| बोर्ड | 2026-27 में भारांक | टिप्पणी |
|---|---|---|
| CBSE | 10 अंक | CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम की यूनिट 11 (भाग ख, भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास, 40 अंक); पुस्तक में यह पुस्तक 2 का अध्याय 4 है |
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इस अध्याय में जगह-जगह (कुमार, 1998) या (दास, 1999) जैसे संदर्भ मिलेंगे। ये पुस्तक के अपने स्रोत-उल्लेख हैं, इन्हें याद करना ज़रूरी नहीं है, सिवाय उन समाजशास्त्रियों के जिनका नाम और विचार नोट्स में सीधे पढ़ाया गया है, जैसे एम.एन. श्रीनिवास और जान ब्रेमन।
- ग्रामीण भारत में भूमि सिर्फ संपत्ति नहीं, जीने का एक तरीका भी क्यों है
- जाति और वर्ग कहाँ साथ चलते हैं, और कहाँ नहीं
- भूमि सुधार क्या बदलना चाहते थे, और ज़्यादातर असफल क्यों रहे
- हरित क्रांति ने उत्पादन तो बढ़ाया, पर असमानता भी क्यों बढ़ाई
- किसान पलायन क्यों करते हैं, और “घुमक्कड़ मज़दूर” स्वतंत्र क्यों नहीं है
- उदारीकरण और संविदा खेती ने ग्रामीण जीवन को कैसे बदला
भारत आज भी मूल रूप से एक ग्रामीण समाज है। 2011 की जनगणना के अनुसार 69 प्रतिशत भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, और उनकी जीविका कृषि या उससे जुड़े कामों से चलती है। यही वजह है कि कृषि भूमि भारत का सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक साधन है। लेकिन भूमि सिर्फ पैसा कमाने का ज़रिया नहीं है। यह संपत्ति का भी एक महत्वपूर्ण प्रकार है, और जीने का एक तरीका भी: हमारी बहुत सी सांस्कृतिक रस्मों में कृषि की पृष्ठभूमि होती है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में नव वर्ष के त्योहार मुख्य रूप से फसल काटने के समय मनाए जाते हैं, और नए कृषि मौसम के आने की घोषणा करते हैं:
पोंगल
तमिलनाडु
बीहू
असम
बैसाखी
पंजाब
उगाड़ी
कर्नाटक
पर “ग्रामीण” का मतलब सिर्फ खेती नहीं है। गाँवों में हमेशा से कारीगर और सेवा देने वाली जातियाँ रही हैं जो खेती और ग्राम्य जीवन को चलाती थीं: कुम्हार, खाती (बढ़ई), जुलाहे, लुहार, सुनार, कहानी सुनाने वाले, ज्योतिषी, पुजारी, भिश्ती (पानी बाँटने वाले) और तेली। औपनिवेशिक काल से मशीन से बने सामानों ने इन हाथ से बने सामानों की जगह ले ली, इसलिए ये पारंपरिक व्यवसाय लगातार घटते गए। साथ ही, नई ग्रामीण आजीविकाएँ भी बढ़ी हैं: आज गाँवों में रहने वाले बहुत से लोग डाकखाने, शिक्षा विभाग, कारखाने या सेना जैसी नौकरियों से जीविका चलाते हैं, जिनका खेती से कोई सीधा संबंध नहीं है।
भारत के कुछ हिस्सों में 40 से 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास बिल्कुल भी ज़मीन नहीं है। चूँकि भूमि ही सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक साधन है, इसलिए भूमि रखना ही ग्रामीण वर्ग संरचना को आकार देता है।
1 कृषिक संरचना: ग्रामीण भारत में जाति एवं वर्ग
ग्रामीण समाज में कृषि भूमि सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक साधन है, पर इसका बराबर विभाजन नहीं है। कुछ क्षेत्रों में अधिकतर परिवारों के पास कम से कम थोड़ी ज़मीन होती है; कुछ अन्य क्षेत्रों में लगभग आधे परिवारों के पास कोई ज़मीन नहीं होती और वे पूरी तरह कृषि मज़दूरी या अन्य कामों पर निर्भर रहते हैं। उत्तराधिकार के नियमों और प्रचलित पितृवंशीय नातेदारी व्यवस्था (जिसमें संपत्ति और वंश पुरुष रेखा से आगे बढ़ते हैं) के कारण भारत के अधिकांश भागों में महिलाएँ ज़मीन की मालिक नहीं होतीं। कानून महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी दिलाने में सहायक होता है, पर वास्तव में उनके पास बहुत सीमित अधिकार होते हैं: परिवार का हिस्सा होने के नाते भूमि पर अधिकार होता है, जिसका मुखिया एक पुरुष होता है।
