कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 3 नियोजित विकास की राजनीति महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. योजना आयोग की स्थापना कब और किस तरीके से हुई?

उत्तर: योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के ज़रिए की। यह संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं था।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. ‘बॉम्बे प्लान’ क्या था?

उत्तर: 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ और इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया। इसी को ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है। इसकी मंशा थी कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. नीति आयोग का पूरा नाम क्या है और यह कब अस्तित्व में आया?

उत्तर: नीति आयोग का पूरा नाम राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था है। भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर इसकी स्थापना की और यह 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आया।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. पंचवर्षीय योजना से क्या आशय है?

उत्तर: पंचवर्षीय योजना का सीधा-सादा विचार यह था कि भारत सरकार अपनी तरफ़ से एक दस्तावेज़ तैयार करेगी, जिसमें अगले पाँच सालों के लिए उसकी आमदनी और खर्च की योजना होगी।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. योजना-व्यय और गैरयोजना-व्यय में क्या अंतर है?

उत्तर: गैरयोजना-व्यय के अंतर्गत सालाना आधार पर दैनंदिन मदों पर खर्च करना था। योजना-व्यय को योजना में तय की गई प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए पाँच साल की अवधि में खर्च करना था।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ‘वामपंथ’ से किन लोगों की तरफ़ संकेत किया जाता है?

उत्तर: ‘वामपंथ’ से अक्सर उन लोगों की तरफ़ संकेत किया जाता है जो अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण के पक्ष में हैं और मुक्त प्रतिस्पर्धा पर राज्य विनियमन को प्राथमिकता देते हैं।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. के.एन. राज की क्या दलील थी?

उत्तर: प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार करने में जुटे इस युवा अर्थशास्त्री की दलील थी कि अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. ‘केरल मॉडल’ किसे कहा जाता है?

उत्तर: केरल में विकास और नियोजन के लिए जो रास्ता चुना गया, उसे ‘केरल मॉडल’ कहा जाता है। इस मॉडल में शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन पर ज़ोर दिया जाता रहा है।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. उड़ीसा की राज्य सरकार इस्पात-निर्माताओं के साथ सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर करके क्या हासिल करना चाहती थी?

उत्तर: इस्पात की विश्वव्यापी माँग बढ़ने पर उड़ीसा निवेश के लिहाज़ से एक महत्त्वपूर्ण जगह के रूप में उभरा, क्योंकि वहाँ लौह-अयस्क का विशाल भंडार था और उसका दोहन बाकी था। राज्य सरकार इस अप्रत्याशित माँग को भुनाना चाहती थी। उसे लगता था कि इससे राज्य में ज़रूरी पूँजी-निवेश भी हो जाएगा और रोज़गार के अवसर भी बड़ी संख्या में सामने आएँगे।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. उड़ीसा वाले उदाहरण में आदिवासियों और पर्यावरणविदों की चिंताएँ क्या थीं?

उत्तर: आदिवासियों को डर था कि अगर वहाँ उद्योग लग गए तो उन्हें अपने घर-बार से विस्थापित होना पड़ेगा और उनकी आजीविका भी छिन जाएगी। पर्यावरणविदों को इस बात का भय था कि खनन और उद्योग से पर्यावरण प्रदूषित होगा।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. अध्याय क्यों कहता है कि विकास से जुड़े फ़ैसले विशेषज्ञ नहीं ले सकते?

उत्तर: इस तरह के फ़ैसलों में एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे सामाजिक-समूह के हितों की तुलना में तौला जाता है, और मौजूदा पीढ़ी तथा आने वाली पीढ़ी के हितों को भी लाभ-हानि की तुला पर मापना पड़ता है। खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय राजनीतिक निर्णय होना चाहिए, क्योंकि जन-प्रतिनिधि ही जनता की भावनाओं को समझते हैं।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. अध्याय यह कैसे दिखाता है कि ‘विकास’ के अर्थ अलग-अलग तबकों के लिए अलग-अलग होते हैं?

