- व्यवहार को “अपसामान्य” कहलाने वाले चार “D” और अपसामान्यता के दो परस्पर विरोधी मत
- इतिहास में अपसामान्य व्यवहार की व्याख्याएँ, और आज के जैविक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक मॉडल
- मनोवैज्ञानिक विकारों का आधिकारिक वर्गीकरण (डीएसएम-5, आईसीडी-10)
- इस अध्याय में दिए गए बारह प्रमुख वर्गों के मनोवैज्ञानिक विकारों के लक्षण एवं विशेषताएँ
- आत्महत्या के जोखिम कारक, चेतावनी संकेत और रोकथाम: एक संवेदनशील विषय
रोगोन्मुखता-दबाव मॉडलदुश्चिंता विकारमनोविदलतातंत्रिकाजन्य विकार
विच्छेदी विकारमादक द्रव्य संबंधित विकार
यह अध्याय CBSE 2026-27 पाठ्यक्रम की यूनिट IV (मनोवैज्ञानिक विकार) है, जो 70 सैद्धांतिक अंकों में से 12 अंक का है।
कक्षा 12 मनोविज्ञान में एक 30 अंकों का प्रायोगिक भाग भी है (केस प्रोफ़ाइल फ़ाइल, पाँच
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रशासन एवं व्याख्या, तथा मौखिक परीक्षा): इसका मूल्यांकन अलग से
होता है और यह इन नोट्स में शामिल नहीं है।
1 परिचय
हम में से हर व्यक्ति जीवन में किसी न किसी मोड़ पर समस्याओं का सामना करता है: परीक्षा से पहले,
करियर की चिंता में, या जब कोई अपना बीमार हो जाए। अधिकांश लोग इनसे निपटकर आगे बढ़ जाते
हैं। लेकिन कुछ लोग जीवन की समस्याओं और तनावों पर अत्यधिक तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं, और यहीं
से मनोविज्ञान में अपसामान्य व्यवहार के अध्ययन की शुरुआत होती है।
अनुकूलन व्यक्ति की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह बदलती पर्यावरणीय आवश्यकताओं के
अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन ला सकता है। जब परिस्थिति की आवश्यकताओं के अनुसार व्यवहार
में परिवर्तन नहीं हो पाता, तो उसे दुरनुकूलक (maladaptive) कहते हैं।
अपसामान्य मनोविज्ञान मनोविज्ञान का वह क्षेत्र है जो दुरनुकूलक व्यवहार, उसके कारणों,
परिणामों और उपचार पर केंद्रित है।
मनोवैज्ञानिक विकारों के अध्ययन ने 2,500 से भी अधिक वर्षों से सभी संस्कृतियों को
विस्मित एवं कौतूहलयुक्त रखा है।
अध्याय की शुरुआती पंक्ति से
“मैं बिना कोई छाया डाले वास्तविक कैसे हो सकता हूँ? मेरा कोई गहन पक्ष भी होना चाहिए
यदि मैं पूर्ण होना चाहता हूँ और अपनी छाया के प्रति सचेत होने से मैं एक बार और याद करता हूँ कि मैं भी
किसी अन्य की भाँति एक मनुष्य हूँ।”
कार्ल युंग, अध्याय के परिचय में उद्धृत
- यह विषय संवेदनशीलता से पढ़ें। कुछ अनुभूत संकेतों/लक्षणों के आधार पर अपने या किसी और
के बारे में कोई सुनिश्चित निष्कर्ष न निकालें कि उसे कोई विकार है। - मनोवैज्ञानिक विकारों के बारे में केवल ज्ञान या सूचना प्राप्त कर लेने मात्र से उनके निदान या
उपचार की अनिवार्य कुशलता प्राप्त नहीं हो जाती। - एक दूसरे का उपचार करने का प्रयास न करें: मनोनैदानिक परीक्षण के लिए नैदानिक
मनोविज्ञान/उपबोधन में विशिष्ट प्रशिक्षण आवश्यक है।
2 अपसामान्यता तथा मनोवैज्ञानिक विकारों की अवधारणाएँ
अपसामान्यता की कोई एक परिभाषा सर्वमान्य नहीं है। लेकिन अधिकांश परिभाषाओं में चार समान
विशेषताएँ पाई जाती हैं, जिन्हें अक्सर चार “D” कहा जाता है।
विसामान्यता (Deviance)
भिन्न, पराकोटि, असामान्य, यहाँ तक कि बेतुकी
कष्ट (Distress)
व्यक्ति और दूसरों के लिए अप्रिय और परेशान करने वाला
अपक्रिया (Dysfunction)
दैनिक जीवन की क्रियाओं को ठीक से करने में बाधा
खतरा (Danger)
व्यक्ति या दूसरों के लिए संभावित रूप से खतरनाक
चारों D को पुस्तक के एक-एक पंक्ति के अर्थ के साथ लिखें: विसामान्य, कष्टप्रद, अपक्रियात्मक
और खतरनाक।
चूँकि “अपसामान्य” का शाब्दिक अर्थ है “सामान्य से हटकर,” इसलिए इसमें किसी मानक या
मानदंड से विचलन निहित है: परंतु मनोविज्ञान के पास तुलना करने के लिए व्यवहार का कोई एक
“आदर्श” या “सामान्य प्रतिरूप” नहीं है। इसीलिए दो मूल, परस्पर विरोधी मत उभरे हैं:
मत 1: सामाजिक मानकों से विचलन
- अपसामान्य = ऐसा व्यवहार जो समाज की उचित क्रियाशीलता की धारणाओं से स्पष्ट रूप से हटकर हो
- मानक किसी समाज की अपनी संस्कृति, इतिहास, मूल्यों और संस्थाओं से विकसित होते हैं
- प्रतिस्पर्धा को महत्व देने वाली संस्कृति आक्रामकता को स्वीकार कर सकती है; सहयोग को महत्व देने वाली संस्कृति (जैसे भारत) उसी व्यवहार को अपसामान्य कह सकती है
- समस्या: यह इस धारणा पर आधारित है कि सामाजिक रूप से स्वीकृत व्यवहार अपसामान्य नहीं है तथा सामान्यता केवल सामाजिक मानकों के प्रति अनुरूपता है
मत 2: दुरनुकूलक व्यवहार
