NCERT की पाठ्यपुस्तक समकालीन विश्व राजनीति के अध्याय 1 की प्रश्नावली के सभी 10 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और कक्षा-गतिविधि के उत्तर अंत में दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्र. सोवियत अर्थव्यवस्था की प्रकृति के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ग़लत है?
(क) सोवियत अर्थव्यवस्था में समाजवाद प्रभावी विचारधारा थी।
(ख) उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व/नियंत्रण होना।
(ग) जनता को आर्थिक आज़ादी थी।
(घ) अर्थव्यवस्था के हर पहलू का नियोजन और नियंत्रण राज्य करता था।
उत्तर: (ग) ग़लत है। सोवियत अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी; मिल्कियत का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व था और भूमि तथा अन्य उत्पादक संपदाओं पर नियंत्रण भी राज्य का ही था। इसलिए जनता को आर्थिक आज़ादी नहीं थी। बाक़ी तीनों कथन सही हैं।
प्र. निम्नलिखित को कालक्रमानुसार सजाएँ?
(क) अफ़गान-संकट (ख) बर्लिन-दीवार का गिरना (ग) सोवियत संघ का विघटन (घ) रूसी क्रांति
उत्तर: सही क्रम है (घ), (क), (ख), (ग)।
1. (घ) रूसी क्रांति: 1917
2. (क) अफ़गान-संकट: सोवियत संघ ने 1979 में अफ़गानिस्तान में हस्तक्षेप किया
3. (ख) बर्लिन-दीवार का गिरना: 9 नवंबर, 1989
4. (ग) सोवियत संघ का विघटन: दिसंबर 1991
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा सोवियत संघ के विघटन का परिणाम नहीं है?
(क) संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के बीच विचारधारात्मक लड़ाई का अंत
(ख) स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल (सीआईएस) का जन्म
(ग) विश्व-व्यवस्था के शक्ति-संतुलन में बदलाव
(घ) मध्यपूर्व में संकट
उत्तर: (घ) मध्यपूर्व में संकट। बाक़ी तीनों को किताब विघटन के सीधे परिणाम के रूप में गिनाती है: विचारधारात्मक विवाद का अंत, राष्ट्रकुल का गठन, और विश्व राजनीति के शक्ति-संबंधों का बदल जाना जिससे अमरीका अकेली महाशक्ति बन बैठा।
प्र. निम्नलिखित में मेल बैठाएं:
(1) मिख़ाइल गोर्बाचेव (2) शॉक थेरेपी (3) रूस (4) बोरिस येल्तसिन (5) वारसॉ
(क) सोवियत संघ का उत्तराधिकारी (ख) सैन्य समझौता (ग) सुधारों की शुरुआत (घ) आर्थिक मॉडल (ङ) रूस के राष्ट्रपति
उत्तर:
(1) मिख़ाइल गोर्बाचेव: (ग) सुधारों की शुरुआत
(2) शॉक थेरेपी: (घ) आर्थिक मॉडल
(3) रूस: (क) सोवियत संघ का उत्तराधिकारी
(4) बोरिस येल्तसिन: (ङ) रूस के राष्ट्रपति
(5) वारसॉ: (ख) सैन्य समझौता
प्र. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।
(क) सोवियत राजनीतिक प्रणाली ______ की विचारधारा पर आधारित थी।
(ख) सोवियत संघ द्वारा बनाया गया सैन्य गठबंधन ______ था।
(ग) ______ पार्टी का सोवियत राजनीतिक व्यवस्था पर दबदबा था।
(घ) ______ ने 1985 में सोवियत संघ में सुधारों की शुरुआत की।
(ङ) ______ का गिरना शीतयुद्ध के अंत का प्रतीक था।
उत्तर:
(क) समाजवाद
(ख) वारसा समझौता
(ग) कम्युनिस्ट
(घ) मिख़ाइल गोर्बाचेव
(ङ) बर्लिन की दीवार
2 वर्णनात्मक प्रश्न
प्र. सोवियत अर्थव्यवस्था को किसी पूँजीवादी देश जैसे संयुक्त राज्य अमरीका की अर्थव्यवस्था से अलग करने वाली किन्हीं तीन विशेषताओं का जिक्र करें।
उत्तर:
1. विचारधारा: सोवियत अर्थव्यवस्था में समाजवाद प्रभावी विचारधारा थी। 1917 की क्रांति निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त करने और समाज को समानता के सिद्धांत पर रचने की कोशिश थी, जबकि अमरीका जैसी अर्थव्यवस्था निजी संपत्ति और मुनाफ़े पर टिकी है।
2. स्वामित्व: मिल्कियत का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व था; भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व के अलावा नियंत्रण भी राज्य का ही था। पूँजीवादी देश में उत्पादन के साधन निजी हाथों में रहते हैं।
3. नियोजन: अर्थव्यवस्था के हर पहलू का नियोजन और नियंत्रण राज्य करता था, न कि बाज़ार। सरकार बुनियादी ज़रूरत की चीजें, मसलन स्वास्थ्य-सुविधा, शिक्षा, बच्चों की देखभाल और लोक-कल्याण की अन्य चीजें रियायती दर पर मुहैया कराती थी और सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करती थी।
प्र. किन बातों के कारण गोर्बाचेव सोवियत संघ में सुधार के लिए बाध्य हुए?
