कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 4 भारत के विदेश संबंध शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

कक्षा 12 राजनीति विज्ञान, पुस्तक 2 स्वतंत्र भारत में राजनीति-II, अध्याय 4 भारत के विदेश संबंध का तेज़ दोहराव। परीक्षा से एक रात पहले पूरा अध्याय एक बार यहाँ से पलट लीजिए।

अध्याय एक नज़र में

भारत आज़ाद हुआ तो शीतयुद्ध शुरू ही हुआ था। भारत ने किसी खेमे में शामिल न होकर गुटनिरपेक्षता की राह चुनी। फिर भी पड़ोसियों से तीन युद्ध लड़ने पड़े: 1962 (चीन), 1965 और 1971 (पाकिस्तान)। इन युद्धों ने विदेश नीति को भी बदला और देश की भीतरी राजनीति को भी। अंत में 1974 का परमाणु परीक्षण और उसके बाद की परमाणु नीति।

1 अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ

  • भारत बड़ी विकट अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आज़ाद हुआ: महायुद्ध की तबाही, पुनर्निर्माण का सवाल, एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था बनाने के प्रयास, उपनिवेशवाद की समाप्ति से नए देशों का उदय।
  • नए देशों के सामने दोहरी चुनौती: लोकतंत्र कायम करना और अपनी जनता की भलाई करना।
  • भारत की अपनी विरासत: अंग्रेजी सरकार की छोड़ी हुई अंतर्राष्ट्रीय विवादों की विरासत, बँटवारे के दबाव, और गरीबी मिटाने का काम।
  • लक्ष्य: सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान और शांति से सुरक्षा। इसकी प्रतिध्वनि नीति-निर्देशक सिद्धांतों में सुनाई देती है।
  • विकासशील देशों के पास संसाधनों का अभाव होता है, इसलिए वे सीधे-सादे लक्ष्य रखते हैं और पड़ोस में अमन-चैन तथा विकास पर ज़ोर देते हैं। अनुदान और कर्ज की निर्भरता ने दुनिया को दो खेमों में बाँट दिया।
बॉक्स याद कीजिए: अनुच्छेद 51

‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के बढ़ावे’ के लिए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत के हवाले से राज्य प्रयास करेगा:
(क) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का
(ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का
(ग) संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का
(घ) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को माध्यस्थम द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का

2 गुटनिरपेक्षता और नेहरू की भूमिका

  • भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन विश्वव्यापी उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का हिस्सा था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इंडियन नेशनल आर्मी (आई.एन.ए.) का गठन किया।
  • शीतयुद्ध के दौर में ही संयुक्त राष्ट्र संघ बना, परमाणु हथियारों का निर्माण शुरू हुआ, चीन में कम्युनिस्ट शासन कायम हुआ और अनौपनिवेशीकरण आरंभ हुआ।
  • नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे और 1946 से 1964 तक विदेश नीति पर उनका गहरा प्रभाव रहा।
  • तीन उद्देश्य: कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता बचाना, क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखना, तेज़ रफ़्तार से आर्थिक विकास करना।
  • अमरीकी खेमे के पक्षधर: डा. भीमराव अंबेडकर, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी। फिर भी नेहरू को खासी बढ़त हासिल थी।
हाशिये के दो अवतरण, जो सीधे परीक्षा में आते हैं

1. नेहरू, संविधान सभा की बहस, मार्च 1949: आज़ादी बुनियादी तौर पर विदेश संबंधों से ही बनी होती है, यही आज़ादी की कसौटी भी है। बाकी सारा कुछ तो स्थानीय स्वायत्तता है। (प्रश्नावली का प्रश्न 3 पूरा इसी पर टिका है।)

2. नेहरू का के.पी.एस. मेनन को पत्र, जनवरी 1947: हमारी नीति ताकत की राजनीति से अपने को अलग रखने और महाशक्तियों के एक खेमे के विरुद्ध दूसरे खेमे में शामिल न होने की है। हमें दोनों के साथ दोस्ताना संबंध रखना है, साथ ही उनके खेमे में शामिल भी नहीं होना है।

3. सी. राजगोपालाचारी का एडविना माउंटबेटन को पत्र, 1950: ताकत के तीनों साधनों, यानी संपदा, धन और जन, से हीन एक देश अब सभ्य जगत में एक नैतिक ताकत के रूप में पहचान हासिल कर रहा है।