- सर्वोत्तम कसौटी सामाजिक स्वीकृति नहीं, बल्कि यह है कि व्यवहार व्यक्ति और समूह के कल्याण को बढ़ावा देता है या नहीं
- कल्याण का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि वृद्धि और पूर्ति (मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम की तरह क्षमताओं की सिद्धि) भी है
- अनुरूप व्यवहार भी दुरनुकूलक होने पर अपसामान्य हो सकता है: उदाहरण के लिए, ऐसा विद्यार्थी जो मन में प्रश्न होते हुए भी कक्षा में चुप रहता है
3 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पश्चिमी सभ्यता के इतिहास में अपसामान्य व्यवहार के लिए तीन व्याख्याएँ बार-बार सामने आती
रही हैं: अलौकिक, जैविक/आंगिक (शरीर से संबंधित), और मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य।
ग्लेन के चार वृत्ति/द्रवों (रक्त, काला पित्त, पीला पित्त, श्लेष्मा) को भारतीय त्रिदोष (वात, पित्त,
कफ़) के साथ मिलाइए नहीं। किताब इन्हें दो अलग परंपराओं की समान अवधारणाओं के रूप में
प्रस्तुत करती है, एक ही तीन/चार वस्तुओं के रूप में नहीं।
4 मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्गीकरण
वर्गीकरण साझा विशेषताओं के आधार पर विकारों की श्रेणियों की एक सूची है। यह मनोवैज्ञानिकों,
मनोरोग विशेषज्ञों और समाजसेवियों को विकारों के बारे में संवाद करने में सक्षम बनाता है, और
उनके कारणों तथा विकास एवं बने रहने की प्रक्रियाओं को समझने में सहायता करता है।
डीएसएम-5 (DSM-5)
- अमरीकी मनोरोग संघ (APA) द्वारा प्रकाशित
- पूरा नाम: Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders, 5वाँ संस्करण
- किसी विकार की उपस्थिति या अनुपस्थिति के लिए स्पष्ट नैदानिक मानदंड प्रस्तुत करता है
आईसीडी-10 (ICD-10)
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा प्रकाशित
- पूरा नाम: ICD-10 Classification of Behavioural and Mental Disorders (अंतरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण का 10वाँ संशोधन)
- भारत सहित अन्यत्र आधिकारिक रूप से प्रयुक्त; प्रत्येक विकार के नैदानिक लक्षण और निदान-दिशानिर्देश देता है
5 अपसामान्य व्यवहार के अंतर्निहित कारक
विभिन्न उपागम भिन्न-भिन्न कारकों पर बल देते हैं: जैविक, मनोवैज्ञानिक तथा अंतर्वैयक्तिक, और
सामाजिक-सांस्कृतिक।
5.1 जैविक कारक
दोषपूर्ण जीन, अंतःस्रावी असंतुलन, कुपोषण और चोटें सामान्य विकास एवं क्रियाशीलता में बाधा
डाल सकती हैं। जैविक मॉडल के अनुसार अपसामान्य व्यवहार का जैवरासायनिक या शारीरिक आधार
होता है: प्रायः न्यूरॉनों के बीच सिनैप्स में संदेश ले जाने वाले न्यूरोट्रांसमीटरों में गड़बड़ी के कारण।
| न्यूरोट्रांसमीटर | अपसामान्य सक्रियता | संबंधित विकार |
|---|---|---|
| गामा एमिनोब्यूटिरिक एसिड (GABA) | कम सक्रियता | दुश्चिंता विकार |
| डोपामाइन | अत्यधिक सक्रियता | मनोविदलता |
| सीरोटोनिन | कम सक्रियता | अवसाद |
यह तालिका याद रखें: “GABA कम = दुश्चिंता, डोपामाइन अधिक = मनोविदलता, सीरोटोनिन कम
= अवसाद।”
आनुवंशिक कारक द्विध्रुवीय एवं संबंधित विकारों, मनोविदलता और बौद्धिक अशक्तता से जुड़े हैं,
परंतु शोधकर्ता यह नहीं पहचान पाए हैं कि कौन से विशिष्ट जीन मुख्यतः इसके दोषी हैं। ऐसा प्रतीत
होता है कि अधिकांशतः कोई एक जीन किसी विशेष व्यवहार या मनोवैज्ञानिक विकार के लिए
उत्तरदायी नहीं होता: कई जीन मिलकर काम करते हैं, और अधिकांश मनोवैज्ञानिक विकारों की व्याख्या अकेले जीव विज्ञान से नहीं की जा सकती।
5.2 मनोवैज्ञानिक मॉडल
मनोगतिक मॉडल (सबसे पुराना और सबसे प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मॉडल, जिसे सबसे पहले
फ्रॉयड ने प्रतिपादित किया) के अनुसार, व्यवहार, चाहे सामान्य हो या अपसामान्य, व्यक्ति के
भीतर की अचेतन मनोवैज्ञानिक शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है, जो एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया
करती हैं। अपसामान्य लक्षण तीन केंद्रीय शक्तियों के बीच द्वंद्व से उत्पन्न होते हैं: इदम्/इड (सहज आवश्यकताएँ, प्रेरणाएँ,
आवेग), अहम् (तर्कसंगत चिंतन) और पराहम् (नैतिक मानक)।
फ्रॉयड के अनुसार अपसामान्य व्यवहार अचेतन स्तर पर होने वाले मानसिक द्वंद्वों की प्रतीकात्मक
अभिव्यक्ति है, जिसका संबंध सामान्यतः प्रारंभिक बाल्यावस्था या शैशवावस्था से होता है।
व्यवहारात्मक मॉडल कहता है कि सामान्य और अपसामान्य दोनों प्रकार के व्यवहार सीखे
जाते हैं, और मनोवैज्ञानिक विकार दुरनुकूलक व्यवहार-प्रतिरूपों को सीखने का परिणाम हैं: अतः
जो सीखा गया है उसे भुलाया भी जा सकता है।
