इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना कब हुई, और 24 अक्टूबर को क्या मनाया जाता है?
उत्तर: स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई। इसी वजह से 24 अक्टूबर संयुक्त राष्ट्रसंघ दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के मूल संस्थापक सदस्य 51 क्यों माने जाते हैं, जबकि चार्टर पर 50 देशों ने हस्ताक्षर किए थे?
उत्तर: 26 जून 1945 को चार्टर पर 50 देशों ने हस्ताक्षर किए, और पोलैंड ने 15 अक्टूबर को हस्ताक्षर किए। इस तरह मूल संस्थापक सदस्यों की संख्या 51 हो गई।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के वर्तमान महासचिव कौन हैं और उन्होंने यह पद कब सँभाला?
उत्तर: अन्तोनियो मनुएल दे ओलिवीरा गुटेरेस, जो पुर्तगाल से हैं। वे नौवें महासचिव हैं और उन्होंने यह पद 1 जनवरी 2017 को सँभाला।
प्र. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्यालय कहाँ है और उसमें कितने न्यायाधीश होते हैं?
उत्तर: मुख्यालय हेग में है। इसमें 15 न्यायाधीश होते हैं, जिनका चुनाव 9 वर्षों के लिए आम सभा और सुरक्षा परिषद् दोनों में पूर्ण बहुमत द्वारा होता है।
प्र. न्यासिता परिषद् कब से स्थगित है और क्यों?
उत्तर: 1 नवम्बर 1994 से। न्यासिता प्रणाली के अंतर्गत आने वाला अंतिम ‘ट्रस्ट टेरीटरी’ पलाउ आज़ाद हो गया, इसलिए परिषद् का काम ही बाक़ी नहीं रहा।
प्र. ‘वीटो’ यानी निषेधाधिकार क्या है?
उत्तर: सुरक्षा-परिषद् में हर सदस्य को एक वोट का अधिकार होता है, पर पाँच स्थायी सदस्यों में से कोई एक अपना नकारात्मक मत देकर किसी फ़ैसले को रोक सकता है, भले ही बाक़ी सभी सदस्य उसके पक्ष में हों। यही नकारात्मक मत वीटो है।
प्र. मानवाधिकारों की रक्षा में सक्रिय दो स्वयंसेवी संगठनों के नाम लिखिए।
उत्तर: एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच।
प्र. विश्व व्यापार संगठन किस संगठन का उत्तराधिकारी है और उसकी स्थापना कब हुई?
उत्तर: यह ‘जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ’ के उत्तराधिकारी के रूप में काम करता है, जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अस्तित्व में आया था। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना सन् 1995 में हुई।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. ‘लीग ऑव नेशंस’ क्यों बनी और उसका क्या हश्र हुआ?
उत्तर: पहले विश्वयुद्ध ने दुनिया को जगाया कि झगड़ों के निपटारे के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने का प्रयास ज़रूर किया जाना चाहिए, और इसी सोच से ‘लीग ऑव नेशंस’ का जन्म हुआ। शुरुआती सफलताओं के बावजूद यह संगठन दूसरा विश्वयुद्ध (1939-45) नहीं रोक सका, जिसमें पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा लोग मारे गए और घायल हुए। इसी नाकामी के बाद उसके उत्तराधिकारी के रूप में संयुक्त राष्ट्रसंघ बना।
प्र. अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्या है? किताब की अपनी परिभाषा के अनुसार समझाइए।
उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय संगठन कोई शक्तिशाली राज्य नहीं होता जिसकी अपने सदस्यों पर धौंस चलती हो। इसका निर्माण विभिन्न राज्य ही करते हैं और यह उन्हीं के मामलों के लिए जवाबदेह होता है। जब राज्यों में इस बात पर सहमति होती है कि कोई अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनना चाहिए, तभी ऐसा संगठन कायम होता है; और एक बार बन जाने पर यह समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान में सदस्य देशों की मदद करता है।
प्र. आम सभा और सुरक्षा-परिषद् के निर्णयों में क्या बुनियादी फ़र्क़ है?
