NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II के अध्याय 3 नियोजित विकास की राजनीति की प्रश्नावली के सभी 7 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। आख़िर में पाठ के बीच पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर भी दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
इस अध्याय की प्रश्नावली हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में एक जैसी नहीं छपी है। प्रश्न 3 में विकल्पों का क्रम अलग है, और इसी वजह से सही उत्तर का अक्षर भी बदल जाता है। हिंदी किताब में विकल्प इस क्रम में हैं: (क) सिर्फ़ ख और घ, (ख) सिर्फ़ क और ख, (ग) सिर्फ़ घ और ग, (घ) उपर्युक्त सभी। अंग्रेज़ी किताब में क्रम है: (i) b and d only, (ii) d and c only, (iii) a and b only, (iv) all the above। सही बात दोनों में एक ही है, पर हिंदी में उसका अक्षर (ख) है और अंग्रेज़ी में (iii)। हिंदी माध्यम के विद्यार्थी को (ख) ही लिखना है। नीचे के सभी उत्तर हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।
यह अध्याय 2022 में तर्कसंगत किया गया संस्करण है और अब कुल 10 पृष्ठों का है। प्रश्नावली को तब बदला नहीं गया, इसलिए प्रश्न 2 का विकल्प ‘सहकारी खेती’ और पूरा प्रश्न 4 (चरण सिंह, बिहार का अकाल, जोनिंग, वर्गीज कूरियन) उन हिस्सों से आते हैं जो अब अध्याय के मूल पाठ में नहीं हैं। इनके उत्तर नीचे पूरे दिए गए हैं, क्योंकि प्रश्नावली किताब की अपनी है और परीक्षा में पूछी जा सकती है। पर ध्यान रहे: इनका ब्योरा अध्याय के पन्नों में ढूँढ़ने पर नहीं मिलेगा, इसलिए इन्हें अलग से याद कर लेना ही सही तरीका है। अध्याय के पाठ में इनमें से सिर्फ़ पी.सी. महालनोबिस और औद्योगीकरण वाला जोड़ा मौजूद है।
1 ‘बॉम्बे प्लान’ के बारे में कौन-सा बयान सही नहीं है
प्र. ‘बॉम्बे प्लान’ के बारे में निम्नलिखित में कौन-सा बयान सही नहीं है।
(क) यह भारत के आर्थिक भविष्य का एक ब्लू-प्रिंट था।
(ख) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था।
(ग) इसकी रचना कुछ अग्रणी उद्योगपतियों ने की थी।
(घ) इसमें नियोजन के विचार का पुरज़ोर समर्थन किया गया था।
उत्तर: (ख) इसमें उद्योगों के ऊपर राज्य के स्वामित्व का समर्थन किया गया था। यही बयान सही नहीं है।
क्यों: किताब कहती है कि ‘बॉम्बे प्लान’ की मंशा थी कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए। यह सरकार से बड़े निवेश की माँग है, उद्योगों पर सरकारी मालिकाना की माँग नहीं। यह प्रस्ताव खुद उद्योगपतियों ने तैयार किया था, इसलिए उनसे यह उम्मीद करना ही उलटा है कि वे अपने उद्योगों को राज्य के स्वामित्व में देने की वकालत करते।
बाकी विकल्प क्यों सही हैं: (ग) सही है, क्योंकि किताब के शब्दों में 1944 में उद्योगपतियों का एक तबका एकजुट हुआ और इस समूह ने यह संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया। (घ) सही है, क्योंकि इस प्रस्ताव का पूरा मक़सद ही देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाना था; किताब इसी के आधार पर कहती है कि ‘चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था की राह पर चले।’ (क) सही है, क्योंकि यह अगले कुछ वर्षों के लिए देश की आर्थिक दिशा का खाका ही था।
2 शुरुआती विकास-नीति में कौन-सा विचार शामिल नहीं था
प्र. भारत ने शुरुआती दौर में विकास की जो नीति अपनाई उसमें निम्नलिखित में से कौन-सा विचार शामिल नहीं था?
