- 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत के समाज सुधार आंदोलनों ने सती, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर रोक और जातिगत भेदभाव के खिलाफ़ कैसे काम किया, और इसे किसने किया
- समाजशास्त्री सतीश सबरवाल के बताए आधुनिक परिवर्तन के तीन पहलू: संचार, संगठन और विचार
- एम.एन. श्रीनिवास की अपनी परिभाषाएँ संस्कृतीकरण और पश्चिमीकरण की, पुस्तक के अपने उदाहरणों और आलोचनाओं के साथ
- आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण, और भारत की कहानी पश्चिम से अलग क्यों है
- पुस्तक के अपने नामों, उद्धरणों और वर्षों के साथ प्रश्नों के उत्तर देना, सामान्य ज्ञान से नहीं
CBSE (2026-27 पाठ्यक्रम): इकाई 9, सांस्कृतिक परिवर्तन, के 5 अंक हैं। इस इकाई में समाज सुधार आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न प्रकार (संस्कृतीकरण, पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण) शामिल हैं। किसी दूसरे बोर्ड के विद्यार्थी इस अध्याय के लिए अपने बोर्ड का वर्तमान पाठ्यक्रम देख लें।
1 संरचनात्मक परिवर्तन से सांस्कृतिक परिवर्तन तक
संरचनात्मक परिवर्तन (पुस्तक 2 का पहला अध्याय) यह दिखाता है कि उपनिवेशवाद ने भारतीय समाज की संरचना को कैसे बदला: औद्योगीकरण और शहरीकरण की वजह से खेत की जगह फ़ैक्टरियाँ बनीं और गाँव की जगह शहर काम व रहने की जगह बन गए। यह अध्याय एक जुड़े हुए पर अलग विषय पर है: संस्कृति, संरचना नहीं। समाजशास्त्री संस्कृति को सामाजिक रूप से स्थापित मानदंड या व्यवहार के प्रतिमान मानते हैं (नीचे परिभाषा 2)। यह अध्याय जिन बदलावों की बात करता है, वे संस्कृति, जीवनशैली, मूल्य, फ़ैशन और यहाँ तक कि भाव-भंगिमाओं में हुए।
सामाजिक संरचना लोगों के संबंधों की वह सतत व्यवस्था है जो संस्थाओं द्वारा परिभाषित या नियंत्रित होती है।
संस्कृति सामाजिक रूप से स्थापित प्ररूप या व्यवहार के प्रतिमान है।
यह अध्याय उपनिवेशी शासन के प्रभाव से उपजे दो जुड़े हुए बदलावों को देखता है:
जानबूझकर किया सुधार
19वीं सदी के समाज सुधारकों और 20वीं सदी की शुरुआत के राष्ट्रवादियों की सोची-समझी कोशिशें, जो महिलाओं और “निचली” जातियों के साथ भेदभाव करने वाली प्रथाओं को बदलना चाहती थीं।
कम-जानबूझकर हुआ बदलाव
सांस्कृतिक व्यवहार में ऐसे बदलाव जो उतने सोच-समझकर नहीं हुए, फिर भी निर्णायक थे: संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण, इन चार प्रक्रियाओं के ज़रिए समझे जाते हैं।
पुस्तक यह बात सीधे कहती है: संस्कृतीकरण की प्रक्रिया उपनिवेशवाद की शुरुआत से पहले से होती रही। बाकी तीन प्रक्रियाएँ, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण, भारत के लोगों की वे जटिल प्रतिक्रियाएँ हैं जो उपनिवेशवाद से हुए परिवर्तनों के कारण हुईं। अपने उत्तर में चारों प्रक्रियाओं को “औपनिवेशिक” मत लिखिए।
2 समाज सुधार आंदोलन
2.1 पुरानी कुरीतियाँ, नया संदर्भ
19वीं सदी तक भारतीय समाज में कुछ “सामाजिक कुरीतियाँ” व्यापक रूप से मानी जाती थीं: सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर रोक, और जातिगत भेदभाव। पुस्तक स्पष्ट कहती है कि सामाजिक भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिरोध कोई नई बात नहीं थी: यह बौद्ध धर्म, भक्ति आंदोलन और सूफ़ी आंदोलनों में उपनिवेशी शासन से बहुत पहले से केंद्रीय था।
19वीं सदी के सुधार प्रयासों की ख़ास बात उनका आधुनिक संदर्भ और विचारों का मिश्रण था। सुधारकों ने पश्चिमी उदारवाद के आधुनिक विचारों को भारत के अपने पारंपरिक साहित्य पर एक नई नज़र के साथ रचनात्मक रूप से जोड़ा।
2.2 विचारों का मिश्रण: चार सुधारक
पुस्तक का अपना बॉक्स 2.1 इसी मिश्रित तरीक़े के चार उदाहरण देता है। हर सुधारक, उसका मुद्दा, और उसने आधुनिक और पारंपरिक तर्कों को कैसे जोड़ा, यह ठीक से याद रखिए।
राजा राम मोहन राय
सती प्रथा का विरोध मानवीय और प्राकृतिक अधिकारों की दलील और हिंदू शास्त्रों, दोनों के आधार पर किया, अकेले किसी एक के आधार पर नहीं।
रानाडे
उनकी रचनाओं, द टेक्स्ट्स ऑफ़ द हिंदू लॉ ऑन द लॉफ़ुलनेस ऑफ़ द रीमैरिज ऑफ़ विडोज़ (यानी “विधवाओं के पुनर्विवाह की वैधता पर हिंदू शास्त्रों के प्रमाण”) और वैदिक अथॉरिटीज़ फ़ॉर विडो मैरिज (यानी “विधवा विवाह के वैदिक प्रमाण”), ने विधवा पुनर्विवाह के लिए शास्त्रीय आधार बताया।
