इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. पुस्तक के अपने शब्दों में सामाजिक संरचना को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: सामाजिक संरचना लोगों के संबंधों की वह सतत व्यवस्था है, जो संस्थाओं द्वारा परिभाषित या नियंत्रित होती है।
प्र. पुस्तक के अपने शब्दों में संस्कृति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: संस्कृति सामाजिक रूप से स्थापित मानदंड या व्यवहार के प्रतिमान हैं।
प्र. संस्कृतीकरण शब्द किसने गढ़ा?
उत्तर: संस्कृतीकरण शब्द एम.एन. श्रीनिवास ने गढ़ा।
प्र. ‘विसंस्कृतीकरण’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: जिस क्षेत्र में ग़ैर-संस्कृतीकृत जातियाँ प्रभावी होती हैं, वहाँ पूरे क्षेत्र में उनका ही प्रभाव फैलता है, इस उल्टी प्रक्रिया को पुस्तक विसंस्कृतीकरण कहती है।
प्र. ‘इजतिहाद’ क्या है, और इस अध्याय में इसका इस्तेमाल किसने किया?
उत्तर: इजतिहाद का अर्थ है स्वतंत्र अन्वेषण। सर सैयद अहमद ख़ान ने इस्लाम की विवेचना में स्वतंत्र अन्वेषण (इजतिहाद) की वैधता का उल्लेख किया, और कुरान में लिखी बातों व आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित प्रकृति के नियमों में समानता जाहिर की।
प्र. जोतिबा फुले ने महिलाओं के लिए पहला स्कूल किस शहर में खोला?
उत्तर: जोतिबा फुले ने महिलाओं के लिए पहला स्कूल पुणे में खोला।
प्र. श्रीनिवास के अनुसार, पश्चिमीकरण कितने वर्षों के ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप आए बदलावों को बताता है?
उत्तर: श्रीनिवास पश्चिमीकरण को लगभग 150 वर्ष के ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप आए बदलावों के रूप में बताते हैं।
प्र. अध्याय ‘जाति के पंथनिरपेक्षीकरण’ से क्या अभिप्राय रखता है?
उत्तर: इसका अर्थ है जाति का धार्मिक ढाँचे (शुद्धता-अशुद्धता की मान्यताओं) से हटकर आज राजनीतिक दबाव-समूहों और जाति-आधारित दलों के रूप में काम करना।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. इस अध्याय में सांस्कृतिक परिवर्तन के रूप में पढ़े गए दो जुड़े हुए विकास कौन-से हैं?
उत्तर: पहला, 19वीं सदी के समाज सुधारकों और 20वीं सदी की शुरुआत के राष्ट्रवादियों की सोची-समझी कोशिशें, जो महिलाओं और ‘निचली’ जातियों के साथ भेदभाव करने वाली प्रथाओं को बदलना चाहती थीं। दूसरा, कम-जानबूझकर हुए पर निर्णायक बदलाव, जिन्हें संस्कृतीकरण, आधुनिकीकरण, पंथनिरपेक्षीकरण और पश्चिमीकरण, इन चार प्रक्रियाओं के ज़रिए समझा जाता है।
प्र. पश्चिमी रूप अपनाने और आधुनिक मूल्यों के बीच विरोधाभास के जो उदाहरण पुस्तक (क्रियाकलाप 2.5) देती है, उन्हें बताइए।
उत्तर: पुस्तक दो उदाहरण देती है: पश्चिमी शिक्षा पाए लोग जिनके कुछ विशिष्ट सजातीय या धार्मिक समुदायों के बारे में विचार पूर्वाग्रही हैं; और एक परिवार जिसने घर की आंतरिक साज-सज्जा में पश्चिमी संस्कृति का बाह्य स्वरूप अपनाया है पर महिलाओं की भूमिका के बारे में उसके विचार अत्यंत संकीर्ण हैं। साथ ही बालिका भ्रूण हत्या का उल्लेख है, जिसमें महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग साथ दिखता है।
प्र. जाति और धर्म को लेकर 19वीं सदी के सुधार आंदोलनों में मौजूद चार रुख बताइए।
उत्तर: कुछ सुधारकों की चिंता उच्च जातियों के मध्यवर्गीय महिलाओं-पुरुषों की समस्याओं से जुड़ी थी; दूसरों के लिए भेदभाव झेलने वाली जातियों के साथ हुआ अन्याय ही मुख्य मुद्दा था; कुछ के लिए सामाजिक कुरीतियाँ सच्चे हिंदुत्व की भावना के कमज़ोर होने का नतीजा थीं; और दूसरों के लिए जाति व लैंगिक शोषण धर्म में ही अंतर्निहित था।
प्र. सतीश सबरवाल का उपनिवेशी भारत में बदलाव का तीन-भागीय ढाँचा क्या था?
