नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
कक्षा 12 समाजशास्त्र, पुस्तक 2 अध्याय 7 “जनसंपर्क साधन और जनसंचार” (NCERT, भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास) की तीनों आधिकारिक प्रश्नावली प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, और उसके बाद पाठ के बीच पूछे गए सभी क्रियाकलाप और प्रश्न, पुस्तक के अपने शब्दों में।
1प्रश्न 1
प्रश्न. समाचारपत्र उद्योग में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनकी रूपरेखा प्रस्तुत करें। इन परिवर्तनों के बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर: भारत में समाचारपत्र उद्योग तीन जुड़े हुए तरीकों से बदला है।
घटने के डर के बावजूद वृद्धि। बहुत लोगों को लगा था कि टेलीविज़न और इंटरनेट के बढ़ने से समाचारपत्र पीछे छूट जाएँगे, पर भारत में प्रसार बल्कि बढ़ ही गया। औसत दैनिक प्रसार 2006 के 39.1 मिलियन प्रतियों से बढ़कर 2016 में 62.8 मिलियन हो गया, जो 4.87% की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर है, और उत्तर क्षेत्र में सबसे तेज़ वृद्धि (7.83%) रही। इसे बढ़ावा दिया शहरों में बसने वाले साक्षर लोगों की बढ़ती संख्या ने (जैसे दिल्ली का हिंदुस्तान संस्करण, जो 2003 के 64,000 से बढ़कर 2005 में 4,25,000 हुआ) और ज़िला/ब्लॉक संस्करणों ने, जो छोटे शहरों और गाँवों के पाठकों की ज़रूरतें पूरी करते हैं (मलयाला मनोरमा, ईनाडु, दिन थंती, दैनिक भास्कर)।
तकनीक में बदलाव। 1980 के दशक के अंत से समाचारपत्र संवाददाता की डेस्क से अंतिम पेज़-प्रूफ तक पूरी तरह स्वचालित हो गए, यह संभव हुआ लैन से जुड़े पीसी और ‘न्यूज़मेकर’ जैसे सॉफ़्टवेयरों से। संवाददाता की आशुलिपि पुस्तिका, पेन, टाइपराइटर और पुराना टेलीफ़ोन अब डिजिटल रिकॉर्डर, लैपटॉप या पीसी, मोबाइल या सेटेलाइट फ़ोन, मॉडेम, डिश और एंटीना से बदल गए (बॉक्स 7.10 का अमर उजाला उदाहरण: लगभग 100 संवाददाता और 100 फ़ोटोग्राफर उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के 13 संस्करणों को सामग्री देते हैं)।
बदलती विषय-वस्तु और पाठक वर्ग। पढ़ने की आदतें बदलीं, वृद्ध पाठक पूरा पत्र पढ़ते हैं, युवा पाठक सीधे अपनी रुचि के पन्नों पर जाते हैं, इसीलिए समाचारपत्र ‘सूचनारंजन’ यानी सूचना और मनोरंजन के मिश्रण की ओर बढ़े, और अब समाचारपत्र एक उपभोक्ता उत्पाद ज़्यादा बन गए हैं, पारंपरिक मूल्यों का वाहक कम।
मेरी राय: ये बदलाव एक ऐसे उद्योग को दिखाते हैं जिसने ढलने के बजाय ख़ुद को बदल लिया, पर सूचनारंजन की ओर झुकाव और विज्ञापनदाताओं पर बढ़ती निर्भरता (बॉक्स 7.11) यह भी बताती है कि सामग्री अब उतनी बिकने वाली चीज़ से तय होती है जितनी सार्वजनिक सेवा के मक़सद से, जिस पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, भले ही प्रसार के आंकड़े अच्छे दिख रहे हों।
2प्रश्न 2
प्रश्न. क्या एक जनसंचार के माध्यम के रूप में रेडियो खत्म हो रहा है? उदारीकरण के बाद भी भारत में एफ.एम. स्टेशनों के सामर्थ्य की चर्चा करें।
उत्तर: नहीं, पुस्तक के अपने प्रमाण दिखाते हैं कि रेडियो खत्म नहीं हुआ, बस इसका रूप बदल गया है।
रेडियो की जारी पहुँच। 2000 तक आकाशवाणी के कार्यक्रम भारत के लगभग दो-तिहाई घरों (लगभग 11 करोड़ घर, 12 करोड़ से अधिक रेडियो सेटों पर) में 24 भाषाओं और 146 बोलियों में सुने जाते थे; आज आकाशवाणी 480 स्टेशन और 681 ट्रांसमीटर तक पहुँच गई है, जो 92% क्षेत्र में फैली 99% जनसंख्या को कवर करती है।