उत्तर: अध्याय कहता है कि इतना कह देने भर से बात नहीं बनती कि हर कोई विकास चाहता है। इस्पात-संयंत्र बैठाने की योजना बना रहे उद्योगपति, इस्पात के किसी शहरी उपभोक्ता और इस्पात-संयंत्र के लिए प्रस्तावित इलाके में रह रहे किसी आदिवासी के लिए ‘विकास’ का अर्थ अलग-अलग होगा। इसी कारण ‘विकास’ से जुड़ी कोई भी चर्चा विवादों से परे नहीं होती।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. आज़ादी के बाद के पहले दशक में ‘विकास’ और ‘आधुनिक’ होने का क्या अर्थ लगाया जाता था?

उत्तर: उस वक्त लोग ‘विकास’ की बात आते ही ‘पश्चिम’ का हवाला देते थे। ‘विकास’ का अर्थ था ज़्यादा-से-ज़्यादा आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना। माना जाता था कि हर देश को पश्चिमी मुल्कों की तरह आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से गुज़रना होगा, और आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति तथा वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था। किताब इसी पन्ने के हाशिये पर विद्यार्थी से सवाल भी करती है: ‘क्या आप यह कह रहे हैं कि आधुनिक बनने के लिए पश्चिमी होना ज़रूरी नहीं है? क्या यह संभव है?’

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. 1940 और 1950 के दशक में नियोजन के विचार को दुनिया भर में जनसमर्थन क्यों मिला?

उत्तर: यूरोप ‘महामंदी’ का शिकार होकर कुछ सबक सीख चुका था; जापान और जर्मनी ने युद्ध की विभीषिका झेलने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था फिर खड़ी कर ली थी; और सोवियत संघ ने 1930 तथा 1940 के दशक में भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति की थी। इन सारी बातों के कारण नियोजन के पक्ष में दुनिया भर में हवा बह रही थी।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. योजना आयोग की भूमिका किस तरह की थी?

उत्तर: योजना आयोग एक सलाहकार की भूमिका निभाता था और इसकी सिफारिशें तभी प्रभावकारी हो पाती थीं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंजूर करे। इसके बावजूद भारत अपने विकास के लिए कौन-सा रास्ता और रणनीति अपनाएगा, यह फ़ैसला करने में इस संस्था ने केंद्रीय और सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. पंचवर्षीय योजना पर अमल करने का क्या फ़ायदा था?

उत्तर: पंचवर्षीय योजना पर अमल करने का एक फ़ायदा यह था कि सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की एक बड़ी तसवीर होती थी और वह अर्थव्यवस्था में लंबी अवधि के हस्तक्षेप कर सकती थी।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. योजनाकारों के लिए बचत बढ़ाना कठिन क्यों था, और आगे बचत का क्या हुआ?

उत्तर: योजनाकारों का बुनियादी लक्ष्य राष्ट्रीय आय का स्तर ऊँचा करना था, जो तभी संभव था जब लोगों की बचत उनके खर्चे से ज़्यादा हो। 1950 के दशक में खर्च का स्तर पहले ही बहुत नीचे था और उसे और कम नहीं किया जा सकता था; साथ ही देश में रोज़गार के काबिल लोगों की तुलना में पूँजी-भंडार कम था। नियोजन की प्रक्रिया में लोगों की बचत तीसरी पंचवर्षीय योजना तक बढ़ी, पर उम्मीद के अनुरूप नहीं। 1960 के दशक से 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक बचत की मात्रा में लगातार कमी आई।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. प्रथम पंचवर्षीय योजना की मुख्य बातें लिखिए।

उत्तर: प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) की कोशिश देश को गरीबी के मकड़जाल से निकालने की थी। इसे तैयार करने में जुटे विशेषज्ञों में एक के.एन. राज थे, जिनकी दलील थी कि अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा। इस योजना में ज़्यादा ज़ोर कृषि-क्षेत्र पर था और इसी के अंतर्गत बाँध तथा सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया, क्योंकि विभाजन के कारण कृषि-क्षेत्र को गहरी मार लगी थी। भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशि आबंटित की गई। योजना में माना गया कि देश में भूमि के वितरण का मौजूदा ढर्रा कृषि के विकास की सबसे बड़ी बाधा है, इसलिए भूमि-सुधार पर ज़ोर दिया गया और उसे देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना गया।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. दूसरी पंचवर्षीय योजना पहली से किन अर्थों में अलग थी?

