इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. पुस्तक के अपने अर्थ में अलगाव को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: अलगाव (मार्क्स) वह स्थिति है जिसमें लोग अपने कार्य से प्रसन्न नहीं होते और उसे केवल जीवित रहने के लिए करते हैं; उनकी उत्तरजीविता भी इस बात पर निर्भर करती है कि मशीनें मानवीय श्रम के लिए कितना स्थान छोड़ती हैं।
प्र. 2018-19 में भारत के कितने प्रतिशत कामगार प्राथमिक क्षेत्र में थे?
उत्तर: 2018-19 में भारत के लगभग 43% कामगार प्राथमिक क्षेत्र (कृषि एवं खदान) में थे।
प्र. अध्याय में रोज़गार के अवसरों के दो तत्व कौन-से बताए गए हैं?
उत्तर: (i) किसी संगठन में रोज़गार, और (ii) स्व-रोज़गार।
प्र. बदली कामगार क्या है?
उत्तर: बदली कामगार वह है जो छुट्टी पर गए मज़दूर के स्थान पर काम करता है; बहुत से बदली कामगार एक ही कंपनी में बहुत लंबे समय से काम करने पर भी सबके समान स्थायी पद और सुरक्षा नहीं पाते।
प्र. अध्याय रोज़गार और स्व-रोज़गार बढ़ाने के लिए कौन-सी तीन सरकारी योजनाओं का नाम लेता है?
उत्तर: मुद्रा योजना, आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया।
प्र. 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर: ट्रेड यूनियन नेता डॉ. दत्ता सामंत ने 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक का नेतृत्व किया।
प्र. अध्याय में प्रयुक्त ‘विनिवेश’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: विनिवेश का अर्थ है सरकार का सार्वजनिक कंपनियों में अपना हिस्सा बेचना।
प्र. पुस्तक के अनुसार केवल कोयला खनन में भारत में कितने कामगार काम करते हैं?
उत्तर: केवल कोयले की खानों में ही 5.5 लाख कामगार काम करते हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. मार्क्स, वेबर और दुर्खाइम जैसे शास्त्रीय समाजशास्त्रियों ने औद्योगीकरण को किन बातों से जोड़ा?
उत्तर: उन्होंने उद्योग को नगरीकरण से, और ग्रामीण इलाकों में पाए जाने वाले आमने-सामने के संबंधों (जहाँ लोग अपने या जान-पहचान के भूस्वामी के खेतों में काम करते थे) की समाप्ति से जोड़ा, जिनकी जगह आधुनिक कारखानों और कार्यस्थलों के अनजान, व्यावसायिक संबंधों ने ले ली।
प्र. अध्याय में दी गई संगठित क्षेत्र की परिभाषा और भारत में असंगठित क्षेत्र का आकार बताइए।
उत्तर: संगठित क्षेत्र की एक परिभाषा के अनुसार, इसकी इकाई में 10 या अधिक लोग पूरे वर्ष रोज़गार में रहते हैं, और सरकारी तौर पर इनका पंजीकरण होना चाहिए ताकि कर्मचारियों को उपयुक्त वेतन या मज़दूरी, पेंशन और अन्य सुविधाएँ मिलना सुनिश्चित हो सके। भारत में 90% से अधिक कार्य, चाहे वह कृषि, उद्योग अथवा नौकरी हो, असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में आते हैं।
प्र. उदारीकरण के पुस्तक के अपने पारले-कोका कोला उदाहरण को दोनों आँकड़ों सहित बताइए।
उत्तर: कोका कोला ने पारले पेय को खरीदा। पारले की सालाना आमदनी 250 करोड़ रुपये थी, जबकि केवल कोका कोला का विज्ञापन बजट 400 करोड़ रुपये था, इतने बड़े विज्ञापन ने भारत में कोला के उपभोग को बढ़ाया और कई परंपरागत पेयों की जगह ले ली।
प्र. निजीकरण के बाद मॉडर्न फूड के साथ क्या हुआ?
