नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
- उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 जैसे मौलिक अधिकारों को जीवनयापन, स्वास्थ्य और गरिमा तक कैसे बढ़ाया
- 73वें संविधान संशोधन (1992) की कहानी: पंचायती राज को संविधान में जगह न मिलने से लेकर क़ानून बनने तक
- पंचायती राज की त्रिस्तरीय संरचना, पंचायतों की असली शक्तियाँ व धन, और महिला आरक्षण का महत्व
- ज़मीनी स्तर का लोकतंत्र सोचने से कठिन क्यों है: जाति, ग्राम सभा (गाँव के सभी नागरिकों की सभा) पर कब्ज़ा, और मेघालय जैसे जनजाति क्षेत्रों में पंचायती राज
- राजनीतिक दल, दबाव समूह और हित समूह में अंतर, पुस्तक के अपने उदाहरणों जैसे FICCI (उद्योगपतियों का संगठन), INTUC (एक श्रमिक संघ), शेतकरी संगठन (किसानों का संगठन), और मैक्स वेबर के अपने शब्दों के साथ
1 यह अध्याय क्यों महत्वपूर्ण है: एक जीवंत दस्तावेज़ के रूप में संविधान
आप सोचते होंगे कि संविधान एक तय नियमों की किताब है। ऐसा नहीं है: यह सामाजिक न्याय के आधारभूत मानदंडों पर आधारित है, इसलिए इसमें लोगों की सहायता करने की क्षमता है, और यह “संदर्भ ग्रंथ” मात्र होने के बजाय सामाजिक न्याय के अर्थ को आगे बढ़ा सकता है। सामाजिक आंदोलनों ने भी न्यायालयों को अधिकारों की व्याख्या इसी समकालीन समझ के अनुसार करने में मदद की है।
संविधान भारत का मूल मानदंड है: वह एक दस्तावेज़ जिससे बाक़ी हर कानून की वैधता तय होती है। कोई भी नया कानून तभी वैध है जब वह संविधान की बताई प्रक्रिया से, संविधान द्वारा तय प्राधिकारी के ज़रिए बना हो।
ग्राम पंचायतों से संबंधित एक निदेशक सिद्धांत (संविधान के भाग IV की नीति-मार्गदर्शक बात, जिसे अदालत में सीधे लागू नहीं कराया जा सकता, भाग III के मौलिक अधिकार के विपरीत) को संविधान सभा में संशोधन के रूप में के. संथानम ने लाया था। इसे क़ानून बनने में लगभग 40 साल लगे, और यह तभी हुआ जब 1992 में 73वाँ संशोधन आया: यह विचार उससे बहुत पहले ही संविधान की भावना में मौजूद था।
1.1 कानून और न्याय एक चीज़ नहीं हैं
कानून का सार शक्ति है: कानून बाध्यकारी होता है क्योंकि इसके पीछे राज्य की शक्ति है। न्याय का सार निष्पक्षता है।
कानून की कोई भी प्रणाली अधिकारियों के एक ढाँचे से काम करती है, और संविधान ही उन सबका आधार है। न्यायालयों का ढाँचा, जो स्वयं संविधान से बना है, विवाद होने पर कानूनों की व्याख्या करता है। उच्चतम न्यायालय सबसे बड़ी अदालत है और संविधान का अंतिम व्याख्याकर्त्ता भी।
1 अंक के प्रश्न में कानून और न्याय का अंतर पूछा जा सकता है। उत्तर इसी रूप में दें: कानून = शक्ति (राज्य द्वारा समर्थित), न्याय = निष्पक्षता; दोनों को एक जैसा मत लिखिए।
1.2 बॉक्स 3.1: उच्चतम न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को कैसे बढ़ाया
उच्चतम न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण रूपों में मौलिक अधिकारों को बढ़ाया है।