उत्तर: सबरवाल ने आधुनिक बदलाव के ढाँचे के तीन पहलू बताए: संचार के तरीक़े (छापाख़ाना, टेलीग्राफ़, रेलवे), संगठन के रूप (ब्रह्म समाज, आर्य समाज, अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन), और विचारों की प्रकृति (उदारवाद, शिक्षा, सांस्कृतिक गर्व के नए विचार)।
प्र. साड़ी के उदाहरण से पुस्तक कैसे दिखाती है कि संस्कृति ‘जीवंत’ है?
उत्तर: परंपरागत रूप से साड़ी एक ढीला, बिना सिला कपड़ा थी, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह से पहना जाता था। आज एक आधुनिक मध्यम वर्ग की महिला जिस तरह साड़ी पहनती है, वह पारंपरिक साड़ी और पश्चिमी ‘पेटीकोट’ व ‘ब्लाउज़’ का एक नया मिश्रण है, जो दिखाता है कि लोग परंपरा को सीखते भी हैं और उसमें बदलाव भी करते हैं।
प्र. पुस्तक रवि वर्मा के परिवार-चित्र (बॉक्स 2.2) को अजीब या विडंबनापूर्ण क्यों बताती है?
उत्तर: यह चित्र मातृवंशीय केरल के नायरों (कृष्णा मेनन की जाति) का है और उस समय बना जब वे पितृस्थानीय एकल परिवार से ज़्यादा परिचित भी नहीं थे; फिर भी इसमें दिखाया गया परिवार आधुनिक पश्चिम के विशिष्ट पितृवंशीय एकाकी परिवार (पिता, माता और बच्चे) जैसा लगता है।
प्र. थिय्या का उदाहरण श्रीनिवास के सामान्यीकरण को कैसे जटिल बनाता है?
उत्तर: श्रीनिवास ने कहा था कि ‘निचली जातियाँ’ संस्कृतीकरण चाहती थीं जबकि ‘ऊँची जातियाँ’ पश्चिमीकरण चाहती थीं। केरल के थिय्या, जो किसी भी प्रकार उच्च जाति के नहीं हैं, उनके अध्ययन से पता लगता है कि वे भी पश्चिमीकरण की इच्छा रखते हैं और भरसक प्रयास भी करते हैं; अभिजात थिय्याओं ने ब्रिटिश संस्कृति को स्वीकार किया और एक ऐसी विश्वजनीन जीवन-शैली की महत्त्वाकांक्षा की जो जाति व्यवस्था की आलोचना करती है।
प्र. पुस्तक के अनुसार अनुष्ठानों के ‘पंथनिरपेक्ष आयाम’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: अनुष्ठानों के पंथनिरपेक्ष आयाम से लोगों को अवसर मिलता है कि वे अपने मित्रों और अपनी उम्र से बड़े लोगों से घुलें-मिलें, और कपड़े व जेवर पहनकर अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करें; पुस्तक का उदाहरण है कि शादी के अवसर पर घर के बाहर लगी मोटर कारों की कतार और वी.आई.पी. मेहमानों का आना परिवार की समृद्धि का सूचक समझा जाता है।
प्र. अध्याय के अनुसार, भारत में आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण की कहानी पश्चिम से अलग क्यों है?