4. सी. राजगोपालाचारी, एक पत्र, दिसंबर 1956: चाऊ एन लाई को लेकर उनके मन में अच्छे भाव जगे और उन्होंने चीन के शासनाध्यक्ष को भरोसे के लायक बताया।

3 दो खेमों से दूरी

  • भारत ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) और वारसा पैक्ट, दोनों से दूरी रखी और संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति-अभियानों में अपनी सेना भेजी।
  • 1956, स्वेज नहर: ब्रिटेन के मिस्र पर हमले के विरुद्ध भारत ने विश्वव्यापी विरोध की अगुवाई की।
  • 1956, हंगरी: सोवियत आक्रमण की भारत ने सार्वजनिक निंदा नहीं की। यही संतुलन की कठिनाई है।
  • नतीजा: भारत को दोनों खेमों से सहायता और अनुदान मिले। (प्रश्नावली 1(क) का आधार।)
  • पाकिस्तान अमरीकी सैन्य-गठबंधन में शामिल हुआ, जिससे 1950 के दशक में भारत-अमरीकी संबंधों में खटास आई। अमरीका भारत-सोवियत दोस्ती से भी नाराज़ था।
  • नियोजित विकास में ज़ोर आयात कम करने पर था, निर्यात सीमित रहा, इसलिए बाहरी दुनिया से भारत का आर्थिक लेन-देन सीमित रहा।

4 एफ्रो-एशियाई एकता

वर्ष घटना याद रखने की बात
मार्च 1947 एशियाई संबंध सम्मेलन आज़ादी मिलने में अभी पाँच महीने बाकी थे
1949 इंडोनेशिया के स्वतंत्रता-संग्राम के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन डच औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए
1955 बांडुंग सम्मेलन (इंडोनेशिया का शहर बांडुंग) एफ्रो-एशियाई संपर्क का चरम बिंदु; यहीं गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव पड़ी
सितंबर 1961 गुटनिरपेक्ष आंदोलन का पहला सम्मेलन, बेलग्रेड स्थापना में नेहरू की महती भूमिका
  • भारत अनौपनिवेशीकरण का प्रबल समर्थक था और उसने नस्लवाद का, खासकर दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद का, दृढ़ता से विरोध किया।
  • अध्याय की पहली तसवीर (अक्तूबर 1960, न्यूयार्क): नेहरू के साथ एनक्रूमा (घाना), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया), टीटो (युगोस्लाविया)।

5 चीन: दोस्ती से युद्ध तक

  • 1949 चीनी क्रांति। भारत कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाले पहले देशों में एक।
  • सरदार बल्लभ भाई पटेल को चढ़ाई की आशंका थी, पर नेहरू ऐसी संभावना दूर-दूर तक नहीं मानते थे।
  • बहुत दिनों तक चीन से लगती सीमा पर सेना नहीं, अर्द्ध-सैनिक बल रखवाली कर रहे थे।
  • पंचशील यानी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पाँच सिद्धांत: नेहरू और चाऊ एन लाई, 29 अप्रैल 1954।
बॉक्स: तिब्बत
  • मध्य एशिया का मशहूर पठार; ऐतिहासिक रूप से भारत-चीन विवाद का बड़ा मसला। अतीत में कभी चीन का प्रशासनिक नियंत्रण, कभी तिब्बत आज़ाद।
  • 1950: चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया; ज़्यादातर तिब्बतियों ने विरोध किया।
  • 1954: पंचशील के एक प्रावधान में एक-दूसरे की क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान की बात थी। चीन ने इसका अर्थ यह लगाया कि भारत तिब्बत पर चीनी दावेदारी स्वीकार कर रहा है।
  • 1956: चाऊ एन लाई के आधिकारिक दौरे के साथ दलाई लामा भी भारत पहुँचे और नेहरू को बिगड़ती स्थिति बताई।
  • 1958: चीनी आधिपत्य के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह, जिसे चीन की सेनाओं ने दबा दिया।
  • 1959: दलाई लामा ने सीमा पारकर भारत से शरण माँगी, भारत ने दे दी। चीन ने कड़ा विरोध किया।
  • शरणार्थी बस्तियाँ दिल्ली में; सबसे बड़ी संभवतः धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में, जो दलाई लामा का निवास-स्थान भी है।
  • तिब्बत की आज़ादी का समर्थन करने वाले दल: सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ।
  • चीन ने ‘स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र’ बनाया है और इस इलाके को वह चीन का अभिन्न अंग मानता है। तिब्बती जनता चीन के दोनों दावों को नकारती है, कि तिब्बत उसका अभिन्न अंग है और कि तिब्बत को स्वायत्तता दी गई है। ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में चीनी बाशिंदों को तिब्बत लाकर वहाँ बसाने की चीन की नीति का भी तिब्बती जनता ने विरोध किया। वे मानते हैं कि तिब्बत की पारंपरिक संस्कृति और धर्म को नष्ट करके चीन वहाँ साम्यवाद फैलाना चाहता है।
कार्टून और चित्र भी पढ़िए