संज्ञानात्मक मॉडल के अनुसार अपसामान्य क्रियाशीलता संज्ञानात्मक समस्याओं से उत्पन्न हो
सकती है: स्वयं के बारे में अविवेकशील या गलत मान्यताएँ और दृष्टिकोण, तर्कहीन चिंतन, और
अतिसामान्यीकरण (एक छोटी-सी नगण्य घटना से व्यापक, नकारात्मक निष्कर्ष निकालना)।
मानवतावादी-अस्तित्वपरक मॉडल मानव अस्तित्व के व्यापक पक्षों को देखता है। मानवतावादियों
का मानना है कि लोग जन्म से ही मित्रतापूर्ण, सहयोगी और रचनात्मक होने की स्वाभाविक प्रवृत्ति
लेकर पैदा होते हैं, और आत्म-सिद्धि की ओर प्रेरित होते हैं। अस्तित्ववादियों का मानना है कि हमें
जन्म से ही अपने अस्तित्व को अर्थ देने या इस उत्तरदायित्व से बचने की पूर्ण स्वतंत्रता है: जो इससे
बचते हैं वे खाली, अप्रामाणिक तथा अपक्रियात्मक जीवन जीते हैं।
मनोवैज्ञानिक मॉडलों में मनोवैज्ञानिक तथा अंतर्वैयक्तिक कारकों को भी अपसामान्य व्यवहार में
महत्वपूर्ण योगदान देने वाला माना जाता है:
मातृत्व वंचन
माँ से अलगाव, या प्रारंभिक वर्षों में स्नेह/उद्दीपन की कमी
दुरनुकूलक माता-पिता संबंध
अस्वीकृति, अतिरक्षण, अतिअनुज्ञेयता, दोषपूर्ण अनुशासन
दुरनुकूलक पारिवारिक संरचना
अपर्याप्त या बाधित परिवार; एक जालबद्ध परिवार जिसमें सदस्य एक-दूसरे की क्रियाओं, विचारों और भावनाओं में अत्यधिक शामिल रहते हैं: बच्चों के लिए स्वतंत्र होना कठिन हो जाता है
तीव्र तनाव
ऊपर के तीन पारिवारिक कारकों के साथ-साथ, तीव्र तनाव को भी अपसामान्य व्यवहार के पीछे एक मनोवैज्ञानिक/अंतर्वैयक्तिक कारक के रूप में नामित किया गया है
5.3 सामाजिक-सांस्कृतिक कारक
युद्ध और हिंसा, समूह पूर्वाग्रह और भेदभाव, आर्थिक और रोज़गार संबंधी समस्याएँ, तथा तीव्र
सामाजिक परिवर्तन अधिकांश लोगों पर दबाव डालते हैं और कुछ में मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उत्पन्न
कर सकते हैं। सामाजिक अवलंब की कमी भी महत्वपूर्ण है: जिन लोगों को सामाजिक अवलंब नहीं
मिलता उनके अवसादग्रस्त होने और बने रहने की संभावना अधिक होती है।
सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांतकार सामाजिक नामपत्र और भूमिकाओं की ओर भी इशारा करते
हैं: जब लोग सामाजिक मानकों को तोड़ते हैं, तो उन्हें “विसामान्य” और “मानसिक रोगी” कहा
जाता है। यह नामपत्र चिपक जाता है, व्यक्ति को “बीमार” की तरह व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित
किया जाता है, और वह धीरे-धीरे बीमार की भूमिका स्वीकार कर उसी के अनुरूप व्यवहार करने लगता है।
5.4 रोगोन्मुखता-दबाव मॉडल
यह अपसामान्य व्यवहार की सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत व्याख्याओं में से एक है, जिसे दुश्चिंता,
अवसाद और मनोविदलता सहित कई विकारों पर लागू किया गया है।
6 प्रमुख मनोवैज्ञानिक विकार
अध्याय मनोवैज्ञानिक विकारों को डीएसएम-5 के अनुसार बारह प्रमुख वर्गों में बाँटता है।
6.1 दुश्चिंता विकार
हमें दुश्चिंता का अनुभव तब होता है जब हम किसी परीक्षा की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं, किसी दंत
चिकित्सक के पास जाना होता है या कोई एकल प्रदर्शन प्रस्तुत करना होता है। यह सामान्य है,
जिसकी हमसे प्रत्याशा की जाती है; इससे हमें अपना कार्य अच्छी तरह करने की अभिप्रेरणा भी
मिलती है। इसके विपरीत, उच्च स्तरीय दुश्चिंता जो कष्टप्रद होती है तथा हमारे सामान्य
क्रियाकलापों में बाधा पहुँचाती है, दुश्चिंता विकार की उपस्थिति का संकेत है।
दुश्चिंता विकार मनोवैज्ञानिक विकारों का सबसे सामान्य वर्ग है। दुश्चिंता भय और आशंका
की एक अस्पष्ट, धुंधली, अत्यंत अप्रिय अनुभूति है, जिसके लक्षणों में तीव्र हृदय गति, साँस फूलना,
दस्त, भूख न लगना, बेहोशी, चक्कर आना, पसीना आना, नींद न आना, बार-बार पेशाब आना और
कँपकँपी शामिल हैं।
| विकार | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|
| सामान्यीकृत दुश्चिंता विकार | किसी वस्तु से न जुड़े दीर्घकालिक, अस्पष्ट, अवर्णनीय, तीव्र भय; अतिसतर्कता और पेशीय तनाव |
| आतंक विकार | तीव्र आतंक/भय के बार-बार होने वाले, अप्रत्याशित दौरे, साथ में शारीरिक लक्षण: साँस फूलना, धड़कन तेज़ होना, कँपकँपी, चक्कर, नियंत्रण खोने या मरने का भय |
| विशिष्ट दुर्भीति | विशिष्ट वस्तुओं, दूसरों के साथ अंतःक्रिया, या अपरिचित परिस्थितियों का अतार्किक भय |
| वियोगज दुश्चिंता विकार | घर या लगाव की वस्तु से अलगाव (या अलगाव की प्रत्याशा) पर अत्यधिक कष्ट |
| इस श्रेणी में अन्य | चयनात्मक गूंगापन/बहरापन, पदार्थ/औषधि-प्रेरित दुश्चिंता विकार, अन्य चिकित्सा स्थिति से उत्पन्न दुश्चिंता विकार |