| अनुच्छेद | कैसे बढ़ाया गया |
|---|---|
| अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) | जीवन और स्वतंत्रता के संक्षिप्त शब्दों की व्याख्या इतनी विस्तृत की गई है कि इसमें जीवनयापन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और गरिमा शामिल है, “एक पशुमात्र के अस्तित्व से बेहतर”। प्रताड़ित क़ैदियों को राहत, बंधुआ मज़दूरों का पुनर्वास, पर्यावरण-हानि पर कार्रवाई, और प्राथमिक स्वास्थ्य व शिक्षा इसी से मिले |
| अनुच्छेद 19(क) (सूचना का अधिकार) | 1993 में उच्चतम न्यायालय ने माना कि सूचना का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनुषांगिक (यानी उससे जुड़ा हुआ) अंग है |
| अनुच्छेद 14 (समान कार्य के लिए समान वेतन) | उच्चतम न्यायालय ने इस निदेशक सिद्धांत को समानता के मौलिक अधिकार के अंतर्गत माना, जिससे बहुत से बागान व कृषि श्रमिकों को राहत मिली |
ये तीनों अधिकार मौलिक अधिकारों में शब्दशः नहीं लिखे हैं: जीवनयापन और सूचना का अधिकार संविधान के पाठ में कहीं स्पष्ट नहीं लिखे, और समान कार्य के लिए समान वेतन केवल निदेशक सिद्धांतों में है। न्यायालयों ने इन्हें मौजूदा मौलिक अधिकारों में पढ़कर निकाला: यही “संविधान का अर्थ बढ़ाया जा सकता है” का मतलब है।
2 पंचायती राज के आदर्श
पंचायती राज का शाब्दिक अर्थ है “पाँच व्यक्तियों द्वारा शासन”: गाँव या ज़मीनी स्तर पर एक क्रियाशील, जीवंत लोकतंत्र का विचार।
ज़मीनी स्तर से लोकतंत्र का विचार भारत में विदेश से आयातित नहीं है। पर तीव्र असमानता वाले समाज में लोकतांत्रिक भागीदारी लिंग, जाति और वर्ग से बाधित होती है। गाँवों में पहले से ही जातीय पंचायतें थीं, पर ये प्रभुत्वशाली समूहों का ही प्रतिनिधित्व करती थीं, रूढ़िवादी थीं, और लगातार लोकतांत्रिक मानदंडों के विपरीत निर्णय लेती थीं।
2.1 संविधान सभा में लगभग हारी हुई एक बहस
संविधान पहली बार बनते समय पंचायतों की उसमें कोई चर्चा ही नहीं थी, और कई संविधान सभा सदस्यों ने इस पर अपना दुख, क्रोध और निराशा प्रकट की।
डॉ. अंबेडकर की सावधानी
- अपने ग्रामीण अनुभव से तर्क दिया कि स्थानीय कुलीन व उच्चजातीय लोग इतने घिरे हैं कि स्थानीय स्वशासन पददलितों का निरंतर शोषण ही होगा
- डर था कि उच्च जातियाँ इस वर्ग को और चुप करा देंगी
गांधीजी का आदर्श
- स्थानीय सरकार की अवधारणा उन्हें भी प्रिय थी: हर गाँव को आत्मनिर्भर इकाई मानते थे, “ग्राम स्वराज्य” को आदर्श मॉडल जो स्वतंत्रता के बाद भी चलता रहे
यह मत लिखिए कि अंबेडकर और गांधीजी पंचायती राज पर सहमत थे। पुस्तक में असली मतभेद दर्ज है: दोनों पक्ष दिखाइए, इन्हें एक जैसा मत मत बनाइए।
ज़मीनी स्तर का लोकतंत्र असल में 1992 में ही शुरू हुआ, 73वें संविधान संशोधन से, जिसने पंचायती राज संस्थाओं (PRI) को संवैधानिक प्रस्थिति दी, ग्रामीण व नगरीय स्थानीय स्वशासन निकायों का हर पाँच साल में चुना जाना अनिवार्य किया, और स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण निर्वाचित स्थानीय निकायों को सौंपा।