उत्तर:
1. पश्चिम से पिछड़ना: पश्चिम के देशों में सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति हो रही थी और सोवियत संघ को इसकी बराबरी में लाने के लिए सुधार ज़रूरी हो गए थे।
2. ठहरी हुई अर्थव्यवस्था: उत्पादकता और प्रौद्योगिकी में पिछड़ जाने से हर तरह की उपभोक्ता-वस्तु की कमी हो गई थी और खाद्यान्न का आयात साल-दर-साल बढ़ रहा था। 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में यह व्यवस्था लड़खड़ा रही थी और अंततः ठहर सी गई थी।
3. हथियारों की होड़ और अफ़गानिस्तान: अमरीका को बराबर की टक्कर देने की भारी कीमत चुकानी पड़ी, और 1979 के अफ़गानिस्तान हस्तक्षेप से व्यवस्था और भी कमजोर हुई।
4. राजनीतिक जड़ता: प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कस चुका था, पार्टी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं थी और भ्रष्टाचार भारी था। लोग अपने को राजव्यवस्था और शासकों से जोड़कर नहीं देख पा रहे थे।
इसीलिए गोर्बाचेव ने पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने, सोवियत संघ को लोकतांत्रिक रूप देने और वहाँ सुधार करने का फ़ैसला किया।
प्र. भारत जैसे देशों के लिए सोवियत संघ के विघटन के क्या परिणाम हुए?
उत्तर:
1. एकध्रुवीय विश्व से सामना: शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद अमरीका अकेली महाशक्ति बन बैठा और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली हो गई। भारत जैसे देशों को इस बदली हुई व्यवस्था में अपनी जगह नए सिरे से तय करनी पड़ी।
2. बहुध्रुवीय विश्व की चाह: भारत और रूस दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है, जहाँ कई शक्तियाँ हों, सुरक्षा की सामूहिक ज़िम्मेदारी हो, संघर्षों का समाधान बातचीत से हो, हर देश की स्वतंत्र विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएँ मजबूत बनें।
3. रूस से रिश्ते का जारी रहना: भारत ने साम्यवादी रह चुके सभी देशों से अच्छे संबंध बनाए, पर सबसे गहरे संबंध रूस के साथ रहे। 2001 के भारत-रूस सामरिक समझौते के अंग के रूप में 80 द्विपक्षीय दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर हुए।
4. ठोस लाभ: भारत को कश्मीर, ऊर्जा-आपूर्ति, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से संबंधित सूचनाओं के आदान-प्रदान, पश्चिम एशिया में पहुँच बनाने और चीन के साथ संबंधों में संतुलन लाने जैसे मसलों में फायदे हुए। रूस भारत की परमाण्विक योजना के लिए महत्त्वपूर्ण है और उसने अंतरिक्ष उद्योग में क्रायोजेनिक रॉकेट देकर मदद की।
5. नए साझीदार: मध्य एशिया के नए स्वतंत्र देशों से रिश्ते बने; भारत कज़ाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से ऊर्जा-आयात बढ़ाने तथा तेल वाले इलाकों में साझेदारी और निवेश की कोशिश कर रहा है।
प्र. शॉक थेरेपी क्या थी? क्या साम्यवाद से पूँजीवाद की तरफ संक्रमण का यह सबसे बेहतर तरीका था?
