कक्षा 12 समाजशास्त्र पुस्तक 2 अध्याय 1 संरचनात्मक परिवर्तन के नोट्स (Structural Change Notes) हिंदी में

यह अध्याय परीक्षा में कितने अंकों का है

यह आपकी दूसरी समाजशास्त्र की पुस्तक (भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं
विकास
) का पहला अध्याय है। पुस्तक का अपना अध्याय क्रमांक 1 है, लेकिन
इस साइट और आपकी पूरे साल की रिवीज़न योजना में यह अध्याय 8 है।

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CBSE 2026-27 5 अंक (इकाई 8, संरचनात्मक परिवर्तन) 80 थ्योरी + 20 प्रोजेक्ट

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देख लें। CBSE पाठ्यक्रम इकाई के कुल अंक देता है, प्रश्न-वार विभाजन नहीं, इसलिए इस
अध्याय की महत्वपूर्ण प्रश्न और MCQ पोस्ट का प्रश्न-बैंक पुस्तक के अपने प्रश्नों और
विषयवस्तु पर आधारित है।

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • यह अध्याय उपनिवेशवाद को केवल इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि एक संरचना और व्यवस्था क्यों मानता है
  • पूंजीवादी उपनिवेशवाद पहले के साम्राज्यों से कैसे अलग था, और इसका भारत के कानून, भूमि और जंगलों पर क्या असर पड़ा
  • पूंजीवाद और राष्ट्र-राज्य क्या हैं, और औपनिवेशिक शासन तथा राष्ट्रवाद के बीच का विरोधाभास
  • ब्रिटिश औद्योगीकरण ने ब्रिटेन में जो नगरीकरण किया, भारत के कुछ क्षेत्रों में उसकी जगह औद्योगिक क्षरण क्यों हुआ
  • औपनिवेशिक नगर और चाय के बागान औपनिवेशिक शासन के अपने हितों से कैसे आकार लिए
  • स्वतंत्र भारत के अपने औद्योगीकरण और नगरीकरण ने इस इतिहास को कैसे आगे बढ़ाया
उपनिवेशवादपूंजीवादराष्ट्र-राज्यऔद्योगीकरणऔद्योगिक क्षरणनगरीकरणस्वदेशी आंदोलनस्मार्ट सिटी

1 उपनिवेशवाद: एक संरचना और व्यवस्था

शुरुआत में एक लाइन में: उपनिवेशवाद यानी एक देश का
दूसरे देश पर शासन। आगे इसकी पूरी परिभाषा दी गई है, लेकिन
यह मोटा अर्थ अभी से याद रखें।

भारत के वर्तमान को समझने के लिए उसके अतीत को जानना ज़रूरी है, और आधुनिक
भारत को समझने के लिए औपनिवेशिक अनुभव सबसे ज़्यादा मायने रखता है। इसकी वजह
सिर्फ़ यह नहीं कि कई आधुनिक विचार और संस्थाएँ उपनिवेशवाद के ज़रिए भारत
पहुँचीं, बल्कि यह भी कि यह अनुभव विरोधाभासी था: औपनिवेशिक दौर में
भारतीय पश्चिमी उदारवाद और स्वतंत्रता के बारे में पढ़ते थे, फिर भी एक ऐसे
औपनिवेशिक शासन में रहते थे जिसने उन्हें ठीक वही स्वतंत्रता और उदारता नहीं
दी। इस तरह के अंतर्विरोधों ने ऐसे अनेक संरचनात्मक बदलावों को दिशा दी जो यह अध्याय बताता
है, और वे सांस्कृतिक बदलाव भी जो अगला अध्याय बताएगा: इन दोनों को
पूरी तरह अलग करना मुश्किल है।

उपनिवेशवाद की विरासत सिर्फ़ इतिहास की किताबों में नहीं है। पुस्तक खुद
रोज़मर्रा के उदाहरण देती है: ब्रिटिश प्रारूप पर आधारित हमारी संसदीय, विधि
और शिक्षा व्यवस्था; सड़क पर बाएँ चलना; “कटलेट” जैसे अंग्रेज़ी खाने के
नाम; ब्रिटेन के नाम से जुड़ा एक प्रसिद्ध बिस्कुट निर्माता; अनेक स्कूलों में
नेक-टाई पोशाक का अनिवार्य हिस्सा। अंग्रेज़ी भाषा खुद एक विरोधाभास है: यह भारतीयों को वैश्विक
बाज़ार में विशेष स्थान देती है और बहुत से भारतीयों ने अंग्रेज़ी में उत्कृष्ट
साहित्यिक रचनाएँ भी की हैं, फिर भी यह “विशेषाधिकार का प्रतीक” बनी रहती है: अंग्रेज़ी न जानना
रोज़गार में सचमुच नुकसान पहुँचाता है, जबकि पारंपरिक रूप से औपचारिक शिक्षा
से वंचित रहे समूहों, जैसे दलितों, के लिए अंग्रेज़ी के ज्ञान से अब
अवसरों के द्वार खुल गए हैं।

