कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 5 कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II के अध्याय 5 कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना की प्रश्नावली के सभी 10 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अंत में ‘खुद करें-खुद सीखें’ गतिविधि और हाशिये की टिप्पणियों में पूछे गए प्रश्न भी हल किए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।

इस अध्याय की प्रश्नावली दोनों संस्करणों में एक जैसी है

इस किताब के कई अध्यायों में हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करण की प्रश्नावली अलग-अलग छपी है और इसी वजह से सही उत्तर का अक्षर तक बदल जाता है। इस अध्याय में ऐसा नहीं है। दोनों संस्करणों में 10 ही प्रश्न हैं, प्रश्न 4 में तीनों विकल्प एक ही क्रम में हैं, प्रश्न 6 में पाँचों विकल्प एक ही क्रम में हैं और प्रश्न 2 की सुमेलन-तालिका भी एक जैसी है। यह बात प्रश्न-दर-प्रश्न मिलाकर जाँची गई है, मान नहीं ली गई है। नीचे के सभी उत्तर हिंदी संस्करण की अपनी संख्या, अपने अक्षरों और अपने शब्दों के अनुसार दिए गए हैं।

दो छोटे फ़र्क़ ज़रूर हैं, और उनका ध्यान रखिए: प्रश्न 9 हिंदी में ‘किन मसलों को लेकर’ पूछता है यानी एक से ज़्यादा मुद्दे बताने हैं, जबकि अंग्रेज़ी संस्करण में यह प्रश्न एकवचन में, एक ही बड़े मसले के बारे में पूछा गया है। और प्रश्न 10 का अनुच्छेद हिंदी में थोड़ा छोटा छपा है। नीचे हिंदी वाला ही अनुच्छेद लिया गया है।

1 1967 के चुनावों के बारे में कौन-कौन से बयान सही हैं

प्रश्न 1

प्र. 1967 के चुनावों के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन से बयान सही हैं:
(क) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव वह हार गई।
(ख) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव भी हारी और विधानसभा के भी।
(ग) कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, लेकिन उसने दूसरी पार्टियों के समर्थन से एक गठबंधन सरकार बनाई।
(घ) कांग्रेस केंद्र में सत्तासीन रही और उसका बहुमत भी बढ़ा।

उत्तर: (क) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव वह हार गई। केवल यही बयान सही है।

क्यों: किताब कहती है कि कांग्रेस को जैसे-तैसे लोकसभा में बहुमत तो मिल गया था, लेकिन उसे प्राप्त मतों के प्रतिशत तथा सीटों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। दूसरी तरफ़ राज्यों में उसे सात राज्यों में बहुमत नहीं मिला और दो अन्य राज्यों में दलबदल के कारण वह सरकार नहीं बना सकी, यानी कुल नौ राज्यों में उसके हाथ से सत्ता निकल गई। यही स्थिति विकल्प (क) में लिखी है।

बाकी विकल्प क्यों ग़लत हैं: (ख) ग़लत है, क्योंकि लोकसभा का चुनाव कांग्रेस हारी नहीं थी। (ग) ग़लत है, क्योंकि लोकसभा में उसका अपना बहुमत था, उसे गठबंधन सरकार नहीं बनानी पड़ी। (घ) ग़लत है, क्योंकि बहुमत बढ़ा नहीं बल्कि घटा था; किताब के शब्दों में अब से पहले कांग्रेस को कभी न तो इतने कम वोट मिले थे और न ही इतनी कम सीटें।

2 निम्नलिखित का मेल करें

प्रश्न 2

प्र. निम्नलिखित का मेल करें:

सूची I सूची II
(क) सिंडिकेट (i) कोई निर्वाचित जन-प्रतिनिधि जिस पार्टी के टिकट से जीता हो, उस पार्टी को छोड़कर अगर दूसरे दल में चला जाए।
(ख) दल-बदल (ii) लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला एक मनभावन मुहावरा।
(ग) नारा (iii) कांग्रेस और इसकी नीतियों के खिलाफ़ अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों का एकजुट होना।
(घ) गैर-कांग्रेसवाद (iv) कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह।

उत्तर: (क)-(iv), (ख)-(i), (ग)-(ii), (घ)-(iii)

क्यों: सिंडिकेट की किताब की अपनी परिभाषा ही यह है कि यह कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह था, जिसका पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था, इसलिए (iv)। दल-बदल की किताब की परिभाषा है कि कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव जीते और फिर उस दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाए, इसलिए (i)। नारा वही मनभावन मुहावरा है जो लोगों का ध्यान खींचे, जैसे ‘जय जवान-जय किसान’ या ‘गरीबी हटाओ’, इसलिए (ii)। और गैर-कांग्रेसवाद वही रणनीति है जिसमें कार्यक्रम तथा विचारधारा के धरातल पर एक-दूसरे से एकदम अलग दल भी कांग्रेस के खिलाफ़ एकजुट हुए, इसलिए (iii)।

3 इन नारों से किन नेताओं का संबंध है

प्रश्न 3

प्र. निम्नलिखित नारे से किन नेताओं का संबंध है:
(क) जय जवान, जय किसान    (ख) इंदिरा हटाओ!    (ग) गरीबी हटाओ!

