कक्षा 12 समाजशास्त्र पुस्तक 2 अध्याय 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन (पुस्तक 2, अध्याय 4) के NCERT प्रश्नों के पूरे हल, प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में: पहले इस अध्याय के अंत की प्रश्नावली के आठ प्रश्न (प्रश्न 1 गद्यांश पर आधारित है और उसके दो भाग हैं; बाकी चर्चा और परियोजना वाले प्रश्न हैं), फिर अध्याय के बीच में पूछे गए सभी क्रियाकलाप और प्रश्न।

1 प्रश्नावली

प्रश्न 1

प्र. दिए गए गद्यांश को पढ़ें तथा प्रश्‍नों का उत्तर दें: “अघनबीघा में मज़दूरों की कठिन कार्य-दशा, मालिकों की एक वर्ग के रूप में आर्थिक शक्‍ति तथा प्रबल जाति के सदस्य के रूप में अपरिमित शक्‍ति के संयुक्‍त प्रभाव का परिणाम थी। मालिकों की सामाजिक शक्‍ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष, राज्य के विभिन्न अंगों का अपने हितों के पक्ष में हस्तक्षेप करवा सकने की क्षमता थी। इस प्रकार प्रबल तथा निम्न वर्ग के मध्य खाई को चौड़ा करने में राजनीतिक कारकों का निर्णयात्मक योगदान रहा है।”
(i) मालिक राज्य की शक्‍ति को अपने हितों के लिए कैसे प्रयोग कर सके, इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
(ii) मज़दूरों की कार्य दशा कठिन क्यों थी?

उत्तर (i): जैसा अध्याय बताता है, प्रबल जाति केवल संख्या में मज़बूत ही नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी शक्‍तिशाली होती है, और दोनों के बल पर स्थानीय समाज पर प्रभुत्व रखती है। अघनबीघा के मालिकों के पास भूस्वामित्व (एक वर्ग के रूप में आर्थिक शक्‍ति) और स्थानीय प्रबल जाति की सदस्यता (सामाजिक-राजनीतिक शक्‍ति), दोनों थे। गद्यांश के अनुसार इसी दोहरे लाभ से मालिकों की सामाजिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे “राज्य के विभिन्न अंगों का अपने हितों के पक्ष में हस्तक्षेप करवा सकने की क्षमता” रखते थे। गद्यांश यह नहीं बताता कि ऐसा कैसे होता था; एक संभावित व्याख्या (गद्यांश में नहीं लिखी) यह है कि वर्ग और प्रबल जाति की इस दोहरी हैसियत से राज्य के अंगों को चलाने वालों पर भी उनका प्रभाव था। इस प्रकार राजनीतिक कारकों ने प्रबल तथा निम्न वर्ग के बीच की खाई को चौड़ा किया।

उत्तर (ii): गद्यांश स्वयं कारण बताता है: मज़दूरों की कठिन कार्य-दशा “मालिकों की एक वर्ग के रूप में आर्थिक शक्ति तथा प्रबल जाति के सदस्य के रूप में अपरिमित शक्ति के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी”। मज़दूर उस कृषिक संरचना में निम्न वर्ग से आते थे, जहाँ भूमि, और इसीलिए सत्ता व विशेषाधिकार, प्रबल भूस्वामी जाति के हाथों में केंद्रित था। जैसा अध्याय आम कृषि मज़दूरों के बारे में बताता है, उन्हें अक्सर सरकार द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी से भी कम मिलता था, उनका रोज़गार असुरक्षित था और वर्ष के बहुत से दिन उनके पास काम नहीं होता था (जिसे पुस्तक बेरोज़गारी कहती है); ऐसे क्षेत्रों में जहाँ “सामंतवादी” कृषिक संरचना जड़ जमाई हुई थी, वहाँ मज़दूरों के पास सौदेबाज़ी की शक्‍ति भी बहुत कम थी, और यहाँ तो मालिकों की राजनीतिक-राज्य शक्‍ति के इस्तेमाल ने स्थिति और भी कठिन बना दी।

प्रश्न 2

प्र. भूमिहीन कृषि मज़दूरों तथा प्रवासन करने वाले मज़दूरों के हितों की रक्षा करने के लिए आपके अनुसार सरकार ने क्या उपाय किए हैं, अथवा क्या किए जाने चाहिए?