पुस्तक का बॉक्स: “Virtually English” (द हिंदू, 4 मई 2006)

पुस्तक में अंग्रेज़ी में छपा यह बॉक्स बताता है कि अंग्रेज़ी जानने वाली गृहिणियाँ और
कॉलेज विद्यार्थी BPO में ऑनलाइन परीक्षक का काम करते हैं: वे एशिया (जापान, कोरिया,
चीन) के उन विद्यार्थियों के अंग्रेज़ी निबंध जाँचते हैं जिनकी भाषा अंग्रेज़ी नहीं है।
इसके लिए अंग्रेज़ी पर पकड़, रचनात्मक कौशल और कंप्यूटर का बुनियादी ज्ञान चाहिए।

अध्याय खुद अपना दायरा दो संरचनात्मक बदलावों तक सीमित करता है जो
उपनिवेशवाद लाया: औद्योगीकरण और नगरीकरण: मुख्यतः औपनिवेशिक काल में,
साथ ही स्वतंत्रता के बाद क्या हुआ इस पर भी एक संक्षिप्त नज़र।

1.1 उपनिवेशवाद की समझ

याद रखने योग्यपरिभाषा 1

उपनिवेशवाद, एक स्तर पर, एक देश के द्वारा दूसरे देश पर
शासन को माना जाता है। आधुनिक काल में पश्चिमी उपनिवेशवाद का सबसे ज़्यादा
प्रभाव रहा है: औपनिवेशिक शासन किसी अन्य शासन से अलग और अधिक प्रभावशाली रहा,
और इसके कारण जो परिवर्तन आए वे अत्यधिक गहरे और भेदभावपूर्ण रहे।

याद रखने योग्यपरिभाषा 2

पूंजीवाद एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के साधनों पर
निजी स्वामित्व होता है और मुनाफ़ा कमाने के लिए बाज़ार व्यवस्था के भीतर
उन्हें संगठित किया जाता है। शुरू से इसकी दो पहचान रही हैं: इसकी
गतिशीलता (बढ़ने, फैलने और तकनीक-श्रम का सबसे ज़्यादा मुनाफ़े के
लिए इस्तेमाल करने की क्षमता), और इसका भूमंडलीय स्वरूप। पश्चिमी
उपनिवेशवाद का पश्चिमी पूंजीवाद के विकास से अन्योन्याश्रित संबंध है। भारत में
भी पूंजीवाद के विकास के कारण उपनिवेशवाद प्रबल हुआ, और इस प्रक्रिया के दूरगामी
प्रभाव भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना पर पड़े। यह शब्द
अभी से ध्यान में रखिए: नीचे दिए गए दो तरह के साम्राज्यों का फ़र्क़ इसी
पर टिका है।

आगे और अध्याय भर में जहाँ भी किसी नाम के साथ कोष्ठक में एक
साल लिखा मिलेगा, जैसे (अल्वी एवं शानिन, 1982), समझ लीजिए कि यह कोई नया शब्द
याद करने की चीज़ नहीं है: यह सिर्फ़ उस विद्वान और उसकी किताब/लेख का नाम है
जिसे NCERT की यह पुस्तक खुद अपने स्रोत के रूप में उद्धृत करती है।

इतिहास में एक शक्ति द्वारा दूसरे के क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के उदाहरण भरे
पड़े हैं, लेकिन पूंजीवाद-पूर्व साम्राज्यों और पूंजीवादी उपनिवेशवाद के बीच
एक बुनियादी फ़र्क़ है (अल्वी एवं शानिन, 1982):

पूंजीवाद-पूर्व साम्राज्य

  • अपने प्रभुत्व से निरंतर लाभ (जैसे कर के रूप में) प्राप्त करते थे, जो उनके निरंतर शासन से व्यक्त होता था
  • कुल मिलाकर, समाज के आर्थिक आधार में हस्तक्षेप नहीं कर सके
  • परंपरागत आर्थिक व्यवस्थाओं पर कब्ज़ा करके अपनी सत्ता बनाए रखी

ब्रितानी (पूंजीवादी) उपनिवेशवाद

  • ब्रितानी पूंजीवाद का मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए सीधे हस्तक्षेप करता था
  • भूमि-स्वामित्व के नियम बदले, और यह भी तय किया कि कौन-सी फसल उगाई जाए
  • उत्पादन और वितरण का पूरा तरीका बदल दिया
  • जंगलों को भी नहीं छोड़ा: पेड़ कटवाए, चाय के बागान लगवाए, और जंगल को नियंत्रित करने के लिए अनेक कानून बनाए, जिनसे चरवाहों और गड़रियों का जंगलों में आना-जाना प्रतिबंधित हुआ और पशुओं के लिए चारा इकट्ठा करना दुर्लभ हो गया
परीक्षा संकेत

“ब्रितानी उपनिवेशवाद पहले की विजयों से कैसे अलग था” जैसे प्रश्न का
उत्तर यही तुलना है। एक बात याद रखें: पहले के शासक कुल मिलाकर अधिशेष
(यानी खेती या उत्पादन से बचा हुआ अतिरिक्त हिस्सा) से लाभ लेते थे और आर्थिक आधार को नहीं छेड़ते थे;
ब्रितानी उपनिवेशवाद ने वह पूरी संरचना बदल दी जो यह अतिरिक्त उत्पादन पैदा
करती थी।

