इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. पुस्तक के अपने शब्दों में ‘कृषिक संरचना’ को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: भूमि स्वामित्व के विभाजन अथवा संरचना के लिए अक्सर ‘कृषिक संरचना’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
प्र. ‘प्रबल जाति’ शब्द किसने दिया?
उत्तर: समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास ने ‘प्रबल जाति’ शब्द दिया और परिभाषित किया।
प्र. ‘रैयत’ का क्या अर्थ है, और यह किस भाषा का शब्द है?
उत्तर: ‘रैयत’ का अर्थ है कृषक, और यह तेलुगू भाषा का शब्द है।
प्र. 1950 से 1970 के बीच पारित भूमि सुधार कानूनों की तीन श्रेणियाँ बताइए।
उत्तर: (1) ज़मींदारी व्यवस्था का उन्मूलन, (2) पट्टेदारी उन्मूलन एवं नियमन अधिनियम, तथा (3) भूमि हदबंदी अधिनियम।
प्र. इस अध्याय में ‘बेरोज़गारी’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: बेरोज़गारी का अर्थ है कृषि मज़दूरों का रोज़ाना दिहाड़ी पर काम करना, पर वर्ष में बहुत से दिन उनके पास कोई काम न होना।
प्र. हरित क्रांति के उस परिणाम को पुस्तक क्या कहती है, जिसमें धनी और धनी हुए, तथा गरीब पूर्ववत रहे या और गरीब हुए?
उत्तर: पुस्तक इस परिणाम को ‘विभेदीकरण’ कहती है।
प्र. दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना किस वर्ष शुरू हुई?
उत्तर: यह योजना 2014 में शुरू हुई।
प्र. ‘बेनामी हस्तांतरण’ क्या है?
उत्तर: भूमि हदबंदी अधिनियम से बचने की युक्तियों को बेनामी हस्तांतरण कहा गया: भूस्वामियों ने ज़मीन रिश्तेदारों, अन्य लोगों या नौकरों के नाम कर दी (वास्तव में उनके नाम नहीं की), और कुछ अमीर किसानों ने अपनी पत्नी को वास्तव में तलाक दे दिया पर उसी के साथ रहते रहे।
प्र. पुस्तक के अनुसार, पट्टेदार अपनी फसल की आमदनी का कितना हिस्सा किराए के रूप में भूस्वामी को देता है?
उत्तर: साधारणतः फसल से होने वाली आमदनी का 50 से 75 प्रतिशत।
प्र. ‘मालिकाना जाति’ समूह से पुस्तक का क्या अभिप्राय है?
उत्तर: एक जाति समूह जिसके पास किसी क्षेत्र के सभी महत्वपूर्ण साधन होते हैं और सभी मज़दूरों पर जिसका नियंत्रण होता है, ताकि वे उसके लिए काम करें।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. पुस्तक की अपनी परिभाषा के अनुसार, ‘जीवननिर्वाही कृषक’ और ‘किसान/काश्तकार’ में अंतर बताइए।
उत्तर: जीवननिर्वाही कृषक मुख्यतः अपने परिवार के उपयोग के लिए उत्पादन करता है और बाज़ार के लिए अतिरिक्त उत्पादन नहीं कर पाता (जीवननिर्वाही कृषि)। किसान/काश्तकार परिवार की ज़रूरत से अधिक उत्पादन करता है और अतिरिक्त उपज बेचकर बाज़ार से जुड़ता है।
प्र. पुस्तक के अनुसार कई जगहों पर ब्राह्मण, सबसे ऊँची जाति होते हुए भी, कृषिक संरचना से बाहर क्यों हो जाते हैं?
उत्तर: क्योंकि कई जगहों पर सबसे ऊँची जाति ब्राह्मण बड़े भूस्वामी नहीं हैं, इसलिए भूस्वामित्व, जो कृषिक संरचना को परिभाषित करता है, उन पर लागू नहीं होता, हालाँकि वे ग्रामीण समाज के अंग हैं।
प्र. औपनिवेशिक काल की ज़मींदारी और रैयतवाड़ी व्यवस्थाओं में क्या अंतर था?