उदारीकरण के बाद एफ.एम. की संभावना। निजी स्वामित्व वाले एफ.एम. स्टेशन 2002 में आए, जिससे मनोरंजन कार्यक्रमों को बढ़ावा मिला, हालाँकि इन्हें राजनीतिक समाचार बुलेटिन प्रसारित करने की अनुमति नहीं है, इसीलिए कई चैनल किसी ख़ास तरह के लोकप्रिय संगीत में विशेषज्ञता रखते हैं। लोकप्रिय एफ.एम. ब्रांड (रेडियो मिर्ची: टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह; रेड एफ.एम.: लिविंग मीडिया; रेडियो सिटी: स्टार नेटवर्क) मीडिया समूहों के हैं, जो इस माध्यम पर असली व्यावसायिक भरोसा दिखाता है। रंग दे बसंती और लगे रहो मुन्ना भाई जैसी फ़िल्में भी रेडियो को एक सक्रिय कथानक-साधन के रूप में इस्तेमाल करती हैं, जो इसकी सांस्कृतिक मौजूदगी दिखाता है।
सामुदायिक रेडियो का उदाहरण। बॉक्स 7.14 का राघव एफ.एम. मंसूरपुर 1, बिहार का एक स्वयं-निर्मित गाँव का स्टेशन, 20 किलोमीटर के दायरे में हज़ारों गाँव वालों तक पहुँचता है, यह दिखाता है कि एफ.एम. स्थानीय ज़रूरतें, यानी स्थानीय ख़बरें, फ़िल्मी गाने और स्वास्थ्य संबंधी जन-हित संदेश, कैसे पूरी करता है जो बड़े नेटवर्क नहीं कर पाते।
निष्कर्ष: पुस्तक एफ.एम. के भविष्य में बड़ी संभावना देखती है: और अधिक निजीकरण और समुदाय-स्वामित्व वाले स्टेशन, स्थानीय समाचारों की बढ़ती माँग से प्रेरित, बड़े नेटवर्कों की जगह स्थानीय रेडियो के विश्वव्यापी रुझान से मेल खाते हुए। रेडियो खत्म नहीं हुआ, इसे एक नई, ज़्यादा स्थानीय भूमिका मिली है।
3प्रश्न 3
प्रश्न. टेलीविज़न के माध्यम में जो परिवर्तन होते रहे हैं उनकी रूपरेखा प्रस्तुत करें। चर्चा करें।
उत्तर:
राज्य-टीवी का दौर। टीवी 1959 में ग्रामीण विकास के लिए प्रयोग के तौर पर शुरू हुआ। साइट (अगस्त 1975 से जुलाई 1976) ने छह राज्यों के 2,400 ग्रामीण टीवी सेटों तक सीधा प्रसारण किया। दूरदर्शन ने 1975 तक दिल्ली, मुंबई, श्रीनगर और अमृतसर में केंद्र स्थापित किए, फिर एक साल में कोलकाता, चेन्नई और जालंधर जोड़े। रंगीन प्रसारण 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों में शुरू हुआ, और हम लोग (1984-85), बुनियाद (1986-87) जैसे सोप ओपेरा तथा रामायण (1987-88), महाभारत (1988-90) जैसे महाकाव्यों ने भारी दर्शक संख्या और विज्ञापन राजस्व पाया।
भूमंडलीकरण का दौर। भारत 1991 के एक राज्य-नियंत्रित चैनल से 1998 तक लगभग 70 चैनलों तक पहुँचा। 1991 का खाड़ी युद्ध (जिसने सीएनएन को लोकप्रिय बनाया) और उसी वर्ष स्टार-टीवी की शुरुआत, फिर ज़ी टीवी (1992), ने निजी उपग्रह टेलीविज़न के आगमन का संकेत दिया। 2000 तक 40 निजी केबल/उपग्रह चैनल थे, जिनमें क्षेत्रीय चैनल भी शामिल थे। केबल ऑपरेटर 1984 के 100 से बढ़कर 1999 तक लगभग 60,000 हो गए।
स्थानीयकरण। विदेशी चैनलों ने भारतीय दर्शकों के अनुसार सामग्री ढाली, बजाय विदेशी सामग्री थोपने के, जैसे स्टार प्लस, जो पहले पूरी तरह अंग्रेज़ी चैनल था, ने अक्तूबर 1996 से हिंदी पट्टी शुरू की और फ़रवरी 1999 तक पूरी तरह हिंदी चैनल बन गया (नारा: “आपकी बोली। आपका प्लस प्वाइंट”), जबकि स्टार स्पोर्ट्स/ईएसपीएन ने हिंदी ऑडियो ट्रैक जोड़े और बड़ी कंपनियों ने क्षेत्रीय-भाषा चैनल शुरू किए।