कृषिक संरचना का अर्थ है भूस्वामित्व की संरचना: किसी क्षेत्र के लोगों के बीच कृषि भूमि किस तरह बँटी है। चूँकि ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि ही सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक साधन है, इसलिए किसके पास कितनी भूमि है, यही तय करता है कि वह कृषि उत्पादन में कौन सी भूमिका निभाएगा, और इसी से पूरी ग्रामीण वर्ग संरचना बनती है।
भूमि तक पहुँच ग्रामीण परिवारों को तीन मुख्य वर्गों में बाँटती है, सबसे सुरक्षित आय से सबसे कम सुरक्षित आय तक:
1.1 जाति और वर्ग कैसे जुड़े हैं
ग्रामीण भारत में जाति और वर्ग का गहरा संबंध है, पर यह संबंध पूरी तरह सटीक नहीं है। सबसे अच्छी ज़मीन और साधन, और इसलिए शक्ति एवं विशेषाधिकार भी, उच्च एवं मध्य जातियों के पास रहे हैं, इसलिए हम प्रायः सोचते हैं कि जाति का दर्जा और वर्ग का दर्जा साथ-साथ चलते हैं। पर पुस्तक कहती है कि कुछ क्षेत्रों में यह मोटे तौर पर सही है, पूर्ण सत्य नहीं: उदाहरण के लिए, कई जगहों पर ब्राह्मण, जो सबसे ऊँची जाति हैं, बड़े भूस्वामी नहीं हैं। इसका मतलब यह हुआ कि ब्राह्मण आमतौर पर भूस्वामी कृषिक संरचना का हिस्सा नहीं गिने जाते, भले ही वे ग्रामीण समाज के अंग हैं। भारत के अधिकांश क्षेत्रों में भूस्वामित्व वाले समूह के लोग ‘शूद्र’ या ‘क्षत्रिय’ वर्ण के हैं।
समाजशास्त्री एम. एन. श्रीनिवास ने किसी क्षेत्र की उस एक-दो जातियों को प्रबल जाति कहा, जो संख्या में बहुत अधिक होने के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी शक्तिशाली हो। प्रबल जाति सिर्फ संख्या के बल पर नहीं, बल्कि आर्थिक-राजनीतिक ताकत के बल पर भी स्थानीय समाज पर प्रभुत्व रखती है।
| क्षेत्र | पुस्तक में नामित प्रबल भूस्वामी जातियाँ |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | जाट और राजपूत |
| कर्नाटक | वोक्कालिगास और लिंगायत |
| आंध्र प्रदेश | कम्मास और रेड्डी |
| पंजाब | जाट सिख |
प्रबल भूस्वामी समूह आमतौर पर मध्यम या ऊँची जातियों के होते हैं, जबकि अधिकांश सीमांत किसान और भूमिहीन लोग निम्न जातीय समूहों से आते हैं, जिन्हें सरकारी वर्गीकरण में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग कहा जाता है। भारत के कई भागों में पहले “अछूत” या दलित जातियों को ज़मीन रखने का अधिकार ही नहीं था, और वे अधिकांशतः प्रबल जाति के भूस्वामियों के यहाँ कृषि मज़दूर रहते थे। इससे इन जातियों के पास भूस्वामियों के लिए काम करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता था, और भूस्वामियों को गहन खेती के लिए एक स्थायी मज़दूर वर्ग मिल जाता था, जिससे उनकी आमदनी और बढ़ जाती थी।
यदि पूछा जाए “क्या ग्रामीण भारत में जाति और वर्ग में सीधा संबंध है?”, तो सीधे हाँ या ना में उत्तर न दें। लिखें: मोटे तौर पर हाँ (ऊँची/मध्यम जातियों के पास अधिकांश ज़मीन है), पर एक असली अपवाद के साथ: ब्राह्मण, सबसे ऊँची जाति होते हुए भी, कई जगहों पर बड़े भूस्वामी नहीं होते।
पुस्तक कहती है कि कृषि उत्पादन और कृषिक संरचना के बीच एक सीधा संबंध होता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पक्की व्यवस्था है, जैसे तमिलनाडु में कावेरी नदी के डेल्टा में चावल उगाने वाले क्षेत्र, वहाँ गहन खेती के लिए बहुत अधिक मज़दूरों की ज़रूरत होती है। यहाँ बहुत असमान कृषिक संरचना विकसित हुई। बड़ी संख्या में भूमिहीन मज़दूर, जो अधिकांशतः बंधुआ (एक ही भूस्वामी से बँधे, दूसरी जगह काम करने की आज़ादी न रखने वाले) और निम्न जाति के होते थे, इस क्षेत्र की कृषिक संरचना के लक्षण थे (कुमार, 1998)।
देश के अधिकांश क्षेत्रों में एक “मालिकाना जाति” समूह, यानी वह जाति जिसके पास सभी महत्वपूर्ण साधन होते हैं और सभी मज़दूरों पर जिसका नियंत्रण होता है, ताकि वे उसके लिए काम करें, इसी स्थिति में होता है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में हाल तक बेगार (मुफ़्त या ज़बरदस्ती करवाया गया श्रम) जैसी प्रथाएँ प्रचलित थीं, जिनमें निम्न जाति के लोगों को हर साल गाँव के ज़मींदार या भूस्वामी (एक बड़ा भूस्वामी, जो अक्सर स्थानीय राजनीति में भी ताकतवर होता था) के लिए निश्चित दिनों तक मुफ़्त काम करना पड़ता था, जो लगभग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली बंधुआ मज़दूरी जैसा ही था। कानूनी रूप से ऐसी प्रथाएँ समाप्त हो चुकी हैं, पर कई क्षेत्रों में अब भी चलती हैं।
