ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन (पुस्तक 2, अध्याय 4) का त्वरित पुनरीक्षण सारांश: मुख्य परिभाषाएँ, नामित तथ्य और मुख्य संरचना। विस्तृत व्याख्या और उदाहरणों के लिए पूरे नोट्स अलग से पढ़ें।
| बोर्ड | भारांक |
|---|---|
| CBSE | 10 अंक (यूनिट 11, 2026-27) |
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1 कृषिक संरचना
| क्षेत्र | प्रबल भूस्वामी जातियाँ |
|---|---|
| उत्तर प्रदेश | जाट और राजपूत |
| कर्नाटक | वोक्कालिगास और लिंगायत |
| आंध्र प्रदेश | कम्मास और रेड्डी |
| पंजाब | जाट सिख |
2 भूमि सुधार (1950-1970)
ज़मींदारी उन्मूलन
संभवतः सबसे प्रभावशाली; बिचौलियों की परत हटाई।
पट्टेदारी अधिनियम
अधिकतर राज्यों में प्रभावशाली ढंग से लागू नहीं, सिवाय पश्चिम बंगाल और केरल के।
भूमि हदबंदी अधिनियम
अधिकांश राज्यों में “दंतविहीन”: बेनामी हस्तांतरण से टाला गया।
3 हरित क्रांति
अंतिम परिणति: “विभेदीकरण” (धनी अधिक धनी, कई निर्धन पूर्ववत रहे या और गरीब हुए)। साथ ही: पट्टेदार कृषकों और सेवा-जातियों की बेदखली; हरित क्रांति के अधिकांश क्षेत्रों में एकल फसली कृषि; क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि, क्योंकि यह पूर्वी भागों की तुलना में पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों में अधिक लागू हुई (दास, 1999)। इसके विपरीत भू-सुधार का प्रभाव सीमित ही रहा।
4 स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण परिवर्तन
- कृषि मज़दूरों का अधिक इस्तेमाल (खेती गहन होने से)
- अनाज की जगह नगद भुगतान
- पुश्तैनी (बंधुआ) बंधन ढीले
- “मुक्त” दिहाड़ी मज़दूरों का वर्ग
जान ब्रेमन: “संरक्षण से शोषण” (1974)। दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना: 2014।
कम बदलाव वाले क्षेत्र: पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार (प्रभावशाली भू-सुधारों, राजनीतिक गतिशीलता तथा पुनर्वितरण के साधनों का अभाव)। अलग रास्ता: केरल (राजनीतिक गतिशीलता, पुनर्वितरण और खाड़ी देशों से जुड़ाव से मिश्रित अर्थव्यवस्था)।
5 मज़दूरों का संचार और भूमंडलीकरण
“घुमक्कड़ मज़दूर” (ब्रेमन, 1985): गतिशील पर स्वतंत्र नहीं; कार्य और जीवन दशाएँ खराब। कृषि मज़दूरों का महिलाकरण। संविदा खेती (जैसे पेप्सी, कोक; टमाटर/आलू)। किसान आत्महत्याएँ 1997-98 से: 8,900 (2001-2006, चार राज्य)।
- भूमि = उत्पादक साधन + संपत्ति + जीवन-शैली, तीनों एक साथ
- जाति और वर्ग कुछ क्षेत्रों में मोटे तौर पर साथ चलते हैं, पूरी तरह नहीं: कई जगहों पर ब्राह्मण बड़े भूस्वामी नहीं हैं
- तीन भूमि सुधारों में ज़मींदारी उन्मूलन संभवतः सबसे प्रभावशाली रहा
- हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया पर असमानता भी बढ़ाई (“विभेदीकरण”)
- “घुमक्कड़ मज़दूर” गतिशील है, स्वतंत्र नहीं
- संविदा खेती: सुरक्षा और निर्भरता, दोनों साथ-साथ