(क) नियोजन (ख) उदारीकरण (ग) सहकारी खेती (घ) आत्मनिर्भरता
उत्तर: (ख) उदारीकरण।
क्यों: उदारीकरण का मतलब है अर्थव्यवस्था पर से सरकारी नियंत्रण हटाना और बाज़ार को खुला छोड़ना। शुरुआती दौर की नीति ठीक इसके उलट थी। किताब के अपने ब्योरे के अनुसार सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया, बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार जैसे उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किए गए, और पूरे देश के लिए योजना बनाने वाला योजना आयोग बनाया गया। यह सब नियंत्रण बढ़ाने वाली नीतियाँ हैं, उदारीकरण की नहीं।
बाकी विकल्प क्यों शामिल थे: नियोजन इस पूरे अध्याय का विषय ही है। आत्मनिर्भरता आयात पर भारी शुल्क लगाकर देसी उद्योगों को खड़ा करने की उसी नीति का दूसरा नाम है। सहकारी खेती उस दौर की नीति का हिस्सा थी, हालाँकि तर्कसंगत किए गए इस संस्करण के पाठ में इसका ब्योरा अब नहीं छपा है।
3 नियोजित अर्थव्यवस्था का विचार कहाँ से लिया गया
प्र. “भारत में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का विचार—ग्रहण किया गया था:”
(क) बॉम्बे प्लान से (ख) सोवियत खेमे के देशों के अनुभवों से
(ग) समाज के बारे में गाँधीवादी विचार से (घ) किसान संगठनों की माँगों से
(क) सिर्फ़ ख और घ (ख) सिर्फ़ क और ख (ग) सिर्फ़ घ और ग (घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (ख) सिर्फ़ क और ख, यानी बॉम्बे प्लान से और सोवियत खेमे के देशों के अनुभवों से।
क्यों: किताब दोनों स्रोत साफ़-साफ़ गिनाती है। एक तरफ़ 1944 का ‘बॉम्बे प्लान’, जिसे उद्योगपतियों के एक तबके ने तैयार किया और जो चाहता था कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश में बड़े कदम उठाए। दूसरी तरफ़ सोवियत संघ का अनुभव: किताब कहती है कि सोवियत संघ ने 1930 तथा 1940 के दशक में भारी कठिनाइयों के बीच शानदार आर्थिक प्रगति की थी, और इसी कारण नियोजन के पक्ष में दुनिया भर में हवा बह रही थी। आगे वह यह भी कहती है कि सोवियत संघ की तरह भारत के योजना आयोग ने भी पंचवर्षीय योजनाओं का विकल्प चुना।
बाकी दोनों क्यों नहीं: गाँधीवादी विचार और किसान संगठनों की माँगों को किताब नियोजन के विचार का स्रोत नहीं बताती। जे.सी. कुमारप्पा ज़रूर गाँधीवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की कोशिश करने वाले और योजना आयोग के सदस्य बताए गए हैं, लेकिन यह अलग बात है और नियोजन के विचार का स्रोत नहीं है।
अक्षर का ध्यान रखिए: हिंदी किताब में यह उत्तर (ख) है। अंग्रेज़ी किताब में यही उत्तर (iii) बनता है, क्योंकि वहाँ विकल्पों का क्रम अलग छपा है। हिंदी की उत्तर-पुस्तिका में (ख) ही लिखिए।
4 सुमेलन
प्र. निम्नलिखित का मेल करें:
(क) चरण सिंह (ख) पी.सी. महालनोबिस (ग) बिहार का अकाल (घ) वर्गीज कूरियन
(i) औद्योगीकरण (ii) जोनिंग (iii) किसान (iv) सहकारी डेयरी
उत्तर:
| सूची I | सूची II | कारण |
|---|---|---|
| (क) चरण सिंह | (iii) किसान | वे किसानों के हितों के पैरोकार नेता थे और खेती तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की माँग करते थे |
| (ख) पी.सी. महालनोबिस | (i) औद्योगीकरण | यही एकमात्र जोड़ा है जो अध्याय के मौजूदा पाठ में है: वे दूसरी पंचवर्षीय योजना के योजनाकार और तीव्र औद्योगीकरण के समर्थक बताए गए हैं |
| (ग) बिहार का अकाल | (ii) जोनिंग | अकाल के दौरान अनाज की आवाजाही को क्षेत्रों में बाँटकर रोकने की व्यवस्था ‘जोनिंग’ कहलाई |
| (घ) वर्गीज कूरियन | (iv) सहकारी डेयरी | वे दुग्ध सहकारी समितियों के आंदोलन से जुड़े थे |
छोटा रूप: क-(iii), ख-(i), ग-(ii), घ-(iv)।
ज़रूरी बात: ऊपर वाले तीन जोड़ों का ब्योरा इस तर्कसंगत संस्करण के अध्याय में अब नहीं छपा है, इसलिए इन्हें पन्ने पलटकर ढूँढ़ने की कोशिश न कीजिए। सिर्फ़ महालनोबिस वाला जोड़ा किताब के पाठ से सीधे निकलता है।
5 आज़ादी के समय विकास के सवाल पर मतभेद
प्र. आज़ादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद क्या थे? क्या इन मतभेदों को सुलझा लिया गया?
