NCERT कक्षा 12 समाजशास्त्र, भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास, पुस्तक 2,
अध्याय 1 संरचनात्मक परिवर्तन के अंत में छपे सभी चार प्रश्नों के पूरे उत्तर।
इस अध्याय का अपना “प्रश्नावली” खंड छोटे उत्तर वाले अभ्यासों की बजाय चार खुली
चर्चा वाले प्रश्नों का है: प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में दिए गए हैं, और
हर उत्तर उस तरह का पूरा, सुव्यवस्थित जवाब दिखाता है जो बोर्ड परीक्षा इस तरह के
प्रश्न से अपेक्षा करती है। पाठ के बीच छपे तीनों क्रियाकलाप (1.1, 1.2 और 1.3) अंत में हल किए गए हैं।
1 प्रश्न 1
प्र. उपनिवेशवाद का हमारे जीवन पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ा है? आप या
तो किसी एक पक्ष जैसे संस्कृति या राजनीति को केंद्र में रखकर, या सारे पक्षों
को जोड़कर विश्लेषण कर सकते हैं।
उत्तर: भारतीय जीवन पर उपनिवेशवाद का प्रभाव बहुत व्यापक रहा है, और
जैसा अध्याय बार-बार कहता है, विरोधाभासी भी। राजनीतिक रूप से, औपनिवेशिक शासन
ने वह संसदीय-कानूनी व्यवस्था दी जिस पर भारत आज भी चलता है, और भारत भी
राष्ट्र-राज्य के उस युग में आया जो पूंजीवाद के साथ प्रमुख राजनीतिक रूप बना; फिर भी उसी औपनिवेशिक शासन ने भारतीयों को वह संप्रभुता और
स्वशासन नहीं दिया जिसकी माँग उसके अपने राजनीतिक विचार करते थे: यही
विरोधाभास भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने समझा, और इसीलिए उन्होंने स्वाधीनता
को अपना जन्मसिद्ध अधिकार घोषित किया।
आर्थिक और संरचनात्मक स्तर पर, उपनिवेशवाद ने भूमि-स्वामित्व के नियम बदले,
तय किया कि कौन-सी फसल उगाई जाए, उत्पादन-वितरण बदला, जंगलों को नियंत्रित
करने के अनेक कानून बनाए जिनसे चरवाहों का जंगलों में आना-जाना प्रतिबंधित हुआ, और चाय बागान जैसे नए उद्योगों के ज़रिए पूरे क्षेत्रों को
नया रूप दिया, जहाँ भर्ती प्रलोभन, बल और भय से, ट्रांसपोर्ट ऑफ़ नेटिव
लेबरर्स एक्ट, 1863 जैसे कानूनों के सहारे, होती थी। इससे भारत के कुछ क्षेत्रों
में औद्योगिक क्षरण भी हुआ, और ब्रिटेन के विपरीत, प्रारंभिक समय में ज़्यादातर
लोगों को कृषि की ओर जाना पड़ा, जबकि बंबई और मद्रास जैसे औपनिवेशिक नगर
मज़बूत होते गए।
सांस्कृतिक स्तर पर, इसकी विरासत अध्याय के अपने बताए रोज़मर्रा के उदाहरणों
में दिखती है: ब्रिटिश प्रारूप पर आधारित हमारी संसदीय, विधि और शिक्षा
व्यवस्था; सड़क पर बाएँ चलना; ‘कटलेट’ जैसे खाने के नाम और अनेक स्कूलों की
पोशाक में नेक-टाई; और ख़ुद अंग्रेज़ी भाषा, जो आज भी विशेषाधिकारों की द्योतक
है, पर जिसके ज्ञान से दलितों जैसे समूहों के लिए, जिन्हें परंपरागत व्यवस्था
में औपचारिक शिक्षा से वंचित रहना पड़ा था, अब अवसरों के द्वार खुल गए हैं।
कुछ परिवर्तन अप्रकट रूप में भी आए: पश्चिमी शिक्षा पद्धति ऐसा वर्ग तैयार करने
के लिए लाई गई जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद को बनाए रखने में सहयोगी हो, लेकिन यही