उपनिवेशवाद के कुछ परिवर्तन अप्रकट रूप में आए, जबकि अनेक सुनियोजित तरीके
से लाए गए थे। जैसे, पश्चिमी शिक्षा पद्धति को इस उद्देश्य से लाया गया था कि
भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद को बनाए रखने में
सहयोगी हो; लेकिन यही पश्चिमी शिक्षा पद्धति राष्ट्रवादी चेतना एवं
उपनिवेश-विरोधी चेतना
का माध्यम बनी।

1.2 उपनिवेशवाद के दौर में लोगों की आवाजाही

1

भारत के भीतर

आज के झारखंड से लोग असम के नए चाय बागानों में काम करने गए। बंगाल और
मद्रास प्रेसिडेंसी क्षेत्रों से एक नया मध्य वर्ग, जैसे सरकारी कर्मचारी
और डॉक्टर-वकील जैसे पेशेवर, औपनिवेशिक सेवा में देश के अलग-अलग हिस्सों
में गए।

2

विदेश, मज़दूरों के रूप में

उपनिवेशवादी शासन ने भारतीय मज़दूरों एवं दक्ष सेवाकर्मियों को जहाज़ों से
सुदूर एशिया, अफ्रीका और अमरीका के अन्य उपनिवेशों में भेजा। कितने लोग तो
रास्ते में ही मर जाते थे; जाने वाले अधिकांश लोगों में से कुछ तो कभी लौटकर
ही नहीं आए। आज उनके वंशजों को “भारतीय मूल” का माना जाता है।

बॉक्स 1.1: मॉरीशस जाने वाले मज़दूरों के जहाज़

1834 से 1920 तक, भारत के बंदरगाहों से नियमित रूप से जहाज़ जाते
थे, जो अलग-अलग धर्मों, लिंगों, वर्गों और जातियों के लोगों को कम से कम
पाँच साल के लिए मॉरीशस के बागानों में मज़दूरी करने ले जाते थे। कई
दशकों तक भर्ती का मुख्य केंद्र बिहार रहा: खासकर पटना, गया,
आरा, सारण, तिरहुत, चंपारण, मुंगेर, भागलपुर और पूर्णिया
ज़िले
(पाइनीओ, 1984)।

1.3 राष्ट्र-राज्य

याद रखने योग्यपरिभाषा 3

राष्ट्र-राज्य आधुनिक राज्य का एक खास रूप है: सरकार को एक तय
भौगोलिक क्षेत्र में संप्रभु सत्ता प्राप्त होती है, और वहाँ रहने वाले लोग
एक ही राष्ट्र के नागरिक होते हैं। जैसे-जैसे पूंजीवाद प्रमुख आर्थिक
व्यवस्था बना, वैसे-वैसे राष्ट्र-राज्य प्रमुख राजनीतिक रूप बन गया।
पहले विश्वयुद्ध से पहले, अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए पासपोर्ट का चलन आम
नहीं था: समाज हमेशा इस तरह संगठित नहीं थे जैसा हम आज मान लेते हैं।
राष्ट्र-राज्य राष्ट्रवाद के उदय से गहरे जुड़े हैं: यह सिद्धांत कि
किसी भी समूह के लोगों को स्वतंत्र होने और संप्रभु सत्ता रखने का अधिकार
है, और यह प्रजातांत्रिक विचारों के उदय का ही हिस्सा है (अध्याय-3 में
आगे पढ़ेंगे)।

याद रखने वाला विरोधाभास

औपनिवेशिक शासन का मतलब था विदेशी शासन, जैसे भारत पर ब्रितानी शासन।
राष्ट्रवाद कहता था कि किसी भी उपनिवेशित समाज के लोगों को समान रूप से
संप्रभु होने का अधिकार है। भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं ने इस विरोधाभास को
सही समय पर समझा: उन्होंने घोषणा की कि स्वाधीनता उनका जन्मसिद्ध
अधिकार है, और राजनीतिक तथा आर्थिक, दोनों तरह की स्वाधीनता के लिए लड़े।

2 औद्योगीकरण और नगरीकरण: औपनिवेशिक अनुभव

याद रखने योग्यपरिभाषा 4

औद्योगीकरण का मतलब है यांत्रिक उत्पादन का उदय, जो भाप या
बिजली जैसे शक्ति के गैर-मानवीय साधनों पर टिका होता है। पारंपरिक समाजों
में, कम तकनीकी विकास की वजह से ज़्यादातर लोगों को खेत पर ही काम करना
पड़ता था; औद्योगिक समाजों में ज़्यादातर लोग खेती की बजाय कारखानों,
दफ़्तरों या दुकानों में काम करते हैं। पश्चिम में 90% से ज़्यादा लोग
कस्बों और शहरों में रहते हैं। औद्योगीकरण और नगरीकरण अक्सर साथ-साथ होते
हैं, लेकिन हमेशा नहीं। भारत में औद्योगीकरण और नगरीकरण वैसे नहीं हुए
जैसे ब्रिटेन में हुए।

