कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 4 भारत के विदेश संबंध NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II के अध्याय 4 भारत के विदेश संबंध की प्रश्नावली के सभी 10 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में हाशिये की टिप्पणियों में पूछे गए प्रश्न भी हल किए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

इस अध्याय में दोनों संस्करणों की प्रश्नावली एक जैसी है

कई अध्यायों में हिंदी और अंग्रेज़ी किताब की प्रश्नावली अलग-अलग छपी है और इसी वजह से सही उत्तर का अक्षर तक बदल जाता है। इस अध्याय में ऐसा नहीं है। दोनों संस्करणों में 10 ही प्रश्न हैं, उसी क्रम में, उन्हीं उप-भागों के साथ। प्रश्न 2 के सुमेलन में दाईं ओर की सूची भी दोनों किताबों में एक ही क्रम में छपी है, इसलिए सही जोड़े दोनों में एक जैसे बनते हैं। नीचे के सारे उत्तर फिर भी हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।

यह अध्याय अपनी प्रश्नावली का पूरा साथ देता है

यह 2022 में तर्कसंगत किया गया संस्करण है। कुछ दूसरे अध्यायों में ऐसा हुआ है कि प्रश्नावली के प्रश्न उन हिस्सों से आते हैं जो अब मूल पाठ में नहीं हैं। इस अध्याय में ऐसा एक भी प्रश्न नहीं है। दसों प्रश्नों का आधार अध्याय के मौजूदा पन्नों में मौजूद है। सिर्फ़ दो बातें ध्यान रखिए: प्रश्न 3 का आधार अध्याय के हाशिये पर छपा नेहरू का अवतरण (संविधान सभा, मार्च 1949) है, और प्रश्न 10 का अवतरण प्रश्न के भीतर ही दिया गया है। यानी बॉक्स और हाशिये की सामग्री भी पूरी तरह परीक्षा में आती है, उसे छोड़िए मत।

1 सही या गलत का निशान लगाएँ

प्रश्न 1

प्र. इन बयानों के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ:
(क) गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका, दोनों की सहायता हासिल कर सका।
(ख) अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे।
(ग) शीतयुद्ध का असर भारत-पाक संबंधों पर भी पड़ा।
(घ) 1971 की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।

उत्तर:

बयान सही / गलत किताब का आधार
(क) सही अध्याय कहता है कि कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया और उसे दोनों खेमों के देशों ने सहायता और अनुदान दिए
(ख) गलत अध्याय का अपना वाक्य है कि पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के विपरीत आज़ाद भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तों की शुरुआत बड़े दोस्ताना ढंग से की। यानी सभी पड़ोसियों से शुरू से तनाव नहीं था
(ग) सही शीतयुद्ध के दौर में पाकिस्तान अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया, जिससे 1950 के दशक में भारत-अमरीकी संबंधों में खटास पैदा हुई और भारत-पाक रिश्ते इसी खेमेबंदी में उलझे
(घ) गलत यह संधि अमरीका से निकटता का नहीं, उससे उलटी स्थिति का नतीजा थी। अध्याय कहता है कि अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख भारत ने इसके जवाब में सोवियत संघ के साथ 1971 में शांति और मित्रता की एक 20-वर्षीय संधि पर दस्तखत किए

छोटा रूप: (क) सही, (ख) गलत, (ग) सही, (घ) गलत।

2 सही जोड़ा मिलाएँ

प्रश्न 2

प्र. निम्नलिखित का सही जोड़ा मिलाएँ:
(क) 1950-64 के दौरान भारत की विदेश नीति का लक्ष्य    (ख) पंचशील    (ग) बांडुंग सम्मेलन    (घ) दलाई लामा
(i) तिब्बत के धार्मिक नेता जो सीमा पार करके भारत चले आए।    (ii) क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास।    (iii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत।    (iv) इसकी परिणति गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हुई।

उत्तर:

सूची I सूची II कारण
(क) 1950-64 की विदेश नीति का लक्ष्य (ii) अध्याय के अनुसार नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य थे: संप्रभुता को बचाए रखना, क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखना और तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना
(ख) पंचशील (iii) अध्याय पंचशील को शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांत ही कहता है, जिनकी घोषणा नेहरू और चाऊ एन लाई ने 29 अप्रैल 1954 को की
(ग) बांडुंग सम्मेलन (iv) अध्याय का वाक्य है कि बांडुंग-सम्मेलन में ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी
(घ) दलाई लामा (i) तिब्बत के धार्मिक नेता, जिन्होंने सीमा पारकर भारत में प्रवेश किया और 1959 में शरण माँगी, जो भारत ने दे दी