उत्तर:
पहले वह बात जिस पर मतभेद नहीं था। किताब कहती है कि लगभग सभी इस बात पर सहमत थे कि भारत के विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक-सामाजिक न्याय दोनों ही हैं। इस बात पर भी सहमति थी कि यह मामला व्यवसायी, उद्योगपति और किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता और सरकार को इसमें प्रमुख भूमिका निभानी है। नियोजन पर भी सहमति थी: विकास का काम निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता, सरकार को एक खाका तैयार करना ही होगा।
अब मतभेद, जो चार शक्लों में सामने आए:
1. कौन-सा मॉडल। आज़ादी के वक्त सामने दो मॉडल थे: उदारवादी-पूँजीवादी मॉडल, जो यूरोप के अधिकतर हिस्सों और संयुक्त राज्य अमरीका में अपनाया गया था, और समाजवादी मॉडल, जिसे सोवियत संघ ने अपनाया था। हिंदुस्तान में बहुत-से लोग सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के नेता तथा खुद कांग्रेस के नेहरू तक शामिल थे। अमरीकी तर्ज़ के पूँजीवादी विकास के पैरोकार बहुत कम थे।
2. उद्योग या खेती। नेताओं में बहस छिड़ी: कुछ औद्योगीकरण को उचित रास्ता मानते थे, तो कुछ की नज़र में कृषि का विकास करना और ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी दूर करना सर्वाधिक ज़रूरी था।
3. सरकार की भूमिका कितनी। सहमति इस पर थी कि सरकार भूमिका निभाए, पर कौन-सी भूमिका निभाए इस पर मतभेद थे। तीन सवाल खड़े हुए: क्या पूरे देश के लिए योजना बनाने वाला कोई केंद्रीय संगठन ज़रूरी है? क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए? और अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि की ज़रूरतों के आड़े आता हो, तो सामाजिक न्याय पर कितना ज़ोर देना उचित होगा?
4. रफ़्तार कितनी। के.एन. राज की दलील थी कि अगले दो दशक तक भारत को अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए, क्योंकि तेज़ रफ़्तार विकास से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचेगा। दूसरी तरफ़ महालनोबिस की दूसरी योजना तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करना चाहती थी। पहली योजना का मूलमंत्र धीरज था, दूसरी का तेज़ी।
क्या मतभेद सुलझ गए? नहीं। किताब का अपना जवाब साफ़ है: ‘इनमें से प्रत्येक सवाल पर टकराव हुए जो आज तक जारी हैं।’ उड़ीसा का उदाहरण, जिससे अध्याय शुरू होता है, इसी बात का सबूत है कि विकास किसके लिए और किस कीमत पर हो, यह सवाल आज भी उतना ही जीवित है। जो फ़ैसले लिए गए उनके राजनीतिक परिणाम सामने आए, और इसीलिए भारत की राजनीति के इतिहास को जानने के लिए विकास के कथाक्रम को पढ़ना ज़रूरी है।
6 पहली योजना का ज़ोर और दूसरी योजना से उसका फ़र्क़
प्र. पहली पंचवर्षीय योजना का किस चीज़ पर सबसे ज़्यादा ज़ोर था? दूसरी पंचवर्षीय योजना पहली से किन अर्थों में अलग थी?
