सांस्कृतिक परिवर्तन (पुस्तक 2, अध्याय 2) का त्वरित पुनरीक्षण सारांश, परीक्षा से ठीक पहले पढ़ने के लिए: हर परिभाषा, नामित सुधारक और प्रक्रियाएँ, और ज़रूरी तथ्य। विस्तृत व्याख्या और उदाहरणों के लिए पूरे नोट्स अलग से पढ़ें।
1 अध्याय के दो विकास
1
जानबूझकर किया सुधार
19वीं सदी के सुधारकों और 20वीं सदी की शुरुआत के राष्ट्रवादियों ने महिलाओं और “निचली” जातियों के साथ भेदभाव करने वाली प्रथाएँ बदलीं।
2
चार प्रक्रियाएँ
संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण, पश्चिमीकरण। संस्कृतीकरण उपनिवेशवाद से पहले से होता रहा; बाकी तीन उपनिवेशवाद से हुए परिवर्तनों पर लोगों की जटिल प्रतिक्रियाएँ हैं।
2 याद रखने लायक सुधारक
| सुधारक | उन्होंने क्या किया |
|---|---|
| राजा राम मोहन राय | मानवीय-प्राकृतिक अधिकारों की दलील और हिंदू शास्त्रों, दोनों के आधार पर सती प्रथा का विरोध |
| रानाडे | विधवा पुनर्विवाह के लिए शास्त्रीय आधार लिखा |
| सर सैयद अहमद ख़ान | इस्लाम की विवेचना में इजतिहाद (स्वतंत्र अन्वेषण) की वैधता का उल्लेख किया; कुरान की बातों और आधुनिक विज्ञान के प्रकृति-नियमों में समानता जाहिर की |
| वीरेशलिंगम | “द सोर्सेज़ ऑफ़ नॉलेज” लिखी (नव्य-न्याय तर्कशास्त्र); जूलियस हक्सले का अनुवाद किया |
| जोतिबा फुले | पुणे में महिलाओं के लिए पहला स्कूल खोला; “पूर्व-आर्य काल” की गरिमा याद की |
| बाल गंगाधर तिलक | आर्य काल की गरिमा पर ज़ोर दिया |
| जहाँआरा शाह नवास | अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन में बहुविवाह-विरोधी प्रस्ताव रखा |
3 सबरवाल के परिवर्तन के तीन पहलू
1संचार: छापाख़ाना, टेलीग्राफ़, रेलवे
2संगठन: ब्रह्म समाज, आर्य समाज, मुस्लिम महिला सम्मेलन
3विचार: उदारवाद, शिक्षा, सांस्कृतिक गर्व
4 ज़रूरी वर्ष
1864केशव चंद्र सेन का मद्रास दौरा
1868विष्णु शास्त्री का विद्यासागर की पुस्तक का मराठी अनुवाद, इंदु प्रकाश में प्रकाशित
1870रवि वर्मा का पहला भुगतान-आधारित चित्र (कृष्णा मेनन परिवार)
1914अंजुमन-ए-ख़्वातीन-ए-इस्लाम (अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन) की स्थापना
1967रूडोल्फ एंड रूडोल्फ, “द मॉडर्निटी ऑफ़ ट्रेडिशन”
1997रजनी कोठारी, “कास्ट एंड मॉडर्न पॉलिटिक्स” (कविराज, संपा., पॉलिटिक्स इन इंडिया)
5 मुख्य परिभाषाएँ
सभी परिभाषाएँ एक जगह
सामाजिक संरचनाव्यक्तियों के बीच संबंधों की निरंतर व्यवस्था, जो संस्थाओं द्वारा परिभाषित या नियंत्रित होती है
संस्कृतिसामाजिक रूप से स्थापित मानदंड या व्यवहार के प्रतिमान
संस्कृतीकरणनिचली जाति, जनजाति या समूह का किसी ऊँची, “द्विज” जाति के रीति-रिवाज, कर्मकांड, विचारधारा और जीवन-शैली अपनाना
विसंस्कृतीकरणजहाँ ग़ैर-संस्कृतीकृत जातियाँ प्रभावी हों, वहाँ उन्हीं का प्रभाव पूरे क्षेत्र में फैलना
पश्चिमीकरणलगभग 150 वर्षों के ब्रिटिश शासन से आए बदलाव, तकनीक, संस्थाओं, विचारधारा और मूल्यों में
आधुनिकीकरणपहले तकनीक व उत्पादन में सुधार; बाद में पश्चिमी यूरोप/उत्तरी अमेरिका के विकास-पथ को सबके लिए मॉडल मानना
