एक दल के प्रभुत्व का दौर

पहला आम चुनाव 1952कांग्रेस-प्रणालीसर्वाधिक वोट पाने वाले की जीतकेरल 1957गुटजनसंघस्वतंत्र पार्टी

1 लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती

उपनिवेशवाद के चंगुल से आज़ाद हुए कई देशों के नेताओं ने तय किया कि अभी लोकतंत्र नहीं अपनाया जा सकता: उनका कहना था कि राष्ट्रीय एकता पहली प्राथमिकता है और लोकतंत्र से मतभेद और संघर्ष बढ़ेंगे। इसी कारण वहाँ अलोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था कायम हुई। इसके कई रूप थे: कहीं थोड़ा-बहुत लोकतंत्र रहा पर प्रभावी नियंत्रण एक नेता के हाथ में था, कहीं एक दल का शासन कायम हुआ और कहीं सीधे सेना ने सत्ता सँभाली। ऐसी हर व्यवस्था जल्दी लोकतंत्र लाने के वायदे से शुरू हुई, पर एक बार पाँव जम जाने के बाद उसे बदलना मुश्किल होता गया। भारत के नेताओं ने इसके बजाय कठिन लोकतांत्रिक राह चुनी, जो स्वतंत्रता संग्राम के अपने ही मूल्यों के अनुरूप था। हमारे नेता राजनीति को समस्या नहीं, समस्या के समाधान का उपाय मानते थे। संविधान 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत हुआ, 24 जनवरी 1950 को हस्ताक्षरित हुआ, और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

परीक्षा संकेत

भारत के चुनाव आयोग का गठन जनवरी 1950 में हुआ; सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने।

2 पहला आम चुनाव, 1951-52

भारत के पहले चुनाव के लिए चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन और मतदाता-सूची तैयार करनी थी। मतदाता-सूची के पहले प्रारूप में 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज होने से रह गए थे: उन्हें ‘अलां की बेटी’, ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज किया गया था। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को मानने से इनकार कर दिया और तय किया कि संभव हो तो इनका पुनरावलोकन हो और ज़रूरी लगे तो इन्हें हटाया जाए।

याद रखने योग्य आँकड़े

17 करोड़ योग्य मतदाताओं ने 3200 विधायकों और 489 लोकसभा सांसदों को चुना; केवल 15% मतदाता साक्षर थे; चुनाव आयोग ने 3 लाख से अधिक अधिकारियों/मतदान कर्मियों को प्रशिक्षित किया। चुनाव दो बार टाले गए, अंततः अक्तूबर 1951 से फ़रवरी 1952 तक हुए: इसे ‘1952 का चुनाव’ कहा जाता है क्योंकि देश के अधिकांश हिस्सों में मतदान 1952 में ही हुआ।

एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ करार दिया, पर परिणाम घोषित होने पर हारने वाले उम्मीदवारों ने भी इन्हें निष्पक्ष बताया। 1952 का चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ: अब यह दलील नहीं दी जा सकती थी कि ग़रीबी या अशिक्षा के माहौल में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं कराए जा सकते। मतदान की विधि समय के साथ बदली: हर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी → एक मतपत्र पर मुहर (अगले चालीस साल तक इस्तेमाल) → 1990 के दशक के अंत से EVM, और 2004 तक पूरे देश में।

पहले चुनाव का तरीका: हर उम्मीदवार की अलग मतपेटी

हर मतदान केंद्र में हर उम्मीदवार के लिए एक मतपेटी रखी गई, जिस पर उसका चुनाव-चिह्न अंकित था; मतदाता को एक खाली मतपत्र मिलता था, जिसे वह अपनी पसंद के उम्मीदवार की पेटी में डालता था। इसके लिए तकरीबन 20 लाख स्टील के बक्से लगे।

पंजाब के एक पीठासीन पदाधिकारी का ब्यौरा: हर पेटी के भीतर और बाहर उम्मीदवार का चुनाव-चिह्न अंकित करना था और बाहर एक तरफ़ उम्मीदवार का नाम उर्दू, हिंदी और पंजाबी में लिखना था; यह सब चुनाव की तारीख से ठीक एक दिन पहले करना था। छह लोगों ने पाँच घंटे लगातार काम किया, जिनमें उनकी दो बेटियाँ भी थीं, और सारा काम उनके घर पर ही हुआ।

