Class 12 Sociology Book 2 Chapter 3 संविधान एवं सामाजिक परिवर्तन Important Questions with Answers

पाठ्यक्रम संबंधी सूचना

नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. पंचायती राज की परिभाषा पुस्तक के अपने शब्दों में दीजिए।

उत्तर: पंचायती राज का शाब्दिक अर्थ है ‘पाँच व्यक्तियों द्वारा शासन’; इसका उद्देश्य गाँव या ज़मीनी स्तर पर एक क्रियाशील, जीवंत लोकतंत्र सुनिश्चित करना है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार कानून का सार क्या है?

उत्तर: कानून का सार इसकी शक्ति है: कानून बल प्रयोग या अनुपालन कराने के साधन रखता है, जिसके पीछे राज्य की शक्ति होती है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार न्याय का सार क्या है?

उत्तर: न्याय का सार निष्पक्षता है।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. कलावती का विवरण और सुखीपुर-दुखीपुर का प्रशिक्षण, दोनों किस NGO ने दर्ज किए?

उत्तर: महिला समाख्या, एक गैर सरकारी संगठन जो ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करता है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. 73वें और 74वें संशोधन ने मिलकर स्थानीय निकायों की कुल सीटों का कितना प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित किया?

उत्तर: कुल सीटों का एक तिहाई (33 प्रतिशत)।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. न्याय पंचायत क्या है?

उत्तर: कुछ राज्यों में गठित एक ग्राम-स्तरीय निकाय, जिसे छोटे-मोटे दीवानी और आपराधिक मामले सुनने का अधिकार है; यह जुर्माना लगा सकती है पर सज़ा नहीं दे सकती।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. अध्याय में मेघालय की कौन-सी तीन प्रमुख आदिवासी जातियाँ नामित हैं?

उत्तर: गारो, खासी और जयंतिया।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 का अर्थ कैसे बढ़ाया, दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर: अनुच्छेद 21 के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की व्याख्या जीवनयापन और स्वास्थ्य (बंधुआ मज़दूरों की रिहाई व पुनर्वास के लिए इस्तेमाल) तक बढ़ाई गई है, और आवास व शिक्षा (प्राथमिक स्वास्थ्य व शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल) तक भी।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. ग्राम सभा और उसके द्वारा चुनी गई स्थानीय सरकार में क्या अंतर है?

उत्तर: ग्राम सभा गाँव के सभी नागरिकों का पूरा समूह है, यानी पूरी आम सभा। स्थानीय सरकार (निर्वाचित पंचायत निकाय) एक छोटा निर्वाचित निकाय है जिसे ग्राम सभा स्वयं चुनती है और विशेष उत्तरदायित्व सौंपती है, यानी ग्राम सभा मतदाता और मंच है, कार्यकारी निकाय स्वयं नहीं।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. 73वें संशोधन के अंतर्गत पंचायतों को कौन-सी वित्तीय शक्तियाँ दी गईं?

उत्तर: पंचायतों को शुल्क, कर, टोल व जुर्माना लगाने, इकट्ठा करने व उपयोग करने की शक्ति दी गई, और सरकारी उत्तरदायित्वों, खासकर वित्त, के उच्च स्तर से स्थानीय स्तर तक हस्तांतरण में सहयोग दिया गया।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. 1993-94 के स्थानीय निकाय चुनावों में क्या महत्वपूर्ण हुआ?

उत्तर: 73वें संशोधन के तुरंत बाद हुए इन चुनावों में 8,00,000 महिलाएँ एक साथ राजनीतिक प्रक्रियाओं में शामिल हुईं, जो महिलाओं को पहली बार असली निर्णय लेने की शक्ति देने की दिशा में एक बड़ा कदम था।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. आदिवासी भारत का एक बड़ा हिस्सा 73वें संशोधन के प्रावधान से बाहर क्यों है?

उत्तर: मेघालय जैसे कई आदिवासी क्षेत्रों में पहले से ही सुविकसित परंपरागत राजनीतिक संस्थाएँ थीं (जैसे खासियों की दरबार कुर), जो सैकड़ों साल से चल रही थीं; पुस्तक बताती है कि शायद उस समय की नीति बनाने वाले इन परंपरागत आदिवासी संस्थाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. राजनीतिक दल और दबाव समूह में अंतर बताइए।

उत्तर: राजनीतिक दल चुनाव लड़कर स्वयं सरकार पर वैध नियंत्रण पाने के लिए संगठित होता है, ताकि किसी विशिष्ट कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जा सके। दबाव समूह चुनाव नहीं लड़ता; यह अपने हितों को पूरा करवाने के लिए सीधे सरकार से लॉबिंग करता है, बिना खुद सरकार बनाने की कोशिश किए।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. दरबार कुर क्या है?

