परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: नेहरू के बाद उत्तराधिकार का सवाल, शास्त्री का दौर, 1967 का चौथा आम चुनाव, गैर-कांग्रेसवाद, संयुक्त विधायक दल, दल-बदल, सिंडिकेट, 1969 की टूट, प्रिवी पर्स, 1971 की जीत और कांग्रेस प्रणाली का पुनर्स्थापन। हर तारीख़, हर नाम, हर आँकड़ा और हर बक्से की बात एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द
कांग्रेस प्रणाली: वह व्यवस्था जिसमें कांग्रेस अपने भीतर कई गुटों, अलग-अलग मतों और हितों को एक साथ लेकर चलती थी और हर तनाव तथा संघर्ष को पचा लेने की क्षमता रखती थी। इसी खासियत के कारण वह जानी जाती थी।
गैर-कांग्रेसवाद: कांग्रेस और उसकी नीतियों के खिलाफ़ अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों का एकजुट होना। यह नाम समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने दिया।
दल-बदल: कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव लड़े और जीत जाए, और चुनाव जीतने के बाद उस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे दल-बदल कहते हैं।
सिंडिकेट: कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह, जिसे अनौपचारिक तौर पर यह नाम दिया जाता था और जिसका पार्टी के संगठन पर नियंत्रण था।
नारा: लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला एक मनभावन मुहावरा। (यह प्रश्नावली के प्रश्न 2 की अपनी परिभाषा है।)
संयुक्त विधायक दल: 1967 में किसी पार्टी को बहुमत न मिलने पर अनेक गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने एकजुट होकर जो दल बनाया और जिसने गैर-कांग्रेसी सरकारों को समर्थन दिया। इसी कारण उन सरकारों को संयुक्त विधायक दल की सरकार कहा गया।
‘प्रिवी पर्स’: रियासतों के विलय से पहले की गई वह व्यवस्था, जिसके तहत तत्कालीन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार और सरकार की तरफ़ से कुछ विशेष भत्ते मिलने थे। ये दोनों चीज़ें विलय किए जाने वाले राज्य के विस्तार, राजस्व और क्षमता के आधार पर तय होनी थीं।
‘अंतरात्मा की आवाज़’ पर वोट: इसका मतलब था कि कांग्रेस के सांसद और विधायक अपनी मनमर्ज़ी से किसी भी उम्मीदवार को वोट डाल सकते हैं, पार्टी के व्हिप से बँधे नहीं हैं।
‘ग्रैंड अलायंस’: 1971 में सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों का बनाया चुनावी गठबंधन, जिसके पास कोई सुसंगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था।
‘कामराज योजना’: के. कामराज का 1963 का वह प्रस्ताव कि सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, ताकि अपेक्षाकृत युवा पार्टी कार्यकर्ता कमान सँभाल सकें।
2 तारीख़ें जिनका घालमेल नहीं होना चाहिए
| तारीख़ | क्या हुआ |
|---|---|
| मई 1964 | नेहरू की मृत्यु |
| 3 जून 1964 | गार्जियन का वह संपादकीय जिसने भारत की तुलना इंग्लैंड से की |
| 1964 से 1966 | लालबहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्रित्व काल |
| 1965 | पाकिस्तान के साथ युद्ध |
| 11 जनवरी 1966 | ताशकंद में शास्त्री का देहान्त |
| 1966 | गुप्त मतदान में इंदिरा गाँधी की जीत, प्रधानमंत्री बनीं |
| फरवरी 1967 | चौथे आम चुनाव (लोकसभा और राज्य विधानसभाएँ) |