छोटा रूप: क-(ii), ख-(iii), ग-(iv), घ-(i)।

ध्यान दीजिए: दाईं ओर की सूची अंग्रेज़ी किताब में भी इसी क्रम में छपी है, इसलिए यहाँ दोनों संस्करणों के जोड़े एक ही बनते हैं। कई दूसरे अध्यायों में ऐसा नहीं होता, इसलिए हमेशा अपनी ही किताब का क्रम देखकर लिखिए।

3 नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का संकेतक क्यों मानते थे

प्रश्न 3

प्र. नेहरू विदेश नीति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? अपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।

उत्तर: इस प्रश्न का सीधा आधार अध्याय के हाशिये पर छपा नेहरू का अवतरण है। संविधान सभा की एक बहस (मार्च 1949) में उन्होंने कहा था कि आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है, यही आज़ादी की कसौटी भी है, बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है, और एक बार विदेश संबंध आपके हाथ से निकलकर दूसरे के हाथ में चले जाएँ तो जिस हद तक ये संबंध छूटे, वहाँ तक आप आज़ाद नहीं रहते।

पहला कारण: संप्रभुता का असली पैमाना यही है। जो देश अपने भीतरी काम तो ख़ुद चलाता है पर यह तय नहीं कर पाता कि दुनिया में किसके साथ खड़ा होगा, वह नेहरू की नज़र में पूरी तरह आज़ाद नहीं है। भारत ने आज़ादी के तुरंत बाद यही तय किया कि वह किसी खेमे में शामिल नहीं होगा। नेहरू ने के.पी.एस. मेनन को जनवरी 1947 के पत्र में लिखा कि हमारी नीति ताकत की राजनीति से अपने को अलग रखने और महाशक्तियों के एक खेमे के विरुद्ध दूसरे खेमे में शामिल न होने की है, हमें दोनों के साथ दोस्ताना संबंध रखना है, साथ ही उनके खेमे में शामिल भी नहीं होना है।

उदाहरण: भारत ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन और वारसा पैक्ट, दोनों तरह के सैन्य गठबंधनों से अपने को दूर रखा और गुटनिरपेक्षता को आदर्श माना।

दूसरा कारण: हर मसले पर अपनी अलग राय रख पाना। गुट में शामिल देश को अपने गुट की लाइन माननी पड़ती है। आज़ाद देश हर मामले को अपने गुण-दोष पर परखता है।

उदाहरण: 1956 में जब ब्रिटेन ने स्वेज नहर के मामले को लेकर मिस्र पर आक्रमण किया तो भारत ने इस नव-औपनिवेशिक हमले के विरुद्ध विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की। इसी साल सोवियत संघ ने हंगरी पर आक्रमण किया, पर भारत ने उसकी सार्वजनिक निंदा नहीं की। अध्याय इसे संतुलन साधने की कठिन कोशिश बताता है, और साथ ही यह भी कहता है कि ऐसी स्थिति के बावजूद कमोबेश भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपनाया और उसे दोनों खेमों के देशों ने सहायता तथा अनुदान दिए।

निष्कर्ष: दोनों उदाहरणों में एक ही बात दिखती है। जिस दिन विदेश नीति किसी और के इशारे पर चलने लगेगी, उस दिन आज़ादी का वह हिस्सा भी चला जाएगा, चाहे भीतर का कामकाज ज्यों का त्यों चलता रहे। इसीलिए नेहरू इसे स्वतंत्रता का अनिवार्य संकेतक मानते थे।

4 घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का दोहरा दबाव

प्रश्न 4

प्र. ‘‘विदेश नीति का निर्धारण घरेलू ज़रूरत और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।’’ 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश नीति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।

उत्तर: अध्याय स्वयं यह सिद्धांत देता है कि जिस तरह किसी व्यक्ति या परिवार के व्यवहारों को अंदरूनी और बाहरी कारक निर्देशित करते हैं, उसी तरह एक देश की विदेश नीति पर भी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का असर पड़ता है। 1960 के दशक का सबसे साफ़ उदाहरण 1962 का चीन-युद्ध और उसके बाद का दौर है।

अंतर्राष्ट्रीय दबाव: चीन ने 1957 से 1959 के बीच अक्साई-चीन पर कब्ज़ा कर वहाँ एक रणनीतिक सड़क बना ली थी। बातचीत से मतभेद नहीं सुलझे और जिस समय पूरे विश्व का ध्यान क्यूबा मिसाइल संकट पर था, ठीक उसी समय चीन ने 1962 के अक्तूबर में दोनों विवादित क्षेत्रों पर व्यापक हमला कर दिया। यह पूरी परिस्थिति भारत के हाथ में नहीं थी।

