कक्षा 12 समाजशास्त्र पुस्तक 2 अध्याय 1 संरचनात्मक परिवर्तन महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. अध्याय की शुरुआत में दी गई उपनिवेशवाद की परिभाषा लिखिए।

उत्तर: एक स्तर पर, उपनिवेशवाद का सीधा मतलब है एक देश द्वारा दूसरे देश पर शासन की स्थापना; आधुनिक काल में पश्चिमी उपनिवेशवाद का सबसे ज़्यादा प्रभाव रहा है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. पूंजीवाद को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: पूंजीवाद एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है और मुनाफ़ा कमाने के लिए बाज़ार व्यवस्था के भीतर उन्हें संगठित किया जाता है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. राष्ट्र-राज्य क्या है?

उत्तर: राष्ट्र-राज्य वह सरकार है जिसे एक तय भौगोलिक क्षेत्र में संप्रभु सत्ता प्राप्त होती है, और वहाँ रहने वाले लोग एक ही राष्ट्र के नागरिक होते हैं।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. औद्योगीकरण को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: औद्योगीकरण का मतलब है यांत्रिक उत्पादन का उदय, जो भाप या बिजली जैसे शक्ति के गैर-मानवीय साधनों के इस्तेमाल पर टिका होता है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. भारत में चाय उद्योग किस वर्ष, और मुख्यतः किस क्षेत्र में शुरू हुआ?

उत्तर: भारत में चाय उद्योग 1851 में शुरू हुआ, और ज़्यादातर चाय बागान असम में स्थित थे।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. हुगली नदी के तट से लगे तीन गाँव (कोलीकाता, गोविंदपुर, सुतानुती) व्यापार के अड्डे बनाने के लिए किसने और किस वर्ष पट्टे पर लिए?

उत्तर: अंग्रेज़ व्यापारी जॉब चारनॉक ने 1690 में हुगली नदी के किनारे कोलीकाता, गोविंदपुर और सुतानुती नामक तीन गाँव पट्टे पर लिए।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. इस अध्याय के अनुसार स्वदेशी आंदोलन ने क्या किया?

उत्तर: स्वदेशी आंदोलन ने भारतीयों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रति निष्ठा को मज़बूत किया।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार, 2011 में भारत की कितनी प्रतिशत जनसंख्या नगरीय थी?

उत्तर: 2011 में भारत की 31.16% जनसंख्या, यानी 377.10 मिलियन लोग, कस्बों में रहते थे।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. पूंजीवाद-पूर्व साम्राज्य, जीते गए क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के साथ व्यवहार में, पूंजीवादी ब्रितानी उपनिवेशवाद से कैसे अलग थे?

उत्तर: पूंजीवाद-पूर्व शासक अपने प्रभुत्व से निरंतर लाभ (कर के रूप में) प्राप्त करते थे; कुल मिलाकर वे समाज के आर्थिक आधार में हस्तक्षेप नहीं कर सके और परंपरागत आर्थिक व्यवस्थाओं पर कब्ज़ा करके अपनी सत्ता बनाए रखी (अल्वी एवं शानिन)। पूंजीवाद पर आधारित ब्रितानी उपनिवेशवाद ने प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप किया: भूमि-स्वामित्व के नियम बदले, तय किया कि कौन-सी फसल उगाई जाए, और उत्पादन-वितरण के तरीके बदले: यह सब ब्रितानी पूंजीवाद के विस्तार के लिए।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. उपनिवेशवाद के कारण हुई लोगों की आवाजाही के दो अलग-अलग रूप बताइए।

उत्तर: भारत के भीतर: लोग आज के झारखंड से असम के चाय बागानों में गए, और बंगाल-मद्रास से एक नया मध्य वर्ग सरकारी कर्मचारियों और पेशेवरों के रूप में देश के अलग-अलग हिस्सों में गया। विदेश: उपनिवेशवादी शासन ने भारतीय मज़दूरों एवं दक्ष सेवाकर्मियों को जहाज़ों से सुदूर एशिया, अफ्रीका और अमरीका के अन्य उपनिवेशों में भेजा; आज उनके वंशजों को ‘भारतीय मूल’ का माना जाता है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. बॉक्स 1.1 मॉरीशस के बागानों के लिए मज़दूरों के चयन के बारे में क्या बताता है?