उत्तर: दरबार कुर मेघालय के खासियों के हर वंश की अपनी परंपरागत परिषद् है, जो वंश के मुखिया के निर्देशन में चलती है; यह खासियों की सैकड़ों साल पुरानी सुविकसित राजनीतिक संस्थाओं का हिस्सा है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. समाजशास्त्री टिपलुट नोंगबरी भूरिया समिति रिपोर्ट की क्या आलोचना करती हैं?

उत्तर: नोंगबरी कहती हैं कि परंपरागत आदिवासी संस्थाओं की रक्षा को लेकर समिति की चिंता तो प्रशंसनीय है, पर समिति स्थिति की जटिलता को पूरी तरह समझ नहीं पाई: आदिवासी समाजों में प्रबल समतावादी लोकाचार होने के बावजूद, स्तरीकरण के तत्त्व मौजूद हैं, और आदिवासी राजनीतिक संस्थाएँ महिलाओं के प्रति असहिष्णु भी हो सकती हैं।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. बॉक्स 3.1 में उच्चतम न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकारों को बढ़ाने के तीन उदाहरण, संबंधित अनुच्छेद संख्या सहित समझाइए।

उत्तर: (1) अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) की व्याख्या जीवनयापन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और गरिमा तक बढ़ाई गई है, ‘एक पशुमात्र के अस्तित्व से बेहतर’; इसका उपयोग क़ैदियों को राहत, बंधुआ मज़दूरों की मुक्ति व पुनर्वास, पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाली गतिविधियों के खिलाफ़ कार्रवाई, और प्राथमिक स्वास्थ्य/शिक्षा के लिए हुआ है। (2) 1993 में उच्चतम न्यायालय ने सूचना के अधिकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(क), का आनुषांगिक अंग माना। (3) उच्चतम न्यायालय ने समान कार्य के लिए समान वेतन के निदेशक सिद्धांत को अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार में पढ़ा, जिससे बहुत से बागान व कृषि श्रमिकों को राहत मिली।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. संविधान सभा में पंचायतों को शामिल करने की बहस का वर्णन कीजिए, जिसमें डॉ. अंबेडकर और गांधीजी दोनों के दृष्टिकोण शामिल हों।

उत्तर: संविधान पहली बार बनते समय पंचायतों की उसमें कोई चर्चा नहीं थी, और कई संविधान सभा सदस्यों ने इस पर अपना दुख, क्रोध व निराशा प्रकट की। डॉ. अंबेडकर ने अपने ग्रामीण अनुभव के आधार पर तर्क दिया कि स्थानीय कुलीन व उच्चजातीय लोग समाज में इतने घिरे हुए हैं कि स्थानीय स्वशासन का मतलब पददलित जनसमूह का निरंतर शोषण ही होगा, और उच्च जातियाँ इस वर्ग को और चुप करा देंगी। इसके विपरीत, गांधीजी को स्थानीय सरकार की अवधारणा बहुत प्रिय थी: वे हर गाँव को स्वयं में आत्मनिर्भर इकाई मानते थे जो अपने मामले स्वयं चलाए, इस आदर्श को उन्होंने ‘ग्राम स्वराज्य’ कहा और चाहते थे कि यह स्वतंत्रता के बाद भी चलता रहे। इसका समझौता दशकों बाद, 1992 में 73वें संशोधन के रूप में आया।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. बॉक्स 3.2 में दी गई पंचायती राज संस्थाओं की त्रिस्तरीय संरचना का वर्णन कीजिए।

उत्तर: संरचना एक पिरामिड की भाँति है। आधार पर ग्राम सभा है, लोकतंत्र की इकाई, जिसमें पूरे गाँव के सभी नागरिक शामिल होते हैं; यह स्थानीय सरकार का चुनाव करती है और उसे विशेष उत्तरदायित्व सौंपती है, साथ ही चर्चा व विकासात्मक कार्यों के लिए एक खुला मंच भी देती है। 73वें संशोधन ने यह त्रिस्तरीय प्रणाली बीस लाख से अधिक जनसंख्या वाले सभी राज्यों में लागू की, हर पाँच साल में चुनाव अनिवार्य किए, अनुसूचित जाति/जनजाति व 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कीं, और पूरे ज़िले के लिए योजनाएँ तैयार करने हेतु ज़िला योजना समिति गठित की।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. अध्याय के अनुसार पंचायतों की शक्तियाँ और सामाजिक कल्याण संबंधी उत्तरदायित्व क्या हैं?