राष्ट्रवादी और उपनिवेश-विरोधी चेतना का माध्यम बनी। कुल मिलाकर, उपनिवेशवाद
इतिहास का बंद अध्याय नहीं है: यह आज भी उन संस्थाओं और आदतों में, जटिल और
विरोधाभासी तरीक़ों से, जीवित है जिनके साथ हम अब भी रहते हैं।
2 प्रश्न 2
प्र. औद्योगीकरण और नगरीकरण का परस्पर संबंध है, विचार करें।
उत्तर: औद्योगीकरण का मतलब है यांत्रिक उत्पादन का उदय, जो भाप या
बिजली जैसे गैर-मानवीय शक्ति साधनों पर टिका होता है, और यह आमतौर पर
नगरीकरण से जुड़ा होता है क्योंकि औद्योगिक समाजों को खेत की बजाय कारखानों,
दफ़्तरों और दुकानों में काम करने वाले बड़ी संख्या में लोग चाहिए होते हैं:
पश्चिम में 90% से ज़्यादा लोग कस्बों-शहरों में रहते हैं, क्योंकि वहीं रोज़गार व व्यवसाय के अवसर अधिक होते हैं।
ब्रिटेन यह संबंध साफ़ दिखाता है: औद्योगीकरण करने वाला पहला देश होने के साथ
वह प्रमुख रूप से नगरीय बनने वाला भी पहला देश था, जहाँ 10,000 से ज़्यादा
निवासियों वाले कस्बों और शहरों में रहने वाली जनसंख्या का हिस्सा 1800 में 20% से
बढ़कर 1900 तक 74% हो गया, और लंदन उसी दौर में लगभग 11 लाख (1.1 मिलियन) से बढ़कर 70 लाख (7 मिलियन) से अधिक हो गया।
लेकिन अध्याय साफ़ कहता है कि ये दोनों प्रक्रियाएँ “अक्सर साथ-साथ होती
हैं, पर हमेशा नहीं”, और औपनिवेशिक भारत ख़ुद इसका उलट उदाहरण है। जिस ब्रितानी
औद्योगीकरण ने ब्रिटेन को नगरीय बनाया, उसी ने भारत के कुछ हिस्सों में
औद्योगिक क्षरण किया: परंपरागत रेशम और कपास का उत्पादन और निर्यात
‘मेनचेस्टर प्रतियोगिता’ में गिरता गया, और सूरत-मसुलीपट्नम जैसे नगर कमज़ोर
हुए। ब्रिटेन के विपरीत, भारत में ब्रिटिश औद्योगीकरण के प्रारंभिक समय में
ज़्यादातर लोगों को कृषि की ओर जाना पड़ा, जैसा 1911 की जनगणना रिपोर्ट
दर्शाती है। औपनिवेशिक भारत में नगरीय वृद्धि अलग रूप में हुई: बंबई, कलकत्ता
और मद्रास जैसे औपनिवेशिक नगर मुख्यतः इसलिए बढ़े क्योंकि वे ब्रितानी
निर्यात-हितों की सेवा करते थे, और 19वीं सदी के अंत से यांत्रिक उद्योग वाले
कुछ आधुनिक नए शहरों में भी जनसंख्या बढ़ने लगी। इसलिए ये दोनों प्रक्रियाएँ
जुड़ी तो हैं, पर इस जुड़ाव का आकार इस पर निर्भर करता है कि औद्योगीकरण और
नगरीकरण किसके हितों के अनुसार चलते हैं: भारत के प्रारंभिक औद्योगीकरण और
नगरीकरण पर औपनिवेशिक शासन चलता था, जो अपने ही हितों को देखता था।
3 प्रश्न 3
प्र. किसी ऐसे शहर या नगर को चुनें जिससे आप भली-भाँति परिचित हैं।
उस शहर/नगर के इतिहास, उसके उद्भव और विकास, तथा समसामयिक स्थिति का विवरण
दें।
उत्तर: यह एक खुला, गतिविधि-आधारित प्रश्न है, इसलिए उत्तर छात्र के
अपने परिचित किसी असली शहर या नगर के बारे में होना चाहिए, अध्याय के अपने
औपनिवेशिक बंदरगाह-नगर वाले उदाहरण के ढाँचे पर। कोलकाता को एक हल किए
गए उदाहरण के तौर पर लेते हुए: 1690 में, अंग्रेज़ व्यापारी जॉब चारनॉक ने
हुगली नदी के किनारे कोलीकाता, गोविंदपुर और सुतानुती नामक तीन गाँव व्यापार
का अड्डा बनाने के लिए पट्टे पर लिए। 1698 में, वहीं रक्षा के लिए फोर्ट