3 73वाँ संशोधन और त्रिस्तरीय प्रणाली
3.1 बॉक्स 3.2: संरचना कैसे बनी है
पंचायती राज संस्थाओं की संरचना एक पिरामिड की भाँति है।
चित्र 1: पंचायती राज की त्रिस्तरीय पिरामिड संरचना (बॉक्स 3.2)। ग्राम सभा आधार पर है क्योंकि यह “लोकतंत्र की इकाई” है: हर वयस्क ग्रामीण स्वतः इसका सदस्य होता है, और यही सभा ऊपर की हर चीज़ को चुनती और निर्देशित करती है, चर्चा व विकास के लिए एक खुला मंच देती हुई।
| 73वें संशोधन का प्रावधान | क्या तय हुआ |
|---|---|
| किन राज्यों पर लागू | बीस लाख से अधिक जनसंख्या वाले सभी राज्य |
| चुनाव | हर पाँच वर्ष में अनिवार्य |
| सीटों का आरक्षण | अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत |
| योजना निकाय | पूरे ज़िले की योजना हेतु ज़िला योजना समिति गठित |
3.2 महिलाओं को निर्वाचित निकायों में लाना
73वें और 74वें संशोधन (73वाँ = ग्रामीण पंचायत, 74वाँ = नगरीय नगरपालिका) ने मिलकर सभी निर्वाचित स्थानीय निकायों में कुल सीटों का एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित किया, जिसमें पहली बार महिलाओं को असली निर्णय लेने की शक्ति मिली। ग्राम पंचायत, नगर निगम या ज़िला परिषद् (यही निकाय कुछ राज्यों में “ज़िला पंचायत” कहलाता है): नाम राज्य के अनुसार बदलता है, निकाय वही रहता है।
यह त्रिस्तरीय स्थानीय स्वशासन प्रणाली 1992-93 से पूरे देश में लागू है।
4 पंचायतों की शक्तियाँ, उत्तरदायित्व और आय
संविधान के अनुसार पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं जैसी शक्तियाँ मिलनी चाहिए, और राज्य सरकारों से यह अपेक्षा है कि वे स्थानीय प्रतिनिधिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करें।
| क्षेत्र | पंचायतों को क्या दिया गया |
|---|---|
| योजना शक्तियाँ | आर्थिक विकास के लिए योजनाएँ बनाना; सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना |
| वित्तीय शक्तियाँ | शुल्क, कर, टोल व जुर्माना लगाना, इकट्ठा करना व उपयोग करना; सरकारी उत्तरदायित्वों, खासकर वित्त, के हस्तांतरण (यानी ऊपर से नीचे सत्ता व धन सौंपना) में सहयोग |
| सामाजिक कल्याण | श्मशान व कब्रिस्तानों का रखरखाव; जन्म-मृत्यु के आँकड़े रखना; मातृत्व व बाल कल्याण केंद्रों की स्थापना; पशुओं के तालाबों पर नियंत्रण; परिवार-नियोजन का प्रचार; कृषि-कार्यों का विकास |
| विकासात्मक कार्य | सड़कों, सार्वजनिक भवनों, तालाबों व स्कूलों का निर्माण; कुटीर उद्योगों को बढ़ावा; लघु सिंचाई कार्यों की देखभाल |
| निगरानी की जाने वाली योजनाएँ | एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) और एकीकृत बाल विकास योजना (ICDS) |
पंचायतों की मुख्य आय संपत्ति, व्यवसाय, पशु, वाहन पर लगाए गए कर, भू-राजस्व पर चुंगी, और किराए से आती है, जिसमें ज़िला पंचायत के अनुदान से और वृद्धि होती है।
