NCERT की मनोविज्ञान पुस्तक, अध्याय 7: “सामाजिक प्रभाव एवं समूह प्रक्रम” के अंत में दिए गए सभी 5 समीक्षात्मक प्रश्नों के पूर्ण उत्तर। इस पुस्तक में औपचारिक “अभ्यास” खंड नहीं है, “समीक्षात्मक प्रश्न” ही इसका स्थान लेते हैं; यही 5 प्रश्न हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में एक-दूसरे से मेल खाते हैं। इनके बाद अध्याय के भीतर पूछे गए प्रश्न और भीतर छपे तीनों क्रियाकलाप (7.1 से 7.3) दिए गए हैं।
प्र. औपचारिक एवं अनौपचारिक समूह तथा अंतः एवं बाह्य समूहों की तुलना कीजिए एवं अंतर बताइए।
उत्तर: औपचारिक एवं अनौपचारिक समूह इस बात में भिन्न होते हैं कि समूह के प्रकार्य कितनी स्पष्टता से बताए गए हैं। औपचारिक समूह में सदस्यों के प्रकार्य एवं भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से घोषित होती हैं, समूह विशिष्ट नियमों या विधि पर आधारित होता है, और प्रतिमानों का एक समुच्चय व्यवस्था बनाए रखने में सहायक होता है: पुस्तक का उदाहरण विश्वविद्यालय है। अनौपचारिक समूह का निर्माण नियमों या विधि पर आधारित नहीं होता, बल्कि सदस्यों में घनिष्ठ संबंध होता है। अंतःसमूह और बाह्य समूह एक अलग प्रकार का भेद है: “अंतःसमूह” स्वयं के समूह को कहते हैं, जिसके लिए “हमलोग” शब्द प्रयुक्त होता है, जबकि “बाह्य समूह” दूसरे समूह को कहते हैं, जिसके लिए “वे” शब्द प्रयुक्त होता है। अंतःसमूह के सदस्यों को सामान्यतः समान, अनुकूल दृष्टि से और वांछनीय विशेषकों वाला माना जाता है, जबकि बाह्य समूह के सदस्यों को भिन्न रूप से और प्रायः नकारात्मक रूप से देखा जाता है। पुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि यद्यपि इस प्रकार का संवर्गीकरण करना एक सामान्य बात है, फिर भी ये संवर्ग वास्तविक नहीं हैं और हमलोगों के द्वारा बनाए गए हैं; कुछ संस्कृतियों, जैसे भारत, में बहुविधता को सम्मान दिया जाता है।
प्र. क्या आप किसी समूह के सदस्य हैं? वह क्या है जिसने आपको इस समूह में सम्मिलित होने के लिए अभिप्रेरित किया? इसकी विवेचना कीजिए।
उत्तर: यह एक व्यक्तिगत, चिंतनशील प्रश्न है जिसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है, पर एक अच्छा उत्तर अपनी समूह-सदस्यता को पुस्तक के छह कारणों से जोड़ेगा: सुरक्षा (संरक्षण और कम असुरक्षा का भाव), प्रतिष्ठा या हैसियत (महत्वपूर्ण समझे जाने वाले समूह से मिलने वाली पहचान), आत्म-सम्मान (आत्म-मूल्य और सकारात्मक सामाजिक अनन्यता), मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक आवश्यकताओं की संतुष्टि (आत्मीयता-भावना, ध्यान देना-पाना), लक्ष्य प्राप्ति (जो अकेले संभव न हो, समूह से संभव हो), और ज्ञान एवं जानकारी (समूह से दृष्टिकोण का विस्तार)। उदाहरण के लिए: “मैं अपने विद्यालय के वाद-विवाद क्लब का सदस्य हूँ। मैं मुख्य रूप से आत्म-सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए जुड़ा: अंतर-विद्यालयी वाद-विवाद जीतने से मुझे गर्व और पहचान मिली; और ज्ञान एवं जानकारी के लिए भी, क्योंकि अन्य सदस्यों के साथ विषयों पर चर्चा से मेरी समझ का विस्तार हुआ।”
प्र. समूह निर्माण को समझने में टकमैन का अवस्था मॉडल किस प्रकार से सहायक है?