विलियम की स्थापना हुई, और किला तथा उसके चारों ओर की खुली ज़मीन (मैदान)
मिलकर वह केंद्र बने जहाँ से नगर तेज़ी से फैला। कोलकाता औपनिवेशिक भारत के
सबसे अहम बंदरगाह-नगरों में से एक बना, जो जूट निर्यात करता था और
ब्रितानी आर्थिक केंद्र को उपनिवेशित भारतीय हाशिये से जोड़ता था। बॉक्स 1.4
बताता है कि औपनिवेशिक नगर के “यूरोपीय शहर” में जलापूर्ति, विद्युत और निकासी
जैसी “सुविधाओं का उपयोग केवल यूरोपीय मूल के नागरिकों के लिए ही सुलभ था”।
आज कोलकाता एक प्रमुख महानगर और पश्चिम बंगाल की राजधानी बना हुआ है, जो
अपनी बनावट, पुरानी इमारतों और बंदरगाह के इतिहास में इस औपनिवेशिक योजना की
भौतिक व संस्थागत विरासत आज भी साथ लिए है। अपने शहर के बारे में लिखते हुए
छात्र को यही ढाँचा अपनाना चाहिए: शहर/नगर कब और क्यों शुरू हुआ या बढ़ा, इसने
कौन-सी आर्थिक या राजनीतिक भूमिका निभाई (औपनिवेशिक काल की या अन्य), और आज
यह कैसा दिखता है: जनसंख्या, मुख्य आर्थिक गतिविधि, और उसके पुराने इतिहास की
कोई भी दिखने वाली विरासत।
4 प्रश्न 4
प्र. आप एक छोटे कस्बे में या बहुत बड़े शहर, या अर्धनगरीय स्थान,
या एक गाँव में रहते हैं। जहाँ आप रहते हैं, उस जगह का वर्णन करें। वहाँ की
विशेषताएँ क्या हैं, आप को क्यों लगता है कि वह एक कस्बा है शहर नहीं, एक
गाँव है कस्बा नहीं या शहर है गाँव नहीं? जहाँ आप रहते हैं, क्या वहाँ कोई
कारखाना है? क्या लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती है? क्या व्यवसाय वहाँ
निर्णायक रूप में प्रभावशाली है? क्या वहाँ इमारतें हैं? क्या वहाँ शिक्षा की
सुविधाएँ उपलब्ध हैं? लोग कैसे रहते और व्यवहार करते हैं? लोग किस तरह बात
करते और कैसे कपड़े पहनते हैं?
उत्तर: यह छात्र के अपने निवास स्थान के बारे में एक खुला प्रश्न
है, इसलिए कोई एक “सही” उत्तर नहीं है। इसका उत्तर ईमानदारी से, अध्याय के
अपने बताए समाजशास्त्रीय संकेतों का इस्तेमाल करते हुए दिया जाना चाहिए, जो
किसी जगह के “कस्बे-पन” या “शहर-पन” को पहचानते हैं। एक अच्छा उत्तर पुस्तक
के अपने हर प्रश्न पर बारी-बारी विचार करता है:
व्यवसाय की प्रकृति: क्या मुख्य आजीविका खेती है (जो एक गाँव-जैसी
बस्ती की पहचान है), या कारखाना/दफ़्तर/दुकान का काम (जो एक औद्योगिक, नगरीय
बस्ती की पहचान है)? पुस्तक ख़ुद पूछती है कि क्या व्यवसाय वहाँ
निर्णायक रूप में प्रभावशाली है; अध्याय के अनुसार औद्योगिक समाजों में ज़्यादातर
लोग खेती की बजाय कारखानों, दफ़्तरों और दुकानों में काम करते हैं, इसलिए यह
पहचान अक्सर निर्णायक होती है।
कारखाने या उद्योग की मौजूदगी: किसी कारखाने के इर्द-गिर्द या पास
बनी बस्ती (जैसे अध्याय के अपने भिलाई के उदाहरण में) एक बिल्कुल अलग चरित्र
विकसित करती है: ज़्यादा प्रवासी मज़दूर, मकानों की ज़्यादा माँग, और खेती की
उपज की बजाय औद्योगिक मज़दूरी से आकार लेने वाला स्थानीय बाज़ार।
इमारतें और बुनियादी ढाँचा: सुनियोजित सड़कें, बहुमंज़िला इमारतें,