उत्तर, पहला हिस्सा: पहली योजना का ज़ोर।
प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) की कोशिश देश को गरीबी के मकड़जाल से निकालने की थी। इसमें सबसे ज़्यादा ज़ोर कृषि-क्षेत्र पर था। इसी योजना के अंतर्गत बाँध और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया, क्योंकि विभाजन के कारण कृषि-क्षेत्र को गहरी मार लगी थी और इस क्षेत्र पर तुरंत ध्यान देना ज़रूरी था। भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशि आबंटित की गई। योजना में यह भी माना गया कि देश में भूमि के वितरण का मौजूदा ढर्रा कृषि के विकास की सबसे बड़ी बाधा है, इसलिए भूमि-सुधार पर ज़ोर दिया गया और उसे देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना गया। योजनाकारों का बुनियादी लक्ष्य राष्ट्रीय आय का स्तर ऊँचा करना था, जिसके लिए बचत बढ़ाना ज़रूरी था। इसे तैयार करने वालों में शामिल के.एन. राज की दलील थी कि भारत को दो दशक तक अपनी चाल ‘धीमी’ रखनी चाहिए।
दूसरा हिस्सा: दूसरी योजना किन अर्थों में अलग थी।
| पहलू | पहली योजना | दूसरी योजना |
|---|---|---|
| मुख्य ज़ोर | कृषि, बाँध और सिंचाई | भारी उद्योग |
| मूलमंत्र | धीरज | तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव, हर संभव दिशा में एक साथ |
| किसने बनाई | विशेषज्ञों की टोली, जिसमें के.एन. राज शामिल थे | पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों की टोली |
| व्यापार-नीति | इस रूप में अलग से नहीं | देसी उद्योगों के संरक्षण के लिए आयात पर भारी शुल्क |
| सार्वजनिक क्षेत्र | मुख्यतः बाँध और सिंचाई परियोजनाएँ | बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में |
दूसरी योजना ने क्या दिया: संरक्षण की नीति से निजी और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्रों के उद्योगों को आगे बढ़ने में मदद मिली, और चूँकि इस अवधि में बचत और निवेश दोनों बढ़ रहे थे, इसलिए ऊपर गिनाए गए उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किए जा सके। किताब के शब्दों में औद्योगीकरण पर दिए गए इस ज़ोर ने भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को एक नया आयाम दिया।
और इसकी क़ीमत क्या रही: भारत प्रौद्योगिकी के लिहाज़ से पिछड़ा हुआ था, इसलिए विश्व बाज़ार से प्रौद्योगिकी खरीदने में उसे अपनी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी। उद्योगों ने कृषि की अपेक्षा निवेश को ज़्यादा आकर्षित किया, जिससे खाद्यान्न-संकट की आशंका बनी रही। योजनाकारों को उद्योग और कृषि के बीच संतुलन साधने में भारी कठिनाई आई। तीसरी योजना दूसरी से कुछ खास अलग नहीं थी, और आलोचकों ने इस समय से योजना की रणनीतियों में सीधे-सीधे ‘शहरों’ की तरफ़दारी देखी।
7 अवतरण पर आधारित प्रश्न
प्र. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:
“आज़ादी के बाद के आरंभिक वर्षों में कांग्रेस पार्टी के भीतर दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ पनपीं। एक तरफ राष्ट्रीय पार्टी कार्यकारिणी ने राज्य के स्वामित्व का समाजवादी सिद्धांत अपनाया, उत्पादकता को बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक संसाधनों के संकेंद्रण को रोकने के लिए अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का नियंत्रण और नियमन किया। दूसरी तरफ कांग्रेस की राष्ट्रीय सरकार ने निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियाँ अपनाईं और उसके बढ़ावे के लिए विशेष कदम उठाए। इसे उत्पादन में अधिकतम वृद्धि की अकेली कसौटी पर ज़ायज़ ठहराया गया।”