उत्तर: टकमैन का मॉडल समूह-निर्माण को पाँच विकासात्मक अवस्थाओं में बाँटता है, जिससे यह समझना आसान होता है कि समूह के शुरुआती दिन बाद के स्थायी कार्यकरण से अलग क्यों महसूस होते हैं। निर्माण या आकृतिकरण अवस्था में समूह, उसके लक्ष्य और उसे प्राप्त करने के तरीके को लेकर बड़ी अनिश्चितता होती है, साथ ही उत्तेजना और भय दोनों रहते हैं, जब सदस्य एक दूसरे को जानने का प्रयास करते हैं। इसके बाद विप्लवन या झंझावात अवस्था आती है, जिसमें लक्ष्य कैसे प्राप्त हो, समूह और संसाधनों को कौन नियंत्रित करे, और कौन क्या कार्य करे, इसे लेकर समूह के भीतर आपस में द्वंद्व होता है: यह अवस्था तब समाप्त होती है जब नेतृत्व का पदानुक्रम और स्पष्ट साझा दृष्टिकोण उभरता है। प्रतिमान या मानक निर्माण अवस्था में सदस्य समूह-व्यवहार से जुड़े साझा प्रतिमान विकसित करते हैं, जिससे एक सकारात्मक समूह अनन्यता बनती है। निष्पादन अवस्था तक समूह की संरचना विकसित होकर सभी सदस्यों द्वारा स्वीकृत हो चुकी होती है, और समूह साथ मिलकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है: कुछ समूहों के लिए यह अंतिम अवस्था हो सकती है। तथापि कुछ समूहों, जैसे विद्यालय समारोह की आयोजन समिति, के लिए एक अन्य अवस्था समापन हो सकती है, जिसमें कार्य पूरा होने पर समूह भंग किया जा सकता है। इस मॉडल से यह भी समझ आता है कि विप्लवन या झंझावात समूह-विकास की एक अवस्था है, और यह कि समूह हमेशा इतने व्यवस्थित ढंग से अवस्थाओं से नहीं गुज़रते: कई अवस्थाएँ एक साथ चल सकती हैं, समूह आगे-पीछे भी जा सकता है, या कुछ अवस्थाएँ छूट भी सकती हैं।
प्र. समूह हमारे व्यवहार को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं?
उत्तर: पुस्तक के अपने सारांश में समूह के दो मुख्य प्रभाव गिनाए गए हैं: सामाजिक सुकरीकरण और सामाजिक स्वैराचार; अध्याय आगे एक तीसरा प्रभाव, समूह ध्रुवीकरण, भी विस्तार से बताता है। पहला, सामाजिक सुकरीकरण: दूसरों की उपस्थिति से भाव-प्रबोधन (उत्तेजना) उत्पन्न होता है, जो उन कार्यों में प्रदर्शन बढ़ा सकती है जिनमें व्यक्ति पहले से अच्छा है, बशर्ते उसके प्रयास का अलग-अलग मूल्यांकन हो रहा हो। दूसरा, सामाजिक स्वैराचार: एक सामूहिक कार्य पर, जिसमें परिणाम अन्य सदस्यों के साथ मिला दिए जाते हैं (जैसे रस्साकशी, जहाँ किसी एक सदस्य द्वारा लगाया गया बल अलग से पहचाना नहीं जा सकता), व्यक्तिगत प्रयास में कमी आना। लताने के प्रयोग ने इसे प्रत्यक्ष रूप से दिखाया: जैसे-जैसे समूह का आकार अकेले से 2, 4 और 6 तक बढ़ा, कुल उत्पन्न शोर बढ़ा, पर प्रत्येक सहभागी द्वारा उत्पन्न शोर वास्तव में घट गया। यह इसलिए होता है क्योंकि सदस्य कम व्यक्तिगत उत्तरदायित्व महसूस करते हैं, जानते हैं कि उनके योगदान का अलग मूल्यांकन नहीं होगा, उनके समूह के निष्पादन की तुलना दूसरे समूहों से नहीं होती, समन्वय ख़राब होता है, या