अभ्यास प्रश्न (4 अंक): “पंचायती राज ज़मीनी स्तर पर सूचना के अधिकार को कैसे बढ़ावा देता है?” उत्तर: पंचायत कार्यालयों के बाहर बोर्ड लगाना अनिवार्य है, जिसमें प्राप्त धन का ब्यौरा और उपयोग की जानकारी हो, ताकि लोग खर्च के फ़ैसलों पर सवाल उठा सकें।
5 न्याय पंचायत: ज़मीनी स्तर पर न्याय
कुछ राज्यों में बनी न्याय पंचायतें छोटे-मोटे दीवानी व आपराधिक मामलों की सुनवाई कर सकती हैं और जुर्माना लगा सकती हैं, पर सज़ा नहीं दे सकतीं। ये ग्रामीण न्यायालय अक्सर पक्षों में समझौता कराने में सफल रहे हैं, और खासकर दहेज के लिए महिलाओं को परेशान करने या हिंसा करने वाले पुरुषों को दंडित करने में प्रभावी रहे हैं।
6 जनजाति क्षेत्रों में पंचायती राज
बहुत से आदिवासी क्षेत्रों की ज़मीनी स्तर के लोकतांत्रिक कार्यों की अपनी समृद्ध परंपरा रही है, 73वें संशोधन से भी बहुत पहले से।
मेघालय की तीनों प्रमुख आदिवासी जातियाँ, गारो, खासी और जयंतिया, सैकड़ों साल पुरानी अपनी राजनीतिक संस्थाएँ रखती हैं, जो गाँव, वंश व राज्य, तीनों स्तरों पर काम करती हैं। खासियों की परंपरागत प्रणाली में हर वंश की अपनी परिषद् होती थी, “दरबार कुर”, जो वंश के मुखिया के निर्देशन में चलती थी।
इस लंबी परंपरा के बावजूद, आदिवासी क्षेत्रों का एक बड़ा हिस्सा 73वें संशोधन के प्रावधान से बाहर है, शायद इसलिए क्योंकि नीति बनाने वालों ने परंपरागत आदिवासी संस्थाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहा। भूरिया समिति ने विशेष रूप से यह देखा था कि पंचायती राज को अनुसूचित/आदिवासी क्षेत्रों तक कैसे बढ़ाया जाए; पुस्तक इसकी असली सिफ़ारिशें नहीं बताती, केवल एक समाजशास्त्री की आलोचना देती है।
आदिवासी संस्थाएँ अपनी संरचना और क्रियाकलाप में लोकतांत्रिक ही हों, यह आवश्यक नहीं है… आदिवासी समाजों में प्रबल समतावादी लोकाचार पाया जाता है, इसके बावजूद उनमें स्तरीकरण के तत्त्व कहीं न कहीं उपस्थित हैं। आदिवासी राजनीतिक संस्थाएँ केवल महिलाओं के प्रति असहिष्णुता के लिए ही नहीं जानी जातीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया ने इस व्यवस्था में विकृतियाँ भी उत्पन्न कर दी हैं जिससे यह पहचानना मुश्किल है कि क्या पारंपरिक है और क्या अपारंपरिक।
समाजशास्त्री टिपलुट नोंगबरी, भूरिया समिति की रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए (नोंगबरी, 2003:220)
“परंपरागत” और “आदिवासी” होने का मतलब अपने आप उचित या लोकतांत्रिक होना नहीं है। भूरिया समिति की चिंता अच्छी सोच थी, पर इसमें यह पूरी तरह नहीं देखा गया कि ये संस्थाएँ अभी भी महिलाओं को बाहर रख सकती हैं, और सामाजिक परिवर्तन ने खुद इन्हें असमान रूप से बदल भी दिया है।
यह वही विषय है जो अध्याय 1 व 2 में पहले चर्चा हुई (संरचनात्मक परिवर्तन, सांस्कृतिक परिवर्तन): परंपरा स्थिर नहीं है, यह लगातार बदलती रहती है।
7 लोकतंत्रीकरण और असमानता: ग्राम सभा पर असली नियंत्रण किसका?