उत्तर:

(क) ‘जय जवान, जय किसान’: लालबहादुर शास्त्री। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश एक साथ दो चुनौतियाँ झेल रहा था, 1965 का पाकिस्तान से युद्ध और मानसून की असफलता से पैदा हुआ खाद्यान्न संकट। किताब कहती है कि इस नारे से इन दोनों चुनौतियों से निपटने के उनके दृढ़ संकल्प का पता चलता है।

(ख) ‘इंदिरा हटाओ!’: 1971 के विपक्षी ‘ग्रैंड अलायंस’ के नेता। इसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय क्रांतिदल शामिल थे। किताब के अनुसार इंदिरा गाँधी ने देश भर में घूम-घूम कर यही कहा कि विपक्षी गठबंधन के पास बस एक ही कार्यक्रम है: इंदिरा हटाओ।

(ग) ‘गरीबी हटाओ!’: इंदिरा गाँधी। यह ‘इंदिरा हटाओ’ के जवाब में रखा गया उनका सकारात्मक कार्यक्रम था, जिसके सहारे उन्होंने भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला तथा बेरोज़गार नौजवानों के बीच अपने समर्थन का आधार तैयार करने की कोशिश की।

4 1971 के ‘ग्रैंड अलायंस’ के बारे में कौन-सा कथन ठीक है

प्रश्न 4

प्र. 1971 के ‘ग्रैंड अलायंस’ के बारे में कौन-सा कथन ठीक है?
(क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।
(ख) इसके पास एक स्पष्ट राजनीतिक तथा विचारधारात्मक कार्यक्रम था।
(ग) इसका गठन सभी गैर-कांग्रेसी दलों ने एकजुट होकर किया था।

उत्तर: (क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।

क्यों: किताब का अपना वाक्य है कि सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने एक चुनावी गठबंधन बना लिया था और इसे ‘ग्रैंड अलायंस’ कहा गया। साम्यवादी दलों में से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तो उल्टे शासक दल के साथ थी, क्योंकि किताब के अनुसार शासक दल ने सीपीआई के साथ गठजोड़ किया था।

बाकी विकल्प क्यों ग़लत हैं: (ख) ग़लत है, क्योंकि किताब साफ़ कहती है कि ‘ग्रैंड अलायंस’ के पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था; कार्यक्रम और अजेंडा तो नयी कांग्रेस के पास था। (ग) ग़लत है, क्योंकि इसमें सभी गैर-कांग्रेसी दल नहीं थे; साम्यवादी दल इससे बाहर थे।

5 कोई दल अपने अंदरूनी मतभेद कैसे सुलझाए

प्रश्न 5

प्र. किसी राजनीतिक दल को अपने अंदरूनी मतभेदों का समाधान किस तरह करना चाहिए? यहाँ कुछ समाधान दिए गए हैं। प्रत्येक पर विचार कीजिए और उसके सामने उसके फ़ायदों और घाटों को लिखिए।
(क) पार्टी के अध्यक्ष द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना।
(ख) पार्टी के भीतर बहुमत की राय पर अमल करना।
(ग) हरेक मामले पर गुप्त मतदान कराना।
(घ) पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से सलाह करना।

उत्तर: यह राय वाला प्रश्न है, पर उत्तर इसी अध्याय के उदाहरणों से जोड़कर लिखिए। नीचे हर तरीके के फ़ायदे और घाटे दिए हैं।