2.1 ब्रिटेन का अनुभव

ब्रिटेन औद्योगीकरण से गुज़रने वाला पहला समाज था, और ग्रामीण से नगरीय
देश बनने वाला भी पहला (गिडिन्स, 2001ः 572):

1800: 10,000+ आबादी वाले कस्बों में रहने वाली जनसंख्या का %20%
1900: 10,000+ आबादी वाले कस्बों में रहने वाली जनसंख्या का %74%
11 लाख1800 में लंदन की जनसंख्या, लगभग 11 लाख (1.1 मिलियन)
70 लाख+बीसवीं सदी के प्रारंभ (1900) तक लंदन की जनसंख्या, 70 लाख (7 मिलियन) से अधिक: तब दुनिया का सबसे बड़ा नगर

2.2 भारत का बिल्कुल अलग ढाँचा

पुस्तक के अनुसार, यह कौतूहल की बात है कि ठीक इसी ब्रितानी औद्योगीकरण का
एक उल्टा असर हुआ: भारत के कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक क्षरण
(डीइंडस्ट्रीयलाइजेशन)
हुआ और कुछ पुराने नगरीय केंद्रों का पतन हुआ।
परंपरागत ढंग से होने वाले रेशम और कपास का उत्पादन और निर्यात “मेनचेस्टर
प्रतियोगिता” में गिरता चला गया। 19वीं सदी के अंत से भारत के कुछ आधुनिक नए
शहरों में, जहाँ यांत्रिक उद्योग लगाए गए थे, जनसंख्या बढ़ने लगी।

शहर का क्या हुआ पुस्तक में दिए गए शहर क्यों
और कमज़ोर हुए सूरत, मसुलीपट्नम प्राचीन व्यापारिक नगर, जिनका अस्तित्व उसी दौर में कमज़ोर होने लगा जब बंबई और मद्रास मज़बूत होते गए (पुस्तक इसे पुराने नगरीय केंद्रों के पतन का हिस्सा बताती है)
बढ़े बंबई, मद्रास उपनिवेशवादी शासन में प्रचलित हुए तटीय नगर, जहाँ से निर्यात आसान था और तैयार माल सस्ते में मँगाया जा सकता था
राजसभाएँ खोईं तंजौर, ढाका, मुर्शीदाबाद भारतीय राज्यों पर ब्रिटिश अधिकार के बाद इनकी राजसभाओं का विघटन हो गया, फलतः राजसभाओं के संरक्षण में कार्यरत कारीगर, कलाकार और कुलीन लोगों का भी पतन हुआ

“नगरों में स्थित उत्पादकों के द्वारा बनाए गए विलासिता के सामानों, ढाका
या मुर्शीदाबाद की उच्चकोटि की रेशम की माँग में दरबारों के विघटन के बाद भारी
कमी हो गई। ये उत्पाद जिन बाह्य बाज़ारों पर निर्भर थे उनका भी कमोबेश सफ़ाया
हो गया था। दूर-दराज के क्षेत्रों के ग्राम, शिल्प विशेषतः पूर्वी भारत के उन
क्षेत्रों के अतिरिक्त जहाँ अंग्रेज़ों का प्रवेश जल्दी और सघन था अधिक समय तक
स्थिर रहे, जब तक कि रेलवे के विस्तार ने उन्हें गंभीर रूप से प्रभावित नहीं
किया।”

सीधा अर्थ: पूर्वी भारत में अंग्रेज़ों का प्रवेश सबसे जल्दी और सबसे गहरा
था, इसलिए वहाँ शिल्प पहले टूटे; बाकी क्षेत्रों के ग्रामीण शिल्प ज़्यादा समय
तक बचे रहे और रेलवे के फैलने पर ही गंभीर रूप से प्रभावित हुए।

सरकार, 1983ः 29

बॉक्स 1.2: भारत की जनगणना रिपोर्ट, 1911 (अंक-1, पृष्ठ 408)

“भारत में सस्ते यूरोपीय कपड़ों के थान और बर्तनों का अबाध और तीव्र गति से
आयात और पश्चिमी रूपरेखा वाले उद्योगों के भारत में ही लग जाने के बाद भारत के
ग्रामीण उद्योगों का लगभग सफ़ाया ही हो गया। खेती से हुई उपज की ऊँची कीमत को
देखते हुए ग्रामीण कारीगरों ने अपने वंशानुगत व्यवसाय को छोड़कर खेती करना शुरू
कर दिया। ग्रामीण संगठनों और कारोबारों का विघटन प्रत्येक क्षेत्र में
अलग-अलग गति से हुआ। विकसित प्रांतों में यह परिवर्तन ज़्यादा स्पष्ट रूप से
दिखा।”