तालिका 4.1: प्रमुख दुश्चिंता विकार और उनके लक्षण
दुर्भीति: जिन लोगों को दुर्भीति होती है उन्हें किसी विशिष्ट वस्तु, लोग या स्थितियों के प्रति
अविवेकी या अतर्क भय होता है। दुर्भीति बहुधा धीरे-धीरे या सामान्यीकृत दुश्चिंता विकार से उत्पन्न
होती है।
देब गाड़ी चलाते समय दिल की धड़कन तेज़ महसूस करने लगा और पसीना आने लगा; महीनों में
ये दौरे बढ़ते गए जब तक वह गाड़ी चलाने से डरने न लगा और अंततः घर से निकलना ही छोड़
दिया। पुस्तक दुश्चिंता विकारों की शुरुआत इसी केस से करती है पर इसका निदान नहीं बताती;
देब के दौरे पुस्तक में दिए आतंक आक्रमण के लक्षणों (तीव्र त्रास, दिल धड़कना, साँस की कमी,
सनकी होने या मरने का भय) से मिलते हैं।
6.2 मनोग्रस्ति-बाध्यता तथा संबंधित विकार
मनोग्रस्ति (Obsession)
किसी विशेष विचार या विषय के बारे में सोचना बंद न कर पाना, जो प्रायः व्यक्ति को अप्रिय या शर्मनाक लगता है
बाध्यता (Compulsion)
बार-बार कुछ विशेष व्यवहार करने की आवश्यकता महसूस होना: कई तरह की बाध्यता में गिनना, आदेश देना (ordering), जाँचना, छूना और धोना सम्मिलित होते हैं
इस श्रेणी में शामिल अन्य विकार: जमाखोरी विकार, बाल-खींचना विकार (त्रिकोटिलोमेनिया),
और त्वकछेदन (त्वचा-उधेड़ना) विकार।
6.3 अभिघात तथा दबावकारक संबंधित विकार
उत्तर अभिघातज दबाव विकार (PTSD) किसी प्राकृतिक आपदा (जैसे सुनामी), आतंकवादी बम
विस्फोट, गंभीर दुर्घटना, या युद्ध के बाद होता है। लक्षण भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, जिनमें बार-बार आने
वाले स्वप्न, अतीतावलोकन (flashbacks), एकाग्रता में कमी और भावनात्मक शून्यता शामिल हैं। इसमें
समायोजन विकार और तीव्र दबाव विकार भी सम्मिलित हैं।
6.4 कायिक अभिलक्षण तथा संबंधित विकार
बिना किसी शारीरिक बीमारी के शारीरिक लक्षण उत्पन्न होते हैं: व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक कठिनाइयाँ
बिना किसी जैविक कारण के शारीरिक शिकायतों के रूप में व्यक्त होती हैं।
| विकार | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| कायिक अभिलक्षण विकार | शरीर से संबंधित लगातार लक्षण; इनके प्रति अत्यधिक चिंता; बार-बार डॉक्टर के पास जाना; दैनिक जीवन में गंभीर कष्ट |
| बीमारी दुश्चिंता विकार | कोई गंभीर बीमारी होने की लगातार चिंता: मुख्य समस्या स्वयं यह चिंता है, शारीरिक शिकायत नहीं |
| परिवर्तन विकार | बिना किसी शारीरिक कारण के किसी शारीरिक क्रिया (पक्षाघात, अंधापन, बहरापन, चलने में कठिनाई) का ह्रास/हानि, प्रायः किसी तनावपूर्ण अनुभव के बाद |
6.5 विच्छेदी विकार
विच्छेदन (Dissociation) विचारों और भावनाओं के बीच संबंधों का विच्छेद है: इसमें अवास्तविकता,
विलगाव, व्यक्तित्व-लोप की भावनाएँ, और कभी-कभी पहचान की हानि या परिवर्तन शामिल है, जो
चेतना के अचानक, अस्थायी परिवर्तन से उत्पन्न होता है जो कष्टकर अनुभवों को रोक देता है।
| कायिक अभिलक्षण एवं संबंधित | विच्छेदी |
|---|---|
| कायिक अभिलक्षण विकार: बिना किसी चिकित्सा स्थिति के (या उससे असंगत रूप से अधिक) शरीर संबंधी लक्षण | विच्छेदी स्मृतिलोप: महत्वपूर्ण व्यक्तिगत, प्रायः तनावपूर्ण, जानकारी याद न रख पाना; भूलना सामान्य से परे होता है; अत्यधिक किंतु चयनात्मक स्मृतिभ्रंश जिसका कोई ज्ञात आंगिक कारण (जैसे सर में चोट लगना) नहीं होता |
| बीमारी दुश्चिंता विकार: किसी गंभीर बीमारी के होने की चिंता | व्यक्तित्व-लोप/स्वअनुभूति-लोप विकार: व्यक्ति की वास्तविकता की समझ और स्व-प्रत्यक्षण में परिवर्तन |
| परिवर्तन विकार: बिना शारीरिक कारण के पेशीय/संवेदी क्रिया की हानि | विच्छेदी पहचान विकार: दो या अधिक, भिन्न और वैषम्यात्मक व्यक्तित्व, सामान्यतः शारीरिक दुर्व्यवहार की घटनाओं से जुड़ा |
बॉक्स 4.1: कायिक अभिलक्षण एवं संबंधित विकारों तथा विच्छेदी विकारों की प्रमुख विशेषताएँ
विच्छेदी आत्मविस्मृति (fugue) विच्छेदी स्मृतिलोप का ही एक भाग है: घर/कार्यस्थल से अनपेक्षित
यात्रा, नई पहचान अपनाना, और पुरानी पहचान याद न रख पाना; यह तब समाप्त होता है जब व्यक्ति
“जाग जाता है” और उसे इस अवधि की कोई स्मृति नहीं रहती, और यह प्रायः अत्यधिक तनाव से जुड़ा
होता है। विच्छेदी पहचान विकार (जिसे अक्सर बहु-व्यक्तित्व कहा जाता है) सबसे नाटकीय विच्छेदी
विकार है, जो अक्सर बाल्यावस्था के अभिघातज अनुभवों से संबंधित होता है।
6.6 अवसादी विकार
अवसाद सबसे व्यापक रूप से प्रचलित और पहचाना जाने वाला मानसिक विकार है: यह एक लक्षण