उत्तर: क्योंकि भारत में पूँजीवाद की शुरुआत ख़ुद उपनिवेशी संदर्भ के भीतर हुई, पश्चिम की तरह नहीं, इसलिए भारत का आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण एक अलग, औपनिवेशिक रूप से गढ़े रास्ते पर चला।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. उदाहरण सहित संस्कृतीकरण की पाँच आलोचनाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: (1) यह सामाजिक गतिशीलता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है; इससे कुछ व्यक्तियों की केवल स्थितिगत बदलाव होता है, असमान ढाँचा बना रहता है। (2) यह ऊँची जाति के तरीक़ों को श्रेष्ठ और निचली जाति के तरीक़ों को हीन मानती है, जिससे नक़ल करना स्वाभाविक व वांछनीय लगता है। (3) यह असमानता और बहिष्कार पर टिके मॉडल को सही ठहराती लगती है, जैसे शुद्धता-अशुद्धता में विश्वास करना ठीक हो। (4) उच्च जाति के अनुष्ठानों और रिवाजों को स्वीकृति मिलने से लड़कियों और महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में सबसे नीचे धकेल दिया जाता है, और कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा और अन्य समूहों के साथ जातिगत भेदभाव बढ़ जाते हैं। (5) दलित संस्कृति और समाज के मूलभूत पक्षों को पिछड़ापन मान लिया जाता है: निम्न जाति के श्रम को ‘शर्मदायक’ माना जाता है, और शिल्प, औषधियों, पर्यावरण, कृषि व पशुपालन के ज्ञान को औद्योगिक युग में गैर-उपयोगी मान लिया गया है।
प्र. पुस्तक के बॉक्स 2.1 का इस्तेमाल करते हुए बताइए कि 19वीं सदी के चार सुधारकों ने आधुनिक और पारंपरिक विचारों को कैसे जोड़ा।
उत्तर: राजा राम मोहन राय ने मानवीय-प्राकृतिक अधिकारों की दलील और हिंदू शास्त्र, दोनों के आधार पर सती का विरोध किया। रानाडे ने विधवा पुनर्विवाह के लिए शास्त्रीय आधार पर लिखा। सर सैयद अहमद ख़ान ने इस्लाम की विवेचना में इजतिहाद (स्वतंत्र अन्वेषण) की वैधता का उल्लेख किया और कुरान की बातों व आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित प्रकृति के नियमों में समानता जाहिर की। वीरेशलिंगम की ‘द सोर्सेज़ ऑफ़ नॉलेज’ नव्य-न्याय तर्कशास्त्र की समझ दिखाती है, साथ ही उन्होंने जूलियस हक्सले की रचनाओं का अनुवाद भी किया। राम मोहन राय, सर सैयद और वीरेशलिंगम ने आधुनिक और परंपरागत या धार्मिक तर्कों को जोड़ा; रानाडे के लिए पुस्तक उनके तर्क का शास्त्रीय, परंपरागत पक्ष बताती है।
प्र. सतीश सबरवाल के परिवर्तन के तीन पहलुओं की व्याख्या कीजिए, हर एक के लिए पुस्तक के अपने उदाहरण के साथ।
उत्तर: संचार के तरीक़े: छापाख़ाना, टेलीग्राफ़, माइक्रोफ़ोन, भाप के जहाज़ और रेलवे ने विचारों के फैलाव को तेज़ किया; केशव चंद्र सेन ने 1864 में मद्रास का दौरा किया और पंडिता रमाबाई ने देशभर की यात्रा की। संगठन के रूप: ब्रह्म समाज (बंगाल), आर्य समाज (पंजाब) और अंजुमन-ए-ख़्वातीन-ए-इस्लाम (अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन) (1914) बने, और भारतीय भाषाओं के बीच रचनाओं का अनुवाद हुआ, जैसे विष्णु शास्त्री का 1868 में विद्यासागर की पुस्तक का मराठी अनुवाद। विचारों की प्रकृति: उदारवाद, घर बसाने-विवाह और भारत की अपनी संस्कृति पर नए आत्म-गौरव के विचार सामने आए, शिक्षा को नया महत्व मिला।
