औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास (पुस्तक 2, अध्याय 5) के NCERT प्रश्नों के पूरे हल, पुस्तक के अपने शब्दों में: पहले अध्याय के अंत की प्रश्नावली (इसमें तीन प्रश्न हैं; प्रश्न 1 और प्रश्न 2 “अथवा” के रूप में दिए गए विकल्प हैं, फिर प्रश्न 3), फिर अध्याय के बीच में पूछे गए सभी क्रियाकलाप और प्रश्न।
प्र. अपने आस-पास वाले किसी भी व्यवसाय को चुनिए और इसका वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में कीजिए, (क) कार्य शक्ति का सामाजिक संघटन, जाति, जेंडर, आयु, क्षेत्र; (ख) मज़दूर प्रक्रिया, काम किस तरह किया जाता है; (ग) वेतन एवं अन्य सुविधाएँ; (घ) कार्यावस्था, सुरक्षा, आराम का समय, कार्य के घंटे इत्यादि।
उत्तर: यह एक खुला, परियोजना-शैली का प्रश्न है, आप अपने आस-पास सचमुच देखा जा सकने वाला कोई व्यवसाय चुनें (दुकान का कामगार, ऑटो-रिक्शा चालक, निर्माण मज़दूर, घरेलू सहायिका, डिलीवरी करने वाला)। नीचे अध्याय में विस्तार से बताए गए एक व्यवसाय, घरेलू बीड़ी कामगार, से एक आदर्श उत्तर दिया गया है, ताकि यह दिखाया जा सके कि चारों बिंदुओं को कैसे संभालना है।
(क) कार्य शक्ति का सामाजिक संघटन: घरों में होने वाला बीड़ी जैसा काम मुख्य रूप से महिलाओं या बच्चों द्वारा किया जाता है, और बीड़ी बनाने वाले कामगार अधिकांशतः महिलाएँ होती हैं। बीड़ी बनाने की प्रक्रिया जंगल के पास वाले गाँवों से शुरू होती है। पुस्तक इन कामगारों की जाति या आयु के बारे में कुछ नहीं बताती; अपने चुने हुए व्यवसाय में ये बातें स्वयं देखकर लिखें।
(ख) मज़दूर प्रक्रिया: गाँव वाले पहले तेंदु पत्ते तोड़कर जंगलात विभाग या निजी ठेकेदार को बेचते हैं, जो इन्हें वापस जंगलात विभाग को बेच देता है। सरकार पत्ते बीड़ी कारखाना मालिकों को नीलाम करती है, जो इन्हें ठेकेदारों को देते हैं, और ठेकेदार तंबाकू व पत्ते घरेलू कामगारों को देता है। ये कामगार पत्तों को गीला करते हैं, काटते हैं, तंबाकू भरते हैं और धागे से बाँधते हैं। ठेकेदार तैयार बीड़ियाँ लेकर उत्पादक को बेचता है, जो इन्हें सेंककर अपने ब्रांड का लेबल लगाता है, फिर वितरक और थोक विक्रेताओं के ज़रिए आखिर में आपके मोहल्ले की पान की दुकान तक पहुँचती हैं।
(ग) वेतन एवं अन्य सुविधाएँ: घरेलू कामगारों को नगों (पीस) के हिसाब से भुगतान मिलता है, कोई निश्चित वेतन या तनख्वाह नहीं। यह काम असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में आता है, जिसमें अध्याय के अनुसार भारत का 90% से अधिक कार्य आता है; बहुत ही कम भारतीय सुरक्षित और लाभदायक नौकरियों में हैं।
(घ) कार्यावस्था: पाठ घरेलू बीड़ी कामगारों के काम के घंटों या आराम के समय के बारे में कुछ नहीं कहता; इतना बताया गया है कि उन्हें नग (पीस) के हिसाब से पैसे मिलते हैं। असंगठित क्षेत्र के बारे में पाठ कहता है कि सरकार ने इसकी अवस्था पर निगरानी के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन कार्यान्विति में नियोजक अथवा ठेकेदार की मनमर्ज़ी ही प्रभावी होती है। अपने चुने हुए व्यवसाय में सुरक्षा, आराम का समय और काम के घंटे स्वयं देखकर लिखें।
प्र. ईंटें बनाने के, बीड़ी रोल करने के, सॉफ़्टवेयर इंजीनियर या खदान के काम, जो बॉक्स में वर्णित किए गए हैं, के कामगारों के सामाजिक संघटन का वर्णन कीजिए। कार्यावस्थाएँ कैसी हैं और उपलब्ध सुविधाएँ कैसी हैं? मधु जैसी लड़कियाँ अपने काम के बारे में क्या सोचती हैं?
