कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 4 भारत के विदेश संबंध महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. पंचशील की घोषणा किसने और कब की?

उत्तर: शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांतों यानी पंचशील की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नेहरू और चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने संयुक्त रूप से 29 अप्रैल 1954 को की।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. भारत की विदेश नीति के लक्ष्य की प्रतिध्वनि संविधान के किस हिस्से में सुनाई देती है?

उत्तर: राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में, खासकर अनुच्छेद 51 में, जो अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के बढ़ावे की बात करता है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. संविधान सभा की बहस (मार्च 1949) में नेहरू ने किसे आज़ादी की कसौटी बताया?

उत्तर: उन्होंने विदेश संबंधों को आज़ादी की कसौटी बताया। उनका कहना था कि आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है, और जिस हद तक ये संबंध आपके हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाएँ, उस हद तक आप आज़ाद नहीं रहते।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. दलाई लामा ने भारत से शरण कब माँगी और भारत ने क्या किया?

उत्तर: 1959 में। तिब्बत की बिगड़ती स्थिति देखकर उन्होंने सीमा पारकर भारत में प्रवेश किया और शरण माँगी, जो भारत ने दे दी। चीन ने भारत के इस कदम का कड़ा विरोध किया।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. 1962 के युद्ध के बाद किस रक्षा मंत्री को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा?

उत्तर: नेहरू के नजदीकी सहयोगी और तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णमेनन को। वे 1957 से रक्षा मंत्री थे।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. भारत में तिब्बती शरणार्थियों की सबसे बड़ी बस्ती कहाँ है?

उत्तर: हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में। दलाई लामा ने भी धर्मशाला को ही अपना निवास-स्थान बनाया है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. शिमला-समझौता किनके बीच और कब हुआ?

उत्तर: इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच 3 जुलाई 1972 को, और इससे अमन की बहाली हुई।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कब किया और उसे क्या करार दिया?

उत्तर: 1974 के मई में। भारत ने इसे शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया और कहा कि वह अणुशक्ति को सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल करने की अपनी नीति के प्रति दृढ़ संकल्प है।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. अनुच्छेद 51 के तहत राज्य किन प्रयासों के लिए बाध्य है?

उत्तर: अनुच्छेद 51 में राज्य के लिए चार प्रयास गिनाए गए हैं: (क) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि, (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखना, (ग) संगठित लोगों के आपसी व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाना, और (घ) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को माध्यस्थम द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देना।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. भारत शीतयुद्ध के दौरान किसी खेमे में शामिल क्यों नहीं हुआ?

उत्तर: क्योंकि भारत अमरीका और सोवियत संघ की अगुवाई वाले सैन्य गठबंधनों, यानी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन और वारसा पैक्ट, से अपने को दूर रखना चाहता था। आज़ाद भारत की विदेश नीति में शांतिपूर्ण विश्व का सपना था, इसलिए उसने गुटनिरपेक्षता की नीति को आदर्श माना, शीतयुद्ध का तनाव कम करने की कोशिश की और संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति-अभियानों में अपनी सेना भेजी।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. 1956 के दो उदाहरणों से बताइए कि गुटनिरपेक्षता का संतुलन साधना कठिन था।

उत्तर: 1956 में जब ब्रिटेन ने स्वेज नहर के मामले को लेकर मिस्र पर आक्रमण किया तो भारत ने इस नव-औपनिवेशिक हमले के विरुद्ध विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की। लेकिन इसी साल सोवियत संघ ने हंगरी पर आक्रमण किया और भारत ने उसकी सार्वजनिक निंदा नहीं की। अध्याय इसे संतुलन साधने की कठिन कोशिश बताता है, जिसमें कभी-कभी संतुलन पूरी तरह नहीं सधता था।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. एफ्रो-एशियाई एकता के लिए नेहरू के दौर में भारत ने कौन-से बड़े कदम उठाए?

