NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 5 «विधायिका» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए। अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्नों और गतिविधियों के उत्तर अंत में दिए गए हैं।
1 क्या विधायिका के बिना काम चल सकता है?
प्र. आलोक मानता है कि किसी देश को कारगर सरकार की ज़रूरत होती है जो जनता की भलाई करे। अतः यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमंत्री और मंत्रिगण चुन लें और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर: नहीं, आलोक की बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता। कारण ये हैं:
1. विधायिका सिर्फ़ कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, वह सभी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रियाओं का केंद्र है।
2. सरकार चुन लेने भर से लोकतंत्र पूरा नहीं होता। असली सवाल यह है कि चुनी हुई सरकार से हिसाब कौन माँगेगा। यही काम विधायिका करती है, प्रश्नकाल, बहस, बजट और अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए।
3. अगर विधायिका न हो तो बहुमत की ताक़त पाकर कार्यपालिका मनमानी करने लगेगी और लोकतंत्र मंत्रिमंडल की तानाशाही में बदल जाएगा।
4. संसद देश के हर क्षेत्र, वर्ग, भाषा और समुदाय की आवाज़ एक जगह लाती है। सिर्फ़ प्रधानमंत्री और मंत्रियों में यह विविधता नहीं आ सकती।
5. सरकार पर व्यवहारिक अंकुश दिखता भी है। 1998 और 2002 में विपक्ष के दबाव में सरकार को उर्वरक की बढ़ी हुई क़ीमत वापस लेनी पड़ी थी।
इसलिए कारगर सरकार और विधायिका, दोनों चाहिए। विधायिका के बिना सरकार कारगर तो हो सकती है, पर जवाबदेह नहीं।
2 द्वि-सदनीय प्रणाली पर बहस
प्र. किसी कक्षा में द्वि-सदनीय प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। इन तर्कों को पढ़िए और इनसे अपनी सहमति या असहमति के कारण बताइए।
(क) नेहा ने कहा कि द्वि-सदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता।
(ख) शमा का तर्क था कि राज्य सभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए।
(ग) त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की ज़रूरत नहीं रह जाती।
उत्तर:
(क) नेहा से असहमत। द्वि-सदनीय प्रणाली दो साफ़ उद्देश्य पूरे करती है। पहला, भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश में यह समाज के हर वर्ग और देश के हर भौगोलिक हिस्से को प्रतिनिधित्व देती है। दूसरा, इससे हर फ़ैसले पर दोबारा विचार संभव हो जाता है, क्योंकि एक सदन का हर विधेयक दूसरे सदन में भी जाता है। एक सदन जल्दबाज़ी में फ़ैसला कर ले, तो दूसरा उसे रोक सकता है।
(ख) शमा से आंशिक सहमति। यह पहले से हो रहा है। राष्ट्रपति राज्य सभा में 12 सदस्य मनोनीत करते हैं, जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला और समाजसेवा में विशेष योगदान दिया हो, और इससे सदन में विशेषज्ञता आती है। पर इसकी एक सीमा भी है, जिसे पुस्तक ख़ुद उठाती है: मनोनीत सदस्य किसी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते, इसलिए वे जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते। इसीलिए मनोनयन थोड़ा रहे, यही ठीक है, पूरा सदन विशेषज्ञों का नहीं हो सकता।
(ग) त्रिदेव से असहमत। दूसरा सदन केवल संघीय ढाँचे के लिए नहीं होता। संघीय देश में वह राज्यों की आवाज़ ज़रूर बनता है, पर उसका दूसरा काम, हर विधेयक पर पुनर्विचार, गैर-संघीय देश में भी उतना ही ज़रूरी है। पूर्णिमा बनर्जी ने संविधान सभा में यही कहा था कि उच्च सदन पुनरीक्षण करने वाली संस्था का उपयोगी काम कर सकता है।
3 लोक सभा का नियंत्रण अधिक प्रभावी क्यों
प्र. लोक सभा कार्यपालिका को राज्य सभा की तुलना में क्यों कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है?