घरेलू ज़रूरत ने नीति बदली: गुटनिरपेक्षता पर चलते हुए भी भारत को इस संकट से उबरने के लिए अमरीका और ब्रिटेन दोनों से सैन्य मदद की गुहार लगानी पड़ी, जबकि सोवियत संघ तटस्थ बना रहा। भीतर की ज़रूरत ने बाहर के रुख को झुकाया।

अंतर्राष्ट्रीय घटना ने घरेलू राजनीति बदली: उसी युद्ध ने भारत की भीतरी राजनीति को हिला दिया। रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णमेनन को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा, नेहरू की छवि धूमिल हुई, पहली बार उनकी सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव आया, कांग्रेस कुछ महत्त्वपूर्ण उप-चुनाव हारी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई।

नियोजन पर असर: 1962 के बाद भारत को अपने सीमित संसाधन खासतौर से रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े। 1962 में रक्षा-उत्पाद विभाग और 1965 में रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना हुई, तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) पर असर पड़ा और चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में ही शुरू हो सकी।

निष्कर्ष: यानी बाहर की परिस्थिति ने भीतर की राजनीति और अर्थव्यवस्था को बदला, और भीतर की ज़रूरत ने बाहर के फ़ैसलों को। यही दोहरा दबाव है।

5 विदेश नीति की दो बातें बदलना और दो बरकरार रखना

प्रश्न 5

प्र. अगर आपको भारत की विदेश नीति के बारे में फैसला लेने को कहा जाए तो आप इसकी किन दो बातों को बदलना चाहेंगे। ठीक इसी तरह यह भी बताएँ कि भारत की विदेश नीति के किन दो पहलुओं को आप बरकरार रखना चाहेंगे। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दीजिए।

उत्तर: यह अपनी राय का प्रश्न है, पर राय अध्याय के तथ्यों पर टिकी होनी चाहिए। एक नमूना उत्तर नीचे है।

जो बरकरार रखना चाहेंगे

1. गुटनिरपेक्षता की मूल भावना, यानी फ़ैसले का अधिकार अपने पास रखना। तर्क यह है कि इसी नीति के कारण भारत को दोनों खेमों से सहायता और अनुदान मिले, और वह स्वेज तथा हंगरी जैसे अलग-अलग मामलों में अपने-अपने गुण-दोष पर राय बना सका।

2. पड़ोसियों के साथ बातचीत और समझौते का रास्ता खुला रखना। तर्क यह है कि कश्मीर पर संघर्ष के बावजूद दोनों सरकारों ने बँटवारे में अपहृत महिलाओं की वापसी पर मिलकर काम किया और विश्व बैंक की मध्यस्थता से 1960 में सिंधु नदी जल संधि हुई, जिस पर संबंधों की नरमी-गरमी के बावजूद ठीक-ठाक अमल होता रहा।

जो बदलना चाहेंगे

1. पड़ोसी की मंशा का आकलन और सैन्य तैयारी। तर्क यह है कि अध्याय के अनुसार नेहरू सोच रहे थे कि भारत पर चीन के आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है, जबकि सरदार पटेल जैसे सहयोगी आशंकित थे। सीमा पर बहुत दिनों तक सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल तैनात रहे और 1962 में इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

2. आर्थिक रिश्तों को नीति का हिस्सा बनाना। तर्क यह है कि नियोजित विकास की रणनीति में ज़ोर आयात कम करने पर था, निर्यात में प्रगति सीमित रही और इस कारण बाहरी दुनिया से भारत का आर्थिक लेन-देन बड़ा सीमित रहा। अध्याय स्वयं कहता है कि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में सैन्य-हितों के बजाय आर्थिक-हितों का ज़ोर ज़्यादा है।

याद रखिए: ऐसे प्रश्न में अंक तर्क के मिलते हैं, राय के नहीं। हर बिंदु के साथ अध्याय से एक उदाहरण ज़रूर जोड़िए।

6 संक्षिप्त टिप्पणियाँ

प्रश्न 6 (क)

प्र. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए: (क) भारत की परमाणु नीति

उत्तर:

शुरुआत: तेज़ गति से आधुनिक भारत के निर्माण के लिए नेहरू ने हमेशा विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर अपना विश्वास जताया। उनकी औद्योगीकरण की नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक परमाणु कार्यक्रम था, जिसकी शुरुआत 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी।

मूल मकसद शांतिपूर्ण था: भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल के लिए अणु ऊर्जा बनाना चाहता था। नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे और उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए ज़ोर दिया। बहरहाल, दुनिया में परमाणु आयुधों में बढ़ोत्तरी होती रही।