| मई 1967 | कांग्रेस कार्यसमिति का दस-सूत्री कार्यक्रम |
| 1969 | ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु और राष्ट्रपति पद का चुनाव, वी.वी. गिरि विजयी |
| 11 नवंबर 1969 | निजलिंगप्पा का इंदिरा गाँधी को निष्कासन का पत्र |
| नवंबर 1969 | कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) के नाम चलन में आए |
| 1970 | प्रिवी पर्स पर संविधान संशोधन का प्रयास, राज्यसभा में असफल |
| दिसंबर 1970 | लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश |
| फ़रवरी 1971 | पाँचवें आम चुनाव |
| 1971 | बांग्लादेश का बनना; प्रिवी पर्स की समाप्ति की राह साफ़ |
| 1972 | राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की व्यापक सफलता |
3 आँकड़े जो सीधे पूछे जाते हैं
| आँकड़ा | किसका |
|---|---|
| 22 वर्ष | अध्याय-प्रवेश के कार्टून में: आज़ादी के इतने बरस बीतते-बीतते कांग्रेस फूट का शिकार हो गई |
| दो-तिहाई से अधिक | 1966 के गुप्त मतदान में इंदिरा गाँधी को मिले कांग्रेस सांसदों के मत |
| 5 रुपये से 7 रुपये | अवमूल्यन के बाद 1 अमरीकी डॉलर की कीमत |
| आधे मंत्री | 1967 में इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के इतने मंत्री चुनाव हार गए |
| 7 + 2 = 9 राज्य | सात में बहुमत नहीं, दो में दलबदल; कुल नौ राज्यों में कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी |
| तीन राज्य | हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश, जहाँ दल-बदल से गैर-कांग्रेसी सरकारें बहाल हुईं |
| एक पखवाड़ा, तीन दफ़ा, 9 घंटे | गया लाल का दल-बदल |
| दस-सूत्री कार्यक्रम | मई 1967 में कांग्रेस कार्यसमिति ने अपनाया |
| चौदह बैंक | जिनके राष्ट्रीयकरण की घोषणा हुई |
| 375 सीटें, 48.4 प्रतिशत वोट | 1971 में कांग्रेस (आर) और सीपीआई का गठबंधन |
| 352 सीटें, 44 प्रतिशत वोट | अकेले कांग्रेस (आर) |
| 16 सीटें, एक-चौथाई वोट | कांग्रेस (ओ) |
| 60 से भी कम सीटें | विपक्षी ‘ग्रैंड अलायंस’ |
| महज चार साल | इतने समय में इंदिरा गाँधी ने अपने सामने खड़ी चुनौतियों को धूल चटा दी |
4 नाम और उनकी पहचान
| नाम | किताब की अपनी पहचान |
|---|---|
| लालबहादुर शास्त्री (1904-1966) | भारत के दूसरे प्रधानमंत्री; 1930 से स्वतंत्रता आंदोलन में; उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्री; कांग्रेस पार्टी के महासचिव; 1951-56 और 1957-64 में केंद्रीय मंत्री; रेल-दुर्घटना की नैतिक जिम्मेवारी लेकर रेलमंत्री पद से इस्तीफ़ा; ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा |
| इंदिरा गाँधी (1917-1984) | 1966 से 1977 और फिर 1980 से 1984 तक प्रधानमंत्री; 1959 में कांग्रेस अध्यक्ष; 1964-66 में शास्त्री मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री (सूचना मंत्रालय); 1967, 1971 और 1980 के आम चुनावों में कांग्रेस को विजयी बनाया; ‘गरीबी हटाओ’ का नारा; प्रिवी पर्स की समाप्ति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, आण्विक-परीक्षण और पर्यावरण-संरक्षण के कदम; 31 अक्तूबर 1984 को हत्या |
