लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

संपूर्ण क्रांतिकेशवानंद भारतीआपातकाल 1975अनुच्छेद 352जनता पार्टीशाह आयोग1977 का चुनाव

1 पृष्ठभूमि और आर्थिक संदर्भ

1971 के बाद, ‘नई’, नेता-केंद्रित कांग्रेस ने ध्रुवीकृत दलगत प्रतिस्पर्धा को और तीखा कर दिया, और सरकार–न्यायपालिका के बीच तनाव बढ़ा। ग़रीबी हटाओ बेहतर स्थितियों में नहीं बदली: पूर्वी पाकिस्तान से ~80 लाख शरणार्थियों ने अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला, 1971 युद्ध के बाद अमेरिका ने सहायता रोकी, और तेल की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं।

याद रखने योग्य आँकड़े

महँगाई दर 1973 में 23% और 1974 में 30% तक पहुँची; असफल मानसून (1972–73) से अनाज उत्पादन 8% गिरा; औद्योगिक वृद्धि कम रही और बेरोज़गारी, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अधिक थी।

आर्थिक असंतोष के इस माहौल में गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों ने कारगर ढंग से जन-विरोध संगठित किए, और 1960 के दशक के अंत से चला आ रहा छात्रों का असंतोष इस दौर में और प्रबल हो उठा। संसदीय राजनीति में विश्वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी बढ़ी; इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाया और राज्यविरोधी तकनीकों का सहारा लिया। ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए। ये पश्चिम बंगाल में सबसे ज़्यादा सक्रिय थे, जहाँ राज्य सरकार ने इन्हें दबाने के लिए कठोर कदम उठाए।

2 गुजरात और बिहार आंदोलन, 1974

आंदोलन क्या हुआ
गुजरात, जनवरी 1974 मूल्य वृद्धि और भ्रष्टाचार के विरुद्ध छात्र आंदोलन → राष्ट्रपति शासन → जून 1975 में ताज़ा चुनाव → कांग्रेस पराजित
बिहार, मार्च 1974 छात्र विरोध ने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया; उन्होंने राज्य सरकार को बर्ख़ास्त करने की माँग की और समाज, अर्थव्यवस्था व राजनीति में ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया

1975 में, जेपी ने संसद तक एक विशाल जन-मार्च का नेतृत्व किया, दिल्ली में अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक रैलियों में से एक, जिसे भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी का समर्थन मिला। अलग से, मई 1974 की रेल हड़ताल, जिसका नेतृत्व जॉर्ज फर्नांडीज़ ने किया, ग़ैर-क़ानूनी घोषित की गई; सरकार ने नेताओं को गिरफ़्तार किया और रेल लाइनों की सुरक्षा में सेना तैनात की, जिससे हड़ताल 20 दिन बाद समाप्त हो गई।

3 न्यायपालिका से टकराव

सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा कि संसद मौलिक अधिकारों को कम नहीं कर सकती और संशोधन के ज़रिए संपत्ति के अधिकार को सीमित नहीं कर सकती: यह केशवानंद भारती मामले में परिणत हुआ, जिसमें कहा गया कि संविधान का एक ‘बुनियादी ढाँचा’ है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती।

ध्यान देने योग्य

1973 में, सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर (जिन्होंने सरकार के विरुद्ध फ़ैसले दिए थे) न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया: यह विवादास्पद क़दम कार्यपालिका के प्रति ‘प्रतिबद्ध’ न्यायपालिका की बात को बढ़ावा देने लगा।

4 आपातकाल की घोषणा

12 जून 1975इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के अपने 1971 के चुनाव को अवैध घोषित किया (राज नारायण की याचिका)
24 जून 1975सर्वोच्च न्यायालय ने आंशिक स्थगन दिया: वे सांसद बनी रह सकती थीं पर लोकसभा कार्यवाही में भाग नहीं ले सकती थीं
25 जून 1975जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली का नेतृत्व किया, उनके इस्तीफ़े और राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह की माँग करते हुए
25 जून 1975 की रातप्रधानमंत्री ने अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को आपातकाल की सिफ़ारिश की, ‘अंदरूनी गड़बड़ी की आशंका’ का हवाला देते हुए; तुरंत घोषित हुआ, अख़बारों की बिजली काटी गई, विपक्षी नेता भोर से पहले गिरफ़्तार हुए
26 जून 1975, सुबह 6 बजेमंत्रिमंडल को इसकी जानकारी दी गई: घटना के बाद ही