स्रोत: फ्रांसिन फ्रैंकल
(क) यहाँ लेखक किस अंतर्विरोध की चर्चा कर रहा है? ऐसे अंतर्विरोध के राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
उत्तर: अंतर्विरोध कांग्रेस के कहने और करने के बीच का है। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी काग़ज़ पर राज्य के स्वामित्व का समाजवादी सिद्धांत अपना रही थी और अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर नियंत्रण-नियमन कर रही थी, ताकि उत्पादकता भी बढ़े और आर्थिक संसाधनों का संकेंद्रण भी रुके। लेकिन उसी पार्टी की सरकार व्यवहार में निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियाँ अपना रही थी और उसे बढ़ावा देने के लिए विशेष कदम उठा रही थी, जिन्हें सिर्फ़ ‘उत्पादन बढ़े’ की कसौटी पर सही ठहराया जाता था। यानी घोषित लक्ष्य समाजवादी था और अमल में आई नीति पूँजी के अनुकूल थी।
राजनीतिक परिणाम:
- दोनों तरफ़ से नाराज़गी। समाजवादी और साम्यवादी कहते कि कांग्रेस समाजवाद की बात करके भी उद्योगपतियों के हित साध रही है, जबकि खुली अर्थव्यवस्था के पैरोकार कहते कि नियंत्रण और नियमन विकास के रास्ते की रुकावट हैं।
- अध्याय जिन सवालों को गिनाता है, वे राजनीतिक विवाद बनकर टिके रहे: सरकार खुद उद्योग चलाए या नहीं, और सामाजिक न्याय बनाम आर्थिक संवृद्धि में किसे तरजीह मिले।
- नीति की दिशा हर बार बहस, दलों से सलाह-मशविरे और जनता की स्वीकृति पर निर्भर हो गई, यानी विकास का सवाल स्थायी रूप से राजनीति का सवाल बन गया। इसी कारण किताब कहती है कि भारत की राजनीति का इतिहास जानने के लिए विकास का कथाक्रम पढ़ना ज़रूरी है।
(ख) अगर लेखक की बात सही है तो फिर बताएँ कि कांग्रेस इस नीति पर क्यों चल रही थी? क्या इसका संबंध विपक्षी दलों की प्रकृति से था?
उत्तर: कांग्रेस एक ही पार्टी के भीतर बहुत अलग-अलग रुझानों को समेटे हुए थी, इसलिए उसे दोनों तरफ़ संतुलन बैठाकर चलना पड़ता था। एक तरफ़ आज़ादी के आंदोलन से यह सहमति चली आ रही थी कि गरीबी मिटाने और सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण का मुख्य जिम्मा सरकार का होगा और आज़ाद भारत की सरकार अंग्रेजी हुकूमत की तरह संकुचित व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए काम नहीं करेगी। दूसरी तरफ़ उत्पादन बढ़ाने के लिए निजी निवेश की ज़रूरत थी, और यह याद रखना चाहिए कि नियोजन की माँग खुद उद्योगपतियों ने बॉम्बे प्लान के ज़रिए उठाई थी। समाजवादी भाषा से पार्टी अपने वामपंथी रुझान वालों और आम गरीब मतदाता को साथ रखती थी, और उदार नीतियों से निवेश तथा उत्पादन की ज़रूरत पूरी करती थी।
विपक्ष की प्रकृति से संबंध: हाँ, इसका सीधा संबंध था। उस दौर में विपक्ष दोनों छोरों पर बँटा हुआ था। एक तरफ़ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी जैसे दल थे, जो और ज़्यादा समाजवाद की माँग करते थे; दूसरी तरफ़ वे लोग थे जो खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था चाहते थे, यानी अध्याय की परिभाषा में ‘दक्षिणपंथ’। कांग्रेस अगर पूरी तरह एक तरफ़ झुक जाती तो दूसरी तरफ़ का पूरा समर्थन विपक्ष के पास चला जाता। बीच का रास्ता अपनाकर वह दोनों छोरों की ज़मीन अपने पास रखती थी, और यही वजह है कि विपक्षी दल उसका विकल्प नहीं बन पा रहे थे।
(ग) क्या कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और इसके प्रांतीय नेताओं के बीच भी कोई अंतर्विरोध था?