उत्तर: नीचे हर काम के बारे में वही लिखा गया है जो पाठ बताता है; जहाँ पाठ कुछ नहीं कहता, वहाँ यह साफ़ लिखा गया है।
सामाजिक संघटन: ईंट-भट्टी जैसे स्थानों के दिहाड़ी मज़दूरों को ठेकेदार गाँव जाकर काम के लिए लाता है, और कभी-कभी पूरा परिवार प्रवसन कर जाता है और बच्चे काम में माता-पिता की सहायता करते हैं; बीड़ी बनाने का काम मुख्य रूप से महिलाओं या बच्चों द्वारा किया जाता है; सॉफ़्टवेयर में काम करने वाले लोग मध्यम वर्गीय और पूर्णतः शिक्षित होते हैं; पाठ खदान कामगारों की जाति, जेंडर या आयु के बारे में कुछ नहीं बताता, केवल इतना कि कोयले की खानों में ही 5.5 लाख लोग काम करते हैं।
ईंट-भट्टी के मज़दूर: ठेकेदार उन्हें कुछ पैसा उधार देता है, जिसमें काम के स्थान तक आने का यातायात खर्च भी होता है; उधार पैसा अग्रिम दिहाड़ी माना जाता है, और जब तक उधार नहीं चुक जाता वे बिना पैसे के काम करते हैं। उनके काम के घंटों और सुविधाओं के बारे में पाठ कुछ नहीं कहता।
बीड़ी कामगार: घर पर काम करने वालों को नग (पीस) के हिसाब से पैसे दिए जाते हैं; एक एजेंट या ठेकेदार कच्चा माल देता है और बनी हुई बीड़ियाँ ले जाता है। उनके काम के घंटों या आराम के समय के बारे में पाठ कुछ नहीं कहता।
सॉफ़्टवेयर इंजीनियर: बॉक्स 5.1 के अनुसार औसतन 10-12 घंटे का कार्यदिवस, अंतिम सीमा पर ‘नाइट आउट’, और ‘फ्लैक्सी-टाइम’ जिसका व्यवहार में अर्थ है काम पूरा होने तक रुकना; उनका कार्य भी टायलरिज्म लेबर प्रक्रिया के अनुरूप होता है।
खदान के कामगार: खदान एक्ट, 1952 (अब व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति कोड, 2020 में शामिल) अधिकतम घंटे, अतिरिक्त घंटों का पैसा और सुरक्षा के नियम तय करता है। बड़ी कंपनियों में इन नियमों का पालन किया जाता है, लेकिन छोटी खानों और खुली खानों में नहीं; भूमिगत खानों में बाढ़, आग, धँसने और गैसों से खतरा, और साँस की बीमारियाँ होती हैं।
मधु जैसी लड़कियाँ: पाठ में ‘मधु’ केवल प्रश्न में आती है और उसके विचार दर्ज नहीं हैं। पाठ मछली-प्रसंस्करण की युवा प्रवासी महिलाओं के बारे में कहता है कि उनके पास सामाजिकता के लिए बहुत कम समय होता है और काम उन्हें अकेलेपन और असुरक्षा की तरफ़ ले जाता है, फिर भी बहुत सी युवा महिलाएँ “कुछ स्वतंत्रता और आर्थिक स्वायत्तता का प्रतिनिधित्व करती हैं”। इसी आधार पर आप लिख सकते हैं कि ऐसी लड़कियाँ अपने काम के बारे में क्या सोच सकती हैं।
प्र. उदारीकरण ने रोज़गार के प्रतिमानों को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर: 1990 के दशक से सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई है। निजी कंपनियों, विशेषकर विदेशी फर्मों को, दूरसंचार, नागरिक उड्डयन और ऊर्जा जैसे उन क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया जो पहले सरकार के लिए आरक्षित थे, और उद्योग खोलने के लिए अब लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है, विदेशी वस्तुएँ अब भारतीय दुकानों में आसानी से मिल जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप बहुत सी भारतीय कंपनियों, छोटी एवं बड़ी, को बहुदेशीय