| के. कामराज (1903-1975) | स्वतंत्रता-सेनानी और कांग्रेस नेता; मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री; शिक्षा का प्रसार और स्कूली बच्चों को ‘दोपहर का भोजन’ देने की योजना; 1963 की ‘कामराज योजना’; कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे; सिंडिकेट के अगुवा |
| एस. निजलिंगप्पा (1902-2000) | वरिष्ठ कांग्रेस नेता; संविधान सभा के सदस्य; लोकसभा के सदस्य; तत्कालीन मैसूर प्रांत (अब कर्नाटक) के मुख्यमंत्री; आधुनिक कर्नाटक के निर्माता; 1968-71 में कांग्रेस अध्यक्ष |
| वी.वी. गिरि (1894-1980) | 1969 से 1974 तक भारत के राष्ट्रपति; आंध्र प्रदेश के मज़दूर नेता; सिलोन (श्रीलंका) में भारतीय उच्चायुक्त; केंद्रीय मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री; उत्तर प्रदेश, केरल और मैसूर के राज्यपाल; उपराष्ट्रपति (1967 से 1969); ज़ाकिर हुसैन के निधन के बाद कार्यकारी राष्ट्रपति; इस्तीफ़ा देकर स्वतंत्र प्रत्याशी; इंदिरा गाँधी के समर्थन से विजयी |
| राममनोहर लोहिया (1910-1967) | समाजवादी नेता एवं विचारक; स्वतंत्रता-सेनानी; कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य; बाद में सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता; 1963 से 1967 तक लोकसभा सांसद; ‘मैनकाइंड’ और ‘जन’ के संस्थापक संपादक; गैर-कांग्रेसवाद के रणनीतिकार; पिछड़े वर्गों को आरक्षण की वकालत; अंग्रेज़ी-विरोध; नेहरू के खिलाफ़ मोर्चा खोला |
| सी. नटराजन अन्नादुरई (1909-1969) | 1967 से मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री; चर्चित पत्रकार, लेखक एवं वक्ता; जस्टिस पार्टी से संबद्ध; बाद में द्रविड़ कषगम (1934) में शामिल; 1949 में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम का गठन; हिंदी का विरोध और हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व; राज्यों की व्यापक स्वायत्तता के समर्थक |
| कर्पूरी ठाकुर (1924-1988) | दिसंबर 1970 से जून 1971 तथा जून 1977 से अप्रैल 1979 तक बिहार के मुख्यमंत्री; स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजवादी नेता; मज़दूर और किसान आंदोलनों में सक्रिय; लोहिया के प्रबल समर्थक; जेपी के आंदोलन में भागीदारी; दूसरे कार्यकाल में बिहार में पिछड़ों के लिए आरक्षण; अंग्रेज़ी के इस्तेमाल के प्रबल विरोधी |
| मोरारजी देसाई | बंबई प्रांत (मौजूदा महाराष्ट्र और गुजरात) के मुख्यमंत्री रह चुके; 1966 में इंदिरा गाँधी से हारे; 1969 में उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री, बैंकों के राष्ट्रीयकरण तथा प्रिवी पर्स पर मतभेद के बाद सरकार से किनारा |
| एन. संजीव रेड्डी | सिंडिकेट के सदस्य (आंध्र प्रदेश); 1969 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष और कांग्रेस के आधिकारिक राष्ट्रपति-उम्मीदवार, जो हार गए |
| एस.के. पाटिल, अतुल्य घोष, के.बी. सहाय | सिंडिकेट के पाटिल (बंबई सिटी) और घोष (पश्चिम बंगाल); 1967 में पाटिल, घोष, कामराज और बिहार के के.बी. सहाय जैसे दिग्गजों को मुँह की खानी पड़ी |
| गया लाल और राव वीरेन्द्र सिंह | हरियाणा के विधायक गया लाल का दल-बदल, और कांग्रेस नेता राव वीरेन्द्र सिंह की चंडीगढ़ में की गई घोषणा, जिससे ‘आया राम-गया राम’ मशहूर हुआ |
| मोहम्मद अयूब खान | पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति, जिनसे बातचीत के लिए शास्त्री ताशकंद गए थे |