सर सैयद अहमद ख़ान
इस्लाम की उनकी व्याख्या ने स्वतंत्र अन्वेषण (इजतिहाद) की वैधता पर ज़ोर दिया, और कुरान में लिखी गई बातों व आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित प्रकृति के नियमों में समानता जाहिर की।
वीरेशलिंगम
उनकी पुस्तक द सोर्सेज़ ऑफ़ नॉलेज (यानी “ज्ञान के स्रोत”) में न्याय-शास्त्र की नई शैली (नव्य-न्याय तर्कशास्त्र, यानी न्याय-दर्शन की एक तार्किक प्रणाली) की समझ दिखती है; उन्होंने जीवविज्ञानी जुलियस हक्सले की रचनाओं का अनुवाद भी किया।
नई शिक्षा में भी यही मिश्रण था: मानविकी और सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम का साहित्यिक हिस्सा यूरोपीय नवजागरण (रेनेसाँ), धर्म-सुधार और प्रबोधन (एनलाइटनमेंट) से लिया गया था, और इसके विषय मानवतावादी, धर्मनिरपेक्ष और उदार थे, फिर भी सुधारक भारत के अपने ग्रंथों का इस्तेमाल करते हुए तर्क देते थे।
2.3 सबरवाल के परिवर्तन के तीन पहलू
समाजशास्त्री सतीश सबरवाल ने उपनिवेशी भारत में आधुनिक बदलाव के ढाँचे के तीन पहलू बताए: संचार के तरीक़े, संगठन के रूप, और विचारों की प्रकृति।
संचार के तरीक़े
नई तकनीक ने विचारों के फैलाव को तेज़ किया: छापाख़ाना, टेलीग्राफ़, और बाद में माइक्रोफ़ोन; भाप के जहाज़ और रेलवे ने लोगों व सामान की आवाजाही आसान की। पंजाब और बंगाल के सुधारक मद्रास और महाराष्ट्र के सुधारकों से विचार बाँटते थे। बंगाल के केशव चंद्र सेन ने 1864 में मद्रास का दौरा किया। पंडिता रमाबाई ने देश के कई हिस्सों की यात्रा की। ईसाई मिशनरी आज के नागालैंड, मिज़ोरम और मेघालय के दूर-दराज़ इलाक़ों तक पहुँचे।
संगठन के रूप
आधुनिक सामाजिक संगठन बने: बंगाल में ब्रह्म समाज और पंजाब में आर्य समाज। अंजुमन-ए-ख़्वातीन-ए-इस्लाम (यानी अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन; पुस्तक के शब्दों में, भारत में मुस्लिम महिलाओं की राष्ट्र-स्तरीय संस्था) की स्थापना 1914 में हुई। सुधारक सार्वजनिक सभाओं के साथ-साथ अख़बारों और पत्रिकाओं के ज़रिए भी बहस करते थे; रचनाओं का एक भारतीय भाषा से दूसरी में अनुवाद भी होता था, जैसे विष्णु शास्त्री ने 1868 में इंदु प्रकाश में विद्यासागर की पुस्तक का मराठी अनुवाद प्रकाशित किया।
विचारों की प्रकृति
उदारवाद और आज़ादी के नए विचार, घर बसाने और विवाह के नए विचार, माँ-बेटियों की नई भूमिकाएँ सामने आईं, साथ ही भारत की अपनी संस्कृति और परंपरा पर एक नया आत्म-गौरव भी। शिक्षा को आधुनिक बनने के साथ-साथ प्राचीन विरासत बनाए रखने के लिए ज़रूरी माना गया।
2.4 महिला शिक्षा पर बहस
महिला शिक्षा के विचार पर गहरी बहस हुई। जोतिबा फुले (इन्हें ज्योतिबा भी कहा जाता है) ने ही पुणे में महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला। कुछ सुधारकों का मानना था कि पूर्व-आधुनिक भारत में महिलाएँ शिक्षित थीं; दूसरों ने इसे केवल कुछ विशेषाधिकार-प्राप्त महिलाओं तक सीमित बताकर इसका विरोध किया। सुधारक इस बात पर भी असहमत थे कि किस अतीत पर गर्व करें: जोतिबा फुले ने पूर्व-आर्य काल की गरिमा को याद किया, जबकि बाल गंगाधर तिलक ने आर्य काल की गरिमा पर ज़ोर दिया। दोनों ने सुधार के लिए परंपरा का सहारा लिया, पर अलग-अलग परंपराओं की ओर इशारा किया।
2.5 एक नहीं, कई सुधार आंदोलन
सुधार आंदोलनों में कुछ समान विषय थे, पर पुस्तक साफ़ कहती है कि उनमें अनेक महत्वपूर्ण असहमतियाँ भी थीं। चार अलग-अलग रुख साथ-साथ मौजूद थे; इन्हें चार अलग बिंदुओं के रूप में याद रखिए, एक मिले-जुले नज़रिए के रूप में नहीं।
चिंता का दायरा
- कुछ सुधारकों की चिंता उच्च जातियों के मध्यवर्गीय महिलाओं और पुरुषों की समस्याओं से जुड़ी थी
- दूसरे सुधारकों के लिए भेदभाव झेलने वाली जातियों के साथ हुआ अन्याय ही मुख्य मुद्दा था
धर्म को लेकर नज़रिया
- कुछ के लिए सामाजिक कुरीतियाँ सच्चे हिंदुत्व की भावना के कमज़ोर होने का नतीजा थीं
- दूसरों के लिए जाति और लैंगिक शोषण धर्म में ही अंतर्निहित था
2.6 मुस्लिम सुधार बहसें