उत्तर: 1834 से 1920 तक, भारत के बंदरगाहों से नियमित रूप से जहाज़ जाते थे जो अलग-अलग धर्मों, लिंगों, वर्गों और जातियों के लोगों को कम से कम पाँच साल के लिए मॉरीशस के बागानों में मज़दूरी करने के लिए पहुँचाते थे। कई दशकों तक भर्ती का मुख्य केंद्र बिहार के पटना, गया, आरा, सारण, तिरहुत, चंपारण, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया जैसे ज़िले रहे।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. 1800 से 1900 के बीच ब्रिटेन कितनी तेज़ी से नगरीय हुआ, दो आँकड़े दीजिए।

उत्तर: 1800 में, 10,000 निवासियों वाले कस्बों और शहरों में ब्रिटेन की पूरी जनसंख्या के 20% लोग रहते थे; 1900 तक यह अनुपात 74% हो गया। राजधानी लंदन की जनसंख्या भी 1800 में लगभग 11 लाख (1.1 मिलियन) से बढ़कर बीसवीं सदी के प्रारंभ तक 70 लाख (7 मिलियन) से अधिक हो गई।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. औद्योगिक क्षरण (डीइंडस्ट्रीयलाइजेशन) से क्या मतलब है, और इसने ब्रितानी शासन में भारत को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर: औद्योगिक क्षरण का मतलब है मौजूदा उद्योग का पतन। भारत में, ब्रितानी औद्योगीकरण से कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक क्षरण हुआ: परंपरागत ढंग से होने वाले रेशम और कपास का उत्पादन और निर्यात ‘मेनचेस्टर प्रतियोगिता’ में गिरता चला गया, और सस्ते यूरोपीय कपड़ों के थान व बर्तनों के अबाध आयात से ग्रामीण उद्योगों का लगभग सफ़ाया हो गया (बॉक्स 1.2)। इसी दौर में सूरत और मसुलीपट्नम जैसे पुराने नगरों का अस्तित्व भी कमज़ोर होने लगा।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. तंजौर, ढाका और मुर्शीदाबाद जैसे नगर औपनिवेशिक शासन में क्यों कमज़ोर हुए?

उत्तर: भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश अधिकार के बाद तंजौर, ढाका और मुर्शीदाबाद की राजसभाओं का विघटन हो गया; फलतः इन राजसभाओं के संरक्षण में कार्यरत कारीगर, कलाकार और कुलीन लोगों का भी पतन हुआ।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. बॉक्स 1.3 के अनुसार, भूमि-स्वामित्व और अंग्रेज़ी शिक्षा एक असली भारतीय मध्य वर्ग क्यों नहीं बना सके?

उत्तर: पहला, भूमि-स्वामित्व का प्रारंभ में कृषि से हुई उपज से कोई लेना-देना नहीं था; दूसरा, (अंग्रेज़ी में शिक्षा का) भारत की सांस्कृतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं था। इसलिए ये विकल्प मध्य वर्ग का गठन करने के लिए समुचित नहीं थे; पुस्तक के शब्दों में, ‘ज़मींदार ज़मीन के परजीवी हो गए और शिक्षित स्नातक बस नौकरी ढूँढ़ने वाले’ (मुखर्जी 1979)।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे तटीय नगर औपनिवेशिक शासन में क्यों उपयुक्त माने गए?

उत्तर: इन जगहों से उपभोग की आवश्यक वस्तुओं का निर्यात आसानी से किया जा सकता था और उत्पादित वस्तुओं का सस्ती लागत से आयात किया जा सकता था। इसलिए ये नगर ब्रिटेन में स्थित आर्थिक केंद्र और औपनिवेशिक भारत में स्थित हाशिये के बीच महत्वपूर्ण संपर्क सूत्र थे: ‘भूमंडलीय पूंजीवाद के ठोस उदाहरण’।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. इस अध्याय में बताए अनुसार पश्चिमी पूंजीवाद और पश्चिमी उपनिवेशवाद के उदय के बीच संबंध, और उसका भारत पर पड़ा असर समझाइए।

