नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
संविधान एवं सामाजिक परिवर्तन (पुस्तक 2, अध्याय 3) की NCERT प्रश्नावली के संपूर्ण हल, पुस्तक के अपने शब्दों में। पाठ के बीच का क्रियाकलाप 3.1 अंत में हल किया गया है।
प्रश्न. क्या आपने बाल मज़दूर और मज़दूर किसान संगठन के बारे में सुना है? यदि नहीं तो पता कीजिए और उनके बारे में 200 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर: यह एक शोध-आधारित खुला प्रश्न है, इसलिए उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं, पर एक अच्छे लेख में दोनों संगठनों को स्पष्ट रूप से शामिल करना चाहिए। बाल मज़दूरी भारत में एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जहाँ आर्थिक तंगी के कारण बहुत से बच्चों को स्कूल छोड़कर काम करना पड़ता है; इसे रोकने के लिए बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम जैसे क़ानून और अनेक गैर-सरकारी संगठन बच्चों को शिक्षा व सुरक्षित बचपन दिलाने के लिए काम करते हैं। मज़दूर किसान शक्ति संगठन (अक्सर छोटे रूप में इसी तरह लिखा जाता है) मज़दूरों और किसानों का एक ज़मीनी संगठन है, जो 1990 के दशक में राजस्थान में सूचना के अधिकार आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए जाना जाता है: इसने जन सुनवाइयाँ आयोजित कीं, जहाँ ग्रामीण खुले रूप से स्थानीय अधिकारियों से पूछ सकते थे कि पंचायत का धन वास्तव में कैसे खर्च हुआ, ठीक उसी ‘धन आवंटन की जाँच के अधिकार’ का उपयोग करते हुए जिसे यह अध्याय पंचायत प्रशासन की अनिवार्य विशेषता बताता है। दोनों संगठन, आकार व सदस्यता में बहुत अलग होते हुए भी, इसी अध्याय की भावना में काम करते हैं: सामान्य रूप से सत्ता से बाहर रखे गए लोगों (बच्चे, कृषि मज़दूर) को स्थानीय शासन में सीधी, सूचित भागीदारी में लाना और उससे जवाबदेही माँगना।
ध्यान दें: उत्तर में बाल पंचायत पर भी कुछ पंक्तियाँ लिखना उपयोगी है: बाल पंचायतें बच्चों की अपनी ग्राम-स्तरीय सभाएँ होती हैं, जो बड़ों की पंचायत के ढाँचे पर बनी होती हैं। इनमें बच्चे स्वयं स्कूल में उपस्थिति, बाल मज़दूरी, साफ़-सफ़ाई और खेलने की सुरक्षित जगह जैसे अपने मुद्दों पर चर्चा करते हैं और उन्हें गाँव के बड़ों व स्थानीय संस्थाओं तक पहुँचाते हैं। ये प्रायः बाल अधिकारों पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों की मदद से बनती हैं, और बच्चों को लोकतांत्रिक भागीदारी का अपना मंच देती हैं, जैसे ग्राम सभा बड़ों को देती है।
प्रश्न. ग्रामीणों की आवाज़ को सामने लाने में 73वाँ संविधान-संशोधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। चर्चा कीजिए।
उत्तर: 1992 से पहले पंचायतों को कोई संवैधानिक प्रस्थिति नहीं थी: मूल संविधान में इनकी चर्चा तक नहीं थी, और परंपरागत जातीय पंचायतें अक्सर पूरे गाँव की बजाय प्रभुत्वशाली समूहों का ही प्रतिनिधित्व करती थीं। 