कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: तीन चुनौतियाँ, विभाजन की चार कठिनाइयाँ और उसके आँकड़े, रजवाड़ों का विलय, हैदराबाद और मणिपुर, राज्यों का पुनर्गठन, और हर तारीख़ तथा नाम एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द

याद कर लेंपरिभाषा

द्वि-राष्ट्र सिद्धांत: मुस्लिम लीग का यह सिद्धांत कि भारत किसी एक कौम का नहीं बल्कि ‘हिंदू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश है। इसी कारण मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश यानी पाकिस्तान की माँग की। कांग्रेस ने इस सिद्धांत और पाकिस्तान की माँग, दोनों का विरोध किया।

याद कर लेंपरिभाषा

रजवाड़ा (देसी रियासत): छोटे-बड़े आकार के वे राज्य जिन पर राजाओं का शासन था। राजाओं ने ब्रिटिश-राज की अधीनता यानी सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर रखी थी और इसके अंतर्गत वे अपने राज्य के घरेलू मामलों का शासन चलाते थे।

याद कर लेंपरिभाषा

इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन: वह सहमति-पत्र जिस पर हस्ताक्षर का अर्थ था कि रजवाड़ा भारतीय संघ का अंग बनने के लिए सहमत है। अधिकतर रजवाड़ों के शासकों ने इसी पर हस्ताक्षर किए।

याद कर लेंपरिभाषा

रज़ाकार: हैदराबाद के निज़ाम का अर्द्ध-सैनिक बल, जिसे उसने आंदोलन देखकर अपनी ही जनता के खिलाफ़ रवाना किया। रज़ाकार अव्वल दर्जे के सांप्रदायिक और अत्याचारी थे और उन्होंने गैर-मुसलमानों को खासतौर पर निशाना बनाया।

याद कर लेंपरिभाषा

कल्पित समुदाय: राष्ट्र की वह धारणा जिसके अनुसार राष्ट्र सर्वसामान्य विश्वास, इतिहास, राजनीतिक आकांक्षा और कल्पनाओं से एकसूत्र में बँधा होता है। प्रश्नावली का प्रश्न 9 भारत को इसी कसौटी पर परखने को कहता है।

याद कर लेंपरिभाषा

राज्य पुनर्गठन आयोग: 1953 में बना आयोग, जिसका काम राज्यों के सीमांकन के मामले पर गौर करना था। इसकी सिफ़ारिश थी कि राज्यों की सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर होना चाहिए।

2 तीन चुनौतियाँ

चुनौती क्या थी संविधान ने क्या दिया
1. एकता
(पहली और तात्कालिक)
ऐसा एकजुट भारत गढ़ना जिसमें सारी विविधताओं के लिए जगह हो। भारत आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था। आम धारणा थी कि इतनी विविधता वाला देश ज़्यादा दिन एकजुट नहीं रह सकता। सबसे चुभता सवाल: क्षेत्रीय अखंडता कैसे हासिल हो। संविधान ने इसका जवाब सीधे नहीं दिया; यह मुख्यतः राजनीतिक चुनौती थी, जिसे रजवाड़ों के विलय और राज्यों के पुनर्गठन से हल किया गया।
2. लोकतंत्र लोकतंत्र कायम करना। किताब का ज़ोर: लोकतांत्रिक संविधान ज़रूरी है पर इतना भर काफ़ी नहीं; संविधान से मेल खाते लोकतांत्रिक व्यवहार-बरताव भी चलन में आएँ। मौलिक अधिकारों की गारंटी; हर नागरिक को मतदान का अधिकार; संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र।
3. विकास ऐसा विकास जिससे समूचे समाज का भला हो, न कि कुछ एक तबकों का। असली चुनौती आर्थिक विकास और गरीबी के खात्मे की कारगर नीतियाँ बनाना। सबके साथ समानता का बरताव; वंचित तबकों तथा धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को विशेष सुरक्षा; राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत।