उत्तर:
1. उत्तरदायित्व: मंत्रिपरिषद् केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, राज्य सभा के प्रति नहीं।
2. अविश्वास प्रस्ताव: यह केवल लोक सभा में लाया जा सकता है और पारित होते ही पूरी सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ता है। राज्य सभा सरकार की आलोचना तो कर सकती है, पर उसे हटा नहीं सकती।
3. वित्तीय शक्ति: धन विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत होता है और वही उसे संशोधित या अस्वीकार कर सकती है। सरकार का सारा खर्च उसी की मंज़ूरी से चलता है।
4. असली वजह: लोक सभा को जनता सीधे चुनती है। हमारे संविधान की व्यवस्था में अंतिम शक्ति जनता के पास है, इसलिए सरकार हटाने और वित्त पर नियंत्रण जैसी निर्णायक शक्तियाँ जनता के सीधे चुने प्रतिनिधियों को ही दी गईं। राज्य सभा को जनता नहीं, विधायक चुनते हैं।
4 क्या लोक सभा सिर्फ़ भावनाओं का मंच है?
प्र. लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं, बल्कि जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत हैं? कारण बताएँ।
उत्तर: इस कथन से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता। लोक सभा दोनों काम करती है, और नियंत्रण वाला काम भी असली है।
कथन के पक्ष में जो सच है:
1. लोक सभा देश का सबसे बड़ा बहस मंच है, जहाँ हर क्षेत्र, जाति, धर्म और भाषा के प्रतिनिधि अपने लोगों की समस्याएँ रखते हैं।
2. प्रश्नकाल में उठने वाले ज़्यादातर सवाल मूल्यवृद्धि, अनाज की उपलब्धता, कमज़ोर वर्गों पर अत्याचार, दंगे और कालाबाज़ारी जैसे जनसरोकार के होते हैं।
3. जब सरकार के पीछे अनुशासित बहुमत हो, तब सदन की सरकार हटाने की शक्ति काफ़ी हद तक काल्पनिक रह जाती है।
कथन के विपक्ष में जो सच है:
4. 1989 के बाद कई सरकारों को सदन का विश्वास खोने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा, यानी नियंत्रण कागज़ी नहीं है।
5. बजट और धन विधेयक पर लोक सभा की मंज़ूरी के बिना सरकार एक रुपया खर्च नहीं कर सकती।
6. जनभावना की अभिव्यक्ति ही तो दबाव बनती है। 1998 और 2002 में इसी दबाव में सरकार को उर्वरक की बढ़ी क़ीमत वापस लेनी पड़ी।
निष्कर्ष: अभिव्यक्ति और नियंत्रण दो अलग काम नहीं हैं, एक दूसरे को ताक़त देता है।
5 संसद को कारगर बनाने के तीन प्रस्ताव
प्र. नीचे संसद को ज़्यादा कारगर बनाने के कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से प्रत्येक के साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें, और यह भी बताएँ कि इन सुझावों को मानने के क्या प्रभाव होंगे।
(क) संसद को अपेक्षाकृत ज़्यादा समय तक काम करना चाहिए।
(ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए।
(ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर सदस्य को दंडित कर सकें।
उत्तर:
(क) सहमत। पिछले दो दशकों में अधिवेशन और बहस, दोनों का समय घटा है। ज़्यादा समय मिलने से विधेयकों पर गहरी चर्चा हो सकेगी, प्रश्नकाल और शून्यकाल पूरे चल सकेंगे और जल्दबाज़ी में कानून पास कराने की गुंजाइश घटेगी। संभावित नुक़सान: सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए कम समय मिलेगा और सदन चलाने का खर्च बढ़ेगा।
(ख) सहमत, पर व्यावहारिक ढंग से। गणपूर्ति यानी कोरम का पूरा न होना आज एक असली समस्या है, और खाली सदन में लिया गया फ़ैसला कमज़ोर होता है। उपस्थिति अनिवार्य करने से चर्चा में भागीदारी बढ़ेगी। संभावित नुक़सान: सिर्फ़ हाज़िरी लगाने से चर्चा की गुणवत्ता अपने आप नहीं बढ़ती, और बीमारी या क्षेत्र के ज़रूरी काम की छूट रखनी ही पड़ेगी।
(ग) आंशिक सहमति। सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए अध्यक्ष के पास अनुशासन की शक्ति होनी चाहिए, और वह पहले से है। पर ख़तरा असली है: अध्यक्ष आम तौर पर बहुमत दल से आता है, इसलिए यह शक्ति विपक्ष की आवाज़ दबाने में इस्तेमाल हो सकती है। दलबदल कानून का अनुभव यही बताता है कि अध्यक्ष को दी गई अतिरिक्त शक्ति सदस्यों की स्वतंत्रता घटा देती है। इसलिए दंड के नियम पहले से तय, सबके लिए समान और सीमित होने चाहिए।
6 कानून बनाने में संसद की भूमिका
प्र. आरिफ यह जानना चाहता था कि अगर मंत्री ही अधिकांश महत्त्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करते हैं और बहुसंख्यक दल अकसर सरकारी विधेयक को पारित कर देता है, तो फिर कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है? आप आरिफ को क्या उत्तर देंगे?
