- जलवायु वर्गीकरण के तीन तरीके, और कोपेन की पद्धति ही सबसे ज़्यादा क्यों इस्तेमाल होती है
- कोपेन के कूट-अक्षर कैसे पढ़ें, ताकि “Aw” या “BSh” देखते ही जलवायु समझ आ जाए
- पाँचों जलवायु समूहों और उनके चौदह प्रकारों की मुख्य विशेषताएँ और विश्व के क्षेत्र
- जलवायु परिवर्तन एक पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया क्यों है, चट्टानों, पेड़ों और इतिहास के सबूतों के साथ
- जलवायु परिवर्तन के खगोलीय और पार्थिव कारण
- ग्रीनहाउस प्रभाव असल में क्या है, और यह भूमंडलीय ऊष्मन तथा क्योटो प्रोटोकॉल से कैसे जुड़ा है
1कोपेन की जलवायु वर्गीकरण पद्धति
दुनिया में जलवायु की बहुत बड़ी विविधता है। इन्हें समझने के लिए भूगोलवेत्ता पहले इन्हें समूहों में बाँटते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई लाइब्रेरियन किताब ढूँढने से पहले उन्हें अलमारियों में बाँट देता है। इस बँटवारे को जलवायु वर्गीकरण कहते हैं, और इसे करने के एक से ज़्यादा तरीके हैं।
1.1 जलवायु वर्गीकरण के तीन बड़े तरीके
आनुभविक
वास्तव में देखे गए आँकड़ों पर आधारित, मुख्यतः तापमान और वर्षा के असली रिकॉर्ड पर। कोपेन ने यही तरीका अपनाया।
जननिक
जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने की कोशिश करता है, जैसे वायु राशियाँ या दाब पेटियाँ जो उस जलवायु को जन्म देती हैं।
अनुप्रयुक्त
किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाया जाता है, जैसे खेती या भवन-निर्माण के हिसाब से जलवायु का वर्गीकरण।
एक बहुत आम एक अंक का सवाल पूछता है कि कोपेन की पद्धति किस तरह की है। जवाब हमेशा आनुभविक होता है, जननिक या अनुप्रयुक्त कभी नहीं, क्योंकि यह पूरी तरह असली तापमान-वर्षा के आँकड़ों से बनी है।
1.2 कोपेन की पद्धति
दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला जलवायु वर्गीकरण वी. कोपेन ने बनाया था। उन्होंने एक काम की बात पकड़ी: किसी जगह पर उगने वाले पौधों का प्रकार वहाँ की जलवायु से गहरा जुड़ा होता है। इसीलिए उन्होंने नए सिरे से जलवायु की सीमाएँ बनाने की बजाय, तापमान और वर्षा के कुछ खास मान चुने, इन्हें असल में वहाँ उगने वाली वनस्पति से मिलाया, और इन्हीं मिलते-जुलते मानों से अपने जलवायु प्रकार तय किए।
कोपेन का वर्गीकरण मध्यमान वार्षिक और मध्यमान मासिक तापमान तथा वर्षण के आँकड़ों पर आधारित एक आनुभविक जलवायु वर्गीकरण पद्धति है, जिसे वी. कोपेन ने 1918 में बनाया था और जो समय-समय पर संशोधित होकर आज भी इस्तेमाल होती है।
कोपेन ने एक आसान संकेत-पद्धति बनाई: बड़े जलवायु समूहों के लिए बड़े अक्षर, और हर समूह के अंदर के बारीक प्रकारों के लिए छोटे अक्षर। उन्होंने पाँच प्रमुख समूह तय किए, इनमें से चार तापमान पर और एक वर्षण पर आधारित है।
| अक्षर | समूह | पहचान की शर्त |
|---|---|---|
| A | उष्णकटिबंधीय | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C या उससे ज़्यादा |
| B | शुष्क जलवायु | विभव वाष्पीकरण, वर्षण से ज़्यादा |
| C | कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय) | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान 18°C से कम पर −3°C से ज़्यादा |
| D | शीतल हिम-वन | सबसे ठंडे महीने का औसत तापमान −3°C या उससे नीचे |
| E | शीत जलवायु | सभी महीनों का औसत तापमान 10°C से कम |
यह सारणी शब्द-दर-शब्द याद रखें, यह लगभग हर साल 4-5 अंकों के सवाल में पूछी जाती है। याद रखें: A, C, D, E आर्द्र जलवायु हैं; सिर्फ़ B शुष्क है।
1.3 छोटे अक्षर एक प्रकार कैसे बनाते हैं
हर बड़े अक्षर वाला समूह वर्षा और तापमान के मौसमी बदलाव के आधार पर आगे प्रकारों में बँटता है, जिन्हें छोटे अक्षरों से दिखाया जाता है।
| छोटा अक्षर | मतलब |
|---|---|
| f | कोई शुष्क ऋतु नहीं |
| m | मानसूनी जलवायु |
| w | जाड़े की शुष्क ऋतु |
| s | ग्रीष्म की शुष्क ऋतु |