उत्तर: पश्चिमी उपनिवेशवाद का पश्चिमी पूंजीवाद के विकास से अन्योन्याश्रित संबंध है: पश्चिम में पूंजीवाद एक जटिल प्रक्रिया से उभरा, जिसमें यूरोप द्वारा शेष दुनिया की खोज, गैर-यूरोपीय देशों की संपत्ति और संसाधनों का दोहन, और विज्ञान-तकनीक का अद्वितीय विकास तथा उद्योग और कृषि में उसका उपयोग शामिल था। पुस्तक के अनुसार, भारत में भी पूंजीवाद के विकास के कारण उपनिवेशवाद प्रबल हुआ, और इस प्रक्रिया के दूरगामी प्रभाव भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना पर पड़े। उपनिवेशवाद के प्रभाव से औद्योगीकरण और नगरीकरण के कुछ विशिष्ट प्रारूप उभरे, जैसे कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक क्षरण, और 19वीं सदी के अंत से यांत्रिक उद्योग वाले कुछ नए शहरों में जनसंख्या की वृद्धि।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. स्वाधीनता के संदर्भ में, अध्याय द्वारा बताए गए उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद के बीच के विरोधाभास को समझाइए।

उत्तर: औपनिवेशिक शासन का मतलब था विदेशी शासन, जैसे भारत पर ब्रितानी शासन, जबकि राष्ट्रवाद कहता था कि किसी भी उपनिवेशित समाज के लोगों को समान रूप से संप्रभु होने का अधिकार है। यह एक सीधा विरोधाभास था: एक ओर उपनिवेशी शक्ति एक जनता को स्वशासन से वंचित रखे हुए थी, दूसरी ओर संप्रभुता के सिद्धांत पर बने राष्ट्र-राज्य प्रमुख राजनीतिक रूप बनते जा रहे थे। भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने इस विरोधाभास को सही समय पर समझा और घोषणा की कि स्वाधीनता उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, और राजनीतिक तथा आर्थिक, दोनों तरह की स्वाधीनता के लिए लड़े।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. इस अध्याय के अनुसार भारत का औद्योगीकरण का अनुभव ब्रिटेन से कैसे अलग था?

उत्तर: ब्रिटेन, औद्योगीकरण से गुज़रने वाला पहला समाज, सबसे पहले ग्रामीण से नगरीय देश बना: 1800 में 10,000 निवासियों वाले कस्बों और शहरों में पूरी जनसंख्या के 20% लोग रहते थे, और 1900 तक यह अनुपात 74% हो गया। भारत में, यह कौतूहल की बात है कि ठीक इसी ब्रिटिश औद्योगीकरण का एक उल्टा असर हुआ: भारत के कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक क्षरण हुआ (परंपरागत रेशम और कपास का उत्पादन और निर्यात ‘मेनचेस्टर प्रतियोगिता’ में गिरता गया) और कुछ पुराने नगरीय केंद्रों का पतन हुआ। साथ ही, ब्रिटेन के विपरीत, भारत में ब्रिटिश औद्योगीकरण के प्रारंभिक समय में ज़्यादातर लोगों को कृषि की ओर जाना पड़ा, जैसा 1911 की भारतीय जनगणना रिपोर्ट दर्शाती है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. औपनिवेशिक बंदरगाह-नगरों ने ब्रिटेन और भारत को जोड़ने में कौन-सी भूमिका निभाई, उदाहरण सहित बताइए।

उत्तर: ब्रिटिश साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में नगरों की भूमिका महत्वपूर्ण थी; बंबई, कलकत्ता और मद्रास जैसे तटीय नगर उपयुक्त माने गए क्योंकि इन जगहों से उपभोग की आवश्यक वस्तुओं का निर्यात आसानी से और उत्पादित वस्तुओं का आयात सस्ती लागत से किया जा सकता था। इसलिए ये ब्रिटेन में स्थित आर्थिक केंद्र और औपनिवेशिक भारत में स्थित हाशिये के बीच महत्वपूर्ण संपर्क सूत्र थे। बंबई को इस प्रकार सुनियोजित ढंग से विकसित किया गया था कि 1900 तक भारत की एक-तिहाई कच्ची कपास जहाज़ से भेजी जा चुकी थी; कोलकाता से जूट (पटसन) का निर्यात होता था; और चेन्नई से कहवा, चीनी, नील और कपास ब्रिटेन को निर्यात किया जाता था।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. बॉक्स 1.4 के आधार पर, दक्षिण एशिया के औपनिवेशिक नगर में यूरोपीय नगर और देशी नगर के बीच का फ़र्क़ बताइए।

