NCERT की पाठ्यपुस्तक समकालीन विश्व राजनीति के अध्याय 4 अंतर्राष्ट्रीय संगठन की प्रश्नावली के सभी 12 प्रश्न, ठीक उसी रूप में जैसे किताब (हिंदी संस्करण) में छपे हैं, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। अध्याय के हाशिये और कार्टूनों के प्रश्नों तथा कक्षा-गतिविधि के उत्तर अंत में दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
इस अध्याय की प्रश्नावली हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों में एक जैसी नहीं है। प्रश्न 6 (रिक्त स्थान) में हिंदी संस्करण में पाँच रिक्त स्थान हैं, अंग्रेज़ी में केवल चार। पाँचवाँ रिक्त स्थान मानवाधिकार संगठनों वाला है, और वह हिंदी संस्करण में ही मिलेगा। नीचे के सभी उत्तर हिंदी संस्करण की अपनी संख्या और विकल्पों के अनुसार दिए गए हैं।
1 सही या ग़लत बताइए
प्र. निषेधाधिकार (वीटो) के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। इनमें प्रत्येक के आगे सही या ग़लत का चिह्न लगाएँ।
(क) सुरक्षा-परिषद् के सिर्फ स्थायी सदस्यों को ‘वीटो’ का अधिकार है।
(ख) यह एक तरह की नकारात्मक शक्ति है।
(ग) सुरक्षा परिषद् के फ़ैसलों से असंतुष्ट होने पर महासचिव ‘वीटो’ का प्रयोग करता है।
(घ) एक ‘वीटो’ से भी सुरक्षा-परिषद् का प्रस्ताव नामंजूर हो सकता है।
उत्तर:
(क) सही। किताब के अनुसार सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अस्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार नहीं है; यह अधिकार केवल पाँच स्थायी सदस्यों के पास है।
(ख) सही। वीटो कोई प्रस्ताव पास कराने की ताक़त नहीं देता, वह केवल किसी फ़ैसले को रोक सकता है। स्थायी सदस्य का यही नकारात्मक मत वीटो कहलाता है।
(ग) ग़लत। महासचिव सचिवालय का प्रधान है, सुरक्षा-परिषद् का मतदाता नहीं। वीटो का अधिकार उसके पास होता ही नहीं।
(घ) सही। स्थायी सदस्यों में से कोई एक अपने निषेधाधिकार का प्रयोग करके किसी फ़ैसले को रोक सकता है, भले ही अन्य स्थायी सदस्यों और सभी अस्थायी सदस्यों ने उस फ़ैसले के पक्ष में मतदान किया हो।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के कामकाज के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं। इनमें से प्रत्येक के सामने सही या ग़लत का चिह्न लगाएँ।
(क) सुरक्षा और शांति से जुड़े सभी मसलों का निपटारा सुरक्षा-परिषद् में होता है।
(ख) मानवतावादी नीतियों का क्रियान्वयन विश्वभर में फैली मुख्य शाखाओं तथा एजेंसियों के मार्फत होता है।
(ग) सुरक्षा के किसी मसले पर पाँचों स्थायी सदस्य देशों का सहमत होना उसके बारे में लिए गए फैसले के क्रियान्वयन के लिए ज़रूरी है।
(घ) संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा के सभी सदस्य संयुक्त राष्ट्रसंघ के बाकी प्रमुख अंगों और विशेष एजेंसियों के स्वतः सदस्य हो जाते हैं।
उत्तर:
(क) ग़लत। किताब कहती है कि सदस्य देशों के बीच युद्ध और शांति तथा वैर-विरोध पर आम सभा में भी चर्चा होती है और सुरक्षा परिषद् में भी। इसलिए ये सभी मसले केवल सुरक्षा-परिषद् में नहीं निपटते।
(ख) सही। सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से निबटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्रसंघ विकास कार्यक्रम, शरणार्थी उच्चायोग, बाल कोष जैसी कई एजेंसियाँ हैं, जो दुनिया भर में फैली हैं।
(ग) सही। मतदान में हर सदस्य को एक वोट का अधिकार है, पर किसी एक स्थायी सदस्य का वीटो फ़ैसले को रोक देता है। इसलिए व्यवहार में पाँचों स्थायी सदस्यों का सहमत होना ज़रूरी हो जाता है।
(घ) ग़लत। आम सभा की सदस्यता अपने आप बाक़ी प्रमुख अंगों और विशेष एजेंसियों की सदस्यता नहीं देती। मिसाल के लिए सुरक्षा-परिषद् में केवल 15 सदस्य हैं और आर्थिक और सामाजिक परिषद् में 54, जिनका चुनाव आम सभा करती है।
2 वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्र. निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य सुरक्षा-परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव को ज़्यादा वज़नदार बनाता है?