उत्तर: हाँ। केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताएँ और प्रांतीय नेताओं की ज़मीनी मजबूरियाँ एक जैसी नहीं थीं।
- केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान पूरे देश के लिए एक मॉडल पर था: योजना आयोग, पंचवर्षीय योजनाएँ, भारी उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र। यह एक केंद्रीकृत सोच थी, जिसमें फ़ैसला ऊपर से नीचे आता था।
- प्रांतीय नेताओं को अपने इलाके के किसानों, ज़मींदारों और स्थानीय हितों का सामना करना पड़ता था। भूमि-सुधार इसकी सबसे साफ़ मिसाल है: योजना उसे देश के विकास की बुनियादी चीज़ मानती थी, पर उसे लागू राज्यों में करना था, जहाँ ज़मीन के मौजूदा बँटवारे से फ़ायदा पाने वाले तबके प्रांतीय राजनीति में मज़बूत थे।
- दोनों स्तर अलग-अलग लोगों के प्रति जवाबदेह थे। केंद्रीय नेतृत्व संवृद्धि और न्याय को पूरे देश के सवाल के रूप में तौल सकता था, जबकि प्रांतीय नेता को अपने राज्य के प्रभावशाली हितों के बीच अगला चुनाव जीतना होता था। जो नीति राष्ट्रीय नेता के लिए आसान थी, वह प्रांतीय नेता के लिए राजनीतिक जोखिम बन सकती थी, और यही दोनों के बीच फ़ासला पैदा करता था।
कुल मिलाकर, विकास की नीति पर टकराव सिर्फ़ कांग्रेस और विपक्ष के बीच नहीं था, वह कांग्रेस के भीतर भी था और केंद्र तथा राज्यों के बीच भी।
8 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय प्रश्नावली के अलावा पाठ के बीच में भी सवाल पूछता है: डाक-टिकटों के कैप्शन में, उड़ीसा वाले उदाहरण के बाद, वामपंथ-दक्षिणपंथ वाले बक्से में, हाशिये की टिप्पणियों में और योजना आयोग तथा ‘कुछ आगे की’ बक्सों में। नीचे इनके उत्तर उसी क्रम में दिए गए हैं जिसमें ये किताब में आते हैं, किताब के अपने शब्दों में।
प्र. आजकल ऐसे डाक-टिकट कुछ खास देखने में नहीं आते। क्या आप सोच सकते हैं क्यों?
उत्तर: कैप्शन के अनुसार आज़ादी के बाद के शुरुआती दो दशकों में आधुनिक भारत के निर्माण के प्रयास हुए और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की विकास परियोजनाओं की भूमिका मुख्य रही; बाँध, कारखाने और रेल जैसे विषयों वाले डाक-टिकट उसी दौर की झलक हैं। उस समय नियोजन को लेकर देश में गहमागहमी थी, जो दूसरी योजना के साथ चरम पर पहुँची। बाद में हालात बदल गए: 1966 तक नियोजन का नयापन मंद पड़ गया, सरकार ने योजना को विराम दिया, अध्याय की शुरुआत में ही कहा गया है कि बाद के सालों में यह रणनीति छोड़ दी गई, और 2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग आ गया। इसलिए अब सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी परियोजनाएँ विकास का मुख्य प्रतीक नहीं रहीं, और डाक-टिकटों के विषय भी बदल गए। (यह सोचकर लिखने वाला प्रश्न है; कारण देकर लिखा गया कोई भी उचित उत्तर मान्य है।)
प्र. इस उदाहरण में कई तरह के हित सक्रिय हैं। क्या आप इन हितों को पहचान सकते हैं? ऊपर के उदाहरण में संघर्ष के अहम बिंदु कौन-कौन से हैं? क्या आपको लगता है कि कोई ऐसा बिंदु भी है जिस पर सभी पक्ष राजी हो सकें? क्या इस मसले को इस भाँति सुलझाया जा सकता है कि इससे संबद्ध सभी हितों को संतुष्ट किया जा सके? उड़ीसा में किस तरह के विकास की ज़रूरत है? दरअसल, किसकी ज़रूरतों को उड़ीसा की ज़रूरत कहा जाए?