उत्तर: यूरोपीय शहर में विशाल बंगले, सुसज्जित मकान, सुनियोजित सड़कें, सड़कों के दोनों किनारों पर पेड़, और दोपहर तथा शाम को मिलने-जुलने के लिए क्लब थे; खुली जगहों को पश्चिमी रूपरेखा के मनोरंजन की सुविधाओं, जैसे घुड़दौड़, गोल्फ़, फुटबॉल और क्रिकेट के लिए सुरक्षित रखा गया था। जब घरेलू जलापूर्ति, विद्युत संपर्क और दूषित पानी के निष्कासन की सुविधाएँ मौजूद थीं और तकनीकी स्तर पर संभव थीं, तब यूरोपीय नगरों के निवासियों ने उनका भरपूर इस्तेमाल किया। देशी (स्थानीय) निवासियों के बारे में पुस्तक कहती है कि ‘इन सुविधाओं का उपयोग केवल यूरोपीय मूल के नागरिकों के लिए ही सुलभ था’, यानी देशी नगर के लोगों को ये सुविधाएँ उसी तरह उपलब्ध नहीं थीं (दत्त 1993)।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. औपनिवेशिक असम में चाय बागानों के लिए मज़दूरों की भर्ती कैसे हुई, और यह औपनिवेशिक शासन के बारे में क्या दिखाता है?

उत्तर: असम की जनसंख्या सघन नहीं थी और चाय के बागान निर्जन पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित थे, इसलिए मज़दूरों को दूसरे प्रांतों से लाना पड़ता था; दूरदराज से हज़ारों मज़दूरों को लाने-रखने का खर्च बागानों के मालिक और ठेकेदार उठाने को सहमत नहीं थे, इसलिए ब्रिटिश व्यावसायिकों ने सरकारी ताकत का सहारा लिया; ठेकेदार मज़दूरों को प्रलोभन, बल और भय के द्वारा असम भेजते थे, जिसे सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों जैसे ट्रांसपोर्ट ऑफ़ नेटिव लेबरर्स एक्ट (सं. III)-1863 (संशोधन 1865, 1870, 1873) का साथ मिला। यह दिखाता है कि औपनिवेशिक अधिकारी जानते थे कि बागान मालिकों के फ़ायदे के लिए मज़दूरों पर कड़े क़दम उठाए जा रहे हैं, और उन्होंने उपनिवेश के अपने कानूनों को उन प्रजातांत्रिक मानकों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जो ब्रिटेन में ख़ुद ब्रितानी सरकार मानती थी।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. स्वतंत्रता के बाद के पहले दो दशकों में गाँवों पर एम. एस. ए. राव द्वारा बताए गए तीन तरह के नगरीय प्रभाव समझाइए।

उत्तर: पहला, वे गाँव जहाँ काफ़ी लोग रोज़गार के लिए दूर के शहरों में जाते हैं जबकि परिवार गाँव में ही रहता है, जैसे माधोपुर, जहाँ प्रवासी पैसे घर भेजते हैं और समय-समय पर गाँव आते हैं। दूसरा, वे गाँव जो भिलाई जैसे औद्योगिक नगर के पास हैं, जहाँ आसपास के कुछ गाँवों की पूरी ज़मीन उस शहर का हिस्सा बन जाती है, जबकि कुछ गाँवों की आंशिक भूमि अधिग्रहित की जाती है; प्रवासी कामगारों के आने से मकानों की माँग बढ़ती है और बाज़ार का विस्तार होता है, साथ ही स्थानीय निवासियों और अप्रवासियों के बीच के संबंधों को संतुलित करने की समस्या भी उत्पन्न होती है। तीसरा, महानगरों का फैलाव, जो कुछ गाँवों को पूरी तरह अपने में समा लेता है, जबकि बाकियों की सिर्फ़ ग़ैर-आबाद ज़मीन नगरीय विकास के लिए लेता है।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. स्वतंत्र भारत में औद्योगीकरण को लेकर भारतीय राष्ट्रवादियों की क्या दृष्टि थी, और इसे किस तरह लागू किया गया?