कंपनियों ने खरीद लिया, और कुछ भारतीय कंपनियाँ खुद बहुदेशीय बन गईं। पुस्तक का अपना उदाहरण है, कोका कोला ने पारले पेय को खरीदा, पारले की सालाना आमदनी 250 करोड़ रुपये थी, जबकि केवल कोका कोला का विज्ञापन बजट 400 करोड़ रुपये था, इतने बड़े विज्ञापन ने स्वाभाविक रूप से भारत में कोला के उपभोग को बढ़ाया और कई परंपरागत पेयों की जगह ले ली। खुदरा व्यापार को पुस्तक उदारीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र बताती है।
सरकार सार्वजनिक कंपनियों में अपना हिस्सा भी बेच रही है, इसे विनिवेश कहा जाता है, कई सरकारी कर्मचारी इससे भयभीत हैं कि नौकरी न चली जाए। मॉडर्न फूड, जिसे सरकार ने सस्ता स्वास्थ्यवर्धक खाना उपलब्ध कराने के लिए बनाया था, निजीकरण की जाने वाली पहली कंपनी बनी, और इसके 60% कर्मचारियों को पहले पाँच वर्षों में ही जबरन सेवामुक्त कर दिया गया। अधिकांश कंपनियों ने अपने स्थायी कर्मचारियों की संख्या घटाकर काम छोटी कंपनियों या घरों को बाह्यस्रोतीकृत करना शुरू किया, बहुदेशीय कंपनियाँ पूरे विश्व में यह करती हैं, भारत जैसे विकासशील देशों से उन्हें सस्ते मज़दूर मिल जाते हैं। छोटी कंपनियाँ बड़ी कंपनियों से काम पाने के लिए होड़ करती हैं, इसलिए वे कम वेतन देती हैं और कार्यावस्था भी अधिकतर खराब होती है, और छोटी फर्मों में मज़दूर संघ बनाना भी मुश्किल हो जाता है, अधिकांश कंपनियाँ, यहाँ तक कि सरकार भी, अब बाह्य स्रोतों और अनुबंध पर काम करवाने लगी है, लेकिन यह प्रवृत्ति निजी क्षेत्रों में विशेष रूप से दिखाई देती है।
सारांश में, भारत अभी भी मुख्यतः एक कृषि प्रधान देश है, सेवा क्षेत्र, दुकानें, बैंक, आईटी उद्योग, होटल, अधिक लोगों को रोज़गार दे रहा है और शहरी मध्यवर्ग तथा उसके मूल्य बढ़ रहे हैं। फिर भी बहुत कम लोगों के पास भारत में सुरक्षित रोज़गार है, और स्थायी सुरक्षित रोज़गार की छोटी संख्या भी अनुबंधित कामगारों के बढ़ने से असुरक्षित होती जा रही है। सरकारी रोज़गार, जो जनसंख्या के कल्याण का एक बड़ा साधन था, अब घट रहा है, और विश्वव्यापी उदारीकरण एवं निजीकरण के साथ आमदनी की असमानताएँ भी बढ़ती दिखाई देती हैं।
2 पाठगत क्रियाकलाप और प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय अपने शुरुआती पृष्ठों में, भाग 5.2 और 5.4 में, और तीन क्रियाकलाप-बॉक्सों में भी प्रश्न पूछता है। ये यहाँ उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में पुस्तक इन्हें छापती है, आदर्श उत्तरों के साथ।
प्र. हम महिलाओं को कुछ अन्य क्षेत्रों जैसे इंजीनियरिंग की बजाय नर्सिंग अथवा शिक्षण के कार्यों में अधिक क्यों पाते हैं? यह मात्र एक संयोग है अथवा इसके पीछे समाज की यह सोच है कि महिलाएँ देखभाल एवं पालन-पोषण के क्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त हैं, बनिस्बत उन कार्यों के जो ‘सख्त’ और ‘पुरुषोचित’ नज़र आते हैं? अगर अधिक महिलाएँ इंजीनियरिंग के क्षेत्र में जाती हैं तो वे इस व्यवसाय को कैसे प्रभावित करती हैं? अपने आप से पूछिए कि क्यों भारत में कॉफ़ी के विज्ञापन में पैकेट पर दो कप दिखाए जाते हैं जबकि अमेरिका में एक कप?
