जाना पड़ा और निज़ाम के आत्मसमर्पण के बाद ही विलय हुआ। मणिपुर में भी भारत सरकार ने विधानसभा से नहीं, महाराजा से हस्ताक्षर करवाए, जबकि विधानसभा में विलय के सवाल पर गहरे मतभेद थे। और मूल घोषणा ही यह थी कि फ़ैसला प्रजा को नहीं, राजाओं को करना है।
मेरी राय: विलय का मुख्य तरीका लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण था। किताब खुद कहती है कि शांतिपूर्ण बातचीत के ज़रिए लगभग सभी रजवाड़े, जिनकी सीमाएँ आज़ाद हिंदुस्तान की नयी सीमाओं से मिलती थीं, 15 अगस्त 1947 से पहले ही भारतीय संघ में शामिल हो गए, और सरदार पटेल ने मनाने-समझाने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई। बलप्रयोग अपवाद था, नियम नहीं, और वह भी वहाँ हुआ जहाँ शासक अपनी ही जनता का दमन कर रहा था। इसलिए कुल मिलाकर यह घटनाक्रम लोकतंत्र के विस्तार का ही है, बशर्ते हम यह भी मानें कि यह विस्तार हर जगह आम सहमति से नहीं हुआ।
5 अगस्त 1947 के दो बयान
प्र. नीचे 1947 के अगस्त के कुछ बयान दिए गए हैं जो अपनी प्रकृति में अत्यंत भिन्न हैं ः
‘‘आज आपने अपने सर पर काँटों का ताज पहना है। सत्ता का आसन एक बुरी चीज़ है। इस आसन पर आपको बड़ा सचेत रहना होगा… आपको और ज़्यादा विनम्र और धैर्यवान बनना होगा… अब लगातार आपकी परीक्षा ली जाएगी।’’
मोहनदास करमचंद गाँधी
‘‘…भारत आज़ादी की जिंदगी के लिए जागेगा… हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाएँगे… आज दुर्भाग्य के एक दौर का खात्मा होगा और हिंदुस्तान अपने को फिर से पा लेगा… आज हम जो जश्न मना रहे हैं वह एक कदम भर है, संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं…’’
जवाहरलाल नेहरू
इन दो बयानों से राष्ट्र-निर्माण का जो एजेंडा ध्वनित होता है उसे लिखिए। आपको कौन-सा एजेंडा जँच रहा है और क्यों?
उत्तर:
गाँधी का एजेंडा: चेतावनी और ज़िम्मेदारी। गाँधी सत्ता को उपलब्धि नहीं, बोझ मानते हैं। ‘काँटों का ताज’ और ‘सत्ता का आसन एक बुरी चीज़ है’ का सीधा अर्थ यह है कि आज़ादी के साथ जश्न नहीं, कर्तव्य आया है। उनका एजेंडा है: विनम्रता, धैर्य, सचेत रहना और लगातार अपनी परीक्षा देना। यह बयान उसी दिन के उनके व्यवहार से मेल खाता है, क्योंकि 15 अगस्त 1947 को वे किसी जश्न में नहीं थे, कोलकाता के दंगा-प्रभावित इलाकों में थे।
नेहरू का एजेंडा: उम्मीद और नयी शुरुआत। नेहरू आज़ादी को एक नए युग की शुरुआत मानते हैं: पुराने से नए की ओर कदम, दुर्भाग्य के दौर का खात्मा, संभावनाओं के द्वार खुलना। ध्यान दीजिए कि वे भी जश्न को अंतिम मंज़िल नहीं कहते, ‘एक कदम भर’ कहते हैं। यानी उनका एजेंडा है: लोकतंत्र, विकास और आत्म-खोज की लंबी यात्रा अब शुरू होती है।
मेरी राय: दोनों एजेंडे एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं, और नए राष्ट्र को दोनों की ज़रूरत थी। नेहरू का बयान बताता है कि किस दिशा में जाना है, गाँधी का बयान बताता है कि किस भाव से जाना है। अगर एक ही चुनना हो तो 1947 के हालात में गाँधी का एजेंडा ज़्यादा ज़रूरी लगता है, क्योंकि उस साल देश विभाजन, हिंसा और 80 लाख लोगों के विस्थापन से गुज़र रहा था। ऐसे समय में सत्ता पाने वालों को सबसे पहले विनम्रता और ज़िम्मेदारी की ही याद दिलाई जानी चाहिए थी।
6 नेहरू और धर्मनिरपेक्षता
प्र. भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए नेहरू ने किन तर्कों का इस्तेमाल किया। क्या आपको लगता है कि ये केवल भावनात्मक और नैतिक तर्क हैं अथवा इनमें कोई तर्क युक्तिपरक भी है?