उत्तर: अध्याय भारत सरकार के जिन कार्यक्रमों के नाम देता है (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, ग्राम उदय से भारत उदय अभियान, नेशनल अरबन मिशन, सतत कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन, किसान क्रेडिट कार्ड, और 2014 की दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना), वे किसानों और ग्रामीण अधिसंरचना के लिए हैं: पुस्तक के अनुसार “इन कार्यक्रमों ने पूरे देश में किसानों के लिए एकीकृत सहायता के मार्ग खोले हैं”। अध्याय भूमिहीन मज़दूरों या प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा के लिए किसी अलग सरकारी उपाय का नाम नहीं लेता, इसलिए आगे के उपाय आपके अपने सुझाव हैं। अध्याय स्वयं उनकी असुरक्षा का जो वर्णन करता है (न्यूनतम मज़दूरी से कम भुगतान, वर्ष के बहुत से दिन काम न मिलना, नियोक्ताओं द्वारा उन्हें आसान शोषण की वजह से तरजीह दिया जाना) यह दिखाता है कि आगे क्या ज़रूरी है: स्थानीय तथा प्रवासी दोनों तरह के मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी कानून का प्रभावी क्रियान्वयन, संचार (सरकुलेशन) करने वाले प्रवासी मज़दूरों के लिए पंजीकरण तथा कल्याण योजनाओं की सुविधा (क्योंकि जान ब्रेमन के अध्ययन के अनुसार उन्हें अक्सर न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती), तथा भूमि सुधार व पट्टेदारी कानूनों का, जो कागज़ पर पहले से मौजूद हैं, बेहतर क्रियान्वयन।

प्रश्न 3

प्र. कृषि मज़दूरों की स्थिति तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के अभाव के बीच सीधा संबंध है। इनमें से कुछ के नाम बताइए।

उत्तर: अध्याय इस तरह के कई संबंध बताता है: (1) कृषि मज़दूर मुख्यतः रोज़ाना दिहाड़ी पर काम करते हैं, अक्सर न्यूनतम मज़दूरी से भी कम पाते हैं, उनका रोज़गार असुरक्षित है और वर्ष के कई दिन बेरोज़गार रहते हैं, जिससे गतिशीलता के लिए निवेश करने लायक कुछ नहीं बचता। (2) अधिकांश सीमांत किसान और भूमिहीन लोग निम्न जातियों (आधिकारिक रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग) से आते हैं, इसलिए जाति और वर्ग का नुकसान एक-दूसरे को और मज़बूत करता है। (3) पारंपरिक, लगभग बंधुआ मज़दूरी संबंध (बेगार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी का बंधन) ऐतिहासिक रूप से मज़दूरों को एक ही प्रबल जाति के नियोक्ता से बाँधे रखते थे, जिससे उनकी सौदेबाज़ी शक्‍ति और विकल्प सीमित हो जाते थे। (4) हरित क्रांति ने उत्पादकता तो बढ़ाई, पर इसका लाभ मुख्यतः मध्यम-बड़े किसानों को मिला, जबकि भूमिहीन मज़दूरों को कई क्षेत्रों में रोज़गार और दिहाड़ी में कुछ बढ़ोतरी मिली, पर नगद भुगतान की ओर बदलाव तथा बढ़ती कीमतों से अधिकतर ग्रामीण मज़दूरों की आर्थिक दशा खराब हो गई। (5) जान ब्रेमन द्वारा “घुमक्कड़” कहे गए प्रवासी तथा संचार (सरकुलेशन) करने वाले मज़दूर, घूमते हुए भी न्यूनतम मज़दूरी सुरक्षा और स्थायी रोज़गार से बाहर ही रहते हैं, इसलिए जगह बदलने से आय या दर्जे में ऊर्ध्वगामी गतिशीलता नहीं आती।

प्रश्न 4

प्र. वे कौन से कारक हैं जिन्होंने कुछ समूहों के नव धनाढ्य, उद्यमी तथा प्रबल वर्ग के रूप में परिवर्तन को संभव किया है? क्या आप अपने राज्य में इस परिवर्तन के उदाहरण के बारे में सोच सकते हैं?