| ज़ाकिर हुसैन | तत्कालीन राष्ट्रपति, जिनकी मृत्यु से 1969 में पद खाली हुआ |
| सुदीप्त कविराज | प्रश्नावली के प्रश्न 10 वाले अनुच्छेद के लेखक |
| नेविल मैक्सवेल | लेख ‘इंडियाज़ डिसइंटीग्रेटिंग डेमोक्रेसी’ के लेखक, जो ‘लंदन टाइम्स’ में 1967 में प्रकाशित हुआ |
| आनंद चक्रवती | पुस्तक ‘ए विलेज इन चोमू असेंबली कॉन्सटीट्ऐंसी इन राजस्थान’ के लेखक, जिस पर देवीसर की चुनाव-कथा आधारित है |
| मोहनलाल सुखाड़िया | राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता, चुनाव-कथा में |
| हैरॉल्ड मैकमिलन | इंग्लैंड के प्रधानमंत्री, जिनके बाद वहाँ उत्तराधिकार का मामला लंबे समय तक खिंचा; गार्जियन ने इसी से भारत की तुलना की |
5 कहानी एक नज़र में
| पड़ाव | निचोड़ |
|---|---|
| उत्तराधिकार की चुनौती | दो सवाल: ‘नेहरू के बाद कौन?’ और ‘नेहरू के बाद होगा क्या?’ आशंका थी कि लोकतंत्र टिकेगा नहीं और सेना राजनीतिक भूमिका में उतर आएगी। 1960 का दशक ‘खतरनाक दशक’। |
| नेहरू के बाद शास्त्री | कामराज के सलाह-मशविरे से शास्त्री निर्विरोध चुने गए। सवाल इतनी आसानी से हल हुआ कि आलोचक ठगे-से रह गए। |
| शास्त्री के बाद इंदिरा | सर्वसम्मति न बनने पर गुप्त मतदान; मोरारजी देसाई की हार। सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता माना गया। |
| 1967 का संदर्भ | सूखा, खाद्य संकट, विदेशी मुद्रा-भंडार में कमी, उत्पादन और निर्यात में गिरावट, सैन्य खर्चे में बढ़ोतरी, अवमूल्यन, महँगाई, ‘बंद’ और ‘हड़ताल’, कृषक-विद्रोह, गंभीर सांप्रदायिक दंगे। |
| गैर-कांग्रेसवाद | वोट बँटने से ही कांग्रेस जीतती है, यह मानकर विरोधी दल एकजुट हुए। लोहिया का तर्क: कांग्रेस का शासन अलोकतांत्रिक और गरीबों के खिलाफ़ है। |
| चुनाव का जनादेश | ‘राजनीतिक भूकंप’। लोकसभा में बहुमत जैसे-तैसे, पर मत और सीटें सबसे कम। आधे मंत्री हारे। |
| गठबंधन | संयुक्त विधायक दल की सरकारें। बिहार में दो समाजवादी पार्टियाँ एसएसपी और पीएसपी, साथ में वामपंथी सीपीआई और दक्षिणपंथी जनसंघ। पंजाब की ‘पॉपुलर यूनाइटेड फ्रंट’ सरकार में दो प्रतिस्पर्धी अकाली दल, संत ग्रुप और मास्टर ग्रुप, तथा सीपीआई, सीपीआई (एम), एसएसपी, रिपब्लिकन पार्टी और भारतीय जनसंघ। मद्रास में डीएमके को पूर्ण बहुमत। उस समय कहा जाता था कि दिल्ली से हावड़ा जाने वाली ट्रेन पूरे रास्ते में एक भी कांग्रेस-शासित राज्य से होकर नहीं गुज़रेगी। |
| दल-बदल | तीन राज्यों में सरकारें बदलीं; ‘आया राम-गया राम’; बाद में संविधान संशोधन। |
| इंदिरा बनाम सिंडिकेट | असली चुनौती पार्टी के भीतर से। सत्ता-संघर्ष को विचारधारात्मक संघर्ष में बदला; दस-सूत्री कार्यक्रम। |
| 1969 का राष्ट्रपति चुनाव | संजीव रेड्डी बनाम वी.वी. गिरि; ‘व्हिप’ बनाम ‘अंतरात्मा की आवाज़’; गिरि जीते; टूट तय। |
| विभाजन | कांग्रेस (ओ) यानी पुरानी कांग्रेस, कांग्रेस (आर) यानी नयी कांग्रेस। इंदिरा ने इसे ‘समाजवादी’ बनाम ‘पुरातनपंथी’ की लड़ाई बताया। |
| 1971 का मुकाबला | ‘ग्रैंड अलायंस’ बनाम कांग्रेस (आर) और सीपीआई। ‘इंदिरा हटाओ’ बनाम ‘गरीबी हटाओ’। |
| परिणाम | 375 सीटें, 48.4 प्रतिशत; कांग्रेस (ओ) को 16; ग्रैंड अलायंस को 60 से कम। फिर बांग्लादेश युद्ध और 1972 की जीत। |