सार्वभौम मताधिकार पर संदेह, और चुनाव के बाद के फ़ैसले

उस वक्त तक लोकतंत्र सिर्फ़ धनी देशों में कायम था, और यूरोप के बहुतेरे देशों में महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला था। ऐसे में ग़रीब और अनपढ़ मतदाताओं वाले देश में सार्वभौम मताधिकार (हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार) पर अमल बड़ा जोखिम भरा प्रयोग माना गया:

  • ‘आर्गनाइजर’ पत्रिका ने लिखा कि जवाहरलाल नेहरू ‘अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे और पछताएँगे कि भारत में सार्वभौम मताधिकार असफल रहा।’
  • इंडियन सिविल सर्विस के एक अँग्रेज़ नुमाइंदे का दावा था कि ‘आने वाला वक्त और अब से कहीं ज्यादा जानकार दौर बड़े विस्मय से लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदी नौटंकी देखेगा।’

चुनाव में औसतन हर सीट पर चार उम्मीदवार थे, कुल मतदाताओं में आधे से अधिक ने वोट डाला, और अभियान, मतदान और मतगणना में कुल छह महीने लगे। इसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने माना कि इन चुनावों ने ‘उन सभी आलोचकों के संदेहों पर पानी फेर दिया है जो सार्वभौम मताधिकार की इस शुरुआत को इस देश के लिए जोखिम का सौदा मान रहे थे।’ हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा: ‘यह बात हर जगह मानी जा रही है कि भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रयोग को बखूबी अंजाम दिया।’

3 पहले तीन आम चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व

चुनाव क्या हुआ
1952 कांग्रेस ने लोकसभा की 489 में से 364 सीटें जीतीं; CPI (अगली सबसे बड़ी पार्टी) को केवल 16 सीटें मिलीं। जिन राज्यों में शुरू में बहुमत नहीं था (त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास, उड़ीसा), वहाँ भी कांग्रेस ने सरकार बनाई। नेहरू प्रधानमंत्री बने।
1957 और 1962 कांग्रेस ने लोकसभा की तीन-चौथाई सीटें जीतना जारी रखा; कोई भी विपक्षी दल कांग्रेस की सीटों के दसवें हिस्से तक भी नहीं पहुँच सका।
केरल, 1957 महत्त्वपूर्ण अपवाद: CPI के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य सरकार बनाई।
याद रखेंपरिभाषा 1

हमारी चुनाव-प्रणाली में ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ (फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) का तरीका अपनाया गया है: जो पार्टी बाकियों से थोड़े ज़्यादा वोट पाती है, उसे वोटों के अनुपात की तुलना में कहीं ज़्यादा सीटें मिलती हैं। इसी से कांग्रेस की जीत का आँकड़ा बढ़ा-चढ़ा दिखता है: 1952 में कांग्रेस को मात्र 45% वोट मिले पर 74% सीटें, क्योंकि ग़ैर-कांग्रेसी वोट कई प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों में बँट गए, जबकि उनका कुल जोड़ कांग्रेस के वोटों से कहीं ज़्यादा था। उलटा हाल सोशलिस्ट पार्टी का हुआ: वोट के लिहाज़ से दूसरे नंबर पर रहकर उसे पूरे देश में कुल 10 प्रतिशत वोट मिले, पर वह 3 प्रतिशत सीटें भी नहीं जीत पाई।

4 केरल में कम्युनिस्टों की जीत, और सरकार की बर्ख़ास्तगी

मार्च 1957 के केरल विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ने 126 में से 60 सीटें जीतीं और उसे पाँच स्वतंत्र (निर्दलीय) उम्मीदवारों का समर्थन भी मिला। राज्यपाल ने कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया: दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के ज़रिए बनी। कांग्रेस ने इस निर्वाचित सरकार के विरुद्ध ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ा (कम्युनिस्टों का कहना था कि इस संघर्ष की अगुआई निहित स्वार्थ और धार्मिक संगठन कर रहे हैं), और 1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने अनुच्छेद 356 के तहत इसे बर्ख़ास्त कर दिया। यह फ़ैसला बड़ा विवादास्पद साबित हुआ, और संविधान-प्रदत्त आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में इसका बार-बार हवाला दिया गया।