पाइप से जलापूर्ति, सीवेज और बिजली कनेक्शन एक शहर की ज़्यादा पहचान हैं;
बिखरे हुए मकान और आसपास के खेतों पर निर्भरता एक गाँव की ज़्यादा पहचान है।
शिक्षा और सामाजिक अवसर: स्कूल, कॉलेज और औपचारिक संस्थाओं तक
पहुँच कस्बों-शहरों में कहीं ज़्यादा होती है, और अध्याय का अपना अंग्रेज़ी
शिक्षा का विवरण दिखाता है कि ऐसे अवसर किसी व्यक्ति या समुदाय के भविष्य को
कैसे बदल सकते हैं।
जीवन जीने का ढंग: लोग कैसे बात करते, कैसे कपड़े पहनते और कैसा
व्यवहार करते हैं, और वे अपने पड़ोसियों को कितनी नज़दीक से जानते हैं, ये सब
वे संकेत हैं जिनकी ओर अध्याय की अपनी समापन-पंक्ति (वर्थ, 1938) सीधे इशारा
करती है: नगरीकरण सिर्फ़ इमारतों और नौकरियों की बात नहीं, बल्कि ख़ुद
“जीवन का एक अंतरंग हिस्सा” भी है। छात्र के उत्तर का अंत यह तौलते हुए होना
चाहिए कि इनमें से कौन-सी विशेषताएँ उसकी अपनी जगह पर सबसे ज़्यादा लागू होती
हैं, और ईमानदारी से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वह जगह गाँव, कस्बे या
शहर, किसकी तरह ज़्यादा काम करती है।
5 पाठ के बीच के क्रियाकलाप
अध्याय के बीच में तीन क्रियाकलाप भी छपे हैं। यहाँ उन्हें उसी क्रम में हल किया गया है जिस क्रम में पुस्तक उन्हें देती है।
प्र. तीनों नगरों की शुरुआत (उद्भव और विकास) के बारे में और जानकारी इकट्ठा करें। इनके पुराने नामों के बारे में भी पता करें जिन्हें बदलकर अब बंबई से मुंबई, मद्रास से चेन्नई, कलकत्ता से कोलकाता, बंगलोर से बंगलूरु किया गया है। अन्य शहरी उपनिवेशी नगरों के विकास के बारे में पता लगाइए?
उत्तर:
- कोलकाता (कलकत्ता): इसकी शुरुआत पुस्तक ख़ुद बताती है: 1690 में अंग्रेज़ व्यापारी जॉब चारनॉक ने हुगली नदी के तट से लगे तीन गाँव, कोलीकाता, गोविंदपुर और सुतानुती, व्यापार का अड्डा बनाने के लिए पट्टे पर लिए। 1698 में फोर्ट विलियम बना, और किला तथा उसके आसपास का खुला मैदान नगर का केंद्र बना जहाँ से नगर फैला। यहाँ से जूट (पटसन) का निर्यात होता था।
- मुंबई (बंबई): बंबई कुछ द्वीपों का समूह था जो 1661 में पुर्तगालियों से अंग्रेज़ राजा को मिला और 1668 में ईस्ट इंडिया कंपनी को पट्टे पर दे दिया गया (पुस्तक से बाहर)। पुस्तक के अनुसार बंबई को इस प्रकार सुनियोजित ढंग से विकसित किया गया था कि 1900 तक भारत की एक-तिहाई कच्ची कपास जहाज़ से भेजी जा चुकी थी।
- चेन्नई (मद्रास): ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1640 के दशक में यहाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज बनाया और बस्ती इसी किले के आसपास बढ़ी। औपनिवेशिक काल में यहाँ से कहवा, चीनी, नील और कपास ब्रिटेन भेजे जाते थे।
- नए नाम: स्वतंत्रता के बाद राज्य सरकारों ने औपनिवेशिक दौर की वर्तनी की जगह वे नाम अपनाए जो स्थानीय लोग अपनी भाषा में पहले से बोलते थे: बंबई 1995 में मुंबई, मद्रास 1996 में चेन्नई, कलकत्ता 2001 में कोलकाता और बंगलोर 2014 में बंगलूरु बना। इसके पीछे औपनिवेशिक शासन की छाप वाले नामों को छोड़ने की भावना थी।