73वें संविधान संशोधन ने इसे मौलिक रूप से बदल दिया। इसने पंचायती राज संस्थाओं को असली संवैधानिक प्रस्थिति दी, स्थानीय स्वशासन निकायों का हर पाँच साल में चुना जाना अनिवार्य किया, और महत्वपूर्ण रूप से, स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण इन्हीं निर्वाचित निकायों को दिया। इसने ग्राम सभा, यानी पूरे गाँव के नागरिकों का समूह, को आधार मानकर एक त्रिस्तरीय पिरामिड संरचना बनाई, जो “लोकतंत्र की इकाई” है और स्थानीय सरकार का चुनाव करके उसे विशेष उत्तरदायित्व सौंपती है। इसे बीस लाख से अधिक जनसंख्या वाले सभी राज्यों में लागू किया गया, और पूरे ज़िले के लिए योजनाएँ बनाने हेतु ज़िला योजना समिति गठित की गई। इसने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित कीं, और 74वें संशोधन के साथ मिलकर स्थानीय निकायों की कुल सीटों का एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित किया, जिसमें से 17 प्रतिशत अनुसूचित जाति/जनजाति महिलाओं के लिए था। इसका परिणाम तुरंत और ठोस था: केवल 1993-94 के चुनावों में 8,00,000 महिलाएँ एक साथ राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ीं, और उन्हें पहली बार असली निर्णय लेने की शक्ति मिली। पंचायतों को अपने कार्यालय के बाहर धन के उपयोग का ब्यौरा देने वाला बोर्ड लगाना भी अनिवार्य किया गया, जिससे ग्रामीणों को स्थानीय शासन पर एक असली, रोज़मर्रा का “सूचना का अधिकार” मिला। इन सब बातों को मिलाकर देखें तो गाँवों को असली आवाज़ देने में 73वें संशोधन को अत्यंत महत्वपूर्ण कहना बिल्कुल सही है।
प्रश्न. एक निबंध लिखकर उदाहरण देते हुए उन तरीकों को बताइए जिनसे भारतीय संविधान ने साधारण जनता के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाए हैं और उनकी समस्याओं का अनुभव किया है।
उत्तर: यह अध्याय बताता है कि संविधान कोई दूर की क़ानूनी किताब नहीं, बल्कि एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसका अर्थ न्यायालय और सामाजिक आंदोलन सक्रिय रूप से बढ़ाते रहते हैं ताकि यह असली लोगों की सेवा कर सके, क्योंकि यह सामाजिक न्याय के आधारभूत मानदंडों पर टिका है। मौलिक अधिकारों के स्तर पर, उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार) को जीवनयापन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और गरिमा तक बढ़ाया, “एक पशुमात्र के अस्तित्व से बेहतर”, जिससे प्रताड़ित/वंचित क़ैदियों, बंधुआ मज़दूरों, और प्राथमिक स्वास्थ्य/शिक्षा से वंचित लोगों को सीधा लाभ मिला। 1993 में सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19(क) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) में पढ़ा गया, जिससे आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का एक असली औज़ार मिला। समान कार्य के लिए समान वेतन के निदेशक तत्त्व को अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार में पढ़ा गया, जिससे बहुत से बागान व कृषि श्रमिकों को राहत मिली। ज़मीनी स्तर पर, 73वें संशोधन ने लोकतंत्र के प्रति संविधान की अमूर्त प्रतिबद्धता को गाँव-स्तर की ठोस संस्थाओं में बदल दिया: निर्वाचित ग्राम सभाएँ और पंचायतें, महिलाओं व अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित सीटें, और पंचायत के धन के उपयोग का अनिवार्य सार्वजनिक प्रदर्शन, यानी संविधान की पारदर्शिता की गारंटी एक आम ग्रामीण के अपने सूचना बोर्ड तक पहुँच जाती है। न्याय पंचायतें विवाद निपटान, दहेज उत्पीड़न व महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा के मामलों सहित, लोगों के घर के क़रीब लाती हैं, ये जुर्माना लगा सकती हैं (हालाँकि सज़ा नहीं) और अक्सर पक्षों में समझौता कराने में सफल रहती हैं। यहाँ तक कि किसी ट्रेड यूनियन, किसान संघ या उद्योगपतियों के संगठन का हर फरवरी बजट से पहले वित्त मंत्रालय से मिलना भी संगठित होने और सुने जाने के संवैधानिक अधिकार का ही उपयोग है। कुल मिलाकर, अध्याय दिखाता है कि संविधान एक स्थिर नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि एक जीवंत ढाँचा है जिसका रोज़मर्रा के जीवन तक पहुँचना निरंतर व्याख्या, संशोधन और आम नागरिकों व संस्थाओं के सक्रिय उपयोग पर निर्भर करता है।