उत्तर: आम सभा में 193 सदस्यों के प्रतिनिधि होते हैं और सभी को एकसमान मत मिलता है; प्रमुख निर्णयों के लिए दो-तिहाई और बाक़ी में सामान्य बहुमत चाहिए, लेकिन उसके निर्णय सभी सदस्यों पर बाध्यकारी नहीं होते। सुरक्षा-परिषद् में केवल 15 सदस्य हैं, पर उसके निर्णय सभी सदस्यों पर बाध्यकारी होते हैं। यही वजह है कि असली ताक़त की बहस सुरक्षा-परिषद् को लेकर होती है।
प्र. सुरक्षा-परिषद् के अस्थायी सदस्यों के बारे में तीन बातें लिखिए।
उत्तर: पहली, वे दस होते हैं और उनका चुनाव आम सभा दो वर्षों के लिए करती है। दूसरी, दो साल की अवधि के तत्काल बाद किसी देश को फिर से इस पद के लिए नहीं चुना जा सकता। तीसरी, उनका निर्वाचन इस तरह होता है कि विश्व के सभी महादेशों का प्रतिनिधित्व हो सके, और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि उन्हें वीटो का अधिकार नहीं है।
प्र. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में सब सदस्यों की राय का वजन बराबर क्यों नहीं है? आँकड़ों सहित बताइए।
उत्तर: इसमें मत सदस्यता के हिसाब से नहीं, हिस्सेदारी के हिसाब से बँटे हैं। समूह-7 के सात सदस्यों (अमरीका, जापान, जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन, इटली और कनाडा) के पास ही 41.29 प्रतिशत मत हैं, और अकेले अमरीका के पास 16.52 प्रतिशत मताधिकार हैं। इसकी तुलना में चीन के पास 6.09, भारत के पास 2.64, रूस के पास 2.59, ब्राज़ील के पास 2.22 और सऊदी अरब के पास 2.02 प्रतिशत मत हैं। कुल 190 सदस्य देशों (19 फरवरी 2024 की स्थिति) में यह असंतुलन साफ़ दिखता है।
प्र. अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी का काम क्या है?
उत्तर: इस संगठन की स्थापना 1957 में हुई। यह परमाण्विक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने और सैन्य उद्देश्यों में इसके इस्तेमाल को रोकने की कोशिश करता है। इसके अधिकारी नियमित रूप से विश्व की परमाण्विक सुविधाओं की जाँच करते हैं, ताकि नागरिक परमाणु-संयंत्रों का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए न हो।
प्र. सन् 1992 में आम सभा ने जो प्रस्ताव स्वीकृत किया, उसमें कौन-सी तीन मुख्य शिकायतें दर्ज थीं?
उत्तर: पहली, सुरक्षा परिषद् अब राजनीतिक वास्तविकताओं की नुमाइंदगी नहीं करती। दूसरी, इसके फ़ैसलों पर पश्चिमी मूल्यों और हितों की छाप होती है और इन फ़ैसलों पर चंद देशों का दबदबा होता है। तीसरी, सुरक्षा परिषद् में बराबर का प्रतिनिधित्व नहीं है।
प्र. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टें सरकारों को अक्सर नागवार क्यों लगती हैं, और फिर भी उनका महत्त्व क्या है?
उत्तर: एमनेस्टी इंटरनेशनल एक स्वयंसेवी संगठन है जो पूरे विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाता है और मानवाधिकारों से जुड़ी रिपोर्ट तैयार तथा प्रकाशित करता है। इन रिपोर्टों का ज़्यादा ज़ोर सरकारों द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार पर होता है, इसीलिए सरकारों को ये नागवार लगती हैं। बहरहाल, ये रिपोर्टें मानवाधिकारों से संबंधित अनुसंधान और तरफ़दारी में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्र. जून 2006 के लेबनान संकट में संयुक्त राष्ट्रसंघ की भूमिका पर क्या टिप्पणी की जाती है?