उत्तर: भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए औपनिवेशिक आर्थिक शोषण एक केंद्रीय मुद्दा था, और आधुनिक विचारों ने लोगों को यह समझाया कि गरीबी को दूर किया जा सकता है। उन्होंने तेज़ औद्योगीकरण को विकास और सामाजिक न्याय, दोनों का रास्ता माना, इसलिए नई स्वतंत्र सरकार ने भारी और मशीन बनाने वाले उद्योगों के विकास, सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार और एक बड़े सहकारी क्षेत्र को प्राथमिकता दी: जिसके फलस्वरूप बोकारो, भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे नए औद्योगिक नगर बने।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. ‘उपनिवेशवाद ने नए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संरचनात्मक बदलाव लाए।’ भूमि, जंगल, लोगों की आवाजाही और एक नए मध्य वर्ग के उदय के संदर्भ में इस कथन पर चर्चा कीजिए।

उत्तर: ब्रितानी उपनिवेशवाद ने, पहले के पूंजीवाद-पूर्व शासकों के उलट (जो कुल मिलाकर समाज के आर्थिक आधार में हस्तक्षेप नहीं कर सके), जिन संरचनाओं पर शासन किया उनमें प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप किया। भूमि और जंगल में, इसने भूमि-स्वामित्व के नियम बदले, तय किया कि कौन-सी फसल उगाई जाए, उत्पादन और वितरण के तरीके बदले, पेड़ों की कटाई कराकर चाय की खेती शुरू कराई, और जंगल को नियंत्रित करने के लिए अनेक कानून बनाए, जिनसे चरवाहों और गड़रियों का जंगलों में आना-जाना प्रतिबंधित हुआ और पशुओं के लिए चारा इकट्ठा करना दुर्लभ हो गया। इसने लोगों की आवाजाही भी बढ़ाई: भारत के भीतर, आज के झारखंड से असम के चाय बागानों तक, और बंगाल-मद्रास के एक नए मध्य वर्ग का सरकारी सेवाकर्मियों और पेशेवरों के रूप में; और विदेश में, मज़दूरों एवं दक्ष सेवाकर्मियों के रूप में (बॉक्स 1.1: 1834 से 1920 तक, कम से कम पाँच साल के लिए मॉरीशस के बागानों में, कई दशकों तक मुख्यतः बिहार के ज़िलों से चुने गए), जिनके वंशजों को आज ‘भारतीय मूल’ का माना जाता है। नए मध्य वर्ग के उदय पर, बॉक्स 1.3 दिखाता है कि जो विकल्प दिए गए, भूमि-स्वामित्व और अंग्रेज़ी में शिक्षा की सुविधा, वे मध्य वर्ग का गठन करने के लिए समुचित नहीं थे: भूमि-स्वामित्व का प्रारंभ में कृषि से हुई उपज से कोई लेना-देना नहीं था और (अंग्रेज़ी शिक्षा का) भारत की सांस्कृतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं था; मुखर्जी के शब्दों में, ‘ज़मींदार ज़मीन के परजीवी हो गए और शिक्षित स्नातक बस नौकरी ढूँढ़ने वाले’। साथ मिलाकर, ये बदलाव दिखाते हैं कि उपनिवेशवाद एक संरचना और व्यवस्था के रूप में काम करता था। इनमें से कुछ परिवर्तन अप्रकट रूप में थे जबकि अनेक सुनियोजित तरीके से लाए गए: जैसे पश्चिमी शिक्षा पद्धति, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के सहयोगी तैयार करने के लिए लाई गई, पर राष्ट्रवादी और उपनिवेश-विरोधी चेतना का माध्यम बनी।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. अध्याय में दिए गए तथ्यों और आँकड़ों का इस्तेमाल करते हुए, ब्रिटेन और औपनिवेशिक भारत के औद्योगीकरण-नगरीकरण के अनुभव की तुलना कीजिए।

