कक्षा 12 समाजशास्त्र पुस्तक 2 अध्याय 2 सांस्कृतिक परिवर्तन NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

सांस्कृतिक परिवर्तन (पुस्तक 2, अध्याय 2) के NCERT प्रश्नों के पूरे हल, हर प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में: सबसे पहले इस अध्याय के अंत की प्रश्नावली के तीन प्रश्न (जिनमें से एक के तीन उप-भाग हैं), फिर अध्याय के बीच में पूछे गए सभी क्रियाकलाप और प्रश्न।

1 प्रश्नावली

प्रश्न 1

प्र. संस्कृतीकरण पर एक आलोचनात्मक लेख लिखें।

उत्तर: संस्कृतीकरण, जो शब्द एम.एन. श्रीनिवास ने गढ़ा, वह प्रक्रिया है जिसमें कोई “निचली” जाति, जनजाति या समूह किसी ऊँची, “द्विज” जाति के रीति-रिवाज, कर्मकांड, विश्वास, विचारधारा और जीवन-शैली अपना लेता है। इसका प्रभाव भाषा, साहित्य, विचारधारा, संगीत, नृत्य, नाटक, जीवन-शैली और कर्मकांड, सभी में दिखता है। यह ज़्यादातर हिंदू समाज के भीतर घटती है, हालाँकि श्रीनिवास ख़ुद बताते हैं कि इसकी झलक हिंदू धर्म से बाहर के कुछ संप्रदायों और समूहों में भी मिलती है।

यह क्षेत्र के हिसाब से भी असमान रूप से चलती है। जहाँ कोई ऊँची संस्कृतीकृत जाति प्रभावी थी, वहाँ पूरे क्षेत्र की संस्कृति कुछ हद तक संस्कृतीकृत हुई। जहाँ ग़ैर-संस्कृतीकृत जातियाँ प्रभावी थीं, वहाँ उन्हीं का प्रभाव फैला, जिसे पुस्तक विसंस्कृतीकरण कहती है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रीय विभिन्नताएँ भी हैं: पंजाब में संस्कृत-परंपरा का प्रभाव कभी मज़बूत नहीं रहा और कई सदियों तक, 19वीं सदी की तीसरी तिमाही तक, फ़ारसी प्रभाव ही प्रभावी रहा।

श्रीनिवास के अनुसार सामान्यतया यह माना जाता है कि संस्कृतीकरण में समूह की आर्थिक या राजनीतिक स्थिति में सुधार होता है, अथवा हिंदुत्व की “महान परंपरा” के किसी स्रोत (तीर्थ स्थल, मठ या मतांतर वाला संप्रदाय) से उसका संपर्क होता है, जिससे समूह में उच्च चेतना का भाव उभरता है। संदर्भ प्रारूप अधिकतर आर्थिक रूप से बेहतर होता है। पर असली बाधाएँ भी हैं: बेहद असमान समाज में प्रभावी जातियाँ परंपरागत रूप से इसकी हिम्मत करने वाली निचली जातियों को दंडित करती रही हैं, जैसा कुमुद पावड़े का ख़ुद संस्कृत शिक्षिका बनने का अनुभव दिखाता है।

एक अवधारणा के रूप में संस्कृतीकरण की पाँच अलग-अलग आलोचनाएँ हुई हैं। पहली, यह सामाजिक गतिशीलता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है, क्योंकि इससे कुछ व्यक्तियों की स्थिति में केवल स्थितिगत बदलाव आता है, संरचनात्मक नहीं, और असमान ढाँचा जस का तस बना रहता है। दूसरी, यह ऊँची जाति के तरीक़ों को श्रेष्ठ और निचली जाति के तरीक़ों को हीन मानती है, जिससे नक़ल करना स्वाभाविक लगने लगता है। तीसरी, यह असमानता और बहिष्कार पर टिके एक मॉडल को सही ठहराती लगती है, जिसका मतलब है समूहों की शुद्धता-अशुद्धता में विश्वास को सही मानना। चौथी, उच्च जाति के अनुष्ठानों और रिवाजों को स्वीकृति मिलने से लड़कियों और महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में सबसे नीचे धकेल दिया जाता है, और कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा और अन्य समूहों के साथ जातिगत भेदभाव बढ़ जाते हैं। पाँचवीं, दलित संस्कृति और दलित समाज के मूलभूत पक्षों को पिछड़ापन मान लिया जाता है: निम्न जाति के लोगों के श्रम को निम्न और “शर्मदायक” माना जाता है, और शिल्प, औषधियों, पर्यावरण, कृषि और पशुपालन के ज्ञान को औद्योगिक युग में गैर-उपयोगी मान लिया गया है।

ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के साथ अनेक भारतीय भाषाओं से संस्कृत के शब्द और मुहावरे हटाए गए; पिछड़े वर्गों के आंदोलनों का एक निर्णायक परिणाम यह हुआ कि जातीय समूहों और व्यक्तियों की ऊर्ध्वगामी गतिशीलता में पंथनिरपेक्ष कारकों की भूमिका पर बल दिया जाने लगा; और हाल के वर्षों में दलित अपने को दलित बताने में प्रतिष्ठा अनुभव करने लगे हैं।

प्रश्न 2

प्र. पश्चिमीकरण का साधारणतः मतलब होता है पश्चिमी पोशाकों व जीवन शैली का अनुकरण। क्या पश्चिमीकरण के दूसरे पक्ष भी हैं? क्या पश्चिमीकरण का मतलब आधुनिकीकरण है? चर्चा करें।

उत्तर: पश्चिमीकरण सिर्फ़ पहनावे से कहीं व्यापक है, पर इसे आधुनिकीकरण से भी नहीं जोड़ना चाहिए। एम.एन. श्रीनिवास पश्चिमीकरण को परिभाषित करते हैं: लगभग 150 वर्षों के ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप भारतीय समाज और संस्कृति में आए बदलाव, जिसमें तकनीक, संस्थाओं, विचारधारा और मूल्यों जैसे कई स्तरों पर बदलाव शामिल हैं, सिर्फ़ पहनावा नहीं।

पुस्तक के अनुसार पश्चिमीकरण के विभिन्न प्रकार रहे हैं; अध्याय इनमें से दो का वर्णन करता है। पहला, पश्चिमी संस्कृति से सबसे पहले संपर्क में आए एक छोटे तबके में, ख़ासकर बुद्धिजीवियों में, एक पश्चिमी उप-सांस्कृतिक ढाँचा बना, जिन्होंने पश्चिमी सोच के तरीक़े और जीवन-शैली अपनाई। दूसरा, पश्चिमी सांस्कृतिक लक्षणों, जैसे नई तकनीक, पहनावे, भोजन और उपभोक्ता सामान, का आम फैलाव हुआ (पुस्तक का अपना उदाहरण: पूरे देश में मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से के परिवारों में टेलीविज़न, फ्रिज, सोफ़ा सेट, खाने की मेज़ और कुर्सी आम बात है)।

लेकिन, पुस्तक के अनुसार, पश्चिमीकरण में संस्कृति के बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति भी होती है। इसका यह मतलब आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र और समानता के आधुनिक मूल्य भी अपना लिए गए हों, जैसा पुस्तक के अपने उदाहरण दिखाते हैं: पश्चिमी शिक्षा पाए लोग जो फिर भी किसी जातीय या धार्मिक समुदाय के बारे में पूर्वाग्रह रखते हैं; एक परिवार जो पश्चिमी शैली में घर सजाता है पर महिलाओं की भूमिका को लेकर बेहद परंपरावादी सोच रखता है; और कन्या भ्रूण हत्या, जो महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण रवैये को बहुत आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ देती है।

आधुनिकीकरण इसके उलट ख़ुद मूल्यों और सामाजिक संगठन में बदलाव की बात करता है, जैसा रूडोल्फ एंड रूडोल्फ की आधुनिकता की परिभाषा बताती है: स्थानीय बंधन की जगह सार्वभौमिक, व्यापक-दृष्टिकोण वाला रवैया; समूह नहीं, व्यक्ति समाज की मुख्य इकाई बनना; जन्म नहीं, चुनाव पर आधारित संगठन; जन्म से तय पहचान की जगह अर्जित पहचान; और वैज्ञानिक सोच का मज़बूत होना।

तो पहनावा और जीवन-शैली पश्चिमीकरण का एक दिखने वाला हिस्सा ज़रूर हैं, पर अध्याय की असली बात यह है कि पश्चिमीकरण बिना आधुनिकीकरण के भी हो सकता है: पश्चिम के बाहरी रूप अपनाने से वह मूल्य-परिवर्तन आना आवश्यक नहीं जो आधुनिकीकरण के व्यापक अर्थ में शामिल है।

