कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 6 न्यायपालिका के नोट्स (Judiciary Notes) हिंदी में

अध्याय का नक्शा : पूरा चैप्टर एक नज़र में
1 · न्यायपालिका क्यों ज़रूरी?विधि का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका की ज़रूरत
2 · न्यायपालिका की स्वतंत्रतातीन अर्थ, स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के उपाय
3 · न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटानामुख्य न्यायाधीश की परंपरा, वी- रामास्वामी मामला
4 · न्यायपालिका की संरचनाएकीकृत न्याय-व्यवस्था, पिरामिड ढाँचा
न्यायपालिका
5 · सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकारमौलिक, रिट, अपीली, परामर्शदायी और विशेष शक्तियाँ
6 · न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिकाशुरुआती मुक़दमे, सकारात्मक-नकारात्मक असर
7 · न्यायपालिका, अधिकार और न्यायिक पुनरावलोकनरिट शक्ति और पुनरावलोकन शक्ति
8 · न्यायपालिका और संसदमूल ढाँचा सिद्धांत, केशवानंद भारती मुक़दमा, निष्कर्ष
विधि का शासनन्यायपालिका की स्वतंत्रताजनहित याचिकान्यायिक सक्रियतामूल ढाँचान्यायिक पुनरावलोकनकेशवानंद भारतीअनुच्छेद 32अनुच्छेद 226

1 न्यायपालिका क्यों ज़रूरी?

अक्सर अदालतों को सिर्फ़ व्यक्तियों के बीच झगड़े सुलझाने वाली संस्था माना जाता है। पर न्यायपालिका इससे कहीं ज़्यादा काम करती है, यह सरकार का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय दुनिया की सबसे शक्तिशाली अदालतों में से एक है। 1950 से ही न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करने और उसकी रक्षा करने में अहम भूमिका निभाती आई है।

किसी भी समाज में व्यक्तियों के बीच, समूहों के बीच, और व्यक्ति या समूह और सरकार के बीच झगड़े होना स्वाभाविक है। इन सभी झगड़ों को विधि के शासन (rule of law) के सिद्धांत के अनुसार एक स्वतंत्र संस्था द्वारा सुलझाया जाना चाहिए। विधि के शासन का मतलब है कि सभी व्यक्ति, चाहे अमीर हों या ग़रीब, पुरुष हों या महिला, अगड़ी जाति के हों या पिछड़ी जाति के, एक ही क़ानून के अधीन हों।

रट लेंपरिभाषा 1

न्यायपालिका की मुख्य भूमिका विधि के शासन की रक्षा करना और क़ानून की सर्वोच्चता सुनिश्चित करना है। यह व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करती है, क़ानून के अनुसार झगड़े सुलझाती है, और यह सुनिश्चित करती है कि लोकतंत्र किसी व्यक्ति या समूह की तानाशाही में न बदल जाए।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय भवन, नई दिल्ली
चित्र 1 · भारत का सर्वोच्च न्यायालय दुनिया की सबसे शक्तिशाली अदालतों में से एक है, इसके पास मौलिक, रिट, अपीली और परामर्शदायी, चारों तरह के क्षेत्राधिकार हैं। फ़ोटो: Pinakpani / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0.

2 न्यायपालिका की स्वतंत्रता

2.1 स्वतंत्रता का मतलब क्या है

  • कार्यपालिका और विधायिका जैसे बाक़ी अंग न्यायपालिका के काम में इस तरह बाधा न डालें कि वह न्याय ही न कर पाए
  • बाक़ी अंग न्यायपालिका के फ़ैसलों में हस्तक्षेप न करें
  • न्यायाधीश बिना किसी डर या पक्षपात के अपना काम कर सकें
परीक्षा संकेत

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब मनमानी या जवाबदेही का अभाव नहीं है। न्यायपालिका लोकतांत्रिक राजनीतिक ढाँचे का ही हिस्सा है, इसलिए वह संविधान, लोकतांत्रिक परंपराओं और देश की जनता के प्रति जवाबदेह है।