उत्तर: भारत ने 1947 के मार्च में एशियाई संबंध सम्मेलन का आयोजन किया, जबकि आज़ादी में अभी पाँच महीने बाकी थे। इंडोनेशिया को डच शासन से मुक्त कराने के समर्थन में 1949 में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन किया। भारत अनौपनिवेशीकरण का प्रबल समर्थक था और उसने नस्लवाद का, खासकर दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद का, विरोध किया। 1955 का बांडुंग-सम्मेलन इस पूरे संपर्क का चरम बिंदु था।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. चीन के साथ भारत के दोस्ताना रिश्ते में किन दो कारणों से खटास आई?

उत्तर: पहला, चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे भारत और चीन के बीच का ऐतिहासिक मध्यवर्ती राज्य खत्म हो गया, और तिब्बती संस्कृति को कुचलने की खबरों से भारत की बेचैनी बढ़ी। दूसरा, भारत ने 1959 में दलाई लामा को शरण दे दी, जिस पर चीन ने आरोप लगाया कि भारत सरकार अंदरूनी तौर पर चीन विरोधी गतिविधियों को हवा दे रही है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. भारत और चीन के बीच सीमा-विवाद किन इलाकों को लेकर था?

उत्तर: मुख्य विवाद चीन से लगी लंबी सीमा-रेखा के पश्चिमी और पूर्वी छोर के बारे में था। चीन ने जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से के अक्साई-चीन और अरुणाचल प्रदेश के अधिकांश हिस्सों पर अपना अधिकार जताया। अरुणाचल प्रदेश को उस समय नेफा या उत्तर-पूर्वी सीमांत कहा जाता था।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. सी. राजगोपालाचारी ने 1950 में एडविना माउंटबेटन को लिखे पत्र में भारत के बारे में क्या कहा?

उत्तर: उन्होंने लिखा कि ताकत के तीनों साधनों, यानी संपदा, धन और जन, से हीन एक देश अब बड़ी तेज़ी से सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है और उसकी आवाज़ को दिग्गज देशों की जमात में बड़ी इज़्ज़त के साथ सुना जाता है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. 1965 के भारत-पाक युद्ध की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर: 1965 के अप्रैल में पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ इलाके के रन में सैनिक हमला बोला। इसके बाद अगस्त-सितंबर में उसने जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर हमला किया। पाकिस्तान के नेताओं को उम्मीद थी कि जम्मू-कश्मीर की जनता उनका समर्थन करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. भारत ने 1971 में सोवियत संघ के साथ संधि क्यों की और उससे उसे क्या मिला?

उत्तर: पाकिस्तान को अमरीका और चीन का साथ मिल रहा था और किसिंजर के जुलाई 1971 के गुपचुप चीन दौरे के बाद अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती दिख रही थी। इसके जवाब में भारत ने सोवियत संघ के साथ 1971 में शांति और मित्रता की 20-वर्षीय संधि पर दस्तखत किए। इस संधि से भारत को आश्वासन मिला कि हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. भारत की विदेश नीति किन अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में बनी?

उत्तर: 1. भारत बड़ी विकट और चुनौतीपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आज़ाद हुआ। दुनिया महायुद्ध की तबाही से अभी बाहर निकली थी और उसके सामने पुनर्निर्माण का सवाल प्रमुख था।
2. एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बनाने के प्रयास हो रहे थे और उपनिवेशवाद की समाप्ति से दुनिया के नक्शे पर नए देश नमूदार हो रहे थे। इन नए देशों के सामने लोकतंत्र कायम करने और अपनी जनता की भलाई करने की दोहरी चुनौती थी।
3. भारत की अपनी चिंताएँ भी थीं। अंग्रेजी सरकार अंतर्राष्ट्रीय विवादों की एक पूरी विरासत छोड़ गई थी, बँटवारे के कारण अलग से दबाव पैदा हुए थे और गरीबी मिटाने का काम सामने खड़ा था।
4. भारत जब अपनी विदेश नीति तैयार कर रहा था तब शीतयुद्ध शुरू ही हुआ था और दुनिया तेज़ी से दो खेमों में बँट रही थी, एक अमरीका के प्रभाव में और दूसरा सोवियत संघ के।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. नेहरू की विदेश नीति के उद्देश्य क्या थे और देश के भीतर इसका विरोध किसने किया?