प्रश्न 3

प्र. लघु निबंध लिखें: (i) संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण (ii) जाति और पंथनिरपेक्षीकरण (iii) जेंडर और संस्कृतीकरण।

(i) संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण: पुस्तक के अनुसार भारत में कुछ अनुष्ठानों में प्रत्यक्ष रूप से पंथनिरपेक्षीकृत प्रभाव भी रहा है, और अनुष्ठानों के पंथनिरपेक्ष आयाम भी होते हैं। इनके ज़रिए लोग अपने मित्रों और अपने से बड़ी उम्र के लोगों से घुलते-मिलते हैं, और परिवार का धन, कपड़े व गहने भी दिखा पाते हैं। पुस्तक का अपना उदाहरण है कि किसी शादी के घर के बाहर लगी गाड़ियों की संख्या, और कौन-कौन से वीआईपी मेहमान आए, यह अब परिवार की स्थानीय हैसियत का पैमाना बन गया है, और यह प्रवृत्ति हाल के दशकों में ज़्यादा स्पष्ट हुई है।

(ii) जाति और पंथनिरपेक्षीकरण: परंपरागत भारत में जाति व्यवस्था एक धार्मिक ढाँचे के भीतर काम करती थी, जिसके केंद्र में शुद्धता-अशुद्धता की मान्यताएँ थीं। आज यह अक्सर राजनीतिक दबाव समूहों के रूप में काम करती है: आज के भारत में जातिगत संगठनों और जाति-आधारित राजनीतिक दलों का उद्भव हुआ है; ये जातिगत संगठन अपनी माँग मनवाने के लिए दबाव डालते हैं। धार्मिक ढाँचे से राजनीतिक ढाँचे की ओर जाति की इसी बदली हुई भूमिका को पुस्तक जाति का पंथनिरपेक्षीकरण कहती है। रजनी कोठारी का तर्क (बॉक्स 2.5) इसे आगे बढ़ाता है। उनके मुताबिक़ सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जाति ख़त्म हो रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि आधुनिक राजनीति के असर में जाति किस रूप में ढल रही है, और जाति-आधारित समाज में राजनीति किस रूप में ढल रही है। इसकी वजह यह है कि जहाँ जातीय संरचना एक ऐसा संगठनात्मक समूह प्रदान करती है जिसमें जनसंख्या का एक बड़ा भाग निवास करता है, वहाँ राजनीति को ऐसी ही संरचना के माध्यम से व्यवस्थित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

(iii) जेंडर और संस्कृतीकरण: संस्कृतीकरण का मतलब है किसी “निचली” जाति या समूह का किसी “द्विज” जाति के रीति-रिवाज अपनाना। पुस्तक की चौथी आलोचना के अनुसार उच्च जाति के अनुष्ठानों, रिवाजों और व्यवहार को संस्कृतीकरण के कारण स्वीकृति मिलने से लड़कियों और महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में सबसे नीचे धकेल दिया जाता है, और कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा और अन्य समूहों के साथ जातिगत भेदभाव बढ़ जाते हैं। क्रियाकलाप 2.4 में पुस्तक पूछती है कि क्या यह प्रक्रिया पुरुषों की स्थिति में परिवर्तन लाती है जबकि महिलाओं के लिए सत्य इससे विपरीत है; चौथी आलोचना ऐसा मानने का आधार देती है।

2 पाठगत क्रियाकलाप और प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)

अध्याय अपने क्रियाकलाप-बॉक्सों में और पाठ के बीच में भी प्रश्न पूछता है। ये यहाँ उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में पुस्तक इन्हें छापती है, आदर्श उत्तरों के साथ। जहाँ क्रियाकलाप कहता है कि जानकारी इकट्ठी करें, देखें या खोजें, वहाँ उत्तर बताता है कि एक अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए; इसे अपनी खोज के साथ इस्तेमाल करें।

क्रियाकलाप 2.1

प्र. निम्नलिखित समाज सुधारकों के बारे में सूचनाएँ इकट्ठी करें, जैसे कि किसने किस मुद्दे या समस्या पर काम किया, कैसे संघर्ष किया, किस प्रकार जागरूकता फैलाई, क्या उन्हें किसी प्रकार के विरोध का सामना करना पड़ा? (वीरेशलिंगम, पंडिता रमाबाई, विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, जोतिबा फुले, श्री नारायण गुरु, सर सैयद अहमद खान, कोई अन्य)