(क) परमाणु क्षमता
(ख) भारत संयुक्त राष्ट्रसंघ के जन्म से ही उसका सदस्य है।
(ग) भारत एशिया में है।
(घ) भारत की बढ़ती हुई आर्थिक ताकत और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था
उत्तर: (घ) भारत की बढ़ती हुई आर्थिक ताकत और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था।
किताब में सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के लिए जो मानदंड सुझाए गए हैं, उनमें बड़ी आर्थिक ताकत होना और लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों का सम्मान करना शामिल है। भारत के बारे में किताब यही कहती है कि वह तेजी से अंतर्राष्ट्रीय फलक पर आर्थिक-शक्ति बनकर उभर रहा है और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। विकल्प (क) उल्टा असर डालता है, क्योंकि कुछ देश भारत के परमाणु हथियारों को लेकर चिंतित हैं; और (ख) तथा (ग) अपने आप में सदस्यता का आधार नहीं बनते।
प्र. परमाणु प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग और उसकी सुरक्षा से संबद्ध संयुक्त राष्ट्रसंघ की एजेंसी का नाम है
(क) संयुक्त राष्ट्रसंघ निरस्त्रीकरण समिति
(ख) अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी
(ग) संयुक्त राष्ट्रसंघ अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा समिति
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (ख) अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी।
इस संगठन की स्थापना 1957 में हुई। यह परमाण्विक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने और सैन्य उद्देश्यों में इसके इस्तेमाल को रोकने की कोशिश करता है। इसके अधिकारी नियमित रूप से विश्व की परमाण्विक सुविधाओं की जाँच करते हैं, ताकि नागरिक परमाणु-संयंत्रों का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए न हो।
प्र. विश्व व्यापार संगठन निम्नलिखित में से किस संगठन का उत्तराधिकारी है?
(क) जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ
(ख) जेनरल एरेंजमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ
(ग) विश्व स्वास्थ्य संगठन
(घ) संयुक्त राष्ट्रसंघ विकास कार्यक्रम
उत्तर: (क) जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ।
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना सन् 1995 में हुई और यह ‘जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ’ के उत्तराधिकारी के रूप में काम करता है, जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अस्तित्व में आया था। विकल्प (ख) में ‘एग्रीमेंट’ की जगह ‘एरेंजमेंट’ लिखा है, इसीलिए वह ग़लत है; ध्यान से पढ़िए, परीक्षा में यही चूक कराई जाती है।
3 रिक्त स्थानों की पूर्ति
प्र. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें।
(क) संयुक्त राष्ट्रसंघ का मुख्य उद्देश्य ————– है।
(ख) संयुक्त राष्ट्रसंघ का सबसे जाना-पहचाना पद ————– का है।
(ग) संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा-परिषद् में ————– स्थायी और ————– अस्थायी सदस्य हैं।
(घ) ————– संयुक्त राष्ट्रसंघ के वर्तमान महासचिव हैं।
(च) मानवाधिकारों की रक्षा में सक्रिय दो स्वयंसेवी संगठन ————– और ————– हैं।
उत्तर:
(क) अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों को रोकना और राष्ट्रों के बीच सहयोग की राह दिखाना।
(ख) महासचिव। किताब कहती है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का सबसे अधिक दिखने वाला सार्वजनिक चेहरा और उसका प्रधान प्रतिनिधि महासचिव होता है।
(ग) पाँच स्थायी और दस अस्थायी सदस्य।
(घ) अन्तोनियो मनुएल दे ओलिवीरा गुटेरेस (एंटोनियो गुटेरेस), जो नौवें महासचिव हैं और जिन्होंने 1 जनवरी 2017 को यह पद सँभाला।
(च) एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच।
4 सुमेलन
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ की मुख्य शाखाओं और एजेंसियों का सुमेल उनके काम से करें
1. आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् · 2. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय · 3. अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी · 4. सुरक्षा-परिषद् · 5. संयुक्त राष्ट्रसंघ शरणार्थी उच्चायोग · 6. विश्व व्यापार संगठन · 7. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष · 8. आम सभा · 9. विश्व स्वास्थ्य संगठन · 10. सचिवालय
(क) वैश्विक वित्त-व्यवस्था की देखरेख।
(ख) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संरक्षण।
(ग) सदस्य देशों के आर्थिक और सामाजिक कल्याण की चिंता।
(घ) परमाणु प्रौद्योगिकी का शांतिपूर्ण उपयोग और सुरक्षा।
(ड) सदस्य देशों के बीच मौजूद विवादों का निपटारा।
(च) आपातकाल में आश्रय तथा चिकित्सीय सहायता मुहैया करना।
(छ) वैश्विक मामलों पर बहस-मुबाहिसा
(ज) संयुक्त राष्ट्रसंघ के मामलों का समायोजन और प्रशासन
(झ) सबके लिए स्वास्थ्य
(ञ) सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार की राह आसान बनाना।
उत्तर:
1. आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् → (ग) सदस्य देशों के आर्थिक और सामाजिक कल्याण की चिंता।
2. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय → (ड) सदस्य देशों के बीच मौजूद विवादों का निपटारा।
3. अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी → (घ) परमाणु प्रौद्योगिकी का शांतिपूर्ण उपयोग और सुरक्षा।
4. सुरक्षा-परिषद् → (ख) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का संरक्षण।
5. संयुक्त राष्ट्रसंघ शरणार्थी उच्चायोग → (च) आपातकाल में आश्रय तथा चिकित्सीय सहायता मुहैया करना।
6. विश्व व्यापार संगठन → (ञ) सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार की राह आसान बनाना।
7. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष → (क) वैश्विक वित्त-व्यवस्था की देखरेख।
8. आम सभा → (छ) वैश्विक मामलों पर बहस-मुबाहिसा।
9. विश्व स्वास्थ्य संगठन → (झ) सबके लिए स्वास्थ्य।
10. सचिवालय → (ज) संयुक्त राष्ट्रसंघ के मामलों का समायोजन और प्रशासन।
5 वर्णनात्मक प्रश्न
प्र. सुरक्षा-परिषद् के कार्य क्या हैं?