उत्तर: ज़मींदारी व्यवस्था में ब्रिटिश स्थानीय ज़मींदारों के ज़रिए शासन करते थे, जो किसानों से कर वसूल कर भारी टैक्स भी वसूलते थे, इससे ब्रिटिश काल के दौरान कृषि उत्पादन कम होने लगा। रैयतवाड़ी व्यवस्था में वास्तविक कृषक सीधे सरकार को कर देता था, बीच में कोई ज़मींदार नहीं होता था, इसलिए टैक्स का बोझ हल्का रहा और ये क्षेत्र अधिक उत्पादक बने।
प्र. पुस्तक भूमि हदबंदी अधिनियम को ‘दंतविहीन’ (बेअसर) क्यों कहती है?
उत्तर: क्योंकि इसमें बचाव के बहुत से रास्ते और युक्तियाँ थीं, जिनसे अधिकांश भूस्वामी अपनी अतिरिक्त भूमि राज्य को देने से बच निकले: ज़मीन रिश्तेदारों, अन्य लोगों या नौकरों के नाम कर दी गई, और कुछ स्थानों पर कुछ अमीर किसानों ने अपनी पत्नी को वास्तव में तलाक दे दिया (परंतु उसी के साथ रहते रहे), क्योंकि अधिनियम अविवाहित महिला को अलग हिस्सा देता था, पत्नियों को नहीं। इन्हें बेनामी हस्तांतरण भी कहा जाता था।
प्र. ‘कृषि मज़दूरों के महिलाकरण’ को समझाइए।
उत्तर: निर्धन क्षेत्रों में, जहाँ परिवार के पुरुष सदस्य वर्ष का अधिकतर हिस्सा गाँव के बाहर काम करने में बिताते हैं, कृषि मूल रूप से महिलाओं का कार्य बन गई है। महिलाएँ भी कृषि मज़दूरों के मुख्य स्रोत के रूप में उभर रही हैं; इसे ‘कृषि मज़दूरों का महिलाकरण’ कहते हैं। इन महिलाओं में असुरक्षा अधिक है, क्योंकि उन्हें समान कार्य के लिए पुरुषों से कम मज़दूरी मिलती है।
प्र. जान ब्रेमन के ‘घुमक्कड़ मज़दूर’ (फूटलूज लेबर) शब्द का अर्थ है कि प्रवासी मज़दूर स्वतंत्र नहीं होते, यह कैसे स्पष्ट होता है?
उत्तर: यह शब्द मज़दूरों के काम के लिए घूमने को बताता है, पर इसका अर्थ स्वतंत्रता नहीं है: ब्रेमन (1985) के अध्ययन में पाया गया कि भूमिहीन मज़दूरों के पास बहुत से अधिकार नहीं होते, उदाहरण के लिए उन्हें अक्सर न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं दी जाती।
प्र. हरित क्रांति के दूसरे चरण (1980 के दशक से) ने जीवन-यापन की असुरक्षा कैसे बढ़ाई?
उत्तर: दूसरे चरण में सूखे तथा आंशिक सिंचित क्षेत्रों के किसानों ने हरित क्रांति के तरीके अपनाए। बढ़ते व्यापारीकरण और बाज़ार पर निर्भरता ने (जैसे जहाँ कपास की खेती को प्रोत्साहित किया गया) असुरक्षा घटाने के बजाय बढ़ाई, क्योंकि जो किसान पहले अपने लिए खाद्यान्न उगाते थे, वे अब आमदनी के लिए बाज़ार पर निर्भर हो गए। साथ ही हरित क्रांति के अधिकांश क्षेत्रों में किसानों ने बहुफसली खेती (जिसमें जोखिम बँट जाता है) की जगह एकल फसली खेती अपनाई, जिससे फसल नष्ट होने पर उनके पास कोई सहारा नहीं बचा।
प्र. कृषि उपकरणों (टिलर, ट्रेक्टर, थ्रैशर) के आने से सेवा-जातियों पर क्या सामाजिक प्रभाव पड़ा?