एक अलग सेट के छोटे अक्षर, a, b, c, d, तापमान की उग्रता दिखाते हैं, जो मुख्यतः C और D समूहों के साथ इस्तेमाल होते हैं। B समूह अलग तरीके से बँटता है, इसमें बड़े अक्षर इस्तेमाल होते हैं: S स्टेपी (अर्ध-शुष्क) के लिए और W असली मरुस्थल के लिए।
बड़ा अक्षर = कौन-सा समूह। छोटा अक्षर = समूह के अंदर कौन-सा प्रकार।
जैसे “Cfa” में बड़ा अक्षर C समूह बताता है (कोष्ण शीतोष्ण), और छोटे अक्षर f तथा a प्रकार बताते हैं (कोई शुष्क ऋतु नहीं, गर्म ग्रीष्म)।
1.4 कोपेन के सभी जलवायु प्रकार
| समूह | प्रकार | कूट | विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| A: उष्णकटिबंधीय आर्द्र | उष्णकटिबंधीय आर्द्र | Af | कोई शुष्क ऋतु नहीं |
| उष्णकटिबंधीय मानसून | Am | मानसूनी, छोटी शुष्क ऋतु | |
| उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क | Aw | जाड़े की शुष्क ऋतु | |
| B: शुष्क जलवायु | उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी | BSh | निम्न-अक्षांशीय अर्ध-शुष्क या शुष्क |
| उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल | BWh | निम्न-अक्षांशीय शुष्क | |
| मध्य-अक्षांशीय स्टेपी | BSk | मध्य-अक्षांशीय अर्ध-शुष्क या शुष्क | |
| मध्य-अक्षांशीय मरुस्थल | BWk | मध्य-अक्षांशीय शुष्क | |
| C: कोष्ण शीतोष्ण | आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय | Cfa | कोई शुष्क ऋतु नहीं, गर्म ग्रीष्म |
| भूमध्यसागरीय | Cs | शुष्क, गर्म ग्रीष्म | |
| समुद्री पश्चिम तटीय | Cfb | कोई शुष्क ऋतु नहीं, गर्म और ठंडी ग्रीष्म | |
| D: शीतल हिम-वन | आर्द्र महाद्वीपीय | Df | कोई शुष्क ऋतु नहीं, भीषण जाड़ा |
| उप-ध्रुवीय | Dw | जाड़ा शुष्क और अत्यंत भीषण | |
| E: शीत जलवायु | टुंड्रा | ET | सही अर्थों में कोई ग्रीष्म नहीं |
| ध्रुवीय हिमटोपी | EF | सदैव हिमाच्छादित |
इसे याद करने के लिए विश्व का रंगीन मानचित्र बनाने की कोशिश न करें, परीक्षा में इसकी माँग नहीं होती और हाथ से बना मानचित्र आसानी से ग़लत हो जाता है। हर प्रकार को उसके कूट-अक्षर, एक पंक्ति की विशेषता और दो-तीन असली क्षेत्रों से याद करें, ठीक जैसे नीचे दिया गया है।
2समूह ।: उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु
उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच पाई जाती है। सूर्य लगभग साल भर सिर के ऊपर रहता है, और अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) इसी पट्टी पर टिका रहता है, दोनों मिलकर जलवायु को गर्म और आर्द्र बना देते हैं। वार्षिक तापांतर बहुत कम रहता है, और वार्षिक वर्षा ज़्यादा होती है। यह समूह तीन प्रकारों में बँटता है।
ITCZ (अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र) विषुवत् वृत्त के पास वह पट्टी है जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की पवनें आपस में मिलती हैं, जिससे हवा ऊपर उठती है और भारी वर्षा होती है।
2.1 समूह A के तीन प्रकार
| प्रकार | वर्षा और तापमान | वनस्पति | कहाँ पाई जाती है |
|---|---|---|---|
| Af उष्णकटिबंधीय आर्द्र |
हर महीने वर्षा, दोपहर बाद गरज के साथ बौछारें; तापमान समान रूप से ऊँचा (दिन का अधिकतम ~30°C, न्यूनतम ~20°C), वार्षिक तापांतर लगभग शून्य | सघन, अत्यधिक जैव-विविधता वाला उष्णकटिबंधीय सदाहरित वन | अमेज़न बेसिन, पश्चिमी विषुवतीय अफ्रीका, पूर्वी द्वीप समूह (ईस्ट इंडीज़) |
| Am उष्णकटिबंधीय मानसून |
भारी वर्षा मुख्यतः गर्मियों में, जाड़ा शुष्क, सिर्फ़ छोटी शुष्क ऋतु | भारत की अपनी विस्तृत जलवायु इसी प्रकार की है, इसका पूरा विवरण भारत: भौतिक पर्यावरण किताब में है | भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण अमेरिका का उत्तर-पूर्वी भाग, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया |
| Aw उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क |
वर्षा Af/Am से कम और अनियमित; आर्द्र ऋतु छोटी, शुष्क ऋतु लंबी और भीषण; तापमान साल भर ऊँचा, शुष्क ऋतु में दैनिक तापांतर सबसे ज़्यादा | पर्णपाती वन, पेड़ों से ढकी घासभूमि | ब्राज़ील में अमेज़न वन के उत्तर-दक्षिण, बोलिविया-पैरागुए से सटे इलाके; सूडान और मध्य अफ्रीका का दक्षिणी भाग |