उत्तर: नेहरू के तर्क मुख्यतः मुख्यमंत्रियों को लिखे उनके 15 अक्तूबर 1947 के पत्र में मिलते हैं, और उनमें दोनों तरह के तर्क हैं।
नेहरू के तर्क:
1. यथार्थ का तर्क। ‘‘भारत में मुसलमान अल्पसंख्यकों की तादाद इतनी ज़्यादा है कि वे चाहें तब भी यहाँ से कहीं और नहीं जा सकते। यह एक बुनियादी तथ्य है और इस पर कोई अँगुली नहीं उठाई जा सकती।’’
2. जवाबी कार्रवाई से इनकार। पाकिस्तान चाहे जितना उकसावा दे, या वहाँ के गैर-मुस्लिमों को जितना भी सहना पड़े, भारत को अपने अल्पसंख्यकों के साथ सभ्यता और शालीनता से पेश आना है।
3. लोकतंत्र का तर्क। लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को नागरिक के अधिकार देने होंगे और उनकी रक्षा करनी होगी।
4. नतीजे की चेतावनी। ‘‘अगर हम ऐसा करने में कामयाब नहीं होते तो यह एक नासूर बन जाएगा जो पूरी राज-व्यवस्था में ज़हर फैलाएगा और शायद उसको तबाह भी कर दे।’’
क्या ये केवल भावनात्मक और नैतिक तर्क हैं? नहीं। इनमें नैतिक पक्ष है, पर युक्तिपरक यानी व्यावहारिक पक्ष भी उतना ही मज़बूत है।
नैतिक पक्ष: सभ्यता और शालीनता से पेश आना, नागरिकता की कसौटी धर्म को न बनाना, और यह मानना कि नागरिक चाहे जिस धर्म को माने उसका दर्ज़ा बाकी नागरिकों के बराबर होना चाहिए।
युक्तिपरक पक्ष: पहला तर्क ही शुद्ध व्यावहारिक है, कि इतनी बड़ी आबादी कहीं जा ही नहीं सकती, इसलिए उसे साथ लेकर चलना ही एकमात्र रास्ता है। ‘नासूर’ वाली चेतावनी भी राज्य की स्थिरता का तर्क है, दया का नहीं। और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना विभाजन के उसी द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को सही ठहराता जिसे भारत के नेता मानते ही नहीं थे।
7 पूर्वी और पश्चिमी इलाकों का फ़र्क़
प्र. आज़ादी के समय देश के पूर्वी और पश्चिमी इलाकों में राष्ट्र-निर्माण की चुनौती के लिहाज़ से दो मुख्य अंतर क्या थे?
उत्तर:
पहला अंतर: विभाजन का बोझ पश्चिम में तात्कालिक और तीखा था, पूर्व में लंबा खिंचा। पश्चिम में पंजाब का बँटवारा हुआ और वहाँ हिंसा तथा विस्थापन तुरंत और भयानक रूप में सामने आया। लाहौर और अमृतसर जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े बन गए और सीमा के दोनों ओर से लाखों लोग आर-पार गए। पूर्व में बंगाल का बँटवारा हुआ और कलकत्ता भी सांप्रदायिक अखाड़ा बना; बँटवारे का असर लंबा खिंचा: किताब पूरे विभाजन के बारे में कहती है कि लाखों शरणार्थियों के लिए आज़ादी का मतलब महीनों और कभी-कभी सालों तक किसी शरणार्थी शिविर में ज़िंदगी काटना रहा। यही वजह है कि गाँधी को 15 अगस्त 1947 के दिन कोलकाता में और अगले महीने दिल्ली में रहना पड़ा।
दूसरा अंतर: रियासतों और सीमाओं का सवाल दोनों तरफ़ अलग शक्ल में था। पश्चिम में सबसे बड़ी चुनौती जूनागढ़ जैसी रियासतों का विलय और नयी अंतर्राष्ट्रीय सीमा को व्यवस्थित करना था। पूर्व और पूर्वोत्तर में चुनौती यह थी कि मणिपुर जैसी रियासतों को भारत में मिलाया जाए, जहाँ आंतरिक स्वायत्तता का आश्वासन दिया जा चुका था और विधानसभा में विलय पर गहरे मतभेद थे। साथ ही, किताब के दिए क्रम से यह भी दिखता है कि पूर्वोत्तर में राज्यों का पुनर्गठन 1956 में नहीं, बहुत बाद में 1963, 1972 और 1987 में जाकर हुआ।
8 राज्य पुनर्गठन आयोग
प्र. राज्य पुनर्गठन आयोग का काम क्या था? इसकी प्रमुख सिफारिश क्या थी?