तरीका फ़ायदे घाटे
(क) अध्यक्ष के बताए मार्ग पर चलना फ़ैसला तुरंत होता है, पार्टी एक आवाज़ में बोलती है और बाहर कमज़ोर नहीं दिखती। यह अलोकतांत्रिक है और असहमति की कोई जगह नहीं छोड़ता। 1969 में अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने ‘व्हिप’ जारी किया कि सभी संजीव रेड्डी को वोट डालें, पर इससे मतभेद सुलझा नहीं, पार्टी ही टूट गई।
(ख) बहुमत की राय पर अमल लोकतांत्रिक है, हर सदस्य की गिनती होती है और फ़ैसले को व्यापक स्वीकृति मिलती है। अल्पमत की बात लगातार दबती रहे तो नाराज़ गुट पार्टी छोड़ सकता है। साथ ही बहुमत हमेशा सही ही हो, यह ज़रूरी नहीं।
(ग) हरेक मामले पर गुप्त मतदान सदस्य दबाव में आए बिना अपनी असली राय दे पाता है। 1966 में इसी तरीके से नेतृत्व का सवाल शांतिपूर्ण ढंग से हल हुआ और इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता माना गया। हर छोटे मामले पर मतदान कराना धीमा और खर्चीला है। गुप्त होने के कारण कोई अपनी राय के लिए जवाबदेह नहीं होता, और यह पार्टी के भीतर स्थायी गुटबाज़ी को बढ़ावा दे सकता है।
(घ) वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से सलाह अनुभव का लाभ मिलता है और विवाद बिना शोर के सुलझ जाता है। नेहरू की मृत्यु के बाद कामराज ने यही रास्ता अपनाया और शास्त्री निर्विरोध चुन लिए गए। यही तरीका आगे चलकर ‘सिंडिकेट’ जैसा अनौपचारिक समूह खड़ा कर सकता है, जो पार्टी के संगठन पर कब्ज़ा जमा ले और नए नेतृत्व से टकराए।

निष्कर्ष के तौर पर लिखने लायक बात: कोई एक तरीका अकेले काफ़ी नहीं है। सबसे सही रास्ता यह है कि रोज़मर्रा के मामलों में वरिष्ठ नेताओं की सलाह और बहुमत की राय से काम चले, और नेतृत्व जैसे बड़े सवालों पर ही गुप्त मतदान का सहारा लिया जाए, ताकि फ़ैसला भी हो और पार्टी की एकता भी बनी रहे।

6 1967 में कांग्रेस की हार के कारण कौन-से थे

प्रश्न 6

प्र. निम्नलिखित में से किसे/किन्हें 1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार के कारण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए:
(क) कांग्रेस पार्टी में करिश्माई नेता का अभाव।
(ख) कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट।
(ग) क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक समूहों की लामबंदी को बढ़ाना।
(घ) गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एकजुटता।
(ङ) कांग्रेस पार्टी के अंदर मतभेद।

उत्तर: (क), (ग), (घ) और (ङ) स्वीकार किए जा सकते हैं। (ख) स्वीकार नहीं किया जा सकता।

(क) करिश्माई नेता का अभाव: स्वीकार्य। किताब कहती है कि कांग्रेस पहली बार नेहरू के बिना मतदाताओं का सामना कर रही थी। दो प्रधानमंत्रियों का जल्दी-जल्दी देहावसान हो चुका था, नए प्रधानमंत्री को पद सँभाले एक साल भी नहीं हुआ था और उन्हें राजनीति के लिहाज़ से कम अनुभवी माना जा रहा था।

(ख) पार्टी के भीतर टूट: स्वीकार्य नहीं। यह समय के हिसाब से ग़लत है। कांग्रेस की औपचारिक टूट 1969 में हुई, यानी इन चुनावों के दो साल बाद। जो चीज़ बाद में हुई, वह पहले हुई हार का कारण नहीं हो सकती।

(ग) क्षेत्रीय, जातीय और सांप्रदायिक समूहों की लामबंदी: स्वीकार्य। इसी दौर में मद्रास में डीएमके ने हिंदी-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करके पूर्ण बहुमत पाया, मार्क्सवादी-लेनिनवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने किसानों के बीच विरोध संगठित किया, और आज़ादी के बाद के सबसे गंभीर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए।

(घ) गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एकजुटता: स्वीकार्य। यही ‘गैर-कांग्रेसवाद’ है। विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उनके वोट बँट जाने से ही कांग्रेस सत्तासीन है, इसलिए उन्होंने कुछ राज्यों में कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाया और अन्य राज्यों में सीटों का चुनावी तालमेल किया।

(ङ) पार्टी के अंदर मतभेद: स्वीकार्य। औपचारिक टूट भले 1969 में हुई, पर मतभेद पहले से थे। किताब के अनुसार विपक्षी दलों को लगा कि इंदिरा गाँधी की अनुभवहीनता और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक से उन्हें कांग्रेस को हटाने का अवसर हाथ लगा है।

इनके अलावा: हार की सबसे बड़ी वजह आर्थिक संकट था। मानसून की असफलता, सूखा, खाद्य संकट, कीमतों में तेज़ी, बेरोजगारी और रुपये के अवमूल्यन ने लोगों को सरकार के खिलाफ़ खड़ा कर दिया था।

7 1970 के दशक में इंदिरा गाँधी की सरकार क्यों लोकप्रिय हुई

प्रश्न 7

प्र. 1970 के दशक में इंदिरा गाँधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई थी?