5 आपातकाल के परिणाम

1

प्रेस सेंसरशिप

अख़बारों को प्रकाशन-सामग्री के लिए पूर्व-अनुमति लेनी पड़ी; ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ जैसी पत्रिकाएँ पालन करने के बजाय बंद हो गईं।

2

अधिकार निलंबित

मौलिक अधिकार निलंबित, जिसमें उन्हें बहाल कराने के लिए न्यायालय जाने का अधिकार भी शामिल; आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध।

3

निवारक नज़रबंदी

केवल आशंका के आधार पर बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ; बंदी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से गिरफ़्तारी को चुनौती नहीं दे सकते थे।

4

अप्रैल 1976 का फ़ैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने कई उच्च न्यायालयों के फ़ैसले पलटते हुए माना कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भी निलंबित किया जा सकता है: इसके सबसे विवादास्पद फ़ैसलों में से एक।

42वें संशोधन, जो आपातकाल के दौरान पारित हुआ, ने विधायिका का कार्यकाल 5 से 6 वर्ष बढ़ा दिया (स्थायी परिवर्तन के रूप में): चुनाव एक वर्ष टालने की शक्ति के साथ मिलकर, इसका अर्थ था कि 1976 में होने वाले चुनाव अब 1978 तक टाले जा सकते थे।

आपातकाल की मुखालफत और प्रतिरोध
  • पहली लहर में गिरफ़्तारी से बचे राजनीतिक कार्यकर्ता ‘भूमिगत’ हो गए और उन्होंने सरकार के खिलाफ़ मुहिम चलायी।
  • ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘स्टेट्समैन’ जैसे अखबारों ने सेंसरशिप का विरोध किया: जिन समाचारों को छापने से रोका जाता था, उनकी जगह वे खाली छोड़ देते थे; ‘सेमिनार’ और ‘मेनस्ट्रीम’ ने घुटने टेकने की जगह बंद होना मुनासिब समझा।
  • सेंसरशिप को धत्ता बताते हुए गुपचुप तरीके से अनेक न्यूज़लेटर और लीफ़लेट्स निकले।
  • पद्मभूषण से सम्मानित कन्नड़ लेखक शिवराम कारंत और पद्मश्री से सम्मानित हिंदी लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने लोकतंत्र के दमन के विरोध में अपनी-अपनी पदवी लौटा दी।

बहरहाल, मुखालफत और प्रतिरोध के इतने प्रकट कदम कुछ ही लोगों ने उठाए।

6 आपातकाल के सबक़

आपातकाल समाप्त होते ही सामान्य लोकतांत्रिक कामकाज तेज़ी से बहाल हुआ, जो दर्शाता है कि भारत में लोकतंत्र को स्थायी रूप से समाप्त करना कितना कठिन है। आपातकाल प्रावधान की अस्पष्टताएँ बाद में सुधारी गईं: ‘अंदरूनी’ आपातकाल अब केवल ‘सशस्त्र विद्रोह’ के आधार पर घोषित किया जा सकता है, और राष्ट्रपति को सलाह केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिखित रूप में दी जानी चाहिए। शाह आयोग रिपोर्ट ने बाद में पाया कि पुलिस और प्रशासन राजनीतिक दबाव के प्रति संवेदनशील हो गए थे: यह समस्या आपातकाल के बाद भी बनी रही।

7 1977 का चुनाव: कांग्रेस की पहली हार

18 महीनों के बाद, चुनाव मार्च 1977 में हुए; जेल में बंद नेता रिहा किए गए। प्रमुख विपक्षी दलों ने एकजुट होकर नई जनता पार्टी बनाई, जिसने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया; जगजीवन राम का अलग हुआ ‘कांग्रेस फ़ॉर डेमोक्रेसी’ बाद में इसमें शामिल हुआ। यह चुनाव आपातकाल पर जनमत संग्रह बन गया।

याद रखने योग्य परिणाम

कांग्रेस ने केवल 154 सीटें जीतीं, 35% से कम वोट के साथ: उसकी पहली लोकसभा हार। जनता पार्टी और सहयोगियों ने 542 में से 330 सीटें जीतीं (अकेले जनता पार्टी: 295, स्पष्ट बहुमत)। कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में हर सीट हार गई; इंदिरा गांधी स्वयं रायबरेली से हार गईं। फिर भी कांग्रेस ने महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा में अपनी ताक़त बनाए रखी और दक्षिण में बड़ी जीत हासिल की: आपातकाल के सबसे कठोर उपाय उत्तर में केंद्रित थे।