हित: (1) राज्य सरकार, जो लौह-अयस्क की अप्रत्याशित माँग को भुनाना चाहती है और मानती है कि सहमति-पत्र से ज़रूरी पूँजी-निवेश होगा और रोज़गार के अवसर बड़ी संख्या में सामने आएँगे। (2) अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय-स्तर के इस्पात-निर्माता, जिन्हें अयस्क चाहिए। (3) सर्वाधिक अविकसित और आदिवासी-बहुल जिलों के आदिवासी, जिन्हें घर-बार से विस्थापित होने और आजीविका छिन जाने का डर है; ख़बर में धिंकिया, नुआंगाँव और गढ़कुजंगा के लोग सहमति-पत्र रद्द करने की माँग कर रहे हैं। (4) पर्यावरणविद्, जिन्हें भय है कि खनन और उद्योग से पर्यावरण प्रदूषित होगा। (5) केंद्र सरकार, जिसे लगता है कि अनुमति न देने से बुरी मिसाल कायम होगी और देश में पूँजी निवेश को बाधा पहुँचेगी।
संघर्ष के बिंदु: निवेश और रोज़गार बनाम आदिवासियों का घर-बार और आजीविका; खनन-उद्योग बनाम पर्यावरण; और देश में निवेश का माहौल बनाम ज़मीन पर रहने वाले लोगों की इच्छा।
सहमति का बिंदु: सभी पक्ष उड़ीसा का विकास और लोगों की भलाई चाहने की बात करते हैं; झगड़ा इस पर है कि फ़ायदा किसे मिले और कीमत कौन चुकाए। गरीब इलाके में रोज़गार की ज़रूरत भी सब मानते हैं। इसी साझी ज़मीन पर उचित मुआवज़े, पुनर्वास और पर्यावरण की रक्षा जैसी शर्तों के साथ समझौते की कोशिश हो सकती है।
क्या सबको संतुष्ट किया जा सकता है? पूरी तरह शायद नहीं, और अध्याय इसका कारण बताता है: ‘इन सवालों के ज़वाब कोई विशेषज्ञ नहीं दे सकता। इस तरह के फ़ैसलों में एक सामाजिक-समूह के हितों को दूसरे सामाजिक-समूह के हितों की तुलना में तौला जाता है।’ साथ ही मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के हितों को भी तौलना पड़ता है। खनन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों की राय जानना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय राजनीतिक निर्णय होना चाहिए, जो जनता की भावनाओं को समझने वाले जन-प्रतिनिधि लें।
किसकी ज़रूरत उड़ीसा की ज़रूरत? अध्याय के अनुसार जनता के विभिन्न तबकों के लिए ‘विकास’ के अर्थ अलग-अलग होते हैं: इस्पात-संयंत्र बैठाने वाले उद्योगपति, इस्पात के शहरी उपभोक्ता और प्रस्तावित इलाके में रहने वाले आदिवासी के लिए विकास का अर्थ एक नहीं है। इसलिए ‘उड़ीसा की एक ज़रूरत’ जैसी कोई चीज़ अपने आप तय नहीं होती; किसकी ज़रूरत को प्राथमिकता मिले, यह तय करना ही राजनीतिक फ़ैसला है। (अपनी राय कारणों के साथ लिखिए।)
प्र. क्या आप बता सकते हैं कि 1960 के दशक में कौन-से राजनीतिक दल वामपंथी और कौन-से दक्षिणपंथी थे। आप इस दौर की कांग्रेस पार्टी को किस तरफ़ रखेंगे?
उत्तर: बक्से की अपनी कसौटी लगाइए: वामपंथ अर्थव्यवस्था के राज्य नियंत्रण और मुक्त प्रतिस्पर्धा पर राज्य विनियमन के पक्ष में है; दक्षिणपंथ मानता है कि खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ारमूलक अर्थव्यवस्था के ज़रिए ही प्रगति हो सकती है।
- वामपंथी: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी। यह अध्याय बताता है कि इनके नेता विकास के सोवियत मॉडल से गहरे तौर पर प्रभावित थे।
- दक्षिणपंथी: स्वतंत्र पार्टी, जिसका निर्देशक सिद्धांत राज्य के नियंत्रण से मुक्त अर्थव्यवस्था था।
- कांग्रेस: बीच में, पर घोषणाओं में वामपंथ की ओर झुकी हुई। नेहरू जैसे नेता सोवियत मॉडल से प्रभावित थे और सरकार ने बिजली, रेलवे, इस्पात जैसे उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किए; लेकिन प्रश्नावली के फ्रैंकल वाले अवतरण के अनुसार उसी कांग्रेस सरकार ने निजी निवेश के लिए उदार आर्थिक नीतियाँ भी अपनाईं। यानी दोनों प्रवृत्तियाँ एक ही पार्टी के भीतर थीं।
प्र. क्या आप यह कह रहे हैं कि ‘आधुनिक’ बनने के लिए ‘पश्चिमी’ होना ज़रूरी नहीं है? क्या यह संभव है?