5 भारत का एक-दलीय प्रभुत्व अलग क्यों था

दुनिया के कई देशों ने एक पार्टी का प्रभुत्व देखा है, पर वहाँ यह लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ: चीन, क्यूबा और सीरिया के संविधान में सिर्फ़ एक ही पार्टी को शासन की अनुमति है; म्यांमार, बेलारूस और इरीट्रिया में यह प्रभुत्व कानूनी और सैन्य उपायों के चलते कायम हुआ; और कुछ साल पहले तक मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताईवान भी एक पार्टी के प्रभुत्व वाले देश थे। भारत का मामला अलग था: कांग्रेस का प्रभुत्व लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ, अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में होड़ की, फिर भी कांग्रेस जीतती रही। भारत का उदाहरण दक्षिण अफ्रीका से मिलता-जुलता है, जहाँ रंगभेद की समाप्ति के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का ऐसा ही दबदबा कायम हुआ।

इस प्रभुत्व के कारण: कांग्रेस को स्वतंत्रता संग्राम की विरासत मिली; उसका ही देशभर में संगठन था; उसके पास नेहरू जैसा सबसे लोकप्रिय, करिश्माई नेता था; और उसे ‘अव्वल और एकलौता’ होने का फ़ायदा मिला, क्योंकि अनेक पार्टियाँ स्वतंत्रता के आस-पास या उसके बाद ही बनीं।

6 कांग्रेस एक सामाजिक और विचारधारात्मक गठबंधन के रूप में

कांग्रेस 1885 में नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों के एक हित-समूह के रूप में शुरू हुई, 20वीं सदी में जन-आंदोलन बनी: हर सविनय अवज्ञा आंदोलन के साथ इसका सामाजिक आधार व्यापक होता गया, जिसमें किसान, उद्योगपति, शहरी और ग्रामीण, श्रमिक और मालिक, सभी वर्ग-जातियाँ शामिल हुईं। आज़ादी के समय तक यह एक सतरंगा सामाजिक गठबंधन बन चुकी थी, और साथ ही एक विचारधारात्मक गठबंधन भी, जिसमें क्रांतिकारी और शांतिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी, दक्षिणपंथी, वामपंथी और हर धारा के मध्यमार्गी: सभी समाहित थे।

गुटों में तालमेल और सहनशीलता

1

गठबंधनी स्वभाव। जो भी आए, गठबंधन उसे अपने में शामिल कर लेता है, इसलिए कांग्रेस को अतिवादी रुख़ से बचना और हर मसले पर संतुलन साधना पड़ता था; सुलह-समझौता और सर्व-समावेशिता उसकी विशेषता बनी। विपक्ष जो बात कहना चाहता, उसे कांग्रेस की विचारधारा और कार्यक्रम में तुरंत जगह मिल जाती थी।

2

मतभेदों के प्रति सहनशीलता। कोई समूह पार्टी के रुख़ से या सत्ता में अपने हिस्से से नाखुश होता, तब भी वह पार्टी छोड़कर विपक्षी बनने के बजाय भीतर रहकर किसी दूसरे समूह से लड़ना बेहतर समझता था। पार्टी के अंदर के ऐसे समूह गुट कहलाते हैं; कुछ विचारधारात्मक सरोकारों से बने, पर अकसर उनके पीछे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा और प्रतिस्पर्धा की भावना थी।

3

गुटबाजी ताकत बनी। भीतर होड़ की गुंजाइश थी, इसलिए अलग-अलग हितों और विचारधाराओं के नेता नई पार्टी बनाने के बजाय कांग्रेस में ही बने रहे। अधिकतर प्रांतीय इकाइयाँ गुटों को मिलाकर बनी थीं, और कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरती थी।

4

संतुलन का औजार। दूसरी पार्टियाँ मुख्यतः कांग्रेस के किसी गुट को प्रभावित करके हाशिए से ही नीतियों पर अप्रत्यक्ष असर डाल पाती थीं। गुटों की यह प्रणाली शासक-दल के भीतर संतुलन साधने के औजार की तरह काम करती थी।

ध्यान देने योग्य: ‘कांग्रेस-प्रणाली’

कांग्रेस के गठबंधन-सदृश स्वरूप ने उसे असाधारण ताक़त दी: सभी को साथ रखने के लिए उसे चरम रुख़ से बचना पड़ता था, और आंतरिक असहमति को नई पार्टियों में जाने देने के बजाय ‘गुटों’ के रूप में सहन किया जाता था। चूँकि असली राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कांग्रेस के भीतर होती थी, चुनावी प्रतिस्पर्धा के पहले दशक में कांग्रेस ने शासक-दल की भूमिका भी निभाई और विपक्ष की भी: इसी कारण इस दौर को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।