उत्तर: आरिफ की बात आधी सही है, पर उसका निष्कर्ष ग़लत है। संसद की भूमिका ये रह जाती है:
1. मंज़ूरी अपने आप नहीं मिलती। कोई विधेयक संसद की मंज़ूरी के बिना कानून नहीं बन सकता, और वह मंज़ूरी सत्ताधारी दल, गठबंधन साथियों और विपक्ष के बीच कड़ी मोलभाव का नतीजा होती है।
2. दूसरा सदन असली रुकावट है। सरकार के पास लोक सभा में बहुमत हो और राज्य सभा में न हो, तो उसे बड़ी रियायतें देनी पड़ती हैं। 1977 में जनता पार्टी और 2000 में राजग के साथ यही हुआ, और 2002 का आतंकवाद निरोधक विधेयक राज्य सभा ने अस्वीकार कर दिया।
3. असली जाँच समितियों में होती है। विधेयक पर विस्तृत चर्चा संसदीय समिति में होती है, जिसमें सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है, और वहीं विधेयक में बदलाव होते हैं।
4. बहस जनता तक बात पहुँचाती है। सदन की चर्चा से देश को पता चलता है कि कानून किसलिए बन रहा है, और इसी दबाव में सरकार कई बार अपने प्रस्ताव वापस लेती है।
5. गठबंधन की मजबूरी। विधेयक को गठबंधन के सभी साथियों को स्वीकार्य होना पड़ता है, इसलिए बहुमत होते हुए भी मनमानी नहीं चलती।
इसीलिए पुस्तक कहती है कि कानून बनाना केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, एक राजनीतिक कार्रवाई भी है।
7 दलबदल पर तीन कथन
प्र. आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज़्यादा सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण दें।
(क) सांसद और विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए।
(ख) दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसदों और विधायकों पर बढ़ा है।
(ग) दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है और इस कारण जो विधायक या सांसद दूसरे दल में शामिल होना चाहता है, उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री-पद के अयोग्य करार कर दिया जाना चाहिए।
उत्तर: सबसे ज़्यादा सहमति कथन (ख) से है, क्योंकि यही वह बात है जिसे पुस्तक ख़ुद प्रमाण के साथ कहती है।
1. पुस्तक साफ़ लिखती है कि बीस वर्षों के अनुभव के बाद यह दिखता है कि दलबदल निरोधक कानून दलबदल रोकने में सफल नहीं हुआ, पर उसने दल के प्रधान नेताओं और सदन के अध्यक्षों को सदस्यों पर अतिरिक्त शक्ति दे दी।
2. अब सांसद को दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान करने पर सदस्यता खोनी पड़ सकती है, इसलिए वह अपने विवेक या अपने क्षेत्र की राय के बजाय दल की लाइन पर चलने को मजबूर है।
कथन (क) से असहमति: पूरी छूट दे दी जाए तो हर चुनाव के बाद खरीद-फ़रोख़्त शुरू हो जाएगी और जनता ने जिस दल को चुना, सरकार किसी और की बन जाएगी।
कथन (ग) से आंशिक असहमति: यह मान लेना कि दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है, ठीक नहीं। कभी-कभी सदस्य वैचारिक कारणों से भी दल छोड़ता है। दंड का प्रावधान ज़रूरी है, पर उसे हर मामले में एक जैसा मान लेना अन्यायपूर्ण होगा।
8 डॉली बनाम सुधा
प्र. डॉली और सुधा में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि मौजूदा वक़्त में संसद कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आई है, क्योंकि अब बहस पर समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा या वॉकआउट ज़्यादा होता है। सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारें धराशायी हुई हैं, यही उसकी जीवंतता है। आप सुधा या डॉली के तर्क के पक्ष या विपक्ष में और कौन-सा तर्क देंगे?