उत्तर: सुरक्षा-परिषद् संयुक्त राष्ट्रसंघ का वह प्रमुख अंग है जिस पर अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के संरक्षण की ज़िम्मेदारी है। इसके मुख्य कार्य ये हैं:
1. सदस्य देशों के बीच युद्ध, शांति और वैर-विरोध के मसलों पर विचार करना और उनका शांतिपूर्ण समाधान निकालना।
2. ऐसे फ़ैसले लेना जो सभी सदस्यों पर बाध्यकारी होते हैं; इसी बाध्यकारी शक्ति में इसकी असली ताक़त है, क्योंकि आम सभा के निर्णय ऐसे नहीं होते।
3. शांति संस्थापक अभियानों और मिशनों को मंज़ूरी देना और उनकी देख-रेख करना।
4. अपने दस अस्थायी सदस्यों के ज़रिए विश्व के सभी महादेशों की भागीदारी सुनिश्चित करना, क्योंकि इनका निर्वाचन ही इस तरह होता है।
5. महासचिव की नियुक्ति के लिए आम सभा को सलाह देना, और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों के चुनाव में आम सभा के साथ भागीदारी करना।
6. अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी जैसे संबद्ध संगठनों के प्रति उत्तरदायित्व साझा करना, जो आम सभा और सुरक्षा-परिषद् दोनों के प्रति उत्तरदायी है।
इसके 15 सदस्यों में पाँच स्थायी सदस्य हैं, जिनके पास वीटो का अधिकार है, और दस अस्थायी सदस्य हैं, जिन्हें आम सभा दो वर्षों के लिए चुनती है।
प्र. भारत के नागरिक के रूप में सुरक्षा-परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष का समर्थन आप कैसे करेंगे? अपने प्रस्ताव का औचित्य सिद्ध करें।
उत्तर: भारत के नागरिक के रूप में मैं इन आधारों पर उसकी दावेदारी का समर्थन करूँगा:
1. जनसंख्या। भारत विश्व में सबसे बड़ी आबादी वाला देश है और विश्व की कुल-जनसंख्या का 1/5वाँ हिस्सा यहाँ निवास करता है। इतनी बड़ी आबादी की नुमाइंदगी के बिना परिषद् को सचमुच प्रतिनिधिमूलक नहीं कहा जा सकता, और ‘आबादी के लिहाज से बड़ा राष्ट्र’ किताब में सुझाए गए मानदंडों में से एक है।
2. लोकतंत्र। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और ‘लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों का सम्मान करने वाला देश’ भी सुझाए गए मानदंडों में शामिल है।
3. भागीदारी का रिकार्ड। भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की लगभग सभी पहलकदमियों में भाग लिया है, और शांति बहाल करने के प्रयासों में वह लंबे समय से ठोस भूमिका निभाता आ रहा है।
4. आर्थिक उभार। भारत तेजी से अंतर्राष्ट्रीय फलक पर आर्थिक-शक्ति बनकर उभर रहा है, जो ‘बड़ी आर्थिक ताकत’ वाले मानदंड को पूरा करता है।
5. वित्तीय जवाबदेही। भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में नियमित रूप से अपना योगदान दिया है और अपने भुगतान से कभी चूका नहीं है।
6. विकासशील देशों की आवाज़। आम सभा में अब ज़्यादातर सदस्य विकासशील देश हैं, और सुरक्षा परिषद् के फ़ैसलों का असर उन्हीं पर पड़ता है। भारत जैसा देश परिषद् में आकर उनकी बात रख सकता है।
औचित्य: भारत का अपना तर्क यह है कि परिषद् की सदस्य संख्या स्थिर रही जबकि आम सभा में सदस्य ख़ूब बढ़े, जिससे परिषद् के प्रतिनिधित्वमूलक चरित्र की हानि हुई है। परिषद् का विस्तार होने पर वह ज़्यादा प्रतिनिधिमूलक होगी और उसे विश्व-बिरादरी का ज़्यादा समर्थन मिलेगा, और परिषद् के कामकाज की सफलता इसी समर्थन पर निर्भर है। इसके अलावा स्थायी सदस्यता का एक प्रतीकात्मक महत्त्व भी है, जिससे पता चलता है कि किसी देश का अंतर्राष्ट्रीय मामलों में महत्त्व बढ़ रहा है, और इस बढ़ी हुई हैसियत का फ़ायदा उसकी विदेश नीति में मिलता है।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे को बदलने के लिए सुझाए गए उपायों के क्रियान्वयन में आ रही कठिनाइयों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें?
