कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली (FPTP) क्या है?

उत्तर: वह प्रणाली जिसमें देश को कई निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा जाता है, हर क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है, और सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला प्रत्याशी विजयी घोषित होता है, बहुमत ज़रूरी नहीं।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. समानुपातिक प्रतिनिधित्व (PR) प्रणाली क्या है?

उत्तर: वह प्रणाली जिसमें हर पार्टी को विधायिका में उतने ही प्रतिशत सीटें मिलती हैं जितना उसे वोट का प्रतिशत मिला है। मतदाता पार्टी को वोट देता है, उम्मीदवार को नहीं।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. पृथक निर्वाचन-मंडल किसे कहते हैं?

उत्तर: वह व्यवस्था जिसमें किसी समुदाय के प्रतिनिधि को सिर्फ़ उसी समुदाय के मतदाता चुनते थे। संविधान सभा ने इसे अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. परिसीमन आयोग क्या काम करता है?

उत्तर: यह राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र संस्था है, जो देश भर में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ तय करती है और यह भी तय करती है कि कौन-सी सीट किस समुदाय के लिए आरक्षित होगी।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि देश के सभी वयस्क नागरिकों को मत देने का अधिकार है, चाहे उनकी शिक्षा, संपत्ति, जाति या लिंग कुछ भी हो।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. अनुच्छेद 324 किस बारे में है?

उत्तर: अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधायिकाओं तथा राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों की मतदाता-सूची, अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी निर्वाचन आयोग को सौंपता है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. नारी शक्ति वंदन अधिनियम किस वर्ष पारित हुआ और यह क्या करता है?

उत्तर: यह 2023 में पारित हुआ और लोक सभा तथा विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीट-आरक्षण का प्रावधान करता है।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल क्या है?

उत्तर: मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होता है।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. 1984 के लोक सभा चुनाव का उदाहरण देकर बताइए कि FPTP में वोट और सीट का अनुपात कैसे बिगड़ सकता है।

उत्तर: 1984 में कांग्रेस को कुल वोटों का सिर्फ़ 48 प्रतिशत मिला, फिर भी उसने 543 में से 415 सीटें (80 प्रतिशत से ज़्यादा) जीत लीं। इसके उलट भाजपा को 7.4 प्रतिशत वोट मिले पर सिर्फ़ 2 सीटें। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि FPTP में हर क्षेत्र में सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला ही जीतता है, हारने वालों के वोट बेकार चले जाते हैं।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. राज्य सभा में सीट जीतने के लिए कोटा कैसे निकाला जाता है? एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: कोटा = (कुल पड़े वोट / (कुल चुने जाने वाले सदस्य + 1)) + 1। उदाहरण के लिए अगर 200 विधायकों को 4 राज्य सभा सदस्य चुनने हैं, तो कोटा = (200/5) + 1 = 41 वोट होगा।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र में क्या अंतर है?

उत्तर: पृथक निर्वाचन-मंडल में किसी समुदाय के प्रतिनिधि को केवल उसी समुदाय के मतदाता चुनते थे। आरक्षित चुनाव-क्षेत्र में क्षेत्र के सभी मतदाता वोट डाल सकते हैं, पर उम्मीदवार सिर्फ़ आरक्षित समुदाय से ही हो सकता है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. परिसीमन आयोग ST और SC सीटें तय करते समय अलग-अलग तरीक़ा क्यों अपनाता है?

उत्तर: ST सीटें उन क्षेत्रों में आरक्षित होती हैं जहाँ ST आबादी सबसे ज़्यादा हो। पर SC आबादी आम तौर पर पूरे राज्य में समान रूप से फैली होती है, इसलिए SC सीटों को ज़्यादा आबादी वाले क्षेत्रों में रखते हुए भी राज्य के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया जाता है।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. निर्वाचन आयोग एक-सदस्यीय से बहु-सदस्यीय कैसे बना?

उत्तर: 1989 के आम चुनाव से पहले पहली बार दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए, पर चुनाव के बाद आयोग फिर एक-सदस्यीय हो गया। 1993 में दोबारा दो आयुक्त नियुक्त हुए और तब से आयोग स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय है।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने की प्रक्रिया बाक़ी चुनाव आयुक्तों से कैसे अलग है?