मुस्लिम सुधारकों में बहुविवाह और पर्दा प्रथा के अर्थ पर सक्रिय बहस हुई। जहाँआरा शाह नवास ने अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन में बहुविवाह के खिलाफ़ एक प्रस्ताव रखा, यह कहते हुए कि मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में जिस तरह का बहुविवाह होता है, वह कुरान की मूल भावना के ही खिलाफ़ है, और शिक्षित महिलाओं का यह कर्तव्य है कि वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस प्रथा को ख़त्म करें। इस प्रस्ताव से उर्दू अख़बारों और पत्रिकाओं में एक बहस छिड़ गई: पंजाब से निकलने वाली महिलाओं की पत्रिका तहसिब-ए-निसवान ने इस प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया, जबकि दूसरी पत्रिकाओं ने इसका विरोध किया।
पुस्तक का क्रियाकलाप 2.1 वीरेशलिंगम, पंडिता रमाबाई, विद्यासागर, जोतिबा फुले और सर सैयद अहमद खान के साथ दयानंद सरस्वती और श्री नारायण गुरु के बारे में भी जानकारी इकट्ठी करने को कहता है; पाठ इन दोनों के बारे में और कुछ नहीं बताता।
बहस सिर्फ़ समुदायों के बीच नहीं, समुदायों के भीतर भी हुई। सती प्रथा का विरोध ब्रह्म समाज ने किया था, पर बंगाल के हिंदू समाज के रूढ़िवादियों ने धर्म सभा बनाई, जिसने अंग्रेज़ों से याचिका करते हुए कहा कि सुधारकों को पवित्र ग्रंथों की नई व्याख्या करने का कोई अधिकार नहीं है।
19वीं सदी के सुधार आंदोलनों को एक साथ, एकजुट अभियान मत लिखिए। पुस्तक हिंदू समुदाय (ब्रह्म समाज बनाम रूढ़िवादियों की धर्म सभा) और मुस्लिम समुदाय (बहुविवाह-विरोधी प्रस्ताव बनाम उसके आलोचक), दोनों में सीधा मतभेद दर्ज करती है। अपने उत्तर में यह मतभेद दिखना चाहिए, उसे एक जैसा बनाकर नहीं लिखना चाहिए।
3 संस्कृति जीवंत है: यह आपस में जुड़ी है और असमान रूप से बदलती है
चारों प्रक्रियाओं को अलग-अलग देखने से पहले, पुस्तक एक ज़रूरी बात कहती है: संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण एक-दूसरे से जुड़ी हैं और साथ-साथ मौजूद रहती हैं। एक ही व्यक्ति कुछ मामलों में आधुनिक और किसी दूसरे मामले में पारंपरिक हो सकता है। इस सह-अस्तित्व को अक्सर भारत और दूसरे ग़ैर-पश्चिमी देशों के लिए स्वाभाविक माना जाता है, पर समाजशास्त्र सिर्फ़ इतना कहकर नहीं रुकता; यह क्यों और कैसे, इसकी पड़ताल भी करता है।
औपनिवेशिक आधुनिकता में ख़ुद भी विरोधाभास थे। पश्चिमी शिक्षा पाने वाला भारतीय मध्यम वर्ग प्रबोधन (एनलाइटनमेंट) के विचारकों और उदार-लोकतांत्रिक दार्शनिकों को पढ़ता था, एक उदार, प्रगतिशील भारत का सपना देखता था, फिर भी उपनिवेशी शासन से अपमानित होकर इसी वर्ग ने पारंपरिक ज्ञान और विद्वता पर गर्व भी जताया। इसका मतलब है कि आधुनिकता सिर्फ़ नए विचार नहीं लाई, बल्कि परंपरा पर नए सिरे से सोचना और उसकी नई व्याख्या भी लाई। संस्कृति और परंपरा, दोनों जीवंत चीज़ें हैं: लोग इन्हें सीखते हैं, और साथ ही इनमें बदलाव भी करते हैं।
पुस्तक का अपना रोज़मर्रा का उदाहरण साड़ी है। परंपरागत रूप से साड़ी एक ढीला, बिना सिला कपड़ा थी, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह से पहना जाता था। आज एक आधुनिक मध्यम वर्ग की महिला जिस तरह साड़ी पहनती है, वह पारंपरिक साड़ी और पश्चिमी “पेटीकोट” व “ब्लाउज़” का एक नया मिश्रण है।
भारत की संरचनात्मक और सांस्कृतिक विविधता का मतलब है कि ये चारों प्रक्रियाएँ अलग-अलग क्षेत्र, वर्ग, जाति, और एक ही समूह में स्त्री-पुरुष को भी अलग-अलग तरह से प्रभावित करती हैं। पुस्तक ए.के. रामानुजन के अपने पिता के वर्णन को “आधुनिकता एवं परंपरा का मिश्रण” के एक उदाहरण के रूप में देती है (क्रियाकलाप 2.3 ऐसे अन्य उदाहरण खोजने को कहता है): एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण सज्जन, जो श्री वैष्णव जातिगत तिलक और सफ़ेद पगड़ी पहनते थे, फिर भी टूटल टाई, क्रोमेंट्ज़ बटन (यानी पश्चिमी टाई और बटन के ब्रांड) और अंग्रेज़ी सर्ज जैकेट (यानी ऊन से बना एक मज़बूत विदेशी कपड़ा) अपनी मलमल की धोती के ऊपर, पारंपरिक ब्राह्मण शैली में लपेटकर पहनते थे।
4 संस्कृतीकरण
संस्कृतीकरण, जो शब्द एम.एन. श्रीनिवास ने गढ़ा, वह प्रक्रिया है जिसमें कोई “निचली” जाति, जनजाति या समूह किसी ऊँची, ख़ासकर “द्विज” (यानी “दो बार जन्मी”, उच्च वर्ण की) जाति के रीति-रिवाज, कर्मकांड, विश्वास, विचारधारा और जीवन-शैली अपना लेता है।
इसका प्रभाव कई तरफ़ दिखता है: भाषा, साहित्य, विचारधारा, संगीत, नृत्य, नाटक, जीवन-शैली और कर्मकांड में। यह मुख्यतः हिंदू दायरे के भीतर की प्रक्रिया है, पर श्रीनिवास ने ख़ुद तर्क दिया कि यह हिंदू धर्म के बाहर के संप्रदायों और समूहों में भी दिखती है।