अध्याय के एक कार्टून का साभार आर.के. लक्ष्मण को दिया गया है और उसके साथ की पंक्ति बताती है कि चीन के साथ 1960 में सीमा विवाद उठा और नेहरू तथा माओत्से तुंग के बीच बातचीत व्यर्थ साबित हुई। दलाई लामा के भारत आने वाले चित्र का साभार होमाई व्यारावाला को है, और अध्याय के आरंभ वाली गुटनिरपेक्ष देशों की तसवीर का साभार नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एवं लाइब्रेरी को। साथ ही अध्याय अपने नक्शे के नीचे स्वयं छापता है कि वह किसी पैमाने के हिसाब से बना भारत का मानचित्र नहीं है और उसमें दिखाई गई सीमा रेखा को प्रामाणिक न माना जाए।

6 चीन का आक्रमण, 1962

  • खटास के दो कारण: (1) 1950 में तिब्बत पर कब्ज़ा, जिससे दोनों देशों के बीच का ऐतिहासिक मध्यवर्ती राज्य खत्म हो गया; (2) 1959 में दलाई लामा को शरण, जिस पर चीन ने आरोप लगाया कि भारत चीन-विरोधी गतिविधियों को हवा दे रहा है।
  • सीमा-विवाद: भारत का दावा कि मामला अंग्रेजी-शासन के समय सुलझ चुका है; चीन का कहना कि औपनिवेशिक फ़ैसला नहीं माना जा सकता।
  • दो विवादित इलाके: अक्साई-चीन (जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से में) और अरुणाचल प्रदेश, जिसे उस समय नेफा या उत्तर-पूर्वी सीमांत कहा जाता था।
  • 1957 से 1959: चीन ने अक्साई-चीन पर कब्ज़ा किया और रणनीतिक बढ़त के लिए वहाँ एक सड़क बनाई।
  • अक्तूबर 1962: जब पूरे विश्व का ध्यान क्यूबा मिसाइल संकट पर था, चीन ने दोनों विवादित क्षेत्रों पर तेज़ और व्यापक हमला किया।
  • पहला हमला एक हफ़्ते चला, अरुणाचल प्रदेश के कुछ महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्ज़ा। अगला दौर नवंबर में: लद्दाख के पश्चिमी मोर्चे पर भारत ने रोका, पर पूर्व में चीनी सेना असम के मैदानी हिस्से के प्रवेशद्वार तक पहुँच गई।
  • अंत में चीन ने एकतरफा युद्धविराम घोषित किया और सेनाएँ हमले से पहले वाले मुकाम पर लौट गईं।
1962 के परिणाम, एक साथ
  • भारत की छवि को देश और विदेश दोनों जगह धक्का।
  • अमरीका और ब्रिटेन से सैन्य मदद की गुहार; सोवियत संघ तटस्थ रहा।
  • राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट, पर राष्ट्र-भावना बलवती हुई।
  • कुछ प्रमुख सैन्य-कमांडरों का इस्तीफा या अवकाश; रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णमेनन को मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा।
  • नेहरू की छवि धूमिल; पहली बार अविश्वास प्रस्ताव आया और लोकसभा में बहस हुई।
  • कांग्रेस कुछ महत्त्वपूर्ण उप-चुनाव हारी। देश का राजनीतिक मानस बदलने लगा।
  • भाकपा 1964 में टूटी; चीन-पक्षधर खेमे ने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) बनाई। कई नेता चीन का पक्ष लेने के आरोप में गिरफ़्तार हुए।
  • पूर्वोत्तर: नगालैंड को प्रांत का दर्जा; मणिपुर और त्रिपुरा केंद्र-शासित प्रदेश रहते हुए भी अपनी विधानसभा के निर्वाचन का अधिकार पा गए।
दो बॉक्स जो अकसर छूट जाते हैं