उत्तर: 1. नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे और 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला।
2. उनके तीन बड़े उद्देश्य थे: कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना, क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना और तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना। इन्हें वे गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।
3. देश में कुछ पार्टियाँ और समूह मानते थे कि भारत को अमरीकी खेमे के साथ नज़दीकी बढ़ानी चाहिए, क्योंकि उस खेमे की प्रतिष्ठा लोकतंत्र के हिमायती के रूप में थी। इस धारा पर सोचने वालों में डा. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे।
4. साम्यवाद की विरोधी कुछ पार्टियाँ, जिनमें भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी प्रमुख थे, भी चाहती थीं कि भारत की विदेश नीति अमरीका के पक्ष में बने। फिर भी विदेश नीति तय करने में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. तिब्बत का मसला भारत और चीन के संबंधों में कैसे उलझा?

उत्तर: 1. तिब्बत मध्य एशिया का मशहूर पठार है और ऐतिहासिक रूप से भारत और चीन के बीच विवाद का बड़ा मसला रहा है। अतीत में चीन ने समय-समय पर तिब्बत पर प्रशासनिक नियंत्रण जताया और कई दफा तिब्बत आज़ाद भी हुआ।
2. 1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया और तिब्बत के ज़्यादातर लोगों ने इस कब्ज़े का विरोध किया।
3. 1954 के पंचशील समझौते के एक प्रावधान में यह बात शामिल थी कि दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान करेंगे। चीन ने इस प्रावधान का अर्थ यह लगाया कि भारत तिब्बत पर चीनी दावेदारी को स्वीकार कर रहा है।
4. 1956 में चाऊ एन लाई के दौरे के साथ दलाई लामा भी भारत आए और उन्होंने नेहरू को तिब्बत की बिगड़ती स्थिति बताई। 1958 में चीनी आधिपत्य के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह हुआ, जिसे चीन की सेनाओं ने दबा दिया, और 1959 में दलाई लामा ने भारत से शरण माँगी जो उन्हें मिल गई। चीन ने इसका कड़ा विरोध किया।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. 1962 के चीनी आक्रमण का घटनाक्रम लिखिए।

उत्तर: 1. 1957 से 1959 के बीच चीन ने अक्साई-चीन इलाके पर कब्ज़ा कर लिया और वहाँ रणनीतिक बढ़त के लिए एक सड़क बनाई। शीर्ष नेताओं की लंबी बातचीत के बावजूद मतभेद नहीं सुलझे और सीमा पर कई बार झड़प हुई।
2. जिस समय पूरे विश्व का ध्यान क्यूबा मिसाइल संकट पर लगा था, ठीक उसी समय चीन ने 1962 के अक्तूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर तेज़ी और व्यापक स्तर पर हमला किया।
3. पहला हमला एक हफ़्ते तक चला और इस दौरान चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश के कुछ महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया। हमले का अगला दौर नवंबर में शुरू हुआ। लद्दाख से लगे पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना ने चीन की बढ़त रोकी, लेकिन पूर्व में चीनी सेना असम के मैदानी हिस्से के प्रवेशद्वार तक पहुँच गई।
4. आखिरकार चीन ने एकतरफा युद्धविराम घोषित किया और उसकी सेनाएँ उसी मुकाम पर लौट गईं जहाँ वे हमले से पहले तैनात थीं।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. 1962 के युद्ध का भारत की राजनीति पर क्या असर पड़ा?