2.2 स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के चार उपाय

  • नियुक्ति में विधायिका शामिल नहीं: इससी धारणा थी कि इससे नियुक्तियों में दलगत राजनीति नहीं आएगी; न्यायाधीश बनने के लिए वकील का अनुभव और/या क़ानून की गहरी समझ ज़रूरी है, राजनीतिक विचार या निष्ठा नहीं
  • तय कार्यकाल: न्यायाधीश सेवानिवृत्ति की उम्र तक पद पर रहते हैं; सिर्फ़ असाधारण स्थितियों में ही हटाए जा सकते हैं, यानी उन्हें कार्यकाल की सुरक्षा प्राप्त है
  • वित्तीय स्वतंत्रता: न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते विधायिका की स्वीकृति के अधीन नहीं हैं
  • आलोचना से सुरक्षा: न्यायाधीशों के काम और फ़ैसलों पर व्यक्तिगत आलोचना नहीं की जा सकती; अदालत की अवमानना पर सज़ा देने की शक्ति इसी सुरक्षा का हिस्सा है; संसद न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं कर सकती, सिवाय उन्हें हटाने की प्रक्रिया के दौरान

3 न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाना

न्यायाधीशों की नियुक्ति कभी भी राजनीतिक विवाद से मुक्त नहीं रही, यह ख़ुद राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है, क्योंकि न्यायाधीशों की राजनीतिक सोच का असर क़ानूनों की व्याख्या पर पड़ता है।

मुख्य न्यायाधीश की परंपरा दो बार टूटी

वर्षों से यह परंपरा रही थी कि सर्वोच्च न्यायालय का सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश ही मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनता था। यह परंपरा दो बार तोड़ी गई: 1973 में ए- एन- रे को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को पीछे छोड़कर CJI नियुक्त किया गया, और 1975 में एम- एच- बेग को एच- आर- खन्ना को पीछे छोड़कर नियुक्त किया गया।

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के बाक़ी न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश से “परामर्श” करके होती है। व्यवहार में इसका मतलब यह हुआ कि नियुक्ति का अंतिम फ़ैसला मंत्रिपरिषद् के पास ही रहता था। 1982 से 1998 के बीच यह मामला बार-बार सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया: पहले अदालत ने माना कि मुख्य न्यायाधीश की भूमिका सिर्फ़ सलाहकारी है, फिर यह माना कि राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश की सलाह माननी ही होगी, और आख़िरकार अदालत ने एक नई प्रक्रिया सुझाई: मुख्य न्यायाधीश अपने साथ चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की सलाह से नाम प्रस्तावित करेंगे। इस तरह नियुक्ति में वरिष्ठ न्यायाधीशों के समूह की राय ही सबसे ज़्यादा मायने रखने लगी।

परीक्षा संकेत

न्यायाधीशों के इस समूह-आधारित सुझाव-तंत्र को आम बोलचाल में “कॉलेजियम प्रणाली” कहा जाता है, पर ध्यान रहे कि किताब में यह शब्द कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ है, किताब सिर्फ़ “वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समूह” कहती है।

3.1 न्यायाधीशों को हटाना

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाना भी बेहद कठिन है। किसी न्यायाधीश को केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है। हटाने वाला प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए।

न्यायाधीश को हटाने की इकलौती कोशिश : वी- रामास्वामी मामला

1991 में पहली बार किसी सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव 108 सांसदों ने रखा। न्यायमूर्ति वी- रामास्वामी पर आरोप था कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने धन का दुरुपयोग किया। 1992 में एक जाँच आयोग ने उन्हें “पद के जान-बूझकर और घोर दुरुपयोग तथा नैतिक पतन” का दोषी पाया। इतने कठोर आरोपों के बावजूद, प्रस्ताव को उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत तो मिल गया, पर कांग्रेस पार्टी ने मतदान से दूरी बना ली, जिससे प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे का समर्थन नहीं मिल सका, और रामास्वामी हटाए नहीं जा सके।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि नियुक्ति में कार्यपालिका की अहम भूमिका है, जबकि हटाने की शक्ति विधायिका के पास है। इसी बँटवारे ने शक्तियों में संतुलन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता, दोनों बनाए रखे हैं।