उत्तर: पुस्तक इन सुधारकों के बारे में कुछ ही तथ्य देती है (नीचे “पुस्तक बताती है” लिखकर दिए गए हैं)। हर प्रविष्टि की बाकी जानकारी पुस्तक से बाहर की सामान्य पृष्ठभूमि है, जो आपकी खोज में मदद के लिए दी गई है; इस्तेमाल से पहले इसे किसी संदर्भ स्रोत से जाँच लें।

  • कंदुकीरी वीरेशलिंगम (आंध्र): विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा के लिए काम किया। उन्होंने तेलुगु में लिखा और छापा; पुस्तक बताती है कि उनकी पुस्तक ‘द सोर्स ऑफ़ नॉलेज’ में नव्य-न्याय के तर्क दिखते हैं और उन्होंने जीव विज्ञानी जुलियस हक्सले के ग्रंथों का अनुवाद भी किया। रूढ़िवादी वर्ग ने विधवा पुनर्विवाह का कड़ा विरोध किया।
  • पंडिता रमाबाई: स्त्रियों की शिक्षा और विधवाओं के कल्याण के लिए काम किया, विधवाओं के लिए आश्रम और विद्यालय खोला। पुस्तक बताती है कि उन्होंने देश के अनेक क्षेत्रों का दौरा किया। रूढ़िवादी समाज ने उनकी कड़ी आलोचना की, जो उनके ईसाई धर्म अपनाने के बाद और बढ़ गई।
  • ईश्वरचंद्र विद्यासागर (बंगाल): शास्त्रों के आधार पर विधवा पुनर्विवाह और बालिका शिक्षा के लिए अभियान चलाया; 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ। पुस्तक बताती है कि 1868 में उनकी पुस्तक का मराठी अनुवाद इंदु प्रकाश में प्रकाशित हुआ। रूढ़िवादी हिंदुओं ने इस सुधार के विरुद्ध याचिकाएँ दीं।
  • दयानंद सरस्वती: आर्य समाज की स्थापना की, जिसे पुस्तक पंजाब में स्थापित आधुनिक संगठन बताती है। उन्होंने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया, मूर्ति पूजा, बाल-विवाह और जन्म पर आधारित जाति का विरोध किया और स्त्री शिक्षा का समर्थन किया। रूढ़िवादी समूहों ने उनका विरोध किया।
  • जोतिबा फुले (महाराष्ट्र): जातिगत शोषण के विरुद्ध और स्त्री शिक्षा के लिए काम किया; पुस्तक बताती है कि उन्होंने पुणे में महिलाओं के लिए पहला विद्यालय खोला और आर्यों के आगमन से पूर्व के काल को अच्छा माना। उच्च जातियों के रूढ़िवादियों ने उनका तीखा विरोध किया।
  • श्री नारायण गुरु (केरल): एझवा और अन्य “निम्न” जातियों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया, उनके लिए मंदिर खोले और सभी मनुष्यों के लिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर का संदेश दिया। रूढ़िवादी उच्च जातियों ने उनका विरोध किया।
  • सर सैयद अहमद खान: मुसलमानों में आधुनिक, वैज्ञानिक शिक्षा के लिए काम किया और अलीगढ़ में कॉलेज की स्थापना की। पुस्तक बताती है कि उन्होंने इस्लाम की विवेचना में स्वतंत्र अन्वेषण (इजतिहाद) की वैधता का उल्लेख किया और कुरान की बातों व आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित प्रकृति के नियमों में समानता दिखाई। रूढ़िवादी धार्मिक नेताओं ने उनका विरोध किया।

इनके तरीक़े सबरवाल के बताए तीन पहलुओं से मेल खाते हैं: संचार माध्यम (अख़बार, पत्रिकाएँ, पुस्तकें, अनुवाद, यात्राएँ), संगठनों के स्वरूप (सभाएँ, गोष्ठियाँ, नए संगठन और विद्यालय) और विचारों की प्रकृति (उदारवादी विचार और परंपरा की नई व्याख्या)।

क्रियाकलाप 2.2

प्र. समाजशास्त्र में इनका अर्थ पढ़ने के पूर्व यह रुचिकर होगा कि आप कक्षा में इस पर विचार करें कि निम्नलिखित शब्दों का क्या अर्थ है। आप किस तरह के व्यवहार को निम्नलिखित रूप में परिभाषित करेंगे: पश्चिमी, आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, संस्कृतीकृत? क्यों? इस अध्याय को पढ़ने के बाद पुनः क्रियाकलाप 2.2 पर आएँ। क्या आप इन शब्दों के सामान्य अर्थ एवं समाजशास्त्रीय अर्थ में कोई अंतर पाते हैं?