उत्तर: 1. चीन-युद्ध से भारत की छवि को देश और विदेश दोनों जगह धक्का लगा। संकट से उबरने के लिए भारत को अमरीका और ब्रिटेन दोनों से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ी, जबकि सोवियत संघ तटस्थ बना रहा। राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँची, पर राष्ट्र-भावना भी बलवती हुई।
2. कुछ प्रमुख सैन्य-कमांडरों ने इस्तीफा दे दिया या अवकाश ग्रहण कर लिया, और तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णमेनन को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा। चीन के इरादों को न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने पर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई और उनकी छवि धूमिल हुई।
3. पहली बार उनकी सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और लोकसभा में उस पर बहस हुई। इसके तुरंत बाद कांग्रेस कुछ महत्त्वपूर्ण उप-चुनाव हार गई।
4. विपक्ष पर भी असर पड़ा। इस युद्ध और चीन-सोवियत मतभेद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में उठा-पटक मची, पार्टी 1964 में टूट गई और चीन का पक्षधर खेमा माकपा बना। साथ ही पूर्वोत्तर को नयी तरतीब देने की कोशिश शुरू हुई: नगालैंड को प्रांत का दर्जा मिला और मणिपुर तथा त्रिपुरा को अपनी विधानसभा के निर्वाचन का अधिकार।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. 1971 के बांग्लादेश युद्ध का कारण और परिणाम लिखिए।

उत्तर: 1. 1970 में पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश आया। भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में और मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग पूर्वी पाकिस्तान में विजयी रही। पाकिस्तान के शासक न यह जनादेश स्वीकार कर पा रहे थे, न परिसंघ की माँग।
2. 1971 में पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीब को गिरफ़्तार कर लिया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर जुल्म ढाने शुरू किए। जवाब में वहाँ की जनता ने मुक्ति संग्राम छेड़ दिया। पूरे 1971 में भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ वहन करना पड़ा और भारत ने मुक्ति संग्राम को नैतिक समर्थन तथा भौतिक सहायता दी।
3. पाकिस्तान को अमरीका और चीन की मदद मिली। अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख भारत ने 1971 में सोवियत संघ के साथ शांति और मित्रता की 20-वर्षीय संधि की। दिसंबर 1971 में पूर्णव्यापी युद्ध छिड़ गया और भारत ने वायुसेना, नौसेना तथा थलसेना के बूते दोनों मोर्चों पर कार्रवाई की।
4. दस दिनों के अंदर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा। बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना, भारत ने एकतरफा युद्ध-विराम घोषित किया और 3 जुलाई 1972 को शिमला-समझौते से अमन की बहाली हुई।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. पड़ोसियों के साथ युद्धों का भारत की नियोजित विकास की प्रक्रिया पर क्या असर पड़ा?

उत्तर: 1. भारत ने अपने सीमित संसाधनों के साथ नियोजित विकास की शुरुआत की थी, पर पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई।
2. 1962 के बाद भारत को अपने सीमित संसाधन खासतौर से रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े और सैन्य ढाँचे का आधुनिकीकरण करना पड़ा।
3. 1962 में रक्षा-उत्पाद विभाग और 1965 में रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना हुई।
4. तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) पर असर पड़ा, इसके बाद लगातार तीन एक-वर्षीय योजनाओं पर अमल हुआ और चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में ही शुरू हो सकी। युद्ध के बाद भारत का रक्षा-व्यय बहुत बढ़ गया।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. करगिल संघर्ष पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: 1. 1999 के शुरुआती महीनों में भारतीय इलाके की नियंत्रण सीमा रेखा के कई ठिकानों, जैसे द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक, पर अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों ने कब्ज़ा कर लिया था।
2. पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत भाँपकर भारतीय सेना हरकत में आई और दोनों देशों के बीच संघर्ष छिड़ गया, जिसे करगिल की लड़ाई कहा जाता है। यह 1999 के मई-जून में जारी रही और 26 जुलाई 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था।
3. इस लड़ाई ने पूरे विश्व का ध्यान खींचा क्योंकि इससे ठीक एक साल पहले दोनों देश परमाणु हथियार बनाने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुके थे। बहरहाल, लड़ाई सिर्फ करगिल के इलाके तक सीमित रही।
4. पाकिस्तान में इस लड़ाई पर बहुत विवाद मचा और कहा गया कि सेना के प्रमुख ने प्रधानमंत्री को अँधेरे में रखा था। लड़ाई के तुरंत बाद जनरल परवेज मुशर्रफ की अगुवाई में पाकिस्तानी सेना ने हुकूमत पर नियंत्रण कर लिया।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. भारत की परमाणु नीति पर विस्तार से लिखिए। (प्रश्नावली प्रश्न 6क)