उत्तर: CEC को हटाने के लिए दोनों सदनों को विशेष बहुमत से सिफ़ारिश करनी पड़ती है, ठीक वैसे ही जैसे राष्ट्रपति पर महाभियोग में होता है। जबकि बाक़ी चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति सीधे हटा सकते हैं।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. चुनाव लड़ने के अधिकार पर कौन-सी दो शर्तें लागू होती हैं?

उत्तर: 1. उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 25 वर्ष होनी चाहिए (लोक सभा या विधानसभा चुनाव के लिए)।
2. जिस व्यक्ति को किसी अपराध में 2 वर्ष या उससे अधिक की सज़ा हुई हो, वह चुनाव लड़ने के अयोग्य है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. इज़राइल की चुनाव प्रणाली की दो ख़ास बातें बताइए।

उत्तर: 1. इज़राइल में पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है और हर 4 साल में चुनाव होते हैं।
2. किसी पार्टी को सीट पाने के लिए न्यूनतम 3.25 प्रतिशत वोट चाहिए, जिससे छोटी पार्टियों को भी प्रतिनिधित्व मिल जाता है और अक्सर गठबंधन सरकार बनती है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. FPTP और PR प्रणाली में कोई चार अंतर लिखिए।

उत्तर: 1. निर्वाचन क्षेत्र: FPTP में छोटे भौगोलिक क्षेत्र होते हैं, PR में बड़े क्षेत्र या पूरा देश एक क्षेत्र हो सकता है।
2. वोट किसे: FPTP में मतदाता उम्मीदवार को वोट देता है, PR में पार्टी को।
3. सीट-वोट अनुपात: FPTP में पार्टी को वोट से ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं, PR में हर पार्टी को वोट के अनुपात में ही सीटें मिलती हैं।
4. बहुमत: FPTP में विजेता को बहुमत मिलना ज़रूरी नहीं, PR में विजेता को वोटों का बहुमत मिलता है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. भारत ने FPTP प्रणाली क्यों अपनाई? कोई चार कारण दीजिए।

उत्तर: 1. सादगी: FPTP आम मतदाता को भी आसानी से समझ आती है।
2. साफ़ पसंद: मतदाता पार्टी और उम्मीदवार दोनों के आधार पर चुनाव कर सकता है।
3. जवाबदेही: हर क्षेत्र का अपना एक ही प्रतिनिधि होता है, जिसे जवाबदेह ठहराया जा सकता है, PR में यह साफ़ नहीं होता।
4. स्थिर सरकार: संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका को स्पष्ट बहुमत चाहिए, PR में सीटें बँट जाने से यह मुश्किल हो सकता है। विविध भारत में PR हर समुदाय को अपनी अलग पार्टी बनाने के लिए भी उकसा सकता था।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. आरक्षित चुनाव-क्षेत्रों की व्यवस्था क्यों ज़रूरी समझी गई? SC-ST आरक्षण के आँकड़े भी दीजिए।

उत्तर: 1. FPTP में सामाजिक रूप से दबदबे वाले समूह हर जगह जीत सकते हैं, वंचित समूह अनदेखे रह सकते हैं।
2. भारत में जाति-आधारित भेदभाव का लंबा इतिहास इस समस्या को और गंभीर बनाता है।
3. इसलिए संविधान ने लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में SC-ST के लिए सीटें आरक्षित कीं, शुरू में 10 वर्ष के लिए, जिसे अब 2030 तक बढ़ाया जा चुका है।
4. आज 543 लोक सभा सीटों में से 84 SC के लिए और 47 ST के लिए आरक्षित हैं।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. निर्वाचन आयोग की चार प्रमुख शक्तियाँ/कार्य समझाइए।

उत्तर: 1. मतदाता-सूची: अद्यतन और त्रुटि-रहित मतदाता-सूची तैयार कराना।
2. चुनाव कार्यक्रम: अधिसूचना, नामांकन, वापसी, मतदान और गिनती की तारीख़ें तय करना।
3. निष्पक्षता की रक्षा: चुनाव टालना या रद्द करना, पुनर्मतदान या पुनर्गणना का आदेश देना, और आदर्श आचार-संहिता लागू करना।
4. दलों की मान्यता: राजनीतिक दलों को मान्यता देना और चुनाव-चिह्न आवंटित करना।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल क्यों उठते हैं, और इसे और मज़बूत बनाने के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं?