जिस समाज में जाति, समुदाय और लिंग आधारित असमानता का लंबा इतिहास हो, वहाँ लोकतंत्रीकरण आसान नहीं है। बहुत से गाँवों में कुछ विशेष समूह, समुदाय या जाति के लोग न तो बैठकों में शामिल किए जाते हैं और न ही उन्हें सूचना दी जाती है।
यह मत लिखिए कि 73वें संशोधन ने ग्राम सभा बनाकर गाँव की असमानता को “हल” कर दिया। पुस्तक इसके ठीक उलट ख़तरा बताती है: ग्राम सभा के सदस्य अक्सर अमीर ज़मींदारों के एक छोटे गुट (यानी बंद, चुनिंदा समूह) द्वारा नियंत्रित होते हैं, जो आमतौर पर उच्च जाति या भूस्वामी किसानों से होते हैं और असली फ़ैसले खुद लेते हैं, जबकि बहुसंख्यक लोग केवल देखते रह जाते हैं।
8 ज़मीनी स्तर की असली कहानियाँ
पुस्तक बॉक्स में तीन असली विवरण देती है, जो दिखाते हैं कि ज़मीनी स्तर का लोकतंत्र व्यवहार में कैसा दिखता है। इनमें से दो महिला समाख्या (ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करने वाला गैर-सरकारी संगठन) से जुड़े हैं: कलावती का विवरण इसी ने दर्ज किया, और सुखीपुर-दुखीपुर का फड़ इसी का प्रशिक्षण कार्यक्रम था। वन पंचायत वाले बॉक्स में कोई स्रोत नहीं दिया गया है।
कलावती: “अब उसका अपना नाम है”
दलित जाति की कलावती चुनाव लड़ने को लेकर चिंतित थी। पंचायत सदस्य बनने से उसका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़ा। सबसे बड़ी बात, अब “उसका अपना नाम है”: पहले वह केवल “रामू की माँ” या “हीरालाल की पत्नी” कहलाती थी। उसे डर था कि प्रधान का चुनाव हारने पर उसकी सखियों की “नाक कट जाएगी”।
वन पंचायत: जहाँ से चिपको आंदोलन शुरू हुआ
उत्तराखंड में ज़्यादातर काम महिलाएँ करती हैं क्योंकि पुरुष अक्सर रक्षा सेवाओं में बाहर तैनात रहते हैं। वनों की कटाई से जूझते हुए महिलाओं ने वन-पंचायतें बनाईं: पौधशालाएँ तैयार कीं, पहाड़ी ढालों के लिए छोटे पौधों की देखभाल की, और अवैध कटाई रोकने के लिए निगरानी की। मशहूर चिपको आंदोलन, पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाना, इसी क्षेत्र में शुरू हुआ।
सुखीपुर और दुखीपुर: एक फड़ के ज़रिए कही गई कहानी
एक “फड़” (चित्रों व लोकगीत सहित कहानी कहने का परंपरागत कपड़े का स्क्रॉल) के ज़रिए दो गाँवों की तुलना की गई: दुखीपुर (“दुखी गाँव”) की भ्रष्ट प्रधान विमला ने स्कूल के लिए मिले धन से अपने परिवार का घर बनवाया, जिससे गाँव वाले दुखी और गरीब रह गए। सुखीपुर (“सुखी गाँव”) की प्रधान नजमा ने असली विकास कार्यों में धन लगाया: चलता हुआ चिकित्सालय और अच्छी सड़क। संदेश: सिर्फ़ वोट देना, खड़े होना या जीतना काफ़ी नहीं, यह जानना ज़रूरी है कि आप किसे और क्यों वोट दे रहे हैं; ईमानदारी का मूल्य कहानी और गीत, दोनों में झलकता है।