उत्तर: शॉक थेरेपी क्या थी: साम्यवाद के पतन के बाद रूस, मध्य एशिया के गणराज्यों और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवाद की ओर संक्रमण का एक ख़ास मॉडल अपनाया गया। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निर्देशित इस मॉडल को ‘शॉक थेरेपी’ यानी आघात पहुँचाकर उपचार करना कहा गया। इसकी सर्वोपरि मान्यता थी कि मिल्कियत का सबसे प्रभावी रूप निजी स्वामित्व होगा; राज्य की संपदा का तुरंत निजीकरण हुआ, सामूहिक ‘फार्म’ को निजी ‘फार्म’ में बदला गया, मुक्त व्यापार और मुद्राओं की आपसी परिवर्तनीयता को अपनाया गया, और किसी भी ‘तीसरे रुख़’ को मंजूर नहीं किया गया।
क्या यह सबसे बेहतर तरीका था: नहीं। 1990 में अपनायी गई शॉक थेरेपी जनता को उपभोग के उस ‘आनंदलोक’ तक नहीं ले गई जिसका उसने वादा किया था।
1. रूस का पूरा राज्य-नियंत्रित औद्योगिक ढाँचा चरमरा उठा और लगभग 90 प्रतिशत उद्योग औने-पौने दामों में बेच दिए गए; इसे ‘इतिहास की सबसे बड़ी गराज-सेल’ कहा जाता है।
2. नागरिकों को अधिकार-पत्र मिले, पर धन की ज़रूरत में उन्होंने वे कालाबाज़ारियों को बेच दिए।
3. रूबल का मूल्य गिरा, मुद्रास्फीति से जमापूँजी जाती रही, और सन् 1999 में वास्तविक ‘सकल घरेलू उत्पाद’ 1989 की तुलना में कहीं नीचे था।
4. समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था नष्ट होने से ज्यादातर लोग ग़रीबी में पड़ गए, मध्य वर्ग हाशिए पर आ गया और कई देशों में एक ‘माफिया वर्ग’ उभर आया।
5. संविधान हड़बड़ी में बने, राष्ट्रपति बहुत ताक़तवर और संसद कमजोर रह गई।
बेहतर रास्ता यह होता कि संक्रमण धीरे-धीरे और क्रम से किया जाता, पुरानी सामाजिक सुरक्षा को एक साथ न तोड़ा जाता, और आर्थिक बदलाव के साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण भी उतनी ही प्राथमिकता से किया जाता।
प्र. निम्नलिखित कथन के पक्ष या विपक्ष में एक लेख लिखें: “दूसरी दुनिया के विघटन के बाद भारत को अपनी विदेश-नीति बदलनी चाहिए और रूस जैसे परंपरागत मित्र की जगह संयुक्त राज्य अमरीका से दोस्ती करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।”
उत्तर: पक्ष में: विघटन के बाद अमरीका अकेली महाशक्ति बन बैठा और उसकी ताकत तथा प्रतिष्ठा की शह पाकर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली हो गई। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएँ विभिन्न देशों की ताकतवर सलाहकार बन गईं, और राजनीतिक रूप से उदारवादी लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ धारणा के रूप में उभरा। ऐसी दुनिया में प्रौद्योगिकी, निवेश और बाज़ार तक पहुँच के लिए अमरीका से नज़दीकी भारत के हित में मानी जा सकती है।
विपक्ष में: भारत-रूस संबंधों का इतिहास आपसी विश्वास और साझे हितों का इतिहास है। सोवियत संघ ने कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारत के रुख का समर्थन किया, 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान मदद की, भिलाई, बोकारो और विशाखापट्टनम के इस्पात कारखानों में सहायता दी, और तब सैन्य टेक्नालॉजी दी जब शायद ही कोई और देश तैयार था। आज भी भारतीय सेना को अधिकांश साजो-सामान रूस से मिलता है, रूस भारत की परमाण्विक और अंतरिक्ष योजनाओं के लिए महत्त्वपूर्ण है, और तेल के संकट की घड़ी में उसने हमेशा भारत की मदद की है। ऐसे परखे हुए रिश्ते को छोड़ देना समझदारी नहीं होगी।
निष्कर्ष: विदेश नीति एक मित्र की जगह दूसरा रख लेने का खेल नहीं है। भारत और रूस, दोनों बहुध्रुवीय विश्व चाहते हैं, जहाँ कई शक्तियाँ हों और फ़ैसले संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं से हों। इसलिए सही रास्ता यह है कि भारत रूस के साथ अपने पुराने रिश्ते को बनाए रखते हुए अमरीका सहित सभी शक्तियों से संबंध बढ़ाए और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर क़ायम रहे।
3 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
किताब अध्याय के हाशिये पर भी कुछ प्रश्न पूछती है और एक कक्षा-गतिविधि देती है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
प्र. मैं हैरान हूँ! आखिर दुनियाभर के इतने सारे संजीदा लोगों ने ऐसी व्यवस्था को क्यों सराहा?