प्र. मुस्लिम सुधारकों में बहुविवाह और पर्दा को लेकर हुई बहस को समझाइए, जैसा पुस्तक बताती है।
उत्तर: मुस्लिम समाज सुधारकों ने बहुविवाह और पर्दा प्रथा, दोनों पर सक्रिय स्तर पर बहस की; पुस्तक का उदाहरण बहुविवाह से जुड़ा है। जहाँआरा शाह नवास ने अखिल भारतीय मुस्लिम महिला सम्मेलन में बहुविवाह के खिलाफ़ प्रस्ताव रखा, यह तर्क देते हुए कि मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्सों में जिस तरह का बहुविवाह होता है, वह कुरान की मूल भावना के ही खिलाफ़ है, और शिक्षित महिलाओं का कर्तव्य है कि वे अपने प्रभाव से इसे ख़त्म करें। इस प्रस्ताव से उर्दू अख़बारों और पत्रिकाओं में एक बहस छिड़ गई: तहसिब-ए-निसवान, पंजाब से निकलने वाली महिलाओं की अग्रणी पत्रिका, ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि दूसरी पत्रिकाओं ने इसका विरोध किया, जिससे पता चलता है कि सुधार पर बहस थी, एकमत नहीं।
प्र. पुस्तक के अनुसार पश्चिमीकरण के विभिन्न प्रकार रहे हैं। अध्याय में वर्णित दो प्रकारों में अंतर समझाइए।
उत्तर: पहला प्रकार वह पश्चिमी उप-सांस्कृतिक ढाँचा है जो पश्चिमी संस्कृति से सबसे पहले संपर्क में आए भारतीयों के एक छोटे तबके, ख़ासकर बुद्धिजीवियों में बना, जिन्होंने इसके सोचने के तरीक़े और जीवन-शैली अपनाई और इसे फैलाने में भी मदद की; 19वीं सदी के कई शुरुआती सुधारक इसी तरह के थे। दूसरा प्रकार पश्चिमी सांस्कृतिक लक्षणों, जैसे नई तकनीक, पहनावा और भोजन, का आम फैलाव है, जिसका उदाहरण पुस्तक पूरे देश में मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से के परिवारों में टेलीविज़न, फ्रिज, सोफ़ा सेट और खाने की मेज़-कुर्सी का आम हो जाना बताती है।
प्र. अध्याय में उद्धृत रूडोल्फ एंड रूडोल्फ की आधुनिकता की परिभाषा को अपने शब्दों में समझाइए।
उत्तर: आधुनिकता का मतलब है स्थानीय बंधन और संकीर्ण नज़रिए की जगह सार्वभौमिक प्रतिबद्धता और व्यापक-दृष्टिकोण अपनाना; भावना और पवित्रता के बजाय उपयोगिता, गणना और विज्ञान को प्राथमिकता देना; समाज व राजनीति की मुख्य इकाई समूह की जगह व्यक्ति को मानना; जन्म की जगह चुनाव के आधार पर संगठन बनाना; भाग्यवाद की जगह वातावरण पर नियंत्रण का रवैया रखना; पहचान को जन्म से तय न मानकर चुनी और अर्जित मानना; और काम को परिवार, निवास व समुदाय से अलग करके व्यवस्थित संगठनों में बाँटना।
प्र. पुस्तक के उदाहरण से समझाइए कि पीढ़ीगत संघर्ष को केवल पश्चिमीकरण का परिणाम मानना पूरी तस्वीर क्यों नहीं है।
उत्तर: बॉक्स 2.3 (अनिमा दत्ता की असमिया कहानी से) का शीर्षक है: ‘प्रायः मध्य वर्ग में पश्चिमीकरण से आया पीढ़ियों का मतभेद अधिक जटिल होता है’। इसमें एक माँ बताती हैं कि उनके बच्चे कभी-कभी उन्हें पूरी तरह अपरिचित-से लगते हैं; न सोचने का तरीका एक है, न पहनना-ओढ़ना, न बोलना-चालना। यानी पुस्तक इस मतभेद को पश्चिमीकरण से जोड़ती है। पर अध्याय फिर पूछता है कि क्या केवल पश्चिमीकरण ही पीढ़ियों के बीच होने वाले संघर्ष का कारण है, और क्या ये संघर्ष आवश्यक बुराई है; इन्हें वह खुले प्रश्नों के रूप में छोड़ता है, कोई तय कार्य-कारण संबंध नहीं बताता।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. संस्कृतीकरण पर एक आलोचनात्मक लेख लिखिए, जिसमें इसकी परिभाषा, प्रभाव और इस पर की गई प्रमुख आलोचनाएँ शामिल हों।