3 विभाजन: चार कठिनाइयाँ

1

कोई जुड़ा मुस्लिम-बहुल इलाका नहीं। ब्रिटिश इंडिया में एक भी ऐसा इलाका नहीं था जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हों; ज़्यादा आबादी वाले दो इलाके थे, एक पश्चिम में और एक पूर्व में, जिन्हें जोड़ा नहीं जा सकता था। नतीजा: पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान, बीच में भारतीय भू-भाग का बड़ा विस्तार।

2

हर मुस्लिम-बहुल इलाका राजी नहीं था। खान अब्दुल गफ़्फार खान, ‘सीमांत गाँधी’, पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़ थे। उनकी आवाज़ की अनदेखी हुई और प्रांत पाकिस्तान में शामिल मान लिया गया।

3

पंजाब और बंगाल का भीतरी बँटवारा। इन मुस्लिम-बहुल प्रांतों के अनेक हिस्सों में गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक थे, इसलिए जिला या उससे निचले स्तर तक बँटवारा हुआ। यह 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि तक तय नहीं हो पाया, इसलिए आज़ादी के दिन तक अनेक लोगों को पता ही नहीं था कि वे भारत में हैं या पाकिस्तान में। यही विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ।

4

अल्पसंख्यकों का सवाल (सबसे अबूझ)। सीमा के दोनों तरफ़ लाखों अल्पसंख्यक थे। वे अपने ही घर में विदेशी बन गए। इस कठिनाई से उबरने की किसी के पास कोई योजना नहीं थी, और लोगों को अकसर कुछ घंटों की सूचना पर घर छोड़ना पड़ा।

4 विभाजन के परिणाम: याद रखने लायक आँकड़े

बात ब्योरा
विस्थापन 80 लाख लोगों को घर-बार छोड़कर सीमा-पार जाना पड़ा। यह मानव-इतिहास के अब तक ज्ञात सबसे बड़े स्थानांतरणों में से एक था: आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा।
मौतें विभाजन की हिंसा में तकरीबन पाँच से दस लाख लोगों ने जान गँवाई।
शहर लाहौर, अमृतसर और कलकत्ता जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े में तब्दील हो गए।
औरतें हज़ारों को अगवा किया गया, जबरन शादी और धर्म-परिवर्तन कराया गया। कई मामलों में परिवार के लोगों ने ‘कुल की इज़्ज़त’ के नाम पर घर की बहू-बेटियों को मार डाला।
शरणार्थी लाखों के लिए आज़ादी का मतलब महीनों और कभी-कभी सालों तक शिविर में ज़िंदगी काटना रहा।
क्या-क्या बँटा वित्तीय संपदा के साथ टेबुल, कुर्सी, टाईपराइटर और पुलिस के वाद्ययंत्रों तक का, और सरकारी तथा रेलवे कर्मचारियों तक का बँटवारा हुआ।
1951 की आबादी बड़ी मुस्लिम आबादी के पाकिस्तान चले जाने के बावजूद भारत की कुल आबादी में 10-12 फ़ीसदी मुसलमान थे।

5 धर्मनिरपेक्षता: नेहरू के तर्क

चार तर्क, एक साथ

1. मुसलमान अल्पसंख्यकों की तादाद इतनी ज़्यादा है कि वे चाहें तब भी कहीं और नहीं जा सकते; यह बुनियादी तथ्य है।
2. पाकिस्तान चाहे जितना उकसावा दे, भारत को अपने अल्पसंख्यकों के साथ सभ्यता और शालीनता से पेश आना है।
3. लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में उन्हें नागरिक के अधिकार देने होंगे और उनकी रक्षा करनी होगी।
4. ऐसा न कर पाए तो ‘‘यह एक नासूर बन जाएगा जो पूरी राज-व्यवस्था में ज़हर फैलाएगा और शायद उसको तबाह भी कर दे।’’
जवाहरलाल नेहरू, मुख्यमंत्रियों को एक पत्र में, 15 अक्तूबर 1947