उत्तर:
आयोग क्यों बना: आंध्र प्रदेश के गठन के साथ ही देश के दूसरे हिस्सों में भी भाषाई आधार पर राज्यों को गठित करने का संघर्ष चल पड़ा। इन संघर्षों से बाध्य होकर केंद्र सरकार ने 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया।
काम: इस आयोग का काम राज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना था, यानी यह तय करना कि भारत के राज्यों की आंतरिक सीमाएँ किस आधार पर खींची जाएँ।
प्रमुख सिफ़ारिश: आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए।
नतीजा: इस रिपोर्ट के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ, और इस अधिनियम के आधार पर 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बनाए गए।
9 भारत एक ‘कल्पित समुदाय’
प्र. कहा जाता है कि राष्ट्र एक व्यापक अर्थ में ‘कल्पित समुदाय’ होता है और सर्वसामान्य विश्वास, इतिहास, राजनीतिक आकांक्षा और कल्पनाओं से एकसूत्र में बँधा होता है। उन विशेषताओं की पहचान करें जिनके आधार पर भारत एक राष्ट्र है।
उत्तर: प्रश्न में दी गई चार कसौटियों पर भारत को एक-एक करके परखा जा सकता है।
1. साझा इतिहास। अध्याय कहता है कि भारत ने एक राष्ट्र के रूप में अपने को एक साझे इतिहास तथा साझी नियति के फ़लक पर गढ़ा। आज़ादी की लंबी लड़ाई, विभाजन का साझा आघात और राष्ट्र-निर्माण के शुरुआती साल पूरे देश का साझा अनुभव हैं।
2. सर्वसामान्य विश्वास। आज़ादी की लड़ाई में कई आवाज़ें थीं, पर दो बातों पर सबकी सहमति थी: आज़ादी के बाद देश का शासन लोकतांत्रिक सरकार के जरिए चलेगा, और सरकार सबके भले के लिए काम करेगी जिसमें गरीबों और कमज़ोरों का खास खयाल रखा जाएगा। इसी के साथ धर्मनिरपेक्ष राज्य का आदर्श भी साझा विश्वास बना, जिसकी अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई।
3. साझी राजनीतिक आकांक्षा। संविधान ने मौलिक अधिकारों की गारंटी दी, हर नागरिक को मतदान का अधिकार दिया और संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र अपनाया। नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया गया। ‘राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों’ के रूप में लोक-कल्याण के साझे लक्ष्य भी दर्ज हुए।
4. विविधता को समेटने वाली कल्पना। भारत अपने आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था, इसलिए यहाँ एकता का मतलब एकरूपता नहीं हो सकता था। भाषावार राज्यों के पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली। अध्याय के शब्दों में, लोकतंत्र को चुनने का अर्थ था विभिन्नताओं को पहचानना और उन्हें स्वीकार करना, यह मानकर चलते हुए कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं।
5. साझा भू-भाग। 565 रजवाड़ों के विलय ने बिखरे हुए भू-भाग को एक संघ में जोड़ा और देश की क्षेत्रीय अखंडता कायम की।