आज। ट्राई की 2015-16 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाज़ार बन गया है। चैनल चौबीसों घंटे चलते हैं, समाचार जीवंत और अनौपचारिक हो गए हैं, और मनोरंजन टेलीविज़न ने कौन बनेगा करोड़पति, इंडियन आइडल और बिग बॉस जैसे रियलिटी शो प्रारूपों के साथ नए सुपरस्टार पैदा किए हैं।
मेरी राय: टेलीविज़न एक अकेले राज्य-संचालित चैनल से, जो विकास का संदेश देता था, बदलकर एक विशाल, प्रतिस्पर्धी, व्यावसायिक उद्योग बन गया है, यह बदलाव पुस्तक के अपने शब्दों में समाचार को “अधिक तात्कालिक, लोकतंत्रात्मक और आत्मीय” बनाने वाला रहा है, पर साथ ही इसने असली सवाल भी खड़े किए हैं (जैसा बॉक्स 7.12 की प्रिंस की कवरेज दिखाती है) कि क्या विशेष सीधी कवरेज पाने की होड़ कभी-कभी ताक-झाँक में बदल जाती है, और क्या इस दौड़ में गंभीर राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों की उपेक्षा होती है।
4 पाठ के भीतर के क्रियाकलाप और प्रश्न
अध्याय पाठ के बीच में भी प्रश्न पूछता है: चार क्रियाकलाप बॉक्स, बॉक्स 7.11 का अभ्यास, और रास्ते में पाठक से पूछे गए कई प्रश्न। ये यहाँ उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में पुस्तक इन्हें छापती है, आदर्श उत्तरों सहित। जहाँ क्रियाकलाप पता लगाने, पूछने या चर्चा करने को कहता है, वहाँ उत्तर बताता है कि एक अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए; इसे अपनी खोज के साथ मिलाकर उपयोग करें।
प्र. एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जहाँ कोई टेलीविज़न, सिनेमा, समाचारपत्र, पत्रिका, इंटरनेट, टेलीफ़ोन या मोबाइल फ़ोन कुछ भी न हों। आप अपने किसी एक दिन के दैनिक क्रियाकलापों को लिखें। उन अवसरों का पता लगाएँ जब आपने जनसंपर्क या जनसंचार के किसी-न-किसी साधन का प्रयोग किया हो। अपनी से पुरानी पीढ़ी के व्यक्तियों से पता लगाएँ कि संचार के इन साधनों के अभाव में जीवन कैसा था। आप उस जीवन की तुलना अपने जीवन से करें। संचार प्रौद्योगिकियों का विकास होने से कार्य करने और खाली समय को बिताने के तरीकों में किस प्रकार का बदलाव आया है? चर्चा करें।
उत्तर: एक सामान्य दिन की सूची में लगभग हर कदम पर जनसंचार के साधन दिखते हैं: मोबाइल फ़ोन पर अलार्म या संदेश, सुबह का समाचारपत्र या टेलीविज़न पर समाचार, ऑनलाइन कक्षाएँ या पढ़ाई की सामग्री, दोस्तों से फ़ोन और चैट, खाली समय में संगीत या वीडियो, और जैसा अध्याय बताता है, बोर्ड के परिणाम और पाठ्यपुस्तकें भी इंटरनेट पर। बुज़ुर्ग आम तौर पर ऐसा जीवन याद करते हैं जिसमें समाचार देर से, मुँह-ज़बानी या रेडियो से आते थे; चिट्ठियाँ कई दिन लेती थीं; घर में एक टेलीफ़ोन होता था या वह भी नहीं; और मनोरंजन का अर्थ था बातचीत, खेल, मेले और कभी-कभार फ़िल्म। काम इसलिए बदला है क्योंकि लोगों से कहीं भी संपर्क किया जा सकता है (अध्याय के नलसाज, बिजली मिस्त्री और बढ़ई मोबाइल फ़ोन रखते हैं), प्रवासी कामगार गाँवों में अपने परिवारों से नियमित संपर्क रखते हैं, और सूचना तुरंत पहुँचती है; खाली समय अधिक घर-केंद्रित और स्क्रीन-केंद्रित हो गया है, और फ़ोन हमेशा चालू रहने से काम और आराम आपस में मिल गए हैं।
प्र. क्या आपने मोबाइल फ़ोनों के बारे में विभिन्न प्रकार के विज्ञापनों को देखा है? क्या आपने यह जानने की कोशिश की है कि ये मोबाइल फ़ोन विविध प्रकार के सामाजिक समूहों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं?