उत्तर:
डॉली के पक्ष में और तर्क:
1. नीति की पहल अब मंत्रिमंडल करता है, एजेंडा वही तय करता है और वही लागू करता है, इसीलिए आलोचक कहते हैं कि संसद का ह्रास हो गया।
2. विधेयक का मसौदा नौकरशाही बनाती है और मंत्रिमंडल की मंज़ूरी के बिना कोई बड़ा विधेयक आता ही नहीं, इसलिए संसद अक्सर मुहर लगाने तक सिमट जाती है।
3. गणपूर्ति तक पूरी नहीं होती और विपक्ष अधिवेशन का बहिष्कार कर देता है, जिससे चर्चा के ज़रिए नियंत्रण की शक्ति ही निष्क्रिय हो जाती है।
4. असली जाँच अब समितियों में होती है और संसद उनके सुझाव शायद ही कभी नामंज़ूर करती है।
सुधा के पक्ष में और तर्क:
5. कितना भी ताक़तवर मंत्रिमंडल हो, उसे लोक सभा में बहुमत बनाए रखना ही पड़ता है और नेता को संसद के सामने जवाब देना पड़ता है।
6. 1989 के बाद कई सरकारें गठबंधन साथियों का समर्थन खोकर गिरीं, यह सदन की असली ताक़त है।
7. 1998 और 2002 में सरकार को उर्वरक की बढ़ी क़ीमत वापस लेनी पड़ी, और 2002 में राज्य सभा ने आतंकवाद निरोधक विधेयक ठुकरा दिया।
8. हंगामा और वॉकआउट सिर्फ़ अव्यवस्था नहीं हैं, वे सरकार से रियायत लेने की राजनीतिक तकनीक भी हैं, और उन्हीं से जवाबदेही निकलती है।
संतुलित निष्कर्ष: दोनों आंशिक रूप से सही हैं। संसद की भूमिका बदली है, पर उसकी लोकतांत्रिक शक्ति ख़त्म नहीं हुई। कमी संस्था में कम और उसे चलाने के तरीक़े में ज़्यादा है।
9 विधेयक के कानून बनने का सही क्रम
प्र. किसी विधेयक को कानून बनने के क्रम में जिन अवस्थाओं से गुज़रना पड़ता है, उन्हें क्रमवार सजाएँ।
(क) किसी विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है।
(ख) विधेयक भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, बताएँ कि वह अगर इस पर हस्ताक्षर नहीं करते हैं तो क्या होता है।
(ग) विधेयक दूसरे सदन में भेजा जाता है और वहाँ इसे पारित कर दिया जाता है।
(घ) विधेयक का प्रस्ताव जिस सदन में हुआ है, उसमें यह विधेयक पारित होता है।
(ङ) विधेयक की हर धारा को पढ़ा जाता है और प्रत्येक धारा पर मतदान होता है।
(च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है, समिति उसमें कुछ फेर-बदल करती है और चर्चा के लिए सदन में भेज देती है।
(छ) संबद्ध मंत्री विधेयक की ज़रूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
(ज) विधि-मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।
उत्तर: सही क्रम इस प्रकार है:
1. (छ) संबद्ध मंत्री विधेयक की ज़रूरत के बारे में प्रस्ताव करता है।
2. (ज) विधि-मंत्रालय का कानून-विभाग विधेयक तैयार करता है।
3. (क) विधेयक पर चर्चा के लिए प्रस्ताव पारित किया जाता है, यानी विधेयक सदन में प्रस्तुत होता है।
4. (च) विधेयक उप-समिति के पास भेजा जाता है और समिति उसे बदलावों के साथ लौटाती है।
5. (ङ) विधेयक की हर धारा पढ़ी जाती है और हर धारा पर मतदान होता है।
6. (घ) जिस सदन में प्रस्ताव हुआ था, उसी में विधेयक पारित होता है।
7. (ग) विधेयक दूसरे सदन में जाता है और वहाँ पारित होता है।
8. (ख) विधेयक राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए जाता है।
राष्ट्रपति हस्ताक्षर न करें तो क्या होता है: राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को लौटा सकते हैं। अगर संसद उसे दोबारा पारित कर देती है, चाहे उसमें बदलाव करे या न करे, तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी ही पड़ती है और विधेयक कानून बन जाता है। धन विधेयक के मामले में राष्ट्रपति उसे लौटा नहीं सकते।