निष्कर्ष: इन सबका नतीजा यह रहा कि बहुतों की आशंका के विपरीत देश टूटा नहीं, बल्कि देश की एकता और ज़्यादा मज़बूत हुई। यही भारत के एक राष्ट्र होने का सबसे ठोस प्रमाण है।
10 रामचंद्र गुहा का अवतरण
प्र. “नीचे लिखे अवतरण को पढ़िए और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए—”
‘‘राष्ट्र-निर्माण के इतिहास के लिहाज से सिर्फ़ सोवियत संघ में हुए प्रयोगों की तुलना भारत से की जा सकती है। सोवियत संघ में भी विभिन्न और परस्पर अलग-अलग जातीय समूह, धर्म, भाषाई समुदाय और सामाजिक वर्गों के बीच एकता का भाव कायम करना पड़ा। जिस पैमाने पर यह काम हुआ, चाहे भौगोलिक पैमाने के लिहाज़ से देखें या जनसंख्यागत वैविध्य के लिहाज़ से, वह अपनेआप में बहुत व्यापक कहा जाएगा। दोनों ही जगह राज्य को जिस कच्ची सामग्री से राष्ट्र-निर्माण की शुरुआत करनी थी वह समान रूप से दुष्कर थी। लोग धर्म के आधार पर बँटे हुए और कर्ज़ तथा बीमारी से दबे हुए थे।’’
रामचंद्र गुहा
(क) यहाँ लेखक ने भारत और सोवियत संघ के बीच जिन समानताओं का उल्लेख किया है, उनकी एक सूची बनाइए। इनमें से प्रत्येक के लिए भारत से एक उदाहरण दीजिए।
| लेखक की बताई समानता | भारत से उदाहरण |
|---|---|
| अलग-अलग जातीय समूहों के बीच एकता कायम करनी पड़ी | पूर्वोत्तर के अनेक जनजातीय समूह; किताब बताती है कि नगालैंड 1963 में और मेघालय, मणिपुर तथा त्रिपुरा 1972 में अलग राज्य बने |
| अलग-अलग धर्मों के बीच एकता कायम करनी पड़ी | 1951 में देश की आबादी में 10-12 फ़ीसदी मुसलमान थे, और सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी तथा यहूदी भी; इसी वजह से भारत ने धर्मनिरपेक्ष राज्य का आदर्श अपनाया |
| अलग-अलग भाषाई समुदायों के बीच एकता कायम करनी पड़ी | विशाल आंध्र आंदोलन और उसके बाद 1956 का राज्य पुनर्गठन अधिनियम, जिससे 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बने |
| अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच एकता कायम करनी पड़ी | संविधान में सामाजिक रूप से वंचित तबकों को विशेष सुरक्षा, और हैदराबाद में निज़ाम के दमन के खिलाफ़ तेलंगाना के किसानों का आंदोलन |
| काम का भौगोलिक पैमाना बहुत बड़ा था | 565 रजवाड़ों को एक संघ में मिलाना; अकेले सौराष्ट्र में 14 बड़े और 119 छोटे रजवाड़े थे |
| जनसंख्यागत वैविध्य बहुत व्यापक था | भारत अपने आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था, अलग-अलग बोली, अलग संस्कृति और अलग-अलग धर्मों के अनुयायी |
| शुरुआती कच्ची सामग्री दुष्कर थी: लोग धर्म के आधार पर बँटे, कर्ज़ और बीमारी से दबे | विभाजन की हिंसा में तकरीबन पाँच से दस लाख मौतें और 80 लाख लोगों का विस्थापन; तीसरी चुनौती ही आर्थिक विकास और गरीबी के खात्मे की थी |
(ख) लेखक ने यहाँ भारत और सोवियत संघ में चली राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रियाओं के बीच की असमानता का उल्लेख नहीं किया है। क्या आप दो असमानताएँ बता सकते हैं?