अप्रसार संधि का विरोध: साम्यवादी शासन वाले चीन ने 1964 के अक्तूबर में परमाणु परीक्षण किया। इसके बाद अणुशक्ति-संपन्न बिरादरी, यानी संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन, जो संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे, ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि दुनिया के अन्य देशों पर थोपनी चाही। भारत हमेशा से इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता आया था और उसने इस पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया।

1974 का परीक्षण: भारत ने 1974 के मई में परमाणु परीक्षण किया और इसे शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत का कहना था कि वह अणुशक्ति को सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल करने की अपनी नीति के प्रति दृढ़ संकल्प है।

आगे का रास्ता: भारत ने अप्रसार की उन संधियों का विरोध किया जो सिर्फ परमाणु शक्ति से हीन देशों पर लागू होने को थीं और जिनसे परमाणु हथियारों से लैस देशों के एकाधिकार को वैधता मिल रही थी। इसी कारण 1995 में जब परमाणु-अप्रसार संधि को अनियतकाल के लिए बढ़ाया गया तो भारत ने विरोध किया और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर भी हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।

1998 और उसके बाद: भारत ने 1998 के मई में परमाणु परीक्षण किए और जताया कि उसके पास सैन्य उद्देश्यों के लिए अणुशक्ति के इस्तेमाल की क्षमता है। इसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी परीक्षण किए, जिससे क्षेत्र में परमाणु युद्ध की आशंका को बल मिला। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी बहुत नाराज़ थी और उसने दोनों देशों पर कुछ प्रतिबंध लगाए, जिन्हें बाद में हटा लिया गया।

नीति का सार: भारत की परमाणु नीति में सैद्धांतिक तौर पर यह स्वीकार किया गया है कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, लेकिन इन हथियारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा। नीति में यह भी दुहराया गया है कि भारत वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव हीन परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध है, ताकि परमाणु हथियारों से मुक्त विश्व की रचना हो।

प्रश्न 6 (ख)

प्र. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए: (ख) विदेश नीति के मामलों पर सर्व-सहमति

उत्तर:

सहमति का दायरा: अध्याय कहता है कि हालाँकि राजनीतिक दलों के बीच विदेश नीति के बारे में छोटे-मोटे मतभेद ज़रूर हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में विभिन्न दलों के बीच राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के मसलों पर व्यापक सहमति है।

इसका नतीजा: इसी कारण 1962 से 1971 के बीच जब भारत ने तीन युद्धों का सामना किया, और इसके बाद के समय में भी जब समय-समय पर कई पार्टियों ने सरकार बनाई, विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।

पुराने मतभेद भी थे: नेहरू के दौर में कुछ पार्टियाँ और समूह मानते थे कि भारत को अमरीकी खेमे के साथ ज्यादा नज़दीकी बढ़ानी चाहिए, क्योंकि उस खेमे की प्रतिष्ठा लोकतंत्र के हिमायती के रूप में थी। इस धारा पर सोचने वालों में डा. भीमराव अंबेडकर भी शामिल थे, और साम्यवाद-विरोधी दलों में भारतीय जनसंघ तथा स्वतंत्र पार्टी प्रमुख थे। फिर भी विदेश नीति तैयार करने में नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।

1977 के बाद: 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार ने घोषणा की कि सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति का पालन किया जाएगा, यानी विदेश नीति में सोवियत संघ के प्रति आया झुकाव खत्म किया जाएगा। इसके बाद की सभी सरकारों ने, कांग्रेसी हों या गैर-कांग्रेसी, चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने और अमरीका के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने की पहल की।

बहस के दो केंद्र: अध्याय के अनुसार भारत की विदेश नीति को विशेष तौर पर दो संदर्भों में देखा जाता है, एक पाकिस्तान को लेकर भारत के रुख के संदर्भ में और दूसरे भारत-अमरीका संबंधों के संदर्भ में। 1990 के बाद के दौर में अमरीका-समर्थक विदेश नीति अपनाने के लिए शासक दलों की आलोचना हुई है।

निष्कर्ष: सहमति का मतलब यह नहीं कि मतभेद हैं ही नहीं। मतलब यह है कि जिन मसलों पर देश की सुरक्षा और अखंडता टिकी है, उन पर दल आपस में नहीं बँटते, और इसीलिए विदेश नीति चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा कम ही बन पाती है।

7 दस साल में तीन युद्ध: नीति की असफलता या परिस्थिति का परिणाम

प्रश्न 7

प्र. भारत की विदेश नीति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ। लेकिन, 1962-1971 की अवधि यानी महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है कि यह भारत की विदेश नीति की असफलता है अथवा, आप इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मंतव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।