उत्तर:

1. गरीबों के हक में दिखने वाली नीतियाँ। उन्होंने सरकार की नीतियों को वामपंथी रंग दिया। मई 1967 में कांग्रेस कार्यसमिति ने उनके प्रभाव से दस-सूत्री कार्यक्रम अपनाया, जिसमें बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण, आम बीमा का राष्ट्रीयकरण, शहरी संपदा और आय का परिसीमन, खाद्यान्न का सरकारी वितरण, भूमि सुधार तथा ग्रामीण गरीबों को आवासीय भूखंड देने के प्रावधान थे।

2. दो बड़ी और जनप्रिय घोषणाएँ। चौदह अग्रणी बैंकों का राष्ट्रीयकरण और भूतपूर्व राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकार यानी ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति। इन पर उन्हें जन समर्थन खूब मिला।

3. भूमि सुधार। उन्होंने भूमि सुधार के मौजूदा कानूनों के क्रियान्वयन के लिए ज़बरदस्त अभियान चलाया और भू-परिसीमन के कुछ और कानून भी बनवाए।

4. ‘गरीबी हटाओ’ का सकारात्मक कार्यक्रम। विपक्ष के पास सिर्फ़ ‘इंदिरा हटाओ’ था, उनके पास एक मुद्दा, एक अजेंडा और कार्यक्रम था। इस नारे से उन्होंने भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला तथा बेरोज़गार नौजवानों के बीच अपना आधार बनाया।

5. 1971 की चुनावी जीत। कांग्रेस (आर) और सीपीआई के गठबंधन को 375 सीटें और 48.4 प्रतिशत वोट मिले, जो पिछले चार आम चुनावों में कांग्रेस को कभी नहीं मिले थे।

6. बांग्लादेश युद्ध में जीत। 1971 के चुनावों के तुरंत बाद पूर्वी पाकिस्तान का संकट और भारत-पाक युद्ध हुआ, जिससे बांग्लादेश बना। इससे उनकी लोकप्रियता में चार चाँद लग गए और विपक्ष के नेताओं तक ने उनके राज्यकौशल की प्रशंसा की। उन्हें गरीबों और वंचितों के रक्षक तथा एक मज़बूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में देखा गया।

7. 1972 की दूसरी जीत। 1972 के राज्य विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को व्यापक सफलता मिली और कांग्रेस लगभग सभी राज्यों में सत्ता में आ गई।

8 ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और उसकी भूमिका

प्रश्न 8

प्र. 1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में ‘सिंडिकेट’ का क्या अर्थ है? सिंडिकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई?

अर्थ: कांग्रेसी नेताओं के एक समूह को अनौपचारिक तौर पर ‘सिंडिकेट’ के नाम से इंगित किया जाता था। इस समूह के नेताओं का पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था।

कौन-कौन इसमें था: इसके अगुवा मद्रास प्रांत के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और फिर कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके के. कामराज थे। इसमें प्रांतों के ताकतवर नेता शामिल थे: बंबई सिटी (अब मुंबई) के एस.के. पाटिल, मैसूर (अब कर्नाटक) के एस. निजलिंगप्पा, आंध्र प्रदेश के एन. संजीव रेड्डी और पश्चिम बंगाल के अतुल्य घोष।

भूमिका:

1. प्रधानमंत्री बनवाने में: लालबहादुर शास्त्री और उसके बाद इंदिरा गाँधी, दोनों ही सिंडिकेट की सहायता से प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ हुए। सिंडिकेट ने ही इंदिरा गाँधी का कांग्रेस संसदीय दल के नेता के रूप में चुना जाना सुनिश्चित किया था।

2. नीति-निर्माण में: इंदिरा गाँधी की पहली मंत्रिपरिषद् में इस समूह की निर्णायक भूमिका रही और इसने नीतियों के निर्माण तथा क्रियान्वयन में भी अहम भूमिका निभाई।

3. टकराव में: सिंडिकेट को उम्मीद थी कि इंदिरा गाँधी उसकी सलाहों पर अमल करेंगी, पर उन्होंने अपने सलाहकारों में पार्टी से बाहर के लोग रखे और धीरे-धीरे तथा बड़ी सावधानी से सिंडिकेट को हाशिए पर ला खड़ा किया। 1969 में सिंडिकेट ने उनकी असहमति के बावजूद एन. संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का आधिकारिक उम्मीदवार बनवाया, और यहीं से टूट तय हो गई।

4. अंत: कांग्रेस के विभाजित होने के बाद सिंडिकेट के नेता और उनके प्रति निष्ठावान कांग्रेसी कांग्रेस (ओ) में ही रहे। चूँकि लोकप्रियता की कसौटी पर इंदिरा गाँधी की कांग्रेस (आर) सफल रही, इसलिए भारतीय राजनीति के ये बड़े और ताकतवर नेता 1971 के बाद प्रभावहीन हो गए।

9 1969 में कांग्रेस किन मसलों को लेकर टूटी

प्रश्न 9

प्र. कांग्रेस पार्टी किन मसलों को लेकर 1969 में टूट की शिकार हुई?