7 इस दौर के विपक्षी दल

इस काल में इन सभी को केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व मिला, पर इनकी मौजूदगी ने शासन-व्यवस्था के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई: इन्होंने कांग्रेस की नीतियों की सुचिन्तित, सिद्धांतों वाली आलोचना की; शासक-दल पर अंकुश रखा और कई बार कांग्रेस के भीतर शक्ति-संतुलन बदला; लोकतांत्रिक विकल्प की संभावना जीवित रखकर व्यवस्थाजन्य रोष को लोकतंत्र-विरोधी बनने से रोका; और ऐसे नेता तैयार किए जिन्होंने आगे देश की तस्वीर सँवारने में अहम भूमिका निभाई। आज की लगभग सभी गैर-कांग्रेसी पार्टियों की जड़ें 1950 के दशक की किसी न किसी विपक्षी पार्टी में खोजी जा सकती हैं।

दल स्थापना विचारधारा / नेता
सोशलिस्ट पार्टी (एसपी) 1948 (जड़ें: 1934 में कांग्रेस के भीतर बनी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी) लोकतांत्रिक समाजवाद; कांग्रेस पर पूँजीपतियों और ज़मींदारों का पक्ष लेने और मज़दूरों-किसानों की उपेक्षा का आरोप। 1948 में कांग्रेस ने दोहरी सदस्यता रोकने के लिए अपना संविधान बदला, इसलिए समाजवादियों को अलग होना पड़ा। 1955 में कांग्रेस ने ‘समाजवादी बनावट वाले समाज’ को लक्ष्य घोषित किया तो समाजवादी दुविधा में पड़े: राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में कुछ ने कांग्रेस से दूरी बढ़ाई, जबकि अशोक मेहता जैसे कुछ ने हल्के-फुल्के सहयोग की तरफ़दारी की। कई टुकड़े हुए, जिनसे किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनीं। नेता: जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, राममनोहर लोहिया, एस.एम. जोशी। आज के समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और जनता दल (सेक्युलर) पर इसकी छाप देखी जा सकती है
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) जड़ें 1920 के दशक के शुरुआती सालों के साम्यवादी समूहों में (रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित); 1935 से कांग्रेस के दायरे में काम; दिसम्बर 1941 में अलग हुए, जब उन्होंने नाजी जर्मनी के खिलाफ़ लड़ रहे ब्रिटेन को समर्थन देने का फ़ैसला किया आज़ादी के समय सुचारू पार्टी मशीनरी और समर्पित कॉडर। पार्टी का विचार था कि 1947 का सत्ता-हस्तांतरण सच्ची आज़ादी नहीं थी; इसी विचार से तेलंगाना में हिंसक विद्रोह को बढ़ावा दिया, जिसे जनता का समर्थन नहीं मिला और सशस्त्र सेनाओं ने दबा दिया। 1951 में हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़कर चुनावों में भाग लेने का फ़ैसला। 1952 में 16 सीटें जीतकर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी; ज़्यादातर समर्थन आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में। चीन और सोवियत संघ के बीच विचारधारात्मक अंतर के बाद 1964 में बड़ी टूट: सोवियत संघ की विचारधारा को ठीक मानने वाले CPI में रहे, विरोधियों ने CPI(M) बनाई; दोनों दल आज तक कायम हैं। नेता: ए.के. गोपालन, एस.ए. डांगे, ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद, पी.सी. जोशी, अजय घोष, पी. सुंदरैया
भारतीय जनसंघ (BJS) 1951, संस्थापक-अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’; ‘अखंड भारत’ की माँग; अंग्रेज़ी की जगह हिंदी को बढ़ावा; अल्पसंख्यक रियायतों का विरोध; चीन के 1964 के आण्विक-परीक्षण के बाद भारत के आण्विक हथियारों की पैरोकारी। 1952 में केवल 3 और 1957 में 4 लोकसभा सीटें; शुरुआती समर्थन राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के शहरी इलाकों में। नेता: श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक। भारतीय जनता पार्टी की जड़ें इसी जनसंघ में हैं
स्वतंत्र पार्टी 1959, नेतृत्व सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) (यह जानकारी पाठ्यपुस्तक के इस अध्याय में नहीं है) इस अध्याय में इस पार्टी का परिचय-बक्सा नहीं है; पार्टी का नाम सिर्फ़ चुनावी नक्शे की दल-सूची और प्रश्नावली में आता है। प्रश्नावली 1(ग) का अपेक्षित उत्तर: इसका एक निर्देशक सिद्धांत था राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था। प्रश्नावली 2 का अपेक्षित मेल: मीनू मसानी इसी दल से (किताब उत्तर-कुंजी नहीं छापती)। यह दल केंद्रीकृत नियोजन, अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण और भूमि-सीमा क़ानूनों का विरोधी था (यह जानकारी पाठ्यपुस्तक के इस अध्याय में नहीं है)
परीक्षा संकेत