उत्तर: अध्याय ये सक्षम बनाने वाले कारक बताता है: ज़मीन, पूँजी, तकनीक तथा जानकारी तक पहुँच, जिसने कुछ किसानों को हरित क्रांति का लाभ उठाने तथा बाज़ार के लिए अतिरिक्‍त उत्पादन करने में सक्षम बनाया; स्थानीय प्रबल जाति का सदस्य होना, जिसके पास पहले से ही सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक शक्‍ति थी; खेती लाभदायक होने पर कृषि से हुए मुनाफ़े को अन्य व्यापारों में लगाना (जैसा तटीय आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा मध्य गुजरात में हुआ, रट्टन, 1995 के अनुसार); तथा फैलती हुई उच्च और व्यावसायिक शिक्षा, खासकर निजी कॉलेजों तक पहुँच, जिससे इन नए संपन्न परिवारों के बच्चे व्यावसायिक या सफ़ेदपोश (श्वेत वस्त्र) व्यवसाय अपना सके या व्यापार शुरू कर सके, जिससे परिवार की तरक्की एक पीढ़ी में मज़बूत हुई। (अपने राज्य का उदाहरण छात्र स्वयं खोजकर इसी प्रतिमान के अनुसार बताएँ: एक स्थानीय प्रबल भूस्वामी जाति, जिसने हरित क्रांति काल की कृषि आय को व्यापार, परिवहन, शिक्षा या राजनीति में लगाया।)

प्रश्न 5

प्र. हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं की फ़‍िल्में अक्सर ग्रामीण परिवेश में होती हैं। ग्रामीण भारत पर आधारित किसी फ़िल्म के बारे में सोचिए तथा उसमें दर्शाए गए कृषक समाज और संस्कृति का वर्णन कीजिए। उसमें दिखाए गए दृश्य कितने वास्तविक हैं? क्या आपने हाल में ग्रामीण क्षेत्र पर आधारित कोई फ़िल्म देखी है? यदि नहीं तो आप इसकी व्याख्या किस प्रकार करेंगे?

उत्तर: यह एक खुला, परियोजना-शैली प्रश्न है, जो अध्याय की अवधारणाओं (कृषिक संरचना, जाति-वर्ग का ओवरलैप, भूमि सुधार, पलायन, संविदा खेती) को छात्र द्वारा वास्तव में देखी गई किसी फ़िल्म से जोड़ता है। एक अच्छा उत्तर किसी खास फ़िल्म का नाम लेता है, बताता है कि वह भूस्वामित्व, जातीय पदानुक्रम या ग्रामीण-नगरीय पलायन के बारे में क्या दिखाती है, और अध्याय के अपने विवरण के आधार पर उसकी वास्तविकता जाँचता है, जैसे क्या वह जाति-वर्ग की तालमेल दिखाती है जो पुस्तक बताती है, या बेरोज़गारी (वर्ष के बहुत से दिन काम न मिलना) तथा प्रवासी मज़दूरी की कठोर सच्चाइयाँ जो पुस्तक में दर्ज हैं (जिन्हें सिनेमा अक्सर रोमांटिक बनाकर दिखाता है या छोड़ देता है)। यदि छात्र ने हाल की कोई ग्रामीण फ़िल्म न देखी हो, तो एक ठीक व्याख्या यह हो सकती है कि आज भारतीय शहर और उनके मुद्दे मीडिया का ध्यान ज़्यादा खींचते हैं, जबकि ग्रामीण भारत, आज भी बहुसंख्यक अनुभव होने (2011 जनगणना के अनुसार 69 प्रतिशत) के बावजूद, अपेक्षाकृत कम निरंतर मीडिया या सिनेमाई ध्यान पाता है।

प्रश्न 6

प्र. अपने पड़ोस में किसी निर्माण स्थल, ईंट के भट्टे या किसी अन्य स्थान पर जाएँ जहाँ आपको प्रवासी मज़दूरों के मिलने की संभावना हो, पता लगाइए कि वे मज़दूर कहाँ से आए हैं? उनके गाँव से उनकी भर्ती किस प्रकार की गई, उनका मुकादम कौन है? अगर वे ग्रामीण क्षेत्र से हैं तो गाँवों में उनके जीवन के बारे में पता लगाइए तथा उन्हें काम ढूँढ़ने के लिए प्रवासन करके बाहर क्यों जाना पड़ा?