2 भूमि सुधार के परिणाम
2.1 औपनिवेशिक पृष्ठभूमि
कृषिक संरचना पूर्व-औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक बहुत बदल चुकी है। पूर्व-औपनिवेशिक काल में भी वही प्रबल जातियाँ खेती करती थीं, पर ज़मीन की सीधी मालिक नहीं थीं: स्थानीय राजा या ज़मींदार (भूस्वामी जो अक्सर क्षत्रिय या अन्य ऊँची जाति के होते थे और अपने क्षेत्र में राजनीतिक रूप से भी शक्तिशाली थे) ज़मीन पर नियंत्रण रखते थे, और किसानों को उपज का बड़ा हिस्सा उन्हें देना पड़ता था।
जब ब्रिटिश भारत आए, तो उन्होंने कई क्षेत्रों में इन्हीं स्थानीय ज़मींदारों के ज़रिए शासन चलाया और उन्हें पहले से भी ज़्यादा अधिकार दे दिए, साथ ही कृषि भूमि पर भारी टैक्स भी लगा दिया। इसी वजह से ज़मींदारों ने किसानों से जितना हो सके उतना उपज या पैसा वसूला। ज़मींदारी व्यवस्था का एक परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश काल के दौरान कृषि उत्पादन कम होने लगा: ज़मींदारों ने किसानों को अपने दबाव से पीस डाला, और बार-बार पड़ने वाले अकालों तथा युद्धों ने जनता को भारी क्षति पहुँचाई। इसे ज़मींदारी व्यवस्था कहा गया। जिन क्षेत्रों में ब्रिटिश सीधा शासन था, वहाँ इसकी जगह रैयतवाड़ी व्यवस्था चली (तेलुगू में “रैयत” का अर्थ है कृषक)। इसमें टैक्स चुकाने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार व्यक्ति को “वास्तविक कृषक” कहा जाता था, पर पुस्तक खुद बताती है कि यह नाम भ्रामक था: ये लोग अक्सर स्वयं ज़मींदार होते थे, खेत जोतने वाले किसान नहीं। बहरहाल, यहाँ टैक्स सीधे सरकार को जाता था, बीच में कोई ज़मींदार नहीं होता था। इसीलिए टैक्स का बोझ हल्का रहा और किसानों को खेती में निवेश करने का ज़्यादा प्रोत्साहन मिला, जिससे ये क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक उत्पादक और समृद्ध बने।
2.2 स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार
स्वतंत्रता के बाद नेहरू सरकार ने नियोजित विकास का कार्यक्रम शुरू किया। इसमें कृषिक सुधार को औद्योगीकरण के साथ जोड़ा गया, तीन सीधी समस्याओं के जवाब में: कम कृषि उत्पादकता, आयातित अनाज पर निर्भरता, और ग्रामीण जनसंख्या में गहरी गरीबी। सन् 1950 से 1970 के बीच राष्ट्रीय और राज्य, दोनों स्तरों पर भूमि सुधार कानूनों की एक शृंखला पारित की गई, जो तीन श्रेणियों में बँटी थी:
ज़मींदारी व्यवस्था का उन्मूलन
किसान और राज्य के बीच के बिचौलियों की परत हटाई गई। सभी भूमि सुधार कानूनों में यह संभवतः सबसे प्रभावी रहा: इसने ज़मींदारों की आर्थिक-राजनीतिक ताकत कमज़ोर की और असली भूस्वामियों-कृषकों की स्थिति मज़बूत की।
पट्टेदारी उन्मूलन एवं नियमन अधिनियम
पट्टेदारी को पूरी तरह हटाने या किराया नियंत्रित करने की कोशिश थी, ताकि पट्टेदारों को कुछ सुरक्षा मिले। अधिकांश राज्यों में यह प्रभावी ढंग से लागू ही नहीं हुआ, सिवाय पश्चिम बंगाल और केरल के, जहाँ आमूल-चूल परिवर्तन हुआ और पट्टेदारों को ज़मीन के अधिकार मिले।
भूमि हदबंदी अधिनियम
एक परिवार कितनी ज़मीन रख सकता है, इसकी ऊपरी सीमा तय की गई, जो ज़मीन की उपजाऊ क्षमता के अनुसार अलग-अलग थी: उपजाऊ ज़मीन की हदबंदी कम, बंजर ज़मीन की ज़्यादा। राज्य को अतिरिक्त ज़मीन लेकर भूमिहीन परिवारों को तय की गई श्रेणियों, जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, के अनुसार पुनः बाँटनी थी, पर अधिकांश भूस्वामी बेनामी हस्तांतरण (ज़मीन को किसी और के नाम पर दिखाकर असली मालिकाना छुपाना) जैसे रास्तों से बच निकले।