उत्तर: जून 2006 के दौरान इजराइल ने लेबनान पर हमला किया, यह कहते हुए कि उग्रवादी गुट हिज़बुल्लाह पर नियंत्रण करने के लिए हमला ज़रूरी है। भारी संख्या में आम नागरिक मारे गए और कई सार्वजनिक इमारतें तथा रिहायशी इलाके इजराइली बमबारी की चपेट में आए। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इस मामले पर एक प्रस्ताव बहुत बाद, यानी अगस्त में पास किया, और इजराइली सेना इस इलाके से अक्टूबर में ही वापस हो सकी। किताब में दिए गए दोनों कार्टून इसी देरी पर, यानी इस संकट में संयुक्त राष्ट्रसंघ और उसके महासचिव की भूमिका पर टिप्पणी करते हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि संगठन के पास प्रस्ताव पास करने की शक्ति तो है, पर उसकी रफ़्तार और असर सदस्य देशों की इच्छा पर निर्भर रहते हैं।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के सुधार को लेकर भारत का अपना पक्ष क्या है, स्थायी सदस्यता की माँग से अलग?
उत्तर: भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे में बदलाव के मसले को कई आधारों पर समर्थन दिया है, और उसका मानना है कि बदले हुए विश्व में संयुक्त राष्ट्रसंघ की मज़बूती और दृढ़ता ज़रूरी है। भारत इस बात का भी समर्थन करता है कि यह संगठन विभिन्न देशों के बीच सहयोग बढ़ाने और विकास को बढ़ावा देने में ज़्यादा बड़ी भूमिका निभाए। सबसे अहम, भारत का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के अजेंडे में विकास का मामला प्रमुख होना चाहिए, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी पूर्व शर्त है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के गठन तक पहुँचने वाले पाँच अहम पड़ाव तारीख़ों सहित लिखिए।
उत्तर: 1. अगस्त 1941: अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट और ब्रितानी प्रधानमंत्री चर्चिल द्वारा अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर।
2. जनवरी 1942: धुरी शक्तियों के ख़िलाफ़ लड़ रहे 26 मित्र-राष्ट्र अटलांटिक चार्टर के समर्थन में वाशिंग्टन में मिले, और दिसंबर 1943 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की घोषणा पर हस्ताक्षर हुए।
3. फरवरी 1945: तीन बड़े नेताओं (रूजवेल्ट, चर्चिल और स्टालिन) ने याल्टा सम्मेलन में प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय संगठन पर एक सम्मेलन करने का निर्णय किया।
4. अप्रैल-मई 1945: सेन फ़्रांसिस्को में दो महीने लंबा सम्मेलन संपन्न हुआ।
5. 26 जून 1945: चार्टर पर 50 देशों के हस्ताक्षर; पोलैंड ने 15 अक्टूबर को हस्ताक्षर किए, इसलिए मूल संस्थापक सदस्य 51 हैं। 24 अक्टूबर 1945 को स्थापना हुई और 30 अक्टूबर 1945 को भारत शामिल हुआ।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रमुख अंगों के नाम लिखिए और हर एक की एक-एक पहचान बताइए।
उत्तर: 1. सुरक्षा-परिषद्: 15 सदस्य, जिनमें पाँच स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार है; इसके निर्णय सभी सदस्यों पर बाध्यकारी हैं।
2. आम सभा: 193 सदस्यों के प्रतिनिधि, सभी को एकसमान मत; प्रमुख निर्णयों के लिए दो-तिहाई बहुमत, पर निर्णय बाध्यकारी नहीं।
3. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय: 15 न्यायाधीश, 9 वर्षों के लिए, मुख्यालय हेग में।
4. आर्थिक और सामाजिक परिषद्: 54 सदस्य, आम सभा द्वारा तीन वर्षों के लिए चुने गए, सभी भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व।
5. सचिवालय: अंतर्राष्ट्रीय स्टाफ, जिसका प्रधान महासचिव होता है; नियुक्ति सुरक्षा-परिषद् की सलाह पर आम सभा पाँच सालों के लिए करती है।
6. न्यासिता परिषद्: अंतिम ‘ट्रस्ट टेरीटरी’ पलाउ के आज़ाद होने के साथ 1 नवम्बर 1994 से स्थगित।
प्र. वीटो को समाप्त करने की माँग क्यों उठती है, और उसके विरुद्ध कौन-सा तर्क दिया जाता है?