4 न्यायपालिका की संरचना

भारत का संविधान एक एकल एकीकृत न्याय-व्यवस्था की व्यवस्था करता है। इसका मतलब है कि, दुनिया के कुछ अन्य संघीय देशों के विपरीत, भारत में अलग-अलग राज्यों की अलग अदालतें नहीं हैं। भारत की न्यायपालिका पिरामिड जैसी है, सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय, उसके नीचे उच्च न्यायालय, और सबसे नीचे ज़िला व अधीनस्थ अदालतें। निचली अदालतें ऊपर की अदालतों की सीधी निगरानी में काम करती हैं।

चित्र 2 · भारत की न्यायपालिका पिरामिड ढाँचे में है, ऊपर से नीचे तक अपील जाती है, और निचली अदालतें ऊपर की अदालतों की निगरानी में काम करती हैं।
चित्र 2 · भारत की न्यायपालिका पिरामिड ढाँचे में है, ऊपर से नीचे तक अपील जाती है, और निचली अदालतें ऊपर की अदालतों की निगरानी में काम करती हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय: इसके फ़ैसले सभी अदालतों पर बाध्यकारी; उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का तबादला कर सकता है; किसी भी अदालत से मुक़दमा अपने पास मँगा सकता है; एक उच्च न्यायालय से दूसरे में मुक़दमा भेज सकता है
  • उच्च न्यायालय: निचली अदालतों से अपील सुन सकता है; मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए रिट जारी कर सकता है; राज्य के अधिकार-क्षेत्र में मुक़दमे सुनता है; अपने से नीचे की अदालतों पर निगरानी और नियंत्रण रखता है
  • ज़िला न्यायालय: ज़िले में उठने वाले मुक़दमे देखता है; निचली अदालतों के फ़ैसलों पर अपील सुनता है; गंभीर आपराधिक मामलों का फ़ैसला करता है

5 सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

5.1 चार तरह का क्षेत्राधिकार

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
मौलिकसंघ और राज्यों के बीच, या राज्यों के आपसी झगड़े सीधे सुलझाता है
अपीलीनिचली अदालतों के दीवानी, फ़ौजदारी और संवैधानिक मुक़दमों की अपील सुनता है
परामर्शदायीसार्वजनिक महत्व और क़ानून के मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देता है
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मौलिक क्षेत्राधिकार का मतलब है कि कुछ मुक़दमों की सुनवाई पहले किसी निचली अदालत में जाए बिना सीधे सर्वोच्च न्यायालय में होती है। संघ-राज्य संबंधों के झगड़ों में सर्वोच्च न्यायालय पंच (umpire) की भूमिका निभाता है, न तो उच्च न्यायालय और न ही निचली अदालतें ऐसे मामले सुन सकती हैं।

रिट क्षेत्राधिकार: जिस भी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन हुआ हो, वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), निषेध आदेश (Prohibition), उत्प्रेषण (Certiorari) और अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) जैसी रिट जारी कर सकता है। उच्च न्यायालय भी रिट जारी कर सकते हैं, पीड़ित व्यक्ति के पास उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय, दोनों में से किसी को चुनने का विकल्प है।

अपीली क्षेत्राधिकार: सर्वोच्च न्यायालय अपील की सबसे ऊँची अदालत है। उच्च न्यायालय को यह प्रमाणित करना होगा कि मुक़दमा अपील के योग्य है, यानी उसमें क़ानून या संविधान की व्याख्या का गंभीर सवाल शामिल हो। फ़ौजदारी मामलों में अगर निचली अदालत ने मृत्युदंड दिया हो, तो उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय, दोनों में अपील की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय की अनुमति न होने पर भी अपील स्वीकार कर सकता है, और मामले की दोबारा सुनवाई कर पुराने फ़ैसले को बदल भी सकता है।