उत्तर: शक्तियाँ: आर्थिक विकास के लिए योजनाएँ व कार्यक्रम बनाना; सामाजिक न्याय बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को बढ़ावा देना; शुल्क, कर, टोल व जुर्माना लगाना, इकट्ठा करना व उपयोग करना; सरकारी उत्तरदायित्वों, खासकर वित्त, के स्थानीय स्तर तक हस्तांतरण में सहयोग। सामाजिक कल्याण उत्तरदायित्व: श्मशान व कब्रिस्तानों का रखरखाव; जन्म-मृत्यु के आँकड़े रखना; मातृत्व व बाल कल्याण केंद्रों की स्थापना; पशुओं के तालाबों पर नियंत्रण; परिवार-नियोजन का प्रचार; कृषि-कार्यों का विकास, साथ ही सड़कों, भवनों, तालाबों व स्कूलों के निर्माण जैसे विकासात्मक कार्य, और IRDP व ICDS जैसी योजनाओं की निगरानी।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. कलावती के विवरण के आधार पर बताइए कि पंचायत सदस्यता एक महिला के लिए औपचारिक राजनीतिक शक्ति से भी आगे बढ़कर क्यों मायने रखती है।

उत्तर: दलित जाति की कलावती शुरू में चुनाव लड़ने को लेकर चिंतित थी। पंचायत सदस्य बनने के बाद उसका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान काफ़ी बढ़ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब ‘उसका अपना नाम है’: पंचायत सदस्य बनने से पहले वह केवल ‘रामू की माँ’ या ‘हीरालाल की पत्नी’ के नाम से जानी जाती थी, यानी उसकी पहचान पूरी तरह पुरुष रिश्तेदारों के ज़रिए ही थी। इससे पता चलता है कि पंचायत सदस्यता, खासकर एक दलित महिला के लिए, केवल एक औपचारिक वोट या सीट नहीं देती, बल्कि उसे एक स्वतंत्र पहचान व सामाजिक प्रतिष्ठा भी देती है, जो सशक्तीकरण का एक असली, भले ही कम दिखने वाला, रूप है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. कुछ समाजशास्त्री यह क्यों तर्क देते हैं कि ‘दबाव समूह’ की अवधारणा समाज में असली शक्ति को कम आँकती है?

उत्तर: पुस्तक कहती है कि यह स्पष्ट है कि सभी समूहों की सरकार तक पहुँच या उस पर दबाव बनाने की क्षमता एक जैसी नहीं होती। कुछ समाजशास्त्री तर्क देते हैं कि केवल ‘दबाव समूह’ के नज़रिए से राजनीति को समझना, वर्ग, जाति या लिंग जैसे प्रबल सामाजिक समूहों की समाज में पहले से मौजूद शक्ति को कम आँकता है। उनका मानना है कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि प्रबल वर्ग सीधे राज्य को नियंत्रित करते हैं, बजाय हर समूह को एक बराबर स्थिति वाला लॉबीकार मान लेने के। फिर भी पुस्तक स्पष्ट करती है कि इससे दबाव समूहों व सामाजिक आंदोलनों की भूमिका बेकार नहीं हो जाती, वे लोकतंत्र में महत्वपूर्ण बने रहते हैं।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. उत्तराखंड में वन पंचायतों की भूमिका और चिपको आंदोलन से उनके संबंध की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: उत्तराखंड में ज़्यादातर काम महिलाएँ करती हैं क्योंकि पुरुष अक्सर रक्षा सेवाओं में बाहर तैनात रहते हैं। ज़्यादातर ग्रामीण खाना पकाने के लिए लकड़ी पर निर्भर हैं, और पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की कटाई एक बड़ी समस्या है, जिससे महिलाओं को कभी-कभी लकड़ी व चारा इकट्ठा करने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है। इसे हल करने के लिए महिलाओं ने वन-पंचायतें बनाईं: सदस्य पौधशालाएँ तैयार करती हैं, पहाड़ी ढालों पर लगाने के लिए छोटे पौधों की देखभाल करती हैं, और आसपास के जंगलों की अवैध कटाई रोकने के लिए निगरानी भी करती हैं। मशहूर चिपको आंदोलन, जिसमें महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया, इसी क्षेत्र में शुरू हुआ था।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. “73वें संशोधन ने गाँव के लोगों को आवाज़ देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।” चर्चा कीजिए।