उत्तर: पुस्तक इसे प्रश्न के रूप में रखती है: क्या यह मात्र संयोग है, या समाज की यह सोच है कि महिलाएँ देखभाल और पालन-पोषण के काम के लिए अधिक उपयुक्त हैं, बनिस्बत ‘सख्त’ और ‘पुरुषोचित’ माने जाने वाले कामों के? पुस्तक का अपना संकेत यह है कि नर्सिंग के कार्य में एक पुल को डिज़ाइन करने से अधिक बल की आवश्यकता होती है, यानी यह बँटवारा शारीरिक क्षमता का नहीं, जेंडर की सामाजिक सोच का लगता है। अधिक महिलाओं के इंजीनियरिंग में जाने से यह पेशा कैसे बदलेगा, यह आपको स्वयं सोचना है; अपने शब्दों में तर्क दें कि ‘पुरुषोचित’ काम की सोच कैसे बदल सकती है। कॉफ़ी के उदाहरण का उत्तर पुस्तक स्वयं देती है: बहुत से भारतीय कॉफ़ी पीने को सामाजिकता निभाने का एक अवसर मानते हैं, इसलिए विज्ञापन में दो कप दिखाए जाते हैं। दोनों उदाहरण पुस्तक की यह बात दिखाते हैं कि कौन क्या उत्पादित करता है, कौन कहाँ कार्य करता है और कौन किसको कैसे बेचता है, ये व्यक्तिगत रुचि नहीं बल्कि सामाजिक प्रारूपों का नतीजा हैं।
प्र. आधुनिकीकरण के सिद्धांतकार क्लार्क कैर द्वारा आगे बढ़ाए गए अभिसरण शोध के अनुसार 21वीं शताब्दी का आधुनिकीकृत भारत, 19वीं शताब्दी के भारत की विशेषताओं से साझा करने के बजाय, 21वीं शताब्दी के चीन या संयुक्त राज्य जैसी अधिक विशेषताएँ रखेगा। क्या आपको यह सच लगता है? क्या संस्कृति, भाषा एवं परंपराएँ नयी तकनीक के कारण विलुप्त हो जाती हैं, और क्या संस्कृति नए उत्पादों को अपनाने के तरीके को प्रभावित करती है? इन बिंदुओं पर अपने स्वयं के विचारों को उदाहरण देते हुए लिखिए।
उत्तर: यह प्रश्न आपके अपने विचार माँगता है, इसलिए एक आदर्श उत्तर यह तर्क दे सकता है कि यह बात आंशिक रूप से सही है। औद्योगिक भारत चीन और अमेरिका से कई बातें साझा करता है: कारखाने, दफ़्तर, आई.टी. कंपनियाँ और कॉल सेंटर; रेलगाड़ियों, बसों और साइबर कैफ़े में जातीय भेदभाव का महत्त्व भी घटा है। पर संस्कृति सीधे-सीधे मिटती नहीं, वह नए उत्पादों को अपनाने के तरीके को प्रभावित करती है। पुस्तक के अपने उदाहरण यही दिखाते हैं: भारत में कॉफ़ी के विज्ञापन में दो कप दिखते हैं क्योंकि कॉफ़ी सामाजिकता निभाने का अवसर है; आई.टी. शहरों में दादा-दादी की मदद से संयुक्त परिवार फिर से बनने लगे हैं; भेदभाव के पुराने स्वरूप नए कारखानों और कार्यस्थलों में भी देखे जा सकते हैं। कानपुर की मिलों में पहले कामगारों को मिस्त्री (रोज़गार दिलाने वाले) के ज़रिए काम मिलता था, जो समुदाय संबंधी दबाव भी डालता था; आजकल काम दिलाने वाले का महत्त्व कम हो गया है और कार्यकारिणी तथा यूनियन भर्ती में भूमिका निभाते हैं। आप अपने आस-पास देखे गए उदाहरण भी जोड़ सकते हैं (पुस्तक से बाहर), जैसे मोबाइल फ़ोन या खाने की चीज़ों का स्थानीय आदतों के अनुसार ढलना। इसलिए भारत तकनीक में तो दूसरे औद्योगिक देशों जैसा हो रहा है, पर संस्कृति नए उत्पादों को अपनाने के तरीके को प्रभावित करती रहती है।
प्र. संगठित क्षेत्र के इतना छोटा होने का सामाजिक आशय क्या है?