उत्तर: मॉडर्न फूड, जिसे सरकार ने सस्ता स्वास्थ्यवर्धक खाना उपलब्ध कराने के लिए बनाया था, निजीकरण की जाने वाली पहली कंपनी बनी, और इसके 60% कर्मचारियों को पहले पाँच वर्षों में ही जबरन सेवामुक्त कर दिया गया।
प्र. कानपुर की कपड़ा मिलों में ‘मिस्त्री’ (रोज़गार दिलाने वाले) की भूमिका बताइए।
उत्तर: पहले बहुत से कामगार ठेकेदार या काम देने वालों से रोज़गार पाते थे; कानपुर कपड़ा मिल में रोज़गार दिलाने वाले को मिस्त्री बोलते थे, और वे खुद भी वहाँ काम करते थे। वे मज़दूरों के समान क्षेत्रों या समुदायों से आते थे, परंतु मालिक उन पर कृपालु होते थे, इसलिए वे सब कामगारों के मुखिया बन जाते थे; मिस्त्री कामगारों पर समुदाय संबंधी दबाव भी डालता था। आजकल काम दिलाने वाले का महत्त्व कम हो गया है।
प्र. अध्याय दिहाड़ी/निर्माण मज़दूरों की ठेकेदार व्यवस्था का वर्णन कैसे करता है?
उत्तर: ठेकेदार गाँव जाकर पूछता है कि क्या लोग काम चाहते हैं, और मज़दूर को यातायात का खर्च कवर करने वाला पैसा उधार देता है, इस उधार को अग्रिम दिहाड़ी माना जाता है, और जब तक उधार नहीं चुक जाता, मज़दूर बिना वेतन के काम करता है।
प्र. मशीनी गति वाले काम का अध्याय का मारुति उद्योग लिमिटेड उदाहरण बताइए।
उत्तर: मारुति उद्योग लिमिटेड में हर मिनट दो कारें तैयार होती हैं, मज़दूरों को पूरे दिन में केवल 45 मिनट का विश्राम मिलता है (दो साढ़े सात मिनट की चाय की छुट्टियाँ और आधे घंटे की एक भोजन छुट्टी), और अधिकतर मज़दूर 40 वर्ष की उम्र तक थककर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेते हैं।
प्र. हैरी ब्रेवरमैन का दक्षता-ह्रास तर्क क्या है?
उत्तर: प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैरी ब्रेवरमैन यह तर्क देते हैं कि वास्तव में मशीनों का प्रयोग कार्यकर्ताओं की दक्षता को कम करता है। उनका उदाहरण है कि पहले वास्तुकार नक्काशी में भी दक्ष थे, जबकि अब कंप्यूटर उनके बहुत से काम कर देता है।
प्र. अध्याय में दी गई परिभाषा के अनुसार हड़ताल और तालाबंदी में अंतर बताइए।
उत्तर: कभी-कभी काम की बुरी दशाओं के कारण कामगार हड़ताल कर देते हैं; हड़ताल में वे काम पर नहीं जाते। तालाबंदी की दशा में व्यवस्थापक मिल का दरवाज़ा बंद कर देते हैं और मज़दूरों को अंदर जाने से रोकते हैं।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. भारत के छोटे संगठित क्षेत्र के तीन सामाजिक निहितार्थ समझाइए, जैसा अध्याय में दिया गया है।
उत्तर: पहला, बहुत कम भारतीयों को बड़ी फर्मों में काम करने का अनुभव मिलता है जहाँ वे दूसरे क्षेत्रों के लोगों से मिल पाएँ, अधिकतर काम छोटे पैमाने के कार्यस्थलों में होता है जहाँ वेतन बढ़ना या नौकरी जाना वैयक्तिक संबंधों से तय होता है, निश्चित नियमों से नहीं। दूसरा, बहुत ही कम भारतीयों को सुविधाओं वाली सुरक्षित नौकरी मिलती है, और उनमें से दो-तिहाई सरकारी नौकरी में हैं, जाति, धर्म तथा क्षेत्र की दीवारों को पार करने में सरकारी नौकरियों की महत्वपूर्ण भूमिका है; एक समाजशास्त्री का तर्क है कि भिलाई स्टील प्लांट में सांप्रदायिक दंगे न होने का कारण यही है कि वहाँ भारत के सभी भागों के लोग एक साथ काम करते हैं (दूसरे इस पर प्रश्न उठा सकते हैं)। तीसरा, बहुत कम लोग संघ के सदस्य होते हैं, इसलिए असंगठित क्षेत्र के कामगारों को उचित वेतन और सुरक्षित कार्यावस्था के लिए सामूहिक रूप से लड़ने का अनुभव नहीं मिलता, सरकार ने निगरानी के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन कार्यान्विति में नियोजक अथवा ठेकेदार की मनमर्ज़ी ही प्रभावी होती है।