उत्तर: क्योंकि सोवियत व्यवस्था के पीछे बड़े आदर्श और ठोस उपलब्धियाँ भी थीं। यह व्यवस्था समाजवाद के आदर्शों और समतामूलक समाज की ज़रूरत से प्रेरित क्रांति से निकली थी, और किताब इसे निजी संपत्ति की संस्था को समाप्त करने तथा समाज को समानता के सिद्धांत पर सचेत रूप से रचने की मानव इतिहास की सबसे बड़ी कोशिश बताती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमरीका को छोड़ दें तो सोवियत अर्थव्यवस्था शेष विश्व से कहीं ज्यादा विकसित थी, और सरकार ने सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित किया था; स्वास्थ्य-सुविधा, शिक्षा, बच्चों की देखभाल और लोक-कल्याण की चीजें रियायती दर पर मिलती थीं। दुनिया के लोग इन्हीं आदर्शों और उपलब्धियों से प्रभावित हुए। व्यवस्था का दूसरा पहलू, यानी नौकरशाही का शिकंजा, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी का अभाव, और जनता के प्रति जवाबदेह न रहने वाली एक ही पार्टी का शासन, बाहर से उतना साफ़ नहीं दिखता था।
प्र. मैंने किसी को कहते हुए सुना है कि, ‘सोवियत संघ का अंत समाजवाद का अंत नहीं है’। क्या यह संभव है?
उत्तर: हाँ, यह संभव है। जो ढहा वह एक ख़ास व्यवस्था थी: एक ही पार्टी का शासन, राज्य द्वारा पूरी तरह नियोजित और नियंत्रित अर्थव्यवस्था, और भूमि तथा उत्पादक संपदाओं पर राज्य का स्वामित्व। समाजवाद एक विचार के रूप में, यानी समानता और समतामूलक समाज का आदर्श, उस राज्य के साथ ख़त्म नहीं हुआ। कई देश लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर ही इसके कुछ हिस्से अपनाते हैं, जैसे लोक-कल्याण की योजनाएँ, रियायती स्वास्थ्य और शिक्षा, और सार्वजनिक क्षेत्र। किताब का शॉक थेरेपी वाला हिस्सा भी यही दिखाता है: जिस संक्रमण ने किसी ‘तीसरे रुख़’ को मंजूर नहीं किया, उसने पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था तहस-नहस कर दी, इसलिए लोग शुद्ध पूँजीवाद के विकल्प खोजते रहे।
प्र. मानचित्र पर मध्य एशियाई देशों को चिन्हित करें।
उत्तर: यह मानचित्र-कार्य है; इसके लिए अपनी पाठ्यपुस्तक में छपे पूर्वी, मध्य यूरोप और ‘स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रकुल’ के मानचित्र का उपयोग कीजिए। चिन्हित करने वाले पाँच मध्य एशियाई देश हैं: कज़ाकिस्तान, किरगिझस्तान, ताज़िकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान। किताब के अनुसार यह क्षेत्र रूस, चीन और अफ़गानिस्तान से सटा है तथा पश्चिम एशिया से नज़दीक है।
प्र. मुझे ‘आघात’ तो दीख रहा है लेकिन ‘उपचार’ कहाँ है? हम इतने बड़े-बड़े जुमलों में क्यों बोलते हैं?