प्रश्न. लोकतंत्र में राजनैतिक दलों की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: राजनीतिक दल एक ऐसा संगठन है जो निर्वाचन प्रक्रिया द्वारा सरकार पर न्यायपूर्ण नियंत्रण स्थापित करने की ओर उन्मुख होता है; यह सत्ता पाकर किसी विशिष्ट कार्यक्रम को पूरा करने के उद्देश्य से बनाया जाता है, और समाज की एक विशेष समझ पर आधारित होता है कि समाज कैसा होना चाहिए। सरकार के लोकतांत्रिक प्रारूप में राजनीतिक दल मुख्य भूमिका निभाते हैं। इनकी महत्ता प्रतिनिधित्व में है: लोकतांत्रिक प्रणाली में समाज के विभिन्न समूहों के हित राजनीतिक दलों द्वारा ही प्रतिनिधित्व पाते हैं, जो उनका मुद्दा उठाते हैं और बल के बजाय चुनाव के ज़रिए सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। जब कुछ समूहों को लगता है कि मौजूदा दल उनका हित नहीं उठा रहे, तो वे या तो एक नया, वैकल्पिक दल बना सकते हैं, या स्वयं को दबाव समूह के रूप में संगठित कर सीधे सरकार से लॉबिंग कर सकते हैं। इस तरह राजनीतिक दल वह मुख्य औपचारिक माध्यम हैं जिनके ज़रिए समाज के विविध हित सरकार की नीति व कार्रवाई में बदलते हैं, जो इन्हें किसी भी लोकतंत्र के रोज़मर्रा के कामकाज के लिए केंद्रीय बनाता है।
प्रश्न. लोकतांत्रिक व्यवस्था में दबाव समूह की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर: दबाव समूह राजनीतिक क्षेत्र में कुछ निश्चित हितों को पूरा करने के लिए बनाए जाते हैं, और मुख्यतः वैधानिक अंगों के सदस्यों का समर्थन पाने के ज़रिए काम करते हैं, बिना चुनाव लड़े या सरकार बनाने की कोशिश किए। इनकी भूमिका समाज के किसी विशेष हिस्से, जैसे उद्योगपति, कर्मचारी, किसान या महिला संगठन, की चिंताओं को सामने रखना और सरकार को अपनी बात मानने के लिए राज़ी करना है। अध्याय का बजट वाला उदाहरण इस भूमिका को व्यवहार में दिखाता है: हर फरवरी में वित्त मंत्री द्वारा बजट पेश किए जाने से पहले, अखबारों में हर रोज़ यह खबर छपती है कि भारतीय उद्यमियों के संगठन, श्रमिक संघ, किसान और, हाल ही में, महिला संगठन वित्त मंत्रालय से मिले, हर एक अपने-अपने हित को आगे बढ़ाते हुए। हालाँकि, अध्याय एक महत्वपूर्ण आलोचना भी दर्ज करता है: कुछ समाजशास्त्री तर्क देते हैं कि सभी समूहों की सरकार तक पहुँच या क्षमता एक जैसी नहीं होती, इसलिए ‘दबाव समूह’ की अवधारणा, जो सभी को एक बराबर स्तर पर मान लेती है, यह भूल सकती है कि वर्ग, जाति या लिंग जैसे प्रबल सामाजिक समूहों के पास पहले से ही असली शक्ति है, और कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि प्रबल वर्ग सीधे राज्य को नियंत्रित करते हैं। फिर भी, पुस्तक स्पष्ट कहती है कि इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि दबाव समूह और सामाजिक आंदोलन एक कार्यशील लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहते हैं।
प्रश्न. दबाव समूह का गठन किस प्रकार होता है?