Aw जलवायु महाद्वीप के पश्चिमी हिस्से में शुष्क (B) जलवायु से और पूर्वी हिस्से में Cf या Cw जलवायु से घिरी रहती है।
3समूह ठ: शुष्क जलवायु
शुष्क जलवायु की पहचान बहुत कम वर्षा है, इतनी कम कि सामान्य पौधों की वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं होती। यह क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा जलवायु समूह है, जो विषुवत् वृत्त के उत्तर-दक्षिण 15° से 60° अक्षांश तक फैला है, पर हर जगह इसकी वजह अलग है।
3.0 शुष्क जलवायु कहाँ और क्यों बनती है
निम्न अक्षांश, 15°-30°
उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब पेटी में आते हैं, जहाँ हवा का अवतलन और तापमान का उत्क्रमण वर्षा बनने ही नहीं देते।
ठंडी धाराओं के पास पश्चिमी तट
ख़ासकर दक्षिण अमेरिका का पश्चिमी तट, यहाँ शुष्क जलवायु विषुवत् वृत्त की ओर ज़्यादा फैलकर तट तक पहुँच जाती है।
मध्य अक्षांश, 35°-60°
महाद्वीपों के भीतरी हिस्सों तक सीमित, जहाँ नमी लाने वाली पवनें पहुँच ही नहीं पातीं, अक्सर पहाड़ों से घिरे भी होते हैं।
शुष्क जलवायु पहले स्टेपी या अर्ध-शुष्क (BS) और मरुस्थल (BW) में बँटती है, और फिर हर एक उपोष्ण कटिबंधीय (h) और मध्य-अक्षांशीय (k) रूप में।
3.1 शुष्क जलवायु के चार प्रकार
उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी (BSh) और उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल (BWh)
15° और 35° अक्षांश के बीच पाई जाती है, आर्द्र और शुष्क जलवायु के बीच संक्रमण क्षेत्र में। दोनों की वर्षा और तापमान की विशेषताएँ मिलती-जुलती हैं, पर स्टेपी को मरुस्थल से थोड़ी ज़्यादा वर्षा मिलती है, इतनी कि विरल घासभूमि उग सके, मरुस्थल में इतनी भी नहीं। दोनों जगह वर्षा बहुत अनियमित रहती है, और यह अनियमितता मरुस्थल से ज़्यादा स्टेपी के जीवन को प्रभावित करती है, कई बार अकाल तक की स्थिति बन जाती है। मरुस्थल में जब वर्षा होती है तो गरज के साथ छोटी तेज़ बौछारों के रूप में होती है, जो मिट्टी में नमी बनाने में कारगर नहीं होती। ठंडी धाराओं से सटे तटीय मरूस्थलों में कोहरा आम बात है। ग्रीष्म ऋतु का अधिकतम तापमान बहुत ऊँचा होता है, अब तक दर्ज सबसे ऊँचा छाया तापमान, 58°C, लीबिया के अल-अज़ीज़िया में 13 सितंबर 1922 को दर्ज हुआ था। वार्षिक और दैनिक तापांतर दोनों ही ज़्यादा रहते हैं।
मध्य-अक्षांशीय स्टेपी (BSk) और मध्य-अक्षांशीय मरुस्थल (BWk)
35° और 60° अक्षांश के बीच, महाद्वीपों के भीतरी हिस्सों में पाई जाती है, जहाँ समुद्र की नमी पहुँच ही नहीं पाती। ये BS/BW का वही बँटवारा दोहराते हैं जो उपोष्ण कटिबंधीय जोड़ी में है, पर विषुवत् वृत्त से कहीं ज़्यादा दूर, बड़े स्थल-भाग के भीतर स्थित हैं।
4समूह ब्: कोष्ण शीतोष्ण (मध्य अक्षांशीय) जलवायु
यह जलवायु 30° और 50° अक्षांश के बीच, मुख्यतः महाद्वीपों के पूर्वी और पश्चिमी सीमांतों पर फैली है। सामान्यतः ग्रीष्म ऋतु गर्म और जाड़ा मृदुल रहता है। इस समूह के चार प्रकार हैं।
4.1 समूह C के चार प्रकार
| प्रकार | तापमान और वर्षा | कहाँ पाई जाती है |
|---|---|---|
| Cwa आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय |
कर्क-मकर रेखा से ध्रुवों की ओर; Aw जैसी ही है, बस जाड़े में ठंड की बजाय गर्मी रहती है | भारत के उत्तरी मैदान, दक्षिणी चीन के भीतरी मैदान |
| Cs भूमध्यसागरीय |
ग्रीष्म में उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब, जाड़े में पछुआ पवनें: गर्म शुष्क ग्रीष्म (~25°C), मृदु वर्षायुक्त जाड़ा (10°C से कम); वार्षिक वर्षा 35-90 से.मी. | मध्य कैलिफ़ोर्निया, मध्य चिली, दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का तट |
| Cfa आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय |
अस्थिर वायु राशियाँ, साल भर वर्षा; ग्रीष्म में तड़ित-झंझा, जाड़े में वाताग्री वर्षण; ग्रीष्म ~27°C, जाड़ा 5-12°C; दैनिक तापांतर कम; वर्षा 75-150 से.मी. | पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका; दक्षिणी-पूर्वी चीन, दक्षिणी जापान; उत्तर-पूर्वी अर्जेंटीना, तटीय दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी ऑस्ट्रेलिया |
| Cfb समुद्री पश्चिम तटीय |
समुद्र के असर से जाड़ा अक्षांश की तुलना में मृदुल: ग्रीष्म 15-20°C, जाड़ा 4-10°C; वार्षिक और दैनिक तापांतर कम; वर्षा साल भर, 50-250 से.मी. | उत्तर-पश्चिमी यूरोप; उत्तरी अमेरिका का पश्चिमी तट, कैलिफ़ोर्निया के उत्तर में; दक्षिणी चिली, दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड |
5समूह क् और म्: शीत और ध्रुवीय जलवायु
5.1 शीतल हिम-वन जलवायु (D)
उत्तरी गोलार्ध के विशाल महाद्वीपीय क्षेत्रों में, 40° और 70° उत्तरी अक्षांश के बीच, यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका में पाई जाती है। अक्षांश बढ़ने के साथ जाड़े की उग्रता भी बढ़ती है, और यह समूह दो प्रकारों में बँटता है।
| प्रकार | कूट | विवरण |
|---|---|---|
| आर्द्र जाड़ों वाली ठंडी जलवायु | Df | ठंडे और बर्फ़ीले जाड़े, छोटी तुषार-मुक्त ऋतु, बड़ा वार्षिक तापांतर, मौसम अचानक बदलता है। समुद्री पश्चिम तटीय और मध्य-अक्षांशीय स्टेपी जलवायु से ध्रुवों की ओर पाई जाती है। |
| शुष्क जाड़ों वाली ठंडी जलवायु | Dw | मुख्यतः उत्तर-पूर्वी एशिया में पाई जाती है। जाड़े में तेज़ प्रतिचक्रवात बनता है और ग्रीष्म में कमज़ोर पड़ जाता है, जिससे पवनों में मानसून जैसा उलटाव आता है। जाड़ा बेहद ठंडा, कुछ जगहों पर तापमान लगातार सात महीनों तक हिमांक से नीचे रहता है। वार्षिक वर्षा कम, 12-15 से.मी., और ग्रीष्म में होती है। |
5.2 ध्रुवीय जलवायु (E)
70° अक्षांश से आगे ध्रुवों की ओर पाई जाती है, दो प्रकारों में बँटी हुई।
| प्रकार | कूट | विवरण |
|---|---|---|
| टुंड्रा | ET | यहाँ उगने वाली छोटी वनस्पति (काई, लाइकेन, फूलदार पौधे) के नाम पर रखा गया नाम। स्थायी तुषार (हमेशा जमी हुई उपमृदा) का क्षेत्र; छोटी वृद्धि-ऋतु और जलजमाव के कारण सिर्फ़ छोटे पौधे ही उग पाते हैं; ग्रीष्म में दिन का उजाला बहुत लंबा रहता है। |
| हिमटोपी | EF | ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के भीतरी हिस्सों में पाई जाती है। ग्रीष्म में भी तापमान हिमांक से नीचे रहता है, वर्षा बहुत कम होती है। बर्फ़ और हिम लगातार जमा होते रहते हैं, बढ़ता दबाव हिम-चादरों को तोड़ देता है और वे हिमशैल (आइसबर्ग) बनकर आर्कटिक-अंटार्कटिक जल में तैरने लगते हैं। प्लेट्यू स्टेशन, अंटार्कटिका (79°द॰) इसी जलवायु का असली उदाहरण है। |
स्थायी तुषार (permafrost) वह उपमृदा है जो साल भर स्थायी रूप से जमी रहती है, यह टुंड्रा क्षेत्रों में पाई जाती है।
एक आम सवाल पूछता है कि भारतीय प्रायद्वीप किस जलवायु में आता है। भारतीय प्रायद्वीप का ज़्यादातर हिस्सा Am, उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु में आता है, न कि Af में और न किसी शुष्क प्रकार में।
6जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक, सतत प्रक्रिया है
आज हम जिस तरह की जलवायु का अनुभव करते हैं, वह पिछले लगभग 10,000 वर्षों से थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ लगभग वैसी ही बनी हुई है। पर पृथ्वी अपनी उत्पत्ति के बाद से जलवायु में इससे कहीं बड़े बदलाव देख चुकी है, और इसके कई अलग-अलग सबूत मिलते हैं।
6.0 जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक होने के सबूत
भूगर्भिक अभिलेख
पृथ्वी के इतिहास में हिमयुगों और अंतर-हिमयुगों के बदलते क्रम को दिखाते हैं।
भू-आकृतियाँ
ऊँचाई और उच्च अक्षांशों वाले इलाकों में हिमानियों के आगे बढ़ने और पीछे हटने के निशान आज भी मौजूद हैं।
हिमानी झीलों के अवसाद
उनकी परतें उष्ण और शीत काल के बदलते क्रम को उजागर करती हैं।
वृक्षों के वलय