उत्तर: हो सकता है आपकी कक्षा पाए कि सामान्य बोलचाल में “पश्चिमी” का मतलब जींस, अंग्रेज़ी और फ़ास्ट फ़ूड समझा जाता है; “आधुनिक” का मतलब नए उपकरण रखना; “धर्मनिरपेक्ष” का मतलब धार्मिक न होना; और “संस्कृतीकृत” शब्द लोग कम ही इस्तेमाल करते हैं। अध्याय पढ़ने के बाद इनके समाजशास्त्रीय अर्थ अलग निकलते हैं:

  • पश्चिमी: पश्चिमी संस्कृति के बाहरी तत्त्वों (पोशाक, भोजन, उपकरण, घर की साज-सज्जा) का अनुकरण; पुस्तक ज़ोर देकर कहती है कि इसके साथ प्रजातंत्र और सामाजिक समानता जैसे मूल्य आना आवश्यक नहीं।
  • आधुनिक: मूल्यों में परिवर्तन: स्थानीय की जगह सार्वभौमिक दृष्टिकोण, जन्म की जगह इच्छा पर आधारित चयन, जन्म से मिली पहचान की जगह अर्जित पहचान, और वैज्ञानिक प्रवृत्ति (रूडॉल्फ और रूडॉल्फ)। भारतीय पोशाक पहनने वाला व्यक्ति जो अपना व्यवसाय और जीवनसाथी स्वयं चुनता है, पश्चिमी पोशाक वाले उस व्यक्ति से अधिक “आधुनिक” है जो जातिगत भेदभाव करता है।
  • धर्मनिरपेक्ष (पंथनिरपेक्ष): पश्चिम में धर्म के प्रभाव में कमी; भारत में अनुष्ठानों के पंथनिरपेक्ष आयाम (शादी में प्रतिष्ठा का प्रदर्शन) और जाति का राजनीतिक दबाव समूह बनना, यानी जाति का पंथनिरपेक्षीकरण भी।
  • संस्कृतीकृत: किसी निम्न जाति या समूह द्वारा उच्च, विशेषकर द्विज जाति की जीवन पद्धति, अनुष्ठान और रीति-रिवाजों को अपनाना, जैसे मांसाहार छोड़ना या उच्च जाति के संस्कार अपनाना।

मुख्य अंतर यह है कि सामान्य समझ इन्हें दिखावे की बातें मानती है, जबकि समाजशास्त्र इन्हें मूल्यों, प्रस्थिति और सामाजिक संगठन में होने वाले परिवर्तन की प्रक्रियाएँ मानता है, जो एक ही व्यक्ति में साथ-साथ भी हो सकती हैं।

पाठ में दिया गया कार्य (क्रियाकलाप 2.3 से पहले)

प्र. आपसे अपेक्षा की जाती है कि आधुनिकीकरण के उन जटिल पक्षों को रेखांकित करें एवं उनका विवेचन करें जिन्होंने देश के विभिन्न भागों में लोगों को प्रभावित किया अथवा एक ही क्षेत्र में विभिन्न जातियों एवं वर्गों को प्रभावित किया और एक ही वर्ग अथवा समुदाय से संबंधित पुरुषों एवं महिलाओं को प्रभावित किया।

उत्तर: अध्याय ख़ुद इसके कुछ आधार देता है। देश के विभिन्न भाग: पंजाब में संस्कृत-परंपरा का प्रभाव कभी मज़बूत नहीं रहा और 19वीं सदी की तीसरी तिमाही तक फ़ारसी प्रभाव प्रभावी रहा; पूर्वोत्तर में पश्चिमी शिक्षा और अंग्रेज़ी ने नागाओं के लिए नए अवसर खोले और अलग-अलग भाषा बोलने वाली जनजातियों को जोड़ा। एक ही क्षेत्र की विभिन्न जातियाँ और वर्ग: केरल के थिय्या, जो उच्च जाति नहीं हैं, पश्चिमीकरण की इच्छा रखते हैं, जिससे श्रीनिवास का सामान्यीकरण अनुपयुक्त ठहरता है; मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में पश्चिमी उपकरण (टीवी, फ्रिज, सोफ़ा सेट) आम हुए। एक ही समूह के पुरुष और महिलाएँ: क्रियाकलाप 2.4 पूछता है कि क्या संस्कृतीकरण पुरुषों की स्थिति ऊपर उठाते हुए महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में नीचे धकेलता है, जैसे कन्यामूल्य की जगह दहेज। इनके साथ अपने क्षेत्र के उदाहरण भी जोड़ें।