उत्तर: पंजाब तथा मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इन उपकरणों के प्रयोग ने सेवा प्रदान करने वाली जातियों के उन समूहों को बेदखल कर दिया जो इन कृषि संबंधी क्रियाकलापों को करते थे, और इस बेदखली ने गाँव से शहर की ओर प्रवासन की गति को भी बढ़ा दिया।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. ग्रामीण भारत में जाति और वर्ग के संबंध को पुस्तक के अनुसार समझाइए।
उत्तर: ग्रामीण वर्ग संरचना मुख्यतः भूमि तक पहुँच से बनती है। सबसे अच्छी ज़मीन और साधन, और इसलिए शक्ति एवं विशेषाधिकार भी, उच्च एवं मध्य जातियों के पास रहे हैं, इसलिए प्रबल भूस्वामी जातियाँ आमतौर पर मध्यम या ऊँची जाति की होती हैं और जाति-वर्ग का दर्जा साथ चलता प्रतीत होता है। पर पुस्तक कहती है कि कुछ क्षेत्रों में यह मोटे तौर पर सही है, पूर्ण सत्य नहीं: कई जगहों पर सबसे ऊँची जाति ब्राह्मण बड़े भूस्वामी नहीं हैं, इसलिए वे कृषिक संरचना से बाहर हो जाते हैं, हालाँकि वे ग्रामीण समाज के अंग हैं। सीमांत किसान और भूमिहीन मुख्यतः निम्न जातियों (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग) से आते हैं, और पहले कई भागों में ‘अछूत’ अथवा दलित जातियाँ, जिन्हें भूमि रखने का अधिकार नहीं था, अधिकांशतः प्रबल जाति के भूस्वामियों के यहाँ कृषि मज़दूर रहती थीं।
प्र. 1950 से 1970 के बीच पारित भूमि सुधार कानूनों की तीन श्रेणियों का वर्णन कीजिए, और यह भी बताइए कि प्रत्येक कितनी प्रभावी रही।
उत्तर: (1) ज़मींदारी व्यवस्था का उन्मूलन: किसान और राज्य के बीच बिचौलियों की परत हटाई गई; पुस्तक इसे संभवतः सबसे प्रभावशाली सुधार बताती है, क्योंकि इसने ज़मींदारों की शक्ति कमज़ोर की और असली भूस्वामियों की स्थिति मज़बूत की। (2) पट्टेदारी उन्मूलन एवं नियमन अधिनियम: पट्टेदारी हटाने या किराया नियंत्रित करने की कोशिश थी; अधिकांश राज्यों में यह कभी प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं हुआ, सिवाय पश्चिम बंगाल और केरल के, जहाँ आमूल-चूल परिवर्तन आया और पट्टेदारों को भूमि अधिकार मिले। (3) भूमि हदबंदी अधिनियम: परिवार के लिए भूमि की ऊपरी सीमा तय की गई और अतिरिक्त भूमि भूमिहीन/SC-ST परिवारों को दी जानी थी, पर बेनामी हस्तांतरण जैसे रास्तों से यह व्यापक रूप से टाला गया, इसलिए पुस्तक इसे ‘दंतविहीन’ कहती है।
प्र. हरित क्रांति ने मुख्यतः मध्यम और बड़े किसानों को ही लाभ क्यों पहुँचाया, छोटे और सीमांत किसानों को नहीं?
उत्तर: नई तकनीक (अधिक उत्पादकता वाले/संकर बीज, कीटनाशक, खाद तथा अन्य निवेश) महँगी थी, और छोटे-सीमांत किसान बड़े किसानों जितना खर्च नहीं कर सकते थे। जिनके पास पहले से ज़मीन, पूँजी, तकनीक और जानकारी थी, केवल वही नए बीजों-खादों में निवेश कर उत्पादन बढ़ा सके और अधिक मुनाफ़ा कमा सके, इसीलिए पुस्तक कहती है कि हरित क्रांति के पहले चरण में नयी तकनीक के लागू होने से ग्रामीण समाज में असमानताएँ बढ़ने का आभास हुआ।