9 राजनीतिक दल, दबाव समूह और हित समूह
हर रोज़ का अखबार दिखाता है कि विभिन्न समूह अपनी आवाज़ सुनवाना और सरकार का ध्यान अपनी परेशानियों की ओर खींचना चाहते हैं।
किसी एक समाचारपत्र को एक सप्ताह तक पढ़ें। हर टकराव के लिए नोट करें: मुद्दा क्या है, समूह ने इसे कैसे उठाया (दल का प्रतिनिधिमंडल, सड़क विरोध, समाचारपत्रों में प्रचार, सार्वजनिक बैठक), और कौन-सा निकाय इसे उठा रहा है: दल, व्यावसायिक संघ, गैर-सरकारी संगठन या कोई और।
9.1 कौन किसे संगठित करता है
| समूह | पुस्तक के अनुसार बनाया गया संगठन |
|---|---|
| उद्योगपति | फेडरेशन ऑफ़ इंडियन कॉमर्स एंड चैंबर्स (FICCI) और एसोसिएशन ऑफ़ चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स (ASSOCHAM) |
| कर्मचारी | इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) या द सेंटर फ़ॉर इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) |
| किसान | शेतकरी संगठन; कृषि मज़दूरों के अपने अलग संघ हैं |
राजनीतिक दल वह संगठन है जो निर्वाचन प्रक्रिया के ज़रिए सरकार पर न्यायपूर्ण नियंत्रण पाने की ओर उन्मुख होता है, ताकि सत्ता पाकर किसी विशिष्ट कार्यक्रम को पूरा किया जा सके।
राजनीतिक दल समाज की एक समझ पर आधारित होते हैं कि समाज कैसा होना चाहिए, और लोकतांत्रिक प्रणाली में विभिन्न समूहों के हित का प्रतिनिधित्व करते हैं। हित समूह राजनीतिक दलों को प्रभावित करते हैं; जब किसी समूह का हित नहीं सुना जाता, तो वह अलग दल बना लेता है, या दबाव समूह बनाकर सरकार से सीधे बात मनवाने की कोशिश करता है।
| शब्द | असल में क्या है |
|---|---|
| हित समूह | राजनीतिक क्षेत्र में विशिष्ट हितों को पूरा करने के लिए संगठित, मुख्यतः वैधानिक अंगों के सदस्यों का समर्थन पाने के ज़रिए काम करता है |
| दबाव समूह | जब कोई हित समूह चुनाव लड़े बिना सरकार से सीधे अपनी बात मनवाने की कोशिश करता है |
जो राजनीतिक संगठन सत्ता पाना चाहते हैं पर उन्हें सामान्य तरीक़ों से यह अवसर नहीं मिलता, उन्हें मान्यता मिलने तक आंदोलन ही माना जाना बेहतर है।
हर साल फरवरी के अंत में वित्त मंत्री संसद में बजट पेश करते हैं। इससे पहले हर रोज़ अखबार में यह खबर छपती है कि उद्यमियों, श्रमिक संघों, किसानों और महिलाओं के संगठनों की वित्त मंत्रालय से बैठक हुई: दबाव समूह की लॉबिंग का रोज़मर्रा का उदाहरण।
10 क्या दबाव समूह वाकई सबका प्रतिनिधित्व करते हैं?