उत्तर: दबाव समूह आमतौर पर तब बनते हैं जब समाज का कोई विशेष हिस्सा, जैसे उद्योगपति, कर्मचारी, किसान या कोई अन्य हित समूह, सरकार के निर्णयों को अपने पक्ष में प्रभावित करना चाहता है, पर चुनाव लड़कर स्वयं सरकार बनाने की कोशिश नहीं करता। अध्याय के अपने उदाहरण दिखाते हैं कि यह प्रत्येक क्षेत्र में अलग-अलग तरह से होता है: उद्योगपति फेडरेशन ऑफ़ इंडियन कॉमर्स एंड चैंबर्स (FICCI) और एसोसिएशन ऑफ़ चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स (ASSOCHAM) जैसे संगठन बनाते हैं; कर्मचारी इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) या द सेंटर फ़ॉर इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) जैसे ट्रेड यूनियन बनाते हैं; और किसान शेतकरी संगठन जैसे कृषि संघ बनाते हैं, जबकि कृषि मज़दूरों के अपने अलग संघ होते हैं। ऐसे समूह विशेष रूप से राजनीतिक क्षेत्र में निश्चित हितों को पूरा करने के लिए बनाए जाते हैं, मुख्यतः वैधानिक अंगों के सदस्यों की लॉबिंग करके, चुनाव लड़कर नहीं। एक दबाव समूह किसी राजनीतिक दल के भीतर से भी उभर सकता है: जब किसी दल के भीतर या आसपास का कोई हित समूह महसूस करता है कि उसकी बात नहीं उठाई जा रही, तो वह सीधे सरकार से लॉबिंग करने के लिए अलग से एक दबाव समूह के रूप में संगठित हो सकता है।
प्रश्न. एक सप्ताह के समाचारपत्र-पत्रिकाओं को देखें। उनमें ऐसे उदाहरणों को लिखें जहाँ हितों का संघर्ष हो। विवादास्पद मुद्दों का पता लगाएँ। उन तरीकों का पता लगाइए जिनसे संबंधित समूह अपने हितों का फ़ायदा उठाते हैं। क्या यह किसी राजनीतिक दल का औपचारिक प्रतिनिधि मंडल है जो प्रधानमंत्री या किसी अन्य अधिकारी से मिलना चाहता है? क्या यह विरोध सड़कों पर किया जा रहा है? क्या यह विरोध लिखित रूप में अथवा समाचार पत्रों में सूचना के द्वारा किया जा रहा है? क्या यह सार्वजनिक बैठकों के द्वारा किया जा रहा है? ऐसे उदाहरणों का पता लगाइए। यह पता लगाइए कि क्या किसी राजनीतिक दल, व्यावसायिक संघ, गैर सरकारी संगठन अथवा किसी भी अन्य निकाय ने इस मुद्दे को उठाया है?
उत्तर: यह एक परियोजना-क्रियाकलाप है, इसलिए निष्कर्ष आपके अपने समाचारपत्र से आएँगे। इसे लिखने और प्रस्तुत करने का एक अच्छा तरीका:
- एक सप्ताह की तालिका बनाइए, जिसमें पाँच स्तंभ हों: तारीख, विवाद का मुद्दा (जैसे महँगाई, भूमि अधिग्रहण, मज़दूरी, कोई नया कानून), दोनों पक्षों के समूह, अपनाया गया तरीका, और मुद्दा उठाने वाला निकाय।
- तरीके का वर्गीकरण पुस्तक की अपनी सूची से करें: राजनीतिक दल का औपचारिक प्रतिनिधि मंडल, सड़क पर विरोध, समाचारपत्रों में लेखन या सूचना, या सार्वजनिक बैठकें।
- निकाय का वर्गीकरण करें: राजनीतिक दल, व्यावसायिक संघ (जैसे उद्योगपतियों का FICCI या ASSOCHAM, या कर्मचारियों का INTUC या CITU), गैर सरकारी संगठन, या कोई अन्य निकाय जैसे किसान संगठन।
- अध्याय के शब्दों में निष्कर्ष लिखें। देखें कि किन समूहों की बात जल्दी सुनी जाती है और किनकी नहीं। अध्याय बताता है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए सभी समूहों में समान क्षमता नहीं है, और हित समूह वैधानिक अंगों के सदस्यों का समर्थन पाकर काम करते हैं, जबकि राजनीतिक दल चुनाव के ज़रिए सरकार पर नियंत्रण चाहते हैं। फरवरी के अंत में बजट से पहले का सप्ताह इसके लिए अच्छा समय है, क्योंकि पुस्तक बताती है कि तब उद्यमियों के संगठन, श्रमिक संघ, किसान और महिला संगठन वित्त मंत्रालय से मिलते हैं।