- अन्य औपनिवेशिक नगर: अपने क्षेत्र के एक-दो नगरों के बारे में लिखें। आम प्रकार थे: अधिकारियों के लिए गर्मियों के ठिकाने के रूप में बसाए गए पहाड़ी नगर (जैसे शिमला और दार्जिलिंग), सेना के लिए बनी छावनियाँ, और रेलवे कारखानों व जंक्शनों के आसपास बढ़े रेलवे नगर। हर नगर के लिए लिखें कि वह कब और क्यों बढ़ा और आज कैसा है।
प्र. आप सब अमूल मक्खन और अमूल के ही अन्य उत्पादों से तो परिचित ही होंगे। पता करें कि किस तरह से इस दुग्ध आधारित उद्योग का उद्भव हुआ।
उत्तर: अमूल गुजरात के खेड़ा (कैरा) ज़िले के दूध उत्पादकों के सहकारी आंदोलन से निकला। 1946 में आणंद में किसानों ने कैरा ज़िला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ बनाया, ताकि वे अपना दूध निजी व्यापारियों को औने-पौने दाम पर बेचने की बजाय मिलकर बेच सकें। त्रिभुवनदास पटेल जैसे नेताओं और बाद में इंजीनियर वर्गीज़ कुरियन ने इस संघ को एक बड़ी डेयरी बनाया, जो दूध का प्रसंस्करण करती थी और अमूल नाम से उत्पाद बेचती थी। गाँव की दुग्ध समितियाँ जिस डेयरी की मालिक होती हैं, यह ‘आणंद मॉडल’ बाद में ऑपरेशन फ्लड के ज़रिए पूरे देश में फैलाया गया। यह सीधे अध्याय से जुड़ता है: स्वतंत्रता के बाद औद्योगीकरण में बड़े को-ऑपरेटिव (सहकारी) सेक्टर को महत्वपूर्ण माना गया, और अमूल इसकी सबसे जानी-मानी सफलताओं में से एक है।
प्र. आज़ादी के बाद के सालों में भारत में अनेक औद्योगिक शहरों का उद्भव और विकास हुआ। संभवतः आपमें से कुछ ऐसे शहरों में रहते भी हों। बोकारो, भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे शहरों के बारे में जानकारी इकट्ठी करें। क्या आपके क्षेत्र में भी ऐसे शहर हैं? क्या आपको उर्वरक उत्पादन यंत्र और तेल के कुओं के क्षेत्र के आसपास बसे शहरों के बारे में पता है? अगर ऐसा कोई शहर आपके क्षेत्र में नहीं है तो पता करें कि ऐसा क्यों है?
उत्तर:
- बोकारो, भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर इस्पात नगर हैं। हर एक स्वतंत्रता के बाद लगाए गए सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े इस्पात कारखाने के आसपास बसा, जब सरकार ने भारी और मशीन बनाने वाले उद्योगों तथा पब्लिक सेक्टर को प्राथमिकता दी। मज़दूरों के लिए मकान, स्कूल, अस्पताल और बाज़ार वाली सुनियोजित बस्तियाँ (टाउनशिप) बनाई गईं, और देश के कई हिस्सों से लोग यहाँ काम करने आए।
- उर्वरक कारखानों और तेल के कुओं के आसपास बसे नगर: जैसे झारखंड का सिंदरी, जो उर्वरक कारखाने के आसपास बढ़ा, और असम के डिगबोई और दुलियाजान, जो तेल क्षेत्रों और तेलशोधक कारखाने के आसपास बढ़े।
- आपका क्षेत्र: अपने पास के ऐसे किसी नगर का नाम लिखें और बताएँ कि वह कैसे शुरू हुआ और आज कैसा है। अगर ऐसा कोई नगर नहीं है तो कारण बताएँ: ऐसे उद्योग वहीं लगते हैं जहाँ कच्चा माल (लौह अयस्क, कोयला, तेल या गैस), पानी, बिजली और यातायात उपलब्ध हो, इसलिए जिस क्षेत्र में ये नहीं हैं वहाँ ऐसा नगर बनने की संभावना कम होती है।