प्र. हरित क्रांति के ‘विभेदीकरण’ की प्रक्रिया को पुस्तक के अनुसार समझाइए।
उत्तर: पुस्तक के अनुसार हरित क्रांति की अंतिम परिणति ‘विभेदीकरण’ एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसमें धनी अधिक धनी हो गए, तथा कई निर्धन पूर्ववत रहे या अधिक गरीब हो गए। जिन किसानों के पास ज़मीन, पूँजी और तकनीक थी, उन्होंने उत्पादन और मुनाफ़ा बढ़ाया, जबकि कई मामलों में भूस्वामियों ने सीधे खेती करना लाभदायक होने पर अपने पट्टेदारों से ज़मीन वापस ले ली। कई क्षेत्रों में मज़दूरों की माँग बढ़ने से कृषि मज़दूरों का रोज़गार और दिहाड़ी बढ़े, पर कीमतों की बढ़ोतरी तथा खाद्यान्न के स्थान पर नगद भुगतान से अधिकतर ग्रामीण मज़दूरों की आर्थिक दशा खराब हो गई।
प्र. मज़दूरों के मौसमी संचार (सरकुलेशन) के प्रतिमान का वर्णन कीजिए, जैसा पुस्तक में बताया गया है।
उत्तर: जैसे-जैसे मज़दूर-भूस्वामी के बीच पारंपरिक संरक्षण के बंधन टूटे, और पंजाब जैसे संपन्न हरित क्रांति क्षेत्रों में मज़दूरों की माँग बढ़ी, हज़ारों मज़दूर अपने गाँव और उन संपन्न क्षेत्रों के बीच मौसमी रूप से आने-जाने लगे जहाँ ज़्यादा काम और मज़दूरी मिलती थी। प्रवासी मज़दूर मुख्यतः सूखाग्रस्त, कम उपजाऊ क्षेत्रों से आते हैं और पंजाब-हरियाणा के खेतों, उत्तर प्रदेश के ईंट भट्टों, या नई दिल्ली-बंगलुरु जैसे शहरों के निर्माण स्थलों में काम करने जाते हैं। पुरुष समय-समय पर काम की खोज में बाहर जाते हैं, जबकि स्त्रियों और बच्चों को अक्सर गाँव में बुज़ुर्ग माता-पिता के साथ छोड़ दिया जाता है। जान ब्रेमन इन्हें ‘घुमक्कड़ मज़दूर’ (फूटलूज लेबर) कहते हैं, परंतु इसका अर्थ स्वतंत्रता नहीं है; ब्रेमन के अध्ययन के अनुसार भूमिहीन मज़दूरों के पास बहुत से अधिकार नहीं होते, उदाहरण के लिए उन्हें अक्सर न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती।
प्र. संविदा खेती कैसे काम करती है, और इसके दो समाजशास्त्रीय नुकसान बताइए।
उत्तर: संविदा खेती में कंपनी उगाई जाने वाली फसल की पहचान करती है, बीज और अन्य निवेश (अक्सर कार्यशील पूँजी भी) उपलब्ध कराती है, और तय कीमत पर किसान की उपज खरीदने की गारंटी देती है, जिससे किसान को बाज़ार की सुरक्षा मिलती है। इसके समाजशास्त्रीय नुकसान: यह बहुत से लोगों को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देती है और उनके अपने देशीय कृषि ज्ञान को निरर्थक बना देती है, तथा यह कृषि भूमि को खाद्यान्न उत्पादन से हटाकर निर्यातोन्मुखी फसलों (जैसे फूल, खीरा) की ओर मोड़ सकती है। इसके अलावा इसमें अक्सर उच्च मात्रा में खाद-कीटनाशक चाहिए, इसलिए यह बहुधा पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित नहीं होती।
प्र. बॉक्स 4.3 के अनुसार, 1997-98 से किसान आत्महत्याओं को पुस्तक किन कारकों से जोड़ती है?