यह न लिखें कि भूमि हदबंदी अधिनियम सफल रहे। पुस्तक कहती है कि अधिकांश राज्यों में ये अधिनियम “दंतविहीन” (यानी बेअसर) साबित हुए: बचाव के बहुत से रास्तों से अधिकांश भूस्वामी बच निकले। भूस्वामियों ने ज़मीन रिश्तेदारों, अन्य लोगों और नौकरों के नाम कर दी; कुछ स्थानों पर कुछ अमीर किसानों ने अपनी पत्नी को वास्तव में तलाक दे दिया (परंतु उसी के साथ रहते रहे), क्योंकि अधिनियम अविवाहित महिला को अलग हिस्सा देता था, पत्नियों को नहीं। इन्हें बेनामी हस्तांतरण भी कहा जाता था।
भूमि सुधार की प्रगति हर राज्य में अलग-अलग रही, और औपनिवेशिक काल से अब तक कृषिक संरचना में वास्तव में परिवर्तन आया, लेकिन अभी भी बहुत असमानता बची हुई है। पुस्तक का अपना निष्कर्ष याद रखने लायक है: भूमि सुधार न केवल कृषि उपज को अधिक बढ़ाने के लिए, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों से गरीबी हटाने और सामाजिक न्याय दिलाने के लिए भी आवश्यक है।
3 हरित क्रांति और इसके सामाजिक परिणाम
अधिकांश क्षेत्रों में भूमि सुधार का प्रभाव सीमित ही रहा। इसके उलट, 1960-70 के दशक की हरित क्रांति ने जहाँ भी असर डाला, वहाँ बड़ा बदलाव लाई।
हरित क्रांति कृषि आधुनिकीकरण का एक सरकारी कार्यक्रम था, जिसे मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने आर्थिक सहायता दी। यह अधिक उत्पादकता वाले या संकर बीजों को कीटनाशकों, खादों और अन्य निवेशों के साथ बढ़ावा देने पर आधारित था। यह केवल उन्हीं क्षेत्रों में लागू हुआ जहाँ सिंचाई की पक्की व्यवस्था थी, और मुख्यतः गेहूँ-चावल उत्पादक क्षेत्रों को लक्षित करता था।
| हरित क्रांति की पहली लहर के क्षेत्र | मुख्य फसलें |
|---|---|
| पंजाब | गेहूँ और चावल |
| पश्चिमी उत्तर प्रदेश | |
| तटीय आंध्र प्रदेश | |
| तमिलनाडु के कुछ हिस्से |
नई तकनीक से कृषि उत्पादकता में तेज़ बढ़ोतरी हुई, और भारत दशकों में पहली बार खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना, जो सरकार और वैज्ञानिकों दोनों की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। पर इन क्षेत्रों का अध्ययन करने वाले समाजशास्त्रियों ने कुछ नकारात्मक सामाजिक प्रभाव भी देखे, साथ ही पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ा।
पुस्तक कृषकों के लिए दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करती है, इस आधार पर कि वे जो उगाते हैं उसे बेच पाते हैं या नहीं:
जीवननिर्वाही कृषक
- मुख्यतः अपने परिवार के उपयोग के लिए उगाता है
- बाज़ार के लिए अतिरिक्त उत्पादन नहीं कर पाता
- इसे “जीवननिर्वाही कृषि” कहा जाता है
काश्तकार / किसान
- परिवार की ज़रूरत से ज़्यादा उत्पादन करता है
- अतिरिक्त उपज बेचकर बाज़ार से जुड़ता है
- हरित क्रांति का सबसे ज़्यादा लाभ इन्हीं को मिला
नए निवेश महँगे थे, इसलिए मुख्यतः मध्यम और बड़े किसान ही इन्हें खरीद पाए और लाभ उठा सके; छोटे और सीमांत किसान इतना खर्च नहीं कर सकते थे। कई जगह भूस्वामियों ने अपने पट्टेदारों से ज़मीन वापस लेकर खुद खेती करना शुरू कर दिया, क्योंकि अब सीधी खेती करना ज़्यादा फायदेमंद हो गया था। इससे पट्टेदारों, भूमिहीनों और सीमांत भूधारकों की हालत और बिगड़ गई, जबकि बड़े किसान और समृद्ध हुए। इसके अलावा पंजाब और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में टिलर, ट्रेक्टर, थ्रैशर जैसी मशीनों के प्रयोग ने सेवा प्रदान करने वाली जातियों के उन समूहों को बेदखल कर दिया जो इन कृषि संबंधी क्रियाकलापों को करते थे, और इससे गाँव से शहर की ओर पलायन की रफ़्तार भी बढ़ गई।
पुस्तक हरित क्रांति की अंतिम परिणति को विभेदीकरण कहती है: धनी अधिक धनी हो गए, जबकि कई निर्धन पूर्ववत रहे या और गरीब हो गए।
यह न लिखें कि हरित क्रांति से मज़दूरी बढ़ी तो मज़दूरों की हालत सुधर गई। पुस्तक दोनों बातें साथ रखती है: मज़दूरों की माँग बढ़ने से कई क्षेत्रों में कृषि मज़दूरों का रोज़गार और उनकी दिहाड़ी, दोनों बढ़े। पर कीमतों की बढ़ोतरी तथा खाद्यान्न (अनाज) के स्थान पर नगद भुगतान से अधिकतर ग्रामीण मज़दूरों की आर्थिक दशा खराब हो गई।