उत्तर: ‘शॉक थेरेपी’ का अर्थ है आघात पहुँचाकर उपचार करना; ‘उपचार’ शब्द सुनकर लगता है कि इससे रोग ठीक होगा। पर किताब का निष्कर्ष है कि शॉक थेरेपी जनता को उपभोग के उस ‘आनंदलोक’ तक नहीं ले गई जिसका उसने वादा किया था: लगभग 90 प्रतिशत उद्योग औने-पौने दामों में बिक गए, रूबल का मूल्य गिरा, मुद्रास्फीति से लोगों की जमापूँजी जाती रही, 1999 का सकल घरेलू उत्पाद 1989 से भी नीचे चला गया और ज्यादातर लोग ग़रीबी में पड़ गए। यानी ‘आघात’ तो साफ़ दिखा, ‘उपचार’ कहीं नहीं दिखा। ऐसे बड़े और मीठे नाम इसलिए रखे जाते हैं ताकि एक कष्टदायक नीति ज़रूरी इलाज जैसी लगे और उसे लागू करवाने वाली संस्थाएँ, यहाँ विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, उसके लिए सहमति जुटा सकें।
प्र. आखिर राष्ट्रवाद और अलगाववाद में अंतर क्या है? अगर आप कामयाब हो जाते हैं तो राष्ट्रीय नायक कहलाते हैं और अगर नाकामयाब रह जाते हैं तो अलगाववाद फैलाने के अपराधी ठहराए जाते हैं।
उत्तर: राष्ट्रवाद किसी जनसमूह की यह भावना है कि वह एक राष्ट्र है और अपना शासन ख़ुद चलाना चाहता है; अलगाववाद किसी क्षेत्र या समूह की मौजूदा देश से अलग हो जाने की माँग है। अक्सर एक ही आंदोलन को दो तरफ़ से देखने पर ये दो नाम मिलते हैं, और हाशिये की टिप्पणी यही कहती है। बाल्टिक गणराज्य, यूक्रेन और दूसरे गणराज्य, जिनमें राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों के उभार से सोवियत संघ टूटा, कामयाब हुए, स्वतंत्र देश बने और उनके आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन कहलाए। दूसरी ओर रूस के भीतर चेचन्या और दाग़िस्तान के हिंसक अलगाववादी आंदोलन कामयाब नहीं हुए, इसलिए मास्को उन्हें अलगाववादी मानता है और उनसे निपटने में सैन्य बमबारी तक की गई।
प्र. भारत और सोवियत संघ की आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराओं की समानताओं की एक सूची बनाएँ।
उत्तर:
1. दोनों ने अर्थव्यवस्था में राज्य को अग्रणी भूमिका दी और नियोजन अपनाया; भारत ने भी पंचवर्षीय योजनाओं के ज़रिये नियोजित विकास किया।
2. दोनों ने बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र खड़ा किया; सोवियत संघ ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की मदद की और भिलाई, बोकारो तथा विशाखापट्टनम के इस्पात कारखानों और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता दी।
3. दोनों समतामूलक समाज के आदर्श के प्रति प्रतिबद्ध रहे; भारत का संविधान भारत को समाजवादी गणराज्य कहता है।
4. दोनों में राज्य नागरिकों के कल्याण की ज़िम्मेदारी लेता रहा, जैसे रियायती शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य योजनाएँ।
5. दोनों ऐसी विश्व-व्यवस्था चाहते रहे जिसमें किसी एक शक्ति का बोलबाला न हो; आज भी भारत और रूस दोनों का सपना बहुध्रुवीय विश्व का है।
मुख्य अंतर भी लिखिए: भारत बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र और मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश रहा जहाँ निजी संपत्ति बनी रही, जबकि सोवियत संघ में एक ही पार्टी का शासन था और किसी अन्य दल या विपक्ष के लिए जगह नहीं थी।
प्र. सोवियत और अमरीकी दोनों खेमों के शीतयुद्ध के दौर के पाँच-पाँच देश चुनें, कक्षा में समूह बनाएँ और हर समूह अपने देश के शीतयुद्ध के दौर के तथा साम्यवाद के पतन के बाद के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हालात की जानकारी जुटाकर बताए कि दूसरी दुनिया के विघटन का उस देश पर क्या प्रभाव हुआ।
कैसे करें: यह समूह-परियोजना है, इसलिए इसका कोई एक उत्तर नहीं है। सोवियत खेमे से वारसा समझौते के पूर्वी यूरोपीय सदस्य, जैसे पोलैंड, हंगरी और चेकोस्लोवाकिया, चुने जा सकते हैं; अमरीकी खेमे से नाटो के सदस्य देश। हर देश के लिए 1991 से पहले और बाद की राजनीतिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और समाज की तुलना कीजिए और इस अध्याय की बातें जोड़िए: पूर्वी यूरोप में साम्यवादी शासन का अंत, बाल्टिक और पूर्वी यूरोप के देशों की यूरोपीय संघ और नाटो से जुड़ने की इच्छा, और शॉक थेरेपी की कठिनाइयाँ। किताब के कहे अनुसार अंत में यह ज़रूर बताइए कि उस देश के लोग बतौर नागरिक अपने बारे में क्या महसूस कर रहे थे।
प्रश्नावली के प्रश्न 1 से 5 तक सीधे वस्तुनिष्ठ रूप में बोर्ड परीक्षा में आते रहे हैं, और प्रश्न 7, 8 तथा 9 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नों के सबसे प्रिय आधार हैं। इनके उत्तरों के बिंदु याद कर लीजिए।