उत्तर: हाँ। मोबाइल फ़ोन के विज्ञापन बहुत अलग-अलग समूहों को लक्ष्य बनाते हैं: युवा और विद्यार्थी (कैमरा, संगीत, खेल, सोशल मीडिया), पेशेवर लोग (तेज़ी, कारोबारी सुविधाएँ), ग्रामीण और कम आय वाले ख़रीदार (सस्ते फ़ोन, लंबी बैटरी, क्षेत्रीय भाषाएँ), परिवार और बुज़ुर्ग (आसान प्रयोग, बच्चों से संपर्क), और घर फ़ोन करने वाले प्रवासी। यह अध्याय की इस बात को दिखाता है कि बाज़ार जनसंचार को आकार देता है, और अलग-अलग वर्ग के लोग इन साधनों का प्रयोग बहुत अलग ढंग से करते हैं।
प्र. स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के पहले दो दशकों में जो लोग बड़े हुए हैं, उनकी पीढ़ी में से अपने किसी परिचित व्यक्ति से उन वृत्तचित्रों के बारे में पूछें जो उन दिनों सिनेमाघर में फ़िल्म दिखाने से पहले नियमित रूप से दिखाए जाते थे। उनकी यादों को लिखें।
उत्तर: उनकी यादें लिखिए। अध्याय बताता है कि क्या अपेक्षा करें: सरकार का फ़िल्म प्रभाग समाचार, फ़िल्में और वृत्तचित्र प्रस्तुत करता था, जिन्हें प्रत्येक सिनेमाघर में फ़िल्म प्रारंभ करने से पहले दिखाया जाता था ताकि दर्शकों को सरकार द्वारा चलाई जा रही विकास प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिल सके। लोग आम तौर पर बाँधों, कारख़ानों और पंचवर्षीय योजनाओं, हरित क्रांति, परिवार नियोजन, स्वास्थ्य और स्वच्छता अभियानों, राष्ट्रीय नेताओं और घटनाओं, तथा अस्पृश्यता और बाल विवाह के विरुद्ध संदेशों वाली फ़िल्में याद करते हैं। इन यादों को अध्याय की इस बात से जोड़िए कि उस समय मीडिया को राष्ट्र-निर्माण में भागीदार और विकास के प्रयासों की जानकारी देने का साधन माना जाता था।
प्र. पुरानी पीढ़ी के विभिन्न लोगों से मिलें और पता लगाएँ कि 1970 और 1980 के दशकों में टेलीविज़न के कार्यक्रमों में क्या दिखाया जाता था? क्या उन लोगों में से बहुतों को टेलीविज़न उपलब्ध था?