उत्तर: संस्कृतीकरण, जो शब्द एम.एन. श्रीनिवास ने गढ़ा, वह प्रक्रिया है जिसमें कोई ‘निचली’ जाति, जनजाति या समूह किसी ऊँची, ‘द्विज’ जाति के रीति-रिवाज, कर्मकांड, विश्वास, विचारधारा और जीवन-शैली अपना लेता है। इसका प्रभाव कई तरफ़ दिखता है: भाषा, साहित्य, विचारधारा, संगीत, नृत्य, नाटक और कर्मकांड में। यह मुख्यतः हिंदू दायरे की प्रक्रिया है, पर श्रीनिवास ने ख़ुद तर्क दिया कि यह हिंदू धर्म के बाहर भी दिखती है। यह क्षेत्र के अनुसार असमान रूप से काम करती है: जहाँ कोई ऊँची संस्कृतीकृत जाति प्रभावी है, वहाँ पूरा क्षेत्र कुछ हद तक संस्कृतीकृत होता है; जहाँ ग़ैर-संस्कृतीकृत जातियाँ प्रभावी हैं, वहाँ उनका ही प्रभाव फैलता है (विसंस्कृतीकरण), और अन्य क्षेत्रीय विभिन्नताओं में, पंजाब में 19वीं सदी की तीसरी तिमाही तक फ़ारसी प्रभाव ही प्रभावी रहा। सामान्यतः माना जाता है कि संस्कृतीकरण में समूह की आर्थिक या राजनीतिक स्थिति में सुधार होता है, या हिंदुत्व की ‘महान परंपरा’ के किसी स्रोत से संपर्क होता है, जिससे समूह में उच्च चेतना का भाव उभरता है। पर इसमें बाधाएँ भी रहीं: प्रभावी जाति ऐसी कोशिश करने वाली निचली जातियों को दंडित करती थी, जैसा कुमुद पावड़े की एक दलित महिला के संस्कृत शिक्षिका बनने की कहानी दिखाती है। एक अवधारणा के रूप में इसकी पाँच आलोचनाएँ हैं: यह केवल स्थितिगत, संरचनात्मक नहीं, बदलाव लाती है; यह ऊँची जाति के तरीक़ों को श्रेष्ठ मानती है; यह असमानता पर टिके मॉडल को सही ठहराती है; इससे महिलाएँ असमानता की सीढ़ी में नीचे धकेली जाती हैं और कन्यामूल्य की जगह दहेज प्रथा बढ़ती है; और दलित संस्कृति के मूलभूत पक्षों को पिछड़ापन मान लिया जाता है। ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन और पिछड़े वर्गों के आंदोलनों के साथ ऊर्ध्वगामी गतिशीलता में पंथनिरपेक्ष कारकों की भूमिका पर बल दिया जाने लगा, और हाल के वर्षों में दलित अपने को दलित बताने में प्रतिष्ठा अनुभव करने लगे हैं।
प्र. ‘पश्चिमीकरण अक्सर सिर्फ़ पश्चिमी पोशाक और जीवन-शैली अपनाने तक सीमित समझा जाता है।’ क्या पश्चिमीकरण के दूसरे पहलू भी हैं, या यह बात आधुनिकीकरण से जुड़ी है? चर्चा कीजिए।
उत्तर: अध्याय दिखाता है कि पश्चिमीकरण पोशाक से कहीं बड़ा है, साथ ही यह आधुनिकीकरण से अलग भी है। एम.एन. श्रीनिवास पश्चिमीकरण को लगभग 150 वर्ष ब्रिटिश शासन से आए बदलावों के रूप में परिभाषित करते हैं, जो तकनीक, संस्थाओं, विचारधारा और मूल्यों, कई स्तरों पर फैले हैं, सिर्फ़ कपड़ों तक नहीं। इसके विभिन्न प्रकारों में एक छोटे तबके, ख़ासकर बुद्धिजीवियों में बना उप-सांस्कृतिक ढाँचा भी शामिल है, और टेलीविज़न, फ्रिज़ व नए खान-पान जैसे पश्चिमी भौतिक लक्षणों का व्यापक फैलाव भी। पर पुस्तक के अनुसार पश्चिमीकरण में संस्कृति के बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति भी होती है; यह लोकतंत्र और समानता जैसे आधुनिक मूल्य अपने साथ लाए, यह ज़रूरी नहीं, जैसा पश्चिमी शिक्षा पाए पर पूर्वाग्रही लोगों, या पश्चिमी घर सजावट के साथ परंपरावादी लैंगिक सोच रखने वाले परिवारों, या कन्या भ्रूण हत्या के उदाहरणों से पता चलता है। आधुनिकीकरण