पहली असमानता: रास्ता लोकतांत्रिक बनाम अलोकतांत्रिक। भारत ने शुरू से ही मौलिक अधिकारों वाला लोकतांत्रिक संविधान, हर नागरिक के लिए मतदान का अधिकार और संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र अपनाया, यानी राजनीतिक मुकाबले लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर होने थे। सोवियत संघ में एकता एक दलीय व्यवस्था और केंद्रीय नियंत्रण के ज़रिए कायम की गई, जिसमें ऐसी प्रतिस्पर्धा की जगह नहीं थी।
दूसरी असमानता: विविधता के प्रति रुख। भारत ने विविधता को खतरा मानने के बजाय उसे स्वीकार किया। भाषावार राज्यों के पुनर्गठन से विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली और क्षेत्रीय तथा भाषाई दावों को मान लेने को लोकतांत्रिक कदम माना गया। सोवियत संघ में एकता का ज़ोर एकरूपता पर था। इसी अंतर का नतीजा यह दिखता है कि बहुतों की आशंका के विपरीत भारत टूटा नहीं और उसकी एकता और मज़बूत हुई।
(ग) अगर पीछे मुड़कर देखें तो आप क्या पाते हैं? राष्ट्र-निर्माण के इन दो प्रयोगों में किसने बेहतर काम किया और क्यों?
उत्तर: पीछे मुड़कर देखने पर भारत का प्रयोग ज़्यादा सफल दिखता है, और इसका कारण तरीका है, इरादा नहीं।
1. भारत आज भी एक है। अध्याय का अपना निष्कर्ष यही है कि बहुतों की आशंका के विपरीत भाषावार पुनर्गठन से देश नहीं टूटा, इसके विपरीत देश की एकता और ज़्यादा मज़बूत हुई। सोवियत संघ का प्रयोग इस कसौटी पर टिक नहीं पाया।
2. भारत ने माँगें दबाईं नहीं, मानीं। जनता के दबाव में नेतृत्व ने भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का मन बनाया, और उम्मीद यही थी कि हर इलाके के क्षेत्रीय और भाषाई दावे को मान लेने से बँटवारे और अलगाववाद का खतरा घटेगा। दबाई गई माँग किसी न किसी दिन फूटती है, मानी गई माँग व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
3. भागीदारी का दायरा बढ़ा। भाषाई राज्यों के आंदोलनों के बाद राजनीति और सत्ता में भागीदारी का रास्ता एक छोटे-से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके तक सीमित नहीं रहा, बाकियों के लिए भी खुल गया।
4. लचीलापन। रजवाड़ों के विलय में भी भारत सरकार का रुख लचीला रहा और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी, जैसा जम्मू-कश्मीर में हुआ।
इस उप-प्रश्न में ‘भारत बेहतर रहा’ लिखना काफ़ी नहीं है। नंबर उस कारण पर मिलते हैं जो अध्याय से आता है: विविधता को स्वीकार करने वाला लोकतांत्रिक तरीका। यही एक वाक्य पूरे अध्याय का निचोड़ भी है।
प्रश्नावली के छोटे उत्तर, दोहराव के लिए:
1. (घ) आबादी की अदला-बदली की कोई योजना नहीं थी।
2. (क)-2, (ख)-1, (ग)-4, (घ)-3।
3. जूनागढ़: गुजरात; मणिपुर: पूर्वोत्तर; मैसूर: कर्नाटक; ग्वालियर: मध्य प्रदेश।
8. काम: राज्यों के सीमांकन पर गौर करना। सिफ़ारिश: सीमाएँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर। नतीजा: 1956 का अधिनियम, 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश।
11 खुद करें-खुद समझें
प्र. किसी भारतीय अथवा पाकिस्तानी/बांग्लादेशी कथाकार की लिखी कोई कहानी या उपन्यास पढ़ें जिसमें बँटवारे का जिक्र आया हो। सीमा के इस तरफ़ के लोगों और सीमा के उस तरफ़ के लोगों के अनुभव कैसे एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं? ‘खोजबीन’ शीर्षक के अंतर्गत इस अध्याय में सुझाई गई तमाम कथाओं को एकत्र करें। एक वॉलपेपर तैयार करें और इसमें मिलते-जुलते अनुभवों वाले स्थल को रेखांकित करें। साथ ही, किसी अनूठे अनुभव को भी इसमें स्थान दें।