उत्तर: दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर ज़ोर दिया गया, जबकि पहली योजना का ज़्यादा ज़ोर कृषि-क्षेत्र पर था। इसे पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की एक टोली ने तैयार किया था। पहली योजना का मूलमंत्र धीरज था, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी और इसके लिए हर संभव दिशा में बदलाव की बात तय की गई थी। सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया, जिससे निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के उद्योगों को आगे बढ़ने में मदद मिली। चूँकि इस अवधि में बचत और निवेश दोनों बढ़ रहे थे, इसलिए बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार जैसे उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किया जा सका।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. तेज़ औद्योगीकरण की रणनीति के साथ कौन-सी समस्याएँ जुड़ी थीं?

उत्तर: भारत प्रौद्योगिकी के लिहाज़ से पिछड़ा हुआ था, इसलिए उसे विश्व बाज़ार से प्रौद्योगिकी खरीदने में अपनी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी। इसके अतिरिक्त उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज़्यादा आकर्षित किया, जिससे खाद्यान्न-संकट की आशंका अलग से सता रही थी। भारत के योजनाकारों को उद्योग और कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई। तीसरी पंचवर्षीय योजना दूसरी से कुछ खास अलग नहीं थी।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. नियोजन की रणनीति पर कौन-सी मुख्य आलोचनाएँ हुईं?

उत्तर: आलोचकों ने ध्यान दिलाया कि तीसरी योजना के समय से योजना की रणनीतियों में सीधे-सीधे ‘शहरों’ की तरफ़दारी होती नज़र आती है। कुछ अन्य लोगों का मानना था कि कृषि की जगह उद्योग को प्राथमिकता देकर गलती की गई। कुछ ऐसे भी लोग थे जो चाहते थे कि भारी उद्योगों की जगह कृषि-आधारित उद्योगों पर ज़ोर दिया जाए। इसके बावजूद अध्याय यह भी कहता है कि तमाम आलोचनाओं के बीच इस वक्त तक भारत के आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ चुकी थी।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. ‘केरल मॉडल’ को विकेंद्रित नियोजन का उदाहरण क्यों कहा जाता है?

उत्तर: ज़रूरी नहीं कि हर नियोजन केंद्रीकृत ही हो, और न ही नियोजन का मतलब हमेशा उद्योगों तथा बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से लगाया जाए। केरल में चुने गए रास्ते में शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन पर ज़ोर दिया जाता रहा है। केरल में प्रति व्यक्ति आय अपेक्षाकृत कम है और औद्योगिक-आधार भी तुलनात्मक रूप से कमज़ोर रहा है, इसके बावजूद वहाँ साक्षरता शत-प्रतिशत है, आयु प्रत्याशा बढ़ी है, तथा शिशु मृत्यु-दर, मातृ मृत्यु-दर और जन्म-दर कम है। 1987 से 1991 के बीच सरकार ने ‘नव लोकतांत्रिक पहल’ नाम से अभियान चलाया, जिसकी रूपरेखा इस तरह बनाई गई थी कि लोग स्वयंसेवी नागरिक संगठनों के माध्यम से विकास की गतिविधियों में सीधे शामिल हो सकें। केरल में यह प्रयास भी हुआ कि लोग पंचायत, प्रखंड और जिला स्तर की योजनाओं को तैयार करने में शामिल हों।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. योजना आयोग की स्थापना वाले प्रस्ताव में इसके कार्यों का दायरा किन शब्दों में बताया गया था?

उत्तर: प्रस्ताव में कहा गया कि भारत के संविधान में नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए हैं और राज्य के लिए नीति-निर्देशक तत्वों का उल्लेख किया गया है, जिनके अंतर्गत राज्य ऐसी समाज-रचना बनाते-बचाते हुए लोगों की भलाई के लिए प्रयास करेगा जहाँ राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाएँ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की भावना से अनुप्राणित हों। राज्य अपनी नीतियाँ इस तरह बनाएगा और अमल में लाएगा कि (क) स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो; (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण को इस तरह बाँटा जाए कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो; और (ग) अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह न किया जाए कि धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ और जनसामान्य की भलाई बाधित हो।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. पी.सी. महालनोबिस और जे.सी. कुमारप्पा के बारे में अध्याय क्या बताता है?