ध्यान दीजिए: हिंदी संस्करण ‘किन मसलों’ पूछता है, यानी एक से ज़्यादा मुद्दे गिनाने हैं। अंग्रेज़ी संस्करण में यही प्रश्न एकवचन में, यानी एक ही बड़े मसले के बारे में है। हिंदी माध्यम के विद्यार्थी को सारे मसले लिखने हैं, सिर्फ़ राष्ट्रपति चुनाव नहीं।

उत्तर:

1. सत्ता और नियंत्रण का मसला (जड़)। इंदिरा गाँधी को असली चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि खुद अपनी पार्टी के ‘सिंडिकेट’ से मिली। सिंडिकेट चाहता था कि वे उसकी सलाहों पर चलें, जबकि उन्होंने सरकार और पार्टी के भीतर खुद का मुकाम बनाना शुरू कर दिया था।

2. विचारधारा का मसला। उन्होंने एक साधारण से सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदल दिया और नीतियों को वामपंथी रंग दिया। मई 1967 का दस-सूत्री कार्यक्रम इसी का नतीजा था, जिसे सिंडिकेट ने औपचारिक स्वीकृति तो दी पर गहरे संदेह के साथ।

3. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का मसला (सबसे बड़ा मौका)। ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु से पद खाली हुआ। सिंडिकेट ने इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष एन. संजीव रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार बनवा दिया, जिनसे इंदिरा गाँधी की बहुत दिनों से राजनीतिक अनबन चली आ रही थी। उन्होंने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में नामांकन भरने का बढ़ावा दिया।

4. बैंकों के राष्ट्रीयकरण और ‘प्रिवी पर्स’ का मसला। इंदिरा गाँधी ने चौदह अग्रणी बैंकों के राष्ट्रीयकरण और ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति की घोषणा की। इन्हीं दोनों मुद्दों पर तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री मोरारजी देसाई से गहरे मतभेद उभरे और उन्होंने सरकार से किनारा कर लिया।

5. ‘व्हिप’ बनाम ‘अंतरात्मा की आवाज़’ का मसला। कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने व्हिप जारी किया कि सभी कांग्रेसी सांसद और विधायक आधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी को वोट डालें। इंदिरा गाँधी समर्थकों की अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की विशेष बैठक की याचना ठुकरा दी गई। इसके जवाब में इंदिरा गाँधी ने खुलेआम ‘अंतरात्मा की आवाज़’ पर वोट डालने को कहा, और वी.वी. गिरि जीत गए।

नतीजा: आधिकारिक उम्मीदवार की हार से पार्टी का टूटना तय हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को पार्टी से निष्कासित कर दिया और इंदिरा गाँधी ने कहा कि उनकी पार्टी ही असली कांग्रेस है। 1969 के नवंबर तक सिंडिकेट का खेमा कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) यानी ‘पुरानी कांग्रेस’ और इंदिरा गाँधी का खेमा कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) यानी ‘नयी कांग्रेस’ कहा जाने लगा। इंदिरा गाँधी ने इस टूट को ‘समाजवादी’ और ‘पुरातनपंथी’ तथा गरीबों के हिमायती और अमीरों के तरफ़दार के बीच की लड़ाई करार दिया।

10 सुदीप्त कविराज के अनुच्छेद पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 10

प्र. निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:

“इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस को अत्यंत केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक पार्टी संगठन में तब्दील कर दिया, जबकि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस शुरुआती दशकों में एक संघीय, लोकतांत्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच थी। नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज चुनावी विमर्श में बदल दिया। कई नारे उछाले गए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार की नीतियाँ भी बनानी थीं—1970 के दशक के शुरुआती सालों में अपनी बड़ी चुनावी जीत के जश्न के बीच कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई।”
सुदीप्त कविराज

(क) लेखक के अनुसार नेहरू और इंदिरा गाँधी द्वारा अपनाई गई रणनीतियों में क्या अंतर था?