हरित क्रांति का दूसरा चरण 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब सूखे तथा आंशिक सिंचित क्षेत्रों के किसानों ने भी हरित क्रांति की खेती के तरीके अपनाने शुरू किए। इन क्षेत्रों में सूखी कृषि से सिंचित कृषि की ओर बड़ा बदलाव आया और फसलों के प्रतिमान भी बदले। बढ़ते व्यापारीकरण और बाज़ार पर निर्भरता ने (उदाहरण के लिए जहाँ कपास की खेती को प्रोत्साहित किया गया) जीवन-यापन की असुरक्षा घटाने की बजाय बढ़ाई, क्योंकि जो किसान पहले अपने लिए खाद्यान्न उगाते थे, वे अब आमदनी के लिए बाज़ार पर निर्भर हो गए। इसके अलावा हरित क्रांति के अधिकांश क्षेत्रों में किसानों ने बहुफसली कृषि (जिसमें जोखिम बँट जाता है) की जगह एकल फसली कृषि अपनाई, जिससे फसल नष्ट होने पर उनके पास कोई सहारा नहीं बचता।
हरित क्रांति ने क्षेत्रीय असमानता भी बढ़ाई: जिन क्षेत्रों में यह तकनीकी परिवर्तन हुआ वे अधिक विकसित हो गए, जबकि अन्य क्षेत्र पूर्ववत रहे। हरित क्रांति को देश के पूर्वी भागों की तुलना में पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों, तथा पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक लागू किया गया (दास, 1999)। कुछ क्षेत्रों में आज भी “सामंतवादी” कृषिक संरचना सुस्थापित है, जिसमें भूधारक जातियाँ तथा भूस्वामी निम्न जातियों, भूमिहीन मज़दूरों और छोटे किसानों पर अपनी सत्ता बरकरार रखे हुए हैं। इन क्षेत्रों में जाति-वर्ग की तीखी असमानता ने हाल के वर्षों में अंतर्जातीय हिंसा सहित कई तरह की हिंसा को जन्म दिया है।
पुस्तक यह भी चेताती है कि “वैज्ञानिक” खेती अपने-आप श्रेष्ठ नहीं है। अक्सर सोचा जाता है कि कृषि की “वैज्ञानिक” पद्धति की जानकारी देने से किसानों की दशा सुधरेगी, पर भारतीय किसान हरित क्रांति से कहीं पहले, सदियों से खेती करते आ रहे हैं और उन्हें ज़मीन तथा फसलों की बहुत सघन पारंपरिक जानकारी है। ऐसी बहुत सी जानकारी, जैसे बीजों की वे पारंपरिक किस्में जिन्हें किसानों ने सदियों में उन्नत किया था, लुप्त होती जा रही है, क्योंकि संकर तथा जैविक सुधार वाले बीजों को अधिक उत्पादकता वाले और “वैज्ञानिक” बीजों के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है।
स्थानीय मत में सावयवी (जैविक) उत्पाद की संपूर्णता की संकर उत्पाद के साथ तुलना की गई है। मदभावी गाँव की एक बुज़ुर्ग महिला भार्गव हुगर ने कहा:
“क्या… वे गेहूँ, लाल सोरघम उगाते हैं… कुछ कंद और मिर्च के पौधे उगाते हैं… कपास। अब सब केवल संकर है… ज्वारी (सावयव/स्थानीय?) कहाँ है? संकर पौधे… और पैदा होने वाले बच्चे भी संकर होते हैं।” (वासवी 1994ः295-96)
यह पुस्तक का अपना उदाहरण है कि बहुत से ग्रामीण लोग स्वयं विश्वास करते हैं कि संकर किस्में पारंपरिक किस्मों से कम स्वस्थ होती हैं। अलग से, पर्यावरण तथा समाज पर कृषि के आधुनिक तरीकों के नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए, बहुत से वैज्ञानिक तथा कृषक आंदोलन अब कृषि के पारंपरिक तरीकों तथा अधिक सावयवी बीजों की ओर लौटने की सलाह दे रहे हैं।
4 स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण समाज में परिवर्तन
स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण सामाजिक संबंधों की प्रकृति में अनेक प्रभावशाली रूपांतरण हुए, विशेषतः उन क्षेत्रों में जहाँ हरित क्रांति लागू हुई। पुस्तक ये चार बदलाव गिनाती है:
- गहन कृषि के कारण कृषि मज़दूरों की बढ़ोतरी
- भुगतान में सामान (अनाज) के स्थान पर नगद भुगतान
- पारंपरिक बंधनों में शिथिलता, यानी भूस्वामी और कृषि मज़दूरों (जिन्हें बँधुआ मज़दूर भी कहते हैं) के बीच पुश्तैनी संबंधों में कमी
- “मुक्त” दिहाड़ी मज़दूरों के वर्ग का उदय
समाजशास्त्री जान ब्रेमन ने भूस्वामियों (आमतौर पर प्रबल जाति) और कृषि मज़दूरों (आमतौर पर निम्न जाति) के बीच बदलते संबंध को “संरक्षण से शोषण” की ओर एक बदलाव बताया (ब्रेमन, 1974)। यहाँ “संरक्षण” का अर्थ है भूस्वामी की वह पारंपरिक, संरक्षक जैसी भूमिका, जिसमें वह अपने आश्रित मज़दूरों को सुरक्षा देता था और बदले में उनकी वफ़ादारी तथा श्रम पाता था। कुछ विद्वान इसे पूँजीवादी कृषि की ओर एक बदलाव मानते हैं, क्योंकि पूँजीवादी उत्पादन में मज़दूरों को उत्पादन के साधनों (यानी ज़मीन, औज़ार और अन्य ज़रूरी संसाधनों) से अलग कर दिया जाता है, और उनकी जगह “मुक्त” दिहाड़ी मज़दूरी ले लेती है।