उत्तर: माँग के पीछे यह सोच है कि निषेधाधिकार लोकतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के बीच बराबरी की धारणा से मेल नहीं खाता, इसलिए यह संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिए उचित या प्रासंगिक नहीं है। एक स्थायी सदस्य अकेले किसी फ़ैसले को रोक सकता है, भले ही अन्य सभी स्थायी और अस्थायी सदस्य उसके पक्ष में हों, और 1 जून 2018 तक इस अधिकार का इस्तेमाल सोवियत संघ/रूस ने 135, अमरीका ने 84, यूके ने 32, फ़्रांस ने 18 और चीन ने 11 बार किया।
विरुद्ध तर्क यह है कि स्थायी सदस्य ऐसे सुधार के लिए शायद ही राजी होंगे, और विश्व शायद अभी इतने आमूल-चूल बदलाव के लिए तैयार भी न हो। ख़तरा यह है कि वीटो न रहा तो सन् 1945 के समान इन ताकतवर देशों की दिलचस्पी संयुक्त राष्ट्रसंघ में न रहे, वे इससे बाहर रहकर अपनी रुचि के अनुसार काम करें, और उनके समर्थन के अभाव में यह संगठन प्रभावकारी न रह जाए।
प्र. शीतयुद्ध के बाद विश्व राजनीति में आए वे बदलाव लिखिए जिनकी वजह से संयुक्त राष्ट्रसंघ में सुधार की माँग उठी।
उत्तर: किताब सन् 1991 से आए ये बदलाव गिनाती है:
1. सोवियत संघ बिखर गया।
2. अमरीका सबसे ज़्यादा ताकतवर है।
3. सोवियत संघ के उत्तराधिकारी राज्य रूस और अमरीका के बीच अब संबंध कहीं ज़्यादा सहयोगात्मक हैं।
4. चीन बड़ी तेज़ी से एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है; भारत भी तेज़ी से इस दिशा में अग्रसर है।
5. एशिया की अर्थव्यवस्था अप्रत्याशित दर से तरक़्क़ी कर रही है।
6. अनेक नए देश संयुक्त राष्ट्रसंघ में शामिल हुए हैं, जो सोवियत संघ से आज़ाद हुए देश हैं अथवा पूर्वी यूरोप के भूतपूर्व साम्यवादी देश हैं।
7. विश्व के सामने चुनौतियों की एक पूरी नयी कड़ी है: जनसंहार, गृहयुद्ध, जातीय संघर्ष, आतंकवाद, परमाण्विक प्रसार, जलवायु में बदलाव, पर्यावरण की हानि और महामारी।
संयुक्त राष्ट्रसंघ का गठन 1945 की सच्चाइयों के अनुरूप हुआ था, इसलिए बदली हुई सच्चाइयों ने सुधार की माँग खड़ी कर दी।
प्र. सुरक्षा परिषद् के नए सदस्य के लिए कौन-से मानदंड सुझाए गए, और हर मानदंड पर क्या सवाल उठता है?
उत्तर: सुझाए गए मानदंड ये थे कि नया सदस्य बड़ी आर्थिक ताकत हो; बड़ी सैन्य ताकत हो; संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में उसका योगदान ज़्यादा हो; आबादी के लिहाज़ से बड़ा राष्ट्र हो; लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सम्मान करता हो; और अपने भूगोल, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति के लिहाज़ से विश्व की विविधता की नुमाइंदगी करता हो।
हर मानदंड की कुछ न कुछ वैधता है, पर सवाल भी उतने ही हैं: सदस्यता के लिए अर्थव्यवस्था या सैन्य-ताकत कितनी बड़ी होनी चाहिए? बजट में कितना योगदान करके कोई देश सदस्यता ख़रीद सकता है? बड़ी जनसंख्या बाधक है या सहायक? और अगर लोकतंत्र तथा मानवाधिकार ही कसौटी हो तो बेहतरीन रिकार्ड वाले देशों की कतार लग जाएगी, पर सवाल यह है कि क्या वे परिषद् के सदस्य के रूप में प्रभावकारी होंगे। सरकारें भी अपने हित और महत्त्वाकांक्षाओं के लिहाज़ से कुछ कसौटियों को फ़ायदेमंद और कुछ को नुकसानदेह मानती हैं।
प्र. सन् 2005 में 60वीं सालगिरह पर संयुक्त राष्ट्रसंघ को ज़्यादा प्रासंगिक बनाने के लिए कौन-से कदम उठाने का फ़ैसला हुआ?