लेखक के अनुसार नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस शुरुआती दशकों में एक संघीय, लोकतांत्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच थी, यानी उसमें राज्यों के नेताओं की अपनी ताकत थी, भीतर बहस की जगह थी और अलग-अलग विचारधाराएँ एक साथ रह सकती थीं। इंदिरा गाँधी ने उसी पार्टी को अत्यंत केंद्रीकृत और अलोकतांत्रिक संगठन में बदल दिया, जिसमें फ़ैसले ऊपर से आते थे। अध्याय का ब्योरा इसी से मेल खाता है: नयी कांग्रेस पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित थी, उसका सांगठनिक ढाँचा कमज़ोर था और उसके भीतर कई गुट नहीं बचे थे।

(ख) लेखक ने क्यों कहा है कि सत्तर के दशक में कांग्रेस ‘मर गई’?

इसलिए कि लेखक की नज़र में कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर खत्म हो गई, चुनावी ताकत के तौर पर नहीं। उसकी नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज चुनावी विमर्श में बदल दिया। नारे खूब उछाले गए, पर उनके अनुकूल सरकार की नीतियाँ बनाना ज़रूरी नहीं समझा गया। यह विडंबना ही है कि यह मौत बड़ी चुनावी जीतों के जश्न के बीच हुई। अध्याय इसी बात को यूँ कहता है कि कांग्रेस की पकड़ मज़बूत हुई और इंदिरा गाँधी की हैसियत बढ़ी, पर जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की लोकतांत्रिक ज़मीन छोटी पड़ती गई।

(ग) कांग्रेस पार्टी में आए बदलावों का असर दूसरी पार्टियों पर किस तरह पड़ा?

1. विपक्ष एकजुट होने को मजबूर हुआ। कांग्रेस के भीतर की उठापटक और उसकी कमज़ोरी को देखकर विचारधारा के लिहाज़ से एकदम अलग दल भी साथ आए। यही ‘गैर-कांग्रेसवाद’ और 1971 का ‘ग्रैंड अलायंस’ है।

2. गठबंधन और दल-बदल की राजनीति शुरू हुई। 1967 से संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं, जिनमें वामपंथी और दक्षिणपंथी तक एक साथ थे, और ‘आया राम-गया राम’ का दौर चला।

3. क्षेत्रीय दलों को जगह मिली। मद्रास में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम को पूर्ण बहुमत मिला, जो किसी राज्य में किसी गैर-कांग्रेसी दल की पहली ऐसी जीत थी।

4. नेता-केंद्रित राजनीति फैली। जब कांग्रेस ने खुद को सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर टिका दिया, तो दूसरी पार्टियों की राजनीति भी नारों और चेहरों के इर्द-गिर्द घूमने लगी, और उनका मुख्य कार्यक्रम ‘इंदिरा हटाओ’ जैसा नकारात्मक होकर रह गया।

11 खुद करें-खुद सीखें

गतिविधि

प्र. • राजनीतिक दलों द्वारा गढ़े गए नारों की एक सूची बनाएँ।
• क्या आपको लगता है कि चीज़ों के विज्ञापन और राजनीतिक दलों के नारे, घोषणापत्र तथा विज्ञापनों में कोई समानता है?
• मँहगाई राजनीतिक दलों की नीतियों पर क्या प्रभाव डालती है? इस पर चर्चा कीजिए।

1. नारों की सूची: शुरुआत इसी अध्याय के नारों से कीजिए: ‘जय जवान-जय किसान’ (लालबहादुर शास्त्री), ‘गरीबी हटाओ’ (1971 में इंदिरा गाँधी का सकारात्मक कार्यक्रम) और ‘इंदिरा हटाओ’, जिसके बारे में इंदिरा गाँधी ने कहा कि विपक्षी गठबंधन के पास बस यही एक कार्यक्रम है। फिर अपने राज्य और हाल के चुनावों के नारे जोड़िए, हर नारे के साथ दल और साल लिखिए।

2. विज्ञापन और दलों के नारे: दोनों में साफ़ समानता है। दोनों छोटी, चुटीली और आसानी से याद रहने वाली पंक्ति का सहारा लेते हैं, दोनों ब्यौरे के बजाय मन में एक अच्छी छवि बनाने की कोशिश करते हैं, और दोनों सुनने वाले से वह वादा करते हैं जो वह चाहता है। घोषणापत्र किसी चीज़ के विस्तृत विवरण जैसा है, जबकि नारा विज्ञापन की पंक्ति जैसा। अध्याय की चेतावनी यहाँ काम की है: सुदीप्त कविराज के अनुसार नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज़ चुनावी विमर्श में बदल दिया, कई नारे उछाले गए पर इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार की नीतियाँ भी बनानी थीं। नारा जब विज्ञापन बन जाए, तो यही ख़तरा रहता है।