उत्तर: ब्रिटेन, औद्योगीकरण से गुज़रने वाला पहला समाज, सबसे पहले ग्रामीण से नगरीय देश बना: 1800 में 10,000 निवासियों वाले कस्बों और शहरों में पूरी जनसंख्या के 20% लोग रहते थे, जो 1900 तक 74% हो गए, और राजधानी लंदन लगभग 11 लाख (1.1 मिलियन) से बढ़कर 70 लाख (7 मिलियन) से अधिक का, उस वक़्त तक दुनिया का सबसे बड़ा नगर और उत्पादन, वाणिज्य और आर्थिकी का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। भारत में, यह कौतूहल की बात है कि ठीक इसी ब्रिटिश औद्योगीकरण का एक उल्टा असर हुआ: भारत के कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक क्षरण हुआ, परंपरागत रेशम और कपास का उत्पादन और निर्यात ‘मेनचेस्टर प्रतियोगिता’ में गिरता गया, सूरत और मसुलीपट्नम जैसे पुराने व्यापारिक नगर कमज़ोर हुए, और भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश अधिकार के बाद तंजौर, ढाका और मुर्शीदाबाद की राजसभाओं का विघटन हुआ, फलतः उनके संरक्षण में कार्यरत कारीगरों और कुलीनों का भी पतन हुआ। ब्रिटेन के विपरीत, भारत में ब्रिटिश औद्योगीकरण के प्रारंभिक समय में ज़्यादातर लोगों को कृषि की ओर जाना पड़ा, जैसा 1911 की जनगणना रिपोर्ट दर्शाती है। नगरीय वृद्धि भी हुई, पर अलग ढंग से: बंबई और मद्रास जैसे औपनिवेशिक नगर मज़बूत होते गए क्योंकि वे औपनिवेशिक निर्यात-हितों (कच्ची कपास, जूट, कहवा, चीनी, नील) की सेवा करते थे, और 19वीं सदी के अंत से यांत्रिक उद्योग वाले कुछ आधुनिक नए शहरों में भी जनसंख्या बढ़ने लगी।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. औपनिवेशिक बंदरगाह-नगरों और चाय बागानों को दो उदाहरण के रूप में लेते हुए दिखाइए कि उपनिवेशवाद ने भारत के संरचनात्मक बदलाव को ब्रितानी हितों की सेवा के लिए कैसे आकार दिया, न कि भारतीय हितों की।

उत्तर: मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे औपनिवेशिक बंदरगाह-नगर इसलिए उपयुक्त माने गए क्योंकि इन जगहों से उपभोग की आवश्यक वस्तुओं का निर्यात आसानी से और उत्पादित वस्तुओं का आयात सस्ती लागत से किया जा सकता था: ये ‘भूमंडलीय पूंजीवाद के ठोस उदाहरण’ थे। बंबई को इस प्रकार सुनियोजित ढंग से विकसित किया गया था कि 1900 तक भारत की एक-तिहाई कच्ची कपास जहाज़ से भेजी जा चुकी थी; कोलकाता से जूट का निर्यात होता था; और चेन्नई से कहवा, चीनी, नील और कपास ब्रिटेन को भेजे जाते थे। कोलकाता ख़ुद 1690 में जॉब चारनॉक द्वारा व्यापार के अड्डों के लिए पट्टे पर लिए गए तीन गाँवों और 1698 में स्थापित फोर्ट विलियम से फैला, और दक्षिण एशिया के औपनिवेशिक नगर के प्रारूप (बॉक्स 1.4) में जलापूर्ति, विद्युत और निकासी जैसी ‘सुविधाओं का उपयोग केवल यूरोपीय मूल के नागरिकों के लिए ही सुलभ था’। चाय उद्योग मज़दूरी के पक्ष से यही कहानी दोहराता है: 1851 में भारत में शुरू हुआ, ज़्यादातर बागान असम में थे, और 1903 तक इसमें 4,79,000 स्थायी और 93,000 अस्थायी लोग काम पर थे; ठेकेदार ट्रांसपोर्ट ऑफ़ नेटिव लेबरर्स एक्ट (सं. III)-1863 (संशोधन 1865, 1870, 1873) का इस्तेमाल करके मज़दूरों को प्रलोभन, बल और भय के द्वारा असम भेजते थे, जबकि बागान मालिक भोग-विलास में रहते थे (बॉक्स 1.6)। दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि भारत के प्रारंभिक औद्योगीकरण और नगरीकरण पर औपनिवेशिक शासन चलता था जो अपने ही हितों को देखता था, और उसके हस्तक्षेपों से ब्रितानी पूंजीवाद का विस्तार हुआ और उसे मज़बूती मिली।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. स्वतंत्र भारत ने उद्योग और नगरों, दोनों में उपनिवेशवाद के छोड़े गए संरचनात्मक बदलावों को दूर करने की कोशिश कैसे की?