इनका पैटर्न बीते आर्द्र और शुष्क काल का संकेत देता है।
ऐतिहासिक अभिलेख
फसलों की बर्बादी, बाढ़ और लोगों के प्रवास को बदलती जलवायु से जोड़कर बताते हैं।
6.1 भारत में जलवायु परिवर्तन
भारत में भी आर्द्र और शुष्क काल आते-जाते रहे हैं। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि लगभग 8,000 ईसा पूर्व राजस्थान का मरुस्थल आर्द्र और शीतल जलवायु वाला था। 3,000 से 1,700 ईसा पूर्व के दौरान यहाँ वर्षा ज़्यादा होती थी। लगभग 2,000 से 1,700 ईसा पूर्व तक यह क्षेत्र हड़प्पा सभ्यता का केंद्र रहा। इसके बाद से यहाँ शुष्कता लगातार बढ़ती गई है।
6.2 भूगर्भिक अतीत में जलवायु
लगभग 500 से 300 करोड़ वर्ष पूर्व, कैंब्रियन, ऑर्डोविसियन और सिल्युरियन कालों के दौरान, पृथ्वी गर्म थी। प्लीस्टोसीन युग में हिमयुग और अंतर-हिमयुग बारी-बारी से आते रहे, अंतिम प्रमुख हिमयुग-चरम लगभग 18,000 वर्ष पहले था। वर्तमान अंतर-हिमयुग, जिसमें हम अभी रह रहे हैं, 10,000 वर्ष पहले शुरू हुआ था।
6.3 हाल के अतीत की जलवायु
1990 के दशक में सदी का सबसे गर्म तापमान और दुनिया की कुछ सबसे भीषण बाढ़ें दर्ज हुईं। बदलाव के कुछ उल्लेखनीय प्रसंग:
जलवायु परिवर्तन किसी जगह या पूरी पृथ्वी की औसत मौसमी दशाओं में आने वाला कोई भी बड़ा, दीर्घकालीन बदलाव है। ऊपर दिए सभी सबूत बताते हैं कि यह एक प्राकृतिक और सतत प्रक्रिया है, कोई नई बात नहीं।
7जलवायु परिवर्तन के कारण
जलवायु परिवर्तन के कई कारण हैं, और वे दो समूहों में बँटते हैं।
7.1 खगोलीय कारण
सौर कलंक
सूर्य की सतह पर काले, ठंडे धब्बे जो एक चक्रीय ढंग से घटते-बढ़ते रहते हैं और सूर्य के उत्सर्जन को बदल देते हैं। कुछ मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार सौर कलंक बढ़ने पर मौसम ठंडा, आर्द्र और तूफ़ानी हो जाता है, और घटने पर गर्म व शुष्क, पर किताब साफ़ कहती है कि ये निष्कर्ष सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
मिलैंकोविच दोलन
पृथ्वी की अपनी कक्षीय विशेषताओं में आने वाले चक्र: सूर्य के चारों ओर इसकी कक्षा का आकार बदलना, पृथ्वी का डगमगाना, और इसके अक्षीय झुकाव में बदलाव। ये सभी पृथ्वी को मिलने वाले सूर्यातप (सौर ऊर्जा) की मात्रा बदल देते हैं, जिसका असर जलवायु पर पड़ सकता है।
7.2 पार्थिव कारण
ज्वालामुखी क्रिया
ज्वालामुखी उद्भेदन वायुमंडल में बड़ी मात्रा में एरोसोल (हवा में तैरते बारीक कण) फेंकता है। ये लंबे समय तक वायुमंडल में बने रहते हैं, जिससे सतह तक पहुँचने वाला सूर्यातप कम हो जाता है। हाल के पिनाटोबा और एल सियोन ज्वालामुखी उद्भेदनों के बाद पृथ्वी का औसत तापमान कुछ वर्षों तक गिरा रहा।
बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें
यह सबसे महत्त्वपूर्ण मानवजनित (मनुष्यों के कारण होने वाला) प्रभाव है। वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता सांद्रण भूमंडलीय ऊष्मन का कारण बन सकता है, जिसका विस्तृत विवरण नीचे है।
8भूमंडलीय ऊष्मन और ग्रीनहाउस प्रभाव
8.1 ग्रीनहाउस प्रभाव असल में क्या है
ग्रीनहाउस प्रभाव वायुमंडल का वह तापन है जो इसलिए होता है क्योंकि ग्रीनहाउस गैसें आगमी लघु तरंग सौर विकिरण को तो आसानी से गुज़रने देती हैं, पर पृथ्वी की सतह से निकलने वाले बहिर्गामी दीर्घ तरंग विकिरण को सोख लेती हैं।
यह नाम असली ग्रीनहाउस से आया है। इसका काँच आगमी लघु तरंग सूर्य-प्रकाश को आसानी से अंदर आने देता है, पर बहिर्गामी दीर्घ तरंग विकिरण के लिए अपारदर्शी होता है, इसीलिए ऊष्मा अंदर ही फँस जाती है और ग्रीनहाउस बाहर की हवा से ज़्यादा गर्म रहता है। बंद खिड़कियों वाली कार या बस भी ठीक यही करती है, गर्मियों में अंदर बाहर से ज़्यादा गर्मी लगती है और जाड़ों में अंदर बाहर से ज़्यादा गर्मी बनी रहती है।

8.2 ग्रीनहाउस गैसें (GHGs)
कुछ अन्य गैसें, जैसे नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), खुद ग्रीनहाउस गैसें नहीं हैं पर ग्रीनहाउस गैसों के साथ आसानी से क्रिया करके वायुमंडल में उनके सांद्रण को प्रभावित करती हैं।