10 संसदीय समितियों का असर
प्र. संसदीय समिति की व्यवस्था से संसद के विधायी कामों के मूल्यांकन और देखरेख पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
अच्छा असर:
1. संसद केवल अधिवेशन के दौरान बैठती है और उसके पास समय बहुत कम है, इसलिए समितियों ने उसका कार्यभार काफ़ी हल्का कर दिया है।
2. विधेयकों की गहरी और तकनीकी जाँच अब समितियों में होती है, जो पूरे सदन में संभव नहीं थी।
3. मंत्रालयों की अनुदान माँगों का अध्ययन, विभागों के खर्च की जाँच और भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल भी यहीं होती है।
4. 1983 से बनी विभाग-संबंधी लगभग 20 स्थायी समितियाँ अपने-अपने विभाग के कामकाज, बजट, खर्च और विधेयकों की लगातार देखरेख करती हैं।
5. इनमें सभी संसदीय दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है, इसीलिए इन्हें लघु विधायिका कहा जाता है, और सत्ता-विपक्ष का तीखा टकराव यहाँ कम रहता है।
दूसरा पहलू:
6. असली फ़ैसला समितियों के हाथ खिसक जाता है। अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक समितियों को भेजे गए और संसद ने उनमें छिट-पुट बदलाव करके मंज़ूरी दे दी।
7. कानूनी रूप से संसद की मंज़ूरी के बिना न बजट पास होता है और न कोई विधेयक कानून बनता है, पर व्यवहार में संसद समितियों के सुझावों को शायद ही कभी नामंज़ूर करती है।
निष्कर्ष: समितियों ने मूल्यांकन और देखरेख को गहरा किया है, पर पूरे सदन की भूमिका उसी अनुपात में घटकर मुहर लगाने की ओर बढ़ी है।
11 पाठगत प्रश्न (अध्याय के बीच में पूछे गए प्रश्न)
अध्याय के हाशिये में, «कहाँ पहुँचे? क्या समझे?» वाले बक्सों में, कार्टूनों के साथ और «खुद करें, खुद सीखें» वाली गतिविधियों में भी कुछ प्रश्न पूछे गए हैं। ये प्रश्नावली का हिस्सा नहीं हैं, पर इनसे वही बातें परखी जाती हैं, इसलिए किताब के क्रम में हर एक का उत्तर यहाँ दिया गया है।
प्र. इन समाचारों पर विचार करें और यह सोचें कि यदि विधायिकाएँ न होतीं, तो क्या होता? प्रत्येक रिपोर्ट को पढ़ने के बाद बताएँ कि कैसे कार्यपालिका को नियंत्रित करने में विधायिका सफल या असफल रही। (समाचार: 28 फरवरी 2002 को खाद के दाम बढ़ाने का प्रस्ताव और 11 मार्च 2002 को उसकी वापसी; 4 जून 1998 को यूरिया और पेट्रोलियम के दाम बढ़ने पर विपक्ष का बहिर्गमन; 22 फरवरी 1983 को असम पर बहस के लिए लोक सभा का सरकारी काम-काज स्थगित करना; 3 मार्च 1985 को आंध्र प्रदेश में हरिजनों के उत्पीड़न पर कांग्रेस सदस्यों का विरोध।)
उत्तर: विधायिका न होती तो सरकार दाम बढ़ा सकती थी, किसी राज्य की हिंसा या कमज़ोर वर्गों पर अत्याचार को अनदेखा कर सकती थी, और कोई उससे जवाब माँगने वाला न होता। हर रिपोर्ट पर:
1. 28 फरवरी और 11 मार्च 2002: वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने 50 किलोग्राम यूरिया की बोरी की क़ीमत 12 रुपए बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, पर विपक्ष के ज़बरदस्त विरोध के कारण उन्हें यह वृद्धि वापस लेनी पड़ी। विधायिका सफल रही।