शुरुआती सालों में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं के बीच पारस्परिक सम्मान का गहरा भाव था: अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे; नेहरू ने समाजवादी जयप्रकाश नारायण को अपनी सरकार में शामिल होने का न्यौता दिया। समय के साथ दलगत प्रतिस्पर्धा तीव्र होने पर यह कम हो गया। सबको अपने में समाहित करने की कांग्रेस की क्षमता जैसे-जैसे घटी, दूसरे दलों को महत्त्व मिलने लगा: कांग्रेस का प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा।

8 अध्याय के व्यक्ति, उद्धरण और नक्शे की जानकारी

दो उद्धरण

डॉ. भीमराव अंबेडकर (संविधान सभा में भाषण, 25 नवंबर 1949): हिंदुस्तान की राजनीति में नायक-पूजा जितनी बड़ी भूमिका अदा करती है, उतनी दुनिया के किसी देश में नहीं; पर ‘राजनीति में नायक-पूजा का भाव सीधे पतन की ओर ले जाता है और यह रास्ता तानाशाही की तरफ़ जाता है।’

जवाहरलाल नेहरू का राजाजी को पत्र, कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर टंडन की जीत के बाद: अगर कांग्रेस के सदस्य टंडन के निर्वाचन को सरकार या कांग्रेस में उनकी मौजूदगी से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण समझते हैं, तो वे कांग्रेस और सरकार के भीतर पूरी तरह अप्रासांगिक हो चुके हैं।

व्यक्ति पाठ्यपुस्तक के जीवनी-बक्से से
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888-1958) मूल नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद; इस्लाम के विद्वान; हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतिपादक; विभाजन के विरोधी; संविधान सभा के सदस्य; पहले मंत्रिमंडल में शिक्षामंत्री
राजकुमारी अमृत कौर (1889-1964) गाँधीवादी स्वतंत्रता सेनानी; कपूरथला के राजपरिवार में जन्म; विरासत में माता से ईसाई धर्म; संविधान सभा की सदस्य; पहले मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री, 1957 तक
आचार्य नरेन्द्र देव (1889-1956) कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक; किसान आंदोलन में सक्रिय; बौद्ध धर्म के विद्वान; आज़ादी के बाद पहले सोशलिस्ट पार्टी और बाद में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व
भीमराव रामजी अंबेडकर (1891-1956) जाति विरोधी आंदोलन के नेता; इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के संस्थापक, बाद में शिडयूल्ड कास्टस् फेडरेशन; रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के गठन के योजनाकार; दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वायसराय की काउंसिल में सदस्य; प्रारूप समिति के अध्यक्ष; नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री; हिंदू कोड बिल पर 1951 में इस्तीफा; 1956 में हज़ारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया
रफी अहमद किदवई (1894-1954) उत्तर प्रदेश से कांग्रेस नेता; प्रांतीय सरकार (1937) में मंत्री, 1946 में दोबारा; पहले मंत्रिमंडल में संचार मंत्री; खाद्य एवं कृषि मंत्री (1952-54)
ए.के. गोपालन (1904-1977) केरल के कम्युनिस्ट नेता; शुरुआत कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में; 1939 में कम्युनिस्ट पार्टी में; 1964 की टूट के बाद CPI(M) में; 1952 से सांसद
दीन दयाल उपाध्याय (1916-1968) 1942 से आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ता; भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य; पहले महासचिव फिर अध्यक्ष; समग्र मानवतावाद सिद्धांत के प्रणेता
श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953) हिंदू महासभा के नेता; भारतीय जनसंघ के संस्थापक; नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री; पाकिस्तान के साथ संबंधों पर मतभेद के चलते 1950 में इस्तीफा; संविधान सभा और लोकसभा के सदस्य; कश्मीर को स्वायत्तता देने के खिलाफ़; जनसंघ के प्रदर्शन के दौरान गिरफ़्तार; हिरासत में मौत
चुनावी नक्शे की जानकारी, शब्दों में