प्र. बीड़ी उद्योग की पूरी उत्पादन शृंखला, जंगल से पान की दुकान तक, समझाइए।
उत्तर: जंगल के पास के गाँव वाले तेंदु पत्ते तोड़कर जंगलात विभाग या निजी ठेकेदार को बेचते हैं, जो इन्हें वापस जंगलात विभाग को बेच देता है, एक व्यक्ति औसतन दिन में 100 बंडल (50 पत्ते प्रति बंडल) इकट्ठा कर सकता है। सरकार पत्तों को बीड़ी कारखाना मालिकों को नीलाम करती है, जो इन्हें ठेकेदारों को देते हैं, ठेकेदार तंबाकू और पत्ते घरेलू कामगारों को देता है, ये मुख्यतः महिलाएँ पत्तों को गीला करके, काटकर, तंबाकू भरकर बीड़ी बाँधती हैं। ठेकेदार तैयार बीड़ियाँ लेकर उत्पादक को बेचता है, जो इन्हें सेंककर अपने ब्रांड का लेबल लगाता है, उत्पादक वितरक को बेचता है, जो थोक विक्रेताओं को देता है, और आखिर में यह आपके मोहल्ले की पान की दुकान पर बिकती है।
प्र. भारत में खनन की कार्यावस्थाएँ अध्याय में कैसे बताई गई हैं?
उत्तर: केवल कोयले की खानों में ही 5.5 लाख कामगार काम करते हैं। खदान एक्ट, 1952 (अब व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति कोड, 2020 का हिस्सा) अधिकतम साप्ताहिक घंटे, अतिरिक्त घंटों का भुगतान और सुरक्षा नियम तय करता है, पर छोटी खानों और खुली खानों में अक्सर इनका पालन नहीं होता, और उप-ठेकेदारी बहुत बढ़ गई है, कई ठेकेदार मज़दूरों का रजिस्टर तक ठीक से नहीं रखते। भूमिगत खानों के मज़दूर बाढ़, आग, छत के धँसने, गैस उत्सर्जन और वेंटिलेशन विफलता जैसे खतरों का सामना करते हैं, जिससे क्षय रोग और सिलिकोसिस जैसी बीमारियाँ होती हैं, खुली खानों के मज़दूर तेज़ धूप-बारिश में काम करते हैं और खान फटने से चोट का जोखिम उठाते हैं। खनन कंपनियों को खनन खत्म होने पर भूमि बहाल करनी चाहिए, पर पुस्तक साफ़ कहती है कि “वे ऐसा नहीं करते हैं।”
प्र. बॉक्स 5.1 का आईटी क्षेत्र में ‘समय की चाकरी’ का विवरण समझाइए।
उत्तर: औसत आईटी कार्यदिवस 10 से 12 घंटे का होता है, अंतिम सीमा आने पर रातभर दफ़्तर में रुकना (‘नाइट आउट’) असामान्य नहीं है। एक कारण अमेरिकी ग्राहक-स्थलों से समय का अंतर है, जिससे सम्मेलन भारत में शाम को होते हैं जबकि अमेरिका में कार्यदिवस शुरू होता है। दूसरा कारण यह है कि बाह्यस्रोतीकृत परियोजनाओं की लागत और समयसीमा आठ घंटे के ‘मैनडे’ के हिसाब से कम आँकी जाती है, जिससे इंजीनियरों को अतिरिक्त घंटे काम करना पड़ता है। ‘फ्लैक्सी-टाइम’ सैद्धांतिक रूप से घंटे चुनने की छूट देता है, पर व्यवहार में इसका अर्थ है काम पूरा होने तक रुकना, और बिना दबाव के भी लोग साथियों के दबाव या बॉस को दिखाने के लिए देर तक रुकते हैं।
प्र. 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक का वर्णन कीजिए, जैसा अध्याय में दिया गया है।
उत्तर: ट्रेड यूनियन नेता डॉ. दत्ता सामंत के नेतृत्व में हुई इस स्ट्राइक की माँग बेहतर वेतन और अपने खुद के संघ बनाने की इजाज़त थी। यह लगभग दो वर्ष चली और लगभग ढाई लाख मज़दूर तथा उनके परिवार प्रभावित हुए। निराश होकर मज़दूर धीरे-धीरे वापस काम पर लौटने लगे, लगभग एक लाख मज़दूर अपनी नौकरी खो बैठे, कुछ अपने गाँव लौटे, कुछ दिहाड़ी मज़दूरी करने लगे, या भिवंडी, मालेगाँव और इच्छलकरंजी जैसे छोटे कस्बों के बिजली करघा क्षेत्रों में काम करने चले गए। मिल मालिकों ने आधुनिकीकरण और मशीनों पर निवेश नहीं किया और अब मिल की ज़मीन रीयल एस्टेट डीलरों को बेचने की कोशिश कर रहे हैं।
प्र. उदारीकरण ने बाह्यस्रोतीकरण के ज़रिए रोज़गार के पैटर्न को कैसे बदला, जैसा अध्याय बताता है?