सभी समूहों की सरकार तक पहुँच या दबाव बनाने की क्षमता एक जैसी नहीं होती। कुछ समाजशास्त्री तर्क देते हैं कि “दबाव समूह” की अवधारणा वर्ग, जाति या लिंग जैसे प्रबल सामाजिक समूहों की पहले से मौजूद शक्ति को कम आँकती है, और यह कहना ज़्यादा सही होगा कि प्रबल वर्ग सीधे राज्य को नियंत्रित करते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि दबाव समूह और सामाजिक आंदोलन बेकार हैं: पुस्तक कहती है कि ये लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहते हैं, जो इसी पुस्तक के आठवें अध्याय (सामाजिक आंदोलन) में विस्तार से दिखाया गया है।
वर्गों की वास्तविक स्थिति अर्थ प्रणाली के क्रम में है, जबकि प्रस्थिति समूहों का स्थान सामाजिक क्रम (आर्डर) में है… लेकिन दल शक्ति संरचना के अंतर्गत होते हैं। दलों की क्रियाएँ हमेशा एक ऐसे उद्देश्य के लिए होती हैं जिनकी प्राप्ति एक नियोजित दृष्टि के लिए की जाती है। उद्देश्य एक ‘कारण’ हो सकता है (दल का उद्देश्य किसी आदर्श या भौतिक आवश्यकता के लिए कार्यक्रम की वास्तविकता को जानना भी हो सकता है), या उद्देश्य निजी भी हो सकता है (आराम, शक्ति और इनके माध्यम से नेता और दल के अनुयायियों का सम्मान)।
मैक्स वेबर, वेबर 1948: 194
आर्थिक वर्ग पैसे और उत्पादन से जुड़े हैं; प्रस्थिति समूह सामाजिक सम्मान से; पर राजनीतिक दल केवल सत्ता पाने और उसका उपयोग करने के लिए बनता है, चाहे किसी सच्चे उद्देश्य के लिए या निजी फ़ायदे (पद, सम्मान, सुविधाएँ) के लिए, जिसे एक उद्देश्य का रूप दे दिया जाता है।
11 निष्कर्ष: यह अध्याय असल में क्या कहता है
संविधान कोई स्थिर दस्तावेज़ नहीं है: न्यायालयों ने बार-बार मौलिक अधिकारों को सामाजिक न्याय के लिए बढ़ाया, और 73वें संशोधन ने 1992 में पंचायती राज को असली संवैधानिक शक्ति दी, संरचना व महिला आरक्षण, दोनों के साथ। पर केवल संरचना कमज़ोर वर्ग को असली शक्ति नहीं दिलाती: ग्राम सभाएँ अभी भी प्रभुत्वशाली गुटों के कब्ज़े में जा सकती हैं, और आदिवासी स्वशासन का एक हिस्सा 73वें संशोधन से बाहर ही रह जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक दल, दबाव समूह और हित समूह सुने जाने की होड़ में हैं, पर असमान रूप से, यही कारण है कि कुछ समाजशास्त्री कहते हैं कि केवल “दबाव समूह” के नज़रिए से प्रबल वर्गों की शक्ति कम आँकी जा सकती है।
- कानून = शक्ति; न्याय = निष्पक्षता; संविधान = मूल मानदंड; उच्चतम न्यायालय = अंतिम व्याख्याकर्त्ता
- बॉक्स 3.1: अनुच्छेद 21 → जीवनयापन/स्वास्थ्य/शिक्षा/गरिमा; अनुच्छेद 19(क) में सूचना का अधिकार (1993); अनुच्छेद 14 में समान वेतन
- 73वाँ संशोधन (1992): PRI को संवैधानिक प्रस्थिति, पाँच वर्षीय चुनाव, स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण
- पिरामिड: ग्राम सभा (आधार) → मध्यवर्ती स्तर → ज़िला स्तर (ज़िला योजना समिति)
- 73वें+74वें संशोधन: एक तिहाई महिला आरक्षण, 17% अ.जा./अ.ज.जा. महिलाएँ, 1993-94 में 8,00,000 महिलाएँ राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ीं
- पंचायत शक्तियाँ: योजना, कराधान, हस्तांतरण, सामाजिक कल्याण (श्मशान/जन्म-मृत्यु आँकड़े, IRDP, ICDS), विकासात्मक कार्य
- न्याय पंचायत: जुर्माना, सज़ा नहीं; दहेज उत्पीड़न में प्रभावी
- मेघालय के गारो/खासी/जयंतिया और दरबार कुर काफ़ी हद तक 73वें संशोधन से बाहर; नोंगबरी: आदिवासी संस्थाएँ अपने आप लोकतांत्रिक नहीं होतीं
- ग्राम सभाओं पर अक्सर अमीर, उच्च जाति के गुटों का कब्ज़ा
- कलावती, वन पंचायत/चिपको, सुखीपुर-दुखीपुर: बॉक्स के तीन असली विवरण (कलावती और फड़, महिला समाख्या के)
- राजनीतिक दल बनाम हित समूह बनाम दबाव समूह में अंतर याद रखें; वेबर का “शक्ति संरचना” वाला उद्धरण