उनके लिए उसी समूह की सदस्यता आवश्यक नहीं होती। तीसरा प्रभाव है समूह ध्रुवीकरण: समूह में विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप समूह की प्रारंभिक स्थिति का और मज़बूत होना, जिससे समूह अकेले व्यक्तियों की तुलना में चरम निर्णय लेने की अधिक संभावना रखते हैं: जैसा पुस्तक के उदाहरण में दिखता है, जहाँ घूस लेते पकड़े गए कर्मचारी का दंड तय करने वाले सहयोगी उसे अपराध से मुक्त कर सकते हैं या नौकरी से निकालने का निर्णय ले सकते हैं, न कि अनैतिक कार्य के अनुरूप दंड दें। यह इसलिए होता है क्योंकि सदस्यों को समान विचार वालों से नए समर्थक तर्क मिलते हैं, उन्हें लगता है कि उनका विचार “अनुरूपता प्रभाव” के रूप में मान्य हो रहा है, और वे समान विचार वालों को अपना अंतःसमूह मानकर अनुरूपता दिखाने लगते हैं, जिससे उनका मत और मज़बूत हो जाता है।
प्र. समूहों में सामाजिक स्वैराचार को कैसे कम किया जा सकता है? अपने विद्यालय में सामाजिक स्वैराचार की किन्हीं दो घटनाओं पर विचार कीजिए। आपने इसे कैसे दूर किया?
उत्तर: पुस्तक सामाजिक स्वैराचार कम करने के पाँच उपाय बताती है: (i) हर सदस्य के व्यक्तिगत प्रयास को पहचानने योग्य बनाना, (ii) सफल कार्य-निष्पादन के लिए सदस्यों को प्रतिबद्ध कर कठोर परिश्रम का दबाव बढ़ाना, (iii) कार्य के प्रकट महत्त्व या मूल्य को बढ़ाना, (iv) लोगों को यह अनुभव कराना कि उनका व्यक्तिगत योगदान महत्वपूर्ण है, और (v) समूह संसक्तता को प्रबल करना, जिससे सफल परिणाम की अभिप्रेरणा बढ़ती है। विद्यालय की दो सामान्य घटनाएँ, और इन सिद्धांतों से उनका समाधान: (1) किसी सामूहिक परियोजना में जब एक या दो छात्र ही अधिकांश कार्य करते हैं और बाकी “स्वैराचार” करते हैं, तो अध्यापक हर सदस्य को एक अलग, पहचानने योग्य उप-कार्य सौंप सकते हैं जिस पर उनका नाम जुड़ा हो, जिससे हर व्यक्ति का योगदान अलग से दिखाई और मूल्यांकित हो सके: यह सीधे “पहचानने योग्य प्रयास” वाले उपाय का प्रयोग है। (2) विद्यालय के किसी आयोजन से पहले सफ़ाई या सजावट के कार्य में, जहाँ बड़े समूह में छात्र अकेले की तुलना में कम प्रयास करते हैं, बड़े समूह को छोटी, स्पष्ट रूप से उत्तरदायी टीमों में बाँटकर हर टीम को एक निश्चित लक्ष्य देना, और सदस्यों को यह याद दिलाना कि यह कार्य आयोजन की सफलता के लिए कितना महत्वपूर्ण है, कार्य के प्रकट महत्त्व और हर सदस्य के योगदान के महत्त्व, दोनों को बढ़ाता है: सीधे इन्हीं दो उपायों का प्रयोग है।
अध्याय के भीतर के प्रश्न। अध्याय अपने पाठ में कुछ प्रश्न पूछता है। ये चिंतनशील प्रश्न हैं, इसलिए नीचे अध्याय के विचारों पर आधारित मार्गदर्शन दिया गया है।
प्र. क्या आप कभी दूर ऐसे स्थान पर रहे हैं जहाँ आपका परिवार, विद्यालय एवं मित्रों का साथ न रहा हो? आपने कैसा अनुभव किया? क्या आपने अनुभव किया कि आपके जीवन में किसी महत्वपूर्ण चीज़ का अभाव था?