क्रियाकलाप 2.3

प्र. कुछ इस प्रकार के अन्य उदाहरणों का उल्लेख करें जो आप दिन-प्रतिदिन की जिंदगी में और व्यापक स्तर पर पाते हैं (आधुनिकता एवं परंपरा का मिश्रण)।

उत्तर: दैनिक जीवन में: साड़ी को पश्चिमी पेटीकोट और ब्लाउज के साथ पहनना (पुस्तक का अपना उदाहरण); जींस के साथ सिंदूर या चूड़ियाँ पहनना; शादी में सारे पारंपरिक संस्कार भी और डीजे, पश्चिमी ढंग का रिसेप्शन व वीडियो भी; स्मार्टफ़ोन ऐप से शुभ मुहूर्त निकालना; ए.के. रामानुजन के पिता, जो श्री वैष्णव जाति-चिह्न और पगड़ी के साथ टूटल टाई और धोती के ऊपर अंग्रेज़ी सर्ज जैकेट पहनते थे। व्यापक स्तर पर: आधुनिक लोकतंत्र, जिसमें रजनी कोठारी (बॉक्स 2.5) के अनुसार राजनीतिज्ञ जाति-समूहों के ज़रिए अपनी शक्ति संगठित करते हैं; 19वीं सदी का अंग्रेज़ी-शिक्षित मध्य वर्ग, जिसने पश्चिमी दार्शनिकों को पढ़ा पर पारंपरिक ज्ञान पर गर्व भी जताया; आधुनिक अस्पताल और ज्योतिषी का साथ-साथ चलना।

क्रियाकलाप 2.4

प्र. संस्कृतीकरण के भाग को गौर से पढ़ें। क्या आपको इस प्रक्रिया में जेंडर पर आधारित सामाजिक भेदभाव के सबूत दिखते हैं, जैसे कि यह प्रक्रिया महिलाओं को पुरुषों से अलग दर्शाती है? क्या आपको लगता है कि यह प्रक्रिया पुरुषों की स्थिति में कोई परिवर्तन लाती है, जबकि महिलाओं के लिए सत्य इससे विपरीत है?

उत्तर: पुस्तक इसे एक प्रश्न के रूप में रखती है, पर उसकी अपनी आलोचना “हाँ” वाले उत्तर का आधार देती है। पुस्तक की चौथी आलोचना कहती है कि उच्च जाति के अनुष्ठानों, रिवाजों और व्यवहार को संस्कृतीकरण के कारण स्वीकृति मिलने से लड़कियों और महिलाओं को असमानता की सीढ़ी में सबसे नीचे धकेल दिया जाता है, और कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज प्रथा तथा अन्य समूहों के साथ जातिगत भेदभाव बढ़ जाते हैं। इसलिए जब कोई समूह संस्कृतीकरण अपनाता है, तो उसके पुरुषों की प्रस्थिति स्थानीय जाति संस्तरण में ऊपर उठ सकती है, पर उसकी महिलाएँ असमानता की सीढ़ी में नीचे धकेली जा सकती हैं: जिस बेटी के लिए पहले कन्यामूल्य मिलता था, उसके लिए अब दहेज देना पड़ता है। यानी समूह ऊपर उठता है, पर समूह के भीतर महिलाओं की स्थिति नीचे जा सकती है।