| पुनर्स्थापन? | प्रणाली लौटी, पर प्रकृति बदलकर। नयी कांग्रेस नेता की लोकप्रियता पर आश्रित, संगठन कमज़ोर, भीतर गुट नहीं, तनाव पचाने की क्षमता खत्म। |
6 पुरानी कांग्रेस बनाम नयी कांग्रेस
| कसौटी | पुरानी कांग्रेस | नयी कांग्रेस |
|---|---|---|
| आधार | संगठन और गुटों का संतुलन | पूर्णतया सर्वोच्च नेता की लोकप्रियता |
| सांगठनिक ढाँचा | मज़बूत, राज्यों के नेता ‘किंगमेकर’ | अपेक्षाकृत कमज़ोर |
| भीतर के गुट | कई गुट, विभिन्न मत और हित साथ-साथ | कई गुट नहीं; अलग-अलग मतों को साथ लेकर चलने वाली नहीं |
| सामाजिक आधार | व्यापक और मिला-जुला | गरीब, महिला, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों पर ज़्यादा निर्भर |
| तनाव पचाने की क्षमता | हर तनाव और संघर्ष को पचा लेने की क्षमता | ज़्यादा लोकप्रिय होकर भी इस क्षमता से हीन |
7 बक्से, कैप्शन और कार्टून, जो अकसर छूट जाते हैं
किताब के बक्से और कार्टून-कैप्शन पूरी तरह परीक्षा के दायरे में हैं, और यही सबसे ज़्यादा छूटते हैं।
- अध्याय-प्रवेश का कार्टून (आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ इंडिया): आज़ादी के बाद शुरुआत में कांग्रेस का चुनाव चिह्न दो बैलों की जोड़ी था। कार्टून दिखाता है कि आज़ादी के 22 वर्ष गुजरते-गुजरते कांग्रेस किस कदर फूट का शिकार हो गई थी।
- गार्जियन का संपादकीय, 3 जून 1964: “तमाम अंदेशों के बावजूद इंग्लैंड की तुलना में भारत में प्रधानमंत्री का सवाल ज़्यादा शालीनता और तेज़ी के साथ हल कर लिया गया”। तुलना हैरॉल्ड मैकमिलन के बाद इंग्लैंड में खिंचे मामले से की गई थी।
- नेविल मैक्सवेल का उद्धरण (‘इंडियाज़ डिसइंटीग्रेटिंग डेमोक्रेसी’, ‘लंदन टाइम्स’, 1967): “…भारत में जिस तरह की प्रवृत्तियाँ जारी हैं, उनमें एक सुव्यवस्थित समाज रचना को बनाए रखने का काम नागरिक सरकार के हाथों से जाता रहेगा और सेना ही फिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एकमात्र विकल्प होगी… भारत को लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर विकसित करने का महान प्रयोग असफल हो चुका है…”
- चुनाव-कथा, राजस्थान के एक गाँव की: 1967 के विधानसभा चुनाव, चोमू निर्वाचन क्षेत्र, कांग्रेस बनाम स्वतंत्र पार्टी। गाँव देवीसर में शेर सिंह का दबदबा, पर भतीजा भीम सिंह ज़्यादा लोकप्रिय। दोनों राजपूत, पर भीम सिंह ने पंचायत प्रधान बनकर गैर-राजपूत समुदायों को जोड़ लिया। वह मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया से मिला, जिन्होंने उसे अपने उम्मीदवार का समर्थन करने पर राजी कर लिया। शेर सिंह ने स्वतंत्र पार्टी के जागीरदार उम्मीदवार का साथ दिया। नतीजा: विधानसभा चुनाव चाचा-भतीजे की खेमेबाजी में बदल गया। स्रोत: आनंद चक्रवती की पुस्तक।
- ‘आया राम-गया राम’ की पेटी: गया लाल, एक पखवाड़ा, तीन दफ़ा, कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट, फिर कांग्रेस, फिर 9 घंटों में दोबारा यूनाइटेड फ्रंट। राव वीरेन्द्र सिंह की चंडीगढ़ में घोषणा: ‘‘गया राम था अब आया राम है।’’ बाद में संविधान में संशोधन।