वी.के. कृष्णमेनन (1897-1974): राजनयिक एवं मंत्री; 1934-1947 के बीच इंग्लैंड की लेबर पार्टी में सक्रिय; इंग्लैंड में भारतीय उच्चायुक्त और बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के मुखिया; राज्यसभा फिर लोकसभा सांसद; 1956 से संघ केबिनेट के सदस्य; 1957 से रक्षा मंत्री; 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस्तीफा।

सिने-संसार, हकीकत: पृष्ठभूमि 1962 का चीनी आक्रमण। लद्दाख में भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी घिर जाती है; कप्तान बहादुर सिंह स्थानीय घुमंतू कबीले की लड़की कम्मो की मदद से उसे निकालने की कोशिश करता है और दोनों शहीद हो जाते हैं। फिल्म में डाक्युमेंटरी फुटेज का काफ़ी इस्तेमाल है और यह युद्ध आधारित फिल्मों की विधा में अहम स्थान रखती है। वर्ष 1964, निर्देशक चेतन आनंद; अभिनय: धर्मेंद्र, प्रिया राजवंश, बलराज साहनी, जयंत, सुधीर, संजय खान, विजय आनंद।

कुछ आगे की, 1962 के बाद भारत-चीन संबंध: संबंध सामान्य होने में करीब दस साल लगे; 1976 में पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल; 1979 में अटल बिहारी वाजपेयी (तब विदेश मंत्री) शीर्ष नेता के तौर पर पहली बार चीन गए; बाद में नेहरू के बाद राजीव गाँधी बतौर प्रधानमंत्री गए। इसके बाद से ज़ोर व्यापारिक मसलों पर रहा है।

7 पाकिस्तान: युद्ध और शांति

वर्ष घटना मुख्य बात
1947 जम्मू-कश्मीर में छाया-युद्ध पूर्णव्यापी युद्ध नहीं बना; मसला संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले (विस्तार सातवें अध्याय में)
सहयोग भी बँटवारे में अपहृत महिलाओं की वापसी दोनों सरकारों ने मिलकर प्रयास किया
1960 सिंधु नदी जल संधि: नेहरू और जनरल अयूब खान विश्व बैंक की मध्यस्थता; नरमी-गरमी के बावजूद अमल ठीक-ठाक होता रहा
अप्रैल 1965 गुजरात के कच्छ के रन में पाकिस्तानी हमला प्रधानमंत्री तब लालबहादुर शास्त्री
अगस्त-सितंबर 1965 जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर हमला पाकिस्तान की उम्मीद थी कि जनता समर्थन देगी, ऐसा नहीं हुआ
1965 शास्त्री का पंजाब की सीमा से जवाबी हमला भारतीय सेना लाहौर के नजदीक तक पहुँची
1966 ताशकंद-समझौता: शास्त्री और अयूब खान सोवियत संघ मध्यस्थ; युद्ध से भारत की कठिन आर्थिक स्थिति पर और बोझ पड़ा

8 बांग्लादेश युद्ध, 1971

  • 1970: पाकिस्तान के पहले आम चुनाव में खंडित जनादेश। जुल्फिकार अली भुट्टो की पार्टी पश्चिमी पाकिस्तान में, मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग पूर्वी पाकिस्तान में विजयी। बंगाली जनता का वोट दोयम दर्जे के बरताव के विरोध में था।
  • शासक न जनादेश स्वीकार कर पाए, न अवामी लीग की परिसंघ बनाने की माँग।
  • 1971: पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीब को गिरफ़्तार किया और पूर्वी पाकिस्तान पर जुल्म ढाए। जनता ने मुक्ति संग्राम छेड़ दिया।
  • पूरे 1971 में भारत पर 80 लाख शरणार्थियों का बोझ। भारत ने नैतिक समर्थन और भौतिक सहायता दी; पाकिस्तान ने भारत पर उसे तोड़ने की साजिश का आरोप लगाया।
  • पाकिस्तान को अमरीका और चीन की मदद। हेनरी किसिंजर (राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सलाहकार) ने जुलाई 1971 में पाकिस्तान होते हुए गुपचुप चीन का दौरा किया।
  • अमरीका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बनती देख भारत ने 1971 में सोवियत संघ के साथ शांति और मित्रता की 20-वर्षीय संधि की। आश्वासन: हमले की सूरत में सोवियत संघ मदद करेगा।
  • दिसंबर 1971: पूर्णव्यापी युद्ध। पाकिस्तानी विमानों ने पंजाब और राजस्थान पर हमले किए, सेना ने जम्मू-कश्मीर में मोर्चा खोला। भारत ने वायुसेना, नौसेना और थलसेना से दोनों मोर्चों पर कार्रवाई की।
  • दस दिनों में ढाका तीन तरफ से घिरा; 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना का आत्म-समर्पण। बांग्लादेश स्वतंत्र; भारत ने एकतरफा युद्ध-विराम घोषित किया।
  • 3 जुलाई 1972: शिमला-समझौता, इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच।
  • जीत के बाद इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता को चार चाँद लगे। वे 1971 के लोकसभा चुनाव पहले ही जीत चुकी थीं; युद्ध के बाद अधिकतर राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस बड़े बहुमत से जीती।
बॉक्स: करगिल संघर्ष