उत्तर: सुधार होने चाहिए, इस पर व्यापक सहमति है; असली मसला यह है कि सुधार कैसे किया जाए। कठिनाइयाँ इस तरह हैं:
1. क्या, कैसे और कब, इस पर सहमति नहीं। लगभग सभी देश मानते हैं कि ढाँचे-प्रक्रिया और न्यायाधिकार, दोनों तरह के सुधार ज़रूरी हैं, पर देशों के बीच सहमति इस बात पर नहीं है कि दरअसल ठीक करना क्या है, कैसे करना है और कब करना है।
2. मानदंडों का झगड़ा। नए स्थायी और अस्थायी सदस्यों के लिए छह मानदंड सुझाए गए: बड़ी आर्थिक ताकत, बड़ी सैन्य ताकत, बजट में ज़्यादा योगदान, बड़ी आबादी, लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सम्मान, तथा भूगोल-अर्थव्यवस्था-संस्कृति के लिहाज से विविधता की नुमाइंदगी। हर मानदंड की कुछ वैधता है, पर हर मानदंड पर सवाल भी हैं: अर्थव्यवस्था या सैन्य-ताकत कितनी बड़ी हो, बजट में कितना योगदान करके कोई देश सदस्यता हासिल कर सके, बड़ी जनसंख्या बाधक है या सहायक। सरकारें भी अपने हित और महत्त्वाकांक्षाओं के लिहाज से कुछ कसौटियों को फायदेमंद और कुछ को नुकसानदेह मानती हैं।
3. प्रतिनिधित्व का उलझा हुआ सवाल। क्या भौगोलिक बराबरी का अर्थ एशिया, अफ़्रीका, लातिनी अमरीका और कैरेबियाई क्षेत्र की एक-एक सीट है, या प्रतिनिधित्व महादेशों के बजाय क्षेत्र और उपक्षेत्र के आधार पर हो? भूगोल की जगह आर्थिक विकास को आधार बनाया जाए तो भी दिक़्क़त है, क्योंकि विकासशील देश विकास की अलग-अलग सीढ़ियों पर खड़े हैं। और संस्कृति को आधार बनाना और भी कठिन है, क्योंकि किसी एक ही राष्ट्र के भीतर विभिन्न संस्कृति-धाराएँ मौजूद होती हैं।
4. वीटो पर गतिरोध। कुछ का ज़ोर है कि पाँच स्थायी सदस्यों का निषेधाधिकार ख़त्म हो, क्योंकि यह लोकतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों के बीच बराबरी की धारणा से मेल नहीं खाता। पर समझ यह भी बनी है कि स्थायी सदस्य ऐसे सुधार के लिए शायद ही राजी होंगे, और यही सबसे बड़ी व्यावहारिक अड़चन है, क्योंकि हर बदलाव उन्हीं के वीटो से गुज़रना है।
5. ताकतवर देशों के अलग हो जाने का ख़तरा। वीटो न रहा तो सन् 1945 के समान इन देशों की दिलचस्पी संगठन में न रहे, वे बाहर रहकर अपनी रुचि के अनुसार काम करें, और उनके समर्थन के अभाव में यह संगठन प्रभावकारी न रह जाए।
6. न्यायाधिकार के मुद्दे भी पेंचदार हैं। शांति संस्थापक आयोग किस झगड़े में दख़ल दे, अत्याचारों से निपटने में विश्व-बिरादरी की जिम्मेदारी क्या हो, मानवाधिकार-उल्लंघन का स्तर कौन तय करे, आतंकवाद की कोई सर्वमान्य परिभाषा हो सकती है या नहीं, और लोकतंत्र को बढ़ावा देने में धन का इस्तेमाल कैसे हो, इन सब पर आम राय नहीं है।
मूल्यांकन: कुल मिलाकर कठिनाई तकनीकी नहीं, राजनीतिक है। सुधार का हर रास्ता उन्हीं देशों की सहमति से खुलता है जिनकी विशेषाधिकार वाली हैसियत सुधार से घटती है, और बाक़ी दुनिया इस पर एकमत नहीं कि उनकी जगह कौन आए। इसीलिए 1992 की शिकायतों और 1997 की जाँच के बाद भी परिषद् का आकार जस का तस बना हुआ है।
प्र. हालाँकि संयुक्त राष्ट्रसंघ युद्ध और इससे उत्पन्न विपदा को रोकने में नाकामयाब रहा है लेकिन विभिन्न देश अभी भी इसे बनाए रखना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक अपरिहार्य संगठन मानने के क्या कारण हैं।
उत्तर: किताब का निष्कर्ष यही है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में थोड़ी कमियाँ हैं, लेकिन इसके बिना दुनिया और बदहाल होगी। इसे अपरिहार्य मानने के कारण ये हैं:
1. बातचीत की जगह। देशों के बीच मनमुटाव और झगड़े होते हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि वे युद्ध ठान लें। यहाँ वे विभेद के मसलों पर बातचीत करके शांतिपूर्ण समाधान ढूँढ़ सकते हैं। जैसा शशि थरूर याद दिलाते हैं, चर्चिल के शब्दों में हथियार लड़ाने से बढ़िया है कि ज़बान लड़ाई जाए।
2. ज़्यादातर झगड़े यहीं सुलझते हैं। अधिकांश झगड़ों और विभेदों का समाधान बिना युद्ध के ही किया जाता है, बस इस तथ्य पर कम ध्यान जाता है।