उत्तर: कंपनियों ने अपने स्थायी कर्मचारियों की संख्या घटाकर काम छोटी कंपनियों या घरों को देना शुरू किया, बहुदेशीय कंपनियाँ पूरे विश्व में बाह्यस्रोतों से काम करवाती हैं, भारत जैसे विकासशील देशों से उन्हें सस्ते मज़दूर मिल जाते हैं। छोटी कंपनियाँ बड़ी कंपनियों से काम पाने के लिए होड़ करती हैं, इसलिए वे कम वेतन देती हैं और कार्यावस्था भी अधिकतर खराब होती है, और छोटी फर्मों में मज़दूर संघ बनाना मुश्किल हो जाता है। अधिकांश कंपनियाँ, यहाँ तक कि सरकार भी, अब बाह्य स्रोतों और अनुबंध पर काम करवाने लगी है, लेकिन यह प्रवृत्ति निजी क्षेत्र में विशेष रूप से दिखाई देती है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. 1990 के दशक से उदारीकरण ने भारतीय उद्योग को कैसे बदला है, पुस्तक के अपने उदाहरणों सहित चर्चा कीजिए।
उत्तर: 1990 के दशक से सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई है, निजी और विदेशी फर्मों को दूरसंचार, नागरिक उड्डयन और ऊर्जा जैसे पहले आरक्षित क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया, उद्योग खोलने के लिए लाइसेंस की ज़रूरत खत्म हो गई और विदेशी वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध हो गईं। उदारीकरण ने बहुदेशीय कंपनियों को भारतीय कंपनियाँ खरीदने का मौका दिया, और कुछ भारतीय कंपनियाँ खुद बहुदेशीय बन गईं, कोका कोला ने पारले पेय को खरीदा (पारले की आमदनी 250 करोड़ रुपये, कोका कोला का विज्ञापन बजट अकेले 400 करोड़ रुपये), जिससे कोला के उपभोग ने कई परंपरागत पेयों की जगह ले ली। सरकार ने विनिवेश की नीति भी अपनाई, मॉडर्न फूड, पहली निजीकृत कंपनी, में 60% कर्मचारियों को पाँच वर्षों में ही जबरन सेवामुक्त कर दिया गया। कंपनियाँ अपने कार्य छोटी कंपनियों या घरों को बाह्यस्रोतीकृत कर रही हैं, जिससे वेतन कम रहता है और संघ बनाना मुश्किल हो जाता है, यह प्रवृत्ति सरकार में भी दिखती है पर निजी क्षेत्र में विशेष रूप से है। कुल मिलाकर भारत अभी भी मुख्यतः कृषि प्रधान देश है, सेवा क्षेत्र और शहरी मध्यवर्ग बढ़ रहे हैं, पर सुरक्षित रोज़गार दुर्लभ बना हुआ है और सरकारी रोज़गार घट रहा है, जबकि विश्व स्तर पर उदारीकरण और निजीकरण बढ़ती आय-असमानता से जुड़े दिखते हैं।
प्र. “औद्योगीकरण कुछ असमानताएँ घटाता है, पर दूसरी नई असमानताएँ भी पैदा करता है।” अध्याय के उदाहरणों से चर्चा कीजिए।