1999 के शुरुआती महीनों में नियंत्रण सीमा रेखा के कई ठिकानों, द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक, पर अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों ने कब्ज़ा कर लिया। पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत भाँपकर भारतीय सेना हरकत में आई। लड़ाई मई-जून 1999 में जारी रही और 26 जुलाई 1999 तक भारत अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था। विश्व का ध्यान इसलिए गया कि ठीक एक साल पहले दोनों देश परमाणु क्षमता का प्रदर्शन कर चुके थे। लड़ाई करगिल तक सीमित रही। पाकिस्तान में विवाद मचा कि सेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री को अँधेरे में रखा, और लड़ाई के तुरंत बाद जनरल परवेज मुशर्रफ की अगुवाई में सेना ने हुकूमत पर नियंत्रण कर लिया।

9 युद्धों का नियोजन पर असर

  • पड़ोसियों से संघर्ष के कारण पंचवर्षीय योजना पटरी से उतर गई।
  • 1962 के बाद सीमित संसाधन रक्षा क्षेत्र में लगाने पड़े; सैन्य ढाँचे का आधुनिकीकरण करना पड़ा।
  • 1962: रक्षा-उत्पाद विभाग की स्थापना। 1965: रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना।
  • तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) पर असर पड़ा, फिर लगातार तीन एक-वर्षीय योजनाएँ, और चौथी पंचवर्षीय योजना 1969 में ही शुरू हो सकी।
  • युद्ध के बाद भारत का रक्षा-व्यय बहुत बढ़ गया।

10 भारत की परमाणु नीति

  • मई 1974: भारत का पहला परमाणु परीक्षण, जिसे भारत ने शांतिपूर्ण परीक्षण करार दिया।
  • परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हुई; यह नेहरू की औद्योगीकरण नीति का महत्त्वपूर्ण घटक था।
  • नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ़ थे और उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक परमाणु निशस्त्रीकरण के लिए ज़ोर दिया।
  • अक्तूबर 1964: चीन ने परमाणु परीक्षण किया।
  • पाँच अणुशक्ति-संपन्न देश, जो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य भी थे: संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन। इन्होंने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि दूसरों पर थोपनी चाही।
  • भारत ने इसे भेदभावपूर्ण माना और दस्तखत से इनकार किया।
  • घरेलू संदर्भ: 1973 का अरब-इजरायल युद्ध, तेल के दामों में भारी वृद्धि, भारत में मुद्रास्फीति, कई आंदोलन और देशव्यापी रेल-हड़ताल।
  • 1995: परमाणु अप्रसार संधि के अनियतकालीन विस्तार का विरोध; सीटीबीटी पर हस्ताक्षर से इनकार।
  • मई 1998: भारत के परीक्षण, तुरंत बाद पाकिस्तान ने भी किए। दोनों पर प्रतिबंध लगे जो बाद में हटा लिए गए।
  • नीति का सार: रक्षा के लिए परमाणु हथियार रखेगा पर ‘प्रयोग पहले नहीं’ करेगा; वैश्विक स्तर पर लागू और भेदभाव हीन परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति वचनबद्ध।