उत्तर: 1. CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह पर करते हैं, इसलिए सत्ताधारी दल अपने पक्ष वाले व्यक्ति को नियुक्त कर सकता है, यह आशंका बनी रहती है।
2. इस आशंका को दूर करने के लिए सुझाव दिया गया है कि नियुक्ति में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश से परामर्श अनिवार्य किया जाए।
3. फिर भी संविधान CEC को हटाने के लिए विशेष बहुमत की शर्त रखकर उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करता है, ताकि सत्ताधारी दल आसानी से उसे न हटा सके।
4. पिछले 25 वर्षों में निर्वाचन आयोग पहले से ज़्यादा मुखर हुआ है, यह इसकी शक्तियाँ बढ़ने से नहीं बल्कि पहले से मौजूद शक्तियों के बेहतर इस्तेमाल से हुआ है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. चुनाव सुधार के लिए दिए गए कोई चार सुझाव लिखिए।

उत्तर: 1. FPTP से हटकर समानुपातिक प्रतिनिधित्व के किसी रूप की ओर जाना।
2. संसद और विधानसभाओं में कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए तय करना।
3. चुनाव में पैसे की भूमिका पर सख़्त नियंत्रण, चुनाव का ख़र्च सरकार एक विशेष कोष से उठाए।
4. आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों पर रोक, भले ही अपील अदालत में लंबित हो; जाति और धार्मिक अपील पर पूरी पाबंदी।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. निर्वाचन आयोग को दो कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है, वे कौन-सी थीं और आयोग ने क्या किया?

उत्तर: 1. 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हो गई, जिससे चुनाव प्रक्रिया को बीच में रोकना पड़ा।
2. 2002 में गुजरात विधानसभा भंग होने पर हिंसा के माहौल के चलते निर्वाचन आयोग ने चुनाव कुछ महीनों के लिए टाल दिए।
3. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग के इस फ़ैसले को सही ठहराया, यह दिखाता है कि आयोग के पास स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव टालने की शक्ति भी है और उसे इस्तेमाल करने का साहस भी।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. राज्य सभा के चुनाव में एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (STV) कैसे काम करती है, पूरी प्रक्रिया एक उदाहरण के साथ समझाइए।

उत्तर: 1. यह भी समानुपातिक प्रतिनिधित्व (PR) का ही एक रूप है, जिससे राज्य सभा के सदस्य चुने जाते हैं।
2. हर राज्य की एक तय कोटा सीट है, और मतदाता संबंधित राज्य के विधायक होते हैं।
3. हर विधायक उम्मीदवारों को वरीयता क्रम में रैंक करता है।
4. जीतने के लिए ज़रूरी न्यूनतम वोटों का कोटा एक फ़ॉर्मूले से तय होता है: कोटा = (कुल वोट / (सीटें+1)) + 1। उदाहरण के लिए 200 विधायकों से 4 सीटें भरनी हों तो कोटा = (200/5)+1 = 41 वोट।
5. पहले हर उम्मीदवार की पहली वरीयता के वोट गिने जाते हैं। जिसे कोटा मिल जाए, वह निर्वाचित घोषित हो जाता है।
6. अगर ज़रूरी संख्या में उम्मीदवार निर्वाचित न हों, तो सबसे कम वोट वाले उम्मीदवार को हटाकर उसके वोट दूसरी वरीयता वाले उम्मीदवारों को ट्रांसफ़र कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक ज़रूरी संख्या में उम्मीदवार निर्वाचित न हो जाएँ।
7. भारत ने राज्य सभा जैसे सीमित मामलों में ही यह जटिल प्रणाली अपनाई, क्योंकि यह पूरे देश के लिए, ख़ासकर बड़े जनसंख्या वाले देश में, चलाना मुश्किल होता।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. पृथक निर्वाचन-मंडल की व्यवस्था क्या थी, संविधान सभा ने इसे क्यों अस्वीकार किया, और इसकी जगह क्या अपनाया गया?