उत्तर: सितम्बर 2005 में सभी सदस्य देशों के प्रमुख जुटे और सात कदम तय हुए:
1. शांति संस्थापक आयोग का गठन।
2. यदि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों को अत्याचारों से बचाने में असफल हो जाए तो विश्व-बिरादरी इसका उत्तरदायित्व ले, इस बात की स्वीकृति।
3. मानवाधिकार परिषद् की स्थापना, जो 2006 के 19 जून से सक्रिय है।
4. सहस्राब्दि विकास लक्ष्य को प्राप्त करने पर सहमति।
5. हर रूप-रीति के आतंकवाद की निंदा।
6. एक लोकतंत्र-कोष का गठन।
7. ट्रस्टीशिप काउंसिल (न्यासिता परिषद्) को समाप्त करने पर सहमति।
प्र. भारत को सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बनाने का विरोध किन आधारों पर किया जाता है?
उत्तर: 1. पड़ोसी पाकिस्तान, जिसके साथ भारत के संबंध दिक़्क़ततलब रहे हैं, इसका विरोध करता है, पर वह अकेला नहीं है।
2. कुछ देश भारत के परमाणु हथियारों को लेकर चिंतित हैं।
3. कुछ का मानना है कि पाकिस्तान के साथ संबंधों में कठिनाई के कारण भारत स्थायी सदस्य के रूप में अप्रभावी रहेगा।
4. कुछ अन्य देशों का मानना है कि भारत को शामिल किया गया तो उभरती हुई ताकत के रूप में ब्राज़ील, जर्मनी, जापान और शायद दक्षिण अफ़्रीका को भी शामिल करना पड़ेगा, जिसका ये देश विरोध करते हैं।
इसके साथ यह माँग भी है कि विस्तार हो तो अफ़्रीका और दक्षिण अमरीका को ज़रूर प्रतिनिधित्व मिले, क्योंकि मौजूदा ढाँचे में इन्हीं महादेशों की नुमाइंदगी नहीं है। इन सरोकारों को देखते हुए निकट भविष्य में भारत या किसी और देश के लिए स्थायी सदस्य बन पाना मुश्किल लगता है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने किस तरह के दो बुनियादी सुधारों का मसला है? दोनों की व्याख्या कीजिए और बताइए कि सहमति क्यों नहीं बन पाती।
उत्तर: बदलते परिवेश की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी संगठन में सुधार और विकास लाज़िमी है, और संयुक्त राष्ट्रसंघ भी इसका अपवाद नहीं। उसके सामने दो तरह के बुनियादी सुधारों का मसला है।
पहला, इस संगठन की बनावट और इसकी प्रक्रियाओं में सुधार। इसमें सबसे बड़ी बहस सुरक्षा परिषद् के कामकाज को लेकर है: स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि समकालीन विश्व राजनीति की वास्तविकताओं की बेहतर नुमाइंदगी हो, और ख़ास तौर पर एशिया, अफ़्रीका तथा दक्षिण अमरीका के ज़्यादा देशों को सदस्यता मिले। इसके अतिरिक्त अमरीका और पश्चिमी देश बजट से जुड़ी प्रक्रियाओं और प्रशासन में सुधार चाहते हैं।
दूसरा, इस संगठन के न्यायाधिकार में आने वाले मुद्दों की समीक्षा। यहाँ कुछ देश और विशेषज्ञ चाहते हैं कि संगठन शांति और सुरक्षा से जुड़े मिशनों में ज़्यादा प्रभावकारी अथवा बड़ी भूमिका निभाए, जबकि औरों की इच्छा है कि यह संगठन अपने को विकास तथा मानवीय भलाई के कामों (स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, जनसंख्या नियंत्रण, मानवाधिकार, लिंगगत न्याय और सामाजिक न्याय) तक सीमित रखे।
लगभग सभी देश सहमत हैं कि दोनों तरह के सुधार ज़रूरी हैं। सहमति इस बात पर नहीं बन पाती कि इसके लिए दरअसल ठीक करना क्या है, कैसे करना है और कब करना है। हर सरकार अपने हित और महत्त्वाकांक्षा के हिसाब से किसी कसौटी को फ़ायदेमंद और किसी को नुकसानदेह मानती है, और स्थायी सदस्य अपनी विशेष हैसियत छोड़ने को तैयार नहीं दिखते।