3. मँहगाई और दलों की नीतियाँ: अध्याय ख़ुद इसका उदाहरण देता है। आर्थिक स्थिति की विकटता के कारण कीमतों में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ, लोग आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, खाद्यान्न की कमी और बढ़ती बेरोज़गारी को लेकर विरोध पर उतर आए, और देश में अकसर ‘बंद’ और ‘हड़ताल’ होने लगे। सरकार ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या माना, जिससे लोगों की नाराज़गी बढ़ी, और 1967 के चुनावों में कांग्रेस के मतों और सीटों में भारी गिरावट आई तथा नौ राज्यों में उसके हाथ से सत्ता निकल गई। मँहगाई का सबसे ज़्यादा नुकसान सत्ताधारी दल को होता है, क्योंकि लोग सरकार को ज़िम्मेदार मानते हैं; इसलिए सरकारें कीमतें थामने वाली नीतियाँ बनाती हैं और विपक्षी दल इसी मुद्दे पर एकजुट होते हैं।

12 पाठ के बीच के प्रश्न

अध्याय के हाशिये पर छपी टिप्पणियों में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं। नीचे इन्हें किताब के क्रम में, किताब के अपने शब्दों में, हल किया गया है।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. फ्रांस और कनाडा में ऐसी सूरत कायम हो, तो वहाँ कोई भी लोकतंत्र के असफल होने अथवा देश के टूटने की बात नहीं कहता। हम ही आखिर लगातार इतने शक में क्यों पड़े रहते हैं?

उत्तर: क्योंकि 1960 के दशक में भारत एक नव-स्वतंत्र, गरीब और बहुत विविधता वाला देश था, और बाहर के बहुत-से लोगों को शक था कि नेहरू के बाद यहाँ लोकतंत्र टिक पाएगा या नहीं। आशंका थी कि बाकी नव-स्वतंत्र देशों की तरह भारत भी राजनीतिक उत्तराधिकार का सवाल लोकतांत्रिक ढंग से हल नहीं कर पाएगा, और असफल रहने की सूरत में सेना राजनीतिक भूमिका में आ सकती है। गरीबी, गैर-बराबरी, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन जैसे अनसुलझे सवालों के कारण ही इस दशक को ‘खतरनाक दशक’ कहा गया। फ्रांस या कनाडा जैसे पुराने और समृद्ध लोकतंत्रों को इस नज़र से नहीं देखा जाता था। भारत ने इस शक का जवाब अपने आचरण से दिया: नेहरू के उत्तराधिकारी का सवाल इतनी आसानी से हल हुआ कि आलोचक ठगे-से रह गए, और शास्त्री के बाद गहन प्रतिस्पर्धा के बावजूद सत्ता का हस्तांतरण शांतिपूर्ण ढंग से हुआ, जिसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. इंदिरा गाँधी के लिए स्थितियाँ सचमुच कठिन रही होंगी- पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में आखिर वे अकेली महिला थीं। ऊँचे पदों पर अपने देश में ज़्यादा महिलाएँ क्यों नहीं हैं?

उत्तर: इंदिरा गाँधी 1966 में प्रधानमंत्री बनीं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उम्मीद थी कि वे उनकी सलाहों पर अमल करेंगी, और साल भर के भीतर उन्हें लोकसभा चुनाव में पार्टी की अगुवाई करनी पड़ी; इन कठिनाइयों के बीच उन्होंने पार्टी पर अपना नियंत्रण बढ़ाने और अपना नेतृत्व-कौशल दिखाने की कोशिश की। ऊँचे पदों पर आज भी महिलाएँ कम इसलिए हैं कि राजनीति लंबे समय से पुरुषों के दबदबे में रही है: दल महिलाओं को कम टिकट देते हैं, घर की ज़्यादातर ज़िम्मेदारी महिलाओं पर होती है, और सार्वजनिक जीवन में उन्हें पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के प्रसार, दलों में महिलाओं को ज़्यादा टिकट और पद, सीटों के आरक्षण (जैसे पंचायतों और नगरपालिकाओं में) और सामाजिक सोच में बदलाव से यह तस्वीर बदल सकती है। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. क्या आज गैर-कांग्रेसवाद प्रासंगिक है? क्या मौज़ूदा पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के खिलाफ़ ऐसा ही तरीका अपनाया जा सकता है?