उत्तर: 1. आज़ादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने पृथक निर्वाचन-मंडल की व्यवस्था शुरू की थी, जिसमें किसी समुदाय के प्रतिनिधि को सिर्फ़ उसी समुदाय के मतदाता चुनते थे।
2. संविधान सभा में इसका तीखा विरोध हुआ। तजम्मुल हुसैन ने कहा कि यह भारत के लिए अभिशाप रहा है और इससे देश को बेहिसाब नुक़सान हुआ है।
3. डर यह था कि इससे समुदाय राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाएँगे, न कि उसमें घुल-मिल पाएँगे।
4. इसकी जगह आरक्षित चुनाव-क्षेत्र की व्यवस्था अपनाई गई, जिसमें क्षेत्र के सभी मतदाता वोट देते हैं, पर उम्मीदवार सिर्फ़ आरक्षित समुदाय से होना चाहिए।
5. जयपाल सिंह ने आदिवासियों की तरफ़ से इसी व्यवस्था का समर्थन किया, यह बताते हुए कि 1935 के अधिनियम में कुल 1585 विधायकों में सिर्फ़ 24 आदिवासी थे, और केंद्र में एक भी नहीं।
6. इसी सोच से आज लोक सभा और विधानसभाओं में SC-ST के लिए 84+47 सीटें आरक्षित हैं, और परिसीमन आयोग यह तय करता है कि कौन-सी सीट किसके लिए आरक्षित होगी।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. भारत की चुनाव-व्यवस्था की सफलता किन बातों से आँकी जा सकती है? पाँच बिंदुओं में समझाइए।

उत्तर: 1. मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि चुनने के साथ-साथ राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर सरकारें शांतिपूर्ण ढंग से बदलने की आज़ादी मिली है।
2. मतदाताओं ने लगातार चुनाव प्रक्रिया में गहरी दिलचस्पी ली है, उम्मीदवारों और दलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
3. व्यवस्था समावेशी साबित हुई है, प्रतिनिधियों की सामाजिक पृष्ठभूमि बदली है, हालाँकि महिला प्रतिनिधियों की संख्या अभी संतोषजनक नहीं।
4. ज़्यादातर हिस्सों में चुनाव नतीजे धाँधली से सीधे प्रभावित नहीं होते, भले ही ऐसी कोशिशें होती रहें।
5. चुनाव अब लोकतांत्रिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं, कोई सरकार जनादेश की अनदेखी की कल्पना तक नहीं कर सकती। इन्हीं वजहों से मतदाता का आत्मविश्वास और निर्वाचन आयोग का कद, दोनों बढ़े हैं।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और उसकी शक्तियों को विस्तार से समझाइए, उदाहरण सहित।

उत्तर: 1. अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी देता है, सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या का समर्थन किया है।
2. आयोग 1993 से स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय है, और सभी फ़ैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं ताकि किसी एक व्यक्ति के पास ज़्यादा शक्ति न हो।
3. CEC और आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक सुरक्षित है, और CEC को हटाने के लिए विशेष बहुमत चाहिए, जो सत्ताधारी दल के लिए आसान नहीं।
4. आयोग के पास मतदाता-सूची तैयार करने, चुनाव कार्यक्रम तय करने, आदर्श आचार-संहिता लागू करने और चुनाव टालने या रद्द करने जैसी व्यापक शक्तियाँ हैं।
5. उदाहरण: 1991 में राजीव गांधी की हत्या पर चुनाव प्रक्रिया रोकना, और 2002 में गुजरात हिंसा के कारण चुनाव टालना, दोनों दिखाते हैं कि आयोग निष्पक्ष चुनाव के लिए कड़े फ़ैसले लेने से नहीं हिचकता।
6. फिर भी नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठते रहते हैं क्योंकि नियुक्ति मंत्रिपरिषद् की सलाह पर होती है, इसलिए विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश से परामर्श अनिवार्य करने के सुझाव आते रहे हैं।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
किसी भी चुनाव प्रणाली की असली परीक्षा यही है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष हो। भारत में मुसलमानों की आबादी लगभग 14.2 प्रतिशत है, पर लोक सभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या आम तौर पर 6 प्रतिशत से भी कम रही है, यानी उनकी आबादी में हिस्से से आधे से भी कम। ज़्यादातर राज्य विधानसभाओं में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। इस तथ्य पर तीन छात्रों ने अलग-अलग निष्कर्ष निकाले। हिलाल का कहना था कि यह FPTP प्रणाली की नाइंसाफ़ी दिखाता है, हमें PR प्रणाली अपनानी चाहिए। आरिफ़ का कहना था कि यह SC-ST को आरक्षण देने की समझदारी दिखाता है, मुसलमानों के लिए भी वैसा ही आरक्षण होना चाहिए। सबा का कहना था कि मुसलमानों की बात समूचे रूप में करने से कोई फ़ायदा नहीं, मुस्लिम महिलाओं को किसी भी प्रणाली में हिस्सा नहीं मिलने वाला, उनके लिए अलग कोटा चाहिए।