उत्तर: उद्योग के मामले में, भारतीय राष्ट्रवादियों ने औपनिवेशिक काल के आर्थिक शोषण को एक केंद्रीय मुद्दा माना, और स्वदेशी आंदोलन द्वारा मज़बूत की गई राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रति निष्ठा से कुछ हद तक प्रेरित होकर, तेज़ औद्योगीकरण को विकास और सामाजिक न्याय, दोनों का रास्ता माना। इससे स्वतंत्र सरकार ने भारी और मशीन बनाने वाले उद्योगों के विकास, सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार और एक बड़े सहकारी क्षेत्र को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया, जिससे बोकारो, भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे नए औद्योगिक नगर बने (अध्याय-5 में भारतीय औद्योगीकरण और उसमें आए परिवर्तनों, विशेषकर 1990 के बाद के उदारीकरण की चर्चा है)। नगरों के मामले में, स्वतंत्र भारत में नगरीकरण निरंतर बढ़ रहा है; हाल ही के वर्षों में बढ़ते भूमंडलीकरण से शहरों का अत्यधिक प्रसार हुआ है, और पुस्तक के अनुसार ‘स्मार्ट सिटी’ की महत्वाकांक्षी योजना इस गति को तीव्र करने में महत्वपूर्ण योगदान देगी (अध्याय-6 में विस्तार से)। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, एम. एस. ए. राव ने इस वृद्धि से आसपास के गाँवों तक फैलने वाले तीन अलग-अलग तरह के नगरीय प्रभाव पहचाने: शहर में रोज़गार के लिए पलायन, भिलाई जैसे पास के औद्योगिक नगर का असर, और फैलते महानगरों द्वारा गाँवों का समाना: और जनसंख्या के आँकड़े इसकी पुष्टि करते हैं: भारत की नगरीय हिस्सेदारी 1951 में 17.29% से बढ़कर 2011 में 31.16% हो गई, हालाँकि इस वृद्धि की रफ़्तार (दशकीय वृद्धि दर) 1981 से 2001 के बीच असल में धीमी हुई, इससे पहले कि 2011 में हल्की-सी सुधरे।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
अभ्यास-उदाहरण (पुस्तक से नहीं): औपनिवेशिक भारत के एक छोटे नगर की अपनी राजसभा थी, जो कुशल बुनकरों के एक पूरे समुदाय को सहारा देती थी, जो बारीक रेशमी कपड़ा बनाकर स्थानीय स्तर पर बेचते और विदेश भी भेजते थे। ब्रिटेन द्वारा उस रियासत पर कब्ज़ा करने के बाद, राजसभा भंग कर दी गई। एक ही पीढ़ी के भीतर, नगर का रेशम व्यापार ठप हो गया और कई बुनकर परिवार जीवन-यापन के लिए खेती की ओर मुड़ गए।

(क) 2 अंक अध्याय में नामित कौन-से असली नगरों की क़िस्मत ऐसी ही रही, और क्यों?
उत्तर: तंजौर, ढाका और मुर्शीदाबाद अध्याय में ऐसे नगरों के रूप में नामित हैं: भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश अधिकार के बाद इनकी राजसभाओं का विघटन हो गया, फलतः इन राजसभाओं के संरक्षण में कार्यरत कारीगर, कलाकार और कुलीन लोगों का भी पतन हुआ।