8 जनता सरकार और 1980 का फ़ैसला

मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच प्रधानमंत्री पद की प्रतिस्पर्धा के कारण देसाई के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी आंतरिक कलह जारी रही। आपातकाल के विरोध से परे कोई साझा कार्यक्रम न होने से पार्टी विभाजित हो गई, और देसाई की सरकार ने 28 महीनों के भीतर बहुमत खो दिया। चरण सिंह की सरकार बनी, पर कांग्रेस द्वारा वादा किया गया समर्थन वापस लेने पर यह केवल ~4 महीने में गिर गई।

परीक्षा संकेत

जनवरी 1980 के ताज़ा चुनावों में जनता पार्टी को व्यापक हार मिली, विशेषकर उत्तर में; इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 353 सीटें जीतीं, लगभग 1971 को दोहराते हुए। सबक़ यह था: जिन सरकारों को अस्थिर और झगड़ालू माना जाता है, मतदाता उन्हें भी कड़ा दंड देते हैं।

9 विरासत

1969 से, कांग्रेस ने अपना पुराना ‘सर्व-समावेशी दल’ का स्वरूप त्याग दिया था; अब वह एक विशिष्ट, समाजवादी, ग़रीब-समर्थक विचारधारा से जुड़ी थी, जो इंदिरा गांधी के व्यक्तिगत नेतृत्व पर आधारित थी। विपक्षी दलों ने ‘ग़ैर-कांग्रेसवाद’ पर और अधिक भरोसा किया, यह समझते हुए कि ग़ैर-कांग्रेसी वोटों का बँटवारा रोकना ज़रूरी है: 1977 के परिणाम में यह एक बड़ा कारक था। 1977 के बाद, पिछड़ी जातियों के कल्याण का मुद्दा भी अप्रत्यक्ष रूप से राजनीति में हावी होने लगा।

10 CBSE 2026-27 संदर्भ सामग्री: तीन विचारक और लोकतांत्रिक उभार

स्थिति: CBSE पाठ्यक्रम 2026-27 में यह अतिरिक्त संदर्भ सामग्री के रूप में दिया गया है। पाठ्यक्रम के परिशिष्ट के अनुसार यह सामग्री कक्षा में पढ़ाने-समझाने के लिए है और बोर्ड परीक्षा में इसका मूल्यांकन नहीं होगा। इसे समझ के लिए पढ़ें; यह NCERT पुस्तक का भाग नहीं है।

1

जयप्रकाश नारायण

तीन प्रमुख योगदान: भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष (स्वतंत्र भारत के पहले नेता जिन्होंने युवाओं, विशेषकर गुजरात और बिहार के युवाओं, की भागीदारी से भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान चलाया; भ्रष्टाचार के विरुद्ध लोकपाल पद की वकालत); सामुदायिक समाजवाद (भारत समुदायों का समाज है जिसकी तीन परतें हैं, समुदाय, क्षेत्र और राष्ट्र, जो मिलकर सच्चे संघ का उदाहरण बनती हैं); और संपूर्ण क्रांति, जिसमें नैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और पारिस्थितिक परिवर्तन शामिल हैं। राजनीतिक परिवर्तन में प्रत्याह्वान का अधिकार (राइट टू रिकॉल), लोकतांत्रिक राजनीति में ग्राम/मोहल्ला समितियों का महत्त्व और स्वच्छ राजनीति के संघर्ष में ‘ऊपर के लोगों’ से जुड़ने का आह्वान शामिल था। जेपी के अनुसार परिवर्तन का असली वाहक ‘मनुष्य’ है।