ग्रीनहाउस गैसें वे वायुमंडलीय गैसें हैं जो पृथ्वी की सतह से निकलने वाले बहिर्गामी दीर्घ तरंग विकिरण को सोखती हैं, मुख्य गैसें हैं कार्बन डाईऑक्साइड, क्लोरोफ़्लोरोकार्बन्स, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और ओज़ोन।
कोई ग्रीनहाउस गैस कितनी असरदार है, यह तीन बातों पर निर्भर करता है: उसके सांद्रण में कितनी वृद्धि हुई है, वह वायुमंडल में कितने समय तक टिकती है, और वह किस तरंगदैर्घ्य का विकिरण सोखती है। CFCs बहुत असरदार होते हैं। ओज़ोन क्षोभमंडल (वायुमंडल की सबसे निचली परत, जहाँ हम रहते हैं) में नीचे रहते हुए पार्थिव विकिरण सोखने में बहुत असरदार होती है, जो इसकी समताप मंडल (क्षोभमंडल के ऊपर की परत, जहाँ असली ओज़ोन परत है) में निभाई जाने वाली रक्षा-भूमिका से बिल्कुल अलग है। कोई ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में जितने ज़्यादा समय तक टिकती है, उसकी वजह से आए बदलाव से पृथ्वी के वायुमंडलीय तंत्र को उबरने में उतना ही ज़्यादा समय लगता है।
| गैस | मुख्य स्रोत |
|---|---|
| कार्बन डाईऑक्साइड (CO2) | सभी ग्रीनहाउस गैसों में सबसे ज़्यादा सांद्रण; मुख्यतः जीवाश्म ईंधन (तेल, गैस, कोयला) जलाने से; वन और महासागर इसके प्राकृतिक सिंक (अवशोषक) हैं |
| क्लोरोफ़्लोरोकार्बन्स (CFCs) | मानवीय गतिविधियों की देन, पुराने रेफ्रिजरेंट और एरोसोल में इस्तेमाल होते थे |
| मीथेन (CH4) | प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों में गिनी जाती है |
| नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) | प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों में गिनी जाती है |
| ओज़ोन (O3) | समताप मंडल में प्राकृतिक रूप से बनती है; क्षोभमंडल में नीचे मौजूद होने पर ग्रीनहाउस गैस की तरह भी काम करती है |
वन-कटाई को आमतौर पर एक अलग कारण नहीं माना जाता, यह CO2 के ज़रिए ही असर डालती है: वन अपनी वृद्धि के लिए CO2 इस्तेमाल करते हैं, इसीलिए उन्हें काटना (भूमि-उपयोग में बदलाव) हवा में ज़्यादा CO2 छोड़ देता है। CO2 को अपने स्रोतों और सिंकों के बीच सामंजस्य बिठाने में 20 से 50 वर्ष लगते हैं, और इसका सांद्रण लगभग 0.5% सालाना की दर से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक पूर्व-औद्योगिक स्तर से CO2 के दोगुना होने को जलवायु मॉडलों में एक मानक सूचक की तरह इस्तेमाल करते हैं।
8.3 ओज़ोन और ओज़ोन छिद्र
ओज़ोन प्राकृतिक रूप से समताप मंडल में बनती है, जहाँ पराबैंगनी किरणें ऑक्सीजन को ओज़ोन में बदल देती हैं, इससे पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँच पातीं। समताप मंडल में पहुँचने वाले CFCs इसी ओज़ोन को नष्ट कर देते हैं। इसका सबसे बड़ा ह्रास अंटार्कटिका के ऊपर होता है, और इस ह्रासित हिस्से को ओज़ोन छिद्र कहा जाता है। यह छिद्र पराबैंगनी किरणों को रोके बिना ही क्षोभमंडल में उतरने देता है।
ओज़ोन छिद्र समताप मंडल में ओज़ोन के सांद्रण के गंभीर ह्रास वाला क्षेत्र है, जो अंटार्कटिका के ऊपर सबसे ज़्यादा है, इसका मुख्य कारण CFCs हैं।
8.4 क्योटो प्रोटोकॉल
ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए गए हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है क्योटो प्रोटोकॉल।
इसने 35 औद्योगिक देशों को बाध्य किया कि वे 2012 तक अपने उत्सर्जन को 1990 के स्तर से 5% कम कर दें।
8.5 भूमंडलीय ऊष्मन के प्रभाव
एक बार भूमंडलीय ऊष्मन शुरू हो जाए तो इसे उलटना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं होगा, पर जीवन-पोषक तंत्र पर इसका कुल प्रभाव हानिकारक ही होगा। हिमनदों और हिमटोपियों के पिघलने और समुद्री जल के ऊष्मीय प्रसार से समुद्र का स्तर बढ़ना, तटीय क्षेत्रों और द्वीपों के बड़े हिस्सों को डुबो सकता है, जिससे वहाँ रहने वाले लोगों के लिए सामाजिक समस्याएँ पैदा होंगी।
8.6 दुनिया असल में कितनी गर्म हुई है?