उत्तर: पी.सी. महालनोबिस (1893-1972) अंतरराष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद् थे। वे भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931) के संस्थापक और दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार थे, तथा तीव्र औद्योगीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र की सक्रिय भूमिका के समर्थक थे। जे.सी. कुमारप्पा (1892-1960) का असली नाम जे.सी. कॉर्नेलियस था। वे अर्थशास्त्री एवं चार्टर्ड अकाउंटेंट थे, उनकी शिक्षा इंग्लैंड एवं अमेरिका में हुई, वे महात्मा गाँधी के अनुयायी थे और उन्होंने गाँधीवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की कोशिश की। वे ‘इकॉनोमी ऑफ परमानेंस’ के लेखक थे और योजना आयोग के सदस्य के रूप में योजना प्रक्रिया में शामिल रहे।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. पंचवर्षीय योजनाओं को ‘विराम’ क्यों देना पड़ा, और इस दौर के बारे में अध्याय का निष्कर्ष क्या है?

उत्तर: 1951 के प्रारूप से शुरू हुई नियोजन की गहमागहमी 1956 की दूसरी पंचवर्षीय योजना के साथ अपने चरम पर पहुँची और 1961 की तीसरी पंचवर्षीय योजना के समय तक जारी रही। चौथी पंचवर्षीय योजना 1966 से चालू होनी थी, लेकिन इस वक्त तक नियोजन का नयापन एक हद तक मंद पड़ गया था और भारत गहन आर्थिक संकट की चपेट में आ चुका था। इसलिए सरकार ने पंचवर्षीय योजना को थोड़ी देर का विराम देने का फ़ैसला किया। अध्याय का निष्कर्ष यह है कि इन योजनाओं की प्राथमिकताओं और प्रक्रिया को लेकर अनेक आलोचनाएँ सामने आईं, लेकिन यह बात सच है कि इस वक्त तक भारत के आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ चुकी थी।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. आज़ादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद क्या थे? समझाइए।

उत्तर: आज़ादी के वक्त हिंदुस्तान के सामने विकास के दो मॉडल थे। पहला उदारवादी-पूँजीवादी मॉडल था, जो यूरोप के अधिकतर हिस्सों और संयुक्त राज्य अमरीका में अपनाया गया था; दूसरा समाजवादी मॉडल था, जिसे सोवियत संघ ने अपनाया था। उस वक्त हिंदुस्तान में बहुत-से लोग विकास के सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के नेता तथा खुद कांग्रेस के नेहरू तक शामिल थे; अमरीकी तर्ज़ के पूँजीवादी विकास के पैरोकार बहुत कम थे। कुछ बातों पर सहमति थी: कि भारत के विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक-सामाजिक न्याय दोनों हैं; कि यह मामला व्यवसायी, उद्योगपति और किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; और कि सरकार को इसमें प्रमुख भूमिका निभानी है। मतभेद इस पर थे कि सरकार कौन-सी भूमिका निभाए। सवाल उठे कि क्या पूरे देश के लिए योजना बनाने वाला कोई केंद्रीय संगठन ज़रूरी है, क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए, और अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि की ज़रूरतों के आड़े आता हो तो सामाजिक न्याय पर कितना ज़ोर देना उचित होगा। नेताओं के बीच यह बहस भी थी कि औद्योगीकरण उचित रास्ता है या कृषि का विकास तथा ग्रामीण गरीबी दूर करना। अध्याय के अनुसार इनमें से प्रत्येक सवाल पर टकराव हुए जो आज तक जारी हैं।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. उड़ीसा वाले उदाहरण की मदद से समझाइए कि विकास के फ़ैसले राजनीतिक फ़ैसले क्यों होते हैं।