नेताओं का रुख: भारत के नेता द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में यकीन नहीं करते थे। कौमी सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्ज़ा देने के हामी थे, चाहे नागरिक किसी भी धर्म का हो। नागरिकता की कसौटी धर्म को नहीं बनाया जाना चाहिए, और इस आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई। अल्पसंख्यकों में मुसलमानों के अलावा सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदी भी थे।

6 गाँधी की शहादत

कब क्या हुआ
15 अगस्त 1947 आज़ादी के किसी जश्न में भाग नहीं लिया; कोलकाता के दंगा-प्रभावित इलाकों में डेरा। उनकी मौजूदगी से हालात सुधरे और जश्न सांप्रदायिक सद्भाव के जज़्बे से मना।
दंगे फिर भड़कने पर अमन कायम करने के लिए उपवास पर बैठे।
अगला महीना दिल्ली पहुँचे, जहाँ भी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी।
जनवरी 1948 अंतिम उपवास। असर: सांप्रदायिक तनाव घटा, मुसलमान सुरक्षित घर लौटे, और भारत सरकार पाकिस्तान को उसका देय चुकाने पर राजी हो गई।
30 जनवरी 1948 हिंदू अतिवादी नाथूराम विनायक गोडसे ने संध्याकालीन प्रार्थना के समय तीन गोलियाँ चलाईं। गाँधीजी ने इससे पहले सशस्त्र सुरक्षा लेने से मना कर दिया था।

7 रजवाड़ों का विलय

बात ब्योरा
संख्या 565 रजवाड़े
फैलाव अंग्रेजी प्रभुत्व वाले भारतीय साम्राज्य का एक-तिहाई हिस्सा; प्रत्येक चार भारतीयों में से एक किसी न किसी रजवाड़े की प्रजा
समस्या ब्रिटिश-राज की समाप्ति के साथ सभी रजवाड़े कानूनी तौर पर आज़ाद हो जाते; वे भारत या पाकिस्तान में जाएँ या स्वतंत्र रहें, यह फ़ैसला प्रजा को नहीं, राजाओं को करना था
पहली घोषणाएँ सबसे पहले त्रावणकोर के राजा, अगले दिन हैदराबाद के निज़ाम; भोपाल के नवाब संविधान-सभा में शामिल नहीं होना चाहते थे
सरकार का रास्ता माउंटबेटन योजना के तहत रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र थीं; सरदार पटेल ने मनाने-समझाने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई
पैमाना आज के उड़ीसा में 26, छत्तीसगढ़ में 15, सौराष्ट्र में 14 बड़े और 119 छोटे रजवाड़े
दस्तावेज़ इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन (सहमति-पत्र)
कठिन मामले जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर और मणिपुर (कश्मीर की चर्चा पुस्तक 2 के अध्याय 8 में)
तीन बातें, ज़रूर याद रखें

किताब खुद रजवाड़ों की चर्चा से तीन निष्कर्ष निकालती है, और यही चार अंक का सवाल बनते हैं:
1. अधिकतर रजवाड़ों के लोग भारतीय संघ में शामिल होना चाहते थे।
2. भारत सरकार का रुख लचीला था और वह कुछ इलाकों को स्वायत्तता देने के लिए तैयार थी, जैसा जम्मू-कश्मीर में हुआ।
3. विभाजन की पृष्ठभूमि में देश की क्षेत्रीय अखंडता और एकता का सवाल सबसे अहम हो उठा था।