ऊपर बताए गए दोनों तापन काल के बीच थोड़ी शीतलता आई थी, जो उत्तरी गोलार्ध में ज़्यादा साफ़ दिखी। 1856 से 2000 के बीच दर्ज सात सबसे गर्म वर्षों में से सभी सात इसी अवधि के आख़िरी दशक में दर्ज हुए, और 1998 भी इसी दशक में आता है।
- जलवायु वर्गीकरण के तीन तरीके हैं: आनुभविक (देखे गए आँकड़े), जननिक (कारण), अनुप्रयुक्त (विशेष उद्देश्य); कोपेन की पद्धति आनुभविक है
- कोपेन ने 5 समूहों के लिए बड़े अक्षर (A, C, D, E आर्द्र; B शुष्क) और उनके अंदर के प्रकारों के लिए छोटे अक्षर इस्तेमाल किए, ये मध्यमान तापमान और वर्षण के आँकड़ों पर आधारित हैं
- समूह A (उष्णकटिबंधीय) में Af, Am, Aw; समूह B (शुष्क) में BSh, BWh, BSk, BWk; समूह C (कोष्ण शीतोष्ण) में Cwa, Cs, Cfa, Cfb; समूह D (शीतल हिम-वन) में Df, Dw; समूह E (शीत) में ET, EF
- भारतीय प्रायद्वीप का ज़्यादातर हिस्सा Am, उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु में आता है
- जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक है, यह भूगर्भ विज्ञान, भू-आकृतियों, हिमानी अवसादों, वृक्षों के वलय, ऐतिहासिक अभिलेखों और भारत के अपने आर्द्र-शुष्क चक्रों (8,000 ईसा पूर्व से) से साबित होता है
- कारण दो तरह के हैं: खगोलीय (सौर कलंक, मिलैंकोविच दोलन) और पार्थिव (ज्वालामुखी क्रिया, बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें)
- ग्रीनहाउस प्रभाव: लघु तरंग सूर्य-प्रकाश आसानी से अंदर आता है, पृथ्वी का दीर्घ तरंग विकिरण ग्रीनहाउस गैसों द्वारा ज़्यादातर फँसा लिया जाता है, ठीक काँच के घर की तरह
- प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें: CO2 (सबसे ज़्यादा सांद्रण, जीवाश्म ईंधन से), CFCs, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओज़ोन; CFCs समताप मंडल की ओज़ोन को भी नष्ट करते हैं, जिससे अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन छिद्र बनता है
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997, प्रभावी 2005, 141 देश) ने 35 औद्योगिक देशों को 2012 तक उत्सर्जन 1990 के स्तर से 5% कम करने के लिए बाध्य किया
- विश्व का औसत तापमान लगभग 14°C है; 1901-44 और 1977-99 दोनों में लगभग 0.4°C की बढ़त हुई; 1998 शायद पूरी सहस्राब्दि का सबसे गर्म वर्ष रहा
- 1 अंककोपेन की “A” प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी शर्त सही बैठती है?
(क) सभी महीनों में उच्च वर्षा(ख) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से ज़्यादा(ग) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18°C से ज़्यादा(घ) सभी महीनों का औसत तापमान 10°C से कम - 1 अंकजलवायु के वर्गीकरण की कोपेन की पद्धति को कहा जा सकता है:
(क) अनुप्रयुक्त(ख) क्रमबद्ध(ग) जननिक(घ) आनुभविक - 1 अंकभारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भाग को कोपेन की पद्धति के अनुसार किस समूह में रखा जाएगा?
(क) “Af”(ख) “BSh”(ग) “Cfb”(घ) “Am” - 1 अंकनिम्नलिखित में से किस वर्ष में विश्व का सबसे गर्म तापमान दर्ज होने का अनुमान है?
(क) 1990(ख) 1998(ग) 1885(घ) 1950 - 1 अंकनीचे दिए गए चार जलवायु समूहों में से कौन-सा समूह आर्द्र दशाओं को दर्शाता है?