उत्तर: पुस्तक किसान आत्महत्याओं को ‘कृषिक समस्या’ से जोड़ती है: भूस्वामित्व के बदलते प्रतिमान; फसलों के बदलते प्रतिमान, खासकर नगदी फसल की ओर झुकाव; उदारीकरण की नीतियाँ जिन्होंने भारतीय कृषि को भूमंडलीय शक्तियों के सामने ला खड़ा किया; महँगे निवेशों पर अत्यधिक निर्भरता; राज्य का कृषि विस्तार गतिविधियों से हटना (जिसकी जगह बहुराष्ट्रीय बीज-खाद कंपनियों ने ले ली); कृषि के लिए राज्य सहयोग में कमी; तथा कृषि कार्यों का वैयक्तीकरण। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2001 से 2006 के बीच आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल तथा महाराष्ट्र में 8,900 किसानों ने आत्महत्या की।
प्र. (a) तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य गुजरात, तथा (b) केरल, इन क्षेत्रों में ग्रामीण रूपांतरण के अलग-अलग रास्तों की तुलना कीजिए।
उत्तर: तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य गुजरात में, प्रबल जातियों के संपन्न किसानों ने हरित क्रांति से हुए मुनाफ़े को अन्य व्यापारों में लगाया, जिससे नए क्षेत्रीय उद्यमी और राजनीतिक रूप से ताकतवर वर्ग उभरे, तथा शिक्षा के ज़रिए शहरी मध्यम वर्ग का विस्तार भी हुआ। इसके विपरीत केरल राजनीतिक गतिशीलता, पुनर्वितरण के साधनों तथा खाड़ी देशों से जुड़ाव के ज़रिए विकसित हुआ: वहाँ का ग्रामीण क्षेत्र खुदरा व्यापार-सेवाओं और प्रेषण पर निर्भर एक मिश्रित अर्थव्यवस्था बन गया, न कि मूल रूप से कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. स्वतंत्रता के बाद भारत में भूमि सुधारों के प्रभाव पर चर्चा कीजिए, और यह भी बताइए कि वे अपने उद्देश्यों में कितने सफल रहे।
उत्तर: स्वतंत्रता के बाद नेहरू और उनके नीति सलाहकारों ने नियोजित विकास को कृषिक सुधार से जोड़ा, कम पैदावार, आयातित अनाज पर निर्भरता तथा ग्रामीण जनसंख्या के एक बड़े भाग की गहन गरीबी के जवाब में। 1950 से 1970 के बीच राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भूमि सुधार कानून पारित किए गए, तीन श्रेणियों में: ज़मींदारी व्यवस्था का उन्मूलन (भू-सुधार कानूनों में संभवतः सबसे अधिक प्रभावशाली, क्योंकि इसने बिचौलियों की परत हटाई और ज़मींदारों की आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति कम की); पट्टेदारी उन्मूलन एवं नियमन अधिनियम (अधिकतर राज्यों में कभी भी प्रभावशाली तरीके से लागू नहीं हुए, सिवाय पश्चिम बंगाल और केरल के, जहाँ आमूल-चूल परिवर्तन आया); तथा भूमि हदबंदी अधिनियम (अतिरिक्त भूमि भूमिहीन तथा अनुसूचित जाति/जनजाति परिवारों में बाँटने के लिए थे, पर अधिकांश राज्यों में ये ‘दंतविहीन’ साबित हुए, क्योंकि बेनामी हस्तांतरण जैसे रास्तों से अधिकांश भूस्वामी बच निकले)। प्रगति हर राज्य में अलग-अलग रही। औपनिवेशिक काल से अब तक कृषिक संरचना में वास्तव में परिवर्तन आया, लेकिन अभी भी बहुत असमानता बची हुई है। पुस्तक का अपना निष्कर्ष है कि अधिकतर क्षेत्रों में भू-सुधार का ग्रामीण समाज तथा कृषिक संरचना पर एक सीमित प्रभाव ही रहा। पुस्तक यह भी कहती है कि भूमि सुधार न केवल कृषि उपज बढ़ाने के लिए, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों से गरीबी हटाने और सामाजिक न्याय दिलाने के लिए भी आवश्यक है।
प्र. हरित क्रांति के सामाजिक परिणामों को समझाइए, इसकी उपलब्धियों और इसकी लागतों में फ़र्क करते हुए।