8 दो मामले: हैदराबाद और मणिपुर

हैदराबाद मणिपुर
शासक निज़ाम, दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों में शुमार महाराजा बोधचंद्र सिंह
शुरुआती कदम नवंबर 1947 में भारत के साथ यथास्थिति बहाल रखने का एक साल का समझौता आज़ादी के चंद रोज़ पहले सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर, बदले में आंतरिक स्वायत्तता का आश्वासन
जनता की भूमिका निज़ाम के दमनकारी शासन के खिलाफ़ आंदोलन; तेलंगाना के किसान सबसे दुखी; महिलाएँ सबसे ज़्यादा जुल्म की शिकार और बड़ी संख्या में शामिल; कम्युनिस्ट और हैदराबाद कांग्रेस अग्रिम पंक्ति में जनमत के दबाव में जून 1948 में चुनाव, जिससे संवैधानिक राजतंत्र कायम हुआ
टकराव निज़ाम ने रज़ाकार रवाना किए, जिन्होंने गैर-मुसलमानों को निशाना बनाया, लूटपाट, हत्या और बलात्कार किए विधानसभा में गहरे मतभेद: मणिपुर की कांग्रेस विलय के पक्ष में, दूसरी पार्टियाँ खिलाफ़
नतीजा सितंबर 1948 में भारतीय सेना पहुँची; कुछ रोज़ लड़ाई के बाद निज़ाम का आत्मसमर्पण और विलय भारत सरकार ने महाराजा को राजी किया; सितंबर 1949 में सफलता
एक अंक का पक्का सवाल

मणिपुर भारत का पहला भाग है जहाँ सार्वभौम वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाकर चुनाव हुए। यह चुनाव 1948 के जून में हुआ था, यानी विलय से पहले।

9 राज्यों का पुनर्गठन: पूरी कथा एक क्रम में

1920

कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन। इसके बाद से ही कांग्रेस ने यह सिद्धांत मान लिया कि राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर होगा। अनेक प्रांतीय कांग्रेस-समितियाँ भाषाई इलाके के आधार पर बनीं।

1947 के बाद

नेताओं को चिंता: भाषावार प्रांत बने तो अव्यवस्था फैल सकती है, देश टूटने का खतरा है, और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से ध्यान भटक सकता है। रजवाड़ों का मसला अभी हल नहीं हुआ था और बँटवारे की यादें ताज़ा थीं। केंद्रीय नेतृत्व ने मसला स्थगित कर दिया।

विरोध

पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में विरोध भड़का। विशाल आंध्र आंदोलन ने माँग की कि तेलुगुभाषी इलाकों को अलग करके आंध्र प्रदेश बनाया जाए। पुराने मद्रास प्रांत में आज के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश शामिल थे; कुछ हिस्से आज के केरल और कर्नाटक में हैं।

1952

पोट्टी श्रीरामुलु अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर बैठे; 56 दिनों बाद मृत्यु। अव्यवस्था और हिंसा फैली, पुलिस फायरिंग में लोग हताहत हुए, मद्रास में अनेक विधायकों ने इस्तीफ़ा दिया। आखिरकार दिसंबर 1952 में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश की घोषणा की।

1953

दूसरे हिस्सों में भी संघर्ष चलने पर केंद्र सरकार ने राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया। काम: राज्यों के सीमांकन पर गौर करना। सिफ़ारिश: सीमाओं का निर्धारण वहाँ बोली जाने वाली भाषा के आधार पर हो।

1956

राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास; इसके आधार पर 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बनाए गए।

नतीजा, चार बिंदुओं में

1. बहुतों की आशंका के विपरीत देश टूटा नहीं, एकता और ज़्यादा मज़बूत हुई।
2. भाषाई राज्यों और उनके आंदोलनों ने लोकतांत्रिक राजनीति तथा नेतृत्व की प्रकृति को बुनियादी रूपों में बदला।
3. राजनीति और सत्ता में भागीदारी अब एक छोटे-से अंग्रेजीभाषी अभिजात तबके तक सीमित नहीं रही; सीमांकन के लिए एक समरूप आधार भी मिला।
4. सबसे बड़ी बात: विभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकृति मिली। लोकतंत्र को चुनने का अर्थ ही था विभिन्नताओं को पहचानना और स्वीकार करना, यह मानकर चलते हुए कि विभिन्नताओं में आपसी विरोध भी हो सकते हैं। किताब के शब्दों में, भारत में लोकतंत्र की धारणा विचारों और जीवन-पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई थी।