4.1 क्षेत्रीय भिन्नता
| जहाँ कोई ऊँची संस्कृतीकृत जाति प्रभावी थी | जहाँ ग़ैर-संस्कृतीकृत जातियाँ प्रभावी थीं |
|---|---|
| पूरे क्षेत्र की संस्कृति में कुछ हद तक संस्कृतीकरण हुआ | उनका ही प्रभाव ज़्यादा मज़बूत रहा, इसे पुस्तक विसंस्कृतीकरण कहती है |
इसके अलावा अन्य क्षेत्रीय विभिन्नताएँ भी पाई जाती हैं। पंजाब में संस्कृत-परंपरा का प्रभाव कभी बहुत मज़बूत नहीं रहा; कई सदियों तक, 19वीं सदी की तीसरी तिमाही तक, वहाँ फ़ारसी प्रभाव ही प्रभावी रहा।
“किसी भी समूह का संस्कृतीकरण उसकी प्रस्थिति को स्थानीय जाति संस्तरण में उच्चता की तरफ़ ले जाता है। सामान्यतया यह माना जाता है कि संस्कृतीकरण संबंधित समूह की आर्थिक अथवा राजनीतिक स्थिति में सुधार है अथवा हिंदुत्व की महान-परंपराओं का किसी स्रोत के साथ उसका संपर्क होता है। परिणामस्वरूप उस समूह में उच्च चेतना का भाव उभरता है। महान परंपराओं का यह स्रोत कोई तीर्थ स्थल हो सकता है, कोई मठ हो सकता है अथवा कोई मतांतर वाला संप्रदाय हो सकता है।”
एम.एन. श्रीनिवास
पुस्तक एक सामान्य बात भी जोड़ती है: संस्कृतीकरण में लोग सांस्कृतिक दृष्टि से प्रतिष्ठित समूहों के रीति-रिवाज और नाम अपनाकर अपनी प्रस्थिति ऊँची करते हैं। जिस संदर्भ प्रारूप (यानी जिस प्रतिष्ठित समूह की नक़ल की जाती है) की ओर लोग देखते हैं, वह अधिकतर आर्थिक रूप से बेहतर होता है, और जब व्यक्ति धनवान होने लगते हैं तो उनकी आकांक्षाओं को प्रतिष्ठित समूह भी स्वीकारने लगते हैं।
भारत जैसे बेहद असमान समाज में निचली जातियों के लिए ऊँची जातियों के रीति-रिवाज अपनाने में असली बाधाएँ रही हैं: परंपरागत रूप से प्रभावी जाति उन निचली जातियों को दंडित करती थी जो इसकी हिम्मत करती थीं।
कुमुद पावड़े अपनी आत्मकथा में बताती हैं कि कैसे एक दलित महिला संस्कृत की शिक्षिका बनी। एक छात्रा के रूप में वे संस्कृत की ओर आकर्षित हुईं, शायद इसलिए क्योंकि यह उस क्षेत्र में प्रवेश का ज़रिया था जो जाति और लिंग, दोनों के कारण उनके लिए बंद था, और शायद इसलिए भी क्योंकि इससे वे मूल संस्कृत साहित्य में यह पढ़ सकती थीं कि उनमें स्त्री और दलितों के बारे में क्या कहा गया है। पढ़ाई में आगे बढ़ने के साथ उन्हें कई तरह की सामाजिक प्रतिक्रियाएँ झेलनी पड़ीं, आश्चर्य से लेकर ईर्ष्या तक, और संरक्षित स्वीकृति से लेकर पूर्ण अस्वीकृति तक। जैसा वे ख़ुद कहती हैं:
“इसका परिणाम ये हुआ कि मैं अपनी जाति को भूलने की पूरी कोशिश करती हूँ लेकिन ये प्रायः असंभव है, और इससे मुझे वो अनुभव याद आता है जो मैंने कहीं सुना था: ‘जो जन्म से मिला हो, और जो मरने के बाद भी नष्ट न हो, वो जाति है।'”
4.2 संस्कृतीकरण की पाँच आलोचनाएँ
पुस्तक संस्कृतीकरण की अवधारणा पर पाँच अलग-अलग आलोचनाएँ देती है। पाँचों को अलग-अलग बिंदु के रूप में याद कीजिए।
संरचनात्मक बदलाव नहीं
यह सामाजिक गतिशीलता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है। इससे केवल कुछ व्यक्तियों की स्थिति बदलती है; असमान ढाँचा जस का तस बना रहता है।
ऊँची जाति को “श्रेष्ठ” मानना
यह ऊँची जाति के तरीक़ों को श्रेष्ठ और निचली जाति के तरीक़ों को हीन मानती है, जिससे नक़ल करना स्वाभाविक और वांछनीय लगने लगता है।
असमानता को सही ठहराना
यह असमानता और बहिष्कार पर टिके एक मॉडल को सही ठहराती लगती है, यह मानते हुए कि समूहों की शुद्धता और अशुद्धता में विश्वास करना ठीक है।
प्रतिगामी प्रथाओं का फैलना
उच्च जाति के अनुष्ठानों और रिवाजों को स्वीकृति मिलने से लड़कियों और महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में सबसे नीचे धकेल दिया जाता है, और कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा और अन्य समूहों के साथ जातिगत भेदभाव बढ़ जाते हैं।
दलित संस्कृति का क्षरण
दलित संस्कृति और समाज के मूलभूत पक्षों को पिछड़ापन मान लिया जाता है: निम्न जाति के लोगों के श्रम को निम्न और “शर्मदायक” माना जाता है, और शिल्प, औषधियों की जानकारी, पर्यावरण, कृषि और पशुपालन के ज्ञान को औद्योगिक युग में गैर-उपयोगी मान लिया जाता है।
क्रियाकलाप 2.4 पूछता है: क्या इस प्रक्रिया में जेंडर पर आधारित भेदभाव के सबूत दिखते हैं, और क्या यह पुरुषों की स्थिति में परिवर्तन लाती है जबकि महिलाओं के लिए सत्य इससे विपरीत है? चौथी आलोचना इस पर सोचने का एक आधार देती है।
ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन और 20वीं सदी में क्षेत्रीय स्वचेतना के विकास के साथ, कई भारतीय भाषाओं में संस्कृत के शब्दों व वाक्यांशों को जानबूझकर हटाने की कोशिश हुई। पिछड़े वर्गों के आंदोलनों का एक निर्णायक परिणाम यह हुआ कि जातीय समूहों और व्यक्तियों की ऊर्ध्वगामी गतिशीलता में पंथनिरपेक्ष कारकों की भूमिका पर बल दिया जाने लगा। प्रभावी जातियों में अब वैश्य, क्षत्रिय या ब्राह्मण जैसा दिखने की इच्छा नहीं रही; उल्टा, प्रभावी जाति का सदस्य होना ही प्रतिष्ठा की बात बन गई। हाल के वर्षों में दलितों ने अपनी ख़ुद की पहचान पर गर्व करना शुरू किया है।
5 पश्चिमीकरण
एम.एन. श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण को परिभाषित किया है: “यह भारतीय समाज और संस्कृति में, लगभग 150 सालों के ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप आए परिवर्तन हैं, जिसमें विभिन्न पहलू आते हैं, जैसे— प्रौद्योगिकी, संस्था, विचारधारा, और मूल्य।”
5.1 पश्चिमीकरण के प्रकार
पुस्तक कहती है कि पश्चिमीकरण के विभिन्न प्रकार रहे हैं। इनमें से दो का वर्णन है:
छोटे तबके की उप-संस्कृति
- पश्चिमी संस्कृति से सबसे पहले संपर्क में आए भारतीयों के एक छोटे तबके में एक पश्चिमी उप-सांस्कृतिक ढाँचा बना
- बुद्धिजीवियों ने पश्चिमी सोच के तरीक़े और जीवन-शैली अपनाई, और इसे फैलाने में भी मदद की
- 19वीं सदी के शुरुआती कई सुधारक इसी तरह के थे
व्यापक फैलाव
- नई तकनीक, पहनावे, भोजन जैसे पश्चिमी सांस्कृतिक लक्षणों का बड़े पैमाने पर फैलाव, आम आदतों में बदलाव के साथ
- पुस्तक का अपना उदाहरण: पूरे देश में मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से के परिवारों में टेलीविज़न, फ्रिज, सोफ़ा सेट, खाने की मेज़ और कुर्सी होना
पश्चिमीकरण को आधुनिकीकरण के बराबर मत समझिए। पश्चिमीकरण में संस्कृति के बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति भी होती है; इसका यह मतलब आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और समानता के आधुनिक मूल्य भी अपना लिए गए हों। कई उत्तर ग़लती से “पश्चिमी कपड़े” को अपने आप “आधुनिक मूल्य” मान लेते हैं, पुस्तक इन दोनों को साफ़-साफ़ अलग करती है।
पुस्तक का क्रियाकलाप 2.5 इस विरोधाभास के दो उदाहरण देता है: पश्चिमी शिक्षा पाए लोग जिनके कुछ विशिष्ट सजातीय या धार्मिक समुदायों के बारे में विचार पूर्वाग्रही हैं; और एक परिवार जिसने घर की आंतरिक साज-सज्जा में पश्चिमी संस्कृति का बाह्य स्वरूप अपनाया है पर महिलाओं की भूमिका के बारे में उसके विचार अत्यंत संकीर्ण हैं। साथ में बालिका भ्रूण हत्या का उल्लेख है, जिसमें महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग साथ दिखता है। क्रियाकलाप यह भी पूछता है कि क्या ऐसा दोहरापन केवल भारतीयों में है, या पश्चिमी समाजों में भी प्रजातीय और भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण मौजूद हैं।
5.2 कला में पश्चिमीकरण
पश्चिम ने भारतीय कला और साहित्य को भी प्रभावित किया। कलाकार रवि वर्मा, अबनिंद्रनाथ टैगोर, चंदू मेनन और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, सभी उपनिवेशी टकराव से जूझ रहे थे।
1870 में रवि वर्मा को अपना पहला भुगतान-आधारित चित्र बनाने के लिए अनुबंधित किया गया: किजाक्के पलाट कृष्णा मेनन के परिवार का चित्र। इस चित्र में दो शैलियाँ मिलती हैं: पुराने जल-रंग की सपाट, द्वि-आयामी बनावट, और तेल-रंग से संभव बनी नई परिप्रेक्ष्य (पर्सपेक्टिव) व भ्रामक गहराई (इल्यूज़निज़्म) की तकनीकें। चित्र में बैठे लोगों को उम्र और स्तरीकरण के अनुसार सजाया गया है, जिससे 19वीं सदी के उन यूरोपीय चित्रों की याद आती है जिनमें बुर्जुआ (यानी संपन्न मध्यम वर्ग के) परिवार दिखाए गए हैं। पुस्तक ख़ुद जिस विडंबना की बात करती है वह यह है: यह चित्र मातृवंशीय (यानी वंश माँ से चलने वाले) केरल के नायरों का है, जो कृष्णा मेनन की जाति थी, और उस समय बना जब वे पितृस्थानीय एकल परिवार (जहाँ दंपती पति के परिवार के घर रहते हैं) से ज़्यादा परिचित भी नहीं थे; फिर भी इसमें दिखाया गया परिवार आधुनिक पश्चिम के विशिष्ट पितृवंशीय (यानी वंश पिता से चलने वाले) एकाकी परिवार जैसा लगता है, जिसमें पिता, माता और बच्चे हैं।
5.3 क्या पश्चिमीकरण सिर्फ़ “ऊँची जातियों” तक सीमित था?