उत्तर (मार्गदर्शन): ऐसे किसी अनुभव का ईमानदारी से वर्णन कीजिए। अध्याय की बात यह है कि परिवार, कक्षा और मित्र ऐसे समूह हैं जो आवश्यक सहायता एवं सुविधा देते हैं और हमारी संवृद्धि एवं विकास को सुकर बनाते हैं, इसलिए इन सबसे दूर रहने पर प्रायः किसी महत्वपूर्ण चीज़ का अभाव अनुभव होता है।
प्र. इन दोनों चित्रों को देखिए।
उत्तर (मार्गदर्शन): चित्र अ एक फुटबाल टीम है: एक समूह, जिसमें सदस्य एक दूसरे से अंतःक्रिया करते हैं और उनकी भूमिकाएँ तथा लक्ष्य होते हैं। चित्र ब मैच देख रहे दर्शकगण हैं: ऐसे व्यक्तियों का मात्र एकत्रीकरण जो संयोगवश एक ही स्थान पर एक ही समय पर उपस्थित हैं।
प्र. यदि आप एक ही कॉलोनी में नहीं रहते, एक ही विद्यालय में नहीं जाते या एक ही खेल-मैदान में नहीं खेलते तो क्या आप किसी के मित्र होते?
उत्तर (मार्गदर्शन): संभवतः नहीं। एक ही व्यक्तियों से पुनरावृत्त अंतःक्रियाएँ हमें उन्हें समझने और उनकी अभिरुचियों एवं अभिवृत्तियों को जानने का अवसर देती हैं, और समान अभिरुचि, अभिवृत्ति तथा पृष्ठभूमि समूह के सदस्यों के प्रति हमारी पसंद के मुख्य निर्धारक हैं।
प्र. हम ऐसे लोगों को क्यों पसंद करते हैं जो हमारी तरह या हमारे समान होते हैं?
उत्तर: पुस्तक दो व्याख्याएँ देती है। (1) व्यक्ति संगति पसंद करता है और ऐसे संबंधों को पसंद करता है जो संगत हों; जब दो व्यक्ति एक जैसे होते हैं तो वहाँ संगति होती है और दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं। (2) अपने जैसे व्यक्ति हमारे मत और मूल्यों को प्रबलित करते हैं और उन्हें मान्यता देते हैं; हमें अनुभव होता है कि हम सही हैं और हम उन्हें पसंद करने लगते हैं।
प्र. यदि एक समूह में व्यक्ति के प्रयासों को एक साथ मिला दिया जाए जिसके कारण आप संपूर्ण समूह के स्तर पर निष्पादन को देखने लगते हैं तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? क्या आप जानते हैं कि ऐसी स्थिति में प्रायः क्या होता है?
उत्तर: अकेले निष्पादन करने की तुलना में समूह में व्यक्ति कम मेहनत से कार्य करता है। इसे सामाजिक स्वैराचार कहते हैं: ऐसे सामूहिक कार्य में व्यक्तिगत प्रयास में कमी, जिसमें परिणाम समूह के अन्य सदस्यों के साथ मिला दिए जाते हैं।
अध्याय के भीतर के क्रियाकलाप। अध्याय के भीतर तीन क्रियाकलाप बॉक्स भी छपे हैं। ये कक्षा में किए जाने वाले अभ्यास हैं, इसलिए इनका कोई एक तय आदर्श उत्तर नहीं है; नीचे अध्याय के विचारों के आधार पर बताया गया है कि किन बातों पर ध्यान देना है।
प्र. अपनी कक्षा से दस सदस्यों का यादृच्छिक रूप से चयन कीजिए और मुक्त-सदन की योजना बनाने के लिए एक समिति गठित कीजिए। देखिए कि वे किस प्रकार आगे बढ़ते हैं। उन्हें संपूर्ण योजना बनाने की पूर्ण स्वायत्तता दें। कक्षा के दूसरे सदस्य उनके कार्य का प्रेक्षण करें। क्या आप इसमें किसी अवस्था को उभरते हुए देखते हैं? वे कौन-सी अवस्थाएँ थीं? अवस्थाओं का क्रम क्या था? कौन-सी अवस्थाएँ छूट गईं? कक्षा में इस पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर (मार्गदर्शन): टकमैन