आम ग़लती

यह मत मान लीजिए कि भारत में औद्योगीकरण ने भी ब्रिटेन की तरह लोगों को
शहरों की ओर खींचा। पुस्तक साफ़ कहती है कि ब्रिटेन के विपरीत, भारत में
ब्रिटिश औद्योगीकरण के प्रारंभिक समय में ज़्यादातर लोगों को कृषि की ओर जाना पड़ा,
जैसा भारतीय जनगणना रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

भारत में समाजशास्त्रीय लेखन में उपनिवेशवाद के विरोधाभासी और अनिच्छित
परिणामों
के बारे में अक्सर चर्चा की गई है। नीचे का बॉक्स 1.3 ऐसी ही एक
झलक है। इससे यह भी पता चलता है कि औद्योगीकरण का मतलब केवल मशीनों पर आधारित
उत्पादन ही नहीं, बल्कि यह नए सामाजिक समूहों और नए सामाजिक संबंधों के
उद्भव और विकास की कहानी है; दूसरे शब्दों में, यह भारतीय सामाजिक संरचना में
हुए परिवर्तनों के बारे में है।

बॉक्स 1.3: वे विकल्प जो मध्य वर्ग नहीं बना सके

ईस्ट इंडिया कंपनी, और बाद में ब्रितानी सरकार ने भारत को बदले में जो
दिया वह था: भूमि-स्वामित्व और अंग्रेज़ी में शिक्षा की सुविधा।
ये विकल्प मध्य वर्ग का गठन करने के लिए समुचित नहीं थे: पहला, भूमि-स्वामित्व का
प्रारंभ में कृषि से हुई उपज से कोई लेना-देना नहीं था, और दूसरा, (अंग्रेज़ी शिक्षा
का) भारत की सांस्कृतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं था। पुस्तक के अपने शब्दों में, “ज़मींदार ज़मीन के
परजीवी हो गए और शिक्षित स्नातक बस नौकरी ढूँढ़ने वाले” (मुखर्जी, 1979ः
114)।

2.3 औपनिवेशिक बंदरगाह-नगर

ब्रिटिश साम्राज्य की अर्थव्यवस्था में नगरों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। तटीय नगर,
जैसे मुंबई, कोलकाता और चेन्नई, इसलिए उपयुक्त माने गए क्योंकि इन जगहों से उपभोग की
आवश्यक वस्तुओं का निर्यात आसानी से किया जा सकता था और तैयार माल सस्ते में मँगाया जा सकता था (नीचे
बंबई का पुराना नाम भी आया है, क्योंकि उस दौर के स्रोत यही नाम इस्तेमाल
करते थे)। ये
ब्रिटेन में स्थित आर्थिक केंद्र और औपनिवेशिक भारत के हाशिये के बीच महत्वपूर्ण
संपर्क सूत्र थे: “भूमंडलीय पूंजीवाद का ठोस उदाहरण।”

नगर क्या निर्यात होता था (बंबई का आँकड़ा 1900 का है)
बंबई बंबई को इस प्रकार सुनियोजित ढंग से विकसित किया गया था कि 1900 तक भारत की एक-तिहाई कच्ची कपास जहाज़ से भेजी जा चुकी थी
कोलकाता जूट (पटसन)
चेन्नई कहवा, चीनी, नील और कपास, ब्रिटेन को
1690अंग्रेज़ व्यापारी जॉब चारनॉक ने हुगली नदी के किनारे तीन गाँव, कोलीकाता, गोविंदपुर और सुतानुती, व्यापार का अड्डा बनाने के लिए पट्टे पर लिए
1698रक्षा के लिए वहीं फोर्ट विलियम की स्थापना हुई; इसके चारों ओर साफ़ की गई खुली ज़मीन, मैदान, सैन्य टुकड़ियों के लिए इस्तेमाल हुई
यहीं सेकिला और मैदान मिलकर उस केंद्र बने जहाँ से कोलकाता नगर तेज़ी से फैला

औपनिवेशिक काल के नगरीकरण में पुराने नगरों का पतन हुआ और उनकी जगह नए
औपनिवेशिक नगर उभरे: कोलकाता इनमें सबसे पहला था।

यूरोपीय नगर

  • विशाल बंगले, सुसज्जित मकान, सुनियोजित सड़कें
  • सड़कों के दोनों किनारों पर पेड़, दोपहर और शाम को मिलने-जुलने के लिए क्लब
  • खुली जगहें पश्चिमी रूपरेखा के मनोरंजन, जैसे घुड़दौड़, गोल्फ़, फुटबॉल और क्रिकेट के लिए सुरक्षित रखी गईं
  • जब घरेलू जलापूर्ति, विद्युत संपर्क और दूषित पानी के निष्कासन की सुविधाएँ मौजूद थीं और तकनीकी स्तर पर संभव थीं, तब यूरोपीय नगरों के निवासियों ने उनका भरपूर इस्तेमाल किया

देशी (स्थानीय) निवासी

  • पुस्तक के शब्दों में, “इन सुविधाओं का उपयोग केवल यूरोपीय मूल के नागरिकों के लिए ही सुलभ था”