या एक विकार दोनों को संदर्भित कर सकता है। किसी वास्तविक क्षति (जैसे संबंध टूटना, कोई लक्ष्य न
मिलना) के बाद रोज़मर्रा का “उदास महसूस करना” नैदानिक विकार के समान नहीं है।
मुख्य अवसादी विकार अवसादग्रस्त मनोदशा और/अथवा अधिकांश गतिविधियों में रुचि या
आनंद की हानि की अवधि है, साथ ही शरीर के वज़न में परिवर्तन, नींद की समस्याएँ, थकान,
स्पष्ट रूप से चिंतन करने में असमर्थता, क्षोभ, बहुत धीरे-धीरे कार्य करना, अत्यधिक अपराधबोध या निरर्थकता की
भावना, और मृत्यु एवं आत्महत्या के विचार जैसे लक्षण।
आनुवंशिक बनावट
मुख्य अवसादी तथा द्विध्रुवीय विकारों में आनुवंशिक संरचना या आनुवंशिकता खतरे का एक महत्वपूर्ण कारण है
उम्र
स्त्रियों को प्रारंभिक प्रौढ़ावस्था में अधिक जोखिम; पुरुष प्रारंभिक मध्यावस्था में अधिक जोखिम में
लिंग
पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अवसादी विकार बताए जाने की संभावना अधिक होती है
जीवन-घटनाएँ और अवलंब
नकारात्मक जीवन-घटनाएँ और सामाजिक अवलंब की कमी, दोनों जोखिम बढ़ाते हैं
इस विषय को तथ्यात्मक रूप से और बिना सनसनीखेज़ बनाए पढ़ें। हर आत्महत्या एक दुर्भाग्य
है। आत्महत्या पूरे जीवनकाल में घटित होती है। यह जैविक, आनुवंशिक, मनोवैज्ञानिक,
समाजशास्त्रीय, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय कारकों के जटिल अंतर्संबंध से उत्पन्न होती है। पूर्व में
आत्महत्या का प्रयास सबसे प्रबल जोखिम कारक है। अन्य जोखिम कारक: कोई मानसिक विकार
होना (विशेषकर अवसाद और मद्य-उपयोग विकार), प्राकृतिक आपदाएँ, हिंसा, दुर्व्यवहार या हानि,
और जीवन के किसी भी चरण में अलगाव।
आत्मघाती व्यवहार प्रायः समस्या-समाधान, तनाव-प्रबंधन और भावनात्मक अभिव्यक्ति में कठिनाई
को दर्शाता है; विचार तब कार्य में बदलते हैं जब उन पर अमल करना व्यक्ति की कठिनाइयों से बाहर
निकलने का “एकमात्र रास्ता” प्रतीत होता है। सामाजिक दायरे और समुदायों में आत्महत्या का असर
भयावह और दीर्घकालीन समय तक रहता है। आत्महत्या से जुड़ा कलंक (stigma) अनवरत है; इसकी
वजह से बहुत से लोग जो आत्महत्या का विचार या प्रयास करते हैं, वे सहायता के लिए कोशिश नहीं
करते। अतः पहचान में सुधार, रेफरल (अग्रप्रेषण) और व्यवहार का प्रबंधन आत्महत्या को रोकने में
निर्णायक हो सकते हैं। आत्महत्याएँ रोकी जा सकती हैं, और इसके लिए सरकार, मीडिया तथा
नागरिक समाज को शामिल करते हुए एक व्यापक, बहु-क्षेत्रीय उपागम चाहिए।
आत्महत्या के साधनों तक पहुँच सीमित करना · आत्महत्या की ज़िम्मेदार मीडिया रिपोर्टिंग ·
मद्य-संबंधी नीतियाँ · जोखिम में मौजूद लोगों की शीघ्र पहचान, उपचार और देखभाल · मूल्यांकन
और प्रबंधन में स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण · आत्महत्या का प्रयास कर चुके लोगों के लिए देखभाल
और सामुदायिक सहयोग।
एक किशोर के प्रदर्शन, उपस्थिति या व्यवहार को प्रभावित करने वाले किसी अनपेक्षित या ध्यान देने
योग्य परिवर्तन को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए, जैसे नीचे दिए संकेत।
कष्ट में विद्यार्थियों की पहचान
- सामान्य गतिविधियों में रुचि की कमी
- गिरते अंक
- घटता प्रयास
- कक्षा में दुर्व्यवहार
- रहस्यमयी या बार-बार अनुपस्थिति
- धूम्रपान, मद्यपान या नशे का दुरुपयोग
विद्यार्थियों का आत्म-सम्मान सशक्तीकरण
- सकारात्मक पहचान बनाने हेतु सकारात्मक जीवन-अनुभवों पर बल देना
- शारीरिक, सामाजिक और व्यावसायिक कौशल विकसित करने के अवसर देना
- विश्वसनीय संवाद स्थापित करना
- ऐसे लक्ष्य निर्धारित करना जो विशिष्ट, मापने योग्य, प्राप्त करने योग्य, प्रासंगिक और एक निश्चित समय-सीमा वाले हों
6.7 द्विध्रुवीय तथा संबंधित विकार
द्विध्रुवीय I विकार में उन्माद और अवसाद दोनों शामिल होते हैं, जो बारी-बारी से मौजूद रहते
हैं और कभी-कभी सामान्य मनोदशा की अवधियों से बाधित होते हैं; उन्माद के प्रकरण शायद ही
कभी अकेले प्रकट होते हैं: वे प्रायः अवसाद के साथ बारी-बारी से आते हैं। द्विध्रुवीय मनोदशा
विकारों को पहले उन्माद-अवसाद विकार कहा जाता था। इसके प्रकारों में द्विध्रुवीय I विकार,
द्विध्रुवीय II विकार, तथा चक्रविक्षिप्ति विकार शामिल हैं।
6.8 मनोविदलता वर्णक्रम तथा अन्य मनोविक्षिप्ति विकार
मनोविदलता मनोविक्षिप्ति विकारों के उस समूह का वर्णनात्मक नाम है जिसमें बाधित चिंतन
प्रक्रियाओं, विचित्र प्रत्यक्षणों, असामान्य भावनात्मक स्थितियों और पेशीय असामान्यताओं के कारण
व्यक्तिगत, सामाजिक और व्यावसायिक क्रियाशीलता में गिरावट आती है: यह रोगियों, परिवारों और
समाज पर भारी लागत डालने वाला एक दुर्बल करने वाला विकार है।