परामर्शदायी क्षेत्राधिकार: राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व या संविधान की व्याख्या से जुड़ा कोई भी मामला सर्वोच्च न्यायालय के पास सलाह के लिए भेज सकता है। पर न तो सर्वोच्च न्यायालय सलाह देने के लिए बाध्य है, न ही राष्ट्रपति उस सलाह को मानने के लिए बाध्य है। इसकी उपयोगिता दो तरह से है: पहला, किसी क़दम से पहले क़ानूनी राय मिल जाने से आगे की मुक़दमेबाज़ी टल सकती है; दूसरा, सरकार सलाह के आधार पर अपनी कार्रवाई या क़ानून में उचित बदलाव कर सकती है।

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अनुच्छेद 137: सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही किसी निर्णय या आदेश पर पुनर्विचार करने की शक्ति है। अनुच्छेद 144: भारत के क्षेत्र की सभी सिविल और न्यायिक संस्थाओं को सर्वोच्च न्यायालय की सहायता में काम करना होगा। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय किसी भी अदालत के किसी भी फ़ैसले पर विशेष अनुमति से अपील स्वीकार कर सकता है।

6 न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका

न्यायिक सक्रियता का सबसे बड़ा माध्यम है जनहित याचिका (Public Interest Litigation, PIL), इसे सामाजिक कार्रवाई याचिका (SAL) भी कहा जाता है। सामान्यतः कोई व्यक्ति तभी अदालत जा सकता था जब उसे ख़ुद नुक़सान पहुँचा हो। यह धारणा 1979 के आसपास बदली, जब अदालत ने एक ऐसा मुक़दमा सुनने का फ़ैसला किया जो पीड़ित व्यक्ति ने ख़ुद नहीं, बल्कि किसी और ने उसकी ओर से दाख़िल किया था। इसी दौर में सर्वोच्च न्यायालय ने क़ैदियों के अधिकारों का मामला भी उठाया।

दो शुरुआती जनहित याचिकाएँ

1. 1979, हुसैनारा खातून बनाम बिहार सरकार: समाचारों में बिहार की जेलों में बंद ‘विचाराधीन क़ैदियों’ की ख़बर छपी, जो अपनी सज़ा से भी ज़्यादा समय जेल में काट चुके थे। इस ख़बर से प्रेरित होकर एक वकील ने याचिका दाख़िल की, जो शुरुआती जनहित याचिकाओं में से एक बनी।
2. 1980, सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन: तिहाड़ जेल के एक क़ैदी ने न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर को यातना के बारे में लिखी एक पर्ची भिजवाई, जिसे न्यायाधीश ने याचिका में बदल दिया। बाद में अदालत ने पत्रों के आधार पर सुनवाई की प्रथा बंद कर दी, पर यह मामला अग्रणी जनहित याचिकाओं में गिना जाता है।

जनहित याचिकाओं ने अधिकारों के दायरे को बढ़ाया, स्वच्छ हवा, प्रदूषण-मुक्त पानी और सम्मानजनक जीवन जैसे अधिकार पूरे समाज के अधिकार माने जाने लगे। 1980 के बाद इसने उन वर्गों के अधिकारों को भी अदालत तक पहुँचाया जो ख़ुद अदालत तक नहीं पहुँच पाते, सामाजिक संगठनों और वकीलों को उनकी ओर से याचिका दाख़िल करने की अनुमति मिली।

“यह बात ज़रूर याद रहे कि ग़रीबों की समस्याएँ ऐसे लोगों की समस्याओं से गुणात्मक रूप से अलग हैं जिन पर अब तक अदालत का ध्यान रहा है। ग़रीबों के प्रति इंसाफ़ का अलग नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है। यदि हम ग़रीबों के मामले में आँख मूँदकर इंसाफ़ की कोई प्रतिकूल प्रक्रिया अपनाते हैं, तो वे कभी भी अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।”