3. साथ मिलकर ही होने वाले काम। कुछ मसले इतने चुनौतीपूर्ण होते हैं कि उनसे तभी निपटा जा सकता है जब सभी साथ मिलकर काम करें। कुछ रोगों को तभी ख़त्म किया जा सकता है जब विश्व का हर देश अपनी आबादी को टीके लगाने में सहयोग करे; और ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए विश्व के बड़े औद्योगिक देशों का सहयोग ज़रूरी है।
4. सहयोग को भरोसेमंद बनाना। सहयोग की ज़रूरत पहचानना और सचमुच सहयोग करना दो अलग बातें हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन नियमों और नौकरशाही की एक रूपरेखा दे सकता है, ताकि सदस्यों को यह विश्वास हो कि लागत में सबकी समुचित साझेदारी होगी, लाभ का बँटवारा न्यायोचित होगा और कोई सदस्य समझौते की शर्तों से मुकरेगा नहीं।
5. विकास और मानवीय भलाई। सामाजिक और आर्थिक मुद्दों के लिए इसकी कई एजेंसियाँ काम करती हैं, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्रसंघ विकास कार्यक्रम, शरणार्थी उच्चायोग और बाल कोष।
6. महाशक्ति पर कुछ अंकुश। एकध्रुवीय विश्व में शेष विश्व के लिए यही वह मंच है जहाँ अमरीकी रवैये और नीतियों की आलोचना की सुनवाई हो सके और बीच का रास्ता निकालने तथा रियायत देने की बात कही-सोची जा सके। अमरीकी नेता भी समझते हैं कि इसी के जरिए 190 राष्ट्रों को एक साथ किया जा सकता है।
7. बढ़ती पारस्परिक निर्भरता। आज विभिन्न समाजों और मसलों के बीच आपसी तार जुड़ते जा रहे हैं, और प्रौद्योगिकी यह सिद्ध कर रही है कि आने वाले दिनों में यह निर्भरता और बढ़ेगी। इसलिए संयुक्त राष्ट्रसंघ का महत्त्व भी निरंतर बढ़ेगा; ऐसे संगठन के बिना सात अरब से भी ज़्यादा लोग कैसे रहेंगे, इसकी कल्पना करना कठिन है।
प्र. संयुक्त राष्ट्रसंघ में सुधार का अर्थ है सुरक्षा परिषद् के ढाँचे में बदलाव। इस कथन का सत्यापन करें।
उत्तर: यह कथन काफ़ी हद तक सही है, और किताब की अपनी चर्चा भी इसी ओर झुकती है।
कथन के पक्ष में:
1. किताब साफ़ कहती है कि बनावट और प्रक्रियाओं में सुधार के अंतर्गत सबसे बड़ी बहस सुरक्षा परिषद् के कामकाज को लेकर है, और वह ख़ुद इस चर्चा में ज़्यादा ज़ोर ढाँचागत और प्रक्रियागत सुधारों पर देती है।
2. सन् 1992 में आम सभा के प्रस्ताव में जो तीन मुख्य शिकायतें दर्ज थीं, वे तीनों सुरक्षा परिषद् के बारे में ही थीं: वह राजनीतिक वास्तविकताओं की नुमाइंदगी नहीं करती, उसके फ़ैसलों पर पश्चिमी मूल्यों-हितों की छाप और चंद देशों का दबदबा है, और उसमें बराबर का प्रतिनिधित्व नहीं है।
3. 1 जनवरी 1997 को कोफी अन्नान ने जो जाँच शुरू करवाई, उसका उदाहरण-सवाल भी यही था कि क्या सुरक्षा परिषद् के नए सदस्य चुने जाने चाहिए।
4. सदस्यता के छह मानदंड, प्रतिनिधित्व की बहस और वीटो को ख़त्म करने की माँग, ये सब सुरक्षा परिषद् के ढाँचे से ही जुड़े हैं। भारत की भी सबसे बड़ी चिंता इसी परिषद् की संरचना है।
5. आम सभा में सदस्य 193 तक पहुँच गए, पर 1965 में 11 से 15 होने के बाद परिषद् का आकार जस का तस बना हुआ है, इसलिए असंतुलन भी यहीं सबसे तीखा है।
कथन की सीमा: फिर भी यह कहना पूरा सच नहीं होगा कि सुधार का अर्थ केवल यही है। किताब साफ़ कहती है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने दो तरह के बुनियादी सुधारों का मसला है: एक बनावट और प्रक्रियाओं का, और दूसरा उन मुद्दों की समीक्षा का जो इस संगठन के न्यायाधिकार में आते हैं। दूसरा हिस्सा परिषद् से बाहर का है, और 2005 में तय किए गए सात कदम इसका सबूत हैं: शांति संस्थापक आयोग, विश्व-बिरादरी के उत्तरदायित्व की स्वीकृति, मानवाधिकार परिषद्, सहस्राब्दि विकास लक्ष्य, आतंकवाद की निंदा, लोकतंत्र-कोष और न्यासिता परिषद् को समाप्त करना। अमरीका और पश्चिमी देश बजट-प्रक्रियाओं और प्रशासन में सुधार भी चाहते हैं, जो परिषद् के ढाँचे का मामला नहीं है।
निष्कर्ष: सुरक्षा परिषद् का ढाँचा सुधार की सबसे बड़ी और सबसे विवादित माँग ज़रूर है, इसलिए कथन का मूल भाव सही है; पर सुधार का दायरा उससे कुछ बड़ा है और उसमें संगठन के न्यायाधिकार तथा प्रशासन के सवाल भी शामिल हैं।
6 पाठ के बीच के प्रश्न (अध्याय के भीतर पूछे गए)