उत्तर: शुरुआत
तेज़ गति से आधुनिक भारत के निर्माण के लिए नेहरू ने हमेशा विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर भरोसा जताया। उनकी औद्योगीकरण की नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक परमाणु कार्यक्रम था, जिसकी शुरुआत 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी।
शांतिपूर्ण उद्देश्य
भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल के लिए अणु ऊर्जा बनाना चाहता था। नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे और उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए ज़ोर दिया।
अप्रसार संधि का विरोध
साम्यवादी शासन वाले चीन ने 1964 के अक्तूबर में परमाणु परीक्षण किया। इसके बाद अणुशक्ति-संपन्न बिरादरी, यानी संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन, जो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे, ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि दुनिया के अन्य देशों पर थोपनी चाही। भारत ने इसे हमेशा भेदभावपूर्ण माना और दस्तखत करने से इनकार कर दिया।
1974 का परीक्षण
भारत ने 1974 के मई में परमाणु परीक्षण किया और इसे शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत का कहना था कि वह अणुशक्ति को सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल करने की अपनी नीति के प्रति दृढ़ संकल्प है।
आगे का रास्ता
1995 में जब परमाणु-अप्रसार संधि को अनियतकाल के लिए बढ़ाया गया तो भारत ने विरोध किया और सीटीबीटी पर भी हस्ताक्षर से इनकार कर दिया। 1998 के मई में भारत ने परीक्षण कर यह जताया कि उसके पास सैन्य उद्देश्यों के लिए अणुशक्ति के इस्तेमाल की क्षमता है, और इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए। दोनों पर कुछ प्रतिबंध लगे जो बाद में हटा लिए गए।
नीति का सार
भारत की परमाणु नीति में सैद्धांतिक तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, लेकिन इनका प्रयोग पहले नहीं करेगा। नीति में यह भी दुहराया गया है कि भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव हीन परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है, ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति पर टिप्पणी लिखिए। (प्रश्नावली प्रश्न 6ख)

उत्तर: सहमति का दायरा
राजनीतिक दलों के बीच विदेश नीति के बारे में छोटे-मोटे मतभेद ज़रूर हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के मसलों पर विभिन्न दलों के बीच व्यापक सहमति है।
इसका नतीजा
इसी कारण 1962 से 1971 के बीच जब भारत ने तीन युद्धों का सामना किया, और इसके बाद के समय में भी जब समय-समय पर कई पार्टियों ने सरकार बनाई, विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।
पुराने मतभेद
नेहरू के दौर में कुछ पार्टियाँ और समूह मानते थे कि भारत को अमरीकी खेमे के साथ नज़दीकी बढ़ानी चाहिए। इस धारा में डा. भीमराव अंबेडकर, भारतीय जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी शामिल थे। फिर भी विदेश नीति तय करने में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।
1977 के बाद
1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने घोषणा की कि सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति का पालन किया जाएगा, यानी सोवियत संघ के प्रति आया झुकाव खत्म किया जाएगा। इसके बाद की सभी सरकारों ने, कांग्रेसी हों या गैर-कांग्रेसी, चीन के साथ बेहतर संबंध और अमरीका के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने की पहल की।
बहस के दो केंद्र
भारत की विदेश नीति को खास तौर पर दो संदर्भों में देखा जाता है: पाकिस्तान को लेकर भारत का रुख, और भारत-अमरीका संबंध। 1990 के बाद के दौर में अमरीका-समर्थक विदेश नीति अपनाने के लिए शासक दलों की आलोचना भी हुई है।
निष्कर्ष
सहमति का मतलब यह नहीं कि कोई मतभेद ही नहीं है। मतलब यह है कि जिन मसलों पर देश की सुरक्षा और अखंडता टिकी है, उन पर दल आपस में नहीं बँटते, और इसीलिए विदेश नीति चुनावी राजनीति का मुद्दा कम ही बन पाती है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. ‘विदेश नीति का निर्धारण घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।’ 1960 के दशक से उदाहरण देकर पुष्टि कीजिए। (प्रश्नावली प्रश्न 4)