उत्तर: दोनों पक्षों के तर्क देकर संतुलित निष्कर्ष निकालना यहाँ सही तरीका है।

असफलता कहने के पक्ष में तर्क

1. चीन के इरादों का आकलन चूका। अध्याय कहता है कि नेहरू सोच रहे थे कि भारत पर चीन के आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है, जबकि सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे सहयोगी आशंकित थे।

2. तैयारी नहीं थी। बहुत दिनों से चीन से लगती सीमा पर सेना के बजाय अर्द्ध-सैनिक बल रखवाली कर रहे थे। युद्ध के बाद चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने को लेकर नेहरू की बड़ी आलोचना हुई।

अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम कहने के पक्ष में तर्क

1. तीनों युद्ध भारत ने शुरू नहीं किए। 1962 में चीन ने हमला किया, 1965 के अप्रैल में पाकिस्तान ने कच्छ के रन में और फिर अगस्त-सितंबर में जम्मू-कश्मीर में हमला किया, और 1971 का युद्ध पाकिस्तान के अपने अंदरूनी संकट से निकला जिसमें भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ उठाना पड़ा।

2. शीतयुद्ध का ढाँचा भारत के नियंत्रण से बाहर था। पाकिस्तान अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-गठबंधन में शामिल हो गया, और 1971 में अमरीका तथा चीन दोनों ने पाकिस्तान की मदद की।

नीति की उपलब्धियाँ भी देखिए

गुटनिरपेक्षता के कारण भारत को दोनों खेमों से सहायता और अनुदान मिले। भारत अनौपनिवेशीकरण का प्रबल समर्थक बना, उसने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद का विरोध किया, बांडुंग-सम्मेलन तक एशिया-अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों से संपर्क बढ़ाया और गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना में नेहरू की महती भूमिका रही।

निष्कर्ष: इसे पूरी तरह विदेश नीति की असफलता कहना उचित नहीं होगा। युद्ध मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और पड़ोसी देशों के कदमों का परिणाम थे। हाँ, पड़ोसी की मंशा के आकलन और सैन्य तैयारी के मोर्चे पर चूक ज़रूर हुई, और 1962 के बाद भारत ने इसी सबक पर अपने सैन्य ढाँचे का आधुनिकीकरण शुरू किया।

8 क्या भारत क्षेत्रीय महाशक्ति बनना चाहता है

प्रश्न 8

प्र. क्या भारत की विदेश नीति से यह झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है? 1971 के बांग्लादेश युद्ध के संदर्भ में इस प्रश्न पर विचार करें।

उत्तर:

हाँ कहने के पक्ष में

1. 1971 में भारत ने वायुसेना, नौसेना और थलसेना, तीनों के बूते पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर कार्रवाई की। दस दिनों के अंदर भारतीय सेना ने ढाका को तीन तरफ से घेर लिया और 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा।

2. इस जीत को देश के भीतर सैन्य-पराक्रम के प्रमाण की तरह देखा गया। अध्याय कहता है कि अधिकांश भारतीयों ने इसे गौरव की घड़ी के रूप में देखा और माना कि भारत का सैन्य-पराक्रम प्रबल हुआ है।

3. भारत ने अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी के जवाब में सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय संधि करके यह भी दिखाया कि वह क्षेत्र के शक्ति-संतुलन में सक्रिय खिलाड़ी है।

नहीं कहने के पक्ष में

1. भारत पहले कदम पर हस्तक्षेप नहीं कर रहा था। उसने पूरे 1971 में 80 लाख शरणार्थियों का बोझ उठाया और मुक्ति संग्राम को नैतिक समर्थन तथा भौतिक सहायता दी। यह एक मानवीय और सुरक्षा संबंधी मजबूरी थी।

2. भारत ने बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र बनते ही अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया। किसी भू-भाग पर कब्ज़ा बनाए रखने की कोशिश नहीं हुई।

3. इसके बाद 3 जुलाई 1972 को इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला-समझौते पर दस्तखत हुए और इससे अमन की बहाली हुई। यानी अंत बातचीत और समझौते पर हुआ।

निष्कर्ष: 1971 से यह ज़रूर झलकता है कि भारत अपने क्षेत्र में एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा और उसने इस भूमिका को स्वीकार भी किया। लेकिन उसका व्यवहार विस्तारवादी नहीं था। एकतरफा युद्ध-विराम और शिमला-समझौता बताते हैं कि लक्ष्य क्षेत्र पर दबदबा कायम करना नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और सीमा पर स्थिरता हासिल करना था।

9 राजनीतिक नेतृत्व का विदेश नीति पर असर

प्रश्न 9

प्र. किसी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व किस तरह उस राष्ट्र की विदेश नीति पर असर डालता है? भारत की विदेश नीति के उदाहरण देते हुए इस प्रश्न पर विचार कीजिए।