यह बदलाव असल में औपनिवेशिक काल में ही शुरू हो गया था (19वीं सदी में महाराष्ट्र के बड़े हिस्सों में कपास की खेती विश्व बाज़ार से जुड़ चुकी थी), पर स्वतंत्रता के बाद इसकी रफ़्तार तेज़ी से बढ़ी, क्योंकि राज्य ने सिंचाई, सड़क, बिजली और बैंकों-सहकारी समितियों के ज़रिए कृषि ऋण में निवेश किया। 2014 में शुरू हुई दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना पुस्तक का अपना उदाहरण है, जो ग्रामीण भारत में बिना रुकावट बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की सरकारी कोशिश दिखाती है।
कम बदलाव वाले क्षेत्र
- पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार
- प्रभावशाली भू-सुधारों, राजनीतिक गतिशीलता तथा पुनर्वितरण के साधनों का अभाव
- कृषिक संरचना और लोगों के जीवन में बहुत कम बदलाव
अलग रास्ते से बदलने वाले क्षेत्र
- तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य गुजरात: संपन्न किसान उद्यमी बने (रट्टन, 1995)
- केरल: राजनीतिक गतिशीलता (अधिकारों के लिए संगठित राजनीतिक कार्रवाई), पुनर्वितरण और खाड़ी देशों से प्रेषण (विदेश में काम करने वाले परिवारजनों द्वारा भेजा गया पैसा) से एक मिश्रित अर्थव्यवस्था बनी, सिर्फ कृषि-प्रधान नहीं
तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य गुजरात जैसे कृषि-संपन्न क्षेत्रों में, प्रबल जातियों के संपन्न किसानों ने खेती से हुए मुनाफ़े को अन्य व्यापारों में लगाना शुरू किया, जिससे नए क्षेत्रीय उद्यमी और राजनीतिक रूप से ताकतवर वर्ग उभरे। साथ ही, ग्रामीण और अर्ध-नगरीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा, खासकर निजी व्यावसायिक कॉलेजों के फैलने से इन नए ग्रामीण अभिजात वर्गों ने अपने बच्चों को पढ़ाया, जिनमें से कई आगे चलकर सफ़ेदपोश नौकरियों या व्यापार में गए, जिससे शहरी मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ।
5 मज़दूरों का संचार (सरकुलेशन)
जैसे-जैसे भूस्वामी और मज़दूरों के बीच पारंपरिक संरक्षण के बंधन टूटे, और पंजाब जैसे संपन्न हरित क्रांति क्षेत्रों में मज़दूरों की माँग बढ़ी, वैसे-वैसे मौसमी पलायन का एक प्रतिमान उभरा: हज़ारों मज़दूर अपने गाँव और उन संपन्न क्षेत्रों के बीच आते-जाते रहते हैं जहाँ ज़्यादा काम और ज़्यादा मज़दूरी मिलती है। 1990 के दशक के मध्य से बढ़ती ग्रामीण असमानता ने भी कई परिवारों को एक साथ कई तरह के काम करने पर मजबूर किया है, जिससे पलायन की एक और वजह जुड़ गई। एक जीवन-रणनीति के तौर पर पुरुष समय-समय पर काम और अच्छी मज़दूरी की खोज में बाहर चले जाते हैं, जबकि स्त्रियों और बच्चों को अक्सर गाँव में बुज़ुर्ग माता-पिता के साथ छोड़ दिया जाता है।
प्रवासी मज़दूर आमतौर पर सूखाग्रस्त और कम उपजाऊ क्षेत्रों से आते हैं, और वर्ष के कुछ हिस्सों के लिए पंजाब-हरियाणा के खेतों में, उत्तर प्रदेश के ईंट भट्टों में, या नई दिल्ली-बंगलुरु जैसे शहरों के निर्माण स्थलों में काम करने जाते हैं।
जान ब्रेमन ने इन मज़दूरों को “घुमक्कड़ मज़दूर” (फूटलूज लेबर) कहा, पर इसका मतलब आज़ादी नहीं है। ब्रेमन (1985) के अध्ययन के अनुसार भूमिहीन मज़दूरों के पास बहुत से अधिकार नहीं होते: उन्हें अक्सर न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती।
धनी किसान अक्सर फसल काटने जैसे गहन कामों के लिए स्थानीय मज़दूरों की बजाय प्रवासी मज़दूरों को तरजीह देते हैं, क्योंकि प्रवासी मज़दूरों का शोषण आसान होता है और उन्हें कम मज़दूरी दी जा सकती है। इससे कुछ क्षेत्रों में, खासकर गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में, एक अजीब प्रतिमान बना है: वहाँ के स्थानीय भूमिहीन मज़दूर काम की तलाश में बाहर चले जाते हैं, जबकि बाहर से लाए गए प्रवासी मज़दूर उन्हीं के गाँव के खेतों पर काम करते हैं। प्रवासन तथा काम की सुरक्षा के अभाव से इन मज़दूरों के कार्य तथा जीवन की दशाएँ खराब हो जाती हैं।