उत्तर: पुस्तक तीन आशय बताती है। पहला, बहुत कम लोग बड़ी फर्मों में काम करते हैं जहाँ वे दूसरे क्षेत्रों और पृष्ठभूमि वाले लोगों से मिल पाएँ; अधिकतर लोग छोटे पैमाने के कार्यस्थलों पर काम करते हैं जहाँ कार्य के कई पक्षों का निर्धारण वैयक्तिक संबंधों से होता है, जबकि बड़े संस्थानों में निश्चित नियम, अधिक पारदर्शी नियुक्ति और शिकायत की निश्चित कार्यविधियाँ होती हैं। दूसरा, बहुत कम भारतीय सुरक्षित और लाभदायक नौकरियों में हैं, और उनमें भी दो-तिहाई सरकारी नौकरी करते हैं; इसीलिए लोग सरकारी नौकरी पाने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, और बाकी लोग बुढ़ापे में बच्चों पर आश्रित रहने को बाध्य हैं; जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारें पार करने में सरकारी नौकरियों की महत्वपूर्ण भूमिका है (एक समाजशास्त्री का भिलाई स्टील प्लांट वाला तर्क, जिस पर दूसरे प्रश्न उठा सकते हैं)। तीसरा, बहुत कम लोग संघ के सदस्य हैं, इसलिए असंगठित क्षेत्र के कर्मी उचित वेतन और सुरक्षित कार्यावस्था के लिए सामूहिक रूप से लड़ने का अनुभव नहीं रखते; सरकार ने असंगठित क्षेत्रों पर निगरानी के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन कार्यान्विति में नियोजक अथवा ठेकेदार की मनमर्ज़ी ही प्रभावी होती है।
प्र. उदारीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र खुदरा व्यापार हो सकता है। आपके विचार से क्या भारतीय, भारतीय डिपार्टमेंटल स्टोर (भारतीय बहुविभागीय भंडारों), किराने की दुकान, अपने पड़ोस में या छोटे शहरों की कपड़े की दुकान से खरीदारी करने को वरीयता देते हैं, अथवा वे व्यापार के लिए बाहर जाते हैं?
उत्तर: पाठ यह प्रश्न पूछता है और इसका कोई निष्कर्ष नहीं देता। अपने पड़ोस की दुकान या बड़े स्टोर के उदाहरण से अपना मत लिखें; विद्यार्थी दोनों में से कोई भी पक्ष ले सकते हैं। उत्तर को पाठ के अपने उदाहरण से जोड़ें कि उदारीकरण के बाद प्रतिस्पर्धा कैसी होती है: पारले पेय की सालाना आमदनी 250 करोड़ रुपये थी, जबकि कोका कोला का विज्ञापन बजट 400 करोड़ रुपये था, और विज्ञापन के इस स्तर ने उपभोग को बढ़ाकर कई भारतीय पेयों का स्थान ले लिया।
प्र. हमारे आसपास हम जिन उत्पादों को देखते हैं उन्हें कैसे बनाया जाता है? एक ऑफ़िस या फ़ैक्ट्री में मैनेजर और कामगारों के संबंध कैसे होते हैं?
उत्तर: औद्योगीकरण से एक विस्तृत श्रम विभाजन होता है, इसलिए लोग अधिकतर अपने कार्यों का अंतिम रूप नहीं देख पाते, क्योंकि उन्हें उत्पादन के एक छोटे से पुर्जे को बनाना होता है। मैनेजर का मुख्य कार्य होता है कामगारों को नियंत्रित रखना और उनसे अधिक काम करवाना, जिसके दो तरीके हैं: पहला, कार्य के घंटों में वृद्धि; दूसरा, निर्धारित समय में उत्पादित वस्तु की मात्रा को बढ़ा देना। मशीनें उत्पादन को बढ़ाने में सहायक होती हैं, परंतु ये खतरे भी पैदा करती हैं और अंततः मशीनें कामगारों का स्थान ले रही हैं; उदाहरण के लिए, मारुति उद्योग लिमिटेड में कामगारों को मशीनी गति से काम करना होता है और पूरे दिन में केवल 45 मिनट का विश्राम मिलता है।
प्र. (गाँधीजी के 1924 के “मशीनों के प्रति पागलपन” वाले कथन, जो क्रियाकलाप 5.2 में उद्धृत है, और 1934 में चर्खा अपनाने पर उनके विचारों के बाद) उदाहरण द्वारा बताइए कि मशीनें किस तरह कामगारों के लिए समस्या पैदा करती हैं? गाँधीजी के दिमाग में क्या विकल्प था? चर्खे को अपनाने से शोषण को कैसे रोका जा सकता है?