का आशय प्रारंभिक वर्षों में प्रौद्योगिकी और उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार से था; अपने व्यापक अर्थ में यह मूल्यों और सामाजिक संगठन में बदलाव है: जन्म की जगह चुनाव, अर्जित पहचान, और वैज्ञानिक सोच का बढ़ना, जैसा रूडोल्फ एंड रूडोल्फ की परिभाषा बताती है। तो पोशाक और जीवन-शैली पश्चिमीकरण का एक हिस्सा ज़रूर हैं, पर अध्याय का गहरा बिंदु यह है कि पश्चिमीकरण बिना आधुनिकीकरण के भी हो सकता है, क्योंकि पश्चिमी बाहरी रूप अपनाने से मूल्यों में वह बदलाव आना आवश्यक नहीं जो आधुनिकीकरण में शामिल है।
प्र. अध्याय के उदाहरणों का इस्तेमाल करते हुए समझाइए कि संस्कृतीकरण, पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण और पंथनिरपेक्षीकरण, ये चारों प्रक्रियाएँ आपस में कैसे जुड़ी हैं और साथ-साथ मौजूद रहती हैं।
उत्तर: अध्याय सीधे कहता है कि ये चारों प्रक्रियाएँ आपस में जुड़ी हैं और साथ-साथ मौजूद रहती हैं, और एक ही व्यक्ति कुछ मामलों में आधुनिक और किसी दूसरे मामले में पारंपरिक हो सकता है, जिसे भारत और दूसरे ग़ैर-पश्चिमी देशों के लिए स्वाभाविक माना जाता है, फिर भी समाजशास्त्र केवल इतना कहकर नहीं रुकता। ए.के. रामानुजन के पिता पुस्तक का ‘आधुनिकता एवं परंपरा का मिश्रण’ वाला उदाहरण हैं: एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मण, जो श्री वैष्णव जातिगत तिलक और पगड़ी पहनते थे (पारंपरिक पहचान), फिर भी टूटल टाई और अंग्रेज़ी जैकेट पहनते थे (पश्चिमीकृत बाहरी रूप)। औपनिवेशिक आधुनिकता में ख़ुद भी विरोधाभास थे: पश्चिमी शिक्षा पाया मध्यम वर्ग उदार-लोकतांत्रिक विचार पढ़ता था (आधुनिकीकरण), फिर भी उपनिवेशी शासन से अपमानित होकर पारंपरिक ज्ञान पर गर्व भी जताता था (परंपरावादी प्रतिक्रिया), ठीक इसी अपमान की वजह से। पंथनिरपेक्षीकरण भी धर्म को सीधे नहीं हटाता: पुस्तक कहती है कि संचार के आधुनिक प्रकारों, संगठन और विचार के स्तर पर नए प्रकार के धार्मिक सुधार संगठनों का उद्भव हुआ, इसलिए यह विचार कि आधुनिक युग धार्मिक जीवन को आवश्यक रूप से विलुप्त करेगा, पूरी तरह सच नहीं है; आधुनिकीकरण और धार्मिक चेतना साथ-साथ चल सकते हैं। (ब्रह्म समाज और आर्य समाज को पुस्तक पहले ‘आधुनिक सामाजिक संगठन’ कहती है।) अध्याय का अपना निष्कर्ष इसी जुड़ाव को दर्शाता है: भारत में सांस्कृतिक परिवर्तन केवल पश्चिमी विचारों को अपनाना नहीं था, बल्कि साथ ही परंपरा पर सक्रिय सवाल उठाना और उसकी नई व्याख्या करना भी था।
प्र. लघु निबंध लिखिए: (i) संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण (ii) जाति और पंथनिरपेक्षीकरण (iii) जेंडर और संस्कृतीकरण।
उत्तर: (i) संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण: भारत में कुछ अनुष्ठानों में प्रत्यक्ष रूप से पंथनिरपेक्षीकृत प्रभाव भी रहा है, और अनुष्ठानों के पंथनिरपेक्ष आयाम भी होते हैं। ये लोगों को अपने मित्रों और अपनी उम्र से बड़े लोगों से घुलने-मिलने का मौक़ा देते हैं और कपड़े व जेवर पहनकर परिवार की संपत्ति के प्रदर्शन का ज़रिया बनते हैं; पुस्तक का उदाहरण है कि किसी शादी के घर के बाहर लगी गाड़ियों की संख्या और आए वीआईपी मेहमान परिवार की स्थानीय हैसियत का पैमाना बन जाते हैं, यह प्रवृत्ति हाल