प्र. भारत सुरक्षा-परिषद् की स्थायी सदस्यता का दावेदार क्यों है? उसके पक्ष के तर्क विस्तार से लिखिए।
उत्तर: 1. जनसंख्या: भारत विश्व में सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, और विश्व की कुल-जनसंख्या का 1/5वाँ हिस्सा यहाँ निवास करता है। इतनी बड़ी आबादी की नुमाइंदगी के बिना परिषद् को प्रतिनिधिमूलक कहना कठिन है।
2. लोकतंत्र: भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों का सम्मान सुझाए गए मानदंडों में से एक है।
3. भागीदारी: भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की लगभग सभी पहलकदमियों में भाग लिया है, और शांति बहाल करने के प्रयासों में वह लंबे समय से ठोस भूमिका निभाता आ रहा है।
4. आर्थिक उभार: भारत तेज़ी से अंतर्राष्ट्रीय फलक पर आर्थिक-शक्ति बनकर उभर रहा है, जो एक और सुझाया गया मानदंड है।
5. वित्तीय जवाबदेही: भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में नियमित रूप से अपना योगदान दिया है और अपने भुगतान से कभी चूका नहीं है।
6. प्रतिनिधित्व का तर्क: भारत का मानना है कि आम सभा में सदस्य ख़ूब बढ़े जबकि परिषद् की संरचना स्थिर रही, जिससे उसके प्रतिनिधित्वमूलक चरित्र की हानि हुई है; परिषद् का विस्तार होने पर उसे विश्व-बिरादरी का ज़्यादा समर्थन मिलेगा।
भारत यह भी जानता है कि स्थायी सदस्यता का एक प्रतीकात्मक महत्त्व भी है: इससे पता चलता है कि किसी देश का अंतर्राष्ट्रीय मामलों में महत्त्व बढ़ रहा है, और इस बढ़ी हुई हैसियत का फ़ायदा उसकी विदेश नीति में मिलता है। जैसा किताब कहती है, अगर आपकी साख एक ताकतवर देश के रूप में है तो आपका प्रभाव ज़्यादा होगा।
प्र. एक-ध्रुवीय विश्व में अमरीका की ताकत पर अंकुश लगाना क्यों मुश्किल है, और फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ की क्या भूमिका बची रहती है?
उत्तर: अंकुश मुश्किल होने के कारण:
1. सोवियत संघ की ग़ैर-मौजूदगी में अब अमरीका एकमात्र महाशक्ति है, और अपनी सैन्य तथा आर्थिक ताकत के बूते वह संयुक्त राष्ट्रसंघ या किसी अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन की अनदेखी कर सकता है।
2. संगठन के भीतर भी उसका ख़ास प्रभाव है: वह बजट में सबसे ज़्यादा योगदान करने वाला देश है और उसकी वित्तीय ताकत बेजोड़ है।
3. संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीकी भू-क्षेत्र में स्थित है और उसके कई नौकरशाह अमरीकी नागरिक हैं, इससे भी उसका प्रभाव बढ़ जाता है।
4. अपने वीटो से वह हर उस प्रस्ताव को रोक सकता है जो उसे या उसके साथी राष्ट्रों को न जँचे, और महासचिव के चयन में भी उसकी बात बहुत वज़न रखती है। अपनी ताकत के बूते वह शेष विश्व में फूट भी डाल सकता है ताकि उसकी नीतियों का विरोध मंद पड़ जाए।
फिर भी बची हुई भूमिका:
संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीका की ताकत पर अंकुश लगाने में ख़ास सक्षम नहीं है, पर एकध्रुवीय विश्व में भी वह अमरीका और शेष विश्व के बीच विभिन्न मसलों पर बातचीत कायम कर सकता है, और इस संगठन ने ऐसा किया भी है। अमरीकी नेता अक्सर इसकी आलोचना करते हैं, लेकिन वे समझते हैं कि झगड़ों और सामाजिक-आर्थिक विकास के मसले पर इसी के जरिए 190 राष्ट्रों को एक साथ किया जा सकता है। शेष विश्व के लिए यह ऐसा मंच है जहाँ अमरीकी रवैये और नीतियों पर कुछ अंकुश लगाया जा सके, जहाँ किसी ख़ास नीति की आलोचना की सुनवाई हो, और जहाँ बीच का रास्ता निकालने तथा रियायत देने की बात कही-सोची जा सके।