पाठ्यपुस्तक के 1952, 1957 और 1962 के चुनावी नक्शे के साथ दलों के ये संक्षेप छपे हैं: भाराकाँ (इंडियन नेशनल कांग्रेस), नि (निर्दलीय), सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया), सोपा (सोशलिस्ट पार्टी), किमपा (किसान मज़दूर प्रजा पार्टी), स्वतंत्र (स्वतंत्र पार्टी), प्रसोपा (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी), हिंदू महा. (अखिल भारतीय हिन्दू महासभा), जनसंघ (आल इंडिया भारतीय जनसंघ), झापा (झारखंड पार्टी), एससीएफ (शिडयूल्ड कास्टस् फेडरेशन), डीएमके (द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम), गप (गणतंत्र परिषद), पीडीएफ (पीपल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट)।

1952-1967 के दौरान कांग्रेस शासित राज्यों के दो अपवाद: केरल (डेमोक्रेटिक लेफ़्ट फ्रंट, 1957-1959) और जम्मू और कश्मीर (नेशनल कॉन्फ्रेंस)।

रजनी कोठारी का अवतरण और ‘सिंहासन’ फ़िल्म

रजनी कोठारी (प्रश्नावली 5 का अवतरण): पटेल कांग्रेस को दूसरे राजनीतिक समूहों से निसंग रखकर एक सर्वांगसम और अनुशासित पार्टी बनाना चाहते थे। लेखक के अनुसार, जैसे ‘आंदोलन को चलाते चले जाने’ के बारे में गाँधी के ख्याल हद से ज़्यादा रोमानी थे, वैसे ही पटेल की यह धारणा भी कांग्रेस की उस समन्वयवादी भूमिका को पकड़ने में चूक गई जिसे कांग्रेस को आने वाले दशकों में निभाना था।

सिंहासन (1981): अरुण साधु के दो उपन्यासों ‘सिंहासन’ और ‘मुंबई दिनांक’ पर आधारित मराठी फ़िल्म, जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए सत्तारूढ़ दल के भीतर की रस्साकशी और उसमें विपक्ष की भूमिका दिखाती है। निर्देशक जब्बार पटेल, पटकथा विजय तेंदुलकर।