उत्तर: यह एक क्षेत्र-परियोजना प्रश्न है। अध्याय को मार्गदर्शक मानकर: प्रवासी मज़दूर आमतौर पर सूखाग्रस्त, कम उपजाऊ क्षेत्रों से आते हैं, और मौसमी रूप से पंजाब-हरियाणा के खेतों, उत्तर प्रदेश के ईंट भट्टों, या नई दिल्ली-बंगलुरु जैसे शहरों के निर्माण स्थलों की ओर जाते हैं। पुस्तक “मुकादम” का अर्थ नहीं बताती; यही पता लगाना इस प्रश्न का काम है। सामान्य प्रयोग में (पुस्तक से बाहर) मुकादम वह श्रम ठेकेदार होता है जो मज़दूरों के समूहों को उनके गाँव से भर्ती करके कार्यस्थल तक लाता है; साक्षात्कार में इसकी पुष्टि करें। साक्षात्कार के उत्तर इन बिंदुओं के तहत दर्ज करने चाहिए: मूल गाँव, पलायन का कारण (आमतौर पर गाँव में अपर्याप्‍त या असुरक्षित आय, जैसे भूमिहीन या सीमांत किसान होना), घर से दूर रहने की अवधि, मज़दूरी और कार्य-दशाएँ, और क्या परिवार के सदस्य (खासकर महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग) गाँव में ही रह गए हैं, जो पुस्तक द्वारा बताए गए पुरुष-पलायन के प्रतिमान से मेल खाता है।

प्रश्न 7

प्र. अपने स्थानीय फल विक्रेता के पास जाएँ और उससे पूछें कि वे फल जो वह बेचता है, कहाँ से आते हैं, और उनका मूल्य क्या है? पता लगाइए कि भारत के बाहर से फलों के आयात (जैसेकि आस्ट्रेलिया से सेव) के बाद स्थानीय उत्पाद के मूल्यों का क्या हुआ। क्या कोई ऐसा आयातित फल है जो भारतीय फलों से सस्ता है?

उत्तर: यह अध्याय के भूमंडलीकरण एवं उदारीकरण संबंधी विवेचन से जुड़ा एक क्षेत्र-परियोजना प्रश्न है: 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से भारत की उदारीकरण नीति तथा डब्लू.टी.ओ. सदस्यता ने भारतीय बाज़ारों को आयात के लिए खोलना ज़रूरी बना दिया, इसीलिए आयातित फल तथा खाद्य सामग्री, जो पहले आयात-प्रतिस्थापन नीतियों के तहत उपलब्ध नहीं थे, अब स्थानीय दुकानों की अलमारियों में मिलते हैं, जैसा इसी प्रश्न में दिया आस्ट्रेलियाई सेवों का उदाहरण दिखाता है। छात्र के साक्षात्कार में यह दर्ज होना चाहिए: कौन-से फल स्थानीय हैं और कौन-से आयातित, उनके सापेक्ष मूल्य, तथा फल विक्रेता के अनुसार आयात शुरू होने के बाद स्थानीय फलों के मूल्यों का क्या हुआ। ग्राहकों पर इसका प्रभाव आपकी अपनी खोज से पता चलेगा; अध्याय किसानों पर पड़े प्रभाव बताता है: दशकों तक सरकारी सहयोग और संरक्षित बाज़ारों के बाद भारतीय किसान अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से प्रतिस्पर्धा के सामने आ गए हैं।