प्र. “अंतर्राष्ट्रीय संगठन हर मर्ज़ की दवा नहीं लेकिन वे महत्त्वपूर्ण ज़रूर हैं।” उदाहरणों सहित समझाइए।
उत्तर: किताब यह बात दो जानकार लोगों के उद्धरणों के बाद कहती है, और उसके पीछे ठोस कारण गिनाती है।
1. युद्ध और शांति के मामलों में मदद: देशों के बीच मनमुटाव और झगड़े होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे युद्ध ठान लें। वे विभेद के मसलों पर बातचीत करके शांतिपूर्ण समाधान ढूँढ़ सकते हैं। वस्तुतः अधिकांश झगड़ों और विभेदों का समाधान बिना युद्ध के ही किया जाता है, बस इस तथ्य पर कम ध्यान जाता है।
2. बेहतर जीवन-स्थितियाँ: वे देशों की सहायता करते हैं ताकि हम सबकी बेहतर जीवन-स्थितियाँ कायम हों।
3. साथ मिलकर ही होने वाले काम: कुछ मसले इतने चुनौतीपूर्ण होते हैं कि उनसे तभी निपटा जा सकता है जब सभी साथ मिलकर काम करें। बीमारी इसकी एक मिसाल है, क्योंकि कुछ रोगों को तभी ख़त्म किया जा सकता है जब विश्व का हर देश अपनी आबादी को टीके लगाने में सहयोग करे। दूसरी मिसाल ग्लोबल वार्मिंग है: वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ने से तापमान बढ़ रहा है, इससे समुद्रतल की ऊँचाई बढ़ने का ख़तरा है, और तब समुद्रतटीय इलाके तथा बड़े-बड़े शहर डूब जाएँगे। हर देश अपने तरीके से समाधान ढूँढ़ सकता है, पर सबसे प्रभावकारी समाधान तो यही है कि तापवृद्धि को ही रोका जाए, जिसके लिए बड़े औद्योगिक देशों का सहयोग ज़रूरी है।
4. सहयोग को संभव बनाना: सहयोग की ज़रूरत पहचानना और सचमुच सहयोग करना दो अलग बातें हैं। लागत का भार कौन कितना उठाए, लाभ का बँटवारा न्यायोचित कैसे हो, और कोई मुकरे या दग़ा न करे, इन बिंदुओं पर देश हमेशा सहमत नहीं होते। एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन सूचनाएँ और उपाय जुटाने में मदद करता है और नियमों तथा नौकरशाही की एक रूपरेखा देता है, जिससे सदस्यों को भरोसा होता है कि लागत में सबकी समुचित साझेदारी होगी और समझौते की शर्तों का पालन होगा।
यही वजह है कि ये संगठन हर समस्या का हल नहीं, फिर भी अपरिहार्य हैं।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के अलावा जिन चार अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की चर्चा इस अध्याय में है, उनका परिचय दीजिए।
उत्तर: 1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष: यह वैश्विक स्तर की वित्त-व्यवस्था की देखरेख करता है और माँगे जाने पर वित्तीय तथा तकनीकी सहायता मुहैया करता है। 190 देश (19 फरवरी 2024 की स्थिति) इसके सदस्य हैं, लेकिन हर सदस्य की राय का वजन बराबर नहीं है: समूह-7 के पास 41.29 प्रतिशत और अकेले अमरीका के पास 16.52 प्रतिशत मत हैं।
2. विश्व बैंक: दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सन् 1944 में इसकी औपचारिक स्थापना हुई। इसकी गतिविधियाँ प्रमुख रूप से विकासशील देशों से संबंधित हैं। यह मानवीय विकास (शिक्षा, स्वास्थ्य), कृषि और ग्रामीण विकास (सिंचाई, ग्रामीण सेवाएँ), पर्यावरण सुरक्षा, आधारभूत ढाँचा (सड़क, शहरी विकास, बिजली) तथा सुशासन के लिए काम करता है। यह अपने सदस्य-देशों को आसान ऋण और अनुदान देता है, और ज़्यादा ग़रीब देशों को ये अनुदान वापस नहीं चुकाने पड़ते।