11 सर्व-सहमति और बदलते समीकरण

  • छोटे-मोटे मतभेद के बावजूद राष्ट्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित पर दलों में व्यापक सहमति है।
  • इसीलिए 1962-1971 के तीन युद्धों में और बाद में भी विदेश नीति की भूमिका पार्टी की राजनीति में बड़ी सीमित रही।
  • 1977: जनता पार्टी की सरकार ने ‘सच्ची गुटनिरपेक्ष नीति’ की घोषणा की, यानी सोवियत झुकाव खत्म किया जाएगा।
  • इसके बाद की सभी सरकारों ने चीन से बेहतर और अमरीका से नजदीकी रिश्तों की पहल की।
  • भारत की विदेश नीति दो संदर्भों में देखी जाती है: पाकिस्तान पर रुख और भारत-अमरीका संबंध। 1990 के बाद अमरीका-समर्थक नीति की आलोचना हुई है।
  • रूस महत्त्वपूर्ण मित्र बना हुआ है, पर 1990 के बाद उसका अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व कम हुआ। अब सैन्य-हितों के बजाय आर्थिक-हितों का ज़ोर ज़्यादा है।
  • भारत-पाक: कश्मीर मुख्य मसला बना हुआ है, पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान, नागरिकों की आवाजाही और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिला। रेल और बस सेवा हाल के समय की सबसे बड़ी उपलब्धि है। फिर भी 1999 में युद्ध की स्थिति बनी; प्रयास जारी हैं।

12 CBSE 2026-27 संदर्भ सामग्री (मूल्यांकन नहीं)

स्थिति

CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 ने इस अध्याय में दो उप-विषय अतिरिक्त संदर्भ सामग्री के रूप में जोड़े हैं। पाठ्यक्रम के परिशिष्ट के अनुसार यह सामग्री कक्षा में पढ़ाने-समझाने के लिए है और बोर्ड परीक्षा में इसका मूल्यांकन नहीं होगा। यह NCERT पुस्तक में नहीं है।

  • भारत और यूरोपीय संघ: लोकतंत्र, कानून का शासन और बहुपक्षवाद जैसे साझा मूल्य; परंपरागत व्यापार मशीनरी और उपकरण, रसायन, मूल धातुएँ, खनिज उत्पाद, वस्त्र और परिवहन उपकरण में; यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में; अंतरिक्ष अनुसंधान, स्वच्छ ऊर्जा, कनेक्टिविटी, कुशल कामगारों की आवाजाही और डिजिटल नवाचार में सहयोग; व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद तथा मुक्त व्यापार समझौते की वार्ताओं में प्रगति; नई सुरक्षा और रक्षा साझेदारी (समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, साइबर रक्षा, आतंकवाद-विरोध)।
  • परमाणु कार्यक्रम (अद्यतन): नीति सदा शांति-उन्मुख, जिसकी छाप ‘प्रयोग पहले नहीं’ की नीति में; समकालीन क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए वर्तमान सरकार ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सुरक्षा के अनुरूप इस नीति की समीक्षा कर इसे बदला जा सकता है; भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) की सदस्यता के लिए प्रतिबद्ध है और CTBT तथा NPT जैसी पक्षपातपूर्ण और अन्यायपूर्ण संधियों का विरोध करता है।
आख़िरी पंक्ति में याद रखने वाली संख्याएँ

तीन युद्ध (1962, 1965, 1971) · नेहरू के तीन उद्देश्य · पंचशील के पाँच सिद्धांत · अनुच्छेद 51 की चार उपधाराएँ · पाँच अणुशक्ति-संपन्न देश · पाँच महीने (एशियाई संबंध सम्मेलन आज़ादी से पहले) · एक हफ़्ता (1962 का पहला हमला) · दस दिन (ढाका की घेराबंदी) · 80 लाख शरणार्थी · 90,000 पाकिस्तानी सैनिक · 20-वर्षीय संधि · करीब दस साल (भारत-चीन संबंध सामान्य होने में) · तीन एक-वर्षीय योजनाएँ · 1946 से 1964 (नेहरू का कार्यकाल)

दो चेतावनियाँ

1. हिंदी किताब कुछ जगह सिर्फ साल देती है, महीना नहीं। ताशकंद-समझौता 1966, भारत-सोवियत संधि 1971, रक्षा-उत्पाद विभाग 1962 और रक्षा आपूर्ति विभाग 1965। अपनी तरफ़ से महीना मत जोड़िए।

2. इस अध्याय की प्रश्नावली में कोई भी प्रश्न ऐसा नहीं है जो हटाए गए हिस्सों से आता हो। दसों प्रश्नों का आधार मौजूदा पाठ में है। पर प्रश्न 3 का आधार हाशिये का अवतरण है, इसलिए बॉक्स और हाशिया छोड़कर पढ़ना यहाँ महँगा पड़ेगा।