उत्तर: 1992 से पहले पंचायतों को कोई संवैधानिक प्रस्थिति नहीं थी: मूल संविधान में इनकी चर्चा तक नहीं थी, और मौजूद जातीय पंचायतें अक्सर पूरे गाँव की बजाय प्रभुत्वशाली समूहों का ही प्रतिनिधित्व करती थीं। 73वें संविधान संशोधन ने यह पूरी तरह बदल दिया। इसने पंचायती राज संस्थाओं को असली संवैधानिक प्रस्थिति दी, स्थानीय स्वशासन निकायों का हर पाँच साल में चुना जाना अनिवार्य किया, और सबसे महत्वपूर्ण, स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण निर्वाचित निकायों को दिया। इसने ग्राम सभा को आधार मानकर एक त्रिस्तरीय पिरामिड संरचना बनाई, ग्राम सभा को ‘लोकतंत्र की इकाई’ कहा गया। इसे बीस लाख से अधिक जनसंख्या वाले सभी राज्यों में लागू किया गया, और पूरे ज़िले के लिए योजना बनाने हेतु ज़िला योजना समिति गठित की गई। इसने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित कीं, और 74वें संशोधन के साथ मिलकर स्थानीय निकायों की कुल सीटों का एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित किया, जिसमें से 17 प्रतिशत अ.जा./अ.ज.जा. महिलाओं के लिए था। इसका असर तुरंत और ठोस दिखा: केवल 1993-94 के चुनावों में 8,00,000 महिलाएँ एक साथ राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ीं, और उन्हें पहली बार असली निर्णय लेने की शक्ति मिली। पंचायतों को अपने कार्यालय के बाहर धन के उपयोग का ब्यौरा देने वाला बोर्ड लगाना भी अनिवार्य किया गया, जिससे आम ग्रामीणों को स्थानीय शासन पर एक असली, रोज़मर्रा का ‘सूचना का अधिकार’ मिला। इन सब बातों को मिलाकर देखें तो 73वें संशोधन को गाँव के लोगों को असली आवाज़ देने वाला बताना पूरी तरह उचित है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. इस अध्याय के उदाहरणों का उपयोग करते हुए बताइए कि भारतीय संविधान आम लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को किन तरीक़ों से छूता है।