उत्तर: उनके उत्तर आम तौर पर अध्याय से मेल खाते हैं। दूरदर्शन के केंद्रों के कार्यक्रमों में समाचार, बच्चों और महिलाओं के कार्यक्रम, किसानों के कार्यक्रम और फ़िल्मों पर आधारित मनोरंजन कार्यक्रम होते थे; 1980 के दशक के मध्य से ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ जैसे सोप ओपेरा, और बाद में ‘रामायण’ और ‘महाभारत’। पहुँच सीमित थी: एक ही सरकारी चैनल था, सेट महँगे थे, और बहुत से लोग पड़ोसी के या सामुदायिक सेट पर देखते थे (1975-76 का साइट प्रयोग छह राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 2400 सामुदायिक सेटों तक पहुँचा था)। 1982 के एशियाई खेलों के साथ रंगीन प्रसारण शुरू होने और 1984-85 में ट्रांसमीटरों की संख्या बढ़ने के बाद पहुँच बढ़ी।
प्र. यदि इंटरनेट इन सभी तत्त्वों की आवश्यकता को समाप्त कर संगीत को सीधे डाउनलोड कर बेचना संभव कर सकेगा तो फिर संगीत उद्योग में बाकी क्या बचेगा? आप संगीत उद्योग पर मोबाइल एप्लिकेशन के प्रभाव को कैसे देखते हैं?
उत्तर: सीडी और कैसेट पर टिकी फ़ैक्ट्रियाँ, वितरण शृंखलाएँ, संगीत की दुकानें और बिक्री कर्मचारी घट जाते हैं या खत्म हो जाते हैं, पर उद्योग समाप्त नहीं होता: संगीत बनाने वाले (कलाकार, संगीतकार, स्टूडियो), अधिकारों का स्वामित्व, और ऑनलाइन संगीत बेचने वाली कंपनियाँ बची रहती हैं, जो अब भी कुछ ही बड़े समूहों के हाथों में केंद्रित हैं। मोबाइल एप्लिकेशन आज बहुत से लोगों के संगीत सुनने का मुख्य साधन हैं: स्ट्रीमिंग ऐप सस्ते में विशाल संग्रह उपलब्ध कराते हैं, स्वतंत्र और क्षेत्रीय कलाकारों को सीधे श्रोताओं तक पहुँचने देते हैं, और सदस्यता तथा विज्ञापनों से कमाते हैं, पर इससे बहुत से कलाकारों के लिए बिक्री से कमाना कठिन भी हुआ है। यह अध्याय की मीडिया के रूपों के विलयन और संगीत की भूमंडलीय पहुँच वाली बात को दिखाता है।
प्र. पता लगाइए कि जिस समाचारपत्र से आप भलीभाँति परिचित हैं, वह कितने स्थानों से निकाला जाता है। क्या आपने गौर किया है कि उनमें किसी नगर के हितों और घटनाओं को विशेष महत्त्व देने वाले परिशिष्ट होते हैं? क्या आपने ऐसे अनेक वाणिज्यिक परिशिष्टों को देखा है जो आजकल कई समाचारपत्रों के साथ आते हैं?
उत्तर: अपने समाचारपत्र की मुद्रण पंक्ति देखिए, जिसमें उसके संस्करण और मुद्रण केंद्र लिखे होते हैं; बड़े समाचारपत्र कई शहरों से निकलते हैं, और भारतीय भाषाओं के पत्र अक्सर ज़िला नगरों से भी (अध्याय का ‘अमर उजाला’ उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के 13 संस्करणों को सामग्री देता है; 1998 तक ‘ईनाडु’ आंध्र प्रदेश के 10 नगरों से छपता था)। अधिकांश पत्रों में स्थानीय ख़बरों, कार्यक्रमों और विज्ञापनों वाले नगर परिशिष्ट, और संपत्ति, नौकरी, शिक्षा, ख़रीदारी या त्योहारों पर वाणिज्यिक परिशिष्ट होते हैं। यह अध्याय की इन बातों को दिखाता है कि समाचारपत्र अनेक केंद्रों से अलग-अलग संस्करण निकालकर मुकाबला करते हैं, स्थानीय ख़बरें केंद्रीय हो गई हैं, और विज्ञापनदाताओं पर निर्भरता उन्हें सामग्री में अधिक दख़ल देती है।
प्र. 1. आपके विचार से क्या पाठक बदल गए हैं अथवा समाचार पत्र बदल गए हैं? चर्चा करें।
उत्तर: दोनों बदले हैं, और दोनों ने एक-दूसरे को बदला है। पाठक बदले हैं: युवा पाठकों की खेल, मनोरंजन या सामाजिक गपशप जैसी विशिष्ट रुचियाँ होती हैं और वे सीधे उन्हीं पृष्ठों पर पहुँच जाते हैं, जबकि वृद्धजन पूरा-पूरा समाचार पत्र पढ़ते हैं। समाचार पत्र भी बदले हैं: अलग-अलग रुचियों के पाठकों तक पहुँचने के लिए वे विभिन्न प्रकार की ‘कहानियाँ’ रखते हैं, कीमतें घटाते हैं, विज्ञापनदाताओं पर अधिक निर्भर हैं, और स्वयं को उपभोक्ता वस्तु मानते हैं; बॉक्स कहता है कि समाचार पत्रों का प्रकाशन अब कतिपय परंपराबद्ध मूल्यों के लिए प्रतिबद्धता से संबंधित नहीं रहा है।
प्र. 2. ‘सूचनारंजन’ शब्द पर चर्चा करें। क्या आप इसके कुछ उदाहरण सोच सकते हैं? आपके विचार से सूचनारंजन का क्या प्रभाव होगा?