अध्याय अपने हाशिये पर, कार्टूनों के साथ और एक कक्षा-गतिविधि में भी प्रश्न पूछता है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर इन्हीं विचारों को परखते हैं, इसलिए पुस्तक के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
पाठगत प्रश्न 1. (2006 के लेबनान संकट पर संयुक्त राष्ट्रसंघ वाले दो कार्टूनों के पास हाशिये पर) यही बात तो वे संसद के बारे में कहते हैं। क्या हमें बतकही की ऐसी चौपालें वास्तव में चाहिए?
उत्तर: हाँ, उस अर्थ में जो अध्याय समझाता है। दोनों कार्टून लेबनान संकट में संयुक्त राष्ट्रसंघ की अप्रभाविता पर टिप्पणी करते हैं: जून 2006 में इजराइल ने लेबनान पर हमला किया, संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अगस्त में जाकर प्रस्ताव पारित किया और इजराइली सेना अक्टूबर में ही वापस हटी। फिर भी बातचीत की जगह का अपना मोल है। अध्याय में उद्धृत शशि थरूर का कहना है कि जैसा कि चर्चिल कहते थे, “हथियार लड़ाने से बढ़िया है कि ज़बान लड़ाई जाए”: एक ऐसी जगह का होना बेहतर है जहाँ दुनिया के सारे देश इकट्ठे हों और कभी-कभार अपनी बातों से एक-दूसरे का सर खाएँ, बनिस्पत लड़ाई के मैदान में एक-दूसरे का सर कलम करने के। विवाद में उलझे देश वहाँ विवादित मुद्दों पर चर्चा करके शांतिपूर्ण समाधान ढूँढ़ सकते हैं, और ज़्यादातर झगड़े वास्तव में युद्ध के बिना ही सुलझते हैं। संसद की तरह संयुक्त राष्ट्रसंघ भी धीमा होने के बावजूद उपयोगी है, क्योंकि बातचीत ही लड़ाई का विकल्प है।
पाठगत प्रश्न 2. (पाठ में बताए गए मसलों के अलावा) ऐसे मसलों या समस्याओं की सूची बनाइए जिन्हें सुलझाना किसी एक देश के लिए संभव नहीं है और जिनके लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन की ज़रूरत है।
उत्तर: पाठ बीमारी और विश्वव्यापी तापवृद्धि के उदाहरण देता है। अन्य मसले जिन्हें कोई एक देश नहीं सुलझा सकता: अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद; सीमाओं के पार नशीले पदार्थों की तस्करी और साइबर अपराध; युद्ध और आपदाओं से पैदा होने वाले शरणार्थी; समुद्रों और कई देशों से होकर बहने वाली नदियों का प्रदूषण; परमाणु हथियारों का प्रसार और परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा (अंतर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेंसी का काम); अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियम (विश्व व्यापार संगठन का काम) और विश्व की वित्त-व्यवस्था (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का काम); सुनामी जैसी आपदाएँ जो एक साथ कई देशों पर टूटती हैं; और मानवाधिकारों की रक्षा। हर मामले में अध्याय का तर्क लागू होता है: देश सहयोग की ज़रूरत तो पहचानते हैं, पर तरीके, लागत और लाभ के बँटवारे और समझौते के पालन पर हमेशा सहमत नहीं होते, और अंतर्राष्ट्रीय संगठन वे सूचनाएँ, नियम और तंत्र देता है जिनसे सहयोग संभव होता है।
पाठगत प्रश्न 3. संयुक्त राष्ट्रसंघ की अनेक एजेंसियों का यहाँ जिक्र किया गया है। हरेक एजेंसी की गतिविधियों के बारे में एक समाचार खोजें।
कैसे करें: यह खोज की गतिविधि है, इसलिए समाचार आपको स्वयं खोजने हैं। इस पृष्ठ पर अध्याय विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष और संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन का नाम लेता है। हर एजेंसी के लिए तारीख़, देश और एजेंसी ने क्या किया, यह लिखिए: जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन का टीकाकरण या रोग-नियंत्रण कार्यक्रम, शरणार्थियों के लिए शरणार्थी उच्चायोग की कार्रवाई, या बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए बाल कोष का कार्यक्रम। इससे अध्याय की यह बात स्पष्ट होती है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ केवल युद्ध और शांति ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक मसले भी देखता है।
पाठगत प्रश्न 4. (हाशिया) संयुक्त राष्ट्रसंघ में केवल लोकतांत्रिक नेताओं को ही अपने देश की नुमाइंदगी करने का हक होना चाहिए। आखिर किसी तानाशाह को देश की जनता की ओर से बोलने की अनुमति कैसे दी जा सकती है?