उत्तर: अध्याय का तर्क है कि संविधान कोई दूर की क़ानूनी किताब नहीं है, बल्कि इसका अर्थ न्यायालय और सामाजिक आंदोलन सक्रिय रूप से बढ़ाते रहते हैं ताकि यह असली लोगों की सेवा कर सके, क्योंकि यह सामाजिक न्याय के आधारभूत मानदंडों पर टिका है। मौलिक अधिकारों के स्तर पर, उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 को जीवनयापन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और गरिमा तक बढ़ाया है, जिससे क़ैदियों, बंधुआ मज़दूरों, और प्राथमिक स्वास्थ्य/शिक्षा से वंचित लोगों को सीधा लाभ मिला है। 1993 में सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19(क) में पढ़ा गया, जिससे आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का एक असली औज़ार मिला। समान कार्य के लिए समान वेतन के निदेशक तत्त्व को अनुच्छेद 14 में पढ़ा गया, जिससे बागान व कृषि श्रमिकों को राहत मिली। ज़मीनी स्तर पर, 73वें संशोधन ने लोकतंत्र के प्रति संविधान की अमूर्त प्रतिबद्धता को गाँव-स्तर की ठोस संस्थाओं में बदल दिया: निर्वाचित ग्राम सभाएँ और पंचायतें, महिलाओं व अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित सीटें, और पंचायत के धन के उपयोग का अनिवार्य सार्वजनिक प्रदर्शन, यानी संविधान की पारदर्शिता की गारंटी एक आम ग्रामीण के सूचना बोर्ड तक पहुँच जाती है। न्याय पंचायतें विवाद निपटान, दहेज उत्पीड़न व महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा के मामलों सहित, लोगों के घर के क़रीब लाती हैं, हालाँकि वे सज़ा नहीं दे सकतीं, केवल जुर्माना लगा सकती हैं और अक्सर पक्षों में समझौता कराने में सफल रहती हैं। यहाँ तक कि किसी ट्रेड यूनियन, किसान संघ या उद्योगपतियों के संगठन का बजट-पूर्व वित्त मंत्रालय से मिलना भी संगठित होने और सुने जाने के संवैधानिक अधिकार का ही उपयोग है। कुल मिलाकर, अध्याय दिखाता है कि संविधान एक स्थिर नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि एक जीवंत ढाँचा है जिसका रोज़मर्रा के जीवन तक पहुँचना निरंतर व्याख्या, संशोधन और आम नागरिकों व संस्थाओं के सक्रिय उपयोग पर निर्भर करता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. जाति, समुदाय और लिंग आधारित लंबे असमानता के इतिहास वाले समाज में लोकतंत्रीकरण कठिन क्यों है? अपने उत्तर में ग्राम सभा पर कब्ज़े की समस्या का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: पुस्तक इस बारे में सीधी है: जिस समाज में जाति, समुदाय और लिंग आधारित असमानता का लंबा इतिहास हो, वहाँ लोकतंत्रीकरण आसान नहीं है। 73वें संशोधन ने ग्राम सभा जैसी औपचारिक लोकतांत्रिक संरचनाएँ बना दीं, पर इससे नीचे की असमान सामाजिक संरचना अपने आप ख़त्म नहीं हुई। इसी असमान व अलोकतांत्रिक सामाजिक आधार के कारण, गाँव के कुछ विशेष समूह, समुदाय या जाति के लोग अक्सर गाँव की बैठकों व गतिविधियों में शामिल नहीं किए जाते, न ही उन्हें इसकी जानकारी दी जाती है। व्यवहार में, पुस्तक बताती है कि ग्राम सभा के सदस्य अक्सर अमीर ज़मींदारों के एक छोटे गुट द्वारा नियंत्रित होते हैं, जो आमतौर पर उच्च जाति या भूस्वामी किसानों से होते हैं। यही गुट विकासात्मक कार्यों व धन के आवंटन के असली फ़ैसले लेता है, जबकि बहुसंख्यक लोग केवल देखते रह जाते हैं, निर्णय में हिस्सा लेने वाले नहीं बन पाते। इससे एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है: कागज़ पर एक औपचारिक लोकतांत्रिक संस्था (सार्वभौमिक सदस्यता वाली ग्राम सभा) बना देने से असली निर्णय लेने की शक्ति अपने आप पुनर्वितरित नहीं होती, यह उसी समूह के पास रह सकती है जिसके पास संस्था बनने से पहले भी आर्थिक व सामाजिक प्रभुत्व था। इसलिए असली लोकतंत्रीकरण के लिए केवल संरचनात्मक सुधार नहीं, बल्कि इस कब्ज़े को सक्रिय रूप से तोड़ना ज़रूरी है, जो संविधान संशोधन पारित करने से कहीं धीमी और कठिन प्रक्रिया है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. पुस्तक के उदाहरणों का उपयोग करते हुए राजनीतिक दल, हित समूह और दबाव समूह में स्पष्ट अंतर कीजिए।