उत्तर: सूचनारंजन (इनफोटेनमैंट) यानी सूचना तथा मनोरंजन दोनों का मिश्रण, ताकि सभी प्रकार के पाठकों की रुचि बनी रहे। उदाहरण: फ़िल्मी सितारों की गपशप से भरे समाचार पृष्ठ, जीवन-शैली के रंगीन परिशिष्ट, समाचार को नाटकीय कहानी या प्रश्नोत्तरी की तरह पेश करना, और संगीत तथा सनसनीखेज़ दृश्यों वाले टीवी समाचार। इसका प्रभाव अच्छा भी हो सकता है, क्योंकि अधिक लोग समाचार पढ़ते और देखते हैं; पर इससे समाचार के हल्के हो जाने का ख़तरा भी है: गंभीर राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों की उपेक्षा हो सकती है, और जो बिकता है वह जो महत्त्वपूर्ण है उससे अधिक मायने रखने लगता है।
प्र. क्या आपने कभी कोई डब किया हुआ कार्यक्रम देखा है? उसके बारे में आप क्या महसूस करते हैं?
उत्तर: अधिकांश विद्यार्थियों ने डब किए कार्टून या फ़िल्में देखी हैं, जैसे हिंदी में अमेरिकी कार्यक्रम। अध्याय बताता है कि स्टार और सोनी अमेरिका के अपने कार्यक्रमों को छोटे बच्चों के लिए डब करते रहे, क्योंकि बच्चे उन विलक्षणताओं को स्वीकार करने लगे थे जो भाषा कोई और और कथा-परिवेश कोई और होने पर उत्पन्न होती हैं। अच्छे उत्तर में अपनी राय दीजिए: डबिंग विदेशी सामग्री को समझने योग्य बनाती है और दिखाती है कि पारराष्ट्रीय चैनल स्थानीयकरण कैसे करते हैं; पर चुटकुले, नाम और परिवेश अटपटे लग सकते हैं, क्योंकि पात्र अमेरिकी परिवेश में हिंदी बोलते हैं।
प्र. इनमें से किन-किन कार्यक्रमों को अंतःक्रियात्मक प्रदर्शन, पारिवारिक नाट्य प्रदर्शन, वार्ता प्रदर्शन और यथार्थवादी प्रदर्शन कहा जा सकता है? चर्चा करें।
उत्तर: अध्याय के अपने उदाहरणों में ‘कौन बनेगा करोड़पति’, ‘इंडियन आइडल’ और ‘बिग बॉस’ यथार्थवादी प्रदर्शन (रियलिटी शो) हैं; ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (जिसमें दर्शक भाग ले सकते हैं) और ‘इंडियन आइडल’ (जिसमें दर्शक वोट देते हैं) अंतःक्रियात्मक प्रदर्शन भी हैं। पारिवारिक नाट्य प्रदर्शन (फ़ैमिली सोप) लंबे चलने वाले पारिवारिक धारावाहिक हैं, जैसे दूरदर्शन के दौर के ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’। वार्ता प्रदर्शन (टॉक शो) वे कार्यक्रम हैं जिनमें संचालक अतिथियों या स्टूडियो के दर्शकों के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा करता है। हर प्रकार के ऐसे उदाहरण भी जोड़िए जो आप आजकल देखते हैं।