बॉक्स 1.4, “दक्षिण एशिया के औपनिवेशिक नगर का प्रारूप” (दत्त, 1993ः 361)।

2.4 चाय की बागवानी

भारत में औद्योगीकरण और नगरीकरण उस प्रकार नहीं हुआ जैसे ब्रिटेन में हुआ।
पुस्तक के अनुसार इसकी वजह औद्योगीकरण की देर से हुई शुरुआत नहीं थी, बल्कि
यह कि यहाँ के प्रारंभिक औद्योगीकरण और नगरीकरण पर औपनिवेशिक शासन चलता था जो
अपने ही हितों को देखता था। चाय उद्योग इसका पुस्तक का अपना उदाहरण है।

1851भारत में चाय उद्योग शुरू, ज़्यादातर असम में
4,79,0001903 तक स्थायी कर्मचारी
93,0001903 तक अस्थायी कर्मचारी
बॉक्स 1.5: मज़दूरों की भर्ती कैसे होती थी

असम की जनसंख्या सघन नहीं थी और चाय के बागान निर्जन पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित थे, इसलिए मज़दूरों
को दूसरे प्रांतों से लाना पड़ता था। अस्वस्थ आबोहवा और बुखारों वाली
जगह पर हज़ारों मज़दूरों को लाने-रखने का खर्च बागानों के मालिक और ठेकेदार
उठाने को सहमत नहीं थे, इसलिए ब्रिटिश व्यावसायिकों ने सरकारी ताकत का सहारा
लिया और ऐसे कानून बनाए गए कि गरीब मज़दूरों के पास कोई विकल्प नहीं बचा।
भर्ती का काम ठेकेदारों को दिया गया, जो बंगाल के ट्रांसपोर्ट ऑफ़ नेटिव
लेबरर्स एक्ट (सं. III)-1863
का इस्तेमाल करके मज़दूरों को प्रलोभन, बल और भय
के द्वारा असम भेजते थे। इस एक्ट में 1865, 1870 और 1873 में संशोधन
हुए। औपनिवेशिक
अधिकारी जानते थे कि बागान मालिकों के फ़ायदे के लिए मज़दूरों पर कड़े क़दम
उठाए जा रहे हैं, और यह भी जानते थे कि उपनिवेश के अपने कानूनों को उन
प्रजातांत्रिक मानकों का पालन करने की ज़रूरत नहीं थी जो ब्रिटेन में ख़ुद
ब्रितानी सरकार मानती थी।

बॉक्स 1.6: बागान मालिक कैसे रहते थे

मज़दूरों पर प्रलोभन, बल और भय की मार पड़ रही थी, वहीं परबतपुरी (स्टीमर
से सामान लादने-उतारने की जगह) के आसपास के बागानों के अंग्रेज़ मालिक विशाल
बँगलों में रहते थे, जो जंगली जानवरों से बचाव
के लिए लकड़ी के खंभों पर बने होते थे, प्रशिक्षित माली-बावर्ची-नौकरों की
सेवा में, और स्टीमर से मँगाया गया सामान इस्तेमाल करते थे (फुकन, 2005)।
यह अंतर याद रखने लायक है, सिर्फ़ अतिरिक्त जानकारी नहीं।

3 स्वतंत्रता के बाद का संरचनात्मक परिवर्तन

3.1 स्वतंत्र भारत में औद्योगीकरण

स्वतंत्र भारत की सरकार ने सक्रिय रूप से औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया, कुछ
हद तक उपनिवेशवाद के औद्योगिक असर की प्रतिक्रिया में (अध्याय-5 में यह
विस्तार से है, साथ ही 1990 के बाद के उदारीकरण का भी)। भारतीय
राष्ट्रवादियों के लिए औपनिवेशिक आर्थिक शोषण एक केंद्रीय मुद्दा था; औपनिवेशिक
भारत की गरीबी, पूर्व-औपनिवेशिक समृद्धि की छवियों के बिल्कुल उलट थी।
स्वदेशी आंदोलन ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रति निष्ठा को मज़बूत
किया, और आधुनिक विचारों ने लोगों को यह समझाया कि गरीबी को रोका जा सकता
है। राष्ट्रवादियों ने तेज़ औद्योगीकरण को विकास और सामाजिक न्याय, दोनों का
रास्ता माना: इसलिए भारी और मशीन बनाने वाले उद्योगों का विकास, सार्वजनिक
क्षेत्र का विस्तार और एक बड़ा सहकारी क्षेत्र, तीनों को ज़रूरी समझा गया।

1

बोकारो

स्वतंत्रता के बाद का नया औद्योगिक नगर

2

भिलाई

स्वतंत्रता के बाद का नया औद्योगिक नगर

3

राउरकेला

स्वतंत्रता के बाद का नया औद्योगिक नगर

4

दुर्गापुर

स्वतंत्रता के बाद का नया औद्योगिक नगर

3.2 स्वतंत्र भारत में नगरीकरण

हाल ही के वर्षों में बढ़ते भूमंडलीकरण ने भारतीय नगरों में भारी विस्तार
और बदलाव लाया है। भारत सरकार की ‘स्मार्ट सिटी’ की महत्वाकांक्षी योजना 21वीं सदी के
नगरीकरण की गति को तीव्र करने में महत्वपूर्ण योगदान देगी (अध्याय-6 में इसका विस्तार है)।