कैसे करें: शुरुआत अध्याय में ही छपी तीन रचनाओं से कीजिए: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘सुब्ह-ए-आज़ादी’, अमृता प्रीतम की कविता ‘वारिस शाह से!’ और सआदत हसन मंटो की कहानी ‘कस्र-ए-नफ़्सी’ का अंश ‘मेहमाननवाजी में कसर’। फिर सीमा के इस पार के किसी लेखक की और उस पार के किसी लेखक की एक-एक पूरी कहानी या उपन्यास पढ़िए और लिखिए कि उनमें आम लोगों के साथ क्या-क्या हुआ।
मिलते-जुलते अनुभव: दोनों तरफ़ की रचनाओं में वही बातें मिलेंगी जो अध्याय बताता है: लोगों को रातों-रात घर-बार छोड़ना पड़ा, वे पैदल या ट्रेन से सीमा पार गए और रास्ते में उन पर हमले हुए, औरतों को अगवा किया गया या ‘कुल की इज़्ज़त’ के नाम पर मार दिया गया, बच्चे अपने माँ-बाप से बिछड़ गए, और बरसों से पड़ोसी की तरह रहते आए लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। साथ ही वह दूसरा पहलू भी मिलेगा जो ‘खोज-बीन’ बॉक्स बताता है: ऐसे परिवार भी थे जिन्होंने दूसरे समुदाय के लोगों को पनाह दी और उनकी जान बचाई।
वॉलपेपर: बीच में मिलते-जुलते अनुभव लिखिए और हर अनुभव के साथ किसी रचना की एक पंक्ति रखिए। किनारों पर कक्षा द्वारा ‘खोज-बीन’ में इकट्ठा की गई अनूठी कहानियाँ लगाइए, साथ में यह भी लिखिए कि परिवार कहाँ से आया और कहाँ बसा।
12 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय के बीच में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं: एक चित्र-परिचय में, ‘सिने-संसार’ बॉक्स में, ‘खोज-बीन’ बॉक्स में और हाशिये की टिप्पणियों में। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, किताब के अपने शब्दों में, हल किया गया है।
प्र. यहाँ प्रदर्शित तीन डाक-टिकटों को प्रथम गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी 1950, के अवसर पर जारी किया गया था। इन टिकटों पर छपे चित्र से आपको नए गणतंत्र के सामने खड़ी किन-किन चुनौतियों के बारे में जानकारी मिलती है? अगर आपको 1950 में इन डाक-टिकटों का डिज़ाइन तैयार करने के लिए कहा जाता तो आप इन टिकटों पर किस तरह के चित्र उकेरते?
उत्तर: तीनों टिकटों पर लोगों के साथ चरखा, हल के साथ अनाज की बाली, और तुरही तथा झंडों के साथ जश्न मनाती भीड़ दिखाई गई है। चरखा और अनाज विकास की चुनौती की ओर इशारा करते हैं, यानी खेती और उद्योग के सहारे लोगों का पेट भरना और तन ढँकना। जश्न मनाती भीड़ बताती है कि यह गणतंत्र सारी जनता का है, यानी एकता और लोकतंत्र की चुनौती। यही वे तीन चुनौतियाँ हैं जो अध्याय गिनाता है: एकता के सूत्र में बँधे ऐसे भारत को गढ़ना जिसमें सारी विविधताओं के लिए जगह हो, लोकतंत्र को कायम करना, और ऐसा विकास जिससे समूचे समाज का भला हो।
मेरे डिज़ाइन: एक टिकट पर अलग-अलग इलाकों, भाषाओं और धर्मों के लोग एक साथ (एकता), दूसरे पर वोट डालता एक मतदाता (लोकतंत्र), और तीसरे पर किसान, कारखाना और स्कूल (विकास)। यह हिस्सा आपकी अपनी राय का है, इसलिए तीनों चुनौतियों से मेल खाता कोई भी चित्र सही माना जाएगा।
प्र. आपकी राय में मिर्ज़ा सलीम का फ़िल्म के अंत में क्या रुख रहा होगा? ऐसी परिस्थितियों में आप क्या करते?