2

राम मनोहर लोहिया और समाजवाद

लोकतांत्रिक समाजवाद के प्रवर्तक; उन्होंने पूँजीवाद और साम्यवाद दोनों को भारतीय समाज के लिए अप्रासंगिक माना। इसके दो उद्देश्य: आर्थिक (भोजन और आवास) और गैर-आर्थिक (लोकतंत्र और स्वतंत्रता)। चौबुर्जा राजनीति (Chouburja Rajneeti): राजनीति के चार परस्पर जुड़े स्तंभ, केंद्र, क्षेत्र, ज़िला और गाँव। सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण जैसी नीतियाँ) केवल वंचितों के लिए नहीं, महिलाओं और गैर-धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भी हो। उन्होंने ‘समाजवाद की पार्टी’ के तीन प्रतीक बताए: फावड़ा (परिश्रम की तैयारी), वोट (मतदान की शक्ति) और जेल (त्याग की तत्परता)।

3

दीनदयाल उपाध्याय और एकात्म मानववाद

एकात्म मानववाद एक ‘स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मॉडल’ है जिसमें विकास के केंद्र में मनुष्य रहता है; यह व्यक्ति और समाज की आवश्यकताओं में संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग का समर्थन करता है। तीन सिद्धांत: अंश नहीं, संपूर्ण की प्रधानता; धर्म की सर्वोच्चता; समाज की स्वायत्तता। उन्होंने पश्चिमी ‘पूँजीवादी व्यक्तिवाद’ और ‘मार्क्सवादी समाजवाद’ दोनों को भौतिकवादी मानकर नकारा और चिति (अंतःकरण, शुद्ध आत्मा) पर आधारित वर्गहीन, जातिहीन और संघर्ष-मुक्त समाज की कल्पना की। उन्होंने लोकतंत्र के भारतीयकरण और आर्थिक लोकतंत्र पर ज़ोर दिया, जिसकी नींव विकेंद्रीकरण और स्वदेशी है; उनका अर्थायाम सिद्धांत कहता है कि अर्थ का अभाव और उसकी अति, दोनों धर्म का ह्रास करते हैं।

4

लोकतांत्रिक उभार

लोकतांत्रिक राजनीति में लोगों की बढ़ती भागीदारी। पहला उभार (1950 से 1970 के दशक): केंद्र और राज्यों के चुनावों में वयस्क मतदाताओं की भागीदारी, जिसने इस पश्चिमी धारणा को गलत साबित किया कि लोकतंत्र के लिए पहले आधुनिकीकरण, शहरीकरण, शिक्षा और मीडिया तक पहुँच ज़रूरी है। दूसरा उभार (1980 का दशक): अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी, जिससे राजनीति अधिक समावेशी बनी और इन वर्गों का आत्मसम्मान और सशक्तीकरण बढ़ा। तीसरा उभार (1990 के दशक की शुरुआत से, उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण का दौर): प्रतिस्पर्धी चुनावी बाज़ार, जिसमें तीन बदलाव दिखते हैं, राज्य से बाज़ार, सरकार से शासन (गवर्नेंस), नियंत्रक राज्य से सुविधा-प्रदाता राज्य; युवा मतदाता इसमें निर्णायक बनकर उभरे।