समाजशास्त्री एम. एस. ए. राव (1974ः 486-490) ने, स्वतंत्रता के बाद के पहले
दो दशकों पर लिखते हुए, गाँवों पर पड़ने वाले तीन अलग-अलग तरह के नगरीय
प्रभाव
बताए:

1

रोज़गार के लिए पलायन

गाँव के काफ़ी लोग दूर के शहरों में नौकरी करते हैं जबकि परिवार गाँव
में ही रहता है। माधोपुर (उत्तर-मध्य भारत) पर हुए अध्ययन के
आँकड़े देखिए:

  • कुल 298 घरों में से 77 घरों में कम से कम एक
    प्रवासी सदस्य है
  • 77 अप्रवासियों में से लगभग आधे मुंबई या कोलकाता में काम करते हैं
  • 75% प्रवासी नियमित रूप से घर पैसे भेजते हैं
  • 83% साल में 4-5 बार से लेकर दो साल में एक बार गाँव आते
    हैं

बहुत सारे प्रवासी विदेशों में भी रहते हैं, जैसे गुजरात के गाँवों के अनेक
प्रवासी अफ्रीका और ब्रिटेन के शहरों में। इन्होंने अपने गाँवों में आधुनिक फ़ैशन
के मकान बनाए हैं, ज़मीन-जायदाद में निवेश किया है, और शिक्षण संस्थानों तथा
ट्रस्टों को दान दिया है।

2

औद्योगिक नगर के पास का गाँव

भिलाई जैसा औद्योगिक शहर उभरने पर आसपास के कुछ गाँवों की पूरी ज़मीन
उस शहर का हिस्सा बन जाती है, जबकि कुछ गाँवों की आंशिक भूमि अधिग्रहित की जाती
है। प्रवासी कामगारों के आने से मकानों की माँग बढ़ती है और बाज़ार का विस्तार
होता है, साथ ही स्थानीय निवासियों और अप्रवासियों के बीच के संबंधों को संतुलित
करने की समस्या भी उत्पन्न होती है।

3

महानगरों का फैलाव

कुछ गाँव फैलते महानगर में पूरी तरह समा जाते हैं; बाकियों की सिर्फ़
ग़ैर-आबाद ज़मीन शहरी विकास के लिए ली जाती है।

3.3 भारत की नगरीय जनसंख्या, 1951 से 2011

चार्ट 1: कस्बों में रहने वाली भारत की जनसंख्या का हिस्सा, 1951 (17.29%) और 2011 (31.16%), पुस्तक के आँकड़ों से बनाया गया
चार्ट 1: कस्बों में रहने वाली भारत की जनसंख्या का हिस्सा, 1951 (17.29%) और 2011 (31.16%), पुस्तक के आँकड़ों से बनाया गया
वर्ष कुल जनसंख्या का % नगरीय नगरीय जनसंख्या कस्बों की संख्या
1951 17.29% 62.44 मिलियन 2,843
2011 31.16% 377.10 मिलियन 7,935
परीक्षा संकेत: उलटी दिखने वाली प्रवृत्ति

नगरीय जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर 1951 में 41.42% थी,
फिर 1981-2001 के बीच घटती गई, और 2011 में 31.80% तक थोड़ी
बढ़ी। इसे नगरीय जनसंख्या के % से मत मिलाइए, जो लगातार बढ़ता ही गया: वृद्धि
दर अलग आँकड़ा है और यह दशकों तक घटती रही, फिर हल्की-सी सुधरी।
यह भी याद रखें: आज़ादी के बाद पहली बार, नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या की
निरपेक्ष वृद्धि ग्रामीण क्षेत्रों से ज़्यादा रही, क्योंकि ग्रामीण वृद्धि
दर तेज़ी से घटी जबकि नगरीय दर लगभग वैसी ही रही।

करके देखें: पुस्तक के तीन क्रियाकलाप
  • क्रियाकलाप 1.1: तीनों नगरों की शुरुआत (उद्भव और विकास) के बारे में जानकारी इकट्ठा करें; उनके पुराने नामों के बारे में पता करें (बंबई से मुंबई, मद्रास से चेन्नई, कलकत्ता से कोलकाता, बंगलोर से बंगलूरु); अन्य उपनिवेशी नगरों के विकास के बारे में पता लगाइए।
  • क्रियाकलाप 1.2: पता करें कि अमूल जैसे दुग्ध आधारित उद्योग का उद्भव किस तरह हुआ।
  • क्रियाकलाप 1.3: बोकारो, भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे शहरों के बारे में जानकारी इकट्ठी करें; क्या आपके क्षेत्र में भी ऐसे शहर हैं? उर्वरक संयंत्रों और तेल के कुओं के आसपास बसे शहरों के बारे में पता करें; ऐसा कोई शहर न हो तो पता करें कि ऐसा क्यों है।