श्रीनिवास का कहना था कि जहाँ “निचली जातियाँ” संस्कृतीकरण चाहती थीं, वहीं “ऊँची जातियाँ” पश्चिमीकरण चाहती थीं। भारत जैसे विविधता भरे देश में इस सामान्यीकरण को हर जगह लागू करना मुश्किल है: केरल के थिय्या समुदाय के अध्ययन, जिन्हें किसी भी तरह “ऊँची जाति” नहीं माना जाता, दिखाते हैं कि थिय्या भी पश्चिमीकरण की इच्छा रखते हैं और भरसक प्रयास भी करते हैं। अभिजात थिय्याओं ने ब्रिटिश संस्कृति को एक ज़्यादा व्यापक-दृष्टिकोण वाला जीवन अपनाने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल किया, जो जाति व्यवस्था की आलोचना भी करता था।
पश्चिमी शिक्षा ने पूर्वोत्तर के समूहों के लिए भी नए अवसर खोले। पुस्तक के बॉक्स 2.4 (आओ 2005) में एक नागा लेखक अपने परिवार की कहानी बताते हैं: यूरोपियनों के संपर्क में आए अन्य नागाओं की तरह लेखक के दादा यह मानते थे कि शिक्षा से ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने लेखक की माँ को पढ़ने के लिए पहले असम के पास वाले स्कूल में और फिर दूर शिमला भेजा। गाँव के एक शिक्षित आदमी ने लेखक की माँ से कहा था कि पढ़-लिखकर वे भी विजयलक्ष्मी पंडित जैसी बन सकती हैं, यानी नेहरू की बहन, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। लेखक के पिता ने कठिन परिश्रम से स्कूल-कॉलेज की शिक्षा पाई और शिलांग में कॉलेज की पढ़ाई की। उस दौर के नागाओं के लिए अंग्रेज़ी केवल तरक़्क़ी की सीढ़ी नहीं थी, बल्कि आपस में जुड़ने की साझा ज़बान भी बनी, क्योंकि बमुश्किल 20 किलोमीटर की दूरी पर बसी जनजातियाँ भी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग बोलियाँ बोलती थीं। ये शिक्षित लोग अपने लोगों की आवाज़ बन गए और उन्होंने अंग्रेज़ी को राजकीय प्रशासकीय भाषा बनाया।
5.4 पश्चिमीकरण और पीढ़ियों का अंतर
पुस्तक के बॉक्स 2.3 में एक असमिया माँ बताती हैं कि पश्चिमीकरण कैसे पीढ़ियों के बीच फ़र्क़ को और गहरा कर सकता है: उन्हें अपने ही बच्चे कभी-कभी पूरी तरह अपरिचित-से लगते हैं; न सोचने का तरीका एक है, न पहनना-ओढ़ना, न बोलना-चालना (व्हिटनी ह्यूस्टन के पॉप गाने बनाम अपने मीरा-भजन, गिटार बनाम अपने बरगीत यानी असमिया भक्ति गीत), फिर भी वे उन्हें पूरे दिल से प्यार करती हैं। पुस्तक ख़ुद यहाँ एक कठिन सवाल उठाती है: क्या केवल पश्चिमीकरण ही पीढ़ियों के बीच होने वाले संघर्ष का कारण है, और क्या ये संघर्ष आवश्यक बुराई है? अपने उत्तर में इसे एक खुला सवाल मानिए, कोई तय बात नहीं।
6 आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण
पुस्तक यहाँ एक बात साफ़ कहती है: हम पश्चिमीकरण और समाज सुधार आंदोलनों में एक स्पष्ट संबंध पाते हैं। पुस्तक आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण को साथ पढ़ती है, क्योंकि ये आपस में जुड़ी हैं और आधुनिक विचारों का हिस्सा हैं। पुस्तक की शुरुआत में उपनिवेशवाद-बाद की तीन प्रक्रियाओं को “आधुनिकीकरण, लौकिकीकरण एवं पश्चिमीकरण” कहा गया है; आगे जाकर मुख्य अनुभाग इसी विचार को पंथनिरपेक्षीकरण शब्द से बुलाता है। दोनों शब्द पुस्तक के ही हैं, एक ही विचार के लिए।
6.1 आधुनिकीकरण
प्रारंभिक वर्षों में आधुनिकीकरण का आशय प्रौद्योगिकी और उत्पादन प्रक्रियाओं में होने वाले सुधार से था। 19वीं सदी से, और विशेषकर 20वीं सदी के दौरान, इस शब्द को सकारात्मक और वांछनीय मूल्यों से जोड़कर समझा जाने लगा, और इसका अर्थ व्यापक हुआ: विकास का वह तरीका जिसे पश्चिमी यूरोप या उत्तरी अमेरिका ने अपनाया, इस सलाह के साथ कि अन्य समाजों में भी आवश्यक रूप से विकास का यही तरीका और रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
भारत की आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण की अपनी कहानी पश्चिम से अलग है, क्योंकि भारत में पूँजीवाद की शुरुआत उपनिवेशी संदर्भ के भीतर ही हुई, पश्चिम की तरह नहीं।