10 नए राज्यों का निर्माण: तारीख़ें

वर्ष क्या बना किससे
1960 महाराष्ट्र और गुजरात द्विभाषी राज्य बंबई से, एक जन-आंदोलन के बाद
1963 नगालैंड किताब के शब्दों में, बाकियों से ‘कहीं पहले’
1966 पंजाब (पंजाबी-भाषी इलाके को दर्ज़ा), हरियाणा, हिमाचल प्रदेश वृहत्तर पंजाब से; यह माँग 1956 में नहीं मानी गई थी, दस साल बाद मानी गई
1972 मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा मेघालय असम से अलग करके; बाकी दो उसी साल अलग राज्य बने
1987 मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर
सन् 2000 छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड भाषा नहीं, अलग क्षेत्रीय संस्कृति और विकास में क्षेत्रीय असंतुलन के आधार पर
2 जून 2014 तेलंगाना नए राज्य के रूप में जुड़ा

अभी चल रहे आंदोलन: महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश, और पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में अलग राज्य बनाने की माँग। किताब का वाक्य: राज्यों के पुनर्गठन की कथा अभी समाप्त नहीं हुई है।

11 नाम, बयान और रचनाएँ

नाम किसलिए याद रखें
सरदार वल्लभभाई पटेल (1875-1950) आज़ादी के आंदोलन और कांग्रेस के नेता; गाँधी के अनुयायी; स्वतंत्र भारत के उप-प्रधानमंत्री और प्रथम गृहमंत्री; देसी रियासतों को भारत संघ में मिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका; संविधान सभा की मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक तथा प्रांतीय संविधान संबंधी समितियों के सदस्य।
पोट्टी श्रीरामुलु (1901-1952) गाँधीवादी कार्यकर्ता; नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी; वैयक्तिक सत्याग्रह में भागीदारी; 1946 में मद्रास प्रांत के मंदिर दलितों के लिए खोलने की माँग पर उपवास; 19 अक्तूबर 1952 से आमरण अनशन; 15 दिसम्बर 1952 को अनशन के दौरान मृत्यु।
खान अब्दुल गफ़्फार खान ‘सीमांत गाँधी’; पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत के निर्विवाद नेता; द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के एकदम खिलाफ़।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (1911-1984) नज़्म ‘सुब्ह-ए-आज़ादी’; सियालकोट में जन्म; विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहे; वामपंथी रुझान के कारण शासन तंत्र से टकराव और लंबा कारावास; संग्रह ‘नक्शे फ़रियादी’, ‘दस्त-ए-सबा’, ‘जिंदानामा’।
अमृता प्रीतम (1919-2005) कविता ‘वारिस शाह से!’; पंजाबी की प्रमुख कवयित्री और कथाकार; साहित्य अकादमी, पदमश्री और ज्ञानपीठ से सम्मानित; विभाजन के बाद दिल्ली में निवास; पत्रिका ‘नागमणि’ का संपादन।
सआदत हसन मंटो कहानी ‘कस्र-ए-नफ़्सी’, जिसके हिंदी रूपांतर से किताब ने ‘मेहमाननवाजी में कसर’ अंश लिया है।
‘गर्म हवा’ (1973) निर्देशक एम.एस. सथ्यु, पटकथा कैफ़ी आज़मी; अभिनय बलराज साहनी, जलाल आगा, फ़ारूख शेख, गीता सिद्धार्थ। आगरा में जूते का व्यवसाय करने वाले सलीम मिर्ज़ा की कहानी; बेटा सिकंदर।
कार्टून / चित्र किताब क्या कहती है
‘स्ट्रगल फॉर सरवाइवल’ (26 जुलाई 1953), साभार शंकर यह कार्टून उस दौर के माहौल को दर्शाता है जब राज्यों को भाषाई आधार पर गठित करने की माँग ज़ोर पकड़ रही थी।
‘कोक्सिंग द जेनी’ (5 फरवरी 1956), साभार शंकर इस कार्टून में राज्य पुनर्गठन आयोग की भाषाई विवाद को सुलझाने की क्षमता पर सवाल उठाया गया है।
रजवाड़ों वाला कार्टून, साभार आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ़ इंडिया यह कार्टून रजवाड़ों की जनता और वहाँ के शासकों के आपसी संबंधों पर टिप्पणी करता है; इसमें यह झलक भी मिलती है कि पटेल रजवाड़ों की समस्या को किस ढंग से हल करना चाहते थे।
तीन डाक-टिकट प्रथम गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी 1950, के अवसर पर जारी किए गए; किताब पूछती है कि इन पर छपे चित्रों से नए गणतंत्र के सामने खड़ी किन चुनौतियों का पता चलता है।
चार बयान जो अकसर पूछे जाते हैं