उत्तर: हाँ, यह संभव है। अध्याय बताता है कि आज़ादी के बाद के पहले दशक में ‘पश्चिम’ को विकास का पैमाना माना जाता था: आधुनिक होने का अर्थ था पश्चिमी औद्योगिक देशों की तरह होना, जहाँ पुरानी सामाजिक संरचना टूटी और पूँजीवाद तथा उदारवाद का उदय हुआ। लेकिन आधुनिकीकरण को संवृद्धि, भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि का पर्यायवाची भी माना जाता था, और ये लक्ष्य कोई देश अपने ढंग से हासिल कर सकता है। भारत ने भी किसी एक मॉडल की नकल नहीं की: नियोजन, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र को साथ लेकर अपना अलग रास्ता चुना, और ‘केरल मॉडल’ दिखाता है कि कम प्रति व्यक्ति आय के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य में आगे बढ़ा जा सकता है। (यह मत-आधारित प्रश्न है; जो भी राय लें, कारण दीजिए।)
प्र. पिछले साल आपने ‘भारतीय संविधान: सिद्धांत और व्यवहार’ नाम की किताब पढ़ी थी। क्या आप बता सकते हैं कि इसमें योजना आयोग का कोई जिक्र आया था या नहीं?
उत्तर: नहीं। योजना आयोग का जिक्र उस किताब में कहीं नहीं है, क्योंकि योजना आयोग संविधान द्वारा स्थापित बाकी आयोगों अथवा दूसरे निकायों की तरह नहीं है। इसकी स्थापना मार्च 1950 में भारत सरकार ने एक सीधे-सादे प्रस्ताव के ज़रिए की थी। यह सलाहकार की भूमिका निभाता था और इसकी सिफारिशें तभी प्रभावकारी होती थीं जब मंत्रिमंडल उन्हें मंजूर करे।
प्र. क्या योजना आयोग ने इन उद्देश्यों पर अमल किया है?
उत्तर: आंशिक रूप से। उद्देश्य थे: स्त्री-पुरुष सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का बराबर अधिकार; भौतिक संसाधनों की मिल्कियत और नियंत्रण का ऐसा बँटवारा जिससे सर्वसामान्य की भलाई हो; और धन तथा उत्पादन के साधनों का एकाध जगह केंद्रित न होना। एक ओर पहली योजना ने भूमि-सुधार को देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना और दूसरी योजना में बिजली, रेलवे, इस्पात, मशीनरी और संचार जैसे उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में विकसित किए गए। दूसरी ओर अध्याय खुद मानता है कि आर्थिक विकास के मामले में एक सीमा तक ही सफलता मिली: 1960 के दशक से 1970 के दशक के शुरुआती सालों तक बचत लगातार घटी, खाद्यान्न-संकट की आशंका बनी रही, आलोचकों ने ‘शहरों’ की तरफ़दारी देखी, और फ्रैंकल के अवतरण के अनुसार सरकार ने निजी निवेश को केवल उत्पादन बढ़ाने की कसौटी पर बढ़ावा दिया, जो धन के संकेंद्रण को रोकने वाले उद्देश्य से मेल नहीं खाता। (यह चर्चा वाला प्रश्न है; प्रमाण देकर किसी भी पक्ष में लिखा जा सकता है।)
प्र. इसके उद्देश्य और संरचना को जानने के लिए वेबसाइट http://niti.gov.in से पता करें।
किताब क्या बताती है: भारत सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था) की स्थापना की, जो 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में आई। किताब में इतना ही छपा है; बाकी काम परियोजना के रूप में करना है।
वेबसाइट पर क्या मिलेगा (यह किताब में नहीं छपा, इसलिए परियोजना के लिए है, पाठ्यपुस्तक वाले उत्तर के लिए नहीं)। संरचना: प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष हैं; इसकी शासी परिषद में सभी राज्यों और विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा बाकी केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल होते हैं; इसके अलावा प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त उपाध्यक्ष, पूर्णकालिक सदस्य, अंशकालिक सदस्य, पदेन सदस्य के रूप में केंद्रीय मंत्री और एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी होते हैं। उद्देश्य: सरकार के लिए विचार-संस्था (थिंक टैंक) की भूमिका निभाना, राज्यों के साथ मिलकर सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना, और केवल केंद्र में योजना बनाने के बजाय गाँव के स्तर से शुरू करके ऊपर तक विश्वसनीय योजनाएँ तैयार करने में मदद करना।
1. (ख) 2. (ख) 3. (ख), हिंदी संस्करण के क्रम के अनुसार 4. क-(iii), ख-(i), ग-(ii), घ-(iv)
5, 6, 7 वर्णनात्मक प्रश्न हैं, जिनके पूरे उत्तर ऊपर दिए गए हैं।