उत्तर:

1. नेहरू का दौर: नीति की बुनियाद। नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे और 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला। गुटनिरपेक्षता, एशियाई एकता की पैरोकारी, 1947 के मार्च का एशियाई संबंध सम्मेलन, इंडोनेशिया की आज़ादी का समर्थन, 1955 का बांडुंग-सम्मेलन और 29 अप्रैल 1954 की पंचशील घोषणा, ये सब उनकी सोच की छाप हैं।

2. नेतृत्व की सीमा भी दिखती है। नेहरू ने चीन के आक्रमण की संभावना को दूर-दूर तक नहीं माना, जबकि सरदार पटेल आशंकित थे। 1962 के बाद इसी आकलन पर उनकी बड़ी आलोचना हुई और उनकी छवि धूमिल हुई। यानी नेतृत्व जितना दिशा देता है, उतनी ही उसकी चूक की कीमत भी देश चुकाता है।

3. शास्त्री का दौर। 1965 में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने कश्मीर के मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना की बढ़त रोकने के लिए पंजाब की सीमा की तरफ से जवाबी हमले के आदेश दिए, और बाद में 1966 में जनरल अयूब खान के साथ ताशकंद-समझौते पर हस्ताक्षर किए।

4. इंदिरा गाँधी का दौर। 1971 में वे प्रधानमंत्री थीं। सोवियत संघ के साथ 20-वर्षीय संधि, बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम को समर्थन और दिसंबर के युद्ध का संचालन उनके नेतृत्व में हुआ। 1971 की जंग के बाद उनकी लोकप्रियता को चार चाँद लग गए और उन्होंने ही शिमला-समझौते पर दस्तखत किए।

5. सरकार बदलने का असर। 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने घोषणा की कि सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति का पालन होगा, यानी सोवियत झुकाव खत्म किया जाएगा। इसके बाद की सभी सरकारों ने चीन से बेहतर और अमरीका से नजदीकी रिश्तों की पहल की।

निष्कर्ष: नेतृत्व विदेश नीति की दिशा, प्राथमिकता और गति तय करता है। लेकिन भारत में राष्ट्रीय अखंडता, सीमा की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित जैसे मसलों पर दलों के बीच व्यापक सहमति रही है, इसीलिए नेतृत्व बदलने पर भी नीति की बुनियाद पूरी तरह नहीं बदली।

10 अवतरण आधारित प्रश्न: गुटनिरपेक्षता

प्रश्न 10

प्र. निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

‘‘गुटनिरपेक्षता का व्यापक अर्थ है अपने को किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं करना। इसका अर्थ होता है चीज़ों को यथासंभव सैन्य दृष्टिकोण से न देखना और इसकी कभी ज़रूरत आन पड़े तब भी किसी सैन्य गुट के नज़रिए को अपनाने की जगह स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करना तथा सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना।’’ जवाहरलाल नेहरू

(क) नेहरू सैन्य गुटों से दूरी क्यों बनाना चाहते थे?

पहला कारण अवतरण में ही है। गुट में शामिल होते ही देश हर मसले को अपने गुट के सैन्य नज़रिए से देखने लगता है और स्वतंत्र रूप से स्थिति पर विचार करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।

दूसरा कारण अध्याय देता है। भारत अमरीका और सोवियत संघ की अगुवाई वाले सैन्य गठबंधनों, यानी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन और वारसा पैक्ट, से अपने को दूर रखना चाहता था। नेहरू ने के.पी.एस. मेनन को जनवरी 1947 के पत्र में लिखा कि हमें दोनों के साथ दोस्ताना संबंध रखना है, साथ ही उनके खेमे में शामिल भी नहीं होना है।

तीसरा कारण व्यावहारिक है। नेहरू की विदेश नीति के तीन उद्देश्य थे: संप्रभुता बचाना, क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखना और तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना। किसी गुट में बँधकर ये तीनों साधना मुश्किल था। गुटनिरपेक्ष रहकर भारत को दोनों खेमों से सहायता और अनुदान मिले।

(ख) क्या भारत-सोवियत मैत्री की संधि से गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ?