उत्तर: सिद्धांत
अध्याय कहता है कि जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरूनी और बाहरी कारक निर्देशित करते हैं, उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है।
उदाहरण: 1962 का चीन-युद्ध
अंतर्राष्ट्रीय दबाव यह था कि चीन ने अक्साई-चीन पर कब्ज़ा कर लिया था और अक्तूबर 1962 में हमला कर दिया, ठीक उस वक्त जब दुनिया का ध्यान क्यूबा मिसाइल संकट पर था।
घरेलू असर
इस बाहरी घटना ने घरेलू राजनीति को बदल दिया। रक्षा मंत्री कृष्णमेनन को जाना पड़ा, नेहरू की छवि धूमिल हुई, पहली बार अविश्वास प्रस्ताव आया, कांग्रेस उप-चुनाव हारी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई।
घरेलू ज़रूरत ने नीति बदली
दूसरी तरफ घरेलू ज़रूरत ने भी विदेश नीति को मोड़ा। संकट से उबरने के लिए भारत को अमरीका और ब्रिटेन से सैन्य मदद माँगनी पड़ी, जबकि वह गुटनिरपेक्षता की नीति पर चल रहा था। संसाधन रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े, 1962 में रक्षा-उत्पाद विभाग बना और तीसरी पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई।
1971 का उदाहरण
यही बात 1971 में दिखी। घरेलू ज़रूरत 80 लाख शरणार्थियों का बोझ थी और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति अमरीका-पाकिस्तान-चीन की बनती धुरी। दोनों दबावों के मेल ने भारत को सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय संधि तक पहुँचाया।
निष्कर्ष
इन दोनों उदाहरणों से साफ़ है कि विदेश नीति न सिर्फ बाहर की परिस्थिति से बनती है, न सिर्फ भीतर की ज़रूरत से। वह दोनों के दबाव में बनती है और बदलती है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. 1962 से 1971 के बीच तीन युद्ध हुए। क्या यह भारत की विदेश नीति की असफलता थी? (प्रश्नावली प्रश्न 7)

उत्तर: प्रश्न का संदर्भ
भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ, फिर भी महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा।
असफलता कहने के पक्ष में तर्क
नेहरू ने चीन पर भरोसा किया और पंचशील की घोषणा की, पर 1962 में हमला हुआ। पटेल जैसी आवाज़ों की आशंका को गंभीरता से नहीं लिया गया, सीमा पर सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल तैनात रहे और सैन्य तैयारी नहीं थी। इसी आधार पर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई।
अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति कहने के पक्ष में तर्क
दूसरी तरफ, तीनों युद्ध भारत ने शुरू नहीं किए। चीन ने 1962 में हमला किया, पाकिस्तान ने 1965 में कच्छ के रन और जम्मू-कश्मीर में हमला किया, और 1971 का युद्ध पाकिस्तान के अपने अंदरूनी संकट तथा 80 लाख शरणार्थियों के बोझ से निकला। शीतयुद्ध का ढाँचा, पाकिस्तान का अमरीकी गठबंधन में शामिल होना और अमरीका-चीन की नज़दीकी, ये सब भारत के नियंत्रण से बाहर थे।
नीति की उपलब्धियाँ
यह भी देखना चाहिए कि गुटनिरपेक्षता से भारत को दोनों खेमों से सहायता और अनुदान मिले, वह अनौपनिवेशीकरण और रंगभेद-विरोध का प्रबल स्वर बना, और उसने बांडुंग तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई।
संतुलित निष्कर्ष
इसलिए इसे पूरी तरह विदेश नीति की असफलता कहना ठीक नहीं होगा। युद्ध मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और पड़ोसियों के कदमों का परिणाम थे। हाँ, चीन के इरादों का आकलन और सैन्य तैयारी, इन दो मोर्चों पर नीति चूकी ज़रूर, और 1962 के बाद भारत ने इसी सबक पर अपने सैन्य ढाँचे का आधुनिकीकरण शुरू किया।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व उसकी विदेश नीति पर कैसे असर डालता है? भारत के उदाहरण से समझाइए। (प्रश्नावली प्रश्न 9)