| भ्रमासक्ति का प्रकार | व्यक्ति क्या मानता है |
|---|---|
| उत्पीड़न (सर्वाधिक सामान्य) | उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा जा रहा है, जासूसी हो रही है, बदनाम, धमकाया या पीड़ित किया जा रहा है |
| संदर्भ | दूसरों की क्रियाएँ या साधारण वस्तुएँ/घटनाएँ उसके लिए विशेष, व्यक्तिगत अर्थ रखती हैं |
| अत्यहंमन्यता (महानता) | स्वयं को विशेष रूप से शक्तिसंपन्न व्यक्ति मानना |
| नियंत्रण | स्वयं की भावनाओं, विचारों और क्रियाओं को दूसरे लोग नियंत्रित करते हैं |
भ्रमासक्ति (Delusion) एक झूठा विश्वास है जो अपर्याप्त आधारों पर दृढ़ता से बना रहता है;
यह तर्कसंगत तर्क से प्रभावित नहीं होता और इसका वास्तविकता में कोई आधार नहीं होता।
मनोविदलता से ग्रसित व्यक्तियों में औपचारिक चिंतन विकार भी दिख सकते हैं, अर्थात
विषय के साहचर्य को खोना/विषय-अवपथन (तेज़ी से विषय बदलना), नवशब्द-निर्माण (नए शब्द/वाक्यांश गढ़ना), और
पुनरावृत्ति (एक ही विचार को अनुपयुक्त रूप से दोहराना), साथ ही विभ्रांति (बिना किसी बाह्य
उद्दीपन के प्रत्यक्षण): श्रवण विभ्रांति (सर्वाधिक सामान्य: रोगी से सीधे बात करती हुई आवाज़ें,
“द्वितीय-व्यक्ति,” या रोगी के बारे में बातें करती हुई आवाज़ें, “तृतीय-व्यक्ति”), साथ ही स्पर्शी,
दैहिक, दृष्टि, स्वाद, और घ्राण विभ्रांतियाँ। अनुपयुक्त भाव का अर्थ है परिस्थिति के अनुकूल न
होने वाले संवेग।
नकारात्मक लक्षणों में अलोगिया (वाक्-अयोग्यता), विसंगत भाव (संवेगों की सीमित परास) या
कुंठित भाव (कोई संवेग न दिखना), और इच्छाशक्ति न्यूनता (उदासीनता, कार्य शुरू या पूरा न
कर पाना), तथा सामाजिक विनिवर्तन शामिल हैं। मनःचालित लक्षण अपने चरम रूप कैटाटोनिया तक
पहुँच सकते हैं: कैटाटोनिक जड़िमा (लंबे समय तक गतिहीन और चुप रहना), कैटाटोनिक दृढ़ता
(घंटों तक एक कठोर, सीधी मुद्रा बनाए रखना), और कैटाटोनिक संस्थिति (लंबे समय तक विचित्र
मुद्राओं में बने रहना)।
6.9 तंत्रिकाजन्य विकार
इन विकारों में एक साझा विशेषता है: ये विकास की प्रारंभिक अवस्था में, प्रायः विद्यालय-प्रवेश से
पहले या विद्यालयी जीवन के आरंभिक वर्षों में प्रकट होते हैं, और व्यक्तिगत, सामाजिक, शैक्षिक तथा
व्यावसायिक क्रियाशीलता में बाधा डालते हैं: किसी व्यवहार में न्यूनता/अतिशयता, या उम्र के
अनुरूप व्यवहार प्राप्त करने में विलंब के रूप में। यदि इन विकारों पर ध्यान नहीं दिया गया तो जैसे-जैसे
बच्चा प्रौढ़ावस्था की ओर बढ़ता है, ये गंभीर और दीर्घकालिक विकारों को जन्म देते हैं।
ए.डी.एच.डी. (अवधान-न्यूनता अतिक्रिया विकार): अनवधान
- काम या खेल के दौरान मानसिक प्रयास बनाए रखने में कठिनाई
- मन को किसी एक चीज़ पर टिकाना, या निर्देशों का पालन करना कठिन
- सुनता नहीं, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता, अव्यवस्थित, आसानी से विचलित
- भुलक्कड़; काम पूरा नहीं करता; जल्दी ऊब जाता है
ए.डी.एच.डी.: अतिक्रियाशीलता-आवेगशीलता
- तत्काल प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने या सोचकर कार्य करने में असमर्थ
- बारी की प्रतीक्षा करने या संतुष्टि को टालने में कठिनाई
- लगातार गतिशील: छटपटाना, हिलना-डुलना, चढ़ना, बिना उद्देश्य के इधर-उधर दौड़ना
- माता-पिता और अध्यापक कहते हैं कि “उसके पैर में चक्की लगी है”; लगातार बोलते रहना
स्वलीनता वर्णक्रम विकार की विशेषता सामाजिक अंतःक्रिया और संप्रेषण में व्यापक बाधा, तथा
व्यवहार, रुचियों और गतिविधियों के रूढ़िबद्ध प्रतिरूप हैं: विभिन्न संदर्भों में सामाजिक अंतःक्रिया
और संप्रेषण में स्पष्ट कठिनाई, रुचियों की सीमित परास, और नियमित दिनचर्या की तीव्र इच्छा।
स्वलीनता वर्णक्रम विकार से ग्रसित लगभग 70% बच्चों में बौद्धिक अशक्तता भी होती है।
प्रभावित बच्चों को दूसरों से जुड़ने में गहरी कठिनाई होती है, वे सामाजिक व्यवहार शुरू नहीं कर
पाते, और दूसरों की भावनाओं के प्रति अप्रतिक्रियाशील प्रतीत होते हैं; कई कभी बोलना नहीं सीखते,
और जो सीखते भी हैं उनमें प्रायः दोहरावदार, असामान्य वाक्-प्रतिरूप होते हैं। व्यवहारों में वस्तुओं
को कतार में लगाना या झूलना (हाथ फड़फड़ाने जैसा स्व-उद्दीपक व्यवहार) या स्व-आघातकारी क्रियाएँ
(जैसे सिर पटकना) शामिल हो सकते हैं।
बौद्धिक अशक्तता औसत से कम बौद्धिक क्रियाशीलता (70 या उससे कम बुद्धिलब्धि)
के साथ-साथ अनुकूली व्यवहार में कमियों को कहते हैं: संप्रेषण, स्व-देखभाल, गृह-जीवन, सामाजिक
कौशल, प्रकार्यात्मक शैक्षिक कौशल, कार्य: जो 18 वर्ष की आयु से पहले प्रकट होती हैं।