झटपट दोहराव: परीक्षा से एक रात पहले पढ़ें
  • आर्थिक संकट (1973–74 महँगाई, शरणार्थी बोझ) + गुजरात/बिहार आंदोलन + जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ ने मंच तैयार किया
  • केशवानंद भारती मामला: संविधान का ‘बुनियादी ढाँचा’ संशोधन से परे
  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित किया, 12 जून 1975; आपातकाल घोषित 25 जून 1975, अनुच्छेद 352 के तहत
  • प्रेस सेंसरशिप, मौलिक अधिकार निलंबित, निवारक नज़रबंदी, अप्रैल 1976 का सर्वोच्च न्यायालय फ़ैसला
  • 1977 का चुनाव: कांग्रेस की पहली लोकसभा हार; जनता पार्टी ने अकेले 295 सीटें जीतीं
  • जनता सरकार 28 महीनों में गिरी; चरण सिंह की सरकार ~4 महीने चली
  • 1980 का चुनाव, कांग्रेस ने 353 सीटें जीतीं, मतदाता ग़ैर-लोकतांत्रिक और अस्थिर, दोनों तरह की सरकारों को दंडित करते हैं
अभ्यास प्रश्न: 1 अंक
  1. 1 अंकआपातकाल किस तिथि को घोषित हुआ?
  2. 1 अंकआपातकाल घोषित करने के लिए संविधान के किस अनुच्छेद का प्रयोग हुआ?
  3. 1 अंक12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने क्या फ़ैसला दिया?
  4. 1 अंक‘संपूर्ण क्रांति’ क्या थी, और इसका आह्वान किसने किया?
  5. 1 अंक1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?
  6. 1 अंक1977 के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री कौन बने?
  7. 1 अंक1980 के चुनाव में कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?
  8. 1 अंककेशवानंद भारती मामले ने क्या स्थापित किया?
अभ्यास प्रश्न: 2 और 4 अंक
  1. 2 अंकनिवारक नज़रबंदी क्या थी, और आपातकाल के दौरान इसका उपयोग कैसे हुआ?
  2. 2 अंक42वें संशोधन ने विधायिका के कार्यकाल में क्या परिवर्तन किए?
  3. 2 अंकचरण सिंह की सरकार इतनी जल्दी क्यों गिरी?
  4. 4 अंकसरकार ने 1975 में आपातकाल घोषित करने के लिए क्या कारण बताए?
  5. 4 अंकनागरिक स्वतंत्रताओं और प्रेस की स्वतंत्रता पर आपातकाल के प्रभावों की चर्चा कीजिए।
  6. 4 अंक1977 में उत्तर में बुरी तरह हारने के बावजूद कांग्रेस ने दक्षिणी राज्यों में अपनी ताक़त क्यों बनाए रखी?
  7. 4 अंकशाह आयोग के निष्कर्ष क्या थे?
अभ्यास प्रश्न: 6 अंक
  1. 6 अंक1973 और 1975 के बीच की घटनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत कीजिए जिन्होंने आपातकाल की घोषणा को जन्म दिया।
  2. 6 अंकभारत की दलीय व्यवस्था पर आपातकाल के परिणामों की चर्चा कीजिए।
  3. 6 अंकआपातकाल और उसके बाद (1977–1980) ने भारतीय लोकतंत्र को क्या सबक़ सिखाए?
बहुविकल्पीय प्रश्न
  1. 1 अंकआपातकाल किस अनुच्छेद के तहत घोषित हुआ?
    (क) अनुच्छेद 356(ख) अनुच्छेद 352(ग) अनुच्छेद 370(घ) अनुच्छेद 368
  2. 1 अंक‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
    (क) जॉर्ज फर्नांडीज़(ख) मोरारजी देसाई(ग) जयप्रकाश नारायण(घ) चरण सिंह
  3. 1 अंक1974 की रेल हड़ताल का नेतृत्व किसने किया?
    (क) जॉर्ज फर्नांडीज़(ख) जगजीवन राम(ग) राज नारायण(घ) ए.एन. रे
  4. 1 अंक1977 का लोकसभा चुनाव कब हुआ?
    (क) जनवरी 1976(ख) मार्च 1977(ग) जनवरी 1980(घ) जून 1975
  5. 1 अंकमोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता सरकार लगभग कितने समय चली?
    (क) 6 महीने(ख) 12 महीने(ग) 28 महीने(घ) 5 वर्ष
अभिकथन एवं कारण

विकल्प: (क) दोनों सही, कारण सही व्याख्या · (ख) दोनों सही, पर व्याख्या नहीं · (ग) अभिकथन सही, कारण ग़लत · (घ) अभिकथन ग़लत, कारण सही।

  1. 1 अंक
    अभिकथन (A): 1977 के चुनाव परिणाम ने दिखाया कि भारत लोकतंत्र नहीं रहा था।
    कारण (R): आपातकाल समाप्त होते ही सामान्य लोकतांत्रिक कामकाज बहाल हुआ, जिसमें एक स्वतंत्र चुनाव भी शामिल था जिसने सत्तारूढ़ दल को हराया।
  2. 1 अंक
    अभिकथन (A): 1980 के चुनाव परिणाम ने साबित किया कि मतदाता केवल ग़ैर-लोकतांत्रिक सरकारों को दंडित करते हैं।
    कारण (R): 1977-79 की जनता सरकार अस्थिर थी और उसके भीतर कलह थी; सरकार अस्थिर हो तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दंड देते हैं।
उत्तर कुंजी
बहुविकल्पीय 1–5(ख) (ग) (क) (ख) (ग)  ·  अभिकथन 1(घ): अभिकथन ग़लत, लोकतंत्र जल्दी बहाल हुआ · 2(घ): अभिकथन ग़लत, मतदाता अस्थिरता को भी दंडित करते हैं
यही अध्याय पढ़ें:English Mediumहिंदी माध्यम