3. विश्व व्यापार संगठन: यह वैश्विक व्यापार के नियम तय करता है। स्थापना सन् 1995 में हुई और यह ‘जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ’ के उत्तराधिकारी के रूप में काम करता है। इसके 164 सदस्य हैं (29 जुलाई 2016 की स्थिति)। हर फ़ैसला सभी सदस्यों की सहमति से होता है, पर अमरीका, यूरोपीय संघ तथा जापान जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियाँ नियमों को अपने हित में बनवाने में कामयाब रही हैं, और विकासशील देशों की शिकायत रहती है कि कार्यविधि पारदर्शी नहीं है।
4. अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी: स्थापना 1957 में। यह परमाण्विक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देती है और सैन्य उद्देश्यों में इसके इस्तेमाल को रोकने की कोशिश करती है; इसके अधिकारी नियमित रूप से विश्व की परमाण्विक सुविधाओं की जाँच करते हैं।
इनके अलावा दो स्वयंसेवी संगठन भी अध्याय में हैं: एमनेस्टी इंटरनेशनल, जो पूरे विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाता है, और ह्यूमन राइट्स वॉच, जो अमरीका का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन है और जिसने बारूदी सुरंगों पर रोक, बाल सैनिकों का प्रयोग रोकने तथा अंतर्राष्ट्रीय दंड न्यायालय की स्थापना के अभियानों में मदद की है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक किस देश ने सबसे ज़्यादा बार वीटो का इस्तेमाल किया?
उत्तर: सोवियत संघ/रूस ने, 135 बार।
(ख) 1 अंक ये आँकड़े किस तारीख़ तक के हैं?
उत्तर: 1 जून 2018 तक के।
(ग) 2 अंक हाशिये की टिप्पणी किस बात की ओर इशारा करती है?
उत्तर: वह इस विडंबना की ओर इशारा करती है कि वीटो उन्हीं पाँच देशों के पास है जो पहले से सबसे ताकतवर हैं, जबकि किसी बड़ी ताक़त के दबाव से बचने की असली ज़रूरत कमज़ोर देशों को है। यही तर्क इस माँग की जड़ है कि निषेधाधिकार लोकतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के बीच बराबरी की धारणा से मेल नहीं खाता।
(क) 1 अंक इस सूची में भारत का योगदान कितना है?
उत्तर: 0.8 प्रतिशत।
(ख) 1 अंक बजट में सबसे ज़्यादा योगदान किस देश का है?
उत्तर: संयुक्त राज्य अमेरिका का, 22.0 प्रतिशत।
(ग) 2 अंक बजट में योगदान का संयुक्त राष्ट्रसंघ के भीतर के प्रभाव से क्या संबंध है? भारत के मामले में यह किस तरह दोधारी है?
उत्तर: सबसे बड़ा योगदानकर्ता होने के कारण अमरीका की वित्तीय ताकत बेजोड़ है, और यही उसके भीतरी प्रभाव का एक बड़ा स्रोत है। भारत के लिए यह दोधारी है: एक ओर बजट में ज़्यादा योगदान सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के सुझाए गए मानदंडों में गिना जाता है, और इस पैमाने पर भारत का हिस्सा छोटा है; दूसरी ओर भारत का दावा इस बात से मज़बूत होता है कि उसने योगदान नियमित रूप से दिया है और अपने भुगतान से कभी चूका नहीं है। इसीलिए किताब यह सवाल भी उठाती है कि कोई राष्ट्र बजट में कितना योगदान करे कि सदस्यता हासिल कर सके।