(क) A-B-C-E(ख) A-C-D-E(ग) B-C-D-E(घ) A-C-D-F - 1 अंकअब तक दर्ज सबसे ऊँचा छाया तापमान, 58°C, कहाँ दर्ज हुआ था?
(क) अल-अज़ीज़िया, लीबिया(ख) डेथ वैली, अमेरिका(ग) सहारा, अल्जीरिया(घ) थार, भारत - 1 अंकक्योटो प्रोटोकॉल ने 35 औद्योगिक देशों को 2012 तक उत्सर्जन घटाकर किस स्तर पर लाने के लिए बाध्य किया?
(क) 1990 के स्तर से 5% कम(ख) 2000 के स्तर से 10% कम(ग) 1997 के स्तर के बराबर(घ) 1970 के स्तर से 15% कम - 1 अंकइस अध्याय में बताई गई निम्नलिखित में से कौन-सी प्रमुख ग्रीनहाउस गैस नहीं है?
(क) कार्बन डाईऑक्साइड(ख) मीथेन(ग) नाइट्रोजन(घ) ओज़ोन
कारण (R): यह देखे गए मध्यमान वार्षिक और मध्यमान मासिक तापमान तथा वर्षण के आँकड़ों पर आधारित है।
कारण (R): कुछ मौसम वैज्ञानिक ज़्यादा सौर कलंकों को ठंडे, आर्द्र मौसम से जोड़ते हैं।
कारण (R): निचले क्षोभमंडल में मौजूद होने पर ओज़ोन पार्थिव (दीर्घ तरंग) विकिरण सोखने में बहुत असरदार होती है।
- 1 अंकजलवायु वर्गीकरण के लिए कोपेन ने किन दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया?
- 1 अंककोपेन द्वारा तय किए गए पाँच प्रमुख जलवायु समूहों के नाम बताइए।
- 1 अंककोपेन के कूट में छोटे अक्षर “w” का क्या मतलब है?
- 1 अंकITCZ की परिभाषा दीजिए।
- 1 अंकस्थायी तुषार (permafrost) क्या है?
- 1 अंकध्रुवीय जलवायु के दो प्रकारों के नाम बताइए।
- 1 अंकओज़ोन छिद्र क्या है, और यह सबसे ज़्यादा कहाँ पाया जाता है?
- 1 अंकक्योटो प्रोटोकॉल की घोषणा किस वर्ष हुई थी?
- 3 अंकवर्गीकरण की “जननिक” प्रणाली “आनुभविक” प्रणाली से किस तरह अलग है?
- 2 अंककिस प्रकार की जलवायुओं में वार्षिक तापांतर बहुत कम होता है? एक उदाहरण दीजिए।
- 3 अंककुछ मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, सौर कलंकों की संख्या बढ़ने पर किस तरह की जलवायविक दशाएँ प्रचलित होंगी?
- 3 अंकउपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी (BSh) और उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थल (BWh) जलवायु में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- 2 अंकवायुमंडल ग्रीनहाउस गैसों से परोक्ष रूप से गर्म क्यों होता है, सीधे ज़मीन को गर्म करके क्यों नहीं?
- 3 अंकजलवायु परिवर्तन के किन्हीं तीन खगोलीय और पार्थिव कारणों को बताइए।
- 3 अंकजलवायु परिवर्तन को एक प्राकृतिक प्रक्रिया साबित करने वाले किन्हीं तीन सबूतों को बताइए।
- 2 अंकवन-कटाई का वायुमंडल में CO2 के बढ़ते स्तर से क्या संबंध है?
- 3 अंकभूमध्यसागरीय जलवायु को उसके तापमान और वर्षा की विशेषताओं के साथ समझाइए।
- 2 अंकअतीत में जलवायु परिवर्तन के लिए भारत क्या सबूत देता है?
- 5 अंक“A” और “B” प्रकार की जलवायु की दशाओं की तुलना कीजिए।
- 5 अंक“C” और “A” प्रकार की जलवायु में आपको किस तरह की वनस्पति मिलेगी?
- 5 अंक“ग्रीनहाउस गैसों” से आप क्या समझते हैं? ग्रीनहाउस गैसों की सूची बनाइए और ग्रीनहाउस प्रभाव कैसे काम करता है, समझाइए।
- 5 अंककोपेन की पद्धति के पाँचों प्रमुख जलवायु समूहों को उनकी पहचान की शर्तों और हर समूह के एक-एक प्रकार के साथ समझाइए।
- 5 अंकजलवायु परिवर्तन के खगोलीय और पार्थिव कारणों पर विस्तार से चर्चा कीजिए।
- 5 अंकभूमंडलीय ऊष्मन पर एक व्याख्यात्मक टिप्पणी लिखिए, इसके कारण, सबूत और प्रभावों को शामिल करते हुए।
- क्योटो प्रोटोकॉल और भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन से निपटने में इसकी भूमिका के बारे में जानकारी इकट्ठा कीजिए।