प्रश्न 8

प्र. ग्रामीण भारत में पर्यावरण स्थिति के विषय में जानकारी एकत्र कर एक रिपोर्ट लिखें। उदाहरण के लिए विषय: कीटनाशक, घटता जल स्तर, तटीय क्षेत्रों में झींगें की खेती का प्रभाव, भूमि का लवणीकरण तथा नहर सिंचित क्षेत्रों में पानी का जमाव, जैविक विविधता का ह्रास। संभावित स्रोत: स्टेट ऑफ इंडियन इन्वायरमेंट रिपोर्ट्स, रिपोर्ट्स फ्रॉम सेंटर फॉर साइंस एंड डेवलपमेंट तथा एक पत्रिका: डाउन टू अर्थ।

उत्तर: यह एक शोध-परियोजना प्रश्न है। अध्याय हरित क्रांति के “पर्यावरण के विपरीत प्रभावों” की ओर संकेत करता है, और संविदा खेती के बारे में कहता है कि खाद तथा कीटनाशक के उच्च मात्रा में प्रयोग के कारण वह “बहुधा पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित नहीं होती”। एक अच्छी रिपोर्ट सूचीबद्ध विषयों में से एक (जैसे कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल, या नहर-सिंचित क्षेत्रों में जल-जमाव और लवणीकरण) चुनकर उसे अध्याय के अपने विवरण से जोड़ती है: हरित क्रांति की रासायनिक निवेशों पर निर्भरता, तथा सरकारी कृषि विस्तार सहायता घटने के बाद बहुराष्ट्रीय खाद-कीटनाशक कंपनियों का इस क्षेत्र में प्रवेश, दोनों को अध्याय ग्रामीण भारत में बढ़ती लागत, किसानों के कर्ज़ तथा पर्यावरणीय संकट से जोड़ता है।

2 पाठगत क्रियाकलाप और प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)

अध्याय अपने शुरुआती पृष्ठों में एक प्रश्न और चार क्रियाकलाप-बॉक्सों में प्रश्न भी पूछता है। ये यहाँ उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में पुस्तक इन्हें छापती है, आदर्श उत्तरों के साथ। जहाँ क्रियाकलाप कहता है कि जानकारी प्राप्त करें या देखें, वहाँ उत्तर बताता है कि एक अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए; इसे अपनी खोज के साथ इस्तेमाल करें।

शुरुआती पृष्ठ

प्र. कुछ अन्य कृषि संबंधी त्योहारों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर: पुस्तक के उदाहरणों (तमिलनाडु में पोंगल, असम में बीहू, पंजाब में बैसाखी, कर्नाटक में उगाड़ी) के अलावा अन्य फसल-त्योहार हैं: केरल में ओणम, उत्तर और पश्चिम भारत में मकर संक्रांति और लोहड़ी, ओडिशा में नुआखाई और पश्चिम बंगाल में नबान्न, तथा मेघालय के गारो समुदाय का वांगला (ये उदाहरण पुस्तक से बाहर के हैं)। पुस्तक में नामित त्योहारों की तरह ये भी मुख्य फसल कटने का उत्सव मनाते हैं और नए कृषि मौसम की शुरुआत की घोषणा करते हैं। इससे पुस्तक की यह बात सिद्ध होती है कि ग्रामीण भारत की संस्कृति कृषि से बहुत निकटता से जुड़ी है।

क्रियाकलाप 4.1

प्र. आपके क्षेत्र में मनाए जाने वाले किसी ऐसे महत्वपूर्ण त्योहार के बारे में सोचिए जिसका संबंध फसलों या कृषि जीवन से है। इस त्योहार में शामिल विभिन्न रीति-रिवाजों का क्या अभिप्राय है, और वे कृषि के साथ कैसे जुड़े हैं?