2. 4 जून 1998: यूरिया और पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ने पर पूरे विपक्ष ने सदन से बहिर्गमन किया, दो दिन तक सदन में गर्मा-गर्मी रही, और वित्त मंत्री यशवन्त सिन्हा को मूल्य वृद्धि के प्रस्ताव वापस लेने पड़े। विधायिका फिर सफल रही।
3. 22 फरवरी 1983: लोक सभा ने सर्वसम्मति से सरकारी काम-काज स्थगित करके असम पर बहस को प्राथमिकता दी, और गृहमंत्री ने सभी सदस्यों से सहयोग माँगा। यहाँ विधायिका ने बहस के ज़रिए एक राष्ट्रीय संकट पर सरकार को जवाबदेह बनाया, यह भी सफलता है।
4. 3 मार्च 1985: सत्ताधारी कांग्रेस के सदस्यों ने ही लोक सभा में आंध्र प्रदेश में हरिजनों के उत्पीड़न का विरोध किया। यानी सदन में सत्ता पक्ष के सदस्य भी कमज़ोर वर्गों की समस्याएँ उठाकर सरकार पर दबाव बनाते हैं।
हर मामले में सरकार के पास बहुमत था, फिर भी उसे सदन के सामने जवाब देना पड़ा। यही कार्यपालिका पर विधायिका का नियंत्रण है।
प्र. विभिन्न राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या का पता लगाएँ। एक चार्ट बनाकर 2011 की जनगणना के अनुसार प्रत्येक राज्य की जनसंख्या तथा उस राज्य से निर्वाचित राज्य सभा के सदस्यों की संख्या दिखाएँ।
कैसे करें: यह परियोजना कार्य है, चार्ट आपको ख़ुद बनाना है। हर राज्य की राज्य सभा सीटों की संख्या संविधान की चौथी अनुसूची से लें (अध्याय में दो संख्याएँ दी गई हैं: उत्तर प्रदेश 31 और सिक्किम 1) और जनसंख्या 2011 की जनगणना से। पहले स्तंभ में राज्य, दूसरे में सीटें और तीसरे में जनसंख्या लिखें। चार्ट बन जाने पर वह बात देखें जो अध्याय समझाता है: ज़्यादा आबादी वाले राज्य को ज़्यादा सीटें मिलती हैं, पर सीटें आबादी के बिल्कुल अनुपात में नहीं हैं, ताकि छोटे राज्यों को भी कुछ प्रतिनिधित्व मिले। अमेरिका में ठीक उल्टा है, वहाँ सीनेट में हर राज्य को बराबर सीटें मिलती हैं।
प्र. मुझे समझ में नहीं आता कि खिलाड़ी, कलाकार और वैज्ञानिकों को मनोनीत करने का प्रावधान क्यों है? वे किसका प्रतिनिधित्व करते हैं? और क्या वे वास्तव में राज्य सभा की कार्यवाही में कुछ खास योगदान दे पाते हैं?
उत्तर: राज्य सभा के 12 मनोनीत सदस्य किसी राज्य या मतदाताओं के किसी समूह का प्रतिनिधित्व नहीं करते। राष्ट्रपति उन्हें उन लोगों में से मनोनीत करते हैं जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष उपलब्धि हासिल की हो। मक़सद यह है कि जो लोग चुनाव की राजनीति में नहीं उतरते, उनका विशेष ज्ञान भी संसद तक पहुँचे। पूर्णिमा बनर्जी ने भी संविधान सभा में यही कहा था कि जो लोग सक्रिय राजनीति की उठा-पटक से दूर हैं, वे निचले सदन को सलाह दे सकते हैं। उनका योगदान व्यक्ति पर निर्भर करता है: कुछ मनोनीत सदस्यों ने अपने विषयों पर अक्सर और अच्छा बोला है, जबकि कुछ बहुत कम उपस्थित रहे या कम बोले। यानी सिद्धांत में यह प्रावधान उपयोगी है, पर व्यवहार में इसका मूल्य इस पर निर्भर है कि मनोनीत सदस्य कितनी सक्रियता से भाग लेते हैं।
प्र. (i) क्या आप मानते हैं कि राज्य सभा की संरचना ने भारत में राज्यों की स्थिति को संरक्षित किया है?
(ii) क्या राज्य सभा के चुनाव अप्रत्यक्ष न होकर प्रत्यक्ष होने चाहिए? इससे क्या फायदा या नुकसान होगा?
(iii) 1971 की जनगणना से लोक सभा में सीटों की संख्या नहीं बढ़ी है। क्या आप मानते हैं कि इसे बढ़ाना चाहिए? इसके लिए क्या आधार होना चाहिए?