के दशकों में और स्पष्ट हुई है। (ii) जाति और पंथनिरपेक्षीकरण: परंपरागत रूप से जाति व्यवस्था एक धार्मिक ढाँचे के भीतर काम करती थी, शुद्धता-अशुद्धता की मान्यताओं पर आधारित। आज यह अक्सर राजनीतिक दबाव-समूहों के रूप में काम करती है: जातिगत संगठन और जाति-आधारित राजनीतिक दल अपनी माँग मनवाने के लिए दबाव डालते हैं, इसी बदलाव को पुस्तक जाति का पंथनिरपेक्षीकरण कहती है, जिसे रजनी कोठारी के इस तर्क से समझा जा सकता है कि जहाँ जातीय संरचना एक ऐसा संगठनात्मक समूह प्रदान करती है जिसमें जनसंख्या का एक बड़ा भाग निवास करता है, राजनीति को ऐसी ही संरचना के माध्यम से व्यवस्थित करने का प्रयत्न करना चाहिए। (iii) जेंडर और संस्कृतीकरण: पुस्तक की चौथी आलोचना के अनुसार उच्च जाति के अनुष्ठानों और रिवाजों को संस्कृतीकरण के कारण स्वीकृति मिलने से लड़कियों और महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में सबसे नीचे धकेल दिया जाता है, और कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा बढ़ जाती है; क्रियाकलाप 2.4 में पुस्तक पूछती है कि क्या यह प्रक्रिया पुरुषों की स्थिति में परिवर्तन लाती है, जबकि महिलाओं के लिए सत्य इससे विपरीत है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक परिवार का ऊँची जाति की शादी की रस्में और ज़्यादा दहेज अपनाना किस प्रक्रिया से समझा जा सकता है?
उत्तर: यह संस्कृतीकरण है, क्योंकि परिवार एक ऊँची जाति की रीतियाँ अपना रहा है, ठीक वही प्रथा (कन्यामूल्य की जगह दहेज) जिसे पुस्तक संस्कृतीकरण की आलोचनाओं में गिनाती है।
(ख) 2 अंक टेलीविज़न, डाइनिंग टेबल और पिता की अंग्रेज़ी-माध्यम की पढ़ाई किस प्रक्रिया से समझी जा सकती है, और यह शादी की रस्म वाले बदलाव से अलग क्यों है?
उत्तर: यह पश्चिमीकरण है, यानी नई तकनीक और बदली हुई रोज़मर्रा की आदतों जैसे पश्चिमी सांस्कृतिक लक्षणों का व्यापक फैलाव। यह शादी की रस्म वाले बदलाव से अलग है क्योंकि पश्चिमीकरण मुख्यतः बाहरी, पश्चिमी रूपों की नक़ल है, जबकि शादी की रस्म वाला बदलाव किसी ऊँची जाति की अपनी परंपरागत रीति अपनाना है, यानी संस्कृतीकरण, पश्चिमीकरण नहीं।
(ग) 3 अंक अध्याय के पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण के बीच के भेद का इस्तेमाल करते हुए बताइए कि केवल बुआ से ही उपनाम छोड़ने और पति के घर जाने की उम्मीद रखना परिवार के वास्तविक आधुनिकीकरण के स्तर के बारे में क्या दिखाता है।
उत्तर: अध्याय स्पष्ट कहता है कि पश्चिमीकरण, यानी तकनीक और खान-पान जैसी बाहरी चीज़ें अपनाना, अपने साथ लोकतंत्र और समानता जैसे आधुनिक मूल्य लाना ज़रूरी नहीं। केवल बुआ पर रखी गई असमान अपेक्षा, चाचा पर नहीं, दिखाती है कि दिखने में पश्चिमीकरण (तकनीक, खान-पान) और संस्कृतीकरण (भव्य रस्में) होने के बावजूद, परिवार के जेंडर से जुड़े मूल्य रूडोल्फ एंड रूडोल्फ के अर्थ में आधुनिक नहीं हुए हैं: भूमिकाएँ अब भी (यहाँ लिंग के आधार पर) पहले से तय हैं, चुनी और अर्जित नहीं, जबकि रूडोल्फ एंड रूडोल्फ के अनुसार आधुनिकता में पहचान चुनकर अर्जित की जाती है, न कि जन्म के आधार पर। यह ठीक वही विरोधाभास है जिसकी पुस्तक चेतावनी देती है, जब वह बाहरी रूपों की नक़ल को वास्तविक मूल्य-परिवर्तन से अलग बताती है।