न्यायमूर्ति भगवती, बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत सरकार, 1984

6.1 न्यायिक सक्रियता का असर : दो पहलू

न्यायिक सक्रियता का सकारात्मक असर

  • व्यक्तियों के साथ-साथ समूहों को भी अदालत तक पहुँच मिली
  • कार्यपालिका की जवाबदेही बढ़ी
  • चुनाव लड़ने वालों को संपत्ति-आय-शिक्षा का शपथ-पत्र देना अनिवार्य हुआ, चुनाव निष्पक्ष बने

नकारात्मक असर

  • अदालतों पर काम का बोझ बहुत बढ़ गया
  • कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच की सीमा धुँधली हुई
  • प्रदूषण-भ्रष्टाचार-चुनाव-सुधार जैसे मामलों में अदालत का दख़ल, जो असल में कार्यपालिका/विधायिका का काम है
परीक्षा संकेत

दुनिया के कई देशों में अब जनहित याचिका को अपनाया जा रहा है। दक्षिण अफ़्रीका के संविधान ने तो जनहित याचिका को अपने अधिकार-पत्र (bill of rights) में ही शामिल कर लिया है, वहाँ किसी और के अधिकार-हनन का मामला संवैधानिक न्यायालय में लाना नागरिक का मौलिक अधिकार है।

7 न्यायपालिका, अधिकार और न्यायिक पुनरावलोकन

संविधान अधिकार-हनन को ठीक करने के दो रास्ते देता है: पहला, सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसी रिट जारी करके मौलिक अधिकार बहाल कर सकता है (उच्च न्यायालय के पास यही शक्ति अनुच्छेद 226 के तहत है); दूसरा, सर्वोच्च न्यायालय संबंधित क़ानून को अनुच्छेद 13 के तहत असंवैधानिक और अप्रभावी घोषित कर सकता है।

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न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) सर्वोच्च न्यायालय (या उच्च न्यायालय) की वह शक्ति है जिससे वह किसी क़ानून की संवैधानिकता जाँचता है, और अगर वह क़ानून संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध पाया जाए तो उसे असंवैधानिक और अप्रभावी घोषित कर देता है। यह शब्द संविधान में कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ, पर भारत के लिखित संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की क़ानून रद्द करने की शक्ति से यह अप्रत्यक्ष रूप से हासिल है।

यह पुनरावलोकन शक्ति संघीय झगड़ों में भी लागू होती है, अगर कोई क़ानून संविधान द्वारा तय शक्तियों के बँटवारे के विरुद्ध हो, जैसे केंद्र किसी राज्य-सूची के विषय पर क़ानून बना दे, तो राज्य सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं, और अदालत सहमत हो तो उस क़ानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। यह शक्ति राज्य विधानसभाओं के बनाए क़ानूनों पर भी लागू होती है। रिट शक्ति और पुनरावलोकन शक्ति, दोनों मिलकर न्यायपालिका को बेहद शक्तिशाली बनाती हैं।

8 न्यायपालिका और संसद

संपत्ति के अधिकार को लेकर संसद और न्यायपालिका के बीच टकराव हुआ। भूमि-सुधार लागू करने के लिए संसद संपत्ति के अधिकार पर पाबंदी लगाना चाहती थी। अदालत ने कहा कि संसद इस तरह मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती। संसद ने फिर संविधान में संशोधन करने की कोशिश की, पर अदालत ने कहा कि संशोधन के ज़रिए भी किसी मौलिक अधिकार को कम नहीं किया जा सकता।

  • निजी संपत्ति के अधिकार का दायरा क्या है?
  • संसद की मौलिक अधिकार सीमित/संकुचित/समाप्त करने की शक्ति का दायरा क्या है?
  • संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति का दायरा क्या है?
  • क्या संसद नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करते हुए मौलिक अधिकारों को सीमित करने वाला क़ानून बना सकती है?