उत्तर: विचार आकर्षक है, पर अध्याय दिखाता है कि इसे लागू करना कठिन है। अंतर्राष्ट्रीय संगठन कोई शक्तिशाली राज्य नहीं होता जिसकी अपने सदस्यों पर धौंस चलती हो; इसका निर्माण विभिन्न राज्य ही करते हैं, और इसमें लगभग सभी स्वतंत्र देश शामिल हैं। अगर केवल लोकतंत्रों को प्रतिनिधित्व मिले तो बहुत-से देश बाहर हो जाएँगे, और संयुक्त राष्ट्रसंघ वह एकमात्र जगह नहीं रह जाएगा जहाँ मित्र और शत्रु, सभी देश आपस में बात कर सकें। किसे लोकतांत्रिक माना जाए, यह तय करना भी अपने-आप में एक विवादित राजनीतिक सवाल बन जाएगा। सुरक्षा परिषद् की सदस्यता के लिए सुझाए गए «लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सम्मान» वाले मानदंड पर भी अध्याय यही पूछता है कि ऐसे देश परिषद् के सदस्य के रूप में कितने प्रभावकारी होंगे। लोकतंत्र को दूसरे तरीकों से बढ़ावा दिया जा सकता है, जैसे 2005 में तय किया गया लोकतंत्र-कोष।
कक्षा-गतिविधि (चरण). कक्षा को छः समूहों में बाँटें; हर समूह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए सुझाए गए छह मानदंडों में से किसी एक का पालन करे और उसी मानदंड के आधार पर स्थायी सदस्यों की अपनी सूची बनाए (जैसे जनसंख्या के मानदंड वाला समूह पाँच सर्वाधिक जनसंख्या वाले देशों की सूची बनाएगा), और फिर अपनी सूची तथा अपने मानदंड के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करे।
कैसे करें: यह भूमिका-अभिनय है, इसलिए इसका कोई एक उत्तर नहीं है। छह मानदंड हैं: बड़ी आर्थिक ताकत, बड़ी सैन्य ताकत, संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में ज़्यादा योगदान, बड़ी जनसंख्या, लोकतंत्र और मानवाधिकारों का सम्मान, और ऐसा देश जो भूगोल, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के लिहाज़ से विश्व की विविधता का प्रतिनिधित्व करे। अध्याय की तालिका मदद करेगी: बजट वाला समूह 2019 के संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में सबसे ज़्यादा योगदान करने वाले देशों की तालिका (अमरीका 22.0, चीन 12.0, जापान 8.5 प्रतिशत आदि) ले सकता है। सभी सूचियों की तुलना करें, देखें कि कितने नाम साझा हैं और भारत कितनी बार आता है, और अंत में इस पर खुली चर्चा करें कि कौन-सा मानदंड अपनाया जाए।
पाठगत प्रश्न 5. (हाशिया) यह बात बिलकुल ग़लत है। असल में वीटो की ज़रूरत तो कमजोर देशों को है, उनको नहीं जिनके पास पहले से बहुत ताकत है।
उत्तर: यह टिप्पणी उसी आलोचना को दोहराती है जो अध्याय दर्ज करता है: बहुत-से लोग मानते हैं कि वीटो संयुक्त राष्ट्रसंघ में लोकतंत्र और संप्रभु बराबरी की धारणा के ख़िलाफ़ है और अब यह न तो उचित है न प्रासंगिक। कमज़ोर देशों के पास अपने ख़िलाफ़ होने वाले फ़ैसलों से ऐसा कोई बचाव नहीं है। पर अध्याय दूसरा पक्ष भी देता है: स्थायी सदस्य ऐसे सुधार पर शायद ही राज़ी होंगे, और वीटो न हो तो इस बात का ख़तरा है कि 1945 की तरह ताकतवर देशों की दिलचस्पी संयुक्त राष्ट्रसंघ में न रहे, वे इससे बाहर रहकर अपनी मर्ज़ी से काम करें और उनके समर्थन के अभाव में यह संगठन प्रभावकारी न रह जाए।
पाठगत प्रश्न 6. सतत विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) के बारे में पता करें।
कैसे करें: यह खोज की गतिविधि है। अध्याय सतत विकास लक्ष्यों का दो बार जिक्र करता है: बान की मून ने सहस्राब्दि विकास लक्ष्य और सतत विकास लक्ष्य पर ध्यान दिया, और अध्याय पूछता है कि जब इतने सारे देश अभी भी विकासशील दुनिया का हिस्सा हैं, तब संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिए ऐसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों को पाना कहाँ तक व्यावहारिक है। पता करें कि कुल कितने लक्ष्य हैं, उन्हें किस वर्ष तक पूरा करना है, उनमें से दो-तीन लक्ष्य कौन-से हैं (जैसे ग़रीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता और जलवायु से जुड़े), और भारत उन्हें पाने के लिए क्या कर रहा है।
पाठगत प्रश्न 7. (दारफुर पर कार्टून) दारफुर की हालत की एक बानगी। आपका क्या मानना है, संयुक्त राष्ट्रसंघ इस तरह की स्थितियों में किस प्रकार हस्तक्षेप कर सकता है? क्या इसके लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के न्यायाधिकार में बदलाव की ज़रूरत है?