उत्तर: औद्योगीकरण कुछ सामाजिक असमानताएँ कम करता है, रेलगाड़ियों, बसों और साइबर कैफे में जातीय भेदभाव का महत्त्व नहीं रहता। फिर भी भेदभाव के पुराने स्वरूपों को नए कारखानों और कार्यस्थलों में अभी भी देखा जा सकता है, और कुछ सामाजिक असमानता घटने पर भी आर्थिक या आय-असमानता बढ़ रही है, सामाजिक और आय-असमानता अक्सर एक-दूसरे पर छा जाती हैं, जैसे मेडीसिन, कानून और पत्रकारिता जैसे अच्छे वेतन वाले व्यवसायों में उच्च जाति के लोगों का वर्चस्व, और महिलाओं को समान काम के लिए अक्सर कम वेतन मिलना। संगठित क्षेत्र, जहाँ औपचारिक सुरक्षा है, बहुत कम भारतीयों को रोज़गार देता है, 90% से अधिक कार्य असंगठित है, जहाँ नियम नहीं बल्कि वैयक्तिक संबंध वेतन और नौकरी की सुरक्षा तय करते हैं, और बहुत कम कामगारों को सुविधाओं वाली सुरक्षित नौकरी मिलती है। इस तरह औद्योगीकरण का समानता का वादा सच्चा तो है पर अधूरा है, यह असमानता के कुछ पुराने चिह्न मिटाता है जबकि नई आर्थिक असमानताओं और कुछ पुरानी को साथ-साथ बने रहने देता है।
प्र. मैनेजर, मशीनों और आईटी क्षेत्र के अध्याय के विवरण के आधार पर भारतीय उद्योग में काम वास्तव में कैसे किया जाता है, समझाइए।
उत्तर: मैनेजर का मुख्य काम मज़दूरों को नियंत्रित रखना और उनसे अधिक काम कराना है, या तो घंटे बढ़ाकर या समान समय में उत्पादन बढ़ाकर, मशीनें उत्पादन तो बढ़ाती हैं पर मज़दूरों की जगह लेने का खतरा भी पैदा करती हैं, जिसे मार्क्स और गांधी दोनों ने रोज़गार के लिए खतरा माना। कानपुर के बुनकर रामचंद्र जैसे कपड़ा मिल के कामगार अपने आप को मशीन के विस्तार की तरह वर्णित करते हैं, जिन्हें लगातार, बिना रुके ध्यान देना पड़ता है। मारुति उद्योग लिमिटेड में हर मिनट दो कारें तैयार होती हैं, मज़दूरों को दिन में केवल 45 मिनट विश्राम मिलता है और अधिकतर 40 वर्ष तक थककर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेते हैं, जबकि पुर्जों की समय पर (just-in-time) आपूर्ति कंपनी की लागत कम रखती है पर मज़दूरों को तनाव में रखती है। सेवा क्षेत्र में सॉफ़्टवेयर में काम करने वाले लोग मध्यम वर्गीय और पूर्णतः शिक्षित होते हैं, और उनका कार्य स्वतःस्फूर्त एवं रचनात्मक होता है, फिर भी वह टायलरिज्म लेबर प्रक्रिया के अनुरूप ही होता है, जैसा बॉक्स 5.1 दिखाता है, यानी समय की चाकरी: 10-12 घंटे का दिन, अंतिम सीमा के लिए नाइट आउट, और फ्लैक्सी-टाइम जो व्यवहार में जितना ज़रूरी हो उतना काम करने को कहता है। यह सवाल उठाता है कि क्या ऐसा काम वाकई दक्षता बढ़ाता है, हैरी ब्रेवरमैन का तर्क है कि मशीनें इसके उलट दक्षता घटाती हैं, क्योंकि पहले वास्तुकार नक्काशी में भी दक्ष थे, परंतु अब कंप्यूटर उनके बहुत से काम कर देता है।
प्र. 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक को केंद्र में रखते हुए भारत में मज़दूर संघ और हड़तालों पर एक समीक्षात्मक नोट लिखिए।