“आधुनिकता” का मतलब यह समझ में आता है कि इसके सामने सीमित-संकीर्ण-स्थानीय दृष्टिकोण कमज़ोर पड़ जाते हैं और सार्वभौमिक प्रतिबद्धता व विश्वजनीन दृष्टिकोण (यानी समूचे विश्व का नागरिक होना) ज़्यादा प्रभावशाली होता है; इसमें उपयोगिता, गणना और विज्ञान की सत्यता को भावुकता, धार्मिक पवित्रता और अवैज्ञानिक तत्त्वों के स्थान पर महत्त्व दिया जाता है; इसके प्रभाव में सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाती है, न कि समूह को; इसके मूल्यों के मुताबिक़ मनुष्य ऐसे समूह/संगठन में रहते और काम करते हैं जिसका चयन जन्म के आधार पर नहीं बल्कि इच्छा के आधार पर होता है; इसमें भाग्यवादी प्रवृत्ति के ऊपर ज्ञान तथा नियंत्रण क्षमता को प्राथमिकता दी जाती है; अपनी पहचान चुनकर अर्जित की जाती है, न कि जन्म के आधार पर; और कार्य को परिवार, गृह व समुदाय से अलग कर नौकरशाही संगठन में शामिल किया जाता है।
रूडोल्फ एंड रूडोल्फ, “द मॉडर्निटी ऑफ़ ट्रेडिशन” (1967)
सीधे शब्दों में कहें तो: एक आधुनिक व्यक्ति सिर्फ़ स्थानीय नहीं, सार्वभौमिक संदर्भों से प्रभावित होता है। आप कौन-सा काम करेंगे, यह आपकी अपनी पसंद से तय होता है, न कि आपके माता-पिता के पेशे से। आपकी सामाजिक स्थिति आपकी उपलब्धि पर निर्भर करती है, केवल इस पर नहीं कि आप कौन पैदा हुए। रीति-रिवाज़ की जगह वैज्ञानिक सोच मज़बूत होती जाती है।
6.2 पंथनिरपेक्षीकरण
आधुनिक पश्चिम में पंथनिरपेक्षीकरण (यानी सेक्युलराइज़ेशन) का मतलब आमतौर पर धर्म के प्रभाव में गिरावट रहा है। यह सभी आधुनिकीकरण-सिद्धांतकारों की एक मान्यता रही है कि आधुनिक समाज लगातार ज़्यादा पंथनिरपेक्ष बनते जाते हैं, और इसे धार्मिक संगठनों से जुड़ाव, उनके सामाजिक-भौतिक प्रभाव, और लोगों के धार्मिक विश्वास के स्तर से मापा जाता है।
पंथनिरपेक्षीकरण को धर्म की एकतरफ़ा, पूरी तरह सिद्ध हो चुकी गिरावट मत मान लीजिए। पुस्तक के अनुसार यह विचार कि आधुनिक युग धार्मिक जीवन को आवश्यक रूप से विलुप्त करेगा, “पूरी तरह से सच नहीं है”: हाल में धार्मिक चेतना में अभूतपूर्व वृद्धि और धार्मिक संघर्ष के उदाहरण सामने आए हैं, और संचार के आधुनिक प्रकारों, संगठन और विचार के स्तर पर नए प्रकार के धार्मिक सुधार संगठनों का उद्भव हुआ (सेक्शन 2 के आधुनिक संगठनों को याद कीजिए)।
भारत में कुछ अनुष्ठानों में प्रत्यक्ष रूप से पंथनिरपेक्षीकृत प्रभाव भी रहा है, और अनुष्ठानों के पंथनिरपेक्ष आयाम भी होते हैं। ये लोगों को अपने मित्रों और अपने से बड़ी उम्र के लोगों से घुलने-मिलने का मौक़ा देते हैं, और कपड़े व जेवर पहनकर परिवार की संपत्ति का प्रदर्शन करने का भी। पुस्तक बताती है कि हाल के दशकों में कर्मकांड के आर्थिक, राजनीतिक और स्थिति-सूचक (स्टेटस) पहलू ज़्यादा स्पष्ट हो गए हैं: किसी शादी के घर के बाहर लगी गाड़ियों की संख्या, और कौन-कौन से वीआईपी मेहमान आए, यह अब परिवार की स्थानीय हैसियत का पैमाना बन गया है। (क्रियाकलाप 2.7 त्योहारों के विज्ञापन इकट्ठे करके उनके संदेश देखने को कहता है।)
6.3 जाति का पंथनिरपेक्षीकरण
परंपरागत भारत में जाति व्यवस्था एक धार्मिक ढाँचे के भीतर काम करती थी: शुद्धता और अशुद्धता की मान्यताएँ इसके केंद्र में थीं। आज यह अक्सर राजनीतिक दबाव समूहों के रूप में काम करती है; आज के भारत में जातिगत संगठनों और जाति-आधारित राजनीतिक दलों का उद्भव हुआ है; ये जातिगत संगठन अपनी माँग मनवाने के लिए दबाव डालते हैं। जाति की इसी बदली हुई भूमिका को पुस्तक जाति का पंथनिरपेक्षीकरण कहती है। (क्रियाकलाप 2.6 विवाह-विज्ञापनों में जाति के उल्लेख देखकर यह सोचने को कहता है कि जाति की भूमिका वही है या बदल गई है।)