उत्तर:
(i) आंशिक रूप से। राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है, राज्यों को प्रभावित करने वाला हर मामला उसकी सहमति के लिए भेजा जाता है, और राज्य सूची का कोई विषय उसकी स्वीकृति के बिना संघ सूची या समवर्ती सूची में नहीं जा सकता। पर अध्याय ख़ुद कहता है कि अनुभव के अनुसार राज्य सभा के सदस्य अपने राज्य से ज़्यादा अपने दल का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए व्यवहार में यह संरक्षण काग़ज़ से कमज़ोर है।
(ii) प्रत्यक्ष चुनाव के फायदे: सदस्य सीधे राज्य की जनता के प्रति जवाबदेह होंगे और सदन का लोकतांत्रिक वज़न बढ़ेगा। नुकसान: राज्य सभा लोक सभा की नक़ल बन जाएगी, दोनों सदन एक ही जनादेश का दावा करेंगे और उनके बीच गतिरोध बढ़ सकता है, और सदन राज्यों के प्रतिनिधि का अपना चरित्र खो देगा। कुल मिलाकर, राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदन के लिए विधायकों के ज़रिए अप्रत्यक्ष चुनाव ही ठीक है।
(iii) सीटें बढ़ाने के पक्ष में तर्क है, क्योंकि 1971 के बाद आबादी बहुत बढ़ी है और अब एक सांसद कहीं ज़्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। आधार जनसंख्या होनी चाहिए, ताकि हर वोट का मूल्य सब निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग बराबर रहे। साथ ही, जिन राज्यों ने अपनी जनसंख्या-वृद्धि पर नियंत्रण किया, उनकी सीटों का हिस्सा कम नहीं होना चाहिए, इसलिए सीटें बढ़ाते समय जनसंख्या और राज्यों के प्रति न्याय, दोनों का संतुलन ज़रूरी है।
प्र. राज्य सभा सरकार की आलोचना तो कर सकती है पर उसे हटा नहीं सकती। क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा क्यों?
उत्तर: क्योंकि राज्य सभा को जनता नहीं बल्कि विधायक चुनते हैं। संविधान द्वारा अपनाई गई लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम शक्ति जनता के पास है, इसलिए सरकार को हटाने और वित्त पर नियंत्रण जैसी निर्णायक शक्तियाँ जनता द्वारा सीधे चुने गए प्रतिनिधियों, यानी लोक सभा, को दी गईं। इसी कारण मंत्रिपरिषद् केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, राज्य सभा के प्रति नहीं।
प्र. कानून बनाने की विधि के अध्ययन के बाद, क्या आपको लगता है कि संसद विधेयकों पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय दे सकती है? यदि नहीं, तो इस समस्या के समाधान के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
उत्तर: पूरी तरह नहीं। संसद केवल अधिवेशन के दौरान बैठती है और उसके पास समय बहुत सीमित है, पिछले दो दशकों में अधिवेशन और बहस का समय घटा है, और गणपूर्ति का अभाव तथा बहिष्कार और समय बर्बाद करते हैं। सुझाव: (1) हर महत्त्वपूर्ण विधेयक समिति को भेजा जाए, क्योंकि समितियाँ उसका गहरा अध्ययन कर सकती हैं; (2) अधिवेशन लंबे और नियमित हों; (3) कार्यवाही में बाधा कम हो, ताकि उपलब्ध समय बहस में लगे; (4) विधेयक और समिति की रिपोर्ट सदस्यों को पहले से मिलें, ताकि सदन में चर्चा तैयारी के साथ हो।
प्र. इतने सारे ‘स्टिंग ऑपरेशनों’ के बाद क्या मंत्री अब भी कहीं भी कुछ भी बोलने को स्वतंत्र हैं?
उत्तर: नहीं। संसदीय विशेषाधिकार का अर्थ इतना ही है कि सदन में कही गई किसी बात के लिए किसी सदस्य के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। यह सुरक्षा सदन के भीतर बोलने के लिए है, ताकि सदस्य बिना डर के जनता का प्रतिनिधित्व कर सकें और कार्यपालिका पर नियंत्रण रख सकें। यह कहीं भी कुछ भी बोलने या करने की छूट नहीं है: सदन के बाहर कही गई बात या किया गया काम आम कानून के दायरे में आता है, और ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में पकड़ी गई बातें इसी दायरे में जाँची जाती हैं। सदन के भीतर भी विशेषाधिकार के हनन के मामलों में अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होता है।
प्र. दूरदर्शन पर संसद के ‘आँखों देखे प्रसारण’ को तीन दिन तक लगातार देखिए। या इस संबंध में समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों को तीन दिनों तक एकत्र करें। इससे एक वालपेपर/पोस्टर तैयार करें। ऐसा करने में उन मुद्दों पर ध्यान दें जिन पर बहस हुई, अध्यक्ष की क्या भूमिका रही, कैसे प्रश्न पूछे गए, राजनीतिक दलों तथा आपके निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि की क्या भूमिका रही, वाद-विवाद में उठे मुद्दों की प्रकृति कैसी थी, क्या वे सभी राष्ट्रीय थे या क्षेत्रीय?