निर्धन क्षेत्रों में, जहाँ परिवार के पुरुष सदस्य वर्ष का अधिकतर हिस्सा गाँव के बाहर काम करने में बिताते हैं, कृषि मूल रूप से महिलाओं का कार्य बन गई है। महिलाएँ भी कृषि मज़दूरों के मुख्य स्रोत के रूप में उभर रही हैं, जिसे पुस्तक “कृषि मज़दूरों का महिलाकरण” कहती है। इन महिलाओं को समान कार्य के लिए पुरुषों से कम मज़दूरी मिलती है, और अभी हाल तक सरकारी आँकड़ों में कमाने वालों तथा मज़दूरों के रूप में ये मुश्किल से नज़र आती थीं। पितृवंशीय नातेदारी व्यवस्था इन्हें असली खेत-मज़दूरी करने के बावजूद भूमि के स्वामित्व से दूर ही रखती है।
6 भूमंडलीकरण, उदारीकरण और ग्रामीण समाज
1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से भारत जिस उदारीकरण की नीति पर चल रहा है, उसका कृषि पर गहरा असर पड़ा है। विश्व व्यापार संगठन (डब्लू.टी.ओ.) की सदस्यता का मकसद ज़्यादा खुला अंतर्राष्ट्रीय व्यापार है, जिसके लिए भारतीय बाज़ारों को आयात के लिए खोलना पड़ा। इसी वजह से आयातित फल और खाद्य सामग्री, जो पहले आयात-प्रतिस्थापन नीतियों (यानी विदेश से मँगाने की बजाय देश में ही बनाने की नीति) के चलते उपलब्ध नहीं थीं, अब स्थानीय बाज़ारों में दिखने लगी हैं। हाल ही में गेहूँ आयात करने के भारत के फ़ैसले ने खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता की पुरानी नीति को उलट दिया, और स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों की उस कड़वी याद को ताज़ा कर दिया जब हरित क्रांति से पहले भारत को अमेरिका से खाद्यान्न आयात करना पड़ता था।
6.1 संविदा खेती
पंजाब और कर्नाटक जैसे क्षेत्रों में किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों (जैसे पेप्सी, कोक) से संविदा करके टमाटर और आलू जैसी फसलें उगाते हैं। संविदा खेती आजकल फूल (कट फ्लावर), अंगूर, अंजीर, अनार, कपास और तिलहन जैसी विशेष फसलों के लिए बहुत आम है।
✓ संविदा खेती क्या देती है
- पहले से तय कीमत पर बाज़ार की गारंटी
- बीज, निवेश और पूँजी, जो किसान अकेले नहीं जुटा पाता
✗ इसके समाजशास्त्रीय नुकसान
- किसान अपनी जीविका के लिए कंपनी पर निर्भर हो जाता है
- ज़मीन खाद्यान्न से हटकर निर्यात-केंद्रित फसलों (फूल, खीरा) की ओर मुड़ जाती है
- बहुत से लोगों को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देती है, और उनके अपने देशीय कृषि ज्ञान को निरर्थक बना देती है
- अक्सर बहुत अधिक खाद-कीटनाशक चाहिए, इसलिए बहुधा पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित नहीं
भूमंडलीकरण का एक और, ज़्यादा व्यापक पहलू है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बीज, कीटनाशक और खाद बेचने वाली कंपनियों के रूप में इस क्षेत्र में प्रवेश। सरकारी “कृषि विस्तार” एजेंट (जो पहले किसानों को नए बीज और तरीकों पर मुफ़्त सलाह देने जाते थे) गाँवों में अब धीरे-धीरे इन्हीं कंपनियों के एजेंटों से बदल गए हैं, जो किसानों के लिए जानकारी का लगभग एकमात्र स्रोत होते हुए भी अपना उत्पाद बेचने में सीधा फ़ायदा रखते हैं। इससे किसानों की महँगे निवेशों पर निर्भरता बढ़ी है, मुनाफ़ा घटा है, बहुत से किसान कर्ज़ में डूबे हैं, और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण संकट भी बढ़ा है।
1997-98 से देश के विभिन्न भागों में हो रही किसान आत्महत्याओं को पुस्तक “कृषिक समस्या” (कृषि संकट) से जोड़ती है: भूस्वामित्व के बदलते प्रतिमान, नगदी फसलों की ओर झुकाव, उदारीकरण की नीतियाँ जिन्होंने भारतीय कृषि को भूमंडलीय ताकतों के सामने ला खड़ा किया, महँगे निवेशों पर अत्यधिक निर्भरता, राज्य का कृषि विस्तार गतिविधियों से हटना (जिसकी जगह बहुराष्ट्रीय बीज-खाद कंपनियों ने ले ली), कृषि के लिए राज्य सहयोग में कमी, और कृषि कार्यों का वैयक्तीकरण। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2001 से 2006 के बीच आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र में 8,900 किसानों ने आत्महत्या की (सूरी, 2006ः1523)।