की अवस्थाओं पर ध्यान दीजिए। निर्माण: सदस्य लक्ष्य और एक दूसरे को लेकर अनिश्चित होते हैं, उत्साह के साथ कुछ आशंका भी होती है। विप्लवन या झंझावात: योजना कैसे बने, नेतृत्व कौन करे और कौन क्या करे, इस पर मतभेद, जिसके बाद कुछ नेतृत्व-पदानुक्रम बनता है। प्रतिमान निर्माण: समिति तय करती है कि मिलकर कैसे काम करेगी। निष्पादन: योजना वास्तव में आगे बढ़ती है। समापन: मुक्त-सदन हो जाने के बाद ऐसी समिति भंग की जा सकती है। पुस्तक की यह बात भी लिखिए कि अवस्थाएँ एक साथ चल सकती हैं, समूह आगे-पीछे जा सकता है, या कोई अवस्था छूट सकती है।
प्र. कुछ समय पूर्व में आयोजित किसी अंतःसांस्थानिक प्रतियोगिता के बारे में विचार कीजिए। अपने मित्रों से अपने विद्यालय और इसके विद्यार्थियों के बारे में तथा एक दूसरे विद्यालय एवं उसके विद्यार्थियों के बारे में एक पैराग्राफ़ का विवरण लिखने के लिए कहिए। अपनी कक्षा में अपने सहपाठियों तथा दूसरे विद्यालय के विद्यार्थियों के व्यवहार एवं विशेषताओं की एक सूची बनाने के लिए कहिए। दोनों के मध्य भिन्नताओं का प्रेक्षण कीजिए एवं कक्षा में इस पर विचार-विमर्श कीजिए। क्या आप दोनों के बीच समानताएँ भी देखते हैं? यदि हाँ, तो इस पर भी परिचर्चा कीजिए।
उत्तर (मार्गदर्शन): ये विवरण प्रायः अध्याय में बताया गया अंतःसमूह-बाह्य समूह प्रतिरूप दिखाते हैं: अपने विद्यालय (“हमलोग”) को समान, अनुकूल और वांछनीय विशेषताओं वाला बताया जाता है, जबकि दूसरे विद्यालय (“वे”) को अलग और प्रायः अधिक नकारात्मक रूप से। दोनों सूचियों में वास्तविक समानताएँ दिखना पुस्तक की इस बात का उदाहरण है कि ये संवर्ग वास्तविक नहीं हैं, बल्कि हमलोगों के द्वारा बनाए गए हैं।
प्र. अपनी कक्षा में अध्यापक द्वारा निर्मित एक 5-एकांशीय लघु अभिवृत्ति मापनी मृत्युदंड के प्रति अभिवृत्ति मापन के लिए दीजिए। उनकी अनुक्रियाओं के आधार पर कक्षा को दो समूहों, अर्थात मृत्युदंड समर्थक एवं मृत्युदंड विरोधी समूह, में विभाजित करें। अब इन समूहों को दो अलग-अलग कमरों में बैठाएँ और उन्हें हाल के एक ऐसे मुकदमे पर परिचर्चा करने के लिए कहिए जिसमें न्यायालय द्वारा मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई हो। देखें कि इन दोनों समूहों में परिचर्चा किस प्रकार से आगे बढ़ती है। परिचर्चा के बाद दोनों समूहों को अभिवृत्ति मापनी पुनः दीजिए। यह जाँच करें कि क्या समूह परिचर्चा के परिणामस्वरूप दोनों समूहों में प्रारंभिक स्थिति की तुलना में स्थिति अधिक दृढ़ हुई है।
उत्तर (मार्गदर्शन): यदि समूह ध्रुवीकरण होता है, तो दोनों समूहों की स्थिति और दृढ़ हो जाती है: समर्थक समूह और अधिक पक्ष में, विरोधी समूह और अधिक विरोध में। अध्याय के तीन कारण इसे समझाते हैं: समान विचार वालों की संगति में अपने दृष्टिकोण के पक्ष में नए तर्क सुनने को मिलते हैं, दूसरों की सहमति जनता द्वारा वैधीकरण जैसी लगती है (एक प्रकार का अनुरूपता प्रभाव), और सदस्य समान विचार वालों को अंतःसमूह मानकर उसके साथ तादात्म्य बनाते और अनुरूपता दिखाते हैं, जिससे विचार और दृढ़ हो जाते हैं।