उत्तर: उदाहरण: मारुति उद्योग लिमिटेड में उत्पादन अधिक हो रहा है पर कारखाने में स्थायी रूप से काम करने वालों की संख्या कम हो गई है, और बचे हुए कामगारों को मशीनी गति से काम करना पड़ता है (प्रति मिनट दो कारें, पूरे दिन में केवल 45 मिनट का विश्राम), जिससे वे 40 वर्ष का होने तक पूरी तरह थककर स्वैच्छिक अवकाश ले लेते हैं। पाठ का एक और उदाहरण: पहले वास्तुकार को नक्काशी में दक्षता भी हासिल थी, परंतु अब कंप्यूटर उनके बहुत से काम कर देता है। गाँधीजी का विकल्प मशीनों का विरोध नहीं था; वे मशीनों के प्रति पागलपन और मज़दूरों को कम करने वाली सनक के विरोधी थे, जो हज़ारों मज़दूरों को बिना काम के छोड़ देती है। वे समय और मज़दूर दोनों को “सबके लिए” बचाना चाहते थे, और संपत्ति को कुछ हाथों में नहीं, बल्कि सबके हाथों में देखना चाहते थे। चर्खा अपनाने से शोषण रुकता है, क्योंकि इससे लोगों को अपने घर और गाँव में ही काम और आमदनी मिलती है, और, जैसा गाँधीजी ने 1934 में कहा, एक राष्ट्र के रूप में चर्खा अपनाकर हम न केवल बेरोज़गारी की समस्या का समाधान करते हैं बल्कि यह भी घोषित करते हैं कि “हमारी किसी भी राष्ट्र का शोषण करने की इच्छा नहीं है”, और हम अमीरों द्वारा गरीबों के शोषण को भी समाप्त करना चाहते हैं।
प्र. लेकिन आप एक किसान की दक्षता की तुलना किससे करेंगे जो यह जानता है कि कई सौ फ़सलों को कैसे उगाया जाता है। क्या आप उसकी मौसम, मिट्टी और बीज की समझ पर विश्वास करेंगे या कि एक सॉफ़्टवेयर व्यवसायी पर?
उत्तर: दोनों ही अपने कार्यों में दक्ष हैं, लेकिन अलग तरह से। किसान की दक्षता मौसम, मिट्टी और बीज की समझ पर टिकी है, जबकि सॉफ़्टवेयर व्यवसायी की दक्षता ज्ञान पर आधारित सूचना तकनीक के काम पर, जिसे प्रायः ‘नॉलेज इकॉनोमी’ (ज्ञान आर्थिकी) कहा जाता है। यह समाजशास्त्र के एक महत्वपूर्ण विवाद का हिस्सा है कि क्या औद्योगीकरण और ज्ञान पर आधारित कार्य से समाज की कुशलता बढ़ रही है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैरी ब्रेवरमैन यह तर्क देते हैं कि वास्तव में मशीनों का प्रयोग कार्यकर्ताओं की दक्षता को कम करता है: पहले वास्तुकार को नक्काशी में दक्षता भी हासिल थी, परंतु अब कंप्यूटर उनके बहुत से काम कर देता है।
प्र. 2020-21 के दौरान, कोविड-19 महामारी के कारण सैकड़ों और हज़ारों आई.टी. सेक्टर कर्मचारियों ने घर से काम किया। घर आधारित काम तथा घर से काम करने वालों के बीच अंतर और समानताओं का पता लगाएँ।
उत्तर: यह पता लगाने वाला क्रियाकलाप है, इसलिए आपके निष्कर्ष इससे आगे भी जा सकते हैं; पुस्तक की अपनी सामग्री से यह रूपरेखा बनती है।
- समानता: दोनों तरह का काम कारखाने या दफ़्तर के बजाय घर पर होता है।
- अंतर: घर आधारित काम (लेस, ज़री या ब्रोकेड, गलीचे, बीड़ी, अगरबत्ती) मुख्य रूप से महिलाओं या बच्चों द्वारा किया जाता है; एक एजेंट कच्चा माल दे जाता है और पूरा काम ले भी जाता है, और कामगारों को नग (पीस) के हिसाब से पैसे मिलते हैं (भाग 5.6)। सॉफ़्टवेयर में काम करने वाले लोग, पुस्तक के अनुसार, मध्यम वर्गीय और पूर्णतः शिक्षित होते हैं, और उनके कार्य घंटे लंबे होते हैं (बॉक्स 5.1); कोविड-19 के दौरान (2020-21) उन्होंने घर से काम किया (क्रियाकलाप 5.3)। पुस्तक उनके वेतन या सुविधाओं के बारे में कुछ नहीं बताती, इसलिए ये बातें आप स्वयं पता करें।