क्रियाकलाप 2.5

प्र. क्या आप ऐसे भारतीयों के विषय में सोच सकते हैं जो अपनी पोशाक एवं अभिव्यक्ति से पूर्णरूपेण पश्चिमी हों परंतु उनमें प्रजातांत्रिक व समानता के मूल्यों की कोई छाप न हो जोकि आधुनिक दृष्टिकोण के भाग हैं। हम आपको दो उदाहरण दे रहे हैं। क्या आप ऐसे अन्य उदाहरण वास्तविक जीवन एवं फ़िल्मों में पाते हैं। (हम ऐसे अनेक लोगों को देखते हैं जो पश्चिमी शिक्षा प्राप्त हैं लेकिन कुछ विशिष्ट सजातीय अथवा धार्मिक समुदायों के विषय में उनके विचार पूर्वाग्रही हैं। एक परिवार जिसने पश्चिमी संस्कृति के बाह्य स्वरूप को स्वीकार कर लिया है, जिसे उनके आवास की आंतरिक साज-सज्जा में देखा जा सकता है परंतु समाज में महिलाओं की भूमिकाओं के विषय में उनके विचार अत्यंत संकीर्ण हैं। बालिका भ्रूण हत्या, महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण एवं अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग।) आपको यह भी चर्चा करनी है कि इस तरह का दोहरापन और विरोधाभास केवल भारतीयों में ही देखने को मिलता है या गैर-पश्चिमी समाज में रह रहे लोगों में भी व्याप्त है? क्या यह उतना ही सच नहीं है कि पश्चिमी समाजों में भी प्रजातीय एवं भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण विद्यमान है?

उत्तर: अन्य उदाहरण: पश्चिमी औपचारिक पोशाक पहनने वाला उच्च शिक्षित व्यक्ति जो अपने बेटे के विवाह में भारी दहेज माँगता है; पश्चिमी ढंग की पार्टियाँ करने वाला परिवार जो अपनी बेटी को अपना व्यवसाय या जीवनसाथी चुनने नहीं देता; नवीनतम फ़ोन और गाड़ियाँ रखने वाले लोग जो किसी “निम्न” जाति के व्यक्ति के साथ खाना खाने या उसे मकान किराये पर देने से इनकार करते हैं; फ़िल्मों के ऐसे पात्र जो नए फ़ैशन के कपड़े पहनते हैं पर महिलाओं को संपत्ति समझते हैं या जाति का घमंड दिखाते हैं। ये उदाहरण पुस्तक की इस बात को दिखाते हैं कि पश्चिमीकरण में बाह्य तत्त्वों के अनुकरण की प्रवृत्ति होती है; इसके साथ प्रजातंत्र और सामाजिक समानता जैसे आधुनिक मूल्यों में विश्वास होना आवश्यक नहीं।

यह विरोधाभास केवल भारतीय या गैर-पश्चिमी समाजों तक सीमित नहीं है। तकनीकी रूप से उन्नत पश्चिमी समाजों में भी प्रजाति, रंग या धर्म के आधार पर भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण मौजूद हैं। इसलिए आधुनिक तकनीक और आधुनिक दिखावट अपने आप किसी भी समाज में समानता के मूल्य पैदा नहीं करते।

पाठ के बीच का प्रश्न (क्रियाकलाप 2.5 के बाद)

प्र. आज के युग में पीढ़ियों के बीच संघर्ष और मतभेद को एक प्रकार के सांस्कृतिक संघर्ष और मतभेद के रूप में भी देखा जाता है जो कि पश्चिमीकरण का परिणाम है। क्या आपने इसे देखा है या ऐसा अनुभव किया है? आप अपने आप से ये प्रश्न पूछें कि क्या केवल पश्चिमीकरण ही पीढ़ियों के बीच होने वाले संघर्ष का कारण है? क्या ये संघर्ष आवश्यक बुराई है?

उत्तर: बहुत से विद्यार्थियों ने ऐसा देखा होगा: पहनावे, संगीत, बालों की शैली या करियर को लेकर मतभेद, जैसे बॉक्स 2.3 की असमिया माँ, जिनकी बेटी पैंट और बैगी कमीज पहनती है और गिटार पर पश्चिमी धुन बजाती है, जबकि वे बरगीत गाना और मीरा के भजन सुनना चाहती हैं। बॉक्स 2.3 का शीर्षक ही कहता है कि प्रायः मध्य वर्ग में पश्चिमीकरण से आया पीढ़ियों का मतभेद अधिक जटिल होता है, यानी पश्चिमीकरण एक कारण है; पर पुस्तक पूछती है कि क्या केवल यही कारण है। कुछ अन्य संभावित कारण, जो पुस्तक में नहीं गिनाए गए: उच्च शिक्षा, शहरों या विदेश में प्रवास (बॉक्स में पल्लव एक अलग देश में रहता है), नए व्यवसाय, युवाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और नए संचार माध्यम व तकनीक। ये संघर्ष आवश्यक बुराई हैं या नहीं, इसे पुस्तक खुला प्रश्न छोड़ती है; एक मत यह है कि ज़रूरी नहीं, क्योंकि इनसे परंपरा पर प्रश्न उठते हैं और उसकी पुनर्व्याख्या होती है, जिसे पुस्तक का निष्कर्ष आधुनिकता के प्रभाव का हिस्सा बताता है। ज़रूरी यह है कि इन्हें बातचीत से सुलझाया जाए; बॉक्स 2.3 की माँ दूरी के बावजूद अपने बच्चों को पूरे हृदय से प्यार करती हैं।