आत्महत्या करने वाले कई किसान सीमांत किसान थे, जो हरित क्रांति के तरीकों से अपनी उत्पादकता बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे, एक ऐसा रास्ता जिसमें असली जोखिम था: सब्सिडी घटने से उत्पादन लागत तेज़ी से बढ़ी, बाज़ार अस्थिर रहा, और बहुत से किसानों ने महँगे निवेशों के लिए भारी कर्ज़ लिया। पुस्तक के अनुसार ऋणग्रस्तता और कृषि उत्पादन की प्रक्रिया में आने वाले प्राकृतिक एवं सामाजिक संकट किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारक हैं। सरकार के कई कार्यक्रमों ने पूरे देश में किसानों के लिए एकीकृत सहायता के मार्ग खोले हैं:
| पुस्तक में नामित सरकारी योजना |
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| प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना |
| ग्राम उदय से भारत उदय अभियान |
| नेशनल अरबन मिशन (पुस्तक इसे स्वयं अपनी ग्रामीण-सहायक योजनाओं में सूचीबद्ध करती है) |
| सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन |
| किसान क्रेडिट कार्ड |
- क्रियाकलाप 4.1: आपके क्षेत्र का कृषि से जुड़ा कोई त्योहार और उसके रीति-रिवाज कृषि से कैसे जुड़े हैं; आपके शहर या कस्बे का कोई ऐसा भाग जो पहले गाँव या कृषि भूमि था।
- क्रियाकलाप 4.2: कृषिक या ग्रामीण वर्ग संरचना और जाति के बीच के संबंध, संसाधनों, मज़दूर एवं व्यवसाय की भिन्नता के आधार पर।
- क्रियाकलाप 4.3: भू-दान आंदोलन के बारे में जानें।
- क्रियाकलाप 4.4: समाचारपत्र, दूरदर्शन और रेडियो में ग्रामीण क्षेत्र कब-कब आते हैं, और किस तरह के मुद्दे बताए जाते हैं।
- ग्रामीण भारत में भूमि एक साथ उत्पादक साधन, संपत्ति का रूप, और जीवन-शैली, तीनों है
- कृषिक संरचना = भूस्वामित्व कैसे बँटा है; इसी से भूस्वामी, पट्टेदार और मज़दूर का वर्ग-क्रम बनता है
- जाति और वर्ग कुछ क्षेत्रों में मोटे तौर पर साथ चलते हैं, पर पूरी तरह नहीं: उदाहरण के लिए, कई जगहों पर ब्राह्मण बड़े भूस्वामी नहीं हैं
- एम.एन. श्रीनिवास की “प्रबल जाति” = संख्या में मज़बूत + आर्थिक-राजनीतिक रूप से शक्तिशाली
- भूमि सुधार (1950-70): ज़मींदारी उन्मूलन संभवतः सबसे प्रभावशाली; पट्टेदारी अधिनियम अधिकतर राज्यों में प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हुए; भूमि हदबंदी अधिनियम बेनामी हस्तांतरण से टाले गए
- हरित क्रांति (1960-70, फिर 1980 से) ने उत्पादन तो बहुत बढ़ाया, पर लाभ मुख्यतः मध्यम-बड़े किसानों को मिला और असमानता बढ़ी, इसे पुस्तक “विभेदीकरण” कहती है
- स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण बदलाव: कृषि मज़दूरों की बढ़ोतरी, नगद भुगतान, बंधुआ बंधन ढीले, मुक्त मज़दूरों का उदय (“संरक्षण से शोषण”, ब्रेमन)
- मज़दूरों का संचार: मौसमी पलायन और “घुमक्कड़ मज़दूर” (ब्रेमन): गतिशील पर स्वतंत्र नहीं; अधिक पलायन वाले क्षेत्रों में कृषि मज़दूरों का महिलाकरण
- उदारीकरण और डब्लू.टी.ओ. ने भारतीय कृषि को वैश्विक बाज़ार से जोड़ा; संविदा खेती सुरक्षा भी देती है और नई निर्भरता भी
- किसान आत्महत्याएँ (1997-98 से) कृषिक समस्या से जुड़ी हैं: 2001-2006 के बीच चार राज्यों में 8,900 दर्ज हुईं
- क्या मैं “कृषिक संरचना” और “प्रबल जाति” को अपने शब्दों में, एक-एक क्षेत्रीय उदाहरण के साथ परिभाषित कर सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं भूमि सुधार की तीन श्रेणियाँ बता सकता/सकती हूँ, और यह भी कि पुस्तक किसे संभवतः सबसे प्रभावशाली बताती है?
- क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाते हुए भी असमानता क्यों बढ़ाई?
- क्या मैं बता सकता/सकती हूँ “घुमक्कड़ मज़दूर” का मतलब क्या है, और यह आज़ादी क्यों नहीं है?
- क्या मैं संविदा खेती कैसे काम करती है, यह बता सकता/सकती हूँ, साथ ही एक फ़ायदा और एक नुकसान भी?