उत्तर: हरित क्रांति कृषि आधुनिकीकरण का एक सरकारी कार्यक्रम था, जिसके लिए आर्थिक सहायता अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने दी, और जो अधिक उत्पादकता वाले/संकर बीजों, कीटनाशकों और खादों पर आधारित था। यह केवल समुचित सिंचाई वाले, मुख्यतः गेहूँ-चावल क्षेत्रों में लागू हुआ: पहली लहर में पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तटीय आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के कुछ हिस्से (1960-70)। इसकी उपलब्धि असली थी: कृषि उत्पादकता में अत्यधिक वृद्धि हुई और भारत दशकों बाद पहली बार खाद्यान्न उत्पादन में स्वावलंबी बना। पर इसकी सामाजिक लागत भी थी: मुख्यतः मध्यम-बड़े किसान, जो महँगे निवेश खरीद सकते थे, लाभान्वित हुए; कई मामलों में पट्टेदार-कृषक बेदखल हुए; और मशीनों ने सेवा प्रदान करने वाली जातियों के समूहों को बेदखल कर गाँव-शहर प्रवासन की गति बढ़ाई। इसकी अंतिम परिणति ‘विभेदीकरण’ थी: धनी अधिक धनी हुए, जबकि कई निर्धन पूर्ववत रहे या और गरीब हुए। कई क्षेत्रों में मज़दूरों का रोज़गार और दिहाड़ी बढ़े, पर कीमतों की बढ़ोतरी और नगद भुगतान से अधिकतर ग्रामीण मज़दूरों की आर्थिक दशा खराब हुई। 1980 के दशक से दूसरे चरण ने हरित क्रांति की तकनीक सूखे और आंशिक सिंचित क्षेत्रों तक फैलाई, जहाँ कपास जैसी बाज़ार-निर्भर खेती ने असुरक्षा बढ़ाई; एकल फसली खेती की ओर बदलाव हरित क्रांति के अधिकांश क्षेत्रों में हुआ, जिससे फसल नष्ट होने पर कोई सहारा नहीं बचता। पुस्तक के अनुसार क्षेत्रीय असमानताओं में वृद्धि भी इसकी एक नकारात्मक परिणति थी: जहाँ यह तकनीक लागू हुई वे क्षेत्र अधिक विकसित हुए और अन्य क्षेत्र पूर्ववत रहे; दास (1999) के अनुसार हरित क्रांति को देश के पूर्वी भागों की तुलना में पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों में अधिक लागू किया गया।
प्र. भूमंडलीकरण और उदारीकरण ने भारत के ग्रामीण समाज और कृषि को कैसे प्रभावित किया है, चर्चा कीजिए।
उत्तर: 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से भारत की उदारीकरण नीति, जो डब्लू.टी.ओ. सदस्यता से जुड़ी है, ने भारतीय कृषि बाज़ारों को आयात के लिए खोल दिया, और दशकों तक सरकारी सहयोग और संरक्षित बाज़ारों के बाद भारतीय किसान अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की प्रतिस्पर्धा के सामने आ गए; हाल में गेहूँ आयात के फ़ैसले ने आत्मनिर्भरता की पुरानी नीति को उलट दिया। संविदा खेती आम हो गई: कंपनी फसल की पहचान करती है, बीज-निवेश-अक्सर पूँजी देती है, और तय कीमत पर उपज खरीदने की गारंटी देती है। उदाहरण के लिए पंजाब और कर्नाटक जैसे कुछ क्षेत्रों में किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों (जैसे पेप्सी, कोक) से संविदा करके टमाटर और आलू उगाते हैं, और संविदा खेती अब फूल, अंगूर, अंजीर, अनार, कपास और तिलहन के लिए भी आम है। यह किसानों को वित्तीय सुरक्षा तो देती है, पर निर्भरता भी बढ़ाती है, बहुत से लोगों को उत्पादन प्रक्रिया से अलग करती है, उनके देशीय कृषि ज्ञान को निरर्थक बनाती है, ज़मीन को खाद्यान्न से हटाती है, तथा बहुधा पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित नहीं होती। भूमंडलीकरण का दूसरा पहलू है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सरकारी ‘कृषि विस्तार’ एजेंटों की जगह लेना, जिससे किसानों की महँगे निवेशों पर निर्भरता बढ़ी है। ये दबाव, बदलते भूस्वामित्व और फसल प्रतिमानों के साथ मिलकर, 1997-98 से हो रही किसान आत्महत्याओं (2001-2006 में चार राज्यों में 8,900) से जुड़े हैं। इस संकट के बीच सरकार ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ तथा ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ जैसे कार्यक्रम चलाती है, जिनसे पुस्तक के अनुसार किसानों के लिए एकीकृत सहायता के मार्ग खुले हैं।
प्र. स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण सामाजिक संबंधों में आए मुख्य परिवर्तनों को, पुस्तक के अपने उदाहरणों के साथ, बताइए।