महात्मा गाँधी, 14 अगस्त 1947, कलकत्ता: ‘‘कल हम अंग्रेजी-राज की गुलामी से आज़ाद हो जाएँगे लेकिन आधी रात को भारत का बँटवारा भी होगा। इसलिए कल का दिन हमारे लिए खुशी का दिन होगा और गम का भी।’’
मुहम्मद अली ज़िन्ना, 11 अगस्त 1947, कराची, पाकिस्तान की संविधान सभा में अध्यक्षीय भाषण: ‘‘आपके धर्म, आपकी जाति या विश्वास से राज्य को कुछ लेना-देना नहीं है।’’
सरदार पटेल, रियासतों के शासकों को एक पत्र में (1947): सहयोग न किया और सर्व-सामान्य की भलाई में साथ मिलकर कदम न बढ़ाया तो अराजकता और अव्यवस्था सबको घेर लेगी।
महात्मा गाँधी, जनवरी 1948, भाषावार प्रांतों पर: ‘‘यदि प्रांतों का गठन भाषावार हुआ तो क्षेत्रीय भाषाओं का ज़ोर बढ़ेगा। हिंदुस्तानी को सभी प्रांतों में शिक्षा का माध्यम बनाने का कोई अर्थ न रह जाएगा और अंग्रेज़ी को इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना तो और भी व्यर्थ है।’’

एक लाइन में पूरा अध्याय

आज़ादी के साथ आए विभाजन, 565 रजवाड़ों और भाषाई माँगों की तिहरी चुनौती से भारत ने मुख्यतः बलप्रयोग से नहीं बल्कि बातचीत, लचीलेपन और विविधता की स्वीकृति से निपटा, और इसी वजह से टूटने के बजाय और मज़बूत हुआ।

12 CBSE 2026-27 संदर्भ सामग्री: पटेल और राष्ट्रीय एकीकरण

स्थिति: CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 में यह अतिरिक्त संदर्भ सामग्री के रूप में दिया गया है। पाठ्यक्रम के परिशिष्ट के अनुसार यह सामग्री कक्षा में पढ़ाने-समझाने के लिए है और बोर्ड परीक्षा में इसका मूल्यांकन नहीं होगा। इसे समझ के लिए पढ़ें; यह NCERT पुस्तक का भाग नहीं है।

पटेल और राष्ट्रीय एकीकरण, पाँच पंक्तियों में
  • खेड़ा सत्याग्रह (1918) और बारडोली सत्याग्रह (1928) के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेता बने।
  • सभी 565 देसी रियासतों को एक करने का काम उठाया; ‘लौह पुरुष’, क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं।
  • मुख्य चुनौतियाँ: हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर; भारतीय सेना ने हैदराबाद और जूनागढ़ को विलय के लिए विवश किया।
  • हैदराबाद की तरह कश्मीर का एकीकरण चाहते थे, पर पूर्ण एकीकरण नहीं करा पाए।
  • ‘राष्ट्रवादी’, ‘उत्प्रेरक’, ‘यथार्थवादी’ (Nationalist, Catalyst, Realist: NCR) कहे जाते हैं।