इनके आदर्श उत्तर इस अध्याय की NCERT समाधान पोस्ट में हैं।

4 निष्कर्ष

उपनिवेशवाद सिर्फ़ इतिहास का विषय नहीं है: यह आज भी हमारी रोज़मर्रा की
ज़िंदगी में जटिल तरीकों से मौजूद है। औद्योगीकरण और नगरीकरण का मतलब सिर्फ़
उत्पादन व्यवस्था, तकनीकी बदलाव और बस्तियों का घनत्व नहीं है: पुस्तक के
अपने शब्दों में, यह हमारे “जीवन का एक अंतरंग हिस्सा” भी है (वर्थ,
1938 का विचार)।

सभी परिभाषाएँ एक जगह
उपनिवेशवादएक देश द्वारा दूसरे देश पर शासन; पूंजीवादी ब्रितानी उपनिवेशवाद ने सीधे हस्तक्षेप किया, जबकि पूंजीवाद-पूर्व साम्राज्य, कुल मिलाकर, समाज के आर्थिक आधार में हस्तक्षेप नहीं कर सके
पूंजीवादऐसी आर्थिक व्यवस्था जहाँ उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है और मुनाफ़े के लिए बाज़ार व्यवस्था में संगठित किया जाता है; शुरू से गतिशील और भूमंडलीय
राष्ट्र-राज्यतय क्षेत्र में संप्रभु सत्ता वाली सरकार, जिसके नागरिक एक ही राष्ट्र के हों; राष्ट्रवाद के उदय से जुड़ा
औद्योगीकरणयांत्रिक उत्पादन का उदय, भाप या बिजली जैसे गैर-मानवीय शक्ति साधनों पर आधारित
औद्योगिक क्षरण (डीइंडस्ट्रीयलाइजेशन)मौजूदा उद्योग का पतन: भारत के कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक उद्योगों के साथ ब्रितानी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में यही हुआ
नगरीकरणकस्बों-शहरों का बढ़ना और उनमें रहने वाली जनसंख्या का हिस्सा बढ़ना; अक्सर, पर हमेशा नहीं, औद्योगीकरण से जुड़ा
त्वरित रिवीज़न: परीक्षा से पहली रात यही पढ़ें
  • उपनिवेशवाद = एक देश का दूसरे पर शासन; पूंजीवादी ब्रितानी उपनिवेशवाद ने भूमि, फसल, जंगल और उत्पादन में सीधे हस्तक्षेप किया
  • पूंजीवाद = निजी स्वामित्व, मुनाफ़े के लिए संगठित, गतिशील और भूमंडलीय; राष्ट्र-राज्य = तय क्षेत्र और नागरिकों पर संप्रभु सरकार; राष्ट्रवाद से टकराव में “स्वाधीनता जन्मसिद्ध अधिकार” जैसा नारा निकला
  • ब्रिटेन: औद्योगीकरण और नगरीकरण साथ-साथ (1800 में 20%, 1900 तक 74% लोग 10,000+ आबादी वाले कस्बों-शहरों में; लंदन लगभग 11 लाख से 70 लाख से अधिक); भारत: कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक क्षरण, और प्रारंभिक समय में ज़्यादातर लोग कृषि की ओर
  • औपनिवेशिक बंदरगाह-नगर (बंबई-कपास, कोलकाता-जूट, चेन्नई-कहवा/चीनी/नील/कपास) ने ब्रिटेन के केंद्र को भारत के हाशिये से जोड़ा; चाय बागान भी मज़दूरी में वही औपनिवेशिक-हित पैटर्न दिखाते हैं
  • स्वतंत्र भारत: स्वदेशी-प्रेरित भारी उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र, सहकारिता; नए औद्योगिक नगर (बोकारो, भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर)
  • एम. एस. ए. राव के गाँवों पर तीन तरह के नगरीय प्रभाव; नगरीय जनसंख्या 17.29% (1951) से 31.16% (2011), वृद्धि दर 1981-2001 में घटी
  • CBSE 2026-27: इकाई 8 संरचनात्मक परिवर्तन के 5 अंक; अन्य बोर्ड अपना पाठ्यक्रम देखें
परीक्षा से पहले खुद जाँच लें
  • क्या मैं एक उदाहरण से बता सकता हूँ कि पूंजीवादी उपनिवेशवाद पूंजीवाद-पूर्व साम्राज्यों से कैसे अलग था?
  • क्या मैं बता सकता हूँ कि ब्रितानी औद्योगीकरण ने भारत में औद्योगिक क्षरण क्यों किया, नगरीकरण क्यों नहीं?
  • क्या मैं तीनों औपनिवेशिक बंदरगाह-नगरों के नाम और उनका निर्यात बता सकता हूँ?
  • क्या मैं एम. एस. ए. राव के तीन तरह के नगरीय प्रभाव, पुस्तक के अपने उदाहरणों के साथ, समझा सकता हूँ?
  • क्या मैंने देख लिया है कि मेरा बोर्ड इस अध्याय की परीक्षा कैसे लेता है?
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