“आधुनिक परिदृश्य में, जाति और राजनीति के संबंध की व्याख्या करते हुए आधुनिकता के सिद्धांतों से बना नज़रिया एक प्रकार के भय से ग्रसित होता है। वह इस प्रश्न से शुरू होता है कि क्या जाति समाप्त हो रही है? निश्चित रूप से कोई भी सामाजिक व्यवस्था इस तरह समाप्त नहीं हो जाती। एक ज़्यादा उपयोगी दृष्टि यह होगी कि आधुनिक राजनीति के प्रभाव में जाति कौन-सा रूप लेकर सामने आ रही है, और जाति-अभिमुखित समाज में राजनीति की क्या रूपरेखा है… जहाँ जातीय संरचना एक ऐसा संगठनात्मक समूह प्रदान करती है जिसमें जनसंख्या का एक बड़ा भाग निवास करता है, राजनीति को ऐसी ही संरचना के माध्यम से व्यवस्थित करने का प्रयत्न करना चाहिए। राजनीतिज्ञ जाति-समूहों को इकट्ठा करके अपनी शक्ति को संगठित करते हैं, और जैसे वे संस्थाओं के स्वरूपों को परिवर्तित करते हैं, वैसे ही जाति के स्वरूपों को भी परिवर्तित करते हैं।”
रजनी कोठारी, “कास्ट एंड मॉडर्न पॉलिटिक्स”, सुदीप्तो कविराज (संपा.) पॉलिटिक्स इन इंडिया (1997)
यानी कोठारी के मुताबिक़, राजनीति जाति को ख़त्म नहीं करती, बल्कि जो भी सामाजिक ढाँचा पहले से मौजूद है, राजनीति उसी के ज़रिए ख़ुद को संगठित करती है, चाहे वह ढाँचा जाति ही क्यों न हो।
7 निष्कर्ष: यह अध्याय असल में क्या कहता है
उपनिवेशी अनुभव के भारतीय संस्कृति पर स्थायी परिणाम रहे, जिनमें से कई अनपेक्षित और विरोधाभासी थे। आधुनिकता के पश्चिमी विचारों ने भारतीय राष्ट्रवादियों की कल्पना को आकार दिया, जिससे कुछ ने पारंपरिक ग्रंथों को नए सिरे से देखा, तो कुछ ने उन्हें पूरी तरह ख़ारिज कर दिया। पश्चिमी सांस्कृतिक स्वरूपों की हमारे समाज में पैठ हुई, और पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के आचरण के नए मानदंडों से लेकर कलात्मक अभिव्यक्तियों तक इसकी छाप नज़र आई। समानता और लोकतंत्र के विचारों का गहरा असर पड़ा, जो सुधार आंदोलनों और राष्ट्रीय आंदोलन, दोनों में दिखता है। पुस्तक के अपने शब्दों में, इसका नतीजा सिर्फ़ पश्चिमी विचारों को अपनाना नहीं था, बल्कि परंपरा पर सक्रिय सवाल उठाना और उसकी नई व्याख्या करना भी था।
- यह अध्याय संरचना नहीं, संस्कृति के बारे में है: जानबूझकर किए सुधार आंदोलन, और सांस्कृतिक बदलाव की चार प्रक्रियाएँ
- संस्कृतीकरण उपनिवेशवाद से पहले से होता रहा; आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण उपनिवेशवाद से हुए परिवर्तनों पर लोगों की जटिल प्रतिक्रियाएँ हैं
- सुधारक: राजा राम मोहन राय (सती), रानाडे (विधवा पुनर्विवाह), सर सैयद अहमद ख़ान (इजतिहाद), वीरेशलिंगम (नव्य-न्याय तर्कशास्त्र), फुले (पूर्व-आर्य काल) बनाम तिलक (आर्य काल की गरिमा)
- सबरवाल के तीन पहलू: संचार, संगठन, विचार
- संस्कृतीकरण: श्रीनिवास द्वारा गढ़ा शब्द; “द्विज” जाति के रीति-रिवाज अपनाना; पाँच आलोचनाएँ, ख़ासकर यह कि यह केवल स्थितिगत बदलाव है, संरचनात्मक नहीं
- पश्चिमीकरण: श्रीनिवास की 150-वर्ष-ब्रिटिश-शासन वाली परिभाषा; बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति भी, पर आधुनिक मूल्य आना आवश्यक नहीं
- आधुनिकीकरण: रूडोल्फ एंड रूडोल्फ की परिभाषा जन्म पर नहीं, चुनाव और उपलब्धि पर आधारित है
- पंथनिरपेक्षीकरण: आमतौर पर धर्म की गिरावट का मतलब, पर पुस्तक इसके ख़िलाफ़ सबूत भी देती है; जाति के राजनीतिक दबाव-समूह बनने के लिए भी इस्तेमाल (रजनी कोठारी)
- क्या मैं श्रीनिवास की संस्कृतीकरण और पश्चिमीकरण की सटीक परिभाषाएँ बता सकता/सकती हूँ, सिर्फ़ सामान्य विचार नहीं?
- क्या मैं कम से कम चार 19वीं सदी के सुधारकों के नाम और उनका विशिष्ट योगदान बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं संस्कृतीकरण की पाँचों आलोचनाएँ बिना कोई छोड़े गिना सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं पुस्तक के उदाहरणों से समझा सकता/सकती हूँ कि पश्चिमीकरण आधुनिकीकरण के बराबर क्यों नहीं है?
- क्या मैं “जाति के पंथनिरपेक्षीकरण” को धर्म के ह्रास से बिना मिलाए समझा सकता/सकती हूँ?