उत्तर: राजनीतिक दल एक ऐसा संगठन है जो निर्वाचन प्रक्रिया के ज़रिए सरकार पर वैध नियंत्रण पाने की ओर उन्मुख होता है; यह सत्ता पाकर किसी विशिष्ट कार्यक्रम को पूरा करने के उद्देश्य से बनाया जाता है, और समाज की एक विशेष समझ पर आधारित होता है कि समाज कैसा होना चाहिए। हित समूह राजनीतिक क्षेत्र में विशिष्ट हितों को पूरा करने के लिए संगठित होता है, मुख्यतः वैधानिक अंगों के सदस्यों की लॉबिंग करके, बिना खुद सरकार बनाने की कोशिश किए। दबाव समूह वह है जो हित समूह तब बन जाता है जब वह चुनाव लड़े बिना सीधे सरकार से अपनी बात मनवाने की कोशिश करता है: पुस्तक उद्योगपतियों के FICCI और ASSOCHAM, कर्मचारियों के INTUC और CITU, और किसानों के शेतकरी संगठन जैसे असली उदाहरण देती है, ये सभी हर फरवरी में बजट पेश होने से पहले वित्त मंत्रालय से मिलते हैं। जब कोई हित समूह महसूस करता है कि मौजूदा दल उसकी बात नहीं उठा रहे, तो वह या तो एक नया, वैकल्पिक दल बना सकता है (यानी सीधे दलीय राजनीति में उतर सकता है), या स्वयं को एक दबाव समूह के रूप में संगठित कर सकता है। कुछ समाजशास्त्री यह अलग आलोचना भी जोड़ते हैं कि इन सभी समूहों को लगभग बराबर खिलाड़ी मान लेना यह भूल जाता है कि वर्ग, जाति या लिंग जैसे प्रबल सामाजिक समूहों के पास पहले से ही कितनी ज़्यादा शक्ति होती है, जो इस पूरे ढाँचे की एक अलग पर जुड़ी हुई आलोचना है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
रामनगर गाँव की नई निर्वाचित ग्राम पंचायत में, 73वें और 74वें संशोधन के नियम के अनुसार, एक तिहाई सीटें महिलाओं के पास हैं, और इनमें से एक, सुशीला नाम की एक दलित महिला, अभी-अभी सरपंच चुनी गई है। पर व्यवहार में, पंचायत के विकास कोष को कैसे खर्च किया जाए, इसके ज़्यादातर बड़े फ़ैसले अभी भी प्रभुत्वशाली जाति के तीन बड़े ज़मींदार परिवारों द्वारा अनौपचारिक रूप से लिए जाते हैं, जो हर औपचारिक ग्राम सभा बैठक से पहले मिलकर तय कर लेते हैं कि बैठक में क्या ‘मंज़ूर’ किया जाएगा। जब सुशीला ने यह औपचारिक शिकायत उठाने की कोशिश की कि पास का एक जंगल बाहरी ठेकेदारों द्वारा अवैध रूप से काटा जा रहा है, तो एक ज़मींदार परिवार के सदस्य ने कहा कि यह ‘पंचायत का मामला नहीं है’, और शिकायत को एजेंडे से हटा दिया गया।

(क) 1 अंक किन संविधान संशोधनों ने सुशीला जैसी आरक्षित सीट को संभव बनाया?
उत्तर: 73वें और 74वें संविधान संशोधन, जिन्होंने मिलकर स्थानीय निकायों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं।

(ख) 2 अंक गद्यांश में बताई गई उस सामाजिक समस्या का नाम बताइए और संक्षेप में समझाइए, जिसमें असली निर्णय-प्रक्रिया औपचारिक ग्राम सभा प्रक्रिया को दरकिनार कर देती है।
उत्तर: यह ग्राम सभा पर कब्ज़े की समस्या है: पुस्तक ठीक इसी पैटर्न का वर्णन करती है, जहाँ ग्राम सभा के सदस्य अक्सर अमीर ज़मींदारों के एक छोटे गुट द्वारा नियंत्रित होते हैं, जो आमतौर पर उच्च जाति या भूस्वामी किसानों से होते हैं, और वे ही विकासात्मक कार्यों व धन के आवंटन के असली फ़ैसले लेते हैं, जबकि बाकी गाँव औपचारिक बैठक में केवल देखने वाला बनकर रह जाता है।

(ग) 4 अंक अध्याय में भारत के किसी अन्य हिस्से में एक ऐसी ज़मीनी संस्था का वर्णन है, जहाँ महिलाओं ने ठीक सुशीला जैसी ही समस्या (अवैध वनों की कटाई) पर स्वतंत्र, संगठित कार्रवाई की। इस संस्था का नाम बताइए और समझाइए कि वह कैसे काम करती है।
उत्तर: यह उत्तराखंड में महिलाओं द्वारा बनाई गई वन पंचायत है। वनों की कटाई की समस्या से जूझते हुए, और लकड़ी पर निर्भर होते हुए (साथ ही पुरुषों के अक्सर रक्षा सेवाओं में बाहर तैनात होने के कारण), वहाँ की महिलाओं ने अपनी खुद की वन-पंचायतें बनाईं: सदस्य पौधशालाएँ तैयार करती हैं और पहाड़ी ढालों पर लगाने के लिए छोटे पौधों की देखभाल करती हैं, और आसपास के जंगलों की अवैध कटाई रोकने के लिए निगरानी भी करती हैं। मशहूर चिपको आंदोलन, जिसमें महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया, इसी क्षेत्र में शुरू हुआ। सुशीला के मामले में जहाँ औपचारिक पंचायत ने वनों की कटाई की शिकायत को दबा दिया, वहाँ वन पंचायत मॉडल दिखाता है कि जब मुख्यधारा की पंचायत संरचना ऐसे मुद्दे पर काम नहीं करती, तो महिलाएँ इसी तरह के मुद्दे पर सीधे कार्रवाई के लिए अपनी अलग, समर्पित संस्था खड़ी कर सकती हैं।