उत्तर: संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद् के ज़रिए कदम उठा सकता है: प्रस्ताव पारित करना, प्रतिबंध लगाना, शांति-सेना भेजना, और शरणार्थी उच्चायोग तथा बाल कोष जैसी एजेंसियों के ज़रिए राहत पहुँचाना। 2005 की बैठक में यह स्वीकार किया गया कि यदि कोई राष्ट्र अपने नागरिकों को अत्याचारों से बचाने में असफल हो तो विश्व-बिरादरी इसका उत्तरदायित्व ले, और शांति संस्थापक आयोग का गठन किया गया, जिससे संयुक्त राष्ट्रसंघ का दायरा पहले ही कुछ बढ़ा है। पर अध्याय इसकी सीमाएँ भी बताता है: आयोग किस झगड़े में दखल दे, क्या हर झगड़े में दखल देना उचित या संभव होगा, और किस स्तर का मानवाधिकार-उल्लंघन हो रहा है तथा क्या कार्रवाई की जाए, यह कौन तय करेगा? चूँकि किसी भी स्थायी सदस्य का वीटो फ़ैसले को रोक सकता है, प्रभावी हस्तक्षेप के लिए स्थायी सदस्यों की सहमति ज़रूरी है, और जब कोई सरकार अपने ही लोगों की रक्षा न करे तब देश के भीतर कार्रवाई के लिए एक स्पष्ट न्यायाधिकार भी चाहिए।
पाठगत प्रश्न 8. (हाशिया) क्या हम पाँच बड़े दादाओं की दादागिरी खत्म करना चाहते हैं या उनमें शामिल होकर एक और दादा बनना चाहते हैं?
उत्तर: यह प्रश्न भारत की स्थिति के एक तनाव की ओर इशारा करता है। भारत का तर्क है कि आम सभा में सदस्यों की संख्या ख़ूब बढ़ी जबकि सुरक्षा परिषद् की संरचना स्थिर रही, जिससे उसके प्रतिनिधित्वमूलक चरित्र की हानि हुई, और विकासशील देशों की भी उसके फ़ैसलों में भूमिका होनी चाहिए। साथ ही भारत स्वयं स्थायी सदस्य बनना चाहता है, और स्थायी सदस्यता ताकत का प्रतीक भी है जिसका फ़ायदा विदेश नीति में मिलता है। संगत उत्तर दोनों को जोड़ता है: भारत का दावा परिषद् को ज़्यादा प्रतिनिधित्वमूलक और व्यापक बनाने (ज़्यादा विकासशील देश, अफ़्रीका और दक्षिण अमरीका का प्रतिनिधित्व) और भारत के अपने रिकार्ड (जनसंख्या, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, शांति-अभियानों में योगदान, बजट में नियमित भुगतान) पर टिका होना चाहिए, न कि केवल पाँच बड़ों के विशेषाधिकार पाने पर।
पाठगत प्रश्न 9. (हाशिया) अगर संयुक्त राष्ट्रसंघ किसी को न्यूयार्क बुलाए और अमरीका उसे वीजा न दे तो क्या होगा?
उत्तर: वह व्यक्ति बैठक में नहीं पहुँच पाएगा और संयुक्त राष्ट्रसंघ का काम बाधित होगा। यह अमरीकी प्रभाव के उस स्रोत का उदाहरण है जिसे अध्याय गिनाता है: संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीकी भू-क्षेत्र में स्थित है और इस कारण भी इसमें अमरीका का प्रभाव बढ़ जाता है। बजट में सबसे ज़्यादा योगदान, संयुक्त राष्ट्रसंघ के कई नौकरशाहों का अमरीकी नागरिक होना और वीटो, इन सबके साथ यही वजह है कि अध्याय के अनुसार संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीका का बहुत बड़ा प्रतिसंतुलन नहीं है, हालाँकि वह ऐसा मंच ज़रूर है जहाँ बाक़ी दुनिया अमरीका से बातचीत कर उसके रवैये और नीतियों को बदलने की कोशिश कर सकती है।
प्रश्नावली के प्रश्न 1, 2 और 7 सीधे वस्तुनिष्ठ रूप में बोर्ड परीक्षा में आते रहे हैं, और प्रश्न 9, 10 तथा 12 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्नों के सबसे प्रिय आधार हैं। प्रश्न 6 का पाँचवाँ रिक्त स्थान हिंदी संस्करण की अपनी ख़ासियत है, इसे छोड़िए मत।