- ‘कांग्रेस सिंडिकेट’ की पेटी: अगुवा कामराज; सदस्य एस.के. पाटिल, एस. निजलिंगप्पा, एन. संजीव रेड्डी, अतुल्य घोष। शास्त्री और इंदिरा दोनों सिंडिकेट की सहायता से प्रधानमंत्री बने; टूट के बाद ये नेता कांग्रेस (ओ) में रहे और 1971 के बाद प्रभावहीन हो गए।
- निजलिंगप्पा का 11 नवंबर 1969 का पत्र: “इतिहास…लोकतंत्र की त्रासदी के ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब जनसमर्थन की लहर के बूते अथवा किसी लोकतांत्रिक संगठन के बल पर सत्तासीन हुआ नेता राजनीतिक आत्ममोह का शिकार हो जाता है और चरित्रहीन चाटुकार दरबारियों की बातों में जीने लगता है…”
- ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति की पेटी: विलय के समय आलोचना नहीं हुई थी, क्योंकि एकता और अखंडता का लक्ष्य प्रमुख था। नेहरू का असंतोष; मोरारजी देसाई का ‘रियासतों के साथ विश्वासघात’ वाला तर्क; 1970 का संशोधन राज्यसभा में असफल; अध्यादेश सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त किया; 1971 की जीत के बाद संशोधन हुआ।
- कार्टून, आर.के. लक्ष्मण, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 21 अगस्त 1969: वी.वी. गिरि विजयी मुक्केबाज़ के रूप में, गले में माला; सिंडिकेट के प्रतीक के रूप में निजलिंगप्पा घुटने टेकते हुए; सवाल यह पूछा गया है कि इंदिरा गाँधी को मुक्केबाज़ी वाला दस्ताना पहने क्यों दिखाया गया है।
- विजयन का कार्टून (शंकर्स वीकली), 20 जुलाई 1969: 1969 में कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के लिए प्रतिद्वंद्विता पर।
- कुट्टी का कार्टून, 1974: गैर-साम्यवादी दलों का एक संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिशों पर।
- ‘द ग्रैंड फिनिश’ कार्टून: 1971 के आम चुनाव के परिणामों पर; पराजित खिलाड़ियों के रूप में उस समय के प्रमुख विपक्षी नेता।
- आर.के. लक्ष्मण का कार्टून, 18 जनवरी 1966 (शास्त्री की मृत्यु के बाद) और मुख्यमंत्री चुनने की इंदिरा गाँधी की शैली पर एक और कार्टून।
- रघु राय की तस्वीर के पास छपी हाशिये की टिप्पणी: इंदिरा गाँधी के लिए स्थितियाँ सचमुच कठिन रही होंगी, क्योंकि पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में वे अकेली महिला थीं।
- सिने-संसार, ‘ज़ंजीर’: वर्ष 1973; निर्देशक प्रकाश मेहरा; पटकथा सलीम खान और जावेद अख्तर; अभिनय अमिताभ बच्चन, अजित, जया भादुड़ी, प्राण। नायक विजय एक नौजवान पुलिस अधिकारी है, जिसे झूठे आरोप में जेल भेज दिया जाता है और बाहर आकर वह प्रतिशोध लेता है। फ़िल्म नैतिक मूल्यों के पतन और उससे उपजी कुंठा को दिखाती है। ‘ज़ंजीर’ के साथ सातवें दशक में एक नए तरह के गुस्सैल नौजवान नायक का जन्म हुआ।
8 दो सावधानियाँ
किताब उड़ीसा, मद्रास (अब तमिलनाडु), बंबई सिटी (अब मुंबई) और मैसूर (अब कर्नाटक) लिखती है। उत्तर में यही रूप लिखिए और कोष्ठक में नया नाम दे दीजिए। पार्टी के नाम भी किताब के अनुसार ही लिखिए: कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर), तथा द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके)।
‘ग्रैंड अलायंस’ के घटक दलों में भारतीय क्रांतिदल है। हिंदी किताब इसका संक्षिप्त नाम (बीकेएस) छापती है, जबकि अंग्रेज़ी किताब इसका अलग संक्षिप्त नाम छापती है। उत्तर में सुरक्षित रास्ता यह है कि दल का पूरा नाम लिखिए और संक्षिप्त नाम पर टिकिए मत।