झटपट दोहराव: परीक्षा से एक रात पहले पढ़ें
  • संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू; चुनाव आयोग जनवरी 1950 में बना, सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त
  • पहला आम चुनाव: अक्तूबर 1951 से फ़रवरी 1952; 17 करोड़ मतदाता, केवल 15% साक्षर
  • 1952 में कांग्रेस ने केवल 45% वोट से 364/489 सीटें जीतीं: ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ वाली प्रणाली का असर
  • केरल 1957: दुनिया में पहली बार चुनाव से बनी कम्युनिस्ट सरकार (ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद); 1959 में अनुच्छेद 356 से बर्ख़ास्त
  • भारत का प्रभुत्व अनूठा था: यह सच्चे स्वतंत्र चुनावों में हुआ, अन्य एक-दलीय राज्यों के विपरीत
  • कांग्रेस सामाजिक व वैचारिक ‘गठबंधन’ थी; गुटों की आपसी होड़ से कांग्रेस के भीतर ही विपक्ष की भूमिका निभ जाती थी: ‘कांग्रेस-प्रणाली’
  • मुख्य विपक्षी दल: सोशलिस्ट पार्टी, CPI, भारतीय जनसंघ (स्वतंत्र पार्टी इस अध्याय में सिर्फ़ प्रश्नावली और चुनावी नक्शे की दल-सूची में)
अभ्यास प्रश्न: 1 अंक
  1. 1 अंकस्वतंत्र भारत के पहले चुनाव आयुक्त कौन थे?
  2. 1 अंक1952 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?
  3. 1 अंकलोकतांत्रिक चुनाव से बनी दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकार का नेतृत्व किसने और कहाँ किया?
  4. 1 अंक1959 में केरल सरकार को किस अनुच्छेद के तहत बर्ख़ास्त किया गया?
  5. 1 अंकभारतीय जनसंघ की स्थापना किसने की?
  6. 1 अंकप्रश्नावली 2 के मेल में मीनू मसानी का मेल किस दल से बैठता है?
  7. 1 अंककांग्रेस पार्टी के भीतर के आंतरिक समूहों को क्या कहा जाता है?
  8. 1 अंकपूरा देश किस वर्ष तक EVM पर स्थानांतरित हो गया?
अभ्यास प्रश्न: 2 और 4 अंक
  1. 2 अंक1952 में कांग्रेस को अपने वोट-हिस्से से कहीं अधिक सीटें क्यों मिलीं?
  2. 2 अंक‘कांग्रेस-प्रणाली’ क्या थी?
  3. 2 अंकइस दौर के किन्हीं दो विपक्षी दलों और उनके संस्थापकों के नाम लिखिए।
  4. 4 अंकभारत का एक-दलीय प्रभुत्व अन्य देशों से अलग क्यों था?
  5. 4 अंक1957 के केरल चुनाव और उसके बाद की घटनाओं के महत्व की व्याख्या कीजिए।
  6. 4 अंककांग्रेस को ‘सामाजिक व वैचारिक गठबंधन’ किस बात ने बनाया?
  7. 4 अंककेवल प्रतीकात्मक सीटें जीतने के बावजूद विपक्षी दलों ने क्या भूमिका निभाई?
अभ्यास प्रश्न: 6 अंक
  1. 6 अंकपहले तीन आम चुनावों में कांग्रेस के प्रभुत्व के कारणों की चर्चा कीजिए।
  2. 6 अंकसोशलिस्ट पार्टी, CPI और भारतीय जनसंघ की विचारधारा और नेतृत्व का वर्णन कीजिए।
  3. 6 अंक1951-52 का पहला आम चुनाव कैसे संपन्न हुआ, और यह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण क्यों था?
बहुविकल्पीय प्रश्न
  1. 1 अंक1952 के चुनाव में कांग्रेस को कितना वोट-हिस्सा मिला?
    (क) 25%(ख) 45%(ग) 60%(घ) 74%
  2. 1 अंकपहले आम चुनाव में दूसरी सबसे अधिक सीटें जीतने वाला दल था:
    (क) प्रजा सोशलिस्ट पार्टी(ख) भारतीय जनसंघ(ग) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(घ) स्वतंत्र पार्टी
  3. 1 अंककेरल की साम्यवादी सरकार किस वर्ष बर्ख़ास्त की गई?
    (क) 1952(ख) 1957(ग) 1959(घ) 1964
  4. 1 अंकभारतीय जनसंघ की जड़ें किससे जुड़ी हैं?
    (क) कांग्रेस समाजवादी पार्टी(ख) RSS और हिंदू महासभा(ग) स्वतंत्र पार्टी(घ) CPI
  5. 1 अंकCPI का CPI और CPI(M) में विभाजन किस वर्ष हुआ?
    (क) 1951(ख) 1957(ग) 1959(घ) 1964
अभिकथन एवं कारण

विकल्प: (क) दोनों सही, कारण सही व्याख्या · (ख) दोनों सही, पर व्याख्या नहीं · (ग) अभिकथन सही, कारण ग़लत · (घ) अभिकथन ग़लत, कारण सही।

  1. 1 अंक
    अभिकथन (A): भारत का कांग्रेस-प्रभुत्व चीन जैसे देशों के एक-दलीय प्रभुत्व जैसा ही था।
    कारण (R): कांग्रेस वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष बहुदलीय चुनावों में बार-बार जीती।
  2. 1 अंक
    अभिकथन (A): आंतरिक गुट कांग्रेस पार्टी की केवल एक कमज़ोरी थे।
    कारण (R): गुटों ने विविध समूहों को पार्टी छोड़कर बाहरी विपक्ष बनने के बजाय भीतर ही लड़ने दिया।
उत्तर कुंजी
बहुविकल्पीय 1-5(ख) (ग) (ग) (ख) (घ)  ·  अभिकथन 1(घ): अभिकथन ग़लत, भारत का मामला अलग था · 2(घ): अभिकथन ग़लत, गुट एक ताक़त थे
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