| कार्य क्षेत्र | निम्न (बुद्धिलब्धि 55 से लगभग 70) | सामान्य/मध्यम (बुद्धिलब्धि 35/40 से लगभग 50/55) | तीव्र/अतिगंभीर (बुद्धिलब्धि लगभग 35/40 से नीचे, 20/25 से नीचे तक) |
|---|---|---|---|
| आत्म-अवलंब | स्वयं खाना खाता/कपड़े पहनता है, शौच की आवश्यकताएँ स्वयं संभालता है | प्रशिक्षण चाहिए किंतु पर्याप्त आत्म-अवलंब कौशल सीख सकता है | कोई कौशल नहीं या थोड़ा-बहुत, लेकिन कुछ थोड़ा-बहुत निजी काम कर सकते हैं |
| भाषा और प्रेषण | पर्याप्त ग्राही एवं अभिव्यक्तिपरक भाषा | पर्याप्त किंतु वाक्-समस्याओं सहित | ग्राही भाषा सीमित; अभिव्यक्तिपरक भाषा कमज़ोर |
| शैक्षिक | अनुकूल शिक्षण वातावरण में कक्षा 3 से 6 तक | अत्यंत सीमित; अधिकतम कक्षा 1 से 2 | कोई शैक्षिक कौशल नहीं |
| सामाजिक कौशल | मित्र बनाता है; शीघ्र समायोजित हो जाता है | मित्र बना सकता है, पर कई परिस्थितियों में संघर्ष करता है | वास्तविक मित्रता/सामाजिक अंतःक्रिया में असमर्थ |
| व्यावसायिक | नौकरी कर सकता है; प्रतिस्पर्धात्मक से अर्ध-प्रतिस्पर्धात्मक; मुख्यतः अकुशल काम | संरक्षित कार्य; निरंतर निगरानी चाहिए | सामान्यतः कोई रोज़गार नहीं; निरंतर देखभाल चाहिए |
| वयस्क जीवन | सामान्यतः विवाह करता है, संतान होती है; दबाव में सहायता चाहिए | सामान्यतः विवाह नहीं करता या संतान नहीं होती; निर्भर | कोई विवाह/संतान नहीं; सदा निर्भर |
तालिका 4.2: बौद्धिक अशक्तता के विभिन्न स्तरों वाले व्यक्तियों की विशेषताएँ
विशिष्ट अधिगम विकार जानकारी को कुशलतापूर्वक और सही ढंग से ग्रहण करने या संसाधित
करने में कठिनाई के रूप में प्रकट होता है; यह विद्यालयी जीवन के आरंभिक वर्षों में पठन, लेखन
और/अथवा गणित के मूल कौशलों में समस्याओं के रूप में सामने आता है। प्रभावित बच्चा अपनी उम्र
के हिसाब से औसत से नीचे प्रदर्शन करता है, परंतु अतिरिक्त सहयोग और प्रयास से एक स्वीकार्य
स्तर तक पहुँच सकता है।
6.10 हानिकारक/विघटनकारी, आवेग-नियंत्रण तथा आचरण विकार
विरुद्धक अवज्ञाकारी विकार (ODD) उम्र के अनुरूप न होने वाली ज़िद दिखाता है: बच्चा
चिड़चिड़ा, अवज्ञाकारी और शत्रुतापूर्ण व्यवहार करता है, परंतु स्वयं को क्रोधी या विरोधी नहीं
मानता, और अपने व्यवहार को परिस्थितियों की प्रतिक्रिया बताकर उचित ठहराता है। आचरण
विकार और समाजविरोधी व्यवहार उम्र के अनुरूप न होने वाली उन क्रियाओं को कहते हैं जो
पारिवारिक अपेक्षाओं, सामाजिक मानकों, या दूसरों के व्यक्तिगत/संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन
करती हैं: लोगों या जानवरों के प्रति आक्रामकता, गैर-आक्रामक संपत्ति विनाश, बड़ा छल या चोरी,
और गंभीर नियम-उल्लंघन।
शाब्दिक आक्रामकता
गाली देना, अपशब्द कहना
शारीरिक आक्रामकता
मारना, झगड़ना
शत्रुतापूर्ण आक्रामकता
दूसरों को चोट पहुँचाने के इरादे से
अग्रलक्षी आक्रामकता
बिना उकसावे के दूसरों पर हावी होना और उन्हें डराना-धमकाना
6.11 पोषण तथा भोजन विकार
युवाओं के लिए विशेष रुचि का विषय:
| विकार | प्रमुख विशेषताएँ |
|---|---|
| क्षुधा-अभाव (एनोरेक्सिया नर्वोसा) | विकृत शरीर-प्रतिमा (स्वयं को अधिक वज़न वाला समझना); खाने से इनकार, अनिवार्य रूप से व्यायाम करना, असामान्य खान-पान की आदतें; बड़ी मात्रा में वज़न घटा सकता है, यहाँ तक कि भूखा रहकर मर भी सकता है |
| क्षुधतिशयता (बुलीमिया नर्वोसा) | अत्यधिक मात्रा में भोजन करता है, फिर रेचक, मूत्रवर्धक या उल्टी द्वारा शरीर को शुद्ध करता है; शुद्धिकरण के बाद तनाव और नकारात्मक संवेगों से मुक्ति महसूस करता है |
| अनियंत्रित भोजन | सामान्य से तेज़ गति से बेकाबू भोजन करने के बार-बार होने वाले प्रकरण; तब तक खाता रहता है जब तक उसे महसूस न हो कि वह ज़रूरत से ज़्यादा खा चुका है, भूख न होने पर भी |
6.12 मादक द्रव्य से संबंधित तथा व्यसनकारी विकार
व्यसनकारी व्यवहार: चाहे अत्यधिक उच्च-कैलोरी भोजन (जो अत्यधिक मोटापे की ओर ले जाए)
हो, या मद्य अथवा कोकीन जैसे पदार्थों का दुरुपयोग हो: आज के समाज की सबसे गंभीर समस्याओं
में से एक है।
सभी मादक पेयों में एथिल एल्कोहल होता है, जो रक्त में अवशोषित होकर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र
(मस्तिष्क और मेरुरज्जु) तक पहुँचता है, जहाँ यह क्रियाशीलता को अवसादित करता है। यह पहले
निर्णय-क्षमता और संयम को नियंत्रित करने वाले मस्तिष्क क्षेत्रों को अवसादित करता है (इसलिए लोग
बातूनी, आत्मविश्वासी, प्रसन्न महसूस करते हैं); अधिक मात्रा अवशोषित होने पर निर्णय-क्षमता, वाणी
और स्मृति बिगड़ने लगती है, और लोग भावुक, तेज़ आवाज़ में या आक्रामक हो सकते हैं; पेशीय
कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं: लड़खड़ाकर चलना, धुंधला दिखना, सुनने में परेशानी, और गाड़ी चलाने या
सरल समस्याएँ हल करने में कठिनाई।
मद्य का दुरुपयोग करने वाले नियमित रूप से बड़ी मात्रा में पीते हैं और परिस्थितियों से निपटने के
लिए इस पर निर्भर रहते हैं; शरीर में सहनशीलता विकसित हो जाती है, जिससे समान प्रभाव के लिए
अधिक मात्रा चाहिए, और छोड़ने पर वापसी के लक्षण उत्पन्न होते हैं। मद्यव्यसनिता करोड़ों परिवारों, संबंधों
और जीविकाओं को बर्बाद कर देती है; नशे में गाड़ी चलाने वाले कई सड़क दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार
होते हैं; और इस विकार से ग्रसित लोगों के बच्चों में दुश्चिंता, अवसाद, दुर्भीति और मादक-द्रव्य
संबंधित विकारों की दर अधिक पाई जाती है। अधिक शराब पीना शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से
खराब कर सकता है।
हेरोइन
- सामाजिक और व्यावसायिक क्रियाशीलता में गंभीर बाधा डालती है
- अधिकांश दुरुपयोगकर्ताओं में निर्भरता, सहनशीलता और वापसी प्रतिक्रियाएँ विकसित हो जाती हैं
- सबसे प्रत्यक्ष खतरा: अधिमात्रा (overdose), जो श्वसन केंद्रों को धीमा कर देती है और मृत्यु का कारण बन सकती है
कोकीन
- नियमित उपयोग से दिन भर नशे की स्थिति बनी रह सकती है; सामाजिक/कार्य क्रियाशीलता खराब होती है
- अल्पकालिक स्मृति और ध्यान की समस्याएँ
- निर्भरता विकसित हो जाती है; छोड़ने पर अवसाद, थकान, नींद की समस्याएँ, चिड़चिड़ापन, दुश्चिंता होती है
- मनोवैज्ञानिक क्रियाकलापों और शारीरिक क्षेम या कल्याण पर इसका खतरनाक प्रभाव पड़ता है
मद्य · उत्तेजक (डेक्सट्रोएम्फेटामाइन, मेटाएम्फेटामाइन, कोकीन) · कैफीन (कॉफ़ी, चाय,
कैफीनयुक्त सोडा, दर्दनाशक, चॉकलेट, कोको) · भांग (मारिजुआना/भांग) · विभ्रांतिजनक (LSD,
मेस्कलीन) · सूँघने की दवाएँ (पेट्रोल, गोंद, पेंट थिनर, स्प्रे पेंट, टाइपराइटर
सुधारक द्रव) · तंबाकू (सिगरेट, बीड़ी) · अफ़ीम-वर्गीय (मॉर्फीन, हेरोइन, खाँसी की दवा, दर्दनाशक) ·
शामक/निद्राकारक/दुश्चिंता-रोधी (नींद की गोलियाँ, दुश्चिंता-रोधी औषधियाँ)।
- क्रियाकलाप 4.1: तीन लोगों से बात करके जानें कि वे किस व्यवहार को अपसामान्य मानते हैं और क्यों; कक्षा में साझी विशेषताएँ खोजें।
- क्रियाकलाप 4.2: ‘अपसामान्य’ व्यवहार जो किसी स्थिति में सामान्य हैं (प्रार्थना करते समय स्वयं से बात करना; यातायात पुलिसकर्मी का सड़क के बीच हाथ हिलाना); ऐसे और उदाहरण सोचें।
- क्रियाकलाप 4.3: दसवीं की बोर्ड परीक्षा से पहले के अपने शारीरिक और मानसिक लक्षण याद करें और उन्हें हल्के, मध्यम या गंभीर में बाँटें।
- क्रियाकलाप 4.4: बुरी खबर, क्षति या कम अंक जैसी घटनाएँ याद करें जिनसे आप उदास हुए, और अपनी प्रतिक्रियाओं की दूसरों से तुलना करें।
- क्रियाकलाप 4.5: दिए गए पाँच विश्वासों में भ्रमासक्ति का प्रकार पहचानें।
- अपसामान्य व्यवहार = विसामान्य, कष्टकारी, अपक्रियात्मक और खतरनाक (चार D)
- अपसामान्यता के दो मत: सामाजिक मानकों से विचलन बनाम दुरनुकूलक व्यवहार
- तीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: अलौकिक, जैविक/आंगिक, मनोवैज्ञानिक: अब जैव-मनोसामाजिक उपागम में मिल गए हैं
- डीएसएम-5 (APA) और आईसीडी-10 (WHO) द्वारा वर्गीकृत
- मॉडल: जैविक, मनोगतिक, व्यवहारात्मक, संज्ञानात्मक, मानवतावादी-अस्तित्वपरक, सामाजिक-सांस्कृतिक, रोगोन्मुखता-दबाव
- GABA↓ = दुश्चिंता, डोपामाइन↑ = मनोविदलता, सीरोटोनिन↓ = अवसाद
- बारह विकार वर्ग: दुश्चिंता, मनोग्रस्ति-बाध्यता संबंधित, अभिघात/दबावकारक संबंधित, कायिक अभिलक्षण, विच्छेदी, अवसादी, द्विध्रुवीय, मनोविदलता वर्णक्रम, तंत्रिकाजन्य, हानिकारक/आवेग-नियंत्रण/आचरण, पोषण एवं भोजन, मादक द्रव्य संबंधित एवं व्यसनकारी
- आत्महत्या: पूर्व प्रयास सबसे प्रबल जोखिम कारक है; यह बहु-क्षेत्रीय उपागम से रोकी जा सकती है
- क्या मैं बिना देखे चार D और अपसामान्यता के दोनों मत बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं मनोवैज्ञानिक विकारों के बारहों वर्गों को क्रम से नाम दे सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं GABA, डोपामाइन और सीरोटोनिन को उनके संबंधित विकारों से मिला सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं रोगोन्मुखता-दबाव मॉडल के तीनों घटकों की व्याख्या कर सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं मनोविदलता के सकारात्मक, नकारात्मक और मनःचालित लक्षणों में अंतर बता सकता/सकती हूँ?