कैसे करें: हर दिन के लिए एक स्तंभ बनाएँ। उसमें लिखें: उस दिन उठे मुख्य मुद्दे, अध्यक्ष (राज्य सभा में सभापति) ने व्यवस्था कैसे बनाए रखी, प्रश्नकाल के दो-तीन प्रश्न और किस मंत्री ने उत्तर दिया, बोलने वाले सदस्यों के दल, और आपके क्षेत्र के प्रतिनिधि ने क्या उठाया। अंत में मुद्दों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय में बाँटें। पोस्टर में वे कार्य दिखने चाहिए जो इस अध्याय में बताए गए हैं: प्रश्नों के ज़रिए कार्यपालिका पर नियंत्रण, बहस का कार्य और अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व।
प्र. सरकार से विरोध दर्ज कराने का एक आम तरीका है सदन से ‘वाकआउट’ करना, क्या यह काम ज़रूरत से ज़्यादा हुआ है?
उत्तर: कुछ हद तक हाँ। वाकआउट एक जायज़ राजनीतिक तरीका है, और अध्याय भी मानता है कि ऐसे कई काम सरकार से रियायत लेने की राजनीतिक तकनीक होते हैं जिनसे कार्यपालिका की जवाबदेही बनती है। पर जब बहिर्गमन और बहिष्कार रोज़ की बात बन जाएँ, तो सदन वाद-विवाद के ज़रिए कार्यपालिका को नियंत्रित करने की अपनी शक्ति ही खो देता है, विधायी समय बर्बाद होता है और विधेयक विपक्ष की जाँच के बिना पारित हो जाते हैं। वाकआउट कड़े विरोध का कभी-कभार का संकेत होना चाहिए, बहस का नियमित विकल्प नहीं।
प्र. अच्छा! तो कानून बनाने वालों पर भी कुछ कानून लागू होते हैं?
उत्तर: हाँ। संसद की कार्यवाही सुचारु और अनुशासित ढंग से चले, इसके लिए संविधान में ही प्रावधान बनाए गए हैं, और सदन का अध्यक्ष विधायिका की कार्यवाही के मामले में सर्वोच्च अधिकारी होता है। सदस्यों के व्यवहार पर नियंत्रण का एक और साधन दलबदल निरोधक कानून (52वाँ संविधान संशोधन, 1985) है: दलबदल साबित होने पर सदस्य की सदन की सदस्यता चली जाती है और वह मंत्री जैसे किसी राजनीतिक पद के लिए भी अयोग्य हो जाता है। यानी कानून बनाने वाले भी नियमों से बँधे हैं।
प्र. इन सदस्यों ने ‘वाकआउट’ नहीं किया है। इन्हें अध्यक्ष ने बाहर निकाला है। क्या ऐसी स्थिति अकसर आती है?
उत्तर: ऐसी स्थिति तब आती है जब सदस्य सदन के नियम तोड़ते हैं, जैसे शोर मचाना, सदन के बीचोंबीच आ जाना या कार्यवाही चलने न देना। अध्यक्ष कार्यवाही का सर्वोच्च अधिकारी है, और बहस को सार्थक, अनुशासित तथा सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए वह ऐसे सदस्यों को बाहर निकाल सकता है। संवेदनशील मुद्दों पर जब बहस गरम हो जाती है और सदस्य बाधा डालने को राजनीतिक तरीके की तरह इस्तेमाल करते हैं, तब ऐसी स्थितियाँ ज़्यादा आती हैं।
प्र. मुझे समझ में नहीं आता कि नेता अपना दल क्यों बदलते हैं? क्या वे कभी अपनी उस पार्टी में लौट कर आते भी हैं जो उन्होंने छोड़ी थी?
उत्तर: नेता कभी अपने दल से असहमति के कारण, कभी मंत्री-पद जैसे लाभ के लिए और कभी निजी स्वार्थ के लिए दल बदलते हैं। इसी कारण दलबदल निरोधक कानून (52वाँ संशोधन, 1985) उस सदस्य को अयोग्य करता है जो स्वेच्छा से दल छोड़ दे, दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान करे या आदेश के बावजूद सदन में उपस्थित न हो। हाँ, कई नेता बाद में उसी दल में लौट भी आते हैं जिसे उन्होंने छोड़ा था, जो दिखाता है कि दलबदल अक्सर सिद्धांत से ज़्यादा पद और मोलभाव से जुड़ा होता है। अध्याय का निष्कर्ष है कि यह कानून दलबदल रोकने में सफल नहीं हुआ, पर इसने दल के नेताओं और सदन के अध्यक्षों को सदस्यों पर अतिरिक्त शक्ति दे दी।