पंथनिरपेक्षीकरण (लौकिकीकरण)पश्चिम में आमतौर पर धर्म के प्रभाव में गिरावट; भारत में जाति के धार्मिक ढाँचे से राजनीतिक दबाव-समूह बनने के लिए भी इस्तेमाल
इजतिहादस्वतंत्र अन्वेषण; सर सैयद अहमद ख़ान ने इस्लाम की विवेचना में इसकी वैधता का उल्लेख किया
6 संस्कृतीकरण: पाँच आलोचनाएँ
1केवल स्थितिगत, संरचनात्मक नहीं
2ऊँची जाति को श्रेष्ठ मानती है
3असमानता और बहिष्कार को सही ठहराती है
4महिलाएँ असमानता की सीढ़ी में नीचे; कन्यामूल्य की जगह दहेज; जातिगत भेदभाव
5दलित संस्कृति के मूल पक्ष पिछड़ापन माने गए; श्रम “शर्मदायक”
संदर्भ प्रारूप (जिस प्रतिष्ठित समूह की नक़ल होती है) अधिकतर आर्थिक रूप से बेहतर होता है; जब व्यक्ति धनवान होने लगते हैं तो उनकी आकांक्षाओं को प्रतिष्ठित समूह भी स्वीकारने लगते हैं।
7 पश्चिमीकरण बनाम आधुनिकीकरण
पश्चिमीकरण
- विभिन्न प्रकार, जैसे: पहले संपर्क में आए भारतीयों के छोटे तबके (बुद्धिजीवी) की पश्चिमी उप-संस्कृति; और नए उपकरण, पोशाक, खाद्य-पदार्थ व आदतों का आम फैलाव (टीवी, फ्रिज, सोफ़ा सेट)
- बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति; आधुनिक मूल्य आना आवश्यक नहीं
- श्रीनिवास: निम्न जातियाँ संस्कृतीकरण, उच्च जातियाँ पश्चिमीकरण; पुस्तक के अनुसार ऐसा सामान्यीकरण अनुपयुक्त है (केरल के थिय्या)
आधुनिकीकरण
- प्रारंभ में: प्रौद्योगिकी और उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार; बाद में: पश्चिमी यूरोप या उत्तरी अमेरिका का विकास-पथ
- रूडोल्फ एंड रूडोल्फ: जन्म की जगह इच्छा पर आधारित चयन, और जन्म से तय पहचान की जगह अर्जित पहचान
- भारत में यह पश्चिम से अलग, उपनिवेशी संदर्भ के भीतर शुरू हुआ
त्वरित रिवीज़न: परीक्षा से एक रात पहले यह ज़रूर पढ़ें
- यह अध्याय संरचना नहीं, संस्कृति के बारे में है: जानबूझकर किए सुधार आंदोलन, और सांस्कृतिक बदलाव की चार प्रक्रियाएँ
- संस्कृतीकरण उपनिवेशवाद से पहले से होता रहा; आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण उपनिवेशवाद से हुए परिवर्तनों पर लोगों की जटिल प्रतिक्रियाएँ हैं
- सुधारक: राजा राम मोहन राय (सती), रानाडे (विधवा पुनर्विवाह), सर सैयद अहमद ख़ान (इजतिहाद), वीरेशलिंगम (नव्य-न्याय तर्कशास्त्र), फुले (महिला शिक्षा, पूर्व-आर्य काल) बनाम तिलक (आर्य काल की गरिमा)
- संस्कृतीकरण: श्रीनिवास द्वारा गढ़ा शब्द; “द्विज” जाति के रीति-रिवाज अपनाना; पाँच आलोचनाएँ, ख़ासकर यह कि यह केवल स्थितिगत बदलाव है, संरचनात्मक नहीं
- पश्चिमीकरण: श्रीनिवास की 150-वर्ष-ब्रिटिश-शासन वाली परिभाषा; बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति भी, पर आधुनिक मूल्य आना आवश्यक नहीं
- आधुनिकीकरण: रूडोल्फ एंड रूडोल्फ की परिभाषा जन्म पर नहीं, चुनाव और उपलब्धि पर आधारित है
- पंथनिरपेक्षीकरण: आमतौर पर धर्म की गिरावट का मतलब, पर पुस्तक इसके ख़िलाफ़ सबूत भी देती है; जाति के राजनीतिक दबाव-समूह बनने के लिए भी इस्तेमाल (रजनी कोठारी)
इसी अध्याय की बाक़ी सामग्री