उल्लंघन मानने के पक्ष में: यह 20 साल की एक लंबी संधि थी और इसमें यह आश्वासन शामिल था कि हमला होने की सूरत में सोवियत संघ भारत की मदद करेगा। इतनी लंबी और सुरक्षा से जुड़ी प्रतिबद्धता को एक खेमे की ओर झुकाव कहा जा सकता है। अध्याय स्वयं यह सवाल हाशिये पर उठाता है, और 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने भी माना कि विदेश नीति में सोवियत संघ के प्रति एक झुकाव आ गया था जिसे दुरुस्त करना है।

उल्लंघन न मानने के पक्ष में: यह संधि एक खास परिस्थिति की प्रतिक्रिया थी। किसिंजर के जुलाई 1971 के गुपचुप चीन दौरे के बाद अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती दिख रही थी और पाकिस्तान को अमरीका तथा चीन दोनों की मदद मिल रही थी। इसके जवाब में की गई संधि भारत की अपनी सुरक्षा का स्वतंत्र फ़ैसला था, किसी सैन्य गुट की सदस्यता नहीं। भारत न उत्तर अटलांटिक संधि संगठन में शामिल हुआ, न वारसा पैक्ट में।

संतुलित उत्तर: संधि से गुटनिरपेक्षता की मूल भावना नहीं टूटी, क्योंकि फ़ैसला भारत का अपना था और वह किसी सैन्य गुट का सदस्य नहीं बना। हाँ, इससे व्यवहार में एक झुकाव ज़रूर बना, जिसे बाद की सरकारों ने संतुलित करने की कोशिश की।

(ग) अगर सैन्य-गुट न होते तो क्या गुटनिरपेक्षता की नीति बेमानी होती?

एक तरह से हाँ: ‘गुटनिरपेक्ष’ शब्द का अर्थ ही गुटों के होने पर टिका है। जब कोई गुट ही न हो तो उससे निरपेक्ष रहने की बात अपने आप बेमानी हो जाती है। अध्याय भी बताता है कि शीतयुद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का संदर्भ पूरी तरह बदल गया।

पर असल में नहीं: गुटनिरपेक्षता सिर्फ गुट से बाहर रहने का नाम नहीं है। अवतरण के अपने शब्दों में इसका अर्थ है चीज़ों को सैन्य दृष्टिकोण से न देखना, हर स्थिति पर स्वतंत्र रूप से विचार करना और सभी देशों के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना। ये तीनों बातें गुट हों या न हों, हमेशा काम की रहती हैं।

निष्कर्ष: गुटों के बिना इस नीति का नाम बेमानी हो सकता है, पर उसकी भावना बेमानी नहीं होती। अध्याय के आख़िरी हिस्से में यही दिखता है कि 1990 के बाद रूस का अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व घटा और सैन्य-हितों के बजाय आर्थिक-हितों का ज़ोर बढ़ा, पर राष्ट्रीय हित को सामने रखकर स्वतंत्र फ़ैसला लेने का सिद्धांत बना रहा।

लिखते समय ये तीन बातें याद रखिए

1. जहाँ किताब ने सिर्फ साल दिया है, वहाँ महीना अपनी तरफ़ से मत जोड़िए। हिंदी संस्करण में ताशकंद-समझौता 1966 में और भारत-सोवियत संधि 1971 में बताई गई है, महीने के बिना।

2. प्रश्न 5, 7, 8 और 10(ख) राय वाले प्रश्न हैं। इनमें अंक राय के नहीं, तर्क और उदाहरण के मिलते हैं। हर बिंदु के साथ किताब से एक तथ्य ज़रूर जोड़िए।

3. प्रश्न 3 का पूरा आधार हाशिये पर छपा अवतरण है और प्रश्न 10 का अवतरण प्रश्न के भीतर है। बॉक्स और हाशिये की सामग्री भी पढ़िए, वही यहाँ चार से छह अंक तय करती है।

11 पाठ के बीच के प्रश्न

अध्याय के हाशिये पर छपी टिप्पणियों में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, किताब के अपने शब्दों में, हल किया गया है। (अंग्रेज़ी संस्करण में ‘संवैधानिक सिद्धांत’ बॉक्स के नीचे एक और प्रश्न छपा है, पर हिंदी संस्करण में वह नहीं है, इसलिए यहाँ शामिल नहीं किया गया।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. चौथे अध्याय में एक बार फिर से जवाहरलाल नेहरू! क्या वे कोई सुपरमैन थे या, उनकी भूमिका महिमा-मंडित कर दी गई है?

उत्तर: दोनों में से कोई बात पूरी तरह सही नहीं। नेहरू बार-बार इसलिए आते हैं क्योंकि वे प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे, और इन दोनों रूपों में 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला। अध्याय उन्हें सुपरमैन की तरह पेश नहीं करता, उनकी चूक भी दर्ज़ करता है: नेहरू सोच रहे थे कि भारत पर चीन के आक्रमण की संभावना दूर-दूर तक नहीं है, और 1962 के युद्ध के बाद चीन के इरादों को समय रहते न भाँप सकने और सैन्य तैयारी न कर पाने को लेकर उनकी बड़ी आलोचना हुई; पहली बार उनकी सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव भी आया। यानी उनकी भूमिका बहुत बड़ी थी, पर अध्याय उसका मूल्यांकन करता है, महिमा-मंडन नहीं। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. हम लोग आज की बनिस्बत जब ज़्यादा गरीब, कमज़ोर और नए थे तो शायद दुनिया में हमारी पहचान कहीं ज़्यादा थी। है ना विचित्र बात?