उत्तर: उदाहरण के लिए तमिलनाडु का पोंगल लें। यह नई धान की फसल कटने पर मनाया जाता है। नई फसल के चावल को दूध और गुड़ के साथ नए बर्तन में तब तक उबाला जाता है जब तक वह उफन न जाए, जो समृद्धि का प्रतीक है; फसल को पकाने वाले सूर्य को धन्यवाद दिया जाता है; और अगले दिन हल खींचने और फसल ढोने वाले पशुओं को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा की जाती है। हर रीति उन शक्तियों (सूर्य, वर्षा, पशु, भूमि) के प्रति आभार है जिन पर खेती निर्भर है, और एक कृषि-चक्र के अंत तथा दूसरे की शुरुआत का संकेत है। बीहू, बैसाखी, ओणम या लोहड़ी जैसे किसी भी त्योहार को इसी तरह समझा जा सकता है: उसका समय फसल-चक्र से तय होता है और उसकी रीतियाँ खेती की ज़रूरतों का सम्मान करती हैं।

प्र. भारत में बहुत से ऐसे कस्बे और शहर बढ़ रहे हैं जिनके चारों ओर गाँव हैं। क्या आप किसी ऐसे शहर या कस्बे के बारे में बता सकते हैं जो पहले गाँव था या ऐसा क्षेत्र जो पहले कृषि भूमि था? इस स्थान के विकसित होने के बारे में आप क्या सोचते हैं? और उन लोगों का क्या हुआ जिनकी जीविका इस भूमि से चलती थी?

उत्तर: लगभग हर भारतीय शहर में ऐसे इलाके हैं; उनके नाम अक्सर आज भी “-गाँव”, “-पुर” या “-खेड़ा” पर ख़त्म होते हैं, और कुछ में आज भी पुराना गाँव (“शहरी गाँव”) नई कॉलोनियों से घिरा दिखता है। यह विकास आमतौर पर इसलिए होता है कि शहर को घर, सड़क, उद्योग और दफ़्तरों के लिए ज़मीन चाहिए: खेती की ज़मीन निजी बिल्डर खरीद लेते हैं या सरकार अधिग्रहित कर लेती है, और गाँव नगर-निगम क्षेत्र में शामिल हो जाता है। ज़मीन के मालिक परिवारों को ज़मीन बेचने या किराये के कमरे बनाने से लाभ हो सकता है, और कुछ दुकान या परिवहन का काम शुरू कर देते हैं। पर जो लोग ज़मीन के मालिक हुए बिना उस पर काम करते थे, जैसे पट्टेदार, कृषि मज़दूर और सेवा-जातियाँ, उनकी जीविका छिन जाती है, और वे अक्सर शहर में निर्माण-कार्य, घरेलू काम या फेरी जैसे असुरक्षित कामों में धकेल दिए जाते हैं। यह पुस्तक की उस बात से जुड़ता है कि ग्रामीण और नगरीय अर्थव्यवस्थाएँ आपस में लगातार अधिक जुड़ती जा रही हैं।

क्रियाकलाप 4.2

प्र. सोचिए कि आपने जाति व्यवस्था के बारे में क्या सीखा। कृषिक या ग्रामीण वर्ग संरचना और जाति के मध्य पाए जाने वाले विभिन्न संबंधों को वर्गीकृत कीजिए। इसकी संसाधनों, मज़दूर एवं व्यवसाय की विभिन्नता के साथ विवेचना कीजिए।

उत्तर:

  • संसाधनों तक पहुँच: भूमि तक पहुँच ग्रामीण वर्ग संरचना को आकार देती है, और जाति तथा वर्ग के बीच मोटे तौर पर मेल है। प्रबल भूस्वामी समूह सामान्यतः मध्य और ऊँची जातियों के होते हैं (जैसे उत्तर प्रदेश के जाट और राजपूत, कर्नाटक के वोक्कालिगास और लिंगायत, आंध्र प्रदेश के कम्मास और रेड्डी, पंजाब के जाट सिख), जबकि अधिकांश सीमांत किसान और भूमिहीन अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़े वर्गों के होते हैं। यह मेल पूर्ण नहीं है: सबसे ऊँची जाति ब्राह्मण अक्सर बड़े भूस्वामी नहीं होते।
  • मज़दूर: भारत के कई भागों में पहले “अछूत” अथवा दलित जाति के लोगों को भूमि रखने का अधिकार नहीं था, और वे अधिकांशतः प्रबल जाति के भूस्वामियों के यहाँ कृषि मज़दूर रहते थे। ‘बेगार’ जैसी पद्धति में निम्न जाति के लोगों को वर्ष में कुछ निश्चित दिनों तक ज़मींदार के यहाँ मुफ़्त काम करना पड़ता था, और बहुत से गरीब कामगार पीढ़ियों से बँधुआ मज़दूर की तरह काम करते रहे।
  • व्यवसाय: जाति व्यवस्था में धोबी, कुम्हार और सुनार जैसी विशेषज्ञ और सेवा देने वाली जातियाँ थीं, जिनके व्यवसाय कृषि और ग्राम्य जीवन को सहारा देते थे; भूस्वामी जातियाँ खेती करती या करवाती थीं, जबकि निम्न जातियाँ खेतों में शारीरिक श्रम करती थीं। “मालिकाना जाति” के पास सभी महत्वपूर्ण साधन होते हैं और सभी मज़दूरों पर उसका नियंत्रण होता है।