उत्तर: नेहरू का दौर
नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे और 1946 से 1964 तक उन्होंने विदेश नीति की रचना तथा क्रियान्वयन दोनों पर गहरा प्रभाव डाला। गुटनिरपेक्षता, एशियाई एकता, बांडुंग सम्मेलन और पंचशील, ये सब उनकी सोच की छाप हैं।
नेतृत्व की सीमा भी दिखी
नेतृत्व का असर सिर्फ उपलब्धि नहीं होता। चीन के आक्रमण की संभावना को नेहरू ने दूर-दूर तक नहीं माना, जबकि पटेल जैसे सहयोगी आशंकित थे। 1962 के बाद इसी आकलन पर उनकी आलोचना हुई और उनकी छवि धूमिल हुई।
शास्त्री का दौर
1965 में लालबहादुर शास्त्री ने कश्मीर के मोर्चे पर दबाव कम करने के लिए पंजाब की सीमा से जवाबी हमले का आदेश दिया और बाद में ताशकंद-समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह एक अलग तरह का निर्णायक नेतृत्व था।
इंदिरा गाँधी का दौर
1971 में इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं। सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय संधि, मुक्ति संग्राम को समर्थन और दिसंबर के युद्ध का संचालन उनके नेतृत्व में हुआ। जीत के बाद उनकी लोकप्रियता को चार चाँद लग गए और शिमला-समझौते पर उन्होंने ही दस्तखत किए।
सरकार बदलने का असर
1977 में जनता पार्टी की सरकार ने सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति की घोषणा की, यानी सोवियत झुकाव को दुरुस्त करने की बात कही। इसके बाद की सभी सरकारों ने चीन से बेहतर और अमरीका से नजदीकी रिश्तों की पहल की।
निष्कर्ष
इसलिए नेतृत्व विदेश नीति की दिशा, प्राथमिकता और गति तय करता है। लेकिन भारत में राष्ट्रीय हित और सीमा की सुरक्षा जैसे मसलों पर दलों में व्यापक सहमति रही है, इसीलिए नेतृत्व बदलने पर भी नीति की बुनियाद पूरी तरह नहीं बदली।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
अध्याय के हाशिये पर संविधान सभा की एक बहस (मार्च 1949) से जवाहरलाल नेहरू का यह अवतरण दिया गया है: आज़ादी किन चीजों से बनती है? आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है। यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है। एक बार विदेश संबंध आपके हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाएँ तो फिर जिस हद तक आपके हाथ से ये संबंध छूटे और जिन मसलों में छूटे, वहाँ तक आप आज़ाद नहीं रहते।

(क) 1 अंक यह अवतरण किसका है और किस अवसर का है?
उत्तर: यह जवाहरलाल नेहरू का है और संविधान सभा की एक बहस के दौरान, मार्च 1949 में कहा गया था।

(ख) 1 अंक नेहरू के अनुसार आज़ादी की कसौटी क्या है?
उत्तर: विदेश संबंध। उनके अनुसार आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है और यही आज़ादी की कसौटी भी है।

(ग) 2 अंक ‘बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है’ से नेहरू का क्या आशय है?
उत्तर: उनका आशय है कि अगर कोई देश अपने भीतरी मामले खुद चलाता है पर अपने विदेश संबंध खुद तय नहीं करता, तो वह पूरी तरह आज़ाद नहीं कहा जा सकता। ऐसी हालत में उसे मिली हुई आज़ादी सिर्फ भीतरी कामकाज चलाने की छूट रह जाती है, संप्रभुता नहीं।