“जहाँ न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने की ज़रूरत पर कोई दो राय नहीं हो सकती, वहीं हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत को भी याद रखना ज़रूरी है। स्वतंत्रता के सिद्धांत को उस स्तर तक नहीं ले जाया जाना चाहिए जहाँ वह आस्था का स्थान ले ले। अन्यथा न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के काम भी अपने हाथ में ले लेने वाली एक अतिवादी संस्था की तरह काम करने लगेगी। न्यायपालिका का काम संविधान की व्याख्या करना या अधिकारों के बारे में चल रहे विवादों को हल करना है।”

अलादि कृष्णास्वामी अय्यर, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 837, 23 नवंबर 1949

1967 से 1973 के बीच यह टकराव बहुत गंभीर हो गया, भूमि-सुधार, निवारक निरोध, नौकरियों में आरक्षण और निजी संपत्ति के अधिग्रहण व मुआवज़े से जुड़े क़ानून इसके केंद्र में रहे।

केशवानंद भारती मुक़दमा, 1973

1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा फ़ैसला दिया जिसने संसद और न्यायपालिका के रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया। अदालत ने कहा कि संविधान का एक मूल ढाँचा है, जिसे संसद संशोधन के ज़रिए भी नहीं बदल सकती। साथ ही अदालत ने दो और बातें कहीं: पहला, संपत्ति का अधिकार (विवाद का मुद्दा) मूल ढाँचे का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे उचित रूप से सीमित किया जा सकता है; दूसरा, यह तय करने का अधिकार भी अदालत ने अपने पास रखा कि कौन-सी बातें मूल ढाँचे का हिस्सा हैं।

1979 में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया, जिससे इस टकराव की प्रकृति ही बदल गई। फिर भी कुछ सवाल अनसुलझे हैं: क्या न्यायपालिका विधायिका के अंदरूनी कामकाज (जैसे विशेषाधिकार-हनन पर सदस्य को दंड देना) में दख़ल दे सकती है? संविधान यह भी कहता है कि संसद न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं कर सकती। दोनों तरफ़ से एक-दूसरे की आलोचना होती रही है, विधायिका इसे संसदीय सर्वोच्चता का उल्लंघन मानती है।

आख़िरी दोहराव
  • न्यायपालिका विधि के शासन की रक्षक है; स्वतंत्रता का मतलब जवाबदेही का अभाव नहीं
  • मुख्य न्यायाधीश की परंपरा दो बार टूटी (1973 ए- एन- रे, 1975 एम- एच- बेग), वी- रामास्वामी अकेला हटाने का मामला जो संसद तक पहुँचा पर विफल रहा
  • पिरामिड ढाँचा: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, ज़िला और अधीनस्थ अदालतें
  • सर्वोच्च न्यायालय के चार क्षेत्राधिकार: मौलिक, रिट, अपीली, परामर्शदायी; अनुच्छेद 137 और 144
  • हुसैनारा खातून (1979) और सुनील बत्रा (1980), शुरुआती जनहित याचिकाएँ; न्यायिक सक्रियता के दोनों पहलू याद रखें
  • न्यायिक पुनरावलोकन शब्द संविधान में नहीं, पर शक्ति निहित है; केशवानंद भारती (1973) ने मूल ढाँचा सिद्धांत दिया
  • न्यायपालिका और संसद के बीच संतुलन नाज़ुक है, दोनों संविधान की सीमाओं के भीतर काम करते हैं
परीक्षा से पहले ख़ुद को जाँचें
  • क्या मुझे न्यायपालिका की स्वतंत्रता के तीनों अर्थ और चार उपाय याद हैं?
  • क्या मैं सर्वोच्च न्यायालय के चारों क्षेत्राधिकार उदाहरण सहित समझा सकता हूँ?
  • क्या मुझे दोनों शुरुआती जनहित याचिकाएँ नाम-तारीख़ सहित याद हैं?
  • क्या मैं केशवानंद भारती मुक़दमे की तीनों बातें अलग-अलग बता सकता हूँ?
  • क्या मुझे वी- रामास्वामी मामले के सही आँकड़े याद हैं?
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