क्रियाकलाप 2.6

प्र. आप किसी अखबार या वेबसाइट (जैसे शादी.कॉम) में विवाह संबंधी विज्ञापन के कॉलम को और उसका स्वरूप देखें और जानें कि उसमें कितनी बार जाति व समुदाय का संदर्भ आता है? अगर ये संदर्भ बार-बार आता है तो क्या इसका अर्थ यह है कि आज भी जाति उस प्रकार की भूमिका निभा रही है जो वह परंपरागत रूप में निभाती थी? अथवा क्या जाति की भूमिका परिवर्तित हुई है? विचार करें।

उत्तर: हो सकता है आप पाएँ कि कई वैवाहिक विज्ञापनों में जाति या समुदाय का उल्लेख बार-बार होता है: विज्ञापन अक्सर जाति के शीर्षकों के नीचे छपते हैं, और कई में अपनी ही जाति या उपजाति का जीवनसाथी माँगा जाता है। इससे पता चलता है कि विवाह में जाति आज भी महत्त्वपूर्ण है। पर इसका मतलब यह नहीं कि जाति वही भूमिका निभा रही है जो परंपरागत रूप में निभाती थी। इन्हीं विज्ञापनों में शिक्षा, व्यवसाय, आय, विदेश में नौकरी और रूप-रंग जैसी अर्जित योग्यताओं को भी महत्त्व दिया जा सकता है, और कुछ में “जाति बंधन नहीं” भी लिखा होता है। परंपरागत रूप से जाति पवित्र-अपवित्र के धार्मिक चौखटे के अंदर काम करती थी; आज यह इच्छा और उपलब्धि के साथ-साथ काम करती है, जिन्हें अध्याय आधुनिकीकरण की विशेषताएँ बताता है। जैसा कोठारी बॉक्स 2.5 में कहते हैं, उपयोगी प्रश्न यह नहीं कि जाति समाप्त हो रही है या नहीं, बल्कि यह है कि जाति कौन-सा रूप लेकर सामने आ रही है।

क्रियाकलाप 2.7

प्र. पारंपरिक त्योहारों, जैसे दीवाली, दुर्गा पूजा, गणेश पूजा, दशहरा, करवा चौथ, ईद, क्रिसमस के अवसर पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों को देखें। ऐसे कुछ विज्ञापनों को अखबारों और पत्रिकाओं से निकालें। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसे टेलीविजन पर होने वाले विज्ञापन पर भी ध्यान दें। पता लगाएँ कि इन विज्ञापनों में क्या संदेश दिए जा रहे हैं।

उत्तर: आप शायद पाएँगे कि त्योहारों के कई विज्ञापन ख़रीदारी के बारे में होते हैं: सोना और गहने, कपड़े, कारें और दोपहिया वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मिठाइयाँ और उपहार, अक्सर “त्योहारी ऑफ़र” और छूट के साथ। इनके संदेश त्योहार को परिवार के मेल-मिलाप, उपहार देने, अच्छा दिखने और समृद्धि के प्रदर्शन से जोड़ते हैं (जैसे करवा चौथ पर गहनों और साड़ियों के विज्ञापन, या दीवाली पर नई कारों के विज्ञापन)। अपने संग्रह से इसे जाँचें। ऐसे संदेश पुस्तक की उस बात को दिखाते हैं कि अनुष्ठानों के पंथनिरपेक्ष आयाम होते हैं: इनसे लोगों को आपस में घुलने-मिलने और कपड़े व जेवर पहनकर अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने का अवसर मिलता है, और पिछले कुछ दशकों से अनुष्ठानों के आर्थिक, राजनीतिक और प्रस्थिति संबंधी पक्ष ज़्यादा उभरकर सामने आए हैं।