उत्तर: इस्पात की विश्वव्यापी माँग बढ़ने पर उड़ीसा निवेश की एक महत्त्वपूर्ण जगह के रूप में उभरा और राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय-स्तर के इस्पात-निर्माताओं के साथ सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए। सरकार को उम्मीद थी कि इससे ज़रूरी पूँजी-निवेश होगा और रोज़गार के अवसर बड़ी संख्या में सामने आएँगे। लेकिन लौह-अयस्क के ज़्यादातर भंडार राज्य के सर्वाधिक अविकसित और आदिवासी-बहुल इलाकों में हैं। आदिवासियों को डर था कि उद्योग लगने पर उन्हें घर-बार से विस्थापित होना पड़ेगा और आजीविका छिन जाएगी; पर्यावरणविदों को प्रदूषण का भय था; और केंद्र सरकार को लगता था कि अनुमति न देने से एक बुरी मिसाल कायम होगी और देश में पूँजी निवेश को बाधा पहुँचेगी। यहाँ कई तरह के हित आपस में टकरा रहे हैं, इसलिए सवाल यह बन जाता है कि उड़ीसा को किस तरह के विकास की ज़रूरत है और किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए। अध्याय कहता है कि इन सवालों के जवाब कोई विशेषज्ञ नहीं दे सकता, क्योंकि ऐसे फ़ैसलों में एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे के हितों की तुलना में और मौजूदा पीढ़ी के हितों को आने वाली पीढ़ी के हितों की तुलना में तौलना पड़ता है। खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय निश्चित तौर पर राजनीतिक निर्णय होना चाहिए, जो जन-प्रतिनिधि लें, क्योंकि वे जनता की भावनाओं को समझते हैं। जगतसिंहपुर जिले में हुआ विरोध प्रदर्शन इसी टकराव का जीता-जागता रूप है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. भारत में नियोजन का विचार कहाँ से आया और योजना आयोग की भूमिका क्या रही? विस्तार से लिखिए।

उत्तर: मतभेदों के बावजूद एक बिंदु पर सभी सहमत थे कि विकास का काम निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता और सरकार के लिए ज़रूरी है कि वह विकास का एक खाका अथवा योजना तैयार करे। अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए नियोजन के विचार को 1940 और 1950 के दशक में पूरे विश्व में जनसमर्थन मिला था: यूरोप ‘महामंदी’ से सबक सीख चुका था, जापान और जर्मनी ने युद्ध के बाद अपनी अर्थव्यवस्था फिर खड़ी कर ली थी, और सोवियत संघ ने 1930 तथा 1940 के दशक में भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति की थी। भारत में भी यह विचार सिर्फ़ वामपंथियों तक सीमित नहीं था: 1944 में उद्योगपतियों के एक तबके ने नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है और जो चाहता था कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश में बड़े कदम उठाए। इस तरह चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले। योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के ज़रिए की; यह संविधान द्वारा स्थापित निकाय नहीं था। यह एक सलाहकार की भूमिका निभाता था और इसकी सिफारिशें तभी प्रभावकारी होती थीं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंजूर करे। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने और भारत विकास के लिए कौन-सा रास्ता तथा रणनीति अपनाएगा, यह तय करने में इस संस्था ने केंद्रीय और सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई। सोवियत संघ की तरह इसने पंचवर्षीय योजनाओं का विकल्प चुना, जिसके तहत केंद्र और राज्य सरकारों के बजट को गैरयोजना-व्यय और योजना-व्यय में बाँटा गया। बाद में भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की, जो 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आया।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजना की तुलना कीजिए और बताइए कि दूसरी योजना ने भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या दिया तथा उसकी क्या सीमाएँ रहीं।