उत्तर: बात विचित्र लगती है, पर इसका कारण है। नए-नए आज़ाद भारत के पास भौतिक ताकत कम थी, पर नैतिक प्रतिष्ठा बहुत थी। सी. राजगोपालाचारी ने 1950 में लिखा कि ताकत के तीनों साधनों, संपदा, धन और जन, से हीन एक देश बड़ी तेज़ी से सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है और उसकी आवाज़ को दिग्गज देशों की जमात में बड़ी इज़्ज़त के साथ सुना जाता है। यह पहचान स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शों से, नए आज़ाद एशियाई और अफ्रीकी देशों की अगुवाई से, और गुटनिरपेक्षता से आई, जिसके कारण भारत अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र रवैया अपना सका और दोनों खेमों से सहायता पा सका। (यह चर्चा का प्रश्न है; तर्क देकर आप यह भी कह सकते हैं कि आज भारत की ताकत बढ़ी है।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. हम ऐसा क्यों कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ? नेता झगड़े और सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। ज़्यादातर आम नागरिकों को इनसे कुछ लेना-देना न था।

उत्तर: ‘भारत और पाकिस्तान’ इसलिए कहते हैं क्योंकि युद्ध दो राज्यों के बीच, पूरे देश के नाम पर लड़ा जाता है और उसकी कीमत हर नागरिक चुकाता है, सिर्फ़ नेता और सैनिक नहीं। अध्याय यही दिखाता है: पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई, 1962 के बाद सीमित संसाधन रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े और तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) पर असर पड़ा; 1971 में पूरे साल भारत को 80 लाख शरणार्थियों का बोझ उठाना पड़ा। फिर भी टिप्पणी की बात में दम है: दोनों तरफ़ के आम लोगों का आपस में कोई झगड़ा नहीं होता, इसीलिए संबंध सामान्य बनाने के प्रयास, जैसे दोनों देशों के बीच रेल और बस सेवा, मायने रखते हैं। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. इस बात से तो ऐसा जान पड़ता है कि भारत, सोवियत खेमे में शामिल हो गया था। क्या सोवियत संघ के साथ इस 20-वर्षीय संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद हम कह सकते हैं कि भारत गुटनिरपेक्षता की नीति पर अमल कर रहा था?

उत्तर: हाँ, मोटे तौर पर। 1971 की शांति और मित्रता की 20-वर्षीय संधि अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देखकर, बांग्लादेश संकट के बीच की गई थी। यह एक देश के साथ एक ख़ास ख़तरे के जवाब में की गई मित्रता-संधि थी; भारत वारसा पैक्ट या किसी सैन्य गुट में शामिल नहीं हुआ, और गुटनिरपेक्षता का अर्थ सैन्य गुटों से दूरी रखते हुए सभी देशों से दोस्ताना संबंध रखना ही था। आलोचकों को इसमें सोवियत संघ की ओर झुकाव ज़रूर दिखा, और 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने इसी झुकाव को ठीक करने के लिए सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति के पालन की घोषणा की। यानी संधि से भारत सोवियत संघ के करीब आया, पर शीतयुद्ध के सैन्य गठबंधनों से बाहर ही रहा।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. बड़ा घनचक्कर है! क्या यहाँ सारा मामला परमाणु बम बनाने का नहीं है? हम ऐसा सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते।

उत्तर: यह टिप्पणी इस बात पर है कि भारत ने 1974 के मई के अपने पहले परमाणु परीक्षण को शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया। भारत का कहना था कि वह अणुशक्ति को सिर्फ़ शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल करने की नीति के प्रति वचनबद्ध है: परमाणु कार्यक्रम 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में ऊर्जा के लिए शुरू हुआ था, और नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे तथा व्यापक परमाणु निशस्त्रीकरण के पक्षधर थे। भारत ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि पर भी दस्तखत नहीं किए क्योंकि वह उसे भेदभावपूर्ण मानता था। इसलिए कार्यक्रम सिर्फ़ बम का मामला नहीं था, हालाँकि परीक्षण से यह क्षमता ज़रूर दिख गई। 1998 के मई के परीक्षणों के बाद भारत की परमाणु नीति में यह माना गया कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा, पर इनका ‘प्रयोग पहले नहीं’ करेगा।