उत्तर: फ़िल्म के अंत में सलीम मिर्ज़ा पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला करते हैं। छात्रों के जत्थे में अपने बेटे सिकंदर को देखकर वे भारत में ही रहकर अपने हक़ के लिए लड़ने की राह चुनते हैं और जत्थे में शामिल हो जाते हैं।
मैं क्या करता/करती: मैं भी यहीं रहने का फ़ैसला करता/करती। अध्याय बताता है कि हमारे नेता मानते थे कि नागरिक चाहे जिस धर्म को माने, उसका दर्ज़ा बाकी नागरिकों के बराबर होना चाहिए और नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया जाना चाहिए। यहीं रहकर बराबरी की माँग करना इसी धर्मनिरपेक्ष वादे को निभाने की माँग है। (यह हिस्सा आपकी अपनी राय का है; जो भी उत्तर दें, उसका कारण ज़रूर लिखें।)
प्र. क्या आपने भी ऐसा ही कोई वाकया सुना है। अपने दादा-दादी अथवा इस पीढ़ी के किसी और से पूछिए कि आज़ादी के दिन क्या हुआ था, कैसे जश्न मनाया गया था, बँटवारे का सदमा कितना गहरा था और देश की आज़ादी से इन लोगों की क्या अपेक्षाएँ थीं? कम से कम ऐसे दो वाकयों को लिखिए।
कैसे करें: बुजुर्गों से बॉक्स में दिए क्रम में चार बातें पूछिए: आज़ादी के दिन क्या हुआ, जश्न कैसे मना, बँटवारे का सदमा कैसा था, और आज़ादी से उन्हें क्या उम्मीदें थीं। हर वाकया उन्हीं के शब्दों में लिखिए और साथ में जगह और साल भी लिखिए।
किस बात पर ध्यान दें: बॉक्स का अपना उदाहरण श्वेता के नाना का है, जिन्हें लाहौर से लुधियाना आना पड़ा, जिनके माता-पिता मार दिए गए, और जो इसलिए बच पाए कि पड़ोस के एक मुस्लिम परिवार ने उन्हें कई दिनों तक छुपाकर रखा। किताब यह भी कहती है कि हिंदू परिवारों और अन्य लोगों ने भी मुस्लिम परिवारों को आश्रय देकर उनकी जान बचाई। अपने दोनों वाकयों में दुख के साथ-साथ करुणा और एकजुटता के ऐसे उदाहरण भी दर्ज़ कीजिए।
प्र. क्या जर्मनी की तरह हम लोग भारत और पाकिस्तान के बँटवारे को खत्म नहीं कर सकते? मैं तो अमृतसर में नाश्ता और लाहौर में लंच करना चाहता हूँ!
प्र. क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम एक-दूसरे को स्वतंत्र राष्ट्र मानकर रहना और सम्मान करना सीख जाएँ?
उत्तर: दोनों टिप्पणियाँ उलटी दिशा में जाती हैं, और दूसरी ज़्यादा व्यावहारिक है। बँटवारा किसी बाहरी ताकत की खींची अस्थायी रेखा नहीं था। यह धार्मिक बहुसंख्या के सिद्धांत पर हुआ, 14-15 अगस्त 1947 को दो स्वतंत्र राष्ट्र बने, और इसके साथ इतिहास का सबसे बड़ा और दर्दनाक विस्थापन हुआ: 80 लाख लोगों को सीमा पार जाना पड़ा और पाँच से दस लाख लोगों ने जान गँवाई। तब से दोनों तरफ़ अलग-अलग राज्य और समाज बन चुके हैं। इसलिए एक-दूसरे को स्वतंत्र राष्ट्र मानकर अच्छे पड़ोसी की तरह रहना, और लोगों के आने-जाने, व्यापार और मेल-जोल को आसान बनाना ही वह रास्ता है जिससे ‘अमृतसर में नाश्ता और लाहौर में लंच’ मुमकिन हो सकता है। (यह राय का प्रश्न है; तर्क देकर आप दूसरी राय भी रख सकते हैं।)
प्र. मैं सोचता हूँ कि आखिर उन सैकड़ों राजा-रानी, राजकुमार और राजकुमारियों का क्या हुआ होगा। आखिर आम नागरिक बनने के बाद उनका जीवन कैसा रहा होगा?