उत्तर: कभी-कभी काम की बुरी दशाओं के कारण कामगार हड़ताल कर देते हैं और काम पर नहीं जाते, तालाबंदी में इसके उलट व्यवस्थापक मिल का दरवाज़ा बंद कर मज़दूरों को अंदर आने से रोकते हैं। हड़ताल का फ़ैसला कठिन होता है क्योंकि प्रबंधन अतिरिक्त मज़दूर बुला सकता है और मज़दूरों के लिए बिना वेतन गुज़ारा करना मुश्किल हो जाता है। 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक, डॉ. दत्ता सामंत के नेतृत्व में, अध्याय का केंद्रीय उदाहरण है, बेहतर वेतन और अपने खुद के संघ बनाने की इजाज़त की माँग के साथ शुरू हुई यह स्ट्राइक लगभग दो वर्ष चली और लगभग ढाई लाख मज़दूर तथा उनके परिवार प्रभावित हुए। निराशा में अंततः मज़दूर वापस काम पर लौटे, लगभग एक लाख कामगार बेरोज़गार हो गए, कुछ गाँव लौटे, कुछ दिहाड़ी मज़दूरी करने लगे, या भिवंडी, मालेगाँव, इच्छलकरंजी जैसे कस्बों के बिजली करघा क्षेत्रों में चले गए। मिल मालिकों ने आधुनिकीकरण में निवेश करने के बजाय अब मिल की ज़मीन रीयल एस्टेट डीलरों को सुख-सुविधा संपन्न इमारतें बनाने के लिए बेचने की कोशिश की, जिससे यह सवाल उठा कि मुंबई का भविष्य कौन तय करेगा, वे मज़दूर जिन्होंने इसे बनाया, या मिल मालिक और ज़मीन के व्यापारी। यह घटना मज़दूर संघों की वास्तविक ताकत और लंबी हड़ताल की असली कीमत, खोई हुई नौकरियों, दोनों को दिखाती है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक राजेश की ऑटो-पार्ट्स इकाई संगठित है या असंगठित क्षेत्र में, और क्यों?
उत्तर: यह असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में है, क्योंकि इसमें दस से कम कामगार हैं, यह सरकार में पंजीकृत नहीं है, और यह राजेश को वेतन या सुविधाओं की कोई गारंटी नहीं देती।
(ख) 2 अंक अध्याय के बाह्यस्रोतीकरण वाले विवरण के आधार पर बताइए कि बड़ी कार कंपनी राजेश जैसी छोटी इकाइयों पर सीधे भर्ती करने के बजाय क्यों निर्भर करती है।
उत्तर: अध्याय बताता है कि कंपनियाँ लागत कम रखने के लिए काम छोटी कंपनियों को बाह्यस्रोतीकृत करती हैं, क्योंकि छोटी कंपनियाँ बड़ी कंपनियों से काम पाने के लिए होड़ करती हैं और इसलिए कम वेतन देती हैं; पाठ के अनुसार बाह्य स्रोतों से किया गया कार्य कंपनी को सस्ता पड़ता है। (आपका अपना विश्लेषण, पुस्तक का नहीं: बड़ी कंपनी का ऑर्डर देर से आने पर राजेश जैसे मज़दूरों के पास काम ही नहीं रहता।)
(ग) 3 अंक सुरेश की स्थिति की तुलना अध्याय के ‘बदली’ कामगार और अनुबंधित मज़दूरी वाले विवरण से कीजिए, और बताइए कि सुरेश की चिंता सही क्यों है।
उत्तर: सुरेश के पास फ़िलहाल सुविधाओं वाला सुरक्षित वेतनभोगी पद है, बदली कामगार के उलट जो स्थायी मज़दूर की जगह काम करके भी वही पद नहीं पाता। पर उसकी चिंता अध्याय की एक वास्तविक प्रवृत्ति से मेल खाती है, कंपनियाँ स्थायी कर्मचारियों की संख्या घटाकर काम बाह्यस्रोतीकृत या अनुबंधित कर रही हैं, इसलिए सुरेश जैसा सुरक्षित नियमित वेतनभोगी पद भी स्थायी पदों के अनुबंधित मज़दूरी से बदले जाने के साथ असुरक्षित होता जा रहा है।