इस तरह जाति ने मोटे तौर पर यह आकार दिया है कि ज़मीन का मालिक कौन होगा, उस पर काम कौन करेगा और कौन-सा व्यवसाय अपनाएगा, हालाँकि पुस्तक कहती है कि जाति और वर्ग के ये संबंध “हमेशा स्पष्टवादी नहीं होते”; जहाँ ये मेल खाते हैं, वहाँ जाति और वर्ग की असमानताएँ एक-दूसरे को मज़बूत करती हैं।

क्रियाकलाप 4.3

प्र. भू-दान आंदोलन के बारे में जानें।

उत्तर: पुस्तक इस आंदोलन का विवरण नहीं देती, केवल इसके बारे में जानने को कहती है, इसलिए नीचे की सारी जानकारी पुस्तक से बाहर की है। भू-दान (“भूमि का दान”) आंदोलन गांधीजी के अनुयायी आचार्य विनोबा भावे ने 1951 में तेलंगाना क्षेत्र के पोचमपल्ली गाँव से शुरू किया, जहाँ एक भूस्वामी ने भूमिहीन दलित परिवारों के लिए ज़मीन देने की पेशकश की। विनोबा गाँव-गाँव पैदल घूमकर भूस्वामियों से अपनी ज़मीन का एक हिस्सा स्वेच्छा से दान करने को कहते थे, ताकि उसे भूमिहीनों में बाँटा जा सके। आगे चलकर यह ग्रामदान आंदोलन बना, जिसमें पूरे गाँव अपनी ज़मीन साझा करते थे। लाखों एकड़ भूमि दान में देने का वचन मिला, पर उसका बड़ा हिस्सा वास्तव में बाँटा नहीं जा सका, कुछ ज़मीन खराब या विवादित थी, और आंदोलन धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ गया। इन तथ्यों को किसी विश्वसनीय इतिहास पुस्तक से मिला लें और स्रोत लिखें।

क्रियाकलाप 4.4

प्र. समाचारपत्र ध्यानपूर्वक पढ़ें। दूरदर्शन अथवा रेडियो के समाचार सुनें। कब-कब ग्रामीण क्षेत्रों को सम्मिलित किया जाता है? किस तरह के मुद्दे आमतौर पर बताए जाते हैं?

उत्तर: अध्याय मीडिया में ग्रामीण खबरों के बारे में कुछ नहीं कहता और कोई आँकड़ा नहीं देता, इसलिए आपके एक सप्ताह के अवलोकन से जो दिखे वही लिखें। गिनिए कि कितनी ग्रामीण खबरें आईं और वे किन मुद्दों पर थीं। हो सकता है आपको ग्रामीण खबरें ज़्यादातर संकट के समय (सूखा, बाढ़, फसल का नष्ट होना, किसानों की आत्महत्या, किसान आंदोलन) दिखें, पर वही लिखें जो वास्तव में दिखे। फिर उनकी तुलना अध्याय के अपने मुद्दों से करें: कृषि मज़दूरी, प्रवासी मज़दूर, भूमि अधिकार और खेती में महिलाओं का श्रम। ध्यान रखें कि 2011 की जनगणना के अनुसार 69 प्रतिशत भारतीय गाँवों में रहते हैं।