(क) 1 अंक भारत में मुस्लिम आबादी और लोक सभा में मुस्लिम सांसदों का अनुपात गद्यांश के अनुसार कैसा है?
उत्तर: मुस्लिम आबादी लगभग 14.2 प्रतिशत है, पर लोक सभा में मुस्लिम सांसद आमतौर पर 6 प्रतिशत से कम रहे हैं, यानी आधे से भी कम।

(ख) 2 अंक हिलाल के तर्क का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: हिलाल का तर्क आंशिक रूप से सही है, PR प्रणाली में वोट के अनुपात में सीटें मिलतीं, तो शायद प्रतिनिधित्व बेहतर होता। पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि PR अपनाने से भारत में स्थिर संसदीय सरकार बनाना मुश्किल हो सकता था, और सिर्फ़ चुनाव प्रणाली बदलने से मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना या न देना, दलों के अपने रवैये पर भी निर्भर करता है।

(ग) 3 अंक आरिफ़ और सबा, दोनों के तर्कों की तुलना करते हुए अपना मत दीजिए।
उत्तर: आरिफ़ का तर्क SC-ST आरक्षण की तरह मुसलमानों के लिए भी सीधा आरक्षण माँगता है, पर संविधान धार्मिक आधार पर ऐसा आरक्षण नहीं देता, यह पृथक निर्वाचन-मंडल जैसी व्यवस्था के क़रीब चला जाता है जिसे संविधान सभा ने ही ठुकराया था। सबा का तर्क ज़्यादा बारीक है, वह दिखाती है कि ‘मुसलमान’ जैसे बड़े समूह के भीतर भी महिलाओं जैसी छोटी उप-श्रेणी का हिस्सा अलग हो सकता है, और किसी एक व्यापक श्रेणी के आधार पर उपाय सुझाना सबकी ज़रूरतें पूरी नहीं करता। सही समाधान संभवतः तीनों नज़रियों को मिलाकर बनता है: बेहतर प्रतिनिधित्व के उपाय खोजना, पर धार्मिक आरक्षण के बजाय पार्टी टिकट-वितरण और महिला भागीदारी बढ़ाने वाले सुधारों पर ज़्यादा ज़ोर देना।

केस स्टडी
1984 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 543 में से 415 सीटें मिलीं, यानी 80 प्रतिशत से ज़्यादा। पर उसे कुल वोटों का सिर्फ़ 48 प्रतिशत ही मिला था। भाजपा को 7.4 प्रतिशत वोट मिले, पर एक प्रतिशत से भी कम सीटें। यह इसलिए हुआ क्योंकि हमारे देश में सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली अपनाई जाती है, जिसमें देश को 543 निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा जाता है, हर क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है, और सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला प्रत्याशी विजयी घोषित हो जाता है।

(क) 1 अंक 1984 में कांग्रेस को कितने प्रतिशत वोट और कितनी सीटें मिलीं?
उत्तर: 48 प्रतिशत वोट और 543 में से 415 सीटें (80 प्रतिशत से ज़्यादा)।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार वोट और सीट के इस असंतुलन का कारण क्या है?
उत्तर: FPTP प्रणाली में हर निर्वाचन क्षेत्र से सिर्फ़ एक प्रतिनिधि चुना जाता है, और सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला जीत जाता है, भले ही उसे आधे से कम वोट मिले हों। इसलिए हारने वाले सभी उम्मीदवारों को मिले वोट बेकार चले जाते हैं, और जीतने वाली पार्टी को उसके वोट-प्रतिशत से कहीं ज़्यादा सीटें मिल जाती हैं।

(ग) 3 अंक अगर भारत ने इसकी जगह समानुपातिक प्रतिनिधित्व (PR) प्रणाली अपनाई होती, तो 1984 के नतीजे कैसे अलग होते, और इसके क्या फ़ायदे व नुक़सान होते?
उत्तर: PR प्रणाली में कांग्रेस को सिर्फ़ 48 प्रतिशत सीटें ही मिलतीं, जो 543 का लगभग आधा होता, यानी उसे लोक सभा में बहुमत के लिए भी संघर्ष करना पड़ता। फ़ायदा यह होता कि हर पार्टी को उसके असली जनसमर्थन के बराबर सीटें मिलतीं, जो ज़्यादा निष्पक्ष लगता है। पर नुक़सान यह होता कि इतने बड़े और विविध देश में शायद किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलता, जिससे स्थिर संसदीय सरकार बनाना मुश्किल हो जाता, ठीक वैसे ही जैसे इज़राइल में अक्सर गठबंधन सरकारें बननी पड़ती हैं।