उत्तर: विलय के बाद राजाओं के हाथ से उनकी रियासतें और शासन करने का अधिकार चला गया। रियासतों की प्रजा लोकतांत्रिक भारत की नागरिक बन गई, और राजा भी बाकी सबकी तरह आम नागरिक बन गए, जो वोट डाल सकते थे और चुनाव लड़ सकते थे। मणिपुर इसका उदाहरण है: 1948 के जून में चुनाव के बाद वहाँ संवैधानिक राजतंत्र बना और 1949 के सितंबर में महाराजा ने भारतीय संघ में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। अध्याय का ज़ोर जनता पर होने वाले बदलाव पर है: ज़्यादातर रजवाड़ों में शासन अलोकतांत्रिक ढंग से चलता था, और विलय ने इसे खत्म किया।
प्र. मानचित्र को ध्यान से देखें और निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर देंः
1. स्वतंत्र राज्य बनने से पहले निम्नलिखित राज्य किन मूल राज्यों के अंग थे? (क) गुजरात (ख) हरियाणा (ग) मेघालय (घ) छत्तीसगढ़
2. देश के विभाजन से प्रभावित दो राज्यों के नाम बताएँ?
3. दो ऐसे राज्यों के नाम बताएँ जो पहले संघ-शासित राज्य थे?
उत्तर:
1. (क) गुजरात: द्विभाषी राज्य बंबई का अंग था (1960 में अलग राज्य बना)। (ख) हरियाणा: पंजाब का अंग था (1966)। (ग) मेघालय: असम का अंग था (1972)। (घ) छत्तीसगढ़: मध्य प्रदेश का अंग था (2000)।
2. पंजाब और पश्चिम बंगाल, यानी वे दो प्रांत जिनका बँटवारा हुआ।
3. मणिपुर और त्रिपुरा, जो पहले केंद्र-शासित प्रदेश थे और 1972 में अलग राज्य बने।
प्र. है न दिलचस्प बात? नेहरू और बाकी नेता बड़े लोकप्रिय थे तो भी भाषाई राज्य की माँग को लेकर लोग उनकी इच्छा के विरुद्ध आंदोलन करने से नहीं हिचकिचाए।
उत्तर: हाँ, और यही दिखाता है कि नए भारत में लोकतंत्र कैसे काम कर रहा था। केंद्रीय नेतृत्व ने भाषावार राज्यों का मसला स्थगित कर दिया था, पर स्थानीय नेताओं और जनता ने इस फ़ैसले को चुनौती दी। तेलुगुभाषी इलाकों में विशाल आंध्र आंदोलन चला, पोट्टी श्रीरामुलु की 56 दिनों की भूख-हड़ताल के बाद मृत्यु हुई, और आखिरकार 1952 के दिसंबर में प्रधानमंत्री को आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा करनी पड़ी। लोकप्रिय नेताओं ने लोगों को असहमति जताने से नहीं रोका; जन-दबाव के आगे नेतृत्व ने भाषावार राज्यों के पक्ष में फ़ैसला लिया, और 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग तथा 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम आया।
प्र. संयुक्त राज्य अमरीका की जनसंख्या अपने देश के मुकाबले एक-चौथाई है लेकिन वहाँ 50 राज्य हैं। भारत में 100 से भी ज़्यादा राज्य क्यों नहीं हो सकते?
उत्तर: राज्यों की संख्या सिर्फ़ आबादी से तय नहीं होती। भारत में राज्यों की सीमाएँ एक तय आधार पर खींची गईं: 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम में मुख्य आधार भाषा था, और बाद में अलग क्षेत्रीय संस्कृति या विकास में क्षेत्रीय असंतुलन को आधार बनाया गया, जैसे सन् 2000 में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड तथा 2014 में तेलंगाना। जब ऐसी कोई माँग उठती है और मान ली जाती है, तब नया राज्य बनता है, और अध्याय बताता है कि विदर्भ, हरित प्रदेश और पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से जैसे इलाकों में छोटे राज्यों की माँग अब भी जारी है। इसलिए भारत में और राज्य बन सकते हैं, पर हर राज्य किसी वास्तविक क्षेत्रीय माँग पर टिका होना चाहिए; सिर्फ़ अमरीका की गिनती से मेल बिठाने के लिए सौ राज्य बनाना उस भाषाई और सांस्कृतिक आधार को नज़रअंदाज़ करना होगा जिस पर हमारे राज्य बने हैं। (यह चर्चा का प्रश्न है; तर्क देकर आप ज़्यादा राज्यों के पक्ष में भी लिख सकते हैं।)