उत्तर: पुस्तक स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण सामाजिक संबंधों में चार बदलाव गिनाती है: खेती गहन होने से कृषि मज़दूरों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी; भुगतान का अनाज से नगद में बदलना; भूस्वामी-मज़दूर के बीच पारंपरिक, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले बंधनों (बंधुआ मज़दूरी) का ढीला पड़ना; तथा ‘मुक्त’ दिहाड़ी मज़दूरों के एक वर्ग का उदय। जान ब्रेमन (1974) ने भूस्वामियों (आमतौर पर प्रबल जाति) और कृषि मज़दूरों (आमतौर पर निम्न जाति) के बदलते संबंध को ‘संरक्षण से शोषण’ की ओर एक बदलाव बताया, जिसे कुछ विद्वान पूँजीवादी कृषि की ओर एक कदम मानते हैं, क्योंकि पूँजीवादी उत्पादन में मज़दूरों को उत्पादन के साधनों से अलग किया जाता है और मुक्त दिहाड़ी मज़दूरी का प्रयोग होता है। यह प्रक्रिया औपनिवेशिक काल में ही शुरू हो गई थी, उदाहरण के लिए 19वीं सदी में महाराष्ट्र की कपास खेती विश्व बाज़ार से जुड़ी थी, पर स्वतंत्रता के बाद राज्य द्वारा सिंचाई, सड़क, बिजली तथा ऋण में निवेश (जैसे 2014 की दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना) से इसकी रफ़्तार तेज़ी से बढ़ी। तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा मध्य गुजरात जैसे कृषि-संपन्न क्षेत्रों में संपन्न किसान उद्यमी बने, जिससे नए क्षेत्रीय अभिजात वर्ग तथा शहरी मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रभावशाली भू-सुधारों, राजनीतिक गतिशीलता तथा पुनर्वितरण के साधनों के अभाव के कारण अपेक्षाकृत कम बदलाव आया, और केरल ने राजनीतिक गतिशीलता, पुनर्वितरण तथा खाड़ी देशों से प्रेषण के ज़रिए एक अलग रास्ता अपनाया।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक रामू के दादा का स्थानीय भूस्वामी के साथ किस तरह का मज़दूरी संबंध था?
उत्तर: एक पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला, लगभग बंधुआ मज़दूरी जैसा संबंध: उन्हें हर साल भूस्वामी के लिए निश्चित दिनों तक बिना पैसे के काम (बेगार जैसा श्रम) करना पड़ता था।
(ख) 2 अंक रामू के पिता कंपनी के साथ जिस व्यवस्था में जुड़े हैं, उसकी पहचान कीजिए, और परिवार के लिए इसका एक जोखिम बताइए।
उत्तर: यह संविदा खेती है: कंपनी बीज तथा अन्य निवेश देती है और तय कीमत पर उपज खरीदने की गारंटी देती है। एक जोखिम यह है कि परिवार अपनी जीविका के लिए कंपनी तथा बाज़ार पर निर्भर हो जाता है, इसलिए एक ही फसल (एकल-फसल खेती) की कीमत गिरने पर परिवार आर्थिक संकट में पड़ सकता है, ठीक जैसा कपास की कीमत गिरने पर हुआ।
(ग) 3 अंक अध्याय की अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए बताइए कि रामू की अपनी स्थिति ‘मज़दूरों के संचार’ तथा ‘कृषि मज़दूरों के महिलाकरण’ के बारे में क्या दिखाती है।
उत्तर: रामू का आठ महीने के लिए दूर शहर जाना पुस्तक द्वारा बताए गए मज़दूरों के संचार (सरकुलेशन) का उदाहरण है: सूखाग्रस्त, कम उपजाऊ क्षेत्रों के प्रवासी काम की तलाश में शहरों या अन्य क्षेत्रों में जाते हैं, जबकि गाँव में परिवार का खेत संभाला जाता है। चूँकि रामू ज़्यादातर समय बाहर रहते हैं, खेत की असली ज़िम्मेदारी उनकी पत्नी पर आ जाती है, जो पुस्तक के ‘कृषि मज़दूरों के महिलाकरण’ से मिलता-जुलता है, पर ठीक वही नहीं: पुस्तक के अनुसार पुरुषों के बाहर रहने वाले निर्धन क्षेत्रों में कृषि मूल रूप से महिलाओं का कार्य बन गई है और महिलाएँ कृषि मज़दूरों के मुख्य स्रोत के रूप में उभर रही हैं, जबकि यहाँ रामू की पत्नी अपने परिवार का खेत संभालती है, मज़दूरी नहीं करती। महिलाएँ असली कृषि श्रम करती हैं, फिर भी पितृवंशीय नातेदारी व्यवस्था के कारण आमतौर पर भूमि के स्वामित्व से बाहर रहती हैं, और अभी हाल तक सरकारी आँकड़ों में मुश्किल से नज़र आती थीं।