उत्तर: गैर-कांग्रेसवाद के पीछे का विचार सामान्य है: किसी प्रभुत्वशाली दल के विरोधी दलों को लगता है कि उनके वोटों के बँट जाने से ही वह दल सत्ता में बना रहता है, इसलिए कार्यक्रम और विचारधारा अलग होने पर भी वे एकजुट होकर मोर्चा बनाते हैं या सीटों पर चुनावी तालमेल करते हैं। 1960 के दशक की कांग्रेस के खिलाफ़ इस रणनीति को समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नाम दिया। यही तर्क किसी भी ऐसे दल के खिलाफ़ लागू हो सकता है जो किसी राज्य में लंबे समय से हावी हो, जैसे पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा; उसे हराने के लिए विपक्षी दलों को एकजुट होना पड़ेगा। अध्याय ऐसे मोर्चों की कमज़ोरी भी दिखाता है: 1967 के बाद बनी संयुक्त विधायक दल की सरकारों के घटक विचारधारा के लिहाज़ से एक-दूसरे से भिन्न थे और इनमें से ज़्यादातर सरकारें लंबे समय तक नहीं टिकीं। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. त्रिशंकु विधानसभा और गठबंधन सरकार की इन बातों में नया क्या है? ऐसी बातें तो हम आए दिन सुनते रहते हैं।

उत्तर: आज ये बातें आम हैं, पर 1967 में ये नयी थीं। 1952 से कांग्रेस लगभग हर जगह बहुमत जीतती आई थी, इसलिए एक दल की सरकार ही नियम था। 1967 में कांग्रेस को सात राज्यों में बहुमत नहीं मिला और दो और राज्यों में दलबदल के कारण वह सरकार नहीं बना सकी; कई राज्यों में किसी एक दल को बहुमत न मिलने से गैर-कांग्रेसी दलों ने एकजुट होकर संयुक्त विधायक दल बनाया और गैर-कांग्रेसी सरकारों को समर्थन दिया। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इन चुनाव परिणामों को ‘राजनीतिक भूकंप’ की संज्ञा दी। इसीलिए अध्याय त्रिशंकु विधानसभा और गठबंधन सरकार को एक नए दौर की शुरुआत मानता है, जो आगे चलकर भारतीय राजनीति में आम बात बन गई।

हाशिये की टिप्पणी

प्र. ‘गरीबी हटाओ’ का नारा तो अब से लगभग चालीस साल पहले दिया गया था। क्या यह नारा महज़ चुनावी छलावा था?

उत्तर: महज़ छलावा नहीं, पर पूरा कार्यक्रम भी नहीं। नारे के साथ ठोस नीतियाँ जुड़ी थीं: इंदिरा गाँधी ने सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि, ग्रामीण भू-स्वामित्व और शहरी संपदा के परिसीमन, आय और अवसरों की असमानता की समाप्ति तथा ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति पर ज़ोर दिया, और उनकी सरकार ने चौदह अग्रणी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। दूसरी ओर अध्याय साफ़ कहता है कि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा और इससे जुड़ा कार्यक्रम इंदिरा गाँधी की राजनीतिक रणनीति थी, जिससे उन्होंने भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला और बेरोज़गार नौजवानों के बीच अपने समर्थन का आधार तैयार करने की कोशिश की; और सुदीप्त कविराज कहते हैं कि कई नारे उछाले गए पर इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल नीतियाँ भी बनें। इसलिए यह नारा चुनावी रणनीति भी था और एक नीतिगत दिशा भी, जिसके नतीजे वादे से कम रहे। (यह चर्चा का प्रश्न है; अपनी राय कारण के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी

प्र. यह तो कुछ ऐसा ही है कि कोई मकान की बुनियाद और छत बदल दे फिर भी कहे कि मकान वही है। पुरानी और नयी कांग्रेस में कौन-सी चीज़ समान थी?

उत्तर: समान रहे पार्टी का नाम, उसका प्रभुत्व और उसकी लोकप्रियता: नयी कांग्रेस को लोकप्रियता के लिहाज़ से वही स्थान प्राप्त था जो उसे शुरुआती दौर में हासिल था, और वह फिर पूरे देश में चुनाव जीतने लगी, इसलिए एक दल के प्रभुत्व के अर्थ में कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना हुई। बाकी लगभग सब बदल गया। यह पार्टी पूर्णतया अपने सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता पर आश्रित थी, इसका सांगठनिक ढाँचा अपेक्षाकृत कमज़ोर था, इसके भीतर कई गुट नहीं थे, यानी अब वह विभिन्न मतों और हितों को एक साथ लेकर चलने वाली पार्टी नहीं थी, और यह कुछ सामाजिक वर्गों, जैसे गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों, पर ज़्यादा निर्भर थी। यानी इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस प्रणाली की पुनर्स्थापना उसकी प्रकृति बदलकर की।