उत्तर: प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) की कोशिश देश को गरीबी के मकड़जाल से निकालने की थी। इसका मूलमंत्र धीरज था, और इसे तैयार करने वालों में शामिल के.एन. राज की दलील थी कि अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा। इसका ज़्यादा ज़ोर कृषि-क्षेत्र पर था, इसी के अंतर्गत बाँध और सिंचाई में निवेश हुआ, भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशि आबंटित की गई, और भूमि-सुधार को देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना गया। दूसरी पंचवर्षीय योजना, जिसे पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में एक टोली ने तैयार किया, भारी उद्योगों पर केंद्रित थी और तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करना चाहती थी। सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया, जिससे निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों के उद्योगों को आगे बढ़ने में मदद मिली, और बचत तथा निवेश बढ़ने के कारण बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार जैसे उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किए जा सके। औद्योगीकरण पर दिए गए इस ज़ोर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया। सीमाएँ भी साफ़ थीं: भारत प्रौद्योगिकी के लिहाज़ से पिछड़ा था और उसे विश्व बाज़ार से प्रौद्योगिकी खरीदने में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी; उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज़्यादा आकर्षित किया, जिससे खाद्यान्न-संकट की आशंका बनी रही; और योजनाकारों को उद्योग तथा कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई। तीसरी योजना दूसरी से कुछ खास अलग नहीं थी, और आलोचकों ने इस दौर की रणनीतियों में ‘शहरों’ की तरफ़दारी देखी।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. ‘विकास’ की धारणा को लेकर अध्याय क्या कहता है? आज़ादी के बाद इस धारणा का भारत के विकास-मॉडल पर क्या असर पड़ा?

उत्तर: अध्याय कहता है कि टकरावों के पीछे अकसर विकास की धारणाओं का हाथ होता है, और यह कह देने भर से बात नहीं बनती कि हर कोई विकास चाहता है, क्योंकि जनता के विभिन्न तबकों के लिए ‘विकास’ के अर्थ अलग-अलग होते हैं: इस्पात-संयंत्र लगाने वाले उद्योगपति, इस्पात के शहरी उपभोक्ता और प्रस्तावित इलाके में रहने वाले आदिवासी के लिए इसका मतलब एक नहीं होगा। इसी कारण ‘विकास’ से जुड़ी कोई भी चर्चा विवादों से परे नहीं होती। आज़ादी के बाद के पहले दशक में इस सवाल पर खूब बहसें हुईं, और उस वक्त ‘पश्चिम’ को विकास का पैमाना माना जाता था: ‘विकास’ का अर्थ ज़्यादा-से-ज़्यादा आधुनिक होना था और आधुनिक होने का अर्थ पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना। माना जाता था कि हर देश को आधुनिकीकरण की उसी प्रक्रिया से गुज़रना होगा जिसमें पुरानी सामाजिक संरचना टूटती है और पूँजीवाद तथा उदारवाद का उदय होता है। आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची माना जाता था, और इसी धारणा के कारण देशों को विकसित, विकासशील अथवा अविकसित बताया जाता था। इसी पृष्ठभूमि में आज़ादी के वक्त भारत के सामने विकास के दो मॉडल थे, उदारवादी-पूँजीवादी और समाजवादी, और बहुत-से नेता सोवियत मॉडल से प्रभावित थे; किताब हाशिये पर यह सवाल भी उठाती है कि क्या ‘आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना ज़रूरी है। साथ ही अध्याय यह भी दिखाता है कि नियोजन का मतलब हमेशा केंद्रीकरण और बड़ी परियोजनाएँ नहीं है: ‘केरल मॉडल’ शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि-सुधार, कारगर खाद्य-वितरण और गरीबी-उन्मूलन पर ज़ोर देकर विकेंद्रित नियोजन का दूसरा रास्ता दिखाता है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
अध्याय में ‘द हिंदू’ (23 जून, 2006) से ली गई एक ख़बर दी गई है: भुवनेश्वर से कार्यालय संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार जगतसिंहपुर जिले में प्रस्तावित पोस्को-इंडिया इस्पात संयंत्र से विस्थापन का शिकार हुए लोगों ने इस कोरियाई कंपनी के दफ़्तर के सामने गुरुवार को विरोध प्रदर्शन किया। यह लोग माँग कर रहे थे कि एक साल पहले कंपनी और उड़ीसा की सरकार के बीच जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे उसे रद्द कर दिया जाए। धिंकिया, नुआंगाँव और गढ़कुजंगा ग्राम पंचायत के एक सौ से भी ज़्यादा स्त्री-पुरुषों ने कंपनी के दफ़्तर में घुसने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए और कहा कि हमारी जीविका और जीवन की कीमत पर कंपनी को इस्पात संयंत्र लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस विरोध प्रदर्शन का आयोजन राष्ट्रीय युवा संगठन और नवनिर्माण समिति ने किया था।