(घ) 4 अंक इस अवतरण के आधार पर बताइए कि नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे। दो कारण उदाहरण सहित दीजिए। (प्रश्नावली प्रश्न 3)
उत्तर: 1. पहला कारण संप्रभुता है। नेहरू के अनुसार जिस हद तक विदेश संबंध दूसरे के हाथ में चले जाएँ, उस हद तक देश आज़ाद नहीं रहता। उदाहरण यह है कि आज़ादी के तुरंत बाद भारत ने किसी खेमे में शामिल न होकर गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, ताकि उसके फ़ैसले उसके अपने रहें।
2. दूसरा कारण स्वतंत्र रुख की क्षमता है। भारत ने 1956 में स्वेज नहर के मामले पर ब्रिटेन के हमले के विरुद्ध विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की, जबकि उसी साल हंगरी के मामले में उसने सोवियत संघ की सार्वजनिक निंदा नहीं की। दोनों ही मौकों पर फ़ैसला भारत का अपना था, किसी गुट का थोपा हुआ नहीं, और अध्याय कहता है कि कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया तथा उसे दोनों खेमों से सहायता और अनुदान मिले।

केस स्टडी
अध्याय के तिब्बत बॉक्स में लिखा है: चीन ने ‘स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र’ बनाया है और इस इलाके को वह चीन का अभिन्न अंग मानता है। तिब्बती जनता चीन के इस दावे को नहीं मानती कि तिब्बत चीन का अभिन्न अंग है। ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में चीनी बाशिंदों को तिब्बत लाकर वहाँ बसाने की चीन की नीति का तिब्बती जनता ने विरोध किया। तिब्बती चीन के इस दावे को भी नकारते हैं कि तिब्बत को स्वायत्तता दी गई है। वे मानते हैं कि तिब्बत की पारंपरिक संस्कृति और धर्म को नष्ट करके चीन वहाँ साम्यवाद फैलाना चाहता है।

(क) 1 अंक चीन तिब्बत को क्या मानता है?
उत्तर: चीन ने ‘स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र’ बनाया है और इस इलाके को वह चीन का अभिन्न अंग मानता है।

(ख) 2 अंक तिब्बती जनता चीन के किन दो दावों को नकारती है?
उत्तर: पहला, यह दावा कि तिब्बत चीन का अभिन्न अंग है। दूसरा, यह दावा कि तिब्बत को स्वायत्तता दी गई है। तिब्बती मानते हैं कि चीन तिब्बत की पारंपरिक संस्कृति और धर्म को नष्ट करके वहाँ साम्यवाद फैलाना चाहता है।

(ग) 2 अंक चीन की किस नीति का तिब्बती जनता ने विरोध किया?
उत्तर: ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में चीनी बाशिंदों को तिब्बत लाकर वहाँ बसाने की नीति का।

(घ) 4 अंक तिब्बत के मसले ने भारत और चीन के रिश्ते को किस तरह प्रभावित किया?
उत्तर: 1. 1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया, जिससे भारत और चीन के बीच का ऐतिहासिक मध्यवर्ती राज्य खत्म हो गया। शुरू में भारत सरकार ने खुले तौर पर विरोध नहीं किया।
2. 1954 के पंचशील समझौते में क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान वाले प्रावधान का चीन ने यह अर्थ लगाया कि भारत तिब्बत पर उसकी दावेदारी स्वीकार कर रहा है।
3. तिब्बत की संस्कृति को कुचलने की खबरों से भारत की बेचैनी बढ़ी। 1958 के सशस्त्र विद्रोह को चीन ने दबा दिया और 1959 में भारत ने दलाई लामा को शरण दे दी, जिसका चीन ने कड़ा विरोध किया और आरोप लगाया कि भारत चीन विरोधी गतिविधियों को हवा दे रहा है।
4. भारत में तिब्बती शरणार्थियों की बड़ी बस्तियाँ बनीं, जिनमें सबसे बड़ी हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में है। 1950 और 1960 के दशक में सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ जैसे दलों ने तिब्बत की आज़ादी का समर्थन किया, जिससे यह मसला भारत की घरेलू राजनीति का भी हिस्सा बना।