(ख) 2 अंक अध्याय का कौन-सा समाजशास्त्रीय शब्द नगर के रेशम व्यापार के ठप होने को बताता है?
उत्तर: यह औद्योगिक क्षरण (डीइंडस्ट्रीयलाइजेशन) का उदाहरण है: मौजूदा उद्योग का पतन, जो अध्याय के अनुसार भारत के कुछ क्षेत्रों में परंपरागत रेशम और कपास के उत्पादन के साथ ‘मेनचेस्टर प्रतियोगिता’ में हुआ।

(ग) 2 अंक गद्यांश का अंत, बुनकर परिवारों का खेती की ओर मुड़ना, अध्याय द्वारा ब्रिटेन के विपरीत बताए गए किस पैटर्न से मेल खाता है?
उत्तर: अध्याय बताता है कि ब्रिटेन में औद्योगीकरण के प्रभाव से ज़्यादातर लोग नगरों में आए, लेकिन इसके विपरीत भारत में ब्रिटिश औद्योगीकरण के प्रारंभिक समय में ज़्यादातर लोगों को कृषि की ओर जाना पड़ा: ठीक वैसा ही जैसा गद्यांश के बुनकर परिवारों के साथ होता है। 1911 की जनगणना रिपोर्ट (बॉक्स 1.2) भी बताती है कि ग्रामीण कारीगरों ने अपने वंशानुगत व्यवसाय को छोड़कर खेती करना शुरू कर दिया।

केस स्टडी
अभ्यास-उदाहरण (पुस्तक से नहीं): उत्तर भारत के एक गाँव का एक युवक कारखाने में काम करने मुंबई चला जाता है जबकि उसकी पत्नी और बच्चे गाँव में ही रहते हैं। वह हर महीने पैसे घर भेजता है और साल में दो बार गाँव आता है। इसी बीच, राज्य के दूसरे हिस्से में एक नया इस्पात कारखाना बन रहा है, और आसपास के कई गाँवों की ज़मीन का हिस्सा इस परियोजना के लिए लिया जा रहा है, जिससे बाहरी मज़दूर वहाँ आकर मूल निवासियों के साथ रहने लगे हैं।

(क) 2 अंक इस गद्यांश में दिखाए गए समाजशास्त्री और दो तरह के नगरीय प्रभाव पहचानिए।
उत्तर: एम. एस. ए. राव (1974) ने गाँवों पर नगरीय प्रभाव के अपने तीन प्रकारों में से इन्हें पहचाना: पहले व्यक्ति की कहानी पहले प्रकार से मेल खाती है, रोज़गार के लिए दूर के शहर में पलायन जबकि परिवार गाँव में ही रहता है, जैसे माधोपुर के उदाहरण में। इस्पात-कारखाने की कहानी दूसरे प्रकार से मेल खाती है: औद्योगिक नगर के पास के गाँव, जैसे भिलाई के उदाहरण में।

(ख) 2 अंक अध्याय का कौन-सा असली गाँव पहली स्थिति से सबसे मिलता-जुलता है, और उसके कितने प्रवासी नामित दो शहरों में काम करते थे?
उत्तर: माधोपुर (उत्तर-मध्य भारत) इससे मिलता-जुलता है: इसके 298 घरों में से 77 घरों में प्रवासी हैं, और इन 77 अप्रवासियों में से लगभग आधे मुंबई या कोलकाता में काम करते हैं।

(ग) 2 अंक इस्पात-कारखाने वाले गाँवों के लिए अध्याय किस सामाजिक समस्या की बात करता है?
उत्तर: अध्याय बताता है कि औद्योगिक शहर के पास प्रवासी कामगारों के आने से गाँवों में मकानों की माँग बढ़ जाती है और बाज़ार का विस्तार होता है; साथ ही स्थानीय निवासियों और अप्रवासियों के बीच के संबंधों को संतुलित करने की समस्या भी उत्पन्न होती है।