(क) 1 अंक यह ख़बर किस अख़बार से और किस तारीख़ की है?
उत्तर: यह ख़बर ‘द हिंदू’ से ली गई है और 23 जून, 2006 की है।

(ख) 1 अंक प्रदर्शनकारियों की मुख्य माँग क्या थी?
उत्तर: उनकी माँग थी कि एक साल पहले कंपनी और उड़ीसा की सरकार के बीच जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे उसे रद्द कर दिया जाए।

(ग) 2 अंक प्रदर्शन में कौन-कौन शामिल थे और इसका आयोजन किसने किया?
उत्तर: धिंकिया, नुआंगाँव और गढ़कुजंगा ग्राम पंचायत के एक सौ से भी ज़्यादा स्त्री-पुरुष इसमें शामिल थे, जिन्होंने कंपनी के दफ़्तर में घुसने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इस विरोध प्रदर्शन का आयोजन राष्ट्रीय युवा संगठन और नवनिर्माण समिति ने किया था।

(घ) 2 अंक यह ख़बर अध्याय के उस तर्क को कैसे मज़बूत करती है कि विकास का अंतिम निर्णय राजनीतिक होना चाहिए?
उत्तर: ख़बर दिखाती है कि एक ही परियोजना पर राज्य सरकार, कंपनी और विस्थापित होने वाले लोगों के हित आमने-सामने खड़े हैं, और प्रदर्शनकारी अपनी जीविका तथा जीवन की कीमत पर संयंत्र लगने का विरोध कर रहे हैं। अध्याय के अनुसार ऐसे टकराव का जवाब कोई विशेषज्ञ नहीं दे सकता, क्योंकि इसमें एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे के हितों की तुलना में तौलना पड़ता है। इसीलिए अंतिम निर्णय राजनीतिक निर्णय होना चाहिए, जो जनता की भावनाओं को समझने वाले जन-प्रतिनिधि लें।

केस स्टडी
अध्याय बताता है कि योजना आयोग का ज़िक्र ‘भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ नाम की किताब में कहीं नहीं है, क्योंकि योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है। योजना आयोग की स्थापना, मार्च 1950 में, भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के ज़रिए की। यह आयोग एक सलाहकार की भूमिका निभाता है और इसकी सिफारिशें तभी प्रभावकारी हो पाती हैं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंजूर करे। जिस प्रस्ताव के ज़रिए योजना आयोग की स्थापना हुई थी उसमें इसके कार्यों के दायरे का उल्लेख करते हुए कहा गया कि राज्य अपनी नीतियों को इस तरह बनाएगा और अमल में लाएगा कि (क) स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो; (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण को इस तरह बाँटा जाएगा कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो; और (ग) अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह नहीं किया जाएगा कि धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ और जनसामान्य की भलाई बाधित हो। बाद में भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर एक नई संस्था, नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की, जो 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आई।

(क) 1 अंक योजना आयोग का ज़िक्र संविधान वाली किताब में क्यों नहीं मिलता?
उत्तर: क्योंकि योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है। इसकी स्थापना भारत सरकार ने मार्च 1950 में एक सीधे-सादे प्रस्ताव के ज़रिए की थी।

(ख) 2 अंक योजना आयोग की सिफारिशें कब प्रभावकारी होती थीं?
उत्तर: योजना आयोग एक सलाहकार की भूमिका निभाता था और इसकी सिफारिशें तभी प्रभावकारी हो पाती थीं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंजूर करे।

(ग) 2 अंक प्रस्ताव में दी गई तीन बातों में से कोई दो लिखिए।
उत्तर: कोई दो: (क) स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर-बराबर अधिकार हो; (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण को इस तरह बाँटा जाएगा कि उससे सर्वसामान्य की भलाई हो; (ग) अर्थव्यवस्था का संचालन इस तरह नहीं किया जाएगा कि धन अथवा उत्पादन के साधन एकाध जगह केंद्रित हो जाएँ और जनसामान्य की भलाई बाधित हो।

(घ) 1 अंक योजना आयोग